Thursday, September 15, 2011

क्रांतिकारी बदलाव का संकेत है संसद और जनता के बीच का टकराव - मेधा पाटकर

मेधा पाटकर से वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी की बातचीत-

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का कैसा असर देखती हैं आप?

अभी तो हर तरफ भावनाओं से भरपूर माहौल है। विचार स्पष्ट नहीं है। सवाल भ्रष्टाचार से मुक्ति का है और उसके लिए कड़ा कानून चाहिए। पर ये लंबी प्रक्रिया है और अभी वो चलेगी। स्थाई समिति सारीचीजों को देखकर सारे प्रस्तावों पर विचार कर क्या निर्णय लेती है यह अभी देखा जाना है। इसलिए अभी कुछ नहीं कहा जा सकता कि इस आंदोलन को कितना लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा। लेकिन एकबात जरूर हुई है इस आंदोलन में बहुत सारे युवा जुड़े गरीब तबके से भी लोग आये। मीडिया के कारण मध्यवर्ग बड़े पैमाने पर जुड़ा। हमें सभी का स्वागत किया जाना चाहिए। भ्रष्टाचार सभी की समस्या है। इससे गरीब भी चिंतित है।

कहा जाता है कि अन्ना हजारे का आंदोलन मूलत: मध्यवर्ग के इर्दगिर्द ही केंद्रित था। इसलिए यह एक तरह से भ्रष्ट होते उदारीकरण को सुधारने का प्रयास था। इसमें किसी बुनियादी बदलाव का स्वर नहीं था?

रामलीला मैदान में जमा हुए लोगों में मध्यवर्ग की संख्या 30 प्रतिशत से ज्यादा नहीं थी। बाकी निम्न वर्गीय और गरीब तबके के लोग थे। आपका यह कहना सही है कि मध्यवर्ग उदारीकरण के भीतर ही सुधार का प्रयासकर रहा है। वह उसके दायरे से बाहर नहीं जा रहा। आज पूरे देश का कंपनीकरण हो रहा है। कंपनियां तमाम प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा कर रही हैं। पर मध्यवर्ग उसे भ्रष्टाचार के तौर पर नहीं देख रहा। अभी इसआंदोलन का सारा जोर सरकारी भ्रष्टाचार पर है। कारपोरेट सेक्टर जो लूट कर रहा है वह कानून के तहत कर रहा है। इसलिए वह इस भ्रष्टाचार की परिभाषा में नहीं शामिल किया जा रहा है। यह आंदोलन अभी इस बारे में नहीं चिंतित है कि एनजीओ को इतना धन कहां से मिल रहा है। या कंपनियों को इतनी पूंजी कहां से मिल रही है। अगर वह मौजूदा कानून पर खरे उतरते हैं तो उस पर आपत्ति नहीं उठ रही है। यानी सारा जोर सरकारी भ्रष्टाचार पर है।

क्या आपको लगता है कि यह आंदोलन अपने मौजूदा दायरे से निकल कर बुनियादी मुद्दों को उठाएगा और यह कहेगा कि उदारीकरण की प्रक्रिया में ही भ्रष्टाचार निहित है?

कानूनन होने वाले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए हमें अपनी धारणा बदलनी होगी। भ्रष्टाचार की परिभाषा भी बदलनी होगी। मुङो नहीं लगता कि यह आंदोलन अभी उस दिशा में जाएगा या जा सकता है। इस आंदोलन की शुरूआत जिन लोगों ने की थी उनका एक निश्चित लक्ष्य है। अगर इसे नया रूप देना है। तो लोगों को इसके बीच से रास्ता निकालना होगा। अभी यह आंदोलन 1988 में दी गई भ्रष्टाचार की परिभाषा को ही आधार मानकर चल रहा है। लेकिन उसके बाद हमारी अर्थव्यवस्था बहुत बदल चुकी है। समाज ने लूटने और भ्रष्टाचार करने के तमाम तरीके अपना लिये हैं। भ्रष्टाचार के कुछ काम करने से होते और कुछ करने से होते हैं। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तो कानून और सरकार की मंजूरी से होता है लेकिन वह बड़ा भ्रष्टाचार है।

जंतर मंतर से रामलीला मैदान की यात्रा में इस आंदोलन से तमाम तरह के लोग जुड़े यह छोटे से बहुत बड़ा हुआ। इसमें आपके नेतृत्व में जन आदोलनों के लोग जुड़े तो समाज के कईं तबके नहीं जुड़े। क्या आपको लगता है कि दलित आदिवासियों और अल्पसंख्यक की भागीदारी के बिना जनआंदोलन चल सकता है?

जनआंदोलनों के साथ ही जो इस संघर्ष में जुड़े उन्होंने अलग अलग भूमिकाएं निभाई। इससे पहले हम लोग जो आंदोलन करते थे। उसकी चर्चा भले राष्ट्रीय होती हो लेकिन असर स्थानीय रहता है। हम लोग शोषित पीड़ित और वंचित तबके का आंदोलन कर सरकार को धक्का तो पहुंचाते थे। लेकिन उसका असर ज्यादा नहीं होता था। इस आंदोलन में ज्यादा लोगों की भागीदारी के कारण सरकार पर जोर का धक्का लगा है और इसने सरकार को चुनौती दी है। इसका सीधा असर देखा जा सकता है।

तो क्या महज पीड़ित और शोषित तबके के आधार पर बड़ा आंदोलन नहीं खड़ा हो सकता?

महज पीड़ित वर्ग के आधार पर जो आंदोलन खड़ा होता है उससे बाकी हिस्सा अछूता रह जाता है। लेकिन जैसा कि पूरी दुनिया में हो रहा है कि अगर मध्यवर्ग को जोड़ा जाता है तो आंदोलन का प्रभाव बड़ा होता है। हालांकि इस आंदोलन में भी 100 फीसदी मध्यवर्ग नहीं जुड़ा फिर भी इसका असर बना है इसलिए यह जो उभार आया है उसमें व्यापक मुद्दों को जोड़ना जरूरी है। शिक्षा क्षेत्र के भ्रष्टाचार का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है। गैर बराबरी का मसला बहुत अहम है। चुनाव सुधार का मुद्दा अहम है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को मुद्दा भी कम जरूरी नहीं है। लेकिन मीडिया हर मुद्दे पर सक्रिय नहीं होता। उसे जिस तरह से भ्रष्टाचार और सरकारी भ्रष्टाचार का मामला सनसनी खेज लगता है वैसा गैर बराबरी और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को मामला नहीं लगता। इसलिए इस आंदोलन के सामने सनसनी खेज मुद्दों को गंभीर मुद्दे से जोड़ने की चुनौती है। आंदोलन के साथियों को मंथन करना चाहिए। और उसी से युवाओं को प्ररेणा मिलेगी।

दलितों और अल्पसंख्यकों को आंदोलन से गहरी आपत्तियां रही हैं। दलितों को कहना है कि यह उनके बाबा साहब द्वारा बनाये गये संविधान और उसकी भावना को पलट कर ब्राह्मणवादी नजरिया कायम करने की कोशिश थी। इसी तरह अल्पसंख्यकों ने भी इस पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया है?

यह अन्याय को देखने का नजरिया है। हमें नहीं लगता कि आम दलित और सामान्य मुसलमान इस तरह से सोचता है। दोनों तबके के लोग इस आंदोलन से प्रभावित थे। और जुड़ भी रहे थे। लेकिन उन्हें उनके नेताओं ने बरगलाया है। अल्पसंख्यक समाज की दिक्कत यह थी कि रमजान का महीना चल रहा था और वह बहुत बढ़चढ़कर हिस्सा नहीं ले सकता था। फिर भी जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी की टिप्पणी का कई अल्पसंख्यक संगठनों ने जवाब दिया। दिल्ली में कईं संगठन रामलीला मैदान में आये मुंबई में भी कईं संगठनों ने आंदोलन से एकजुटता दिखाते हुए प्रदर्शन किया। लेकिन अगर कहीं समाज के किसी तबके के मन में संदेह है तो हम सबको उसके पास जाना पड़ेगा। उनसे बातचीत करनी पड़ेगी। उन्हें बताना पड़ेगा कि यह आंदोलन संविधान को चोट पहुंचाने के लिए नहीं उसे बचाने के लिए है।

लेकिन आंदोलन के मंच से जो भी बातें कही गई उनसे यही लगता था कि ये लोग सुधारवादी हैं और बीमारी के बजाय लक्षणों का इलाज करना चाहते हैं। महज आपने कुछ मुद्दे उठाए लेकिन वह भी गौण ही बने रहे। क्या आपको लगता है कि इस तरह के आंदोलनों के बाद सरकार आर्थिक सुधारों में कुछ बदलाव करेगी या उसे तेज करेगी?

देखिए इससे सरकार की जगतीकरण की नीतियों में तत्काल किसी बदलाव की संभावना नहीं दिखती। होना चाहिए था कि इतने बड़े आंदोलन के मंच पर उदारीकरण के 20 सालों के अनुभव की समीक्षा होती। यह मंथन होना जरूरी था। लेकिन नहीं हो पाया। मुङो नहीं लगता कि ऐसा किसी साजिश के तहत हुआ। दरअसल उदारीकरण के कुछ भुक्त भोगी हैं तो कुछ लाभार्थी भी आंदोलन में दोनों तरह के लोग जुड़े थे सभी को यह समझ नहीं है कि इससे देश की बरबादी हो रही है। यह बात लोगों को समझानी होगी लेकिन जब संगठित शक्ति आगे बढ़ती है तो वह मुद्दों को तलाशती है और उसमें बदलाव आता है।

आपको इस आंदोलन में कौन से क्रांतिकारी कदम दिखाई पड़े?

संसद और जनता के बीच जिस तरह का टकराव हुआ वह अपने में एक क्रांतिकारी बदलाव का संकेत था। सांसदों का घर घेरने की बात आज तक किसी आंदोलन में नहीं हुई थी। लोगों को सांसदों के घर पर ही नहीं पार्टी कार्यालयों पर भी जाना चाहिए और उनसे पूछना चाहिए कि वह मुद्दों से मुंह क्यों मोड़ रहे हैं। इससे राजनीतिक विमर्श बदलेगा और नये राजनीतिक चौखट का ढांचा बनेगा।

क्या आपको लगता है कि इस आंदोलन को एक व्यवस्थित विचार धारात्मक ढांचे और संगठन की जरूरत है?

इस पर विचार होना चाहिए कि आंदोलन खड़ा हुआ है तो इसे दूर तक ले जाने के लिए क्या किया जाए। हम पहले आंदोलन करते थे तो सोचते थे कि लोगों का उभार हो गया है और वह अपने आप रास्ता बना लेगा। लेकिन इस आंदोलन ने व्यवस्थित ढंग से कुछ काम किया है। उसे और भी व्यवस्थित करने की जरूरत है। आंदोलन की कोर कमेटी अगले हफ्ते रालेगण सिद्धि यानी अन्ना हजारे के गांव में बैठ रही है। वहां पर बहुत सारी चीजें तय होनी है।

निजी सपनों में खो गई एक क्रांति

अरुण कुमार त्रिपाठी

अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव ने बहन मायावती को बेचैन कर रखा है। कभी भूमि अधिग्रहण विरोधी किसान आन्दोलन कभी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में घोटाले और हत्याएं तो कभी दलितों पर अत्याचार की घटनाओं ने उनसे की गई उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है जिसके कारण वे मुलायम सिंह को हराकर सत्ता में आई थीं। बीच में सैंडल खरीदने के लिए खाली विमान मुंबई भेजने जसी खबरों से उनकी विलासिता हास्यास्पद तरीके से उजागर होती रहती है। लेकिन जाति के जिस आधार और जिस गठजोड़ ने उन्हें सत्ता में पहुंचाया था वह उनसे अभी भी विमुख नहीं हुआ है। यही वजह है कि उनके विरोधी भी न तो निश्िंचत हैं न ही चैन से बैठ पा रहे हैं। विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे के साथ हाल में हुए मायावती के विवाद ने उनके व्यक्तित्व की एक झलक दे दी है। यूरोप के कई देशों से भी बड़े उत्तर प्रदेश जसे विशाल राज्य की चार बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद वे सहज नहीं हो पाई हैं। एक तरफ वे अपने स्वभाव के कारण मनमानी भी करती रहना चाहती हैं तो दूसरी तरफ असाधारण महत्वाकांक्षा के कारण अपनी छवि की भी जेड प्लस सुरक्षा करना चाहती हैं। यही वजह है कि उन्होंने जूलियन असांजे की स्थिति को जाने बिना उन्हें पागलखाने में भेजने की बात कह डाली। हो सकता है कि बहन मायावती की टिप्पणी उनके कम जानकारी वाले मतदाताओं को काफी मजेदार लगी हो कि उन्होंने अपने एक आलोचक के लिए आगरा के पागलखाने के दरवाजे खोल दिए हैं। लेकिन जिसे भी यह पता होगा कि असांजे अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए इंग्लैंड में नजरबंद है, उसे यह साफ लगेगा कि बहन जी को न तो अंतरराष्ट्रीय स्थितियों की जानकारी है न ही उनमें लोकतांत्रिक सहनशीलता। अगर उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्थितियों की जानकारी होती तो वे पहले उन अमेरिकी राजनयिकों और अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की आलोचना करतीं जिन्होंने इस तरह के नकारात्मक केबल भेजे थे और जिसे हिलेरी ने स्वीकार किया। इसीलिए मायावती से सहज और मजेदार टिप्पणी असांजे की थी कि , ‘‘ अगर मायावती उन्हें राजनीतिक शरण दें तो वे भारत आने को तैयार हैं और वे जो विमान भेजेंगी उनमें वे उनके लिए लंदन की अच्छी सैंडल भी लेते आएंगे। मायावती की कार्यशैली से सवर्ण समाज हतप्रभ है और वह अंग्रेजी पढ़ा लिखा वर्ग भी जिसके लिए लोकतंत्र भ्रलोक की व्यवस्था है। इसलिए मायावती जो कुछ कर रही हैं और जिस तरह से कर रही हैं उसकी व्याख्या तब तक नहीं की जा सकती जब तक दलित समाज की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और मायावती की निजी महत्वाकांक्षा को समझा नहीं जाता। दलित समाज की महत्वाकांक्षा देश की सत्ता पर उसी तरह से काबिज होना है जिस तरह से स्वाधीनता के बाद कांग्रेस के माध्यम से पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में ब्राह्मण काबिज थे। बस फर्क यह है कि इस राजनीतिक समीकरण में वे ब्राह्मणों की जगह पर दलितों को रखना चाहते हैं और दलितों की जगह पर ब्राह्मणों को। उत्तर प्रदेश में मायावती ने यह समीकरण बना लिया है और देश भर में उसे बनाया जाना है। पर यह काम इतना आसान नहीं है। अपने छोटे से सलाहकारों के समूह के साथ मायावती सोचती हैं कि यह काम उसी तरह से हो जाएगा जिस तरह से लोकतंत्र के चमत्कार ने उन्हें चौथी बार मुख्यमंत्री बनवा दिया। उन्होंने गठबंधन दौर की इस राजनीति में इं्र कुमार गुजराल, मनमोहन सिंह जसे जनाधार विहीन नेताओं और एचडी देवगौड़ा जसे क्षेत्रीय नेता को प्रधानमंत्री बनते देखा है। इसलिए सोचती हैं कि देश की आबादी में बड़ी भागीदारी रखने वाले दलितों के नेता को कभी न कभी प्रधानमंत्री बनने का मौका तो मिलेगा। अपनी इसी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए वे चारों तरफ से संसाधन और सत्ता जुटाने में लगी हैं। इस काम में उनका जोर साधन की पवित्रता पर नहीं साधन की प्रचुरता पर है। उनके लिए साधन की पवित्रता , नैतिकता और त्याग जसे मूल्य मनुवादी और सवर्ण समाज के मूल्य हैं जिसका दलितों के भौतिकवाद से क्या लेना देना। उनका सारा जोर इस बात है कि जो कुछ किया जाए वह कानूनी हो और फिर कानून बनाना तो अपने हाथ में है। इसीलिए भ्रष्टाचार विरोध और नैतिकता का वह आग्रह उनकी समझ में नहीं आता जिसके लिए कुछ सवर्ण गांधीवादी और हिंदुत्ववादी गुहार लगाया करते हैं। इसके जवाब में या तो भ्रष्टाचारी सवणोर्ं का उदाहरण पेश कर दिया जाता है या फिर यह कहा जाता है कि यह सब मनुवादी साजिश का हिस्सा है। मायावती पर ताज कोरीडोर और आंबेडकर, छत्रपति साहूजी महराज, कांशीराम पार्क के नाम पर प्रदेश में मूर्ति स्थापना के लिए हजारों करोड़ रुपए बर्बाद करने का आरोप है और इसकी जांच भी सीबीआई कर रही है। हाल में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में हुए घोटाले और लखनऊ में पहले अस्पताल में और फिर जेल में दो बड़े डाक्टरों की हत्या ने बसपा और उसके गोरखधंधे पर काफी कुछ रोशनी डाली है। बताया जाता है कि टू-जी से भी बड़ा घोटाला है। इसी तरह हाल में यमुना एक्सप्रेस वे और गंगा एक्सप्रेस वे नाम पर जमीनों के अधिग्रहण से भी काफी विवाद उठा है। उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने का नारा देकर 2007 में सत्ता में आईं मायावती ने एक तरफ इन योजनाओं के माध्यम से प्रदेश के विकास का प्रचार किया है तो दूसरी तरफ इसका विरोध करने वाले किसानों का दमन भी किया है। यही कारण था कि उनकी सरकार के खिलाफ किसानों को एकजुट करने के लिए कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसौल से अलीगढ़ के टप्पल तक पदयात्रा भी कर डाली। इस यात्रा ने मायावती की छवि को नुकसान पहुंचाया और कांग्रेस के असर को थोड़ा बढ़ाया था। लेकिन इस बीच उठे अन्ना हजारे के आंदोलन ने जब कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाना शुरू किया तो मायावती ने राहुल गांधी से हुए नुकसान की कसर पूरी कर डाली। उन्होंने अपने प्रदेश में अन्ना हजारे के समर्थन में प्रदर्शन करने की पूरी छूट दे डाली। आमतौर पर वे आंदोलनों पर लाठीचार्ज करने और उसे कुचलने के लिए जानी जाती हैं। उनकी कोशिश उन सवर्ण मतदाताओं को खुश करने की थी जो बसपा से जुड़े हैं और अन्ना के समर्थक हो गए थे। लेकिन जब उन्होंने देखा कि अन्ना आंदोलन से उनका अपना दलित मतदाता बिदक रहा है और मोहल्लों में संविधान रक्षा समितियां बन रही हैं तो उन्होंने आंदोलनकारियों को चेतावनी भी दे डाली। यानी विकीलीक्स ने अमेरिकी राजनयिकों के माध्यम से मायावती को जितना समझा है वह नाकाफी है। मायावती भले लिखा हुआ भाषण पढ़ती हों लेकिन वे लिखी हुई बातो को छोड़कर आगे निकलने की सामथ्र्य रखती हैं। वे भले अपने विरोधियों के लिए कटु हो जाती हों, लेकिन चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के साथ उनकी राजनीति न तो पहले जसी अड़ियल है न ही उनका व्यक्तित्व। वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए किसानों को ज्यादा मुआवजा देने का भी एलान कर डालती हैं और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का भी समर्थन कर डालती हैं। गौर करने लायक है कि 2008 के परमाणु करार के बाद जिस रिश्वत कांड के कारण समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी के साथ भारतीय जनता पार्टी बदनामी की दाग ओढ़े हुए है उसमें बहन जी और उनकी पार्टी यूपीए के खिलाफ वामपंथी मोर्चे के साथ खड़ी थी। वाममोर्चा ने तो उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना ही दिया था। मायावती की सबसे बड़ी कमी यह है कि उनके पास किसी बड़ी राजनीतिक दृष्टि या सिद्धांत का अभाव है। लेकिन उनकी खूबी यह है कि वे सत्ता की चाभी यानी गुरुकिल्ली पाना और उसका इस्तेमाल करना जानती हैं। वे बाबा साहेब आंबेडकर का सिद्धांत रटने में लगी होतीं तो वहीं पड़ी होतीं जहां आज महाराष्ट्र और कर्नाटक के तमाम दलित पैंथर आंदोलनकारी। वे व्यावहारिक हैं और महत्वाकांक्षा के लिए सपा, भाजपा, कम्युनिस्ट और कांग्रेस किसी से भी समजौता कर सकती हैं। वे अपनी छवि के प्रति उतनी लापरवाह भी नहीं हैं जितना बताया जाता है। एक बेहतर छवि को पाने और सत्ता के शिखर तक पहुंचने के लिए वे कोई भी समझौता कर सकती हैं किसी से भी किनारा कर सकती हैं। इससे उनके और उनके मतदाताओं के किसी सिद्धांत पर आंच नहीं आती। पर यहीं पर वह नव जनवादी क्रांति खो जाती है जिसकी उम्मीद तमाम सिद्धांतकार दलितों से करते रहे हैं।

Wednesday, September 14, 2011

पाखंड है हिंदी दिवस मानना- अशोक वाजपेयी

प्रत्येक वर्ष हिन्दी दिवस सरकारी उत्सव के रूप में मनाया जाता है। प्रस्तुत है हिन्दी दिवस और उसकी स्थिति पर वरिष्ठ साहित्यकारों की बातचीत-

अशोक वाजपेयी-(कवि, आलोचक)

भारत में हिन्दी के नाम पर लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। ऐसे हिन्दी दिवस मनाना किसी पाखंड से कम नहीं है। हिन्दी सिनेमा, मीडिया और बाजार से बढ़ रही है। यदि मनाना ही है तो हिन्दी प्रदेशों में मातृभाषा दिवस मनाएं या भारतीय भाषा दिवस मनाया जाना चाहिए।

नित्यानंद तिवारी-(आलोचक)

हिन्दी दिवस सरकार का आनुष्ठानिक व्यापार बन गया है। इस व्यापार को बदलने की जरूरत है। सरकार का राजभाषा विभाग है, जो तरह-तरह की योजनाएं चलाता है। हिन्दी के विकास के लिए दूसरी तरफ सरकार का ही ज्ञान आयोग है, जिसमें एक सदस्य को हिन्दी में बोलने के बाद माफी मांगनी पड़ी। यह विरोधाभास है। ऐसा लगता है कि राममनोहर लोहिया के बाद भारतीय भाषाओं के आंदोलन की बात पुरानी पड़ गई है। अब हमें औपनिवेशिक मानसिक ढांचे को तोड़ने की जरूरत है। बिना इसके भारतीय भाषाएं महत्व नहीं पा सकती। यदि प्राथमिक कक्षाओं में हिन्दी की स्थिति सुधरती है यह हिन्दी के विकास के लिए शुभ संकेत है।

रामशरण जोशी-(साहित्यकार)

सवाल हिन्दी दिवस की प्रासंगिकता या अप्रासंगिकता का नहीं है। मूल प्रश्न यह है कि हिन्दी को हम किस तरह से देखते हैं। हिन्दी दिवस के ऐसे आयोजन औपचारिकता मात्र होते हैं। लेकिन ऐसे दिवस के मौके पर हमें आत्मविवेचन का अवसर भी मिलता है। ऐसे में इन आयोजनों का तात्कालिक महत्व तो है। मेरा मानना है कि आजादी के बाद हिन्दी का विस्तार हुआ है। यह हिन्दी के लिए उत्सव का काल है विलाप का नहीं। मैं हिन्दी को राष्ट्रीय अस्मिता के नाम पर देखता हूं।

अर्चना वर्मा-(साहित्यकार)

हम हिन्दी के विकास के लिए इसे केवल दिवस के रूप में नहीं देख सकते। लेकिन कोई एक दिन तो है जिसे हम हिन्दी दिवस के रूप में याद करते हैं। लेकिन यह विडंबना है कि फिर हम उसे भूल जाते हैं। लेकिन इससे हिन्दी को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। हाल के आए आंकड़े बताते हैं कि एक बड़ी आबादी है जिसकी शिक्षा हिन्दी में हो रही है। हिन्दी संपर्क की भाषा तो बहुत पहले से है लेकिन अब यह बाजार की भाषा भी बन रही है। ऐसे में हम अब हिन्दी को नकार नहीं सकते। पहले के मुकाबले अब हिन्दी में अंधकार की स्थिति नहीं है। लेकिन यह जरूर है कि हिन्दी बोलने वालों के साथ अभी आत्मविश्वास नहीं जुड़ा है। ऐसा इसलिए भी है कि भारत काफी समय तक गुलाम रहा है और गुलाम हमेशा अपने मालिक की तरह बनना चाहता है।

Friday, August 19, 2011

लोकपाल क्रांति के भावी पंद्रह दिन

अरुण कुमार त्रिपाठी

अगले पंद्रह दिन भारतीय राजनीति में जनलोकपाल क्रांति के रूप में दर्ज होने जा रहे हैं। इस दौरान जनता की जागरूकता का स्तर बढ़ेगा और उसका क्रांतिकरण तेज होगा। दूसरी तरफ जनता से भयभीत जनप्रतिनिधि और उन्हें शरण देने वाली लोकतांत्रिक संस्थाएं अपने भीतर बेचैनी महसूस करेंगी। उन पर बदलने या टूटने का दबाव होगा। यह हमारे लोकतांत्रिक पूंजीवाद में बदलाव और उथल पुथल का दौर है। देखना है एक गांधीवादी आंदोलन की नैतिक ताकत से देश बेहतर भविष्य की ओर जाता है या फिर उस पर कोई अशुभ दृष्टि पड़ जाती है।
अगले पंद्रह दिन भारतीय राजनीति के लिए बड़े अहम होने जा रहे हैं। इस दौरान अन्ना हजारे, उनके साथियों और उनके साथ बाकी देश ने जनलोकपाल का जो सुंदर सपना देखा है वह साकार भी हो सकता है या देश भारी राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर सकता है। इससे कोई दमनकारी व्यवस्था भी निकल सकती है। कें्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम और उनके मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने अन्ना हजारे और उनके साथियों को रामलीला मैदान में पंद्रह दिन की इजाजत देकर अपना संकट टालना चाहा है। लेकिन लगता नहीं कि वह टला है। अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन डा मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चल रही यूपीए सरकार के सिर पर चक्र की तरह मंडरा रहा है और या तो वह उससे अपना काम करवा लेगा या उसको जाने के लिए मजबूर कर देगा।
यह पं्रह दिन अंग्रेजी में कानूनी बातें करने के नहीं, जनता की भाषा में राजनीतिक संवाद करने के होंगे। जो करेगा वही आगे टिकेगा। कांग्रेस के लिए यह गंभीर चुनौती का दौर है। क्योंकि उसका धर्मनिरपेक्षता का एजेंडा पीछे चला गया है। राहुल गांधी का किसान आंदोलन का एजेंडा अन्ना के आंदोलन में समाहित हो गया है। रहे मनमोहन सिंह तो क्या वे युवाओं को एक सुरक्षित भविष्य का आश्वासन दे पाएंगे?
इस दौरान राजनीतिक प्रणाली पर नए सिरे से बहस खड़ी हो सकती है और अगर संसद उस बहस को सार्थक और समर्थ ढंग से नहीं उठा सकती तो उसे अपने नए स्वरूप के लिए तैयारी करनी होगी। इस दौरान जन प्रतिनिधियों और नौकरशाही के चरित्र पर भी बहस होगी और एक नए किस्म का जनमत बनेगा। वह जनमत आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र की दिशा निर्धारित करेगा। लेकिन उससे भी आगे जाकर यह पं्रह दिन भारतीय राजनीति में नए तरह का ध्रुवीकरण पैदा करने वाले हो सकते हैं। उसमें यूपीए के घटक दल कोई नया रुख ले सकते हैं और फिर किसी तीसरे मोर्चे के गठन की सुगबुगाहट हो सकती है। जाहिर सी बात है कि यह समय विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के लिए सर्वाधिक अनुकूल है। लेकिन उसे संसदीय बहसों में कौशल दिखाने के बजाय जमीन पर भी निष्ठा और पारदर्शिता दिखानी होगी। उसे कई राज्यों में बैठे अपने भ्रष्ट नेताओं के भविष्य पर भी सोचना होगा। कल्पनाशील नेतृत्व पैदा करना होगा और जनता की नब्ज पर अन्ना हजारे की तरह हाथ रखना होगा? क्या वह रख पाएगी? अगर नहीं तो वह तमाशबीन बनकर रह जाएगी।
अन्ना हजारे के आंदोलन के पहले चरण की समाप्ति पर तमाम समाजवादी और वामपंथी बुद्धिजीवी और कार्यकर्ता इसे सरकार और आंदोलन की सांठगांठ बता रहे थे। उनका मानना था कि यह आंदोलन सरकार ने ही आयोजित करवाया है और इसीलिए सरकार के मंत्रियों ने स्वयं अन्ना हजारे से मिलकर समझौता किया और लोकपाल मसौदा समिति का गठन कर डाला। लेकिन वह गलतफहमी जल्दी ही खत्म हो गई जब उस समिति में शामिल सदस्यों के खिलाफ फर्जी सीडी जारी होने लगी और कांग्रेस के प्रवक्ता द्वेषपूर्ण बयान देने लगे। पर इससे मिलीभगत का आरोप समाप्त हो गया। फिर भी अन्ना से चिढ़े तमाम आंदोलनकारी यह आरोप लगाते रहे कि वे तो कायर हैं। अनशन तो हर कोई कर लेगा। गिरफ्तारी करके तो दिखाएं। इस बीच भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में योग गुरु बाबा रामदेव का दुखांत प्रहसन भी उपस्थित हो गया। अन्ना हजारे ने अपनी नैतिक शक्ति से बार-बार सरकार को ललकारा और रामदेव प्रसंग से सबक भी लिया और ताकत भी।
लेकिन अन्ना और उनके साथियों ने सबसे ज्यादा राजनीतिक परिपक्वता का परिचय स्वतंत्रता दिवस और 16 अगस्त को दिया। स्वतंत्रता दिवस पर अन्ना हजारे का संबोधन लाल किले से दिए गए प्रधानमंत्री के संबोधन पर भारी पड़ा। लेकिन उससे भी बड़ी उम्मीद जब दिखी जब अन्ना हजारे ने 16 अगस्त को दिल्ली में पूरे शांत भाव से गिरफ्तारी दी और बाद में तिहाड़ जेल पहुंच कर अपने उन तमाम आलोचकों को खामोश कर दिया जो उन्हें कायर बताते हुए ललकार रहे थे कि वे गिरफ्तारी देकर तो दिखाएं।
दरअसल अन्ना हजारे ने अपनी गिरफ्तारी और बाद में छोड़े जाने के बावजूद तिहाड़ से बाहर निकलने से मना कर एक तरफ सरकार को यह बता दिया कि उन्हें जेल से डर नहीं लगता, दूसरी तरफ अपने समर्थकों के बीच साहस का संचार कर दिया। यही वजह है कि पुलिस की तरफ से छोड़े जाने के बावजूद उनके साथी छत्रसाल स्टेडियम छोड़ने को तैयार नहीं हुए। उधर लोग बढ़-बढ़ कर गिरफ्तारी देते रहे और तिहाड़ जेल के बाहर जमे रहे। एक बार फिर युवाओं में राजनीतिक आंदोलनों का औचित्य सिद्ध हुआ है और वे सत्तर और अस्सी के दशक की तरह सत्ता के भय से मुक्त हो रहे हैं और लोहिया व जेपी की यादें ताजा हो रही हैं।
अन्ना हजारे के इस आंदोलन के पीछे उनके साथियों की तैयारी भी है और बहुत कुछ स्वत:स्फूर्त भी। तैयारी इसलिए कि विधिवत योजना के साथ काम करने वाली संगठित सरकारी व्यवस्था को कोई सोच समझ कर काम करने वाली टीम ही कदम कदम पर मात दे सकती है। अभी तक एेसा ही रहा है। अन्ना ने संयम नहीं खोया है और रामलीला मैदान में बैठने से पहले उन्होंने पुलिस को विधिवत यह हलफनामा दिया है कि अगर कोई भी गड़बड़ी होती है या कानून का उल्लंघन होता है वे उसके लिए जिम्मेदार होंगे।
अब सवाल उठता है कि लोकपाल क्रांति के लिए खड़ा हुआ अन्ना हजारे का यह राष्ट्रव्यापी आंदोलन क्या महज एक विधेयक पास करवा कर शांत हो जाएगा? क्या इतने बड़े राष्ट्रीय जन उभार को परिवर्तनकारी एेसे ही व्यर्थ जाने देंगे? क्या वे इससे परिवर्तन का कोई बड़ा कार्यक्रम तय नहीं करेंगे? अव्वल में तो इतनी जल्दी उम्मीद नहीं है, लेकिन अगर सरकार प्रधानमंत्री को उसके दायरे में लाने को तैयार हो गई तो यह उनकी बड़ी जीत होगी, पर क्या इतनी जीत से वे संतुष्ट हो जाएंगे? हो भी सकते हैं और नहीं भी। अन्ना हजारे के आंदोलन में जिस तरह के लोग हैं और जिस तरह के लोग जुड़ रहे हैं वे उसके स्वरूप को लगातार व्यापक बना सकते हैं। मेधा पाटकर का आना आदिवासी और विस्थापन के सवाल को गंभीरता के साथ इस आंदोलन से जोड़ेगा। मेधा आएंगी तो उनके साथ जनांदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय भी सक्रिय होगा। जाहिर सी बात है कि इस आंदोलन में गांधीवादी, संघ से जुड़े राष्ट्रवादी, रेडिकल वामपंथी और आदिवासी और किसान भी जुड़ रहे हैं और वे इसके दायरे को व्यापक बना सकते हैं। शांति भूषण, प्रशांत भूषण और मेधा पाटकर इसके एजेंडे में जन प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का कार्यक्रम भी शामिल करवाना चाहते हैं। वे जनोन्मुखी भूमि अधिग्रहण नीतियों तक ही सीमित नहीं रहेंगे बल्कि जल, जंगल, जमीन के बारे में कुछ ठोस नीतियों की भी मांग करेंगे।
लेकिन इस आंदोलन से जिस तरह से विभिन्न राज्यों, गावों और शहरों के युवा और हर उम्र के नागरिक जुड़ रहे हैं उससे साफ है कि इसमें राष्ट्रीय ही नहीं स्थानीय एजेंडा भी रहेगा। स्थानीय एजेंडे के मद्देनजर ही जनलोकपाल बिल के साथ ही लोकायुक्त की संस्था बनाने की मांग चल रही है। यह आंदोलन दिल्ली की भ्रष्ट केन्द्रीय सरकार पर तो भारी पड़ ही सकता है राज्य की भ्रष्ट सरकारों के लिए भी दिक्कत खड़ी कर सकता है। इस आंदोलन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसे अहिंसक बनाए रखने की है। दूसरी बड़ी चुनौती इसे जाति और धर्म के आधार पर विभाजित होने से रोकने की है। अगले पंद्रह दिन विघ्नसंतोषी शक्तियां सक्रिय हो सकती हैं। अगर प्रतिक्रांति की ताकतों को रोका जा सका तो निश्चित तौर पर यह कारवां क्रांति की ओर जा रहा है।

Sunday, August 14, 2011

दुर्भाग्यपूर्ण है देश में है शिक्षा की दोहरी प्रणाली


आजादी के 64 सालों के बाद एक बार फिर लोगों के सामने मूल्यांकन का प्रश्न है। नई आर्थिक शक्ति के रूप में उभरे इस देश में अभी बुनियादी जरूरतों में सुधार की गुंजाइश बाकी है। ऐसी ही बुनियादी जरूरत हमारी शिक्षा है। आजादी के बाद शिक्षा की स्थिति पर प्रसिद्ध चिंतक पुष्पेश पंत का कहना है कि भले ही आजादी को 64 साल हो गए हों लेकिन इसके बाद भी शिक्षा की स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। देश में शिक्षा की स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। यहां पूरी तरह से दोहरी प्रणाली है। एक अमीर आदमी के लिए शिक्षा और दूसरा गरीब आदमी के लिए शिक्षा। आम आदमी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाता है जिसकी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। कुछ साधन संपन्न लोग ही अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिला पा रहे हैं। हमारे देश का दुर्भाग्य यह है कि हमारे यहां कपिल सिब्बल जसे मंत्री हैं जिन्होंने विदेश में शिक्षा ग्रहण की है और उनको भारतीय शिक्षा प्रणाली की समझ ही नहीं है। मैं शिक्षा के स्तर में गिरावट के लिए आरक्षण की गलत नीतियों को भी दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूं। क्योंकि हमारे यहां मेरिट और आरक्षण में बिल्कुल संतुलन नहीं है और यह किसी भी हालत में शिक्षा के लिए घातक है। जब शिक्षा की बात होती है तो हमारे यहां लोग केवल उच्च शिक्षा, आईआईटी, आईआईएम की बात करते हैं लेकिन जब तक शिक्षा में वर्ण व्यवस्था रहेगी तब तक इसमें कोई सुधार की गुंजाइश नहीं है।
साहित्यकार और प्राध्यापक सुधीश पचौरी का कहना है कि मैं आजादी के बाद शिक्षा की स्थिति को सकारात्मक रूप से देखता हूं। मेरा मानना है कि हमारा देश अभी विकासशील देश है। हमारे यहां गुणात्मक सुधार भी हो रहे हैं। आज दिल्ली विश्वविद्यालय की रैंकिंग विश्व में 300वीं है देश में यह पहले स्थान पर है। इसने जेएनयू को भी पीछे छोड़ दिया है। लेकि न प्राथमिक स्तर पर सरकारी स्कूलों की स्थिति अच्छी नहीं है क्योंकि वहां राज्यों का संरक्षण नहीं है। अब शिक्षा के नए आयाम उभर रहे हैं। पुरानी युनिवर्सिटियों का क्षय हो रहा है। एक जमाने में स्कूलों की संख्या कम थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। मैं आरक्षण की प्रणाली को भी गलत नहीं ठहराता क्योंकि वंचित वर्ग के लिए भी तो लोगों को आगे आना चाहिए। आरक्षण के उचित परिणाम आए हैं। लेकिन मैं फिर कहना चाहता हूं कि इसका एक आधार आर्थिक भी हो। राज्यों को उच्च शिक्षा पर भी ध्यान देना चाहिए। आज उच्च शिक्षा में 85 प्रतिशत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग खर्च कर रहा है और राज्य मात्र 15 प्रतिशत ऐसे में शिक्षा पर राज्य को अपने खर्च अधिक करने होंगे। मुङो लगता है कि शिक्षा का जितना नुकसान कॉरपोरेट हाउसों ने नहीं किया है उससे अधिक राजनीतिक हस्तक्षेप ने किया है। विश्वविद्यालयों को स्वायत्त किए जाने की जरूरत है।


अपनी पुरानी शान में दिखेगा राय पिथोरा

भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा एक बार फिर दिल्ली को उसकी पुराने रौनक में लाने के लिए वह विभिन्न ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण कर रहा है। पुरातत्व विभाग राय पिथौरा के किले संरक्षित करके पुन: उसकी शान वापस दिलाने की कोशिश कर रहा है। 1150 में इस किले को चौहानों ने तोमरों को हराकर इस पर कब्जा कर लिया था लेकिन ऐसा कहा जाता है कि कुतुबु्ीन ऐबक चौहानों को हराकर 1192 में ‘किला राय पिथौरा पर अधिकार कर लिया और इसे अपनी राजधानी बनाया। कभी इसा किले के 13 द्वार थे, जिसमें बरका,हौजरानी,और बायूं द्वार अब भी मौजू हैं। पुरातत्व विभाग इसकी साफ सफाई और खुदाई कर इसकी रौनक वापस लाने का भरपूर प्रयास कर रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के दिल्ली सर्किल के अधीक्षण पुरातत्वविद मोहम्मद केके ने बताया कि इस किले का अपना ऐतिहासिक महत्व है। हालांकि दीवारों के अलावा इसका अन्य अवशेष दिखाई नहीं दे रहा है। यह दीवार लगभग 2 किमी लम्बी है। इसके संरक्षण का काम 2008 से चल रहा था हालांकि अब भी इसमें काफी काम करना बाकी है। इसके संरक्षण में लगभग एक करोड़ की लागत आई है।
इसके ऐतिहासिक महत्व के बारे में भारतीय पुरात् र्सेक्षण के शेिषज्ञोई डी शर्मा के अनुसार, बारहीं सी में शाकंभरी के चौहान शासक ग्रिहराज चतुर्थ ने तोमरों से ल्लिी छीन ली और उसके पौत्र पृथ्ीराज तृतीय ने लालकोट का स्तिार किया। यह स्तिारित नगर ही ‘किला राय पिथौराज् के रूप में लोकप्रिय हुआ, जो ल्लिी के सात नगरों में से एक है। इसे पृथ्ीराज राय पिथौरा के नाम से भी जाना जाता था। भारतीय पुरातत्व विभाग के एक अधिकारी से प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्खनन में पता चलता है कि प्रारंभिक किला योजनानुसार आयताकार था और पश्चिम की तरफ पत्थर से बनी इसकी ऊंचीीारें थी। प्राचीरों के बाहर खाई थी, जो अब कुछ ही जगह शेष है। पत्थरों से बनीीारें ढाई से तीन मीटर तक मोटी है।



कुंजुम, एक अनूठा अंजुमन



रवीन्द्र त्रिपाठी


दिल्ली का हौ़ज खास विलेज अब गांव नहीं है। दिल्ली के कई दूसरे विलेज की तरह एक बेहद आधुनिक , बल्कि उत्तर-आधुनिक जगह हैं जहां के पार्क में आप शाम को प्रवचन के रूप में राम कथा भी सुन सकते हैं और अत्याधुनिक फैशन और कला के दर्शन भी कर सकते हैं। इसी हौज खास विलेज में कुंजुम कैफे है जो अपने तरह की अनोखी जगह है। यहां आप दिन भर बैठे रह सकते हैं और कोई आपसे कहने नहीं आएगा कि बहुत हो गया, अब उठ जाइए।
यहां आप कॉफी पी सकते हैं और कोई आपसे पैसा मांगने नहीं आएगा। और काफी भी पुराने कॉफी हाफस वाली बेस्वाद नहीं। बेहद स्वादिस्ट ब्लैक कॉफी बिस्कुट के साथ। हां बाहर निकलते समय़ एक पेटी में आप अपनी श्रद्धा के मुताबिक जितना पैसा डालना चाहे डाल सकते हैं।
आप दिल्ली के बियाबान में अकेले हैं तो यहां बैठे किसी शख्स से दोस्ती भी गांठ सकते हैं। या अपने दोस्तों के साथ यहां दिन भर बैठकर किसी मसले पर बात भी कर सकते हैं, पेंटिग या स्केचिंग भी।
शनिवार के लगभग साढे बारह बजे हैं और मैं कुजुम कैफे में प्रवेश करती हूं। चार पांच लोग ही हैं। मैं कुजुंम कैफे की शुरुआत करनेवाले अजय जैन से मिलना चाहता हू। मालूम होता है वो विदेश में हैं और कई दिनों के बाद आएंगे। लेकिन उनकी एक सहयोगी श्रुति से मुलाकात होती है। वे कुंजुम कैफ के बारे में थोड़ा सा बताती हैं और कुछ जानकारियां ईमेल करने के कहती हैं। मैं एक मोढे पर बैठ जाता हूं और किताबें पलटने लगता हूं। लकड़ी के कुछ रैक बने हैं जिनपर कुछ किताबें और पुरानी पत्रिकाएं पड़ी हैं। ज्यादातर किताबें और पत्रिकाएं यात्रा से संबंधित हैं। अजय जैन खुद भी एक यात्रा-लेखक हैं। जून 2010 में उन्होंने कुंजुम कैफे शुरू किया था। एक औपचारिक कैफे की परिकल्कना उनके मन में थी जहां किसी तरह का दबाव और तनाव न हो। जहां यात्राओं में रुचि रखने वाले लोग आपस में बतिया सकें और जानकारियां ले-दे सकें।
बहरहाल मोढ़े पर बैठे बैठे मैं फोटोग्राफी की एक किताब उठा लेता हूं। ये होमाई व्यारवाला नाम की महिला फोटोग्राफर पर आधारित है। होमाई भारत की पहली महिला फोटोग्राफर हैं जिनको बाजाप्ता सरकारी मान्यता मिली हुई थी। भारत की आजादी की लड़ाई और आजाद भारत के कई ऐसे फोटोग्राफ उनके लिए हैं जो अब लोकस्मृति के हिस्सा बन गए है।. खासकक पंडित जवाहर लाल नेहरू ऐसे फोटो उन्होंने लिए जो इतने आम फहम हो गए हैं कि किसी को याद नही कि वे किसके लिए हुए हैं। किताब पर हल्की नजर मारते हुए पाता हूं कि उनको इसका बात का गहरा दुख रहा कि 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिरला मंदिर में मौजूद होते हुए भी वे उनकी हत्या की तस्वीर नहीं ले पाईं जबकि उस दौरान वे हर रोज बापू के फोटो खींचतीं थीं। लेकिन 30 जनवरी 1948 को उनका मूड ऐसा हुआ कि वे फोटो नही ले सकीं। होमाई पारसी समुदाय से ताल्लुक रखती थीं और गुजरात के नवसारी मै पैदा हुई थीं। हेनरी कार्तिए ब्रेसों और मार्गरेट बोर्के ह्वाइट की तरह होमाई भी फोटोग्राफी को कलात्मक बुलंदी तक ले गईं।
संयोग से मार्गरेट भी महिला फोटोग्राफर ही थीं। होनाई की जीवन की कहानी बड़ी रोमांचक है। अपने आखिरी वर्षो में वे दिल्ली छोड़कर चली गईं और गुमनाम सी रहीं।
कुजुंम कैफे की दीवारों को बड़े अच्छे फोटोटोग्राफ लगे हैं। बाघ और हाथी के नेचर फोटोग्राफ्स के साथ साथ आम जिंदगी के कई लम्हें यहां कैद हैं। आप इन्हें खरीद भी सकते हैं। शायद उनकी कमाई का एक यही जरिया है। हालांकि यह अनुमान ही है। श्रुति से यह बात मैं पूछता नहीं हूं। अजय जैन होते तो पूछता। फिलहाल जानकारी के लिए बता दिया जाए कि अगर आपकी फोटोग्राफी में रुचि हैं तो कुंजुम कैफे की तरफ आपको ऐसे मेंटर मिल सकते हैं जो आपको बेहतर फोटोग्राफर बनने के गुर दे सकें। हां, इसकी फीस होती है। यही नहीं अगर आप लेखक बनना चाहते तो भी कुजुंम कैफे की सेवाएं आपके लिए हैं। सिर्फ लिखने के लिए नहीं बल्कि अपनी किताब प्रकाशित करने के लिए भी। अजय जैन ने खुद भी अपनी एक यात्रा किताब लिखी और प्रकाशित की है। नाम है- `पीप पीप डोंट स्लीप’
कुंजुंम कैफे में अकेले बैठे लोग अक्सर अपने लैपटॉप पर काम करते दिखते हैं। यहां वाई फाई की सुविधा भी है। एक बीस-बाईस साल के एक नौजवान को मैं अपने लैपट़ॉप पर काम करते देखता हूं। मैं नौजवान के करीब जाता हूं और नाम पूछता हैं। पता चला वे गौरव चौहान हैं और पीतमपुरा में रहते हैं। यानी हॉजखास विलेज से लगभग बीस-पचीस किलोमीटर दूर से यहां आए हैं। वे महीने में एक दिन यहां जरूर आते हैं। गौरव भी यात्रा में काफी रुचि रखते हैं। वे खुद यात्रा का व्यवसाय शुरु करना चाहते हैं। गौरव बताते हैं कि इस समय भारत में यात्रा का व्यवसाय हर साल दस फीसदी के हिसाब से बढ़ रहा है लेकिन एडवेंचर स्पोर्ट्स का व्यवसाय पचीस फीसदी के हिसाब से बढ़ रहा है। स्कूबा डाइविंग और ट्रैकिंग जैसे ए़डवेंचर स्पोर्ट्स युवकों में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। कई ट्रैवल एजेंसी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। गौरव अपना ब्लॉग शुरू करने जा रहे हैं जिसमें एडवेंचर स्पोर्ट्स के बारे में जानकारियां दी जाएंगी।
अब आप पूछेंगे कि कुंजुम कैफे नाम कैसे पड़ा। तो आपको बता दें कि हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्फीति वाले इलाके में कुंजुम नाम की एक घाटी है। उसी से यह नाम लिया गया है। वहां से चलते हुए मैं `पीप पीप डोंट स्लीप’ की एक प्रति खरीदता हूं।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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गहमा-गहमी...