Sunday, September 20, 2015

बदनवालु- एक खोई हुई जगह


रवीन्द्र  त्रिपाठी

क्या ऐसा होता है कि कोई जगह हमारे बीच मौजूद रहते हुए भी खो जाती है? यानी उसका स्वत्व अनुपस्थित हो जाता है?  उस स्थान विशेष का ढांचा तो बना रहता है लेकिन उसकी आत्मा विलुप्त हो जाती है? दूसरे शब्दों में ये भी कह सकते हैं कि जमीन की वो सतह तो बनी रहती हैं जिसकी वजह से उस जगह का नाम दिगंत में फैलता है लेकिन जो विचार वहां पनपते और पुष्पित या पल्लवित होते हैं वे मुरझा जाते हैं उनमें घुन लग जाता है।  क्या उस जगह की विलुप्त आत्मा को फिर से पाया जा सकता है? क्या उन विचारों का पुष्पन और पल्लवन फिर से संभव है जो उस स्थान विशेष जुड़े थे? और उनके साथ ही उस जगह की तेजस्विता का क्या पुनरोदय भी हो सकता है? आखिर आत्मा कभी नष्ट नहीं होती! चाहे वो मनुष्य की हो या जगह की।

अपनी एक यात्रा में एक ऐसी ही जगह और उसकी विलुप्त आत्मा की  खोज के लिए एक प्रयास को मैंने देखा। मैने ये भी महसूस किया कि उन विचारों का फिर से पुष्पन हो रहा है जिसके लिए वो जगह कभी मशहूर हुआ करती थी।  उस जगह का नाम है बदनवालु ( अंग्रेजी प्रेस में बदनवाल के नाम से इधर चर्चित हो गया है।) ये कर्नाटक के मैसूर जिले का एक गांव है। पहली नजर में भारत के उन आम गावों की तरह जहां की खेती हमेशा संकटग्रस्त रहती है। यहां की कृषि बारिश पर निर्भर है जो हमेशा कम होती है। लेकिन बदनवालु  एक गांव भर की नहीं है।  ये गांधी जी के विचारों की सफल प्रयोगभूमि रही थी। एक ऐसी भूमि जहां `हिंद स्वराज के सफल प्रयोग हो रहे थे। वो प्रयोगभूमि आज उजड़  गई है। पर पिछले दिनों इस वीरानेपन में फिर से गांधी के विचारों का बीजरोपन हुआ। देश के वरिष्ठ रंगकर्मी, कन्नड़ लेखक और हथकरघा के पैरोकार प्रसन्ना ने यहां  पिछले दिनों अपने कुछ मित्रों के साथ यहां आकर एक सत्याग्रह किया था। इसी  सिलसिले में मैं वहां गया था। बेशक इस सत्याग्रह के कुछ घोषित मकसद थे- जैसे टिकाऊ जीवनशैली (ससटेनेबल वे ऑफ लाइफ) पर जोर, खादी और हथकरघा की लगातार संकटग्रस्त स्थिति की तरफ ध्यानाकर्षण, ग्रामोद्योग की अमहियत को बताना, विकास की मौजूदा सरकारी नीति पर विमर्श आदि। मगर बात निकली तो दूर तलक गई। यानी खेती पर भी  चर्चा हुई। देसी बनाम विदेशी अर्थात् बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीज का मसला भी उठा। ये सत्याग्रह उन कई कसमसाते मुद्दों का मिलनविंदु भी बना जो आज भारत के अलग अलग हिस्सों में उठ रहे हैं। जो बेचैनियां भारत के हर हिस्से में सुनी जा रही हैं उनमें से कई यहां मुखर हुईं।  इस यात्रा का वृंतात उस तरह का  नहीं है जो  पत्रिकाओं या साहित्यिक पुस्तकों में पाया जाता है। मेरे लिए ये उन विचारों से रूबरू होने होने का था जो हमारे समाज में मौजूद तो हमेशा से रही हैं लेकिन जिन पर महानगरी भारत अपना विश्वास खो बैठा है।
  पर सबसे पहले तो आपको ये बता दूं कि बदनवालु पहुंचने पर आपको इसका पक्का भरोसा हो जाएगा कि  भारतीय रेलवे में गजब की विनोदप्रियता है। ये मैं इसलिए कह रहा हूं  हालांकि इस गांव में एक रेलवे स्टेशन है और इसीलिए यहां  पहुंचना सुगम है, परंतु अगर आपने बदनवालु जाने के लिए रेल का टिकट चाहा तो आपको घोर निराशा होगी। आपको मैसूर या चामराजनगर से नरसांबुधि का टिकट लेना पड़ेगा जिसका अपना  कोई वजूद नहीं है। यानी वहां इस नाम का न कोई गांव है न कस्बा। सिर्फ रेलवे स्टेशन है। कैसे बदनवालु स्टेशन का नाम नरसांबुधि पड़ा ये किसी पुरातात्विक खोज का विषय है। नरसांबुधि भी एक खोई हुई जगह है।  भारतीय रेल उसका अस्तित्व मानता है लेकिन लोकस्मृति में वो नहीं है।
  बहरहाल पृष्ठभूमि के रूप में आपको बता दूं कि बदनबालु में मैं नौ अप्रेल 2015 से 19 अप्रेल 2015 तक था। बदनवालु में एक पुराना खादी केंद्र है जिसकी स्थापना 1927 में हुई थी। इसकी स्थापना तगडूर रामचंद्र राव ने की थी जो आजादी के पहले के भारत और कर्नाटक के प्रसिद्ध गांधीवादी थे। इस खादी आश्रम की पूरे कर्नाटक में इतनी प्रतिष्ठा थी कि यहां और आसपास में बनी खादी को `बदनवालू खादी  खादी  कहा जाता था। गांधीजी खुद इस आश्रम में 1932 में आए थे। ऐसा कहा जाता है कि कन्नड़ के दिग्गज लेखक कुवेंपु हमेशा बदनवालू खादी की पहनते थे। कई और दूसरे तत्कालीन  लेखक भी। कुछ लोगों का तो ये भी कहना है कि `बदनवालू खादीका इंग्लैंड में भी निर्यात होता था। पर आज की तारीख में बदनवालु का खादी केंद्र एक उजड़ा हुआ बियाबन  है। (भारत में कई ऐसे खादी केंद्र हैं)। ऐसा नहीं था कि बदनवालु में  सिर्फ खादी का कपड़ा तैयार किया जाता था। ये एक बड़ा ग्रामोद्योग केंद्र भी था जहां कागज, दियासलाई, तेल पिराई जैसे और भी काम होते थे। लगभग आठ एकड़ में फैले केंद्र में नौ-दस भवन थे। इनमें कई  क्षत विक्षत हैं। कुछ की मरम्मत हो रही है। बाकी किसी तरह खड़े हैं। अब गिरा तब गिरा वो अटका हुआ आंसू की तरह। ये खादी केंद्र जीर्ण शीर्ण शरीर की तरह है।  लगता है किसी भग्नावशेष में आ गए है। सिर्फ दीवार या क्षतें ही नष्ट नीड़ की तरह नहीं है बल्कि पूरा वातावरण ही उस बहुत कुछ के लोप जाने की गवाही देता है जो किसी भी केंद्र को ऊर्जा और हलचलों से भरा बनाए ऱखते हैं। बदनवालु सत्याग्रह उसी खादी मंदिर में फिर ग्रामोद्योग की प्राणप्रतिष्ठा का प्रयास था।
  प्रसन्ना न सिर्फ मेरे पुराने मित्र हैं बल्कि  व्यापक अर्थ में एक ऐसे संस्कृतिकर्मी हैं जो कला और सामाजिक भूमिका में किसी तरह का फर्क नहीं करते हैं। बतौर रंगनिर्देशक उनकी अखिल-भारतीय प्रतिष्ठा है। उन्होंने कई नाटक भी लिखे हैं लेकिन  पिछले कुछ वर्षों से उनका एक दूसरा व्यक्तित्व भी उभर रहा है। कर्नाटक के शिमोगा जिले के हेग्गोड़ू गांव  में उन्होंने `चरखानाम की एक संस्था भी बनाई जो हथकरघा का महत्त्वपूर्ण केंद्र भी बन गया है।  2014 में उन्होंने कर्नाटक में एक पदयात्रा का आयोजन भी किया जो हथकरघा के लिए था। इसी सिलसिले में कर्नाटक के गदग जिले के गजेंद्रगढ़ कस्बे में उन्होने अनशन भी किया था। हथकरघा और विद्दुतकरघा के बीच भारत में पिछले कई वर्षों से युद्ध की स्थिति है जिससे आम भारतीय अनभिज्ञ है। और इस ,युद्ध में हथकऱघा लहुलुहान हो रहा है। हथकऱघा बचाने के आंदोलन के  इसी क्रम में प्रसन्ना ने महसूस किया ये तब तक नहीं बचेगा जब तक लोगों की जीवनशैली नहीं बदलेगी अभी जो जीवनशैली हो है वो उपभोक्तावाद पर आधारित हैं तथा दूसरी चीजों के अलावा ऊर्जा के अत्यधिक उपभोग की तरफ ले जाती है। हालांकि हथकरघा में विद्युत ऊर्जा की खपत नहीं है फिर भी उसके खिलाफ उपभोक्तावादी ताकतें लगी रहती हैं। इसलिए हथकरघा के लिए आंदोलन का अभियान आगे चला   और इसी की अगली कड़ी में था बदनवालु सत्याग्रह जिसके बारे में  दक्षिण भारत उत्सुक था पर उत्तर भारत लगभग उदासीन।  
  19  अप्रेल 2015 को यहां, यानी बदनवालु में  हजारों लोग (पांच से छह हजार के करीब) इकट्ठे हुए हुए और इस सत्याग्रह को अपना समर्थन दिया। यहां कई तरह के लोग थे। किसान, देसी खेती को बचाने कि लिए लगे लोग थे, हथकरघा और खादी के हिमायती थे, शिक्षा में प्रयोग करनेवाले थे, लेखक, कलाकार और रंगकर्मी थे। उस तरह के लोग थे जिनको लग रहा है कि भारत में विकास की जो प्रक्रिया चल रही है वो टिकाऊ नहीं है और प्रकृति-जमीन, जंगल, स्वास्थ्य का विनाश कर रही है।
 ऐसा नहीं था कि सिर्फ 19 अप्रेल को ही जो हुआ सो हुआ। उसकी प्रक्रिया तो यहां पहले ही शुरू हो गई थी जब इस ताऱीख के लगभग एक महीना पहले प्रसन्ना और उनके तीन और साथी यहां आकर  रहने लगे। वे थे अनिल हेगड़े, जो समाजवादी पृष्ठभूमि के हैं, और इन दिनों पश्चिमी घाट बचाने के लिए जो लोग संघर्ष कर रहे हैं उनमें वे भी हैं। दूसरे थे श्रीकुमार जो विज्ञान के अध्येता रहे और इंजीनियरिंग के अध्यापक भी।  अब पिछले कई सालों से वे सिर्फ खेती कर रहे हैं। तीसरी थीं उषा राव जो ग्रामीण प्रबंधन की स्नातक रही हैं। वे भी कुछ सालों से तेलांगना के मेदक इलाके में खेती करती हैं। प्रसन्ना, अनिल हेगड़े, श्री कुमार और उषा राव बीस मार्च 2015 से ही इस खादी आश्रम में  जम गए। इस आश्रम के एक भवन के क्षत-विक्षत हिस्से को उन्होंने साफ किया। उस हिस्से की छत का बड़ा सा हिस्सा गायब था। इसलिए जब बारिश होती तो वो हिस्सा पानी से सराबोर हो जाता था।  कीड़े भी आ जाते थे। दोपहरी में तेज धूप  चमकती। और रात में मच्छरों का प्रकोप। वैसे ये चारो रात में खुले मैदान में सोते थे। ओडोमस के सहारे मच्छऱों का आक्रमण रोकने का प्रयास करते थे। लेकिन मच्छर भी कहां मानते थे। उनका अभियान जारी रहता। 9 अप्रेल की रात मैं भी वहीं सोया। लेकिन उस रात वहां सिर्फ मैं और ये चार लोग भर नहीं थे। कुछ और लोग भी थे। इरफान खान   और उनकी पत्नी सुतपा सिकदर । जी हां,  मैं हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता  इरफान खान की बात कर रहा हूं जो   हॉलीवुड के स्टार भी हो चुके हैं। 9 अप्रेल की रात को इरफान भी बदनवालु के उस चबूतरे पर खुले आसमान के नीचे सोए जहां प्रसन्ना और मैं भी थे। ओडोमस शरीर में मलकर प्रसन्ना तो जल्द गहरी नींद में सो सो गए। पर मैं, प्रसन्ना, अनिल हेगड़े. इरफान और सुतपा तो रात डेढ़ बजे तक बातें करते रहे।

 इरफान  सपत्नीक इस आदोंलन को अपना नैतिक समर्थन देने बदनवालु आए थे। दरअसल मैंसूर से इरफान, सुतपा, एक पेंटर सच्चिदानंद, एक स्थानीय नाट्य उत्साही जयराम पाटिल, उनकी पत्नी रजनी शास्त्री  और मैं मैसूर से एक इनोवा मे साथ ही चले। मैसूर शहर के बाहरी इलाके में जयराम पाटिल का घर है। ये एक गांव ही है जो पेड़ों से भरा है। और यहां एक खास प्रजाति के बंदर काफी हैं। जयराम पाटिल की पत्नी रजनी शास्त्री पशु प्रेमी (एनिमल राइट एक्टिविस्ट) है। लगभग ढाई तीन सौ बदंरों को रोज खेले खिलाती हैं। इसके अलावा चने भी। इरफान तो उनके घर के सामने बंदरों के चने खिलाने लगे। बंदर भी इतने सुसंस्कृत कि उनके हाथों से सिर्फ से चने ही लेते थे। बाकी कोई उधम नहीं। इरफान उनके सानिध्य का मजा ले रहे थे। बंदर भी मस्त होकर चने खा रहे थे और इऱफान के साथ फोटो भी खिंचवा रहे थे। ।
 खैर, बंदर-भोजन के बाद जब हम बदनवालु पहुंचे तो वहां घुप्प अंधेरा। मालूम हुआ कि बिजली का बिल इस आश्रम ने बरसों से नहीं चुकाया है और इसलिए यहां रात में अधेरे का साम्राज्य ही रहता है। कार के हेडलाइटों की रोशनी में ही प्रसन्ना ने सबका एक दूसरे से परिचय कराया। कुछ कन्नड़ टीवी चैनल वाले भी इरफान का इंटरव्यू लेने वहां आ गए थे इसलिए कुछ रोशनी कैमरा के लिए  जो प्रकाश व्यवस्था  थी, वो भी कर रही थी।  इरफान ने चैनलों से बात करते हुए जो कहा उसका लब्बो लुबाब ये था प्रसन्ना मेरे (यानी इरफान के) गुरु हैं और उनसे अभिनय की बारीकियां सीखीं है। (इरफान और उनकी पत्नी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र रहे हैं और प्रसन्ना के निर्देशन में `फुजियामा और `लालघास पर नीले घोड़े’  नाटकों  में इरफान ने मुख्य भूमिका निभाई थी।)  इरफान ने कहा कि वे न सिर्फ प्रसन्ना के कारण यहां आए हैं बल्कि पश्चिमी शैली के विकास के मॉडल के प्रति भारत में अंधानुकरण की प्रवृत्ति बढ़ रही है उससे भी अपनी असहमति जताने यहां पहुंचे हैं।
9 अप्रेल की उस रात जब बदनवालु में चांद कभी बादलों के बीच छिप जाता था और कभी बाहर निकल आता था, और हल्की सी बूंदा बांदी भी हो जाती थी और बिजली के साथ ये आशंका भी जोर से कौंधती थी कि अगर वर्षा हुई तो हम कहां छिपेंगे, इरफान और बाकी हम सब  विकास नीति से लेकर फिल्मों जैसे विषयों पर बात करते रहे। मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दिनों से देख रहा हूं कि इरफान में एक सहज ईमानदारी है जो उनके अभिनय में भी झलकती हैं और निजी जीवन में। जब वे अभिनय करते हैं लगता नहीं कि कुछ अतिरिक्त कर रहे हैं। कोई मैनरिज्म नहीं। कोई अतिनाटकीयता नहीं। किसी तरह का स्टारडम नहीं। पर उनके भीतर एक गहरा `कनिविक्शनजिसका मुरीद हुए बिना आप रह नहीं सकते। उस रात बातचीत में भी वे आत्मीय रूप से अपनी राय और अनुभव बता रहे थे। नासिक के पास इरफान का आमों का बाग भी है। वे बता रहे कि किस तरह कई जगहों पर जमीन देखने के बाद उन्होंने नासिक वाली जगह पसंद की। मुझे याद आया कि इरफान आमों का एक विज्ञापन भी किया था जिसमें कई तरह के आमों का उल्लेख था। उनके नासिक वाले आम के बाग के बारे में जानने के बाद लग कि क्यों वो विज्ञापन भी विश्वसनीय लगता था। आखिर आम का बागवानी का उनका अपना अनुभव भी है। बहरहाल जब फिल्मों की बात चली तो `द लाइफ ऑफ पाई के बारे में भी उन्होंने  कई चीजें बताईं। जैसे ये कि  उसके निर्देशक आंग ली एक बेचैन व्यक्ति हैं और शूटिंग के दौरान ऐसा कई बार होता था कि जब इरफान अपने समय पर शूटिंग के लिए  पहुंचते थे तो पाते थे कि वे (आंग ली) उनके द्वारा बोले जाने  वाले संवादों की खुद बुदबुदा रहे हैं। इरफान के कहने का आशय ये था कि आंग ली  फिल्म निर्माण की प्रक्रिया में खुद को इतना विलीन कर लेते हैं उसी के साथ एकमेव हो जाते हैं।  `लाइफ ऑफ पाई के लिए बाघ फ्रांस के एक चिड़ियाघर से मंगवाए गए थे। ये बाघ भी बड़े मूडियल थे। (मूडियल शब्द मेरा है इरफान का नहीं।) वे कब किस मूड में होते इसका अंदाजा लगाना मुश्किल था। कभी आखें बंद करते तो देर तक खोलते ही नहीं और कभी देखते तो लगातार एकटक। उनके मूड के मुताबिक शूटिंग की जाती थी। इरफान ने कहां कि वे आंग ली के प्रशंसक इसलिए हो गए जिस विषय पर ये फिल्म (द लाइफ ऑफ पाई) है, यानी ईश्वर के होने या न होने पर, उसे बनाना बहुत कठिन है। ये फिल्म... की रचना पर बनी है। वे भी इस पुस्तक को लिखने के दौरान काफी बेचैन थे और कुछ दिनों के लिए पांडचेरी में आकर रहे भी थे।  आज की  हिंदी फिल्मों की बात चली तो इरफान ने कहा कि अब वो समय आ गया है जब अच्छी पिल्म फिल्म के लिए मौलिक कहानी चाहिए, सिर्फ मसाले से काम नहीं चलेगा। वही फिल्म अब
टिकेगी और स्थाई महत्त्व की होगी जिसकी अपनी खास कहानी हो। 10 अप्रेल को जब इरफान और सुतपा लौटते वक्त बदनवालु से बीस किलीमीटर दूर कुम्हारों के गांव दूरा गए तो मैं और अनिल हेगड़े भी साथ थे। गाड़ी अनिल हेगड़े ड्राइव कर रहे थे। इरफान और अनिल हेगड़े में खेती और किसानी को लेकर बहुत बातें हुईं। पोपट लाल पवार
के बारे में अनिल हेगड़े ने विस्तार से बताया। पोपटराव पवार जब महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले को हिब्रे बाजार पंचायत के अध्यक्ष बने तो तब  इस ग्राम पंचायत की खेती का बुरा हाल था। कृषि के लिए पानी नहीं था इसलिए बोरिंग की जाती पर उससे पानी का स्तर और नीचे जाता। पोपटलाल पवार के प्रयास से पंचायत ने जल संग्रहण का काम शुरू किया। इससे पंचायत के भूजल का स्तर ऊपर उठा। फिर अच्छी खेती होने लगी। इस गांव में आज की तारीख में एक भी बोरवेल नहीं है। यानी पानी का दोहन नहीं होता। पंचायत ने नियम बना दिया गांव की जमीन कोई बाहर का आदमी नहीं खरीद सकता। फिर शराब बंदी की गई। पंचायत की तरफ से। महाराष्ट्र सरकार ने  हिब्रे बाजार को एक आदर्श ग्राम पंचायत घोषित किया है। इरफान ने इस कहानी को बड़े गौर से सुना हैं और कहा  इस पर टीवी कार्यक्रम बनाने की इच्छा हो रही है। अनिल हेगड़े ने उसके बाद सुभाष पालेकर के बारे में बताया। पालेकर भी महाराष्ट्र के अमरावती जिले हैं और जीरो-बजट खेती के प्रचारक हैं। अनिल हेगड़े ने कहा कि पालेकर अपनी खेती की पद्धति पर कार्यशाला भी लगाते हैं और किसानों को प्रशिक्षित भी करते हैं।
  14 अप्रेल को मेधा पाटकर बदनवालु के उस खादी केंद्र में पहुंची थीं। प्रसन्ना से मिलने और बदनवालु सत्याग्रह को अपना नैतिक समर्थन देने। मेधा की स्मरण शक्ति गजब की है। उनसे लगभग पंद्रह साल बाद मिला था पर उन्होंने पहचान लिया। उस दिन  खादी केंद्र पर कई युवा लड़कियां भी आई थीं। उन्होंने मेधा पाटकर से नर्मदा बचाओ आंदोलन के बारे में कई सवाल पूछे। मेधा ने संक्षेप में नर्मदा आंदोलन का इतिहास बताया। उन्होंने सबसे ये भी कहा कि जल संग्रहण के लिए अपने अपने इलाके में छोटे मोटे प्रयास करते रहें क्योंकि पानी देश की प्रमुख समस्या है। खेती की भी। उनका कहना था कि  हमारे देश में  बरसात के पानी को बचाने का प्रयास कम होता है और वह अधिकतर बह जाता है। बरसाती पानी के संग्रहण के लिए अभियान चलाया जाना चाहिए। मेधा ने नर्मदाघाटी के पुरातात्विक मह्त्त्व की भी चर्चा की। उनके कहने का सार ये था कि इस घाटी में ही आदि मानव का जन्म हुआ और ये मोहनजोदड़ों (मुइन जोदड़ो) से भी पुरानी सभ्यता है।


 बदनवालु में 19 अप्रेल को जो हजारों लोग थे उनकी अहमियत सिर्फ ये नहीं थी वे किसी संख्या को बता रहे थे। वे उस बेचैनी को भी अभिव्यक्त कर रहे थे जो देश के चप्पे में खदबदा रही है। प्रकृति को नष्ट करके विकास की गाड़ी आगे बढाई जाए या प्रकृति को बचाकर- इस बहस को देश के हर इलाके मे सुना जा सकता है। मगर इस बहस की आवाज दबी दबी सी रह जाती है क्योंकि सत्ताकांक्षी नेता, संगठित कॉरपोरेट, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और नौकरशाही की ताकत इतनी ज्यादा है कि वो  असर नहीं कर पाती।  हालांकि भारत का विकास किस तरह का हो, ये मसला तो औपनिवेशिक भारत में ही उठ गया था और जिसका एक सशक्त विमर्श महात्मा गांधी के `हिंद स्वराजसे आया था। लेकिन आजाद भारत में `हिंद स्वराज का तर्क दब गया और औद्योगीकरण की नीतियों और कार्यक्रमों  ने उसे  कुचलने की कोशिश की। लेकिन विचारों की अपनी ताकत और जिजीविषा होती है। दबाए जाने के बाद भी वे खड़े हो जाते हैं। सीधा और तनकर।  इसी कारण नर्मदा सागर बांध और सरदार सरोवर बांध जैसे प्रकल्पों के खिलाफ आवाजें उठीं और आंदोलन हो रहे है। फिर नई आर्थिक नीति का दौर आय़ा तो लगा कि अब तो उपभोक्तावाद की जययात्रा पूरी हो चुकी है। किंतु तभी किसानों की आत्महत्या की खबरें आने लगीं। कपास की खेती में लगे किसान तबाह होने लगे। हालांकि ये सब अचानक नहीं हुआ था। इसकी पूर्वपीठिका तो पहले से बनने लगी थी। कर्नाटक के ही किसान नेता प्रो. नंजुंडास्वामी ने चेताया था कि अगर विदेशी बीजों का चलन बढ़ा तो भारत के किसान अपनी खेती नहीं कर पाएंगे, वे विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की इच्छा और उनके हितों के मुताबिक खेती करेंग। नंजुंडास्वामी ने एक विदेशी बीज कंपनी को खिलाफ आंदोलन भी चलाया।
     आज की तारीख में स्थिति  ये है कि  विदेशी बीजों का चलन भी जारी है और साथ ही किसानों की बर्बादी भी। किंतु दूसरी तरफ खेती से देसी तरीके और देसी बीजों के लिए चेतना भी बढ़ रही है। बदनवालु में ऐसे कई लोग मौजूद थे जो  व्यावसायिक खेती से नुकसान को लेकर जनजागरण कर रहे हैं। व्यापसायिक खेती में जिस तरह बड़े पैमाने पर कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है उससे स्वास्थ्य संबंधी गंभीर संकट पैदा हो रहे हैं। कैंसर जैसी बीमारियां  सुरसा के बदन की तरह बढ़ रही हैं। अनिल हेगड़े ने इरफान से बातचीत के दौरान पंजाब के एक ऐसे गांव का जिक्र किया जहां के लोग कीटनाशकों के अतिशय प्रयोग के कारण कैंसर की चपेट मं इस तरह आ गए हैं कि अपनी गांव की जमीन बेचना चाहते हैं, परंतु उस जमीन को खरीदनेवाले नहीं है क्योंकि वैसे वहां बसना कौन चाहेगा जहां कैंसर के दानव की क्षुधा बढ़ रही हैउस गांव में कोई अपनी लड़की की शादी के लिए तैयार नहीं है क्योंकि उसके और उसके भावी बच्चों के कैंसरग्रस्त होने की आशंका है। कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसका रिश्ता विकास की नीतियों से है। अगर आप कीटनाशकों का बेहिसाब प्रयोग करेंगे,  परमाणु केंद्रों में पैदा होनेवाले रेडिएशन पर ध्यान नहीं देंगे ये बीमारी तो और बढ़ेगी। फिर कैसा विकास और किसका विकास? विकास औऱ विनाश में फर्क क्या रह जाएगा?
    बदनवालु में  देसी बीजों की बात भी हुई। वहां कृष्णा प्रसाद आए थे जो बंगुलुरु में रहते हैं और `सहज समृद्धा से जुड़े हैं। उत्साह से भरपूर कृष्णा प्रसाद  वैसे शिक्षा से इंजीनियर हैं लेकिन उनका सारा समय देसी बीजों के संवर्धन और प्रोत्साहन के लिए जाता है। उनका दिमाग वैज्ञानिक है और वे प्रमाणों से साथ बात करते हैं। उन्होंने `भारत बीज स्वराज मंच का भी गठन किया है। जापानी किसान और दार्शनिक मसानोबु फुकोआका की किताब `वन स्ट्रा रिवोल्यूशन ने उनकी जीवनदृष्टि बदल दी। उन्होंने तय़ किया कि न तो सरकारी नौकरी करेंगे और न किसी बड़ी कंपनी मे। सारा समय देसी खेती को बचाने में लगाएंगे। उनका दावा  है कि देसी बीजों को बचाने और संग्रह करने का उनका अभियान देश के अलग अलग भागों में लोकप्रिय हो रहा है।
  बदनवालु में मुझे गोपीकृष्ण और मामाजी से मिलकर इस बात का भी एहसास हुआ कि हम गांधी जी के चरखा को भी ही नहीं उनकी बकरी को भी भूल गए हैं। गोपीकृष्ण कर्नाटक के बेलगांव के इलाके हैं और भेड़ पालन में लगे समुदाय के साथ काम करते हैं। मामाजी, जिनका नाम नीलकंठ नागप्पा कुरबर है, और जो पीले रंग की पग्गड़ पहनते हैं,  इसी समुदाय है। वे भेड़ों के डॉक्टर भी हैं। कम से कम अपने को ऐसा ही कहते हैं। बेहद बातूनी आदमी। चेहरे पर कुछ छोटे छोटे मांसल गोले। आंखों में हल्की सी शरारत। बेलगांव के ही हैं लेकिन कोई स्थाई ठिकाना नहीं। वे घुमंतु हैं और अपने घोड़ों और भेड़ों के साथ घूमते रहते हैं। परिवार भी साथ रहता है। वे भेड़ के बारे में ही नहीं घूमंतूपन के बारे में भी काफी कुछ बताते हैं। हिंदी अच्छी बोलते हैं। लहजा थोड़ा व्यंगात्मक है और मजाकिया भी ।  यहां  और आगे बढूं इसके पहले एक हल्का सा विषयांतर हो जाए जो विषयांतर नहीं भी है।  यानी थोड़ा-सा बकरी पुराण ।
  इन दिनों  जब बकरी की चर्चा होती है तो सिर्फ  ऐसे पालतू जानवर की याद आती है जो कम मात्रा में दूध देती है। आजकल उसकी उपयोगिता इसलिए बढ़ गई है कि जब शरीर में जब प्लेटलेट कम हो जाता है तो बकरी के दूध का सेवन फायदेमंद होता है। इसी वजह से जब बड़े शहरों में डेंगू का प्रकोप होता है इस दूध का रेट इतना बढ़ जाता है एक किलो दूध बेचकर कोई एक बकरी खरीद सकता है। पर क्या बकरी के लिए देश में या राज्य सरकारों के लिए कोई नीति है?  मैं नहीं जानता।  मैं उस यात्रा को सफल मानता हूं जिसमें आप कुछ नए प्रश्नों से मिलते हैं। वे प्रश्न आपको नए वैचारिक गंतव्य की तरफ ले जा सकते है। अगर आप जाना चाहें। बदनवालु में भी कई सवाल मिले जिनमें एक  बकरी वाला  भी था। गोपीकृष्ण से बात करने के दौरान मेरे मन में यकाएक कौंधा कि बकरी और भेड़ हमारे राष्ट्रीय विमर्श में कहीं भी क्यों नहीं हैं। क्या हम चरागाही जीवन को बिल्कुल भूल गए हैं। आखिर पारंपरिक भारतीय अर्थव्यवस्था तो चरागाही लोगों पर बहुत कुछ निर्भर थी। खासकर कृषि।
   भेड़ पालन भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था का अविभाज्य हिस्सा रहा है। पहले ज्यादातर और आज भी कई किसान अपने खेतों में भेड़  बिठाते हैं। भेड़ का मल खेत से लिए उर्वरक का काम करता है। भेड़ से  उन भी भी निकलता है जिससे कंबल, स्वेटर बनते हैं। पर जब खेती पर सरकारी नीतियां बनती हैं तो भेड़ों और चरवाहों पर बहुत कम बातें होती हैं।  गोपीकृष्ण  ऊंटों के बारे में चर्चा करते हैं। यानी बकरी, भेड़ और ऊंट को छोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुरक्षित नहीं रख सकते। गांधी जी यों ही बकरी के हिमायती नहीं थे।
 गोपीकृष्ण और मामाजी के साथ ही मिली दीप्ति देसाई। दीप्ति देसाई फोटोग्राफर हैं। पचीस-तीस साल की लड़की।  चेहरे पर गंभीरता भी और उत्साह भी। सारा समय वे चरवाहों और गड़रियों के बीत बिताती हैं। उनके बीच ही रहती हैं और उनके फोटो खींचती हैं। उन सबको ही अपमा परिवार मानती हैं। उनका फोटोग्राफी को लेकर एक साइट भी हैं –दीप्ति देसाई डाट काम।(deeptidesai.com )
 चले फिर बदनवालु सत्याग्रह की ओर। इस सत्याग्रह का वृहत कार्यक्रम 19 अप्रेल को जरूर था लेकिन उसके पहले आसपास की पांच जगहों से ऐसी पदयात्राएं निकली थीं जो 19 को बदनवालु पहुंची थी। ये यात्राएं मैसूर, हेचडी कोटे. चामराजनगर, नंजनगुड़ और अमृतभूमि से निकली थीं। इन यात्राओं में किसान थे, पेंटर थे, रंगकर्मी थे, युवा थे और बच्चे भी थे। गांधीवादी भी थे और लोहियावादी भी। किसी जत्थे ने पचीस किलोमीटर की यात्रा तय की किसी ने पचास किली मीटर की। कोई जत्था  पांच दिनों में यहां पहुंचा तो कोई चार दिनों में। 18 अप्रेल को ये यात्राएं तगडूर रामचंद्र राव के गांव तगडूर पहुंचीं जो बदनवालु से लगभग दस किलोमीटर दूर है। इस गांव में तगड़ू ने एक खादी केंद्र बनाया था जो आज भी सक्रिय है। मालूम हुआ कि रामचंद्र राव का इस गांव में आरंभिक दिनों में काफी विरोध हुआ। उनके खादी केंद्र को शुरू में जला भी दिया गया था। तगड़ू चूंकि अस्पृश्यता नहीं मानते थे इसलिए गांव के सवर्णों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। पर तगड़ू अडिग रहे और अपने मिशन पर लगे रहे। उनका पुश्तैनी मकान भी देखा जो भारत के गावों में पाए जाने वाले सामान्य पुराने मकानों की तरह हैं। मिट्टी का बना।  एक आम भारतीय किसान का मकान जिसकी छतें ऊंची नहीं होतीं और जो मिट्टी के दीवारों से बनी होती है।
 यात्रा में सिर्फ नए प्रश्न ही  मिलते। नई तरह की प्राकृतिक सुषमा ही नही मिलती। नए लोग मिलते हैं जिनसे मिलकर लगता है कि जीवन में आस्था अगर बनी रहेगी तो ऐसे ही लोगों के वजह से। बदनवालु में मुझे एक ऐसे ही सज्जन मिले जयदेव। जयदेव चामराजनगर में रहते हैं और अनाथ और साधनहीम बच्चों के लिए एक केंद्र चलाते हैं दीनबंधु आश्रम। अपने जीवन में जो कुछ अनाथ आश्रम मैंने देखें हैं उनमें बच्चों के चेहरे पर कभी खुशी की रेखा नहीं देखी। लेकिन बदनवालु से लगभग पचीस किलोमीटर दूर चामराजनगर में जो दीनबंधु आश्रम है उसके हर बच्चे के चेहरे पर प्रसन्नता की वो आभा मैंने देखी जो आम बच्चों के चेहरे पर भी विरल है। चामराजनगर तमिलनाडु और केरल से सटा जिला है इसलिए इन दोनों राज्यों की संस्कृतियां भी यहां मौजूद हैं। नारियल के पेड़ों की अनगिनत श्रृंखलाएं यहां सड़क से दिखेंगीं। विज्ञान के विद्यार्थी और प्राध्यापक रहे जयदेव ने अपना लगभग पूरा जीवन अनाथ और साधनहीम बच्चों की देखभाल और शिक्षा में लगा दिया। वे लगभग साठ साल के हैं और ऊर्जा तथा सामाजिक जिम्मेदारी के एहसास से हमेशा भरे रहते हैं। बदनवालु सत्याग्रह में उनकी बड़ी भूमिका रही।  बदनवालु के लिए जो पांच  पदयात्राएं निकली थीं और 19 अप्रेल को वहां पहुंची थीं उनमें एक चामराजनगर के दीनबंधु आश्रम से भी निकली। इनमें कई बच्चे भी थे। इस पदयात्रा के साथ मैं आठ किलोमीटर चला। बच्चों में क्या उत्साह था?  वे कन्नड़ में गीत का रहे थे और नुक्कड़ नाटक भी कर रहे थे। हालांकि उन गीतों और नाटक के संवादों के मैं समझ नहीं पा रहा था लेकिन जो आभास हो रहा था उससे लग रह था कि प्रकृत और पर्यावरण को बचाने का संकल्प उनमें था।

बदनवालु की य़ात्रा मेरे लिए नई अंतर्दृष्टियों के करीब जाने का अवसर था। हालांकि भाषा की समस्या थी। ज्यादातर लोग कन्नड़ ही बोलनेवाले थे। कुछ अंग्रेजी जाननेवाले भी थे। लेकिन वहां वो भारत था जिसे हम देसी भारत कह सकते थे। 19 अप्रेल को बदनवालु की हवा में सिर्फ एक गांव  के खादी केंद्र को बचाने की आवाज भर नहीं था। वो हवा संकल्पों और स्वप्नों से भरी थी।  वो हवा जो आसमान को बड़ा कर देती हैं और आशाओं की नई संभावावनाएं पैदा करती है। वहां कई ऐसे एहसास थे जो हम देश के बड़े महानगरों से लेकर गांव और कस्बों में रोजाना महसूस करते हैं। मसलन ये कि हमारा भोजन इतना जहरीला क्यों हो रहा है?  या फिर उसका स्वाद  क्यों खत्म हो रहा है? ऐसे समय में जब बिजली की कमी हो रही है हम  क्यों खादी या हथकऱघा को नष्ट कर रहे हैं जिसमें बिजली की कोई जरूरत नहीं है। एक ऐतिहासिक सत्य है कि अंग्रजों ने भारतीय  वस्त्र उद्योग को इसलिए खत्म किया उनकी मिलें चलती रहें लेकिन आजाद भारत में हम क्यों अंग्रेजों की राह पर चलते हुए देसी कपड़ा उद्योग और कारीगरों को खत्म करने पर तुले हुए हैं? हमारे देश की खेती विदेशी बीज  कंपनियों के हितों के लिए होगी या भारतीय किसानों के हितों के लिए? क्या गांव आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकते हैं या वहां से हमेशा शहरों की तरफ युवकों का पलायन होता रहेगा? गांधी के `हिन्द स्वराज  के वैचारिक बीज बदनवालु में फिर से रोप गए हैं। देखते हैं कि वे किस तरह अंकुरते हैं। विचारों की खेती भी होती है। बदनवालु की खोई हुई जगह में वो विचार क्या पैदा करते हैं इसे देखने वहां फिर जाऊंगा।

Tuesday, August 11, 2015

तमस- ये अंधेरा कितना घना है!

रवीन्द्र त्रिपाठी
सांप्रदायिकता के प्रसंग में `तमस की याद स्वाभाविक है। भीष्म साहनी का ये उपन्यास हिंदी और भारतीय साहित्य़ में इस कारण भी समादृत है कि ये सांप्रदायिकता की विनाशकारी ताकत और भूमिका को रेखांकित करता है। भीष्म जी ने खुद एक आत्म वक्तव्य में लिखा है  (संदर्भ `भीष्म साहनी- एक मुकम्मल रचनाकार- प्रकाशक `सहमत) कि सन् 1970 के इर्दगिर्द महाराष्ट्र के भिवंडी शहर में दंगे के दौरान  वे वहां अपने बड़े भाई बलराज साहनी और फिल्मकार-लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास के साथ  गए थे तो वहां की विभीषिका को देखकर उनके दिमाग में अपने मूल शहर रावलपिंडी की वे यांदे ताजा हो गई जहां आजादी के ठीक पहले दंगे हुए थे। भीष्म जी उसी इलाके में जन्मे थे। `तमस के कई , बल्कि ज्यादातर, प्रसंग उस दंगे से ही उठाए गए हैं।   ऐसे में इस उपन्यास  को  सांप्रदायिक मनोवृत्ति को उजागर करनेवाला उपन्यास माना जाए तो इसे में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यशपाल के `झूठा सच के  बाद `तमस ही  हिंदी में वह रचना है जिसके बारे में ये कहा जा सकता है कि इस भारत विभाजन से जुड़े सांप्रदायिकता के मुद्दे को व्यापक परिप्रेक्ष्य में उठाया है। भीष्म जी की कहानी `अमृतसर आ गया  हैभी सांप्रदायिक मनोवृत्ति को उजागर करनेवाली रचना है।
  लेकिन कोई बड़ी रचना  किसी खास समस्या, चाहे वो कितनी ही बड़ी क्यों न हो, तक केंद्रित होकर अर्थवान नहीं होती। उसमें कई आवाजें होंती हैं और वे आवाजें समाज और मनुष्य के कई परतों से हमारा साक्षात्कार कराती हैं। `तमस को मैं ऐसी ही रचना मानता हूं। अपने प्रकाशन के चासील साल के अधिक बीत जाने के बाद भी अगर ये हमारे समकालीन साहित्य का एक संदर्भ-विंदु बना हुआ है तो इसकी एक वजह, मेरे खयाल से, ये भी है कि  इसमें व्यक्तिगत और सामाजिक मनोविज्ञान की कई गुत्थियां और प्रवृत्तियां हैं, ब्रितानी उपनिवेशवाद के तौर तरीकों से वाकफियत कराने की इसकी क्षमता है और ये फिर हमें उस अंधेरे का पता देती है जो लगातार घना हो रहा है तथा जो भारत में हीं नहीं दुनिया के कई देशों फैल रहा  है। `तमस की अंतर्वस्तु इस बात से भी जुड़ी है कि लोग दूसरों को और अपने को किस रूप में पहचानते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो `अपने और दूसरे’` का विभाजन ही एक सांप्रदायिक मनोवृत्ति है क्योंकि जब इस तरह का विभाजन करते हैं- यहां उसका तात्पर्य हिंदू बनाम मुसलमान विभाजन से है- तो उसमें दूरी और तनाव अनिवार्य है। हिंसा की आशंका भी।  सामाजिक स्तर पर इस तरह के भेद और विभाजन हर समाज में मौजूद रहते हैं लेकिन जब उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष जैसे ऐतिहासिक आंदोलन की प्रक्रिया में  पर इस विभाजन को पाट कर `नागरिकता या `भारतीयताकी नई संकल्पना पेश की जा रही हो, तो उपनिवेशवादी  ताकतें पुरानी अस्मिताओं को आपस में एक दूसरे के खिलाफ लड़ने के लिए माहौल बनाती है। ` तमसमें भी हम ऐसा ही होता दिखते हैं। इसलिए मेरी प्रस्तावना है कि ये सिर्फ सांप्रदायिकता को रेखांकित करनेवाला उपन्यास नहीं है।
मोटे तौर पर जिसे पहचान की समस्या या पहचान की राजनीति कहते हैं भारत में उसका सीधा संबंध भारत-पाक विभाजन रहा है और इसी  कारण उपनिवेशवाद से मुक्ति के लिए चले संघर्ष से भी। विभाजन के ठीक पहले भारत में जो सांप्रदायिक उन्माद गहराया उसका उत्स आंतरिक  नहीं था बल्कि बाहरी भी था। जरा देखिए कि उस समय पहचान की राजनीति कैसे काम कर रही थी और कौन सी ताकते थीं जो इस राजनीति में सक्रिय थी।  `तमस के शुरुआती पन्नों में आए इस प्रसंग को देखिए- ``नत्थू ने झट से मुड़कर देखा। तीन आदमी गली के मोड़ पर से सहसा प्रकट हो गए थे और नारे लगाने लगे थे। नत्थू को लगा  जैसे गली के बीचोबीच खड़े वो गान-मंडली का रास्ता रोके खड़े हैं। इन तीन आदमियों से एक के सर पर रूमी टोपी थी और आंखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा था। वह आदमी गली के बीचोबीच खड़ा मंडली को ललकारता हुआ सा बोल रहा था:
``कांग्रेस हिंदुओं की जमात है। इसके साथ मुसलमानों का कोई वास्ता नहीं है।‘’
इसका जवाब मंडली की ओर से एक बड़ी उम्र के आदमी ने दिया: `` कांग्रेस  सबकी जमात है। हिंदुओं की, सिखों की, मुसलमानों की। आप अच्छी चक ह जानते हैं महमूद साहिब, आप भी पहले हमारे साथ ही थे।
और उस वयोवृद्ध ने आगे बढ़कर रूमी टोपीवाले आदमी को बांहों में भर लिया। मंडली में से कुछ लोग हंसने लगे। रूमी टोपीवाले ने अपने को बांहों में से अलग करते हुए कहा:
``यह सब हिंदुओं की चालाकी है, बख्शीजी हम सब जानते हैं। आप चाहे जो कहें कांग्रेस हिंदुओं की जमात है और मुस्लिम लीग मुसलमानों की। कांग्रेस मुसलमानों की रहनुमाई नहीं कर सकती।‘’
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वयोवृद्ध आदमी कह रहा था:
``वह देख लो , सिक्ख भी हैं. हिंदू भी हैं, मुसलमान भी हैं। वह अजीज सामने खड़ा है, हकीम जी खड़े हैं----------‘’
``अजीज और हकीम हिंदुओं के कुत्ते हैं। हमें हिंदुओं से नफरत नहीं, इन कुत्तों से नफरत है।‘’ उसने इतने गुस्से में कहा कि कांग्रेस मंडली के दोनो मुसलमान खिसिया गए।
``मौलाना आजाद क्या हिंदू  है या मुसलमान?’’ वयोवृद्ध ने कहा। ``वह तो कांग्रेस का प्रेसिडेंट है।‘’
मौलाना आजाद हिंदुओं का सबसे बड़ा कुत्ता है।गांधी के पीछे दुम हिलाता फिरता है, जैसे ये कुत्ते आपके पीछे दुम हिलाते फिरते हैं।
इस पर वयोवृद्ध बड़े धीरज से बोले:
``आजादी सबके लिए है। सारे हिंदुस्तान के लिए है।‘’
``हिंदुस्तान की आजादी हिंदुओं के लिए होगी, आजाद पाकिस्तान में मुसलमान आजाद होंगे
आइए अब चलते हैं उपन्यास के आखिरी हिस्से की ओर जहां शहर में अमन कायम करने के लिए बैठक हो रही है। उसी समय  एक लीगी उठकर खड़ा हो जाता है और कहता है-
`` ले के रहेंगे पाकिस्तान! बख्शी जी, यह फरेब आप छोड़ दें। एक बार मान जाएं कि कांग्रेस हिंदुओं की जमात है, इसके बाद मैं इन्हें गले लगा लूंगा। कांग्रेस मुसलमानों की नुमाइंदगी नहीं कर सकती।
 ये दो  प्रसंग हैं जिनके माध्यम से ये समझा जा सकता है कि भारत की आजादी की लड़ाई के आखिरी दौर में, जब देश विभाजन की तरफ भी बढ़ रहा था, किस तरह की मानसकिता सक्रिय थी। भारतीयता या मनुष्यता की पहचान धूमिल हो रही थी और उनके ही समानांतर हिंदु या मुसलमान की पहचान  तीखी और आक्रामक हो रही थी। आजादी का मतलब देश के आजाद होने से है –इस स्थापना को ही खंडित किया जा रहा था और धार्मिक अस्मिता पर जोर दिया जा रहा था। यानी ब्रिटेन की गुलामी से आजाद  आम भारतीय को नहीं वरन हिंदू या मुसलमान को होना था- ऐसा माहौल बनाया जा रहा था। और ये भी कि अस्मिता की ये लड़ाई  खुद की अस्मिता को पाने  की उतनी नहीं थी बल्कि दूसरों की अस्मिता को नष्ट करने की थी। मानो जब तक आप दूसरे को खत्म नहीं करेंगे खुद नहीं बचेंगे।
 पहचान की राजनीति या पहचान के नाम पर हत्याएं बीसवीं और इक्सीसवीं सदी की एक बहुत बड़ी परिघटना है। इसीलिए सेकुलर राष्ट्रवाद का विमर्श संकीर्ण और असहिष्णु पहचानवादी विमर्श में बदल गया है। ये सिर्फ  उस भारत में ही नहीं हुआ जो ब्रितानी हुकूमत का गुलाम था बल्कि उस तत्कालीन यूगोस्लाविया में भी हुआ जो एक लंबे समय तक मार्शल टीटो के शासनकाल में सेकूलर रहा। आज यूगोस्वालिया का नामों निशान मिट चुका है और स्लाव, क्रोट या मुस्लिम अस्मिताएं एक दूसरे को हताहत कर क्षत विक्षत हो चुकी हैं। ये पश्चिम एशिया से लेकर पाकिस्तान में हो रहा है जहां शिया बनाम सुन्नी से लेकर कई  तरह की अस्मिताओं के खिलाफ रक्तरंजित लड़ाइयां हो रही हैं। ये आज के हिंदुस्तान में हो रहा है जहां हिंदू- मुस्लिम से लेकर नगा –कूकी विवाद जारी है।
  यहां हम पूछ सकते हैं कि क्या मनुष्य की कोई एकल पहचान हो सकती है? या हम में हर कोई एक साथ कई पहचानों वाला होता है? लेकिन इन पहचानों में तालमेल बिठा कठिन होता है। क्या पहचानवादी राजनीति सिर्फ हिंदू या मुसलमान तक रूकेगी? या हिंदु पहचान की राजनीति करनेवाला धीरे धीरे जातियों की पहचान की राजनीति शुरू नहीं कर देगा या मुसलमान  पहचान की राजनीति करनेवाला क्रमश: शिया, सुन्नी, अहमदिया की राजनीति में नहीं उलझेगा । विश्वमानचित्र पर देखें तो ऐसा ही कई देशों में हो रहा है इसलिए `तमस में जिस अंधेरे को रेखांकित किया गया है वो महज एक भारतीय समस्या या सांप्रदायिकता का मसला नहीं। पहचान के नाम पर पूरी दुनिया में हत्याएं हो रही हैं।
    `तमस में जिस सांप्रदायिक हिंसा का वृतांत है वो सिर्फ दो धार्मिक समुदायों के बीच तनाव की वजह से नहीं है बल्कि उसके पीछे कई वजहे हैं। एक तो खुद उपनिवेशवाद है। उपन्यास के आरंभ में ही हम पाते हैं कि नत्थू से सुअर मरवाने की पीछे तत्कालीन प्रशासन है जो ब्रितानी हूकूमत के तहत काम कर रहा था। लीजा और रिचर्ड (लीजा रिचर्ड की पत्नी और रिचर्ड अंग्रेज अधिकारी) की बातचीत भी इस सिलसिले में मानीखेज है।  लीजा रिचर्ड से कहती है-
``बहुत चालाक नहीं बनो, रिचर्ड। मैं सब जानती हूं। देश के नाम पर ये लोग तुम्हारे साथ लड़ते हैं और धर्म के नाम तुम इनको आपस में लड़वाते हो। क्यों, ठीक है ना?’’
यानी धर्म के नाम पर लड़ाई  दो तरह के धर्मावलंबियों का आपसी मामला नहीं है। उसके पीछे और शक्तियां हैं।
  मेरे मित्र और राजनीति विज्ञानी प्रकाश उपाध्याय ने एक किताब लिखी है-`प्रिय दुश्मनों की खोज। कई बार लोग या समुदाय अपने दुश्मनों की खोज करते हैं। प्रकाश उपाध्याय ने इस पुस्तक में लिखा है- दुश्मन बनाने की इस विधि की सबसे पहली शर्त यह है कि यह जनसमूह अपने उन नेताओं का पिछलग्गू बने जो उन्हें इस बात का ज्ञान दें कि वह (यह जनसमूह) हर प्रकाऱ से एक अद्वितीय और अलग संस्कृति, सभ्यता और राष्ट्र है। जैसे भारत के संदर्भ में हिंदु और मुस्लिम राष्ट्रवादियों द्वारा अपनी अलग संस्कृति और सभ्यता के नाम से सामाजिक विभाजन के जो बीज बोए थे उसी के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में मौलिक रूप से भारत और पाकिस्तान नाम के दो अलग अलग राष्ट्रों का निर्माण हुआ था। (प्रिय दुश्मनों की खोज –पृष्ठ 22)।
 तमस में दुश्मनों की खोज की गई है। हिंदूवादी ताकतें अपने मुससमान को प्रिय दुश्मन मानती हैं और मुस्मिल लीग वाले हिंदुओं को। बिना इस बात का अहसास किए कि वे सदियों से एक साथ रह रही हैं वे एक दूसरे को अपना दुश्मन मानती है और एक दूसरे को नष्ट करने के लिए गोला बारूद इकट्ठा करती हैं और एक दूसरे की हत्याएं भी करती हैं। रणबीर नाम के एक युवक के कहने पर इंद्र नाम का नौजवान एक मुसलमान इत्रफरोश की हत्या करता है, यह जानते हुए कि वो (यानी इत्रफरोश) एक बूढ़ा है और सांप्रदायिक तनाव के माहौल में अपने घर से इसलिए निकला है चंद पैसे कमा सके। रणबीर या इंद्र कोई कट्टर हिंदुवादी भी नहीं है। वे अंदर के कुछ कुछ डरपोक भी हैं। लेकिन वे उस कट्टर उन्माद के दबाव में हैं जो दुश्मन की खोज करती है ताकि अपने को, अपनी पहचान को जबरिया दूसरे पर थोप सके।
   `तमस में अंधेरा नहीं उजाला भी है। लेकिन बहुत कम। उजाला हम तहां देखते हैं जब वृद्ध हरनाम सिंह अपनी पत्नी के साथ डर की वजह से अपने घर से भागता है और पनाह लेता है एक मुसलमान के यहां। जो औरत उसे पनाह देती है उसे नहीं मालूम को उसका पति और उसका बेटा हरनाम सिंह के घर से लूटपाट करके ही वापस लौंटेंगे। ये उपन्यास का बेहद मार्मिक दृश्य है जिसमें मुसलमान औरत राजो पहले  हरनाम सिंह को पनाह देती है और फिर अपने पति की नाराजगी की आशंका से उससे कहती है कि बाहर जाओ। पर फिर उसे जाने से रोकती भी है। जब राजो का बेटा वापस लौटकर हरनाम सिंह को मारना चाहता है तो भीतर से कमजोर पड़ जाता है और अपना  इरादा बदल  देता है । और जब आधी रात को राजो हरनाम सिंह और उसकी पत्नी राजो के घर से विदा लेते हैं तो वो (यानी राजो) सरदार जी को गहने की वो पोटली भी सौंपती है जिसे उसका पति और बेटा लूटपाट के बाद लाए थे।

पर ये उजाला बहुत मद्धिम है और अंधेरा घना होता जा रहा है। पहचान की राजनीति और पहचान के नाम पर हत्याएं जारी हैं। इस संदर्भ में सांप्रदायिकता एक अपर्याप्त अवधारणा है। भीष्म जी का लेखन हमें इस अहसास की तऱफ ले जाता है कि मनुष्यता की आत्मा को ही लहूलूहान किया जा रहा है। पहचान की राजनीति करनेवाले और उपनिवेशवादी ताकतें (आज के संदर्भ में हम जिनको नवसाम्राज्यवादी ताकतें कह सकते हैं) इस दुरभिसंधि में शामिल हैं और हमें किसी `दूसरे के नहीं बल्कि खुद के खिलाफ खड़ा कर रही हैं। क्या `दूसरे को  नेस्तनाबूद करने की आकांक्षा हमें अंदर से विकृत नहीं कर देती?   आखिर कौन सी वजह है कि `अमृतसार आ गया है कहानी में  बाबू नाम का एक चरित्र ट्रेन पर चढ़ रहे एक मुसलमान वृद्ध की  हत्या कर देता है? क्या इसका सिर्फ फौरी कारण था या उसके भीतर कोई घृणा लगातार संगठित हो रही थी और इसका कोई वैचारिक आधार था? क्या इस घृणा की वजह सिर्फ सांप्रदायिकता है या हमें, यानी हम सबको और मात्र हिंदु या मुसलमान को ही नहीं, अपने भीतर जाकर ये देखना होगा कि कहीं  हम जिसे दुश्मन मान कर हत्या कर रहे हैं वो हम खुद तो नहीं हैं। अर्थात कहीं  हम खुद का शिकार तो नहीं कर रहे हैं?  `अमृतसर आ गया हैकहानी में वृद्ध की करनेवाले बाबू की मुस्कान  अंत में वीभत्स क्यों हो जाती है?

साभार-साहित्य अकादमी 

(लेखक, समीक्षक और स्तंभकार रवीन्द्र त्रिपाठी द्वारा भीष्म साहनी की जन्म शतवार्षिकी पर साहित्य अकादमी में पढ़ा गया लेख।)



Tuesday, May 28, 2013


गांधी को माओ की बंदूक न थमाओ
सुकमा जिले की घटना ने सलवा जुडूम के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को धो कर रख दिया है, जो उसने मानवाधिकार, राज्य के कर्त्तव्य और आदिवासियों के हक के नाम पर दिया था। आखिर जो लड़ाई आदिवासी और परोक्ष तौर पर माओवादी जीत चुके थे, उसका जश्न महेंद्र कर्मा को मारकर मनाने की क्या जरूरत थी? छत्तीसगढ़ की माओवादी हिंसा न सिर्फ निंदनीय है बल्कि क्रांति के शास्त्रीय सिद्धांतों से विचलन भी है। पं. सुदंरलाल कहते थे कि अगर माओ के हाथ में गांधी की लाठी थमा दें तो वे गांधी लगेंगे और गांधी के हाथ में बंदूक थमा दो तो वे माओ लगेंगे। जरूरत गांधी के हाथ में लाठी की ही है और हो सके तो माओ के हाथ में भी लाठी थमायी जानी चाहिए
छत्तीसगढ़ में माओवादियों ने महेंद्र कर्मा को जिस तरह से मारा, उससे जाहिर होता है कि समाज में बदलाव और विजय उनका लक्ष्य नहीं है बल्कि हिंसा, प्रतिहिंसा और बदला लेने का रोमांच ही उनका असल मकसद है क्योंकि वह महज हत्या और वीरोचित हत्या नहीं थी, बल्कि मौत और क्रूरता का तांडव था। अगर यही माओवाद है तो स्पष्ट तौर पर उससे किसी नए राज्य और नए समाज की रचना नहीं होती। महेंद्र कर्मा को मारे जाने के पीछे साफ वजह सलवा जुड़ूम को बताया जा रहा है। सलवा जुड़ूम यानी शांति मार्च के नाम से उन्होंने जो नक्सल विरोधी अभियान शुरू किया था, वह शांति लाने के बजाय आपसी हिंसा का पर्याय बन गया था। वह विफल रहा और निंदनीय भी था पर हमें ध्यान रखना चाहिए कि उसकी सबसे ज्यादा कड़ी और वैधानिक निंदा सुप्रीम कोर्ट ने की। नंदिनी सुंदर बनाम छत्तीसगढ़ के मुकदमे में न्यायालय ने उस अभियान को न सिर्फ मानवाधिकार का उल्लंघन बताया बल्कि राज्य सरकार को उसे तत्काल बंद करने की सख्त हिदायत भी दी थी।
 इसलिए जिन



वजहों से महेंद्र कर्मा को मारा गया, वे वजहें तो समाप्त हो चुकी थीं और अगर माओवादियों और उनके समर्थकों को आदिवासियों के अधिकारों की चिंता है तो उसकी जीत हो चुकी थी। कम से कम उन्हें यह तो मानना ही होगा कि भारतीय राष्ट्र राज्य और उसकी न्यायपालिका में यह संभावना है कि वह न सिर्फ सलवा जुड़ूम जैसे नक्सलवाद विरोधी जन अभियान को सिरे से खारिज करता है बल्कि आदिवासियों के हक को नवउदारवाद के माध्यम से छीने जाने की कड़ी आलोचना भी करता है। यह वही सर्वोच्च न्यायालय है जो विनायक सेन को माओवादियों का जासूस बताकर सजा दिए जाने को भी नकारने का साहस दिखाता है। ध्यान देने की बात है कि सर्वोच्च न्यायालय के सलवा जुड़ूम के फैसले की दक्षिणपंथी नीतिकारों ने यह कहते हुए कड़ी आलोचना की थी कि न्यायपालिका में वामपंथी बौद्धिकों का कब्जा हो गया है और वे संविधान को अपने ढंग से हांकना चाहते हैं। उनका आरोप था कि वे देश के विकास की रफ्तार को रोककर उस पर समाजवाद का भार डाले रहना चाहते हैं। पर सुकमा जिले की दरभा घाटी की घटना ने सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को धो कर रख दिया है जो उसने मानवाधिकार, राज्य के कर्त्तव्य और आदिवासियों के हक के नाम पर दिए थे। आखिर जो लड़ाई आदिवासी और परोक्ष तौर पर माओवादी जीत चुके थे, उसका जश्न महेंद्र कर्मा को मारकर मनाने की क्या जरूरत थी? यह कहीं से भी माओवाद और क्रांति का दशर्न नहीं है बल्कि हिंसा का दशर्न है जिसके आधार पर जो भी राज्य बनेगा, वह हाथ के बदले हाथ और आंख के बदले आंख के दर्शन में यकीन करेगा। इस हिंसा का असर क्या होगा, यह तो आने वाला समय बताएगा लेकिन इस पर क्षणिक तौर पर माओवादी जीत का अहसास करेंगे और आदिवासियों को हिंसा के नए रोमांच में ढालने की कोशिश करेंगे। संभव है, इस हिंसा से उनके शहरी समर्थक भी खुश हों, जिन्हें लगता है कि नवउदारवाद की हारी हुई लड़ाई और भारतीय राज्य की क्रूरता और अंतरराष्ट्रीय पूंजी को चुनौती देने का यही एक रास्ता है। पर यह रास्ता न तो कहीं से पूंजी का खेल रोक पा रहा है न ही आदिवासी समाज के जीवन को अपेक्षित बेहतरी दे पा रहा है। अगर बुर्जुआ राजनीति के चुनावी लोकतंत्र ने महेंद्र कर्मा जैसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता और आदिवासी समाज के एक जुझारू व्यक्ति को उठाकर अपने ही समाज का दुश्मन बना दिया तो माओवादी भी सैकड़ों आदिवासियों को हिंसक और अपराधी बना रहे हैं। उनका संघर्ष और उसके लिए संसाधनों का इंतजाम जिस तरह के स्रेतों पर निर्भर है, वह अवैध कमाई ही होती है।उनके बंद संगठन में स्त्रियों और दलितों के अधिकार कितने सुरक्षित हैं, इस बारे में भीतर से आने वाली तमाम खबरें चौंकाने वाली कहानी कहती हैं। कभी दलित सवर्णों के लिए बंदूक उठाने से मना करते हैं तो कभी स्त्रियां दैहिक शोषश की शिकायत कर विद्रोह करती हैं। भारत का यह माओवाद जहां गांधीवादी संघर्ष की विफलता से पैदा हुआ राजनीतिक प्रतिरोध है, वहीं वह माओ त्से तुंग के दशर्न से भी भटका हुआ है। जीवन के अंतिम दिनों में आलोक प्रकाश पुतुल को दिए एक इंटरव्यू में नक्सलबाड़ी आंदोलन के नायक रहे कानू सान्याल ने कहा था कि दरअसल माओवाद जैसी कोई चीज होती ही नहीं हैं। उनका मानना था कि माओ भी मार्क्‍सवाद और लेनिनवाद को मानते थे। इसलिए जन संघर्ष के इस सिद्धांत को कानू सान्याल मार्क्‍सवाद लेनिनवाद और माओ के विचार की संज्ञा देते थे। उनका कहना था कि भारतीय क्रांतिकारी पूरी दुनिया की क्रांतियों से सबक लेंगे पर भारतीय क्रांति होगी तो भारतीय तरीके से। यह बात लेनिन और माओ ने भी मानी है कि अगर उनके सामने आज की तरह संसदीय संघर्ष और चुनावी लोकतंत्र का रास्ता उपलब्ध होता तो शायद उन्हें इतनी बड़ी हिंसा का सहारा न लेना पड़ता। अमेरिका के अग्रणी मार्क्‍सवादी नेता बॉब अवेकिन माओवादी माने जाते हैं। उन्होंने साफ तौर पर सचेत किया है कि कम्युनिस्टों को अपना मकसद हासिल करने के लिए सच को विकृत नहीं करना चाहिए। क्रांति के बारे में वे साफ तौर पर कहते हैं कि-क्रांति न तो बदला लेने की कार्रवाई है और न ही मौजूदा वर्गीय ढांचे में कुछ स्थितियां बदले जाने की प्रक्रिया है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता की मुक्ति का उपक्रम है। उनकी इसी बात को बहुत पहले भारत के महान क्रांतिकारी शहीदे आजम भगत सिंह ने भी अपने ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ वाले लेख में माना था कि जनता की बड़े परिवर्तन की लड़ाई अहिंसक ही होगी। छत्तीसगढ़ की माओवादी हिंसा न सिर्फ निंदनीय है बल्कि क्रांति के शास्त्रीय सिद्धांतों से विचलन भी है। आज भले ही भारतीय रक्षामंत्री एके एंटनी कह रहे हों कि माओवादियों पर सेना का प्रयोग नहीं होगा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कानून के काम करने की बात कर रहे हैं लेकिन दरभा घाटी की यह हिंसा स्पष्ट तौर पर दो तरह से रास्ते खोलती है। एक रास्ता फिर उन्हीं कांग्रेसियों की वापसी की तरफ जाता है जिनकी नीतियों ने आदिवासियों को असुरक्षा और अस्तित्व के संकट में डाल रखा है। दूसरी तरफ यह हमला नरेंद्र मोदी जैसे दक्षिणपंथियों के आगमन का मार्ग प्रशस्त करता है और हमारा कॉरपोरेट वर्ग उसी के लिए लालायित है। इस मार्ग से निकलने का तीसरा विकल्प है गांधीवादी तरीके से शोषणविहीन और समतामूलक समाज की तलाश। भारत गांधी का देश है, माओ का नहीं। पंडित सुदंरलाल कहते थे कि अगर माओ के हाथ में गांधी की लाठी थमा दें तो वे गांधी लगेंगे और अगर गांधी के हाथ में बंदूक थमा दो तो वे माओ लगेंगे। जरूरत गांधी के हाथ में लाठी ही रखने की है और हो सके तो माओ के भी हाथ में लाठी ही थमायी जानी चाहिए।


अरुण त्रिपाठी

Monday, April 15, 2013

दिल्ली वालों के दिलों में बसे प्राण



कौन जाए जौक दिल्ली की गलियां छोड़ कर।
दिल्ली के मशहूर शायर जौक ने कभी ये बातें दिल्ली के बारे में कही थीं, लेकिन पुरानी दिल्ली की गलियों से निकलने वाले बहुत से कलाकार कभी यहां लौटकर नहीं आए। बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता प्राण भी उनमें से एक हैं। पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान में कभी वह भी रहते थे। प्राण किशन सिकंद का जन्म 12 फरवरी, 1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान में ही हुआ था। इनके पिता केवल किशन सिकंद सिविल इंजीनियर थे। यह जानकारी होने पर बल्लीमारान के लोगों को फक्र होता है, लेकिन प्राण के बल्लीमारान में बिताए हुए दिन या उनके परिवार के बारे में उन्हें खास जानकारी नहीं है। बल्लीमारान के ही रहने वाले और फिल्म जगत में अपनी किस्मत आजमा चुके शमीम अहमद बताते हैं कि प्राण को दादा साहेब फाल्के अवार्ड मिलने से उन्हें खुशी है। हालांकि यहां के अधिकतर लोगों को यह नहीं पता कि प्राण बल्लीमारान में पैदा हुए थे। उन्होंने बताया कि प्राण बल्लीमारान के चरखावालान में रहते थे।
प्राण ने कनॉट प्लेस के एल दास एंड कंपनी फोटोग्राफर्स, जो वर्तमान में बस दास स्टूडियो है, से अपना करियर शुरू किया था। तब उनका नाम प्राण किशन सिकंद ही था। कनॉट प्लेस के एफ ब्लॉक की 12 नंबर की दुकान समय के साथ बदल गई है, लेकिन दुकान के वर्तमान मालिक किशन दास के दिलों में प्राण के लिए बेहद मोहब्बत है। 69 वर्षीय किशन दास बताते हैं कि प्राण ने यहीं से अपना करियर शुरू किया था ऐसी बात उनकी मां बताती हैं और प्राण ने उनकी फोटो भी खींची थी। पिता लच्छमन दास ने जब 1937 में पार्टनर हसनंद के साथ दुकान खोली, तो इसकी चार शाखाएं थीं लाहौर, शिमला, मसूरी और दिल्ली। प्राण बाद में लाहौर चले गए थे। उनकी दिली इच्छा प्राण से मिलने की है, वह अपने व्यापारिक काम से कई बार मुंबई गए, लेकिन प्राण से नहीं मिल पाने का उन्हे मलाल है। किशन दास ने बताया कि यदि प्राण साहब तीन मई को दादा साहब फाल्के अवार्ड लेने आते हैं तो उनसे जरूर मिलेंगे। यदि स्वास्थ्य खराब होने के कारण नहीं आते हैं तो मुंबई में जाकर उनसे मिलेंगे।
फिल्म पत्रकार और समीक्षक बन्नी रूबेन की पुस्तक '.. एंड प्राण ए बायोग्राफी' में प्राण ने बताया है कि उन्होंने पहली पंजाबी फिल्म 'यमला जट' पाकिस्तान में ही की थी। उसके बाद उन्होंने वहां कई फिल्में कीं।
दिल्ली के पुराने सिनेमा हॉल डिलाइट के अध्यक्ष शशांक रायजादा पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि प्राण साहब उनके यहां मनोज कुमार के साथ 'पूरब-पश्चिम' फिल्म के रिलीज के वक्त आए थे और लगभग ढाई घटे रहे उनके सरल स्वभाव और दमदार अभिनय के लोग कायल हैं।

Sunday, March 3, 2013

यादें याद आती हैं...



महानगर की इस भाग दौड़ में कभी-कभी लगता है कि क्या सचमुच किसी को भूला जा सकता है? क्या यादों के लिए जगह सिमटने लगी है? क्या कि सी के न रहने की जो रिक्तता है वह किसी और से भरी जा सकती है? लेकिन नहीं जब बात किसी प्रिय की हो तो अपनी या पराई लाख व्यस्ततों के बीच उसकी सुखद-दुखद यादें स्मृतियों में कौंध जाती हैं।
मुझे याद आ रही हैं कि आज ही के दिन दो साल पहले छूटे उस भाई, गुरु और सखा की, जिसके निधन की खबर सुनकर फौरन निगम बोध घाट पर जैसे-तैसे भागा था। मेरे शुभचिंतक पूजा सिंह और रंजेश शाही ने मुझे रात एक बजे से कई बार फोन किया, लेकिन मैं सो रहा था और जब फोन पर उनका मैसेज देखा तो थोड़ी देर के सन्न रह गया। तबीयत तो ज्यादा खराब थी, लेकिन इतनी जल्दी साथ छोड़ देंगे ऐसा नहीं सोचा था। मैं गोरखपुर के चर्चित पत्रकार रोहित पांडेय की बात कर रहा हूं। आज उनकी दूसरी पुण्यतिथि है।
दरअसल दो दिन पहले पूजा को फोन किया था और उससे पूछा कि रोहित भाई की पुण्यतिथि पर कुछ करने की सोच रहा हूं। उसने अपनी तरफ से समर्थन की हामी भर  दी। लेकिन अंत तक मैं असमंजस में रहा कि क्या करूं। मुझे रंजेश की बात याद आई जो उसने निगम बोध घाट पर कही थी। उसने कहा था, ‘‘अभिनव, रोहित सर हम सबके बीच एक पुल की तरह थे। वैसे तो हम दिल्ली में रहते हैं, लेकिन उनके बहाने सबसे मुलाकात हो जाती है।’’ एक बार सोचा कि क्यों न फिर हम सब मिलें और कुछ यादों को साझा करें। बहरहाल, सभी  की अपनी व्यस्तता और शायद मेरा निकम्मापन भी, मैंने किसी को कुछ नहीं कहा.
रोहित भाई ने बहुत कम समय में जिंदगी के कई उतार-चढ़ाव देखे। कभी-कभी लगता है कि गोरखपुर को उन्होंने ‘ठीक से’ समझा और शायद गोरखपुर ने उन्हें भी ‘ठीक से’ ही समझा। मृत्यु के बाद हमारे यहां ‘महान’ बना देने की परंपरा है, लेकिन मैं बिना किसी लाग-लपेट के कहूंगा कि जितना मैं जान पाया कि रोहित भाई महान की श्रेणी में नहीं थे और उनको इसकी कभी  लालसा भी  नहीं थी। जिसकी लालसा थी वह अधूरी ही रही। कुछ संयोग ऐसा रहा कि उनकी मृत्यु के दो साल पहले से उनका दिल्ली आना-जाना लगा रहा और इस बीच हम सबसे मिलना-जुलना भी। हम ठीक से उन्हें इसी बीच जान पाए। कभी  खुद फोन कर बुलाते तो कभी  हम बिना बताए पहुंच जाते। केवल मैं नहीं, पूजा तो उनकी पड़ोसन थी और रंजेश भी  प्राय: आता था। यह रोहित भाई का स्नेह ही था कि हम उनके सामने बैठकर घंटों किसी भी मुद्दे पर बिना उनकी सहमति-असहमति के बात कर सकते थे। वह बिना किसी का पक्ष लिए अपनी बात रखते। कई बार ऐसा हुआ कि मेरी और पूजा की तीखी बहस उनके सामने हुई, लेकिन बिना किसी निष्कर्ष के खत्म भी हो गई। तब तुरंत भाई की कोई अपनी राय नहीं होती थी। किसी को बढ़ावा न किसी की खिंचाई। एक संतुलित दर्शक और रह-रह कर दोनों की तरफ से हामी। दरअसल मैं, पूजा और रंजेश उनके शिष्य हैं। वह पूजा के सच्चे अर्थों में मित्र थे। और, सच कहूं तो थोड़ी देर बाद भाई के साथ रहने पर कोई भी  उनसे खुल सकता था और उससे वह उसके ‘जियरा’ का हाल-चाल पूछ सकते थे।
बेबाकी ऐसी की नापसंदगी पर गाली भी  फरार्टेदार और फिर चाय की दावत भी। उनके पढ़ाए गए लगभग सभी छात्रों को ‘भौजी’ की चाय याद है। ऐसा नहीं है कि गोरखपुर के सभी पत्रकार उनके शुभचिंतक ही थे या वह सब पर जान लुटाते थे। कुछ ऐसे लोग भी मिले जो उन्हें पीठ पीछे कुछ भी कहने से नहीं चूकते थे। वजह, विश्वविद्यालय से लेकर प्रेस क्लब की राजनीति में उनका हस्तक्षेप या वैचारिक मतभेद।
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि कुछ मामलों में मैं उनका धुर विरोधी था। हमारा टकराव विचारधारा को लेकर था। अंतिम समय में उन्हें और करीब से जानने का मौका मिला। वह पूरी तरह से संघी थे और खुलकर कहते भी थे, जबकि मेरा झुकाव वाम की तरफ था (है)। वह कम्युनिज्म को अन्य संघियों की तरह आयातित विचारधारा मानते थे और मेरा मानना था कि विचारधारा कहीं की हो, यह कितनी सार्थक है, यह समझने की जरूरत है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अधिकतर लोगों की सोच अभी धर्मनिरपेक्ष नहीं है। दुनिया के नए विचारों और नई अवधारणाओं को कभी जानने, समझने की कोशिश वहां पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रबुद्ध वर्ग कभी  नहीं करता है (मैं प्रबुद्ध नहीं हूं, लेकिन  मैं भी  नहीं कर पाया)। लेकिन जब आप गोरखपुर या ऐसे किसी शहर से बाहर जाएंगे तब आपको केवल भारत नहीं, बल्कि विश्व की गतिविधियों के बारे में जानने, सोचने, समझने की जरूरत पड़ेगी। मेरे अभी  कई मित्र और विश्वविद्यालय के जानने वाले शिक्षक हैं, जो कम्प्यूटर का प्रयोग नहीं करते, ब्लाग, मेल या ई पेपर उन्हें नहीं पता। दुर्भाग्यवश उन्होंने कभी जानने की कोशिश भी  नहीं की। बहरहाल, विचारधारा के निर्माण में तकनीक का प्रयोग भी प्रभावी रूप से उभरा है।

रोहित भाई मेरी भी जबरदस्त आलोचना करते थे, पीठ पीछे नहीं, मुंह पर, सरेआम (यही उनकी खासियत थी)।लेकिन कई बार यदि उनकी शर्ट की तारीफ करता था तो बस मुस्कुराते हुए ये कहकर चुप कि अरे ज्यादा नहीं, बस 25 रुपये मीटर के कपड़े की है। मतलब आलोचना अपनी जगह और सम्बन्ध अपनी जगह. पैसा उनके लिए कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा। ऐसे कई पत्रकार हैं जो खबर बेचकर मालामाल हैं, लेकिन वह अपना खर्च कर पत्रकारिता करते थे। उनका साफ कहना था, ‘‘सभी संपादकों से तुम्हारे अच्छे संबंध हो सकते हैं, बस उनसे नौकरी मत मांगो।’’

एक वाकया याद आता है। अंतिम दिनों में निराश हो गए थे और एक दिन कहा, ‘‘बाबू ऐसा लगता है कि अब बचना मुश्किल है।’’ मैंने कहा, ‘‘जो आप किसी के हाथ में नहीं है उसकी चिंता छोड़िये, कल आबिदा परवीन (पाकिस्तान की मशहूर सूफी गायिका) को सुनने चलते हैं, सूफी गाएंगी तन-मन एक हो जाएगा।’’ भइया उत्साह से चलने के लिए तैयार हो गए। मेरी छुट्टी थी, हम पहले पहुंच गए। आबिदा का गाना शुरू होने में देर थी। लम्बी बातचीत हुई। अचानक उनका मन तीन-चार गानों के बाद बेचैन हो गया।  ऐसा लगा कि वह कुछ सोच रहे हैं। घबराए से बोले, ‘‘चलो अब चला जाए। मन नहीं लग रहा है।’’ आत्मा और परमात्मा, दोनों मे रोहित भाई का दृढ़ विश्वास था और आबिदा का सूफियाना कलाम रूह तक जाता था। वह अभी रूह से कोई संवाद नहीं करना चाहते थे।  हम लौट आए।
भाई ने तीन दिन तक कोई बात नहीं की। एक दिन रात को तीन बजे उन्होंने एक कविता एसएमएस की। मैंने तुरंत उत्तर दिया, ‘अच्छी है।’ लेकिन उनकी कविता में निराशा साफ झलक रही थी। मैंने उसे नोट क्र लिया अभी बहुत खोजने के बाद भी  वह कविता नहीं मिली, फिर कभी साझा करूंगा।
कभी-कभी  मुझे लगता कि क्या उन्होंने जीने की आस सचमुच छोड़ दी थी? लेकिन अगले ही पल मुझे उनकी मूलचंद अस्पताल की हालत याद आती है। उनके बड़े भाई  ने मुझे फोन किया, ‘‘रोहित मूलचंद अस्पताल में भर्ती हैं तुम आ जाओ।’’ मैं कुवैत एम्बेसी में एक प्रेस कांफ्रेंस में था। भागा-भागा गया उनकी वह स्थिति देखी, जिसकी कल्पना नहीं कर सकता था। वह छटपटा रहे थे, बेचैन थे। ये बेचैनी दर्द की थी, जीजीविषा की थी। वहां से उन्हें फिर एम्स ले जाया गया, लेकिन वहां भी बेड की दिक्कत आ रही थी। डॉक्टर का साफ कहना था कि अब घर ले जाओ। लेकिन उनकी वह स्थिति देखकर रूह कांप गई। जब दर्द होता था तो किसी की नहीं सुनते थे। मुझसे वह स्थिति देखी नहीं जा रही थी और मैं कुछ देर रुकने के बाद चला गया।
उन्हें अभी  बहुत कुछ करना था। बहुत कुछ लिखना था, कई अधूरे ख्वाब पूरे करने थे। आखिर बच्चों के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया था, थिसिस भी  अधूरी थी। दिल्ली में पत्रकारिता का सपना बस सपना रह गया। यह भी अजीब विडंबना है कि उनके पढ़ाए हुए लोग आज अखबारों और चैनलों में विभिन्न पदों पर हैं, लेकिन उन्हें कभी किसी भी अखबार ने बतौर रिपोर्टर नौकरी नहीं दी और न इतना पैसा कि वह अपने बाद अपने परिवार के बारे में सोच सकें । जब बात स्थाई करने की आई तो ऐसी स्थिति नहीं रही। लेकिन गोरखपुर के पत्रकारों का उनके प्रति स्नेह ही था कि उन लोगों ने उनकी हर तरह से मदद की।
रोहित भाई भी  अपने शिष्यों, मित्रों और जानने वालों के लिए हमेशा खड़े रहे। अंतिम समय तक लाभ लेने वालों ने उन्हें नहीं छोड़ा। डॉक्टर के लाख मना करने के बावजूद वह उनसे बात करने वालों के फोन सुनते थे। लेकिन कभी अपने लिए किसी से कुछ नहीं कहा।
प्रभाष जोशी सहित कई ऐसे पत्रकारों,साहित्यकारों से उनका गहरा लगाव था। प्रभाष जी के निधन की खबर उन्होंने सुबह मुझे फोन पर दी थी और खराब सेहत के बावजूद उनके घर गए थे। अभी पिछले साल जब काशीनाथ सिंह को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था तो मैं उनका इंटरव्यू करने गया था। जब मैंने उनसे उनकी रचना ‘रेहन पर रग्घू’ को लेकर बात की तो उन्होंने रोहित पांडेय का नाम लिया। उनका कहना था, ‘‘इस पुस्तक के परिप्रेक्ष्य में रोहित ने मेरा पहला इंटरव्यू लिया था।’’
मेरे लिए इन सब बातों को याद करना एक बार फिर उस पीड़ा से गुजरना है। बहुत कुछ है और बहुत यादें हैं, लेकिन कुछ ऐसा भी है जिसका अपराधबोध होता है, जैसे- अब हम दिल्ली में रहने वाले दोस्त आपस में नहीं मिल पाते। दिल्ली में उनके भाई के घर मार्च 2011 के बाद फिर मैं जाने की हिम्मत नही जुटा पाया। मैं एक बार भी  उनकी पत्नी और बच्चों का हाल-चाल नहीं ले पाया।
ऐसा लगता है कि हम सचमुच कंक्रीट के जंगल में संवेदनाओं को खोते जा रहे हैं। हम मशीन हो रहे हैं, जो जड़ है जिसके चलने की ध्वनि तो है, लेकिन गति नहीं है। और इसके जिम्मेदार हम खुद हैं। अब कोई ऐसा नहीं है हमारे बीच  जो फकीरी का मतलब समझाए, बताए, बुलाए और लड़ने का जज्बा पैदा करे। आज मेरे जैसे पत्रकारिता में ही नहीं बहुत से  क्षेत्रों में उनके जानने वाले लोग हैं जो उनके आत्मीय हैं जिनके पास काफी कुछ हैं उनके बारे में कहने के लिए, गिले-शिकवे भी होंगे तो स्नेह भी होगा। मेरे पास भी है बहुत कुछ लेकिन कुछ साझा कर रहा हूँ।
उनकी कमी, उनका स्नेह, उनसे मतभेद, सबका अपना स्थान है। और इसके साथ ही मैं उनको अपनी श्रद्धांजलि देता हूँ।  रोहित भाई, आपकी मौजूदगी की यादें आज आपकी गैर मौजूदगी में भी हमें रास्ता दिखाती हैं और सदा दिखाती रहेंगी।

नमन! 

Wednesday, February 20, 2013

समझ और दृष्टिकोण


सीएसडीएस के फैलो डॉक्टर हिलाल अहमद से अभिव्यक्ति की आज़ादी और उसके आयाम से सम्बन्धित मेरी बातचीत पर आधारित एक लेख आज राष्ट्रीय सहारा अख़बार के हस्तक्षेप में 'समझ और दृष्टिकोण' शीर्षक के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित है . पढ़े आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है. 


अपने देश में अभिव्यक्ति की आजादी के दो पक्ष हैं। एक पक्ष अभिव्यक्ति की आजादी को कानूनसम्मत और उदारवादी सिद्धांतों पर आधारित बताता है। उस पर कोई अंकुश नहीं लगाया जा सकता। इसके विपरीत, दूसरे पक्ष का कहना है कि धर्म-संस्कृति आस्था के संवेदनशील मसले हैं। इनके विरुद्ध जाने से किसी भावनाएं आहत हो सकती हैं। इसलिए अभिव्यक्ति की आजादी आस्था से बढ़कर नहीं हो सकती। तो ये दो पक्ष हैं। उदारवादी दर्शन के दो प्रकार हैंनका रात्मक और सकारात्मक। नकारात्मक उदारवाद व्यक्ति को ही मूल मानते हुए उस पर किसी अंकुश का विरोध करता है। वहीं, सकारात्मक उदारवाद के नजरिये से व्यक्ति समाज के साथ रहता है। इसलिए उसकी बंदिश और आजादी समाज से अलग नहीं हैं। व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता तभी संभव है, जब वह उस समाज में रहे। टीएच ग्रीन, हेराल्ड जे लॉस्की जैसे ख्यातिनाम दार्शनिक इसी दूसरे सकारात्मक दृष्टिकोण के हैं। वे मानते हैं कि व्यक्ति समाज में फलता-फूलता है और उसके आदर्श इसी सामाजिक संदभरे में ही फलीभूत होते हैं। इसीलिए एक पूरी पण्राली जिसे संविधानवाद कहा जाता है; वह व्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा कुछ नियमों से तय कर देता है। चूंकि संविधान लचीला होता है और इसके निर्माता समय और जरूरतों के हिसाब से इसे बदलते रहते हैं। इसलिए व्यक्तियों और समाजों के बीच की एक गतिशीलता बनी रहती है। इस संदर्भ में, भारत में जब भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात की गई है, वह हमेशा सामाजिक संदभरे में की गई है। वह ‘एब्सल्यूट’ नहीं है। इस तरह से हम देखें तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बात करना अपराध हो जाएगा, जो गलत होगा। उदारवाद में ही यह बात मौजूद है कि जो एब्सल्यूट है, उसके ऊपर संविधान की व्यवस्था है। यह पहला सिद्धांत है। दूसरे, कठमुल्ला और पोंगा पंडित हैं, जिनका मानना है कि व्यक्ति नहीं, समाज सवरेपरि होता है। इस तर्क से मेरे इत्तेफाक न रखने की दो वजहें हैं। पहली, तो यह कि जिस इस्लाम, हिन्दुत्व या ईसाइयत को हम जानते हैं, वह अपने आप में एक आधुनिक रूप लिए हुए है और इसका आधुनिक रूप, जिसे हम मानते हैं, उसका मतलब एक रचा-बसा, लिखित, संविधान- सम्मत रीति-पण्राली है। यह स्वरूप आधुनिकता ने दिया है। मध्यकाल में धर्म के मामले में बहुत खुलापन है। वहां आज के जैसे धर्मातरण के झगड़े ऐसे नहीं दिखते। दरअसल, जिस धर्म को हम आज जानते हैं, वह 19वीं सदी की देन है। आधुनिकता भी उसी सदी की देन है। इससे पहले धर्म और आधुनिकता पर बहसें नहीं मिलतीं। कबीर की साखी समाज और धर्म के आंतरिक रिश्तों को लेकर है। कहने का मतलब यह कि 19वीं सदी में धर्म को जो लिखित शक्ल दिया गया, वह अलिखित रूप में पहले से मौजूद था। बहरहाल, 19वीं सदी में जो धर्म बना, उसमें धर्म का एक ऐसा स्वरूप निकल कर आया जो सीमाओं से बंधा था। इससे ही धार्मिंक आस्थाएं तय होने लगीं। आज जिन आस्थाओं का हवाला दिया जाता है, वे तमाम आधुनिक आस्थाएं हैं। इसीलिए उन पर कंफ्लिक्ट है। धर्म संरचना में एकरूपता लाने की प्रक्रिया आधुनिक प्रक्रिया है जो ब्रिटिश शासनकाल में शुरू हुई। तब यहां सभी धर्मो में सुधार आंदोलन हुए। इसे आज की ईसाइयत के रूप में व्यवस्थित तरीके से लाया गया। इसमें ही यह तय हुआ कि ये मानेंगे, वो नहीं मानेंगे। जैसे इस्लाम में चित्र पर बनाने पर पाबंदी लगी। हालांकि ईरान में ऐसे बेशुमार लोग थे, जो चित्र बनाते थे। हिंदू धर्म में गाय नहीं खाई जाती लेकिन ऐसे बहुत-से कबीले हैं, जो अपने हिंदू मानते हैं और गाय खाते हैं। इस तरह सभी धर्मो में यह तय हुआ कि किसकी अनुमति है और किसकी अनुमति नहीं है। अब सवाल है कि इनके मूल्य क्या हैं, जिनका धर्म संकट में आ जाता है। जिस तरह उदारवादी बिना लिब्रलिज्म को समझे कह देते हैं कि ‘एब्सल्यूट लिबर्टी’ होनी चाहिए। लेकिन यह एब्सल्यूट शब्द उदारवाद की तरफ नहीं निरंकुशता की तरफ जाता है। पूरे यूरोप में, अमेरिका में, थॉमस पेन से लेकर हेराल्ड लॉस्की और आज भी, इस पर र्चचा है कि सीमा थोपी नहीं जा सकती। यह उपजी होती है। वह वहां गलत हैं और जहां-जिनका धर्म संकट में आ जाता है। जैसे एमएफ हुसैन का हिंदू देवी-देवताओं का अर्धनग्न चित्र बनाना। इसके चलते धर्म संकट आने का मतलब है कि उनकी नजर के अलावा और किसी नजरिये से भगवान- पैगम्बर को देखने की कोशिश हुई तो उनकी भावनाओं के विपरीत होगी, चोट पहुंचाएगी। जो ऐसा करेगा वह दंड का भागी होगा। ये बात हिंदू और इस्लाम दोनों धर्मो के खिलाफ चली जाती है। कुरान में ऐसी कई आयतें हैं, जो कहती हैं कि ‘बख्श दो यदि बुरा करे कोई’। शरीयतें इसी तरह बनी हैं, जब सवाल उठने लगे तो इस्लाम में उन्हें नये तरीके से परिभाषित किया गया। फिर नया इस्लाम आया, नए कानून बनें। तो यह बहस है। मेरा कहना है कि अपना संशिलष्ट समाज है। अगर आप असहमत हैं फिर भी बात करना न छोड़ें। अगर आप बात नहीं करेंगे तो अभिव्यक्ति सीमित होकर रह जाएगी। अभिव्यक्ति न तो पूर्ण है, न मिश्रित।

यह आम बहस की बात है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा होनी चाहिए कि नहीं? इस पर आम बहस होनी चाहिए। अब प्रगाश ग्रुप की बात करें तो मुफ्ती साहब ने एक बयान जारी कर कहा कि यह फतवा नहीं था। उनका कहना था कि औरतों को गाना नहीं गाना चाहिए और इस्लाम में संगीत मना है। ये दोनों बातें इस्लाम के दृष्टिकोण से गलत हैं। इस्लाम में संगीत की एक लम्बी परंपरा है। बहुत-सी कश्मीरी औरतें गणतंत्र दिवस की परेड में अपने पारंपरिक गीत- संगीत का प्रदर्शन करती हैं। मतलब यह कि एतराज इस्लामिक दृष्टिकोण से ही यह दुरु स्त नहीं है। कमल हासन की विश्वरूपम का हर जगह अलग-अलग तरीके से विरोध हुआ। इसके पीछे केवल मुस्लिम विरोध ही नहीं था। बहुत-से लोगों ने कहा कि इस फिल्म में विवादित कुछ भी नहीं था। आज मुसलमान तो ऐसा सिंबल है कि उसे यदि उछाल दो तो उसे अंतरराष्ट्रीय पब्लिसिटी मिल जाती है। आज दुनिया बनाम इस्लाम का विमर्श है। ऐसे में प्रचार आसान है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में हमें दो-तीन मुद्दों पर बात करनी पड़ेगी, एक बात लीगल फेमवर्क की है। इसका मतलब यह नहीं है कि इसको बैन कर दो या उठा लो। इसके तीन स्तर हैं। पहला स्तर संविधान का है। इसका मतलब है कि यह हमारा बेसिक ढांचा है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में इसको देखिए। फिर हमारे पास व्यवस्थित कानून हैं; जैसे इंडियन पीनल कोड, सेंसर बोर्ड आदि। ये मुद्दे पर बने कानून हैं। तीसरा, इन पर अमल करने/कराने वाली संस्थाएं हैं। इसके आगे मसले पर व्यापक परिर्चचा होनी चाहिए। इसके तीन रूप हैं-व्यापक जन संवाद, मीडिया और पॉलिसी। सरकार को एक पॉलिसी फ्रेमवर्क बनाना चाहिए जिसमें मीडिया सहित दूसरे लोगों को जोड़ा जाए। सरकार और राजनीति को इससे अलग नहीं रख सकते। हम कम राजनीतिक हैं, तभी यह विवाद है। लिहाजा, हमें ज्यादा राजनीतिक होना पड़ेगा। जब एक व्यापक प्रक्रिया शुरू हो जो मूलभूत सवालों को उठाए और इसके तीन तरीके मैंने बताए हैं। पहला, कानून जिसमें तीन स्तर हैं-संविधान, दूसरे कानून और पॉलिसी। दूसरा स्तर है, संस्थाओं का प्रतिनिधित्व। और आखिर है, लोगों के विचारों को बांटने का। हमें और लोकतांत्रिक और ज्यादा राजनीतिक होना पड़ेगा। अभी हम थोड़ी-सी राजनीति और थोड़ी-सी नीति लेकर चल रहे हैं, ऐसा आगे ठीक नहीं होगा।

अभिनव उपाध्याय की बातचीत पर आधारित

Friday, November 16, 2012

उन स्त्रियों से शिकायत है- चित्रा मुद्गल





 जब हम स्त्री विमर्श की बात करते हैं तो यह संतुलित विमर्श होना चाहिए न कि घृणा के उबाल के साथ। मेरा यह मानना है कि अब संतुलित विमर्श का समय है; क्योंकि स्त्री के उत्थान में पुरुषों का योगदान भी कम नहीं है। पहले ऐसा मानकर चला जा रहा था कि स्त्री को जीवन जीने का अधिकार नहीं है। उन्हें पशुओं की तरह समझा गया। लेकिन इस तरह के सच के पीछे संतुलन का अभाव है। मानवीय सत्ता बराबर है और मेरा मानना है कि इसमें बराबर की साझेदारी होनी चाहिए। चाहे वह संबंध, पति-पत्नी का हो, बाप-बेटी का हो या भाई-बहन का। लेकिन पुरातन समय से जब हम पितृसत्ता की बात करते हैं तो पुरुषों को बलशाली माना गया है। स्त्री को हमेशा कोमलांगी, भ्रूण धारण करने वाली, बच्चे पैदा करने वाली, जननी, विरासत को आगे बढ़ाने वाली ही माना गया है। तब ऐसा था कि पुरुष किसी विशेष स्त्री का पुरुष नहीं होता था। जब संबंधों में समरसता बढ़ी तो वह स्त्री से ईमानदारी की अपेक्षा करने लगा। स्वयं को स्वामी समझने लगा। पितृसत्ता का अर्थ हो गया कि काम के बंटवारे में संतुलन का अभाव। धीरे-धीरे ये संबंध समाज में शोषित-शोषक संबंध को जन्म देता चला गया।
 एक ऐसा भी समय आया जब माना गया कि स्त्री को जीने का अधिकार नहीं है। पितृसत्तात्मक समाज के बदले सोच से मिला स्पेस धर्म भी स्त्री को विशेष रूप से देखते हैं। धर्म स्त्री के जीवन मूल्यों में उदात्तता चाहते हैं। धर्म जब आम स्त्री के सामने आता है। प्राय: यही बताता है कि उसे क्या करना है?लेकिन 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इन स्थितियों का विरोध हुआ और यह विरोध पितृसत्ता की तरफ से ही हुआ। राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद विद्यासागर स्त्री की हिमायत में आगे आए। उनके प्रयासों से स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण में अवश्य ही बदलाव आया यद्यपि पितृसत्ता की जड़ें फिर भी गहरी रहीं। हालांकि मेरा मानना है कि 15 प्रतिशत पितृसत्तात्मक समाज यह मानता है कि स्त्री-पुरुष बराबर हैं। यह वर्ग अपनी बेटी और बेटा की पढ़ाई पर समान खर्च करता है। स्त्री का महत्त्व समाज में और जीवन में समझ रहा है। रोजगार में उसकी भागीदारी को बढ़-चढ़ कर सपोर्ट कर रहा है। यह वर्ग रोजगार के क्षेत्र में चेतना फैलाने के लिए आगे आ रहा है। 
परिवर्तन वैचारिक रूप से चल रहा है। इसी व्यवस्था में अब सबको फायदा मिल रहा है और ऐसे में अवसर मिलने पर रोजगार में स्त्रियों ने यह साबित कर दिया है कि वह किसी पुरुष से दैहिक शक्ति में भले कमजोर हैं लेकिन मानसिक क्षमता,मेधा शक्ति, प्रतिभा शक्ति, निष्ठा शक्ति में वह पुरुषों के बराबर हैं। पितृसत्तात्मक समाज में ही स्त्री मुक्ति और उनके आगे बढ़ने का अवसर आया है। रोजगार में स्त्रियों की भागीदारी को देखकर बिना रोजगार वाली स्त्रियां भी खुश हैं। अब एक साधारण मां भी यह कहती है, ˜मेरी बेटी अध्यापिका बन जाएगी तो उसकी जिंदगी बदल जाएगी। उसे वह दु:ख नहीं झेलने पड़ेंगे जो मुझे झेलने पड़े।’ रोजगार के अवसर मिलने पर स्त्री अब स्वयं को साबित कर रही है। एक संतुलन स्थापित कर रही है। लेकिन विडंबना है कि कार्यस्थल पर पुरुष को प्राय: स्त्री केवल देह के रूप में नजर आती है। उसे उसकी उपस्थिति में कम मेधा के बल पर पाई गई उपलब्धि नजर आती है। फिर भी स्त्री अब देह से ऊपर उठ रही है। वह पुरुषों से बराबरी में कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है। लेकिन अब भी आधे से ज्यादा देश स्त्री का आकलन उसके काम से नहीं बल्कि उसके रूप यौवन से करता है। ऐसे में स्त्रियों के सामने बहुत चुनौतियां हैं। स्त्री विमर्श नहीं लिव-इन-रिले शनशिप मुझे उन स्त्रियों से भी शिकायत है, जो सफलता के लिए मेहनत और मेधा नहीं बल्कि ‘शार्ट कट’ अपनाती हैं। मुझे ऐसे स्त्री विमर्श पर क्रोध आता है। जो अपनी सफलता के लिए अपने सहकर्मी या बॉस के समक्ष बिछ जाती हैं।
 दरअसल, तब आप खिलौना बन जाती हैं। कुछ स्त्रियां कहती हैं कि हम स्वतंत्र हैं। उनका कहना है कि हम चाहे जिसके साथ रह सकते हैं। देह हमारी है और हम अपना संबंध किसी के साथ बनाने के लिए स्वतंत्र हैं। वह लिव- इन-रिलेशनशिप में विश्वास करती हैं। मेरा मानना है कि यह स्त्री विमर्श नहीं है। यह बंधन से मुक्त होना नहीं बल्कि कहीं न कहीं बंधन में रहना है। यह कहीं न कहीं पितृसत्ता के आगे समर्पण है। ऐसे में संतुलन और विवेक बहुत जरूरी है। आर्थिक सत्ता महिलाओं को उद्दाम यौनिकता के शिखर पर ले जा रही है। आप किस रूप में छली जा रही हैं, इसे समझने की जरूरत है। यह सोचना होगा कि यदि परस्त्री गमन किसी स्त्री को पीड़ा दे सकता है तो स्त्री का परपुरुष गमन भी पुरुष के लिए पीड़ादायक हो सकता है। बहरहाल, इन सबके बावजूद स्त्री अपनी अस्मिता की चुनती को स्वीकार कर रही है। ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं; जहां पहले पुरु षों का वर्चस्व था लेकिन अब उस क्षेत्र में स्त्रियां भी काबिज हो रही हैं। स्त्री समाज को रच सकती है, बना सकती है लेकिन यह परिवर्तन घर से शुरू करना होगा। यह समाज यदि बदल सकता है तो स्त्री ही इसे बदल सकती है।



चित्रा जी से अभिनव उपाध्याय की बातचीत

Saturday, August 11, 2012


भटकाव नहीं है यह

अन्ना आंदोलन को एक राजनीतिक विकल्प देने की राह पर आगे बढ़ने की सलाह देने वालों में सर्वप्रमुख प्रो. योगेंद्र यादव से अभिनव उपाध्याय की बातचीत


आप इस पूरे घटनाक्रम को किस तरह से देखते हैं? 

पिछले डेढ़ साल से चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की दिशा और दशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है। मैं समझता हूं कि शुरू से ही इस आंदोलन में तीन धाराएं थीं। पहली धारा राजनीति विरोध और राजनीति मात्र से खड़ा करने की धारा थी। दूसरी धारा कांग्रेस विरोध को तरजीह देने की थी, चाहे उससे भाजपा या अन्य विपक्षी दलों को लाभ हो। तीसरी धारा लोकतांत्रिक राजनीति के भीतर लेकिन स्थापित ढांचे से बाहर थी। पिछले साल भर से समय-समय पर यह तीसरी धारा प्रबल हुई है। इस अनशन को खत्म करते वक्त राजनीतिक विकल्प बनाने की घोषणा इस बुनियादी बदलाव का संकेत देती है। घोषणा भले ही जल्दी में की गई, लेकिन यह प्रक्रिया दीर्घकालिक थी।

क्या यह आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है?

 मैं नहीं समझता कि यह भटकाव है। ऐसा उन लोगों और इस आंदोलन के कार्यकर्ताओं को लग सकता है जो विरोध को एक गैर राजनीतिक काम मानते हैं। मैं मानता हूं कि इस देश में भ्रष्टाचार का विरोध करना अपने आप में राजनीति की शुरु आत करता है। भ्रष्टाचार की जड़ राजनीति में है तो उसका निदान करने की हर कोशिश अंतत: हमें राजनीति की ओर ही ले जाएगी। यूं भी लोकतांत्रिक समाज में किसी भी बुनियादी सार्वजनिक मुद्दे पर आमूल-चूल परिवर्तन की कोशिश लोकतांत्रिक राजनीति से परे रहकर नहीं की जा सकती। चोर दरवाजे से राजनीति करने से बेहतर है कि खुलकर और पूरी जिम्मेदारी से राजनीति की जाए। इस लिहाज से मैं राजनीतिक विकल्प बनाने की इस चेष्टा को आंदोलन का भटकाव नहीं, बल्कि उसकी तार्किक परिणति के रूप में देखता हूं।

कुछ लोग इसकी तुलना जयप्रकाश आंदोलन से कर रहे हैं, क्या आंदोलन उसी तरफ जा रहा है?

 हमें अतिशयोक्तिसे बचना चाहिए। मैंने खुद जयप्रकाश नारायण का आंदोलन नहीं देखा, लेकिन जितना पढ़ा-सुना है, उससे लगता है कि वह आंदोलन ज्यादा व्यापक और गहरा रहा होगा। लेकिन इस आंदोलन का जन-उभार, लोगों की स्वत: स्फूर्त भागीदारी और पूरे सत्ता प्रतिष्ठान को चुनौती देने की जिद, उस आंदोलन की याद जरूर दिलाती है।

जिस राजनीतिक विकल्प की बात की जा रही है, क्या वह कोई लोकतांत्रिक बदलाव ला सकता है? 

संभावना है लेकिन गारंटी नहीं। एक ऐतिहासिक अवसर हमारे सामने है। यदि अन्ना आंदोलन देश भर में चल रहे जनांदोलनों से रिश्ता बनाए और अपने विचार और संगठन को एक बड़े उद्देश्य से जोड़ सके तो यह संभावना बनती है। एक वैकल्पिक किस्म की राजनीति स्थापित हो सकेगी। दूसरी ओर यह खतरा है कि केवल चुनावी राजनीति के फेर में पड़कर आंदोलनकारी भी स्थापित राजनीति का हिस्सा बन जाएंगे।

इसकी आगे की नीति क्या होगी?

 यदि यह आंदोलन संपूर्ण क्रांति के उद्देश्य से बंधा है, जैसा कि अरविंद केजरीवाल ने कहा तो उसे अपनी विचारधारा का पुनर्निर्माण करना होगा। इस आंदोलन की शुरु आत भ्रष्टाचार विरोध के एक सूत्र से हुई। शुरू से ही इसमें देशभक्तिका विचार भी जुड़ा हुआ था। हाल ही में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने इसे ‘स्वराज’ के विचार से भी जोड़ा है। अब चुनौती है कि इन तीन सूत्रों को एक समग्र विचार का स्वरूप दिया जाए। नेताओं और अफसरों के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के साथ भ्रष्टाचार को जन्म देने वाली नीतियों और व्यवस्था पर भी एक दृष्टि बनाई जाए। एकांगी और संकीर्ण देशभक्तिकी जगह इस देश के अंतिम नागरिक की निष्ठा जीतने वाले राष्ट्रवाद की कल्पना की जाए। गांधीजी के स्वराज की कल्पना से स्वराज आए। इस वैचारिक चुनौती के अलावा बड़ी सांगठिनक चुनौतियां भी हैं कि ऐसा राजनीतिक संगठन कैसे बने जो स्थापित पार्टी की बीमारियों से मुक्त रह सके। इस देश की क्षेत्रीय और सामाजिक विविधता को आत्मसात कैसे किया जाए? संगठन में मर्यादा बनाने के लिए क्या प्रक्रिया बनाई जाए? आंतरिक लोकतंत्र की व्यवस्था सुदृढ़ कैसे हो? साथ ही देशभर के जनांदोलनों के साथ रिश्ता कैसे बनाया जा सके? यह सब आसान काम नहीं है।

आप भी इससे जुड़े हैं, आपकी इसमें क्या भूमिका है?

 पिछले साल अप्रैल में ही मैंने इस आंदोलन का स्वागत किया था। इसकी कमजोरियों और खतरों को दर्ज करते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ घटना बताया था। अगस्त के महीने में रामलीला मैदान में मैंने दो-तीन बार संबोधन भी किया और कहा कि यह आंदोलन एक अन्ना हजारे का नहीं देश के हर कस्बे, हर गांव में बैठे किसी न किसी अन्ना का है। उसके बाद लोकपाल बिल पर हुई बहस में मैंने आंदोलनकारियों को सिर्फ एक पार्टी का विरोध करना और भाजपा जैसी पार्टी का समर्थक दिखने के प्रति आगाह किया था। दिसम्बर में भी मैंने रामलीला मैदान से संबोधन किया था। इस बार भी मैंने इस आंदोलन के शुभचिंतक की हैसियत से जंतर मंतर से कई बार बोला। जिन लोगों ने पत्र लिखकर अनशन समाप्त करने और वैकल्पिक राजनीति की शुरु आत का अनुरोध किया था, मैं उनमें से एक था। ऐसा नहीं है कि अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों की हर बात से मैं सहमत हूं। मुझे लगता है कि उनके लोकपाल बिल में कमजोरियां थीं और अरु णा राय और साथियों द्वारा दिए गए प्रस्ताव पर ज्यादा गौर करना चाहिए था। फिर भी यदि आंदोलनकारियों की कमजोरी और सत्ता के भ्रष्टाचार और अहंकार में से मुझे किसी एक को चुनने के लिए कहा जाएगा तो जाहिर है कि मैं

इस आंदोलन का भविष्य किस तरह से देखते हैं? राजनैतिक आंदोलनों के बारे में भविष्यवाणी करना समझदारी नहीं है। आंदोलन के साथियों को बहुत आशाएं हैं, शायद जरूरत से ज्यादा। आलोचकों के मन में आशंकाएं हैं, शायद जरूरत से ज्यादा। भाविष्य इस पर निर्भर करेगा कि यह आंदोलन कितनी गंभीरता और गहराई से चुनौतियों का सामना करेगा जिसका जिक्र हमने पहले किया है।

एक ही थैले के...

गहमा-गहमी...