Friday, March 13, 2009
बजट के बाहर बजट
इंतजार का फल मीठा होता है, ऐसा घर के बुजुर्ग कहते थे। मुङो भी ऐसी ही उम्मीद थी, खासकर तब जब इंतजार बुजुर्ग ही करा रहे हों। बड़ी आशा से बजट का इंतजार चल रहा था कि शायद कोई जादू हो जाय। शायद इस बार कम दाम होने के कारण दाल उछलकर खुद-ब-खुद कू कर में चली आएगी और हम लोगों को भी गाढ़ी दाल का स्वाद मिलेगा। आलू नाचते हुए थैले में आ गिरेगा और प्याज रोयेगी कि अब तो कोई मुङो ले जाओ। टमाटर मुस्क राकर कहेगा कि टच मी बेबी.टच मी और गोभी के फूल पर ग्राहक रुपी भंवरे मंडराएंगे। लेकिन इस बार इंतहां हो गई इंतजार की। कोई भी ऐसी घोषणा नहीं हुई और उम्मीद को सांप सूंघ गया।
इस बज्रपात से शेयर बाजार भरभराकर गिर गया। बीएसई, एनएसई ने कई फीसदी लुढ़क-लुढ़ककर संभलने की कोशिश की। निफ्टी का मामला भी फिफ्टी-फिफ्टी जसा होने लगा। उम्मीदें इस बार भी मुस्कराकर दम तोड़ी। सबसे अधिक उम्मीद कर्तव्यनिष्ट कलमकारों को थी, वो बजट भाषण के समय टकटकी लगाकर देख रहे थे कि बुढ़ऊ शायद कुछ बक दें, चश्मा का लेंस काश इस बार धोखा दे दे और बेरोजगारों की फ टी झोली में एकाध ही सही रसीली गोली आ जाए। लेकिन काश, काश ही रह गया और आस, आस। इस गंदी मंदी से जूझ रहे बेजार बाजार बेचारे बने रहे और सुनकर व्यापारी बौरा गए।
बहरहाल चाय के बाद चिंतन का दौर शुरू हुआ। सहीराम भी इसमें शामिल हुए। मन मंथन चित्त क्रंदन की व्यथा कथा के लिए सभी उत्साहित दिखे। किसी ने कहा, लेकिन इस बजट में किसानों को भारी पैकेज देने की सूचना है और सेना के लिए भी सरकार बढ़ोत्तरी कर रही है। इस पर आर्थिक मामलों के गुरु बाबा चवन्नी ने कहा कि मतलब भक्तजनों इस बार होरी, धनिया, गोबर होली में हर्बल कलर से होली खेलेंगे। लोन सस्ता होने पर निरहू रेडियो की जगह होम थिएटर ले लेगा। अब पूस की रात में हल्कू पश्मीना शाल ओढ़कर खेत की रखवाली करने जाएगा। स्लमडाग झबरा अब अलाव के पास नहीं रूम हीटर के पास बैठेगा। अब बुधिया चंदा मांगकर नहीं खाएगा। जरूर यह खबर सुनकर विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसान श्मशान में जाम लड़ाएंगे। माने अब सर्वहारा कि आरा.र.र.ररर।
लोन न चुका पाने के कारण सुखंडी हो चुके शिष्य घुरहू ने कहा कि बाबा जब हम प्यासे मर रहे होते हैं तो सरकार पानी की बूंद टपकाती है और मरने के बाद भोज कराती है। यह बजट भी कुछ इसी तरह का है। सबने एक सुर में कहा यह बजट हमारे बजट के बाहर है।
अभिनव उपाध्याय
Thursday, March 12, 2009
महापर्व की दक्षिणा
अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र की जो परिभाषा दी वह भारत में शत-प्रतिशत लागू होती है। चाहे बस की सीट हो या भीड़ की धक्का मुक्की, चाहे दंगे में धमा-चौकड़ी हो या मंदिर में दर्शन की लाइन। लोकतंत्र को भरे बाजार में अंगड़ाई भरते देखा जा सकता है। इस लोकतंत्र का एक पर्व है चुनाव और इसके महारथी इसे महापर्व कहते हैं। चौधरी चौपट को चुनाव लड़ने के लिए नए-नए पैतरें सीखने की जरूरत पड़ रही है। वह समर्थकों को बता रहे हैं कि इस महापर्व में चार पैर की कुर्सी रानी की पूजा करनी पड़ती है। क्या पता रानी कब रूठ जाएगी और जनसेवक सड़क पर आ जाएं इसलिए ध्यान रखना पड़ता है।
ढोल-ताशे वाले,ऊं ट, हाथी, घोड़े यही नहीं गदहा तक के लिए इस महापर्व में आमंत्रण पत्र तैयार किये जा रहे हैं। तरह-तरह के गानों का कापीराइट खरीदा जा रहा है। इस पर हो रहे बेहिसाब खर्च से अनजान एक पोस्टर बनाने वाले ने कहा कि इस महापर्व के आने से एक महीने में ही साल भर का खर्च निकल जाता है। पिछली सदी के उत्तराध्र्द में हुए मध्यावधि चुनाव में समझ लिए हमारी चांदी हो गई थी। हम तो मनाते हैं कि यह महापर्व हर साल आए।
राजनीति का ककहरा सीख रहे चौधरी चौपट इस पर्व के आने से मगन हैं। नए-नए कुर्ते का आर्डर दिया जा रहा है। अपने क्षेत्र में लोगों का सुख-दुख पूछा जा रहा है। अद्धा, पौवा और पूरी बोतल का इंतजाम भी अपने चरम पर है। माने खर्च बेहिसाब, लेकिन पैसा न होने से नेता जी के सामने धर्म संकट है। इस मंगल उत्सव को मनाने के लिए दक्षिणा की व्यवस्था सबसे सामने परेशानी का संक ट बन गई है। बहन जी के भाइयों ने एक इंजीनियर को जबसे निपटाया, नेता जी के गुर्गे सरकारी लोगों को फिलहाल कम छू रहे हैं। किसी ने सलाह दे दी कि पूंजीपतियों की घंटी बजाई जाए लेकिन नेता जी परेशान हैं, वह बता रहे हैं कि ये बैरा गए हैं पुराना जूता, चम्मच, कटोरी, चश्मा, लाठी यही सब खरीद रहे हैं इस महापर्व की दक्षिणा के लिए ही इनकी मुट्ठी नहीं खुलती।
किसी ने कहा किसानों से ले लो, बजट में सरकार ने इनकी बहुत सुनी है और फसल भी कटने वाली है। बस क्या था, पकड़ लिए गए गांव के वरिष्ठ खेतिहर लेकिन दशा ऐसी कि चौपट जी चकरा गए। इकहरा बदन देखकर किसी ने पूछा ये क्या हाल बना रखी है? सरकारी योजनाएं यहां नहीं लागू होती क्या? क ल्लू किसान ने कहा, होती हैं लेकिन जमाखोर, सूदखोर, कामचोर ये सब सरकारी मौसेरे भाई हैं। क्या करें पंचायत, प्रधानी, विधान सभा और लोक सभा चुनाव इसमें दक्षिणा देते-देते बस शरीर पर हड्डी का ढांचा बचा है। जाने किस गोंद से चिपका है कि हड्डियां बिखरती नहीं है। नेता जी वहां से हट कर दूसरे के पास दक्षिणा के लिए चले गए।
अभिनव उपाध्याय
Saturday, March 7, 2009
उद्गार
पंकज चौधरी जी हमारे सहकर्मी और कवि भी हैं। बिहार में मिथिलांचल की मिट्टी की महक और समसामयिक समस्याओं पर उनके उद्गार प्राय: शब्दों के रुप में बयां हो ही जाते हैं । प्रस्तुत है इसी तरह के कुछ उद्गार-
गरमी
भीषण गरमी है
आग के गोले बरस रहे हैं
पत्ता तक नहीं हिल रहा
पाताल भी सूख गया होगा
पिछले पच्चीस सालों का
रिकार्ड भंग हो गया है
..............
बड़े-बूढों की गरमी
ऐसे ही निकल रही थी
और दूधमुंहे-बेजुबान बच्चों की गरमी
घमोरियों में निकल रही थी ।
2. कैसा देश, कैसे-कैसे लोग
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कल तक जो बलात्कार करते आया है
और बलत्कृत स्त्री के गुप्तांगों में बंदूक देते चला आया है
कल तक जो अपहरण करते आया है
और फिरौती की रकम न मिलने पर
अपहृत की आंखें निकाल कर
और उसको गोली मारकर
चौराहे के पैर पर लटका देते आया है
कल तक जो राहजनी करते आया है
और राहगीरों को लूटने के बाद
उनके परखचे उड़ा देते आया है
कल तक जो बात की बात में
बस्तियां-दर-बस्तियां फूंक देते आया है
और विरोध नाम की चूं तक भी होने पर
चार बस्तियों को और फूंक देते आया है
कल तक जिसे
दुनिया की तमाम बुरी शक्तियों के समुच्चय के रूप
में देखा जाता रहा है
और लोग-बाग जिसके विनाश के लिए
देवी-देवताओं से मन्नतें मांगते आया है
आज वही छाती पर कलश जमाए लेटा हुआ है
नवरात्र में
दुर्गा की प्रतिमा के सामने
उसकी बगल में
दुर्गा सप्तशती का सस्वर पाठ किया जा रहा है
भजन और कीर्तन हो रहे हैं
कुछ लोग भाव-विभोर नृत्य कर रहे हैं
उसकी आरती उतारी जा रही है
अग्नि में घृत, धूमन और सरर डाले जा रहे हैं
घण्टी और घण्टाल बज रहे हैं
दूर-दूर से आए दर्शनार्थी
अपने हाथों में फूल, माला, नारियल आदि लिए
उसकी परिक्रमा कर रहे हैं
उसके पैरों में अपने मस्तक को टेक रहे हैं
और करबद्ध ध्यानस्थ
एकटंगा प्रतीक्षा कर रहे हैं
उससे आशीर्वाद के लिए
ये कैसा देश है
और यहां कैसे-कैसे लोग हैं!
3. वाह-वाह रे हमारा भारत महान
खाने-खेलने की उम्र में
कूड़े के ढेर पर
पोलिथिन बिछते बच्चे
अपने देश के नहीं
बल्कि जापान के बच्चे हैं
और उनकी धंसी हुई आंखें
पांजर में सटा हुआ पेट
और जिस्म पर गिननेवाली हड्डियों की रेखाएं
अपने देश की नहीं
बल्कि सोमालिया की हैं
और उनकी अर्जित की हुई सम्पत्ति
अपने देश भारत की है
वाह-वाह रे हमारा भारत महान!
4. चोर और चोर
पूस का महीना था
और पूरबा सांय-सांय करती हुई
बेमौसम की बरसात झहरा रही थी
जो जीव-जन्तुओं की हड्डियों में छेद कर जाती थी
और उसे उस बीच चौराहे पर
उस रोड़े और पत्थर बिछी हुई रोड पर
बूटों की नोक पर
फुटबाल की तरह उछाल दिया जाता था
तत्पश्चात उसकी फै्रक्चर हो चुकी हुई देह पर
बेल्टों की तड़ातड़ बारिश शुरू कर दी जाती थी
उसे लातों, मुक्कों, घुस्सों, तमाचों
रोड़े और पत्थरों से पीट-पीटकर
अंधा, बहरा, गूंगा और लूला बना दिया गया था
उसे बांसों और लकड़ियों से भी डंगाया जा रहा था
उसके ऊपर लोहे की रडों का ताबड़तोड़ इस्तेमाल करके
उसके दिमाग को सुन्न कर दिया गया था
और उस सबसे भी नहीं हुआ
तो उसके लहूलुहान मगज पर
चार बोल्डरों को और पटक दिया गया
जुर्म उसका यही था
कि वो एक चोर था
और एक बनिये की दुकान में
चोरी करते हुए पकड़ा गया था
दुनिया के सबसे बड़े और महान लोकतंत्र में
मानवाधिकार का साक्षात उल्लंघन हो रहा था
और ऐन उसी रोज एक चोर और पकड़ाया था
जो राष्ट्र का अरबों रुपया डकार गया था
लेकिन उसके लिए एयर कंडिशंड जेल का निर्माण हो रहा था!
5. यदि तुम्हारे
यदि तुम्हारे
कान बंद कर दिए जाएं तो?
तुम नहीं सुनोगे
यदि तुम्हारी आंखें
बंद कर दी जाएं तो?
तो तुम नहीं देखोगे
और यदि तुम्हारे
मुंह पर जाबी लगा दी जाए तो?
तो तुम्हारा शेर बनना लाजिमी है!
6. वे जब-जब राजपथ की ओर मुड़े
वे जब-जब राजपथ की ओर मुड़े
उनके बारे में प्रचार किया गया कि
उनके पास हाथ तो हो सकते हैं
पर खोपड़ी कहां
उनके सिर पर ताज तो हो सकता है
पर वैसा गौरव कहां
उनकी ही पूरी दुनिया है
क्या है कोई ऐसा विश्वासभाजन?
वे दुनिया को चला तो सकते हैं
पर वैसा चालक कहां
दुनिया के प्रति वे वफादार भी हो सकते हैं
क्या हैं कोई ऐसा माननेवाले माननीय?
उनके पास कुरूपता हो सकती है
सुन्दरता नहीं
उनकी जगह नरक में हो सकती है
स्वर्ग में नहीं
वे असुर हो सकते हैं
सुर नहीं
उनका स्थान पदतल है
सिर ऊपर नहीं
उनका राहु हो सकता है
चन्द्रमा नहीं!
वे कौन थे
और किनके बारे में ऐसा प्रचार करते आ रहे थे
आखिर उनका मकसद क्या था?
7. सचमुच
सचमुच में आप
बदलाव चाहते हैं?
सचमुच में आप
परिवर्तन चाहते हैं?
और सचमुच में आप
दुनिया को बदल देना चाहते हैं?
तो हटाइए
बोरिंग के उस मुहाने पर से
अपना जकड़ा हुआ हाथ
जिसकी कल-कल करती धारा को
आपने आजतक निकलने ही नहीं दिया!
- पंकज चौधरी
Friday, March 6, 2009
नजरें जो बदलीं..

नजरें जो बदलीं..
पिछले एक सप्ताह से बौद्धिक वर्ग से ताल्लुक रखने वाली महिलाएं बेहद सक्रिय नजर आ रही हैं। इन दिनों अखबार और चैनलों में भी कोई न कोई महिला संबंधी लेख पढ़ने को मिल ही जाता है। सबसे ज्यादा व्यस्त इन दिनों महिला पत्रकार हैं, क्योंकि उन्हें आठ मार्च के लिए सामग्री जो जुटानी है। मुश्किल यह है कि पुरानी बोतल में नई शराब भरें भी तो कैसे। क्योंकि महिलाओं की समस्याएं भी पुरानी हैं और समाज का नजरिए में भी कोई खास बदलाव नहीं आया है। लेकिन कलमकार होने की रस्म तो अदा ही करनी होगी। ऊपर मैंने समाज के नजरिए की बात की वही पुराना, घिसा-पिटा नजरिया। पहले सोचा भ्रूण हत्या पर लिखूं पर कुछ नया नहीं लगा। तकरीबन डेढ़ दशक पुराना है यह मुद्दा। दहेज पर हजारों लेख लिखे जा चुके हैं। घरेलू हिंसा अभी पं्रह दिन भी नहीं बीते मैंने हैबिटाट सेंटर के गुलमोहर हाल में इस मुद्दे को लेकर सीएसआर के सौजन्य से आयोजित एक प्रेस वार्ता में शिरकत की थी। सरकार के प्रति बहुत गुस्सा था बौद्धिक वर्ग की महिलाओं में। आरक्षण का मुद्दा भी उठाया गया। दबी कुचली महिलाओं के लिए इन परोपकारी महिलाओं ने आवाज उठाई। वार्ता खत्म करके जब मैं बाहर आई तो ऊनी शाल बेच रही महिला के भावहीन चेहरे को देखकर मैं समझ गई कि यह अंदर चलने वाली महिला आजादी की मुहिम से बेखबर है। सो इस मुद्दे को भी मैंने छोड़ दिया।
मुद्दा तलाशते-तलाशते मैं अचानक दिल्ली की वढेरा गैलरी में पहुंच गई, वहां पर लगी फोटोग्राफी की प्रदर्शनी देखकर मुङो सुकून का एहसास हुआ। इसलिए नहीं क्योंकि यह किसी महिला फोटग्राफर के फोटो की प्रदर्शनी थी, बल्कि इसलिए क्योंकि दिल्ली तक पहुंचने वाली यह महिला शादी गार्डिया एक ऐसे देश से ताल्लुक रखती है जहां आज भी बुर्का महिलाओं की पहचान है। दीवार पर शादी ने अपने कुछ फोटो भी लगाए थे। एक तस्वीर में शादी अपने कैमरे को निहार रही हैं। उस चेहरे को बेहद बारीकी से देखो तो आपको पता चलेगा कि इस महिला ने अपनी आइब्रो के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की है। बात आइब्रो बनवाने या पार्लर जाने की नहीं है बात है लगन की, ईरान जसे कट्टर देश में अपना वजूद बनाने के लिए इस महिला को कितना जूझना पड़ा होगा। वहां लगी फोटो खुद ही बयान कर देती हैं। बुर्के से ढके चेहरों के ठीक सामने रसोईंघर के बर्तन यानी कप प्लेट, कद्दूकस और भी ना जाने क्या-क्या। इस बात का सबूत है कि बुर्का तो मात्र प्रतीक है, इसकी आड़ में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कई बंदिशों से गुजर कर शादी ने दिल्ला तक का अपना सफर तय किया होगा। हालांकि शादी ने अपने ब्रोशर में इस बात का भी जिक्र किया है कि उसके अब्बा उन तंग दिमाग वाले लोगों से बेहद अलग थे जो लड़कियों की आजादी के खिलाफ होते हैं। यह तो महज एक उदाहरण है जो हालिया होने की वजह से मेरे जहन में ताजा था सो लिख दिया। लेकिन और भी ऐसी महिलाएं हैं जिन्हें बंदिशें रोक नहीं पाईं। पर ऐसी महिलाएं महिला दिवस जसे आयोजनों से दूर ही रहती हैं। उनका आदर्श कोई जुझारु इंसान होता है। उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि वह महिला है या पुरुष। वह चीख-चीख कर किसी आरक्षण की मांग भी नहीं करती हैं। मुझसे किसी ने कहा था कि नजरें क्या बदली नजारे बदल गए। शादी जसी महिलाएं नजरें बदलती हैं और ढूंढ़ती हैं अपने हिस्से का आकाश।
संध्या द्विवेदी, आज समाज
Thursday, March 5, 2009
जय हो, मगर किसकी!
खबर है कि सत्ताधारी दल कांग्रेस ने आस्कर विजेता फिल्म स्लमडाग मिलियेनर के गाने जय हो के कापीराइट को खरीद लिया। अब इस गाने की धुन पर कई जिंगल्ल बनाए जाएंगे। जिनका प्रयोग आगामी लोकसभा चुनाव में जनता तो लुभाने के लिए किया जाएगा। वैसे फिल्मी गानों पर राजनैतिक पार्टियाों का थिरकना नया नहीं है। फिल्म चक दे इंडिया में शाहरुख की टीम ने विपक्षी टीम को शिकस्त क्या दी। बस चक दे एक जुमला बन गया। राजनीति हो या क्रिकेट बस मैदान में एक ही गाना गूंजता था। चक दे, चक दे। तब भी कांग्रेसी इस गाने की धुन पर थिरके थे। तब इसका इस्तेमाल गुजरात में किया गया था। हालांकि गुजराती मन पर इस गाने का कोई असर नहीं हुआ। और रील लाइफ से इतर कांग्रेस को रीयल लाइफ में हार का मुंह देखना पड़ा था। जनता ने मोदी को सत्ता सौंप कर यह साबित कर दिया था कि वोट प्रचार पर नहीं, बल्कि मुद्दों पर मिलते हैं। गुजरात की जनता के मन में मोदी यानी विकास पुरुष के रूप में स्थापित हैं। हालांकि यह भी बहश का मुद्दा है कि गुजरात की चमक कितनी सतही है। क्योंकि हालिया कुछ खबरों पर गौर करें तो गुजराते के गांव-देहात में यह चमक फीकी पड़ती दिखाई देती है। खैर, इस बात को तब तक नहीं उठाया जा सकता जब तक आंखों न देख लिया जाए। फिर भी धुआं उड़ा है तो कहीं न कहीं आग तो होगी ही। यानी पूरी न सही पर कुछ प्रतिशत ही सही सच्चाई तो जरूर होगी। खैर राजनीति विषय ही ऐसा है कि किसी एक गली में गुजरते ही कई रास्ते खुल जाते हैं। यानी किसी एक पार्टी का जिक्र करो तो खुद-बखुद कई पार्टियां उस बहश की जद में आ जाती हैं। हम बात कर रहे थे जय हो की। आस्कर विजेता फिल्म स्लमडाग में यह गाना पूरी फिल्म की आत्मा है। किस तरह स्लम में रहने वाला एक बच्चा केबीसी सरीखे प्रोग्राम में एक करोड़ रुपए जीतने में कामयाब होता है। जय हो, जीत और सफलता का पर्याए है। कांग्रेस ने भी जीत के मंसूबों के साथ ही इस गाने को प्रचार का माध्यम बनाया है। पर गुजरात की हार से पार्टी को सबक तो जरूर लेना चाहिए कि अब जनता को लुभाना आसान नहीं है। प्रचार का सुर जो भी हो, लेकिन जब तक असल मुद्दों को न केवल उठाया जाएगा बल्कि सत्ता में आने के बाद अमल में भी लाया जाए तभी जनता उन्हें सड़क से संसद तक जाने का मौका देगी। ध्यान रहे रास्ता दोतरफा है, दूसरा रास्ता संसद से सड़क तक का भी है। जय हो, लेकिन केवल पार्टी की नहीं बल्कि इस जीत में जनता भी शामिल हो।
संध्या द्विवेदी, आज समाज
Thursday, February 26, 2009
Monday, February 23, 2009
सबकी जय हो
स्लमडॉग मिलेनियर ने भारतीय सिनेमा के लिए भी इतिहास रच दिया। अब विदेशी सिनेमा के लोग भी भारतीयों को थोक के भाव अवसर देगें। पहले बस गिने चुने लोग ही हालीवुड में जाकर अर्ध, पूर्ण और अपूर्ण तरीके से डायलॉग बोलते समय मुंह खोलते थे। जो नहीं जा पाते थे। उनका कलेजा कचोटता था लेकिन फिलहाल संकरा रास्ता और चौड़ा हो गया है। अब भारतीय लोग भी विदेशियों के साथ इस चौड़े रास्ते पर चलेगें। मुम्बई का हर स्लमडॉग अब मिलेनियर बनने के लिए डैनी बोएल का इंतजार करेगा। काश किसी की नजर इधर पड़ जाए।
भारतीय सिनेमा जगत और व्यापार पर भी इसका असर पड़ेगा। तमाम बेस्लमडाग सोच में पड़ गए होंगे। गुलजार ने एक बार फिर अपने को सिद्ध कर दिया। अल्ला रक्खा रहमान अब हालीवुड के मेहमान बन जाएगें। शायद इनका भी रेट बढ़ जाए। अनिल कपूर को भी इसका फायदा मिलेगा। फ्रिदा पिंटो और देव पटेल की भी कई फिल्मों के लिए आफर पाएंगें। माने एक साथ सबकी जय हो गई।
इतनी बधाइयां मिली की मन अघा गया। जय हो गाना, बजट पास होने के बाद पराजय की मुद्रा होने पर भी जुबान पर चढ़ गया। मतलब तबीयत कैसी भी हो हर हाल में जय हो।
सब फायदों के बीच एक बात समझ में नहीं आई, क्या गुलजार ने जय हो से बेहतर गाने नहीं लिखें हैं या रहमान ने इससे अच्छा संगीत नहीं दिया है या भारतीय कलाकारों ने इससे बेहतर अभिनय नहीं किया है। इसका उत्तर भी हम जानते हैं। क्योंकि भारत का हिंदी भाषी गीत प्रेमी गुलजार को और पूरे भारत का संगीत प्रेमी रहमान की संगीत का दीवाना है। लेकिन जब ऑस्कर की बात आती है तो हमें सारी योग्यता मूढ़ता में बदल जाती है। हमें शुक्रगुजार होना चाहिए डैनी बॉयल का जिसकी बदौलत हमारे देश में भी आस्कर आ गया और हम सुबह से ही जय हो-जय हो कहते लगे। एक प्रश्न जो कचोटता है वह यह है कि आखिर कब तक हमें ऑस्कर के लिए डैनी बॉयल जसे लोगों की राह देखनी पड़ेगी।
Saturday, February 21, 2009
इन्हे देखकर याद आया कुछ

इन्हे देखकर याद आया कुछ
‘मैं पिछले बाइस साल से यहां आती हूं। तब मेले में मजदूरी करने आई थी, लेकिन जब यहां पर लोगों की भीड़ देखी तो लगा मैं भी सामान बेंच सकती हूं और तभी से हर साल आती हूं।ज् राजस्थानी लोक कला को समृद्ध करने भंवरी देवी सूरजकुंड मेले में तब से आती हैं जब से यह मेला शुरु हुआ है। दिल्ली और आस-पास के लोगों को राजस्थानी लोक कला इतनी भाती है कि इनका कोई भी सामान बच कर वापस नहीं जाता। चाहे लड़ी हो या छल्ले, कठपुतली हो या इंडी या फिर कपड़े का बना पर्स, घोड़ा या गणेश जी इनकी हर सामान से ग्राहक मौजूद हैं।
इस काम में इनका बड़ा लड़का मदन मेघवाड़ सहयोग करता है। ये गांव की चक्की पर बाजरा पीसती हुई दर्शकों को दिखाती हैं। उनका कहना है कि शहर के लोग चक्की नहीं देखे हैं इसे चलाते हुए वह देखना चाहते हैं, खासकर बच्चे इसमें काफी रुचि लेते हैं।
भंवरी देवी ने यह काम कैसे सीखा इसके बारे में वह बताती हैं कि ‘जब मैंे दस साल की थी तभी से बकरी चराती थी और उन लोगों के पास बैठती थी जो कसीदेकारी और गोटे का काम करती थी तभी से मैं भी यह बनाने लगी।ज् इनके काम की खासियत यह है कि इसमें केवल सुई-धागा और कतरन का प्रयोग किया गया है। मात्र सोलह रुपए दिहाड़ी पर काम करने वाली भंवरी देवी मेले में अपनी रोज की आमदनी पांस सौ से दो हजार बताती हैं। लगभग बासठ वर्षीय भंवरी देवी कला श्री सम्मान से सम्मानित हो चुकी हैं। राजस्थान में नागौर जिला के भांवता गांव की रहने वाली भंवरी देवी जब अपने गांव होती हैं तो शादी या अवसरों पर गीत भी गाती हैं। मेले के बारे में वह बताती हैें कि यहां पर मिलने वाला लोगों का प्यार उन्हे इस उम्र में भी खींच लाता है।
ये एक खबर है अखबार के लिए लेकिन इसमें कई सच्चाई भी है जसे आज के युवा चक्की से अनभिज्ञ हैं। कबीर ने चक्की को पूजने की बात की थी लेकिन आज का युवा मेले में इस चक्की को देखते आता है। कितने तो वहां पर अजीब-अजीब से सवाल भी करते थे। भंवरी एक मिसाल लगी। मेहनत की। साहस की। और अपनी में से अर्जित की गई प्रतिष्ठा की।
लेकिन आखिर यह बाल मन कब तक खोजेगा, सरसों के फूल, गेंहू की बाली। ओखल-मूसल या आम की डाली। पब्लिक स्कूल का अध्यापक कबीर के दोहा पढ़ाने के बाद कैसे बता पाएगा कि चक्की कैसी होती है।
एक सवाल जो कौंधता है वह यह है कि हम वाकई अपनी जड़ों से कितना कट गए हैं।
अब एक व्यक्ति गत अनुभव बताता हूं- दिल्ली में दस रुपए गिलास गन्ने का रस पीना खल जाता है इस छोटी कमाई में और गांव का कोल्हू शायद तब बहुत याद आता है और देर तक पकते हुए गुड़ की खुशबू मदहोश कर देती है।
अभिनव उपाध्याय
Monday, February 16, 2009
सन्नाटा का संगीत
सन्नाटा का संगीत
संगीत जीवन से जुड़ा वह आवश्यक तत्व है जिसके बिना फीका है सबकुछ। यह किसी भी तत्व से उत्पन्न हो सकती है। चाहे सिल-बट्टे की खट-खट हो या चक्की के दो पाटों का घर्षण, चाहे ओखल में मूसल का प्रहार हो या सूप में उछलते गेहूं की ध्वनि, गरजते बादल हों या बूदों की रिमझिम, ऊंचाई से लहराकर गिरता झरना हो या समुद्र में थिरकती लहरों की उछल-कूद, पंक्षियों की फड़फड़ाहट हो या हवाओं की सरसराहट, सांसों की गति हो या दिल की धड़कन, सब में बसा है एक सुनाई देने वाला संगीत। लेकिन अगर सन्नाटा का संगीत सुनना हो तो पंडित बिरजू जी महाराज की महफिल में शिरकत करें और उनसे इसकी प्रस्तुति के लिए आग्रह करें। इकहत्तर वर्षीय पंडित जी की यौवन मदमाती प्रस्तुति आपको मंत्रमुग्ध कर देगी।
स्पिक मैके के सौजन्य से आयोजित लेडी श्रीराम कालेज में पंडित बिरजू जी महाराज के कथक नृत्य की प्रस्तुति की सूचना जसे मिली मन में एक बेचैनी सी हो गई, क्योंकि मैं कई दिनों से उनका कार्यक्रम देखने की चाहत पाले बैठा था। मेरा मानना है कि दिल्ली की भागमभाग में ऐसे कार्यक्रम अगर आप देखे तो ये आपको रिचार्ज कर देते हैं।
अपने सहकर्मी मित्र आलोक को जब यह बात बताई तो वह खुशी मन से मेरे साथ चलने को तैयार हो गए। वजह मैं जानता हूं, एक तो वह साहित्य प्रेमी हैं और दूसरे संगीत के प्रति अनुग्रही। एक सच यह भी है कि हम दोनों संगीत की गूढ़ता के अल्पज्ञ भी हैं। इसलिए एक दूसरे पर अपनी विद्वता आरोपित, प्रतिरोपित और अंतत: सहमति प्रदान क रते हैं। उनका कम बोलना हमें अवसर देता है।
बहरहाल, हम मदर डेरी से आए नोयडा मोड़ लेकिन कम्बख्त बस छूट गई, भला हो उस माल ढोने वाली टैक्सी का जिसने हमें गन्तव्य तक पहुंचाया। लेकिन हमें देर हो रही थी और आयोजन स्थल हम दोनों ने नहीं देखा था। मुश्किल तब हो गई जब हमें रास्ता भी गलत बता दिया गया। अब ये सोच रहा था कि कहीं कार्यक्रम शुरु न हो जाए लेकिन जब कार्यक्रम में पहुंचे तो पंडित जी ठीक पहले मंच पर आए थे और लोग खड़ा होकर उनका स्वागत कर रहे थे। पंडित जी के प्रशंसकों की भीड़ ने हमें बालकनी में बैठने को मजबूर कर दिया नहीं तो हम पंडित जी को करीब से निहारना चाहते थे। अद्भुत भाव-भंगिमा और घुंघरु की खनक के बीच पंडित जी ने अपने पिता और गुरु पं. लक्षन जी महाराज के बारे में बताते हुए अपना परिचय दिया। कथक और संगीत के बारे में जो उन्होंने बताया उनकी कुछ बातें इस प्रकार हैं, ‘संगीत वह भाषा है जो लय के आंचल में छिपी बैठी है। ताल लय को मात्रा देते हैं और घुंघरु उसे लय देते हैं। लय ईश्वर की कृपा है, यह हमारी जिंदगी है। संगीत हर जगह है। सन्नाटा में भी संगीत है।ज् इस संक्षिप्त उद्बोधन के बाद पंडित जी ने राग मालकोश में, ‘बरनत छवि श्याम सुंदर, लसत अंग पीत बसन, बंक भृकुटि गरे भाल..ज् पर मनमोहक प्रस्तुति दी।
इसके बाद शुरु हुई विशेष प्रस्तुति, मैंने बहुत से शास्त्रीय कार्यक्र म देखें हैं लेकिन ‘सन्नाटा के संगीतज् को सुनने और महसूस करने का यह हमारा पहला अनुभव था। घुंघरु की हल्की खनक और वातावरण की शांति पूर्ण सन्नाटा का आभास दे रही थी।
शरीर की लचक और पैरों की थिरकन से कहीं भी नहीं लगता था कि यह प्रस्तुति इकहत्तर वर्षीय उस जवान की है जो जिसे गुरु मानकर न जाने कितने जवान कथक की शिक्षा लेते हैं।
इस प्रस्तुति के बाद अब बारी थी तीन ताल की पर प्रस्तुति की। पंडित जी ने बताया कि तीन ताल आकाश है और घुंघरु इसमें तारों की भांति चमक रहा है। इसके बाद तीन ताल की पूरी प्रस्तुति में घुंघरु सुरों के बीच टिमटिमाता रहा। फिर पंडित जी ने छन्द, लय, ताल और बोल के माध्यम से कार्यक्रम में तराना, आरोह-अवरोह के बीच लचकती कमर और थिरकते पांव ने ऐसा जादू किया कि दर्शक समूह मंत्रमुग्ध सा देखते रह गये और हर प्रस्तुति पर दर्शकों की अनवरत तालियां बजती रहीं।
इसके बाद की प्रस्तुति भी आकर्षक और आनंदायक भी थी क्योंकि अब नायक और नायिक के यमुना पर मिलन की बारी थी। दरअसल नायक तबला था और नायिका घुंघरु थी। नायक आगे-आगे और नायिका पीछे-पीछे। इस बीच नायक का रुकना, नायिका का उसे चिढ़ाना, नायक का रुठना और नायिका का मनाना, नायिका के पांव में कांटा चुभना और नायक द्वारा निकालना, और एक कहासुनी के बाद अंतत: यमुना के किनारे दोनों का मिलन। इसका कथक के माध्यम से प्रस्तुति पर सैकड़ों हाथों की तालियों की गड़गड़ाहट की गूंज देर तक हाल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही। दर्शकों के लिए इस न भूलने वाली प्रस्तुति के बाद पारंपरिक कथक के साथ कुछ नए प्रयोग पंडित जी ने दिखाए, इसमें सांप-नेवला की लड़ाई, प्रकृति का चित्रण और अंतत: एक आलसी व्यक्ति की गतिविधियों के माध्यम से हास्य प्रस्तुत किया वह किसी भी लाफ्टर शो अधिक मनोरंजक लगी। यही नहीं इशारों में गोपनीय बातचीत की प्रस्तुति ने मानों लोगों को लोट-पोट कर दिया।
और अब अंत में एक ठुमरी की प्रस्तुति, ‘मोरी गागरिया काहे को फोरी रे श्याम, मैं तो गारी दूंगी ना..., जाए कहूंगी नन्द के दुआरे..ज् की प्रस्तुति के साथ इस कार्यक्रम का समापन किया। उनके साथ उस्ताद अकरम खान ने तबले पर थिरकती अंगुलियों का जो जादू बिखेरा उससे सभी दर्शक उद्वेलित हो गए। राजेश प्रसन्ना ने सरोद पर अच्छी प्रस्तुति दी।
इस तरह एक शाम सुहानी बीती। इसके बाद मैं हर उस शाम को जब अकेला होता हूं तो सन्नाटा में संगीत ढूंढता हूं और उसके मिलने पर एक मिठास देर तक महसूस करता हूं।
अभिनव उपाध्याय
Thursday, February 12, 2009
ये इश्क नहीं आसां...

ं ये इश्क नहीं आसां...
प्रेम दिवस के साथ ही नागफनियां भी उगने लगती हैं। युगल लुकाछिपी शुरु कर देते हैं। ये प्रेम पुजारी बचते रहते हैं कि कहीं श्रीराम भक्तों द्वारा घंटा न बज जाए। सहीराम ने अपने कवि मित्र से पूछा कि इस बार क्या प्रोग्राम है। उन्होनें दबी जुबान से कहा कि क्या बताएं, मंहगाई ने जेब ढीली कर दी है और शिव,राम की सेना ने. . .।
मधुमास मनाने की संभावनाएं बनने से पहले बिगड़ जाती हैं। आप तो जानते ही हैं कि लव मी, लव माई डाग। दरअसल उनका डॉग बेस्लम डॉग है, बहुत चटोर है। हमेशा बढ़िया चाकलेट ही खाता है। लव के चक्कर में डॉग की इतनी सेवा हो गई कि मधु चन्द्रिका की मिलन यामिनी को मंहगाई का ग्रहण लग गया। इस बार मधुमास को खास बनाने की सारी योजनाएं पानी भरती नजर आ रही हैं। फिर भी बड़ी मुश्किल से अठन्नी-चवन्नी जोड़कर रखा था कि 14 फरवरी को प्रेम दिवस मना ही लेंगे लेकिन डर लग रहा है कि पकड़े गए तो स्वघोषित नैतिक ब्रिगेड के सैनिक कहीं तेरही न कर दें। सुना है जितना राम ने सीता को नहीं खोजा था उससे अधिक श्री राम सेना वाले युगलों को खोज रहे हैं। अब सच बताएं सहीराम जी किसी ने सच ही कहा है कि ये इश्क नहीं आसां..।
सहीराम जी पिछले दिनों एक अद्भुत दुर्घटना मेरे साथ हो गई, वसंत के आगमन पर शहर के घोषित रसिकों ने ‘प्रेम पियासाज् कवि सम्मेलन किया उसमें मुङो भी आमंत्रित किया गया था। सच कहूं तो ‘लवज् पर कविता पाठ का आमंत्रण पाकर मन लबालब हो गया। मैंने कविता शुरू की, ‘मोहिनी तेरे नैन कटार, झंकृत होते मन के तारज् अभी स्वर पंचम तक पहुंचा ही था कि मंच के पीछे भगवा और त्रिशूल धारी भाइयों को देखा और श्रृंगार रस की कविता वीर रस में बदल गई। सहीराम ने आगे पूछा, क्या आपने कविता सुनाई? उन्होंने कहा हां लेकिन ऐसे- ‘गोरी तेरे नैन कटार, कर दुश्मन को तार-तार। तोड़, मरोड़ गर्दन उसकी, बैरी छुपा है सीमा पार।ज्
परेशानी तब हो गई जब इस अद्भुत कविता को सुनाकर श्रोताओं ने मुङो श्रृगांर और वीर रस के संयुक्त कवि ‘रसिक विद्रोहीज् की संज्ञा दे दी। रसिक विद्रोही ने आंख बंद कर संत वेलेंटाइन के प्रेम मंत्र का जप किया और प्रार्थना की कि हे संत जी इन घोंघा बसंतों को सपने में समझाओ, साथ में कवि बिहारी से भी अनुरोध किया और कहा, हे रीतिकाल के केशव इन्हे विरह व्यथा से अवगत कराओ शायद इनका पाषाण हृदय पिघल जाए। इस व्यथा को सुनने के बाद सहीराम ने कहा, इस नैतिक ब्रिगेड से मुङो भी चिंता है क्योंकि इश्क तो ऐसा गुनाह है जो शादीशुदा भी करता है।
अभिनव उपाध्याय
बीन की धुन पर अब सांप नहीं, नाचते हैं सपेरे

सांप पर प्रतिबंध के कारण इसमें सपेरों की होती है भागीदारी
सूरजकुं ड मेले में देश के विभिन्न प्रदेशों से आए लोकनृत्यों को देखने में दर्शकों की रुचि रही लेकिन आजकल मेले सपेरा नृत्य की धूम है। लेकिन आश्चर्य इस बात का है यहां बीन की धुन पर सांप नहीं बल्कि सपेरे खुद अपने साथियों के साथ नाचते हैं।
इस सपेरा नृत्य के मुखिया सीसानाथ ने बताया कि अब सरकार ने सांप नचाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। लेकिन दर्शकों को अब भी बीन की धुन सुनने और सांप का नृत्य देखने का शौक है। इसलिए हमारे नृत्य को देखने के लिए देश में ही नहीं विदेशों में भी दर्शकों की कमी नहीं रही।
मूलत: नाथ संप्रदाय के ये सपेरे कानिपा नाथ को अपना गुरू मानते हैं। उनका कहना है कि लोग हमारे बारे में जानना चाहते हैं हमारे नृत्य और बीन की धुन को भी समझना चाहते हैं।
सीसाराम भारत में हरियाणा ट्यूरिज्म की तरफ से इंडिया हैबिटेट सेंटर से लेकर अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर तीस लोगों के साथ प्रस्तुति दे चुके हैं। इसके अलावा वह विश्व के कई देशों में अपनी प्रस्तुति देने गए हैं। इंग्लैंड में बैंड के साथ ‘आन लॉग सांगज् और स्काटलैंड में ‘इमेजिन ग्रेमज् की धुन पर बीन की प्रस्तुति को वह यादगार मानते हैं यही नहीं एक सौ पांच सपेरों के साथ इटली में बीन की प्रस्तुति पर दर्शकों की सराहना वह आजतक नहीं भूलते हैं। वह हरियाणा सरकार का भी धन्यवाद व्यक्त करते हैं कि जो इस कला को जीवित रखने के लिए आर्थिक सहायता और कलाकारों को प्रोत्साहन देती है।
Saturday, February 7, 2009
एक पत्र कुबेर के नाम
लोकतंत्र में गणतंत्र को याद करने के बाद मंहगाई की मार से त्रस्त एक भारतीय नागरिक ने स्वर्ग में धन के देवता को एक पत्र लिखा। पत्र इस प्रकार है-
प्रिय कुबेर जी
दंडवत नमस्कार, बिना इस परवाह के कि कपड़े गंदे हो जाएंगे और इस आशा में कि शायद इसी बहाने आपकी तिजोरी की कुंडी खुल जाए और स्वर्ण कलश से छलक कर एक दो स्वर्ण मुद्रा इधर भी आ जाए। बड़ी आशा से यह पत्र आपको लिख रहा हूं। पिछले साल भी लिखा था लेकिन साढ़े नौ महीने तक कोई जवाब नहीं आया और इतने दिनों से मंदी बरकरार है। इसलिए फिर लिख रहा हूं मेहरबानी करके रिसीव कर लीजिएगा मेहरबानी होगी।
कुबेर जी धरती की बुलेटिन आप तक पहुंच रही होगी तो पता तो चल गया होगा कि आजकल कलमकारों के फांके कट रहे हैं, लेकिन आप निश्चिंत रहिएगा पुजारियों की चांदी है। मंदिर में भक्तों की कमी नहीं है। परेशानी कामन मैन को है, दुकानदार उनकी जेब काटने के लिए-नए उस्तरे इस्तेमाल कर रहा है। दुकान पर सामानों की रेट बढ़ते जा रहे हैं लेकिन वहां काम करने वाला नौकर सूखता जा रहा है। हमारी सरकार कोशिश कर रही है कि कुछ जादू हो जाए लेकिन आप तो जानते ही हैं कि ये लोग कितने अनाड़ी हैं।
कुबेर जी, हमारे पंडित जी ने बताया था कि आप देवताओं के वित्तमंत्री हैं शायद इसीलिए टीवी से लेकर फोटू तक में देवी-देवता एकदम चकाचक दिखते हैं, गहनों से लकधक। लेकिन हमारे यहां के वित्त मंत्री थोड़ा उस टाइप के हैं क्या करें एक साथ कई जिम्मेदारियां हैं, लड़खड़ा कर खड़े भी होते हैं तो पड़ोसी देश लंगी लगा देता है। हमारे प्रधानमंत्री भी सत्तर पार के हो गए हैं निर्णय भी उम्र के हिसाब से ही लेते हैं। वो आपके इंद्र का क्या हाल चाल है उनके रंग-ढंग बदले कि अभी..। उनसे कहिएगा इस साल थोड़ी मेहरबानी कर देगें हमारे यहां काफी किसान सूखे के कारण आपके पास चले गए हैं।
एक बात और वो युधिष्ठिर जी के कुत्ते का हाल भी लिखिएगा, हमारे यहां तो स्लमडॉग करोड़पति हो गया है और बेस्लमडॉग कार के शीशे से मुंह निकालकर स्लम वालों को जीभ चिढ़ाता है।
मनोरंजन का भी बुरा हाल है फिल्मों के टिकट मंहगे हो गए हैं, तारिकाओं पर मंदी का असर नहीं है इनका रेट बढ़ता ही जा रहा है। लेकिन आप अपने यहां की उर्वशी और मेनका टाइप तारिकाओं के बारे में थोड़ा डिटेल में दीजिएगा। एक बात भूल ही रहा था हमारे वित्त मंत्री को मंदी से निकलने का हल सपने में जरुर दे दीजिएगा भूलिएगा मत।
क्या करुं लिखना तो बहुत कुछ है लेकिन अभी पन्ना भर गया है और पेन की स्याही भी जवाब दे रही है। हमारे यहां पेट्रोल पर सब्सिडी है लेकिन कागज, कलम को कौन पूछता है। और अंत में लक्ष्मी जी से मेरा हेलो कहिएगा।
शेष सब ठीक है!
आपका दर्शनाभिलाषी
दुखीराम
अभिनव उपाध्याय
Friday, February 6, 2009
Monday, February 2, 2009
सत्यम् झूठम् सही है लूटम्
जनवरी की ठंड का अगर सबसे अधिक असर किसी पर पड़ा है तो वह है शेयर बाजार। आदमी तो फिर भी थोड़ा बहुत बाहर घूम टहल लेता है लेकिन शेयर तो ठंड के मारे उठा ही नहीं। ये आलस्य मीडिया को भी था बम्बई बम धमाके के बाद वह भी मसाले के अभाव में बस इधर उधर की दिखा सुना रहा था। एकाएक रामालिंगा राजू ने अपने क्रिया कलापों की जानकारी देकर लोगों के मिजाज में गर्मी ला दी। शेयर तो फिर भी आराम फरमाता रहा। मीडिया में खबर चल रही थी, सत्यम ने झूठा कारोबार दिखाकर करोड़ों रुपए ठगे। माने रामलिंगा राजू ने बिना गंगा नहाए काजू खाने का इंतजाम कर लिया। लेकिन धन्य हो भारत का सपूत कि पत्र लिखकर धोखाधड़ी की आत्मस्वीकृति कर ली। दो दिन भूमिगत रहा और निकला तो सीधे हवालात।
उसका यह कार्य चर्चा में रहा। इस पर तत्काल टिप्पणी के लिए सहीराम ने बाबा अठन्नी से संपर्क साधा। बाबा अठन्नी से जब सहीराम ने राजू की चर्चा की तो उन्होंने कहा, भक्त सहीराम मैं राजू की कारगुजारियों से तंग आ गया था कितनी बार समझाया कि सारा माल अकेले मत उड़ाओ कुछ आश्रम टाइप जगहों पर भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दिया करो, माघ का महीना है दुनिया बाबाओं को दान पुण्य करती है। लेकिन उसके कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अब बताओ देश की चौथी आईटी कंपनी की उसने तेरही कर दी।
सहीराम ने बाबा अठन्नी से कहा कि, बाबा कुछ भी हो रामलिंगा ने तो शेयर को गंगा में डुबा दिया। एकदम से नाक कटा दी। बाबा अठन्नी ने मुस्कुराते हुए कहा, सहीराम तुम्हे नहीं पता ऐसे लोग दो नाक वाले होते हैं। एक कट भी जाए तो दूसरी लेकर मुस्कुराते हुए जेल के बाहर फ्लाइंग किस देते हुए फिर वापस आ जाते हैं। सहीराम ने गर्दन हिलाते हुए बाबा अठन्नी की बात पर हैरानी जताई और बोले बाबा रामलिंगा राजू ने आत्मस्वीकृति करके अपनी नाक पर ही उस्तरा चला लिया। यही तो बात है भक्त, तुम्हे मार्केट का मंत्र पता नहीं है। राजू की इस क्रिया के बाद न जाने कितने विशेषण जुड़ते गए। सरकार ने भी उस पर अपनी सहानुभूति जता कर मदद करने की अपील की है। राजू ने यह काम अपने आजू-बाजू देखकर किया है।
सहीराम ने कहा, लेकिन कंपनी की तो काफी साख थी अब क्या होगा? होना क्या है इस कंपनी को तो अभी इक्कीसवां लगा है और जवानी में ऐसी गलती हो ही जाती है इसे सरकार भी समझती है और व्यापार भी। एक लाइन में बाबा इस प्रकरण को क्या कहेगें, सहीराम ने पूछा? बाबा ने कहा, सत्यम् झूठम् सही है लूटम्।
Monday, January 12, 2009
डिप्लोमा इन चाटुकारिता
विश्व आर्थिक मंदी में गोते खा रहा है। कंपनियां लोगों की कास्ट कटिंग कर रही हैं। ऐसे दौर में हमारा काम लोगों को सही तरह से सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में उन लोगों को ट्रेनिंग देना है जो लोगों की तारीफ करने में थोड़ा झिझक महसूस करते हैं। डिप्लोमा इन चाटुकारिता कोर्स के प्रबंधक लम्पट जी बड़े चाव से इसके बारे में सहीराम को बता रहे थे। सहीराम ने उनसे पूछा कि, इस कोर्स को शुरू की जरूरत आपको कैसे महसूस हुई? लम्पट जी ने कहा, यह मेरे व्यक्तिगत अनुभव की देन है। ऐसा हुआ कि मैं एक पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता था लेकिन मुङो चाटुकारिता नहीं आती थी और उम्र के इस पड़ाव पर भी मुङो टिकट नहीं दिया गया। लेकिन राजनीति को छोड़ कर अन्य क्षेत्रों में इसकी क्या उपयोगिता है? सहीराम ने पूछा, लम्पट जी ने मुस्कुराते हुए कहा, लगता है आप भी बिल्कुल सीधे ही हैं, अरे मिनिस्टर से लेकर चपरासी तक इसकी कमी के कारण प्रतियोगिता से बाहर हो जाते हैं और अब तो इसकी जरूरत व्यापक पैमाने पर महसूस होने लगी है।
सहीराम ने इसमें एडमिशन से संबंधित प्रक्रिया पूछी और लम्पट जी ने रिसेप्शन की तरफ इशारा कर दिया। रिसेप्शन पर बैठी चंचला चंद्रमुखी ने ड़ेढ इंच की मुस्कान के साथ ‘हाय हैंडसमज् कहकर उनका स्वागत किया। सहीराम ने उनसे पूछा, कितनी फीस देनी होगी। चंद्रमुखी ने कहा फीस का क्या है इसे डोनेशन ही समझिए यह पब्लिक वेलफेयर में ही है। वैसे आप जसे स्मार्ट के लिए पांच हजार कोई बड़ी रकम नहीं है। अगला सवाल था, यह कोर्स कितने दिनों का है? यह एक हफ्ते के शार्ट टर्म कोर्स की फीस है वैसे हमारे यहां एक महीने, दो महीने से लेकर एक साल तक के कोर्स भी कराए जाते हैं। अगर मास्टर डिग्री या रिसर्च करना हो तो फीस थोड़ी ज्यादा लगेगी लेकिन इसके फायदे की आप कल्पना तक नहीं कर सकते। सहीराम उसकी आंखों की चमक देखकर चौंधिया रहे थे तभी उसने क हा, आप को देखकर ऐसा लगता है कि आप जल्द ही सीख जाएंगे, इसलिए आपके लिए शार्ट टर्म कोर्स ही बेहतर होगा। सहीराम ने फिर पूछा कि आप के यहां कौन-कौन से लोग आते हैं? ओए यंग मैन, ये पूछिए कौन नहीं आता है हमारे यहां राजनीति, फिल्म, कारपोरेट, एजूकेशन, सरकारी मुलाजिम और अलग-अलग क्षेत्रों से लोग आ रहे हैं। पिछले दिनों रिफ्रेशर कोर्स के बदौलत ही कितनों ने इसका लाभ उठाया। अब आप भी देर न करें और दिलखोलकर इसका लाभ लें। उसने मुस्कुराते हुए एक दीर्घ सांस में यह बात कह दी।
सहीराम ने उनका फार्म लौटाते हुए कहा कि, वैसे आपके चेहरे से आपकी उम्र का पता नहीं चलता। रिसेप्शनिस्ट ने फौरन कहा, आप तो पहले से ही एक्सपर्ट हैं।
अभिनव उपाध्याय






चित्र मन के भाव बयां करते हैं। इरान के कलाकार इमान मलिकी की पेंटिंग आँखों को सजीव चित्र का आभास कराती हैं . ऊपर पेश है कुछ ऐसी ही पेंटिंग.जो गूगल से साभार ली गई है .



