Tuesday, August 9, 2011

नहीं रहा ध्रूपद का धुरंधर


अभिनव उपाध्याय
अद्भुत आलाप की शक्ति, सहजता एंv पारंपरिक बंदिशों से शास्त्रीय गायक उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर किसी परिचय के मोहताज नहीं थे। गुरुवार 27 जुलाई को उनका देहावसान हो गया। संगीत मर्मज्ञों का मानना है कि उनकी मृत्यु से शास्त्रीय संगीत जगत को गहरी क्षति पहुंची है।
अलर, राजस्थान में 1927 में जन्में उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर ध्रुपद संगीतज्ञों के प्रतिष्ठित घराने से ताल्लुक रखते थे। संगीत में उनकी प्रारंभिक दीक्षा अपने प्रसिद्घ पिता उस्ताद अल्लाबंदे रहीमुद्दीन खान डागर से हुई, आगे चलकर उस्ताद नसीरूद्दीन डागर, इमामुद्दीन डागर एं हुसैनुद्दीन डागर के संरक्षण में प्रशिक्षित हुए थे। उन्होंने जियाउद्दीन खान डागर से र्रूीणा मे प्रशिक्षण भी प्राप्त किया था।
ध्रुपद के महान गुरूओं के बीच उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर अपने आलाप की शक्ति, सहजता एं पारंपरिक बंदिशों के समृद्घ संग्रहण के कारण जाने गए, जिनमे से कुछ बारहीं एं तेरहीं शताब्दियों की हैं। संगीत साधना के सुदीर्घ जीन में े अपने राग-स्तिार एं लय-ताल पर प्रीणता उनमें अदभुत थी।
आल इंडिया रेडियो एं दूरदर्शन के नैत्यिक कलाकार रहें उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर ने देश के अलावा विदेशी आयोजनों में भी अपनी अमिट छाप छोड़ देने वाली प्रस्तुतियां दीं।
एक प्राध्यापक के रूप में उस्ताद जी ने रीन््र भारती श्ििद्यालय, कोलकाता में अध्यापन भी किया। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन््र ने उनकी कला पर शिष्ट प्रलेखन भी तैयार किया। उनके बारे में शास्त्रीय संगीत के बनारस घराने के प्रसिद्ध गायक पंडित राजन मिश्र का कहना है कि उनका न रहने से शास्त्रीय संगीत जगत में एक परंपरा का अवसान हो गया है। मैं इसे अपनी व्यक्तिगत क्षति भी मानता हूं। हमसे उनका बहुत प्रेम था हमने कई बार साथ-साथ अपनी प्रस्तुतियां दी। सही मायने में ध्रुपद का अंदाज उनके पास था। उनका निधन ध्रुपद के एक महान स्तंभ का समाप्त हो जाना है। अब उनके सिखाए गए लोगों की यह जिम्मेदारी है कि वह उनकी परंपरा को आगे बढ़ाएं।
अपनी उत्कृष्ट संगीतज्ञता के लिए उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर र्ष 1993 में संगीत नाटक अकादेमी सम्मान, र्ष 1996 में साहित्य कला परिषद् सम्मान, र्ष 2002 में बिहार ध्रुपद रत्न सम्मान, र्ष 2003 में राजस्थान संगीत नाटक अकादेमी सम्मान एं र्ष 2008 में पद्म भूषण से सम्मानित किये गये। हिन्दुस्तानी संगीत में उल्लेखनीय योगदान के लिए इस र्ष उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर को संगीत नाटक अकादेमी का रत्न सदस्य चुना गया। संगीत नाटक अकादेमी की उपाध्यक्ष शांता सरबजीत ¨सह का मानना है कि डागर साहब ने ध्रुपद की अनगिनत पीढ़ियों की परंपरा को न केवल जीवित रखा बल्कि बतौर एक धरोहर उन्होने हमें सौंपा। उनके निधन से भारतीय शास्त्रीय गायकी को गहरी क्षति पहुंची है।
प्रसिद्ध संतूर वादक पं भजन सोपोरी उनसे आत्मिय लगाव था उनका कहना है कि संतूर वादक पं भजन सोपोरी का कहना है कि डागर साहब में जो लगन 50-60 के दशक में थी उसी लगन,तालीम के साथ उसी सिद्धता को उन्होने बरकरार रखा। उन्होने एक शैली के साथ राग की ऐतिहासिकता पर काम किया। वह एक ही थे जो ध्रुपद के महान फनकार थे। मुङो याद है पिछले वर्ष नवंबर में हमारा उनके साथ बनारस में अंतिम कंसर्ट था। उनका न होना एक बड़ी क्षति है।
लेखक संगीतज्ञ पं विजय शंकर मिश्र का कहना है कि उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर ने न केवल अपनी परंपरा के सर्वाधिक विद्वान व श्रेष्ठ कलाकार थे। ध्रूपद के वह सबसे महत्वपूर्ण कलाकार थे। वह स्वामी हरिदास की परंपरा से जोड़ते थे और अपने नाम के साथ डागर लिखते थे। मुसलमान होते हुए भी उन्हे संस्कृत सहित अन्य भाषाओं का ज्ञान था वह धारा प्रवाह संस्कृत के श्लोक बोलते थे। गंगा जमुनी तहजीब के भी वह जबरदस्त हिमायती थे। उनका शुरूआती जीवन संघर्षमय रहा लेकिन कभी भारत छोड़कर विदेश जाना पसंद नहीं किए। उनको भारत से गहरा लगाव था।








Thursday, July 14, 2011

किसान के सम्मान में समाधान

अरुण कुमार त्रिपाठी

उदारीकरण के साथ पैदा हुई गांव और खेती की समस्या विश्वव्यापी है। मायावती के राज्य में होने वाला टकराव उसका एक स्थानीय रूप है। वह पूरे देश में किसी न किसी रूप में चल रहा है। मायावती इस वैश्विक पूंजीवाद की समस्या को अपनी स्थानीय राजनीतिक जरूरत और दलितवाद के आधे अधूरे दर्शन से हल करना चाहती हैं। जबकि कांग्रेस अपनी ही सरकार के खिलाफ विपक्ष की भूमिका निभा कर । प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून भी किसानों को ध्यान में रख नहीं उन परियोजनाओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है जो शुरू होने का इंतजार कर रही हैं। इसलिए इस समस्या का हल किसान की तरफ से खोजने पर ही निकलेगा।

पश्चिम बंगाल के सिंगुर और नंदीग्राम से लेकर दिल्ली के आसपास के उत्तर प्रदेश के इलाकों में मची ग्रामीण अशांति का एक ही समाधान है। वह है किसान और खेती का सम्मान। जिस तरह महाभारत में भीष्म ने कहा है कि जंगल बचाना है तो सिंह को बचाओ उसी तरह से कहा जा सकता है कि ग्रामीण इलाकों की अशांति मिटानी है तो किसानों को सम्मान दो। जंगल में तमाम जीव होते हैं लेकिन उनके कें्र में सिंह ही होता है, वैसे ही ग्रामीण जीवन में तमाम तरह के व्यवसायों के बीच खेती एक प्रमुख व्यवसाय है और किसान उसका मुख्य कर्ताधर्ता। उसकी उपेक्षा कर ग्रामीण जीवन में शांति कायम नहीं की जा सकती। यह गलती पूंजीवाद भी करता है और यही गलती मार्क्सवाद भी करता है। इसीलिए दोनों को दिक्कत पेश आती है। वे अपनी पूंजी और विचार के अहंकार में उसके महत्व को भूल जाते हैं और नतीजतन वे अपने ही समाज से लड़ने लगते हैं। यही काम उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती अपने दलितवाद के अतिरिक्त आत्मविश्वास में कर रही हैं और उनके लिए इसके बुरे परिणाम के संकेत मिलने लगे हैं।

भूमि अधिग्रहण पर यह चर्चा बहुत जोरों से है कि 1894 के कानून के आधार पर अब काम नहीं किया जा सकता। अब हमें नए कानून की जरूरत है। सवाल उठता है कि उस नए प्रस्तावित कानून का उद्देश्य क्या है? उसका दर्शन क्या है? अगर उसका दर्शन और उद्देश्य वही है जो उन्नीसवीं सदी के कानून का था तो उससे उसी तरह का टकराव पैदा होगा जो पहले होता रहा है। यह बात अलग है कि अंगेजों ने भारत का ज्यादा उद्योगीकरण नहीं किया इसलिए उस पर आज की तरह टकराव नहीं हुआ। उनका मकसद अपने फौजी इस्तेमाल और औपनिवेशिक शोषण के लिए जमीन का अधिग्रहण करना था इसलिए उन्हें ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं थी। लेकिन विकास की नई महत्वाकांक्षा पर सवार आजाद भारत की सरकारों को ज्यादा से ज्यादा उद्योगीकरण की जरूरत और हमारे संसाधनों को ज्यादा से ज्यादा बाजार में लाना है इसलिए उन्हें ज्यादा जमीनें चाहिए और टकराव भी ज्यादा हो रहे हैं।

लेकिन जमीन अधिग्रहण के लिए बना यह कानून जिस सिद्धांत पर आधारित है वह ब्रिटेन का सत्रहवीं सदी का सिद्धांत है। उस सिद्धांत के अनुसार जमीन पर राज्य का अधिकार प्रमुख होता है। इसे इमिनेंट डोमेन का सिद्धांत कहते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य सार्वजनिक हित में किसी की भी जमीन को ले सकता है और उसका जो चाहे वह उपयोग कर सकता है। बदले में राज्य उसे मुआवजा वगैरह देने का एक फार्मूला तय करेगा। ब्रिटेन में अब यह सिद्धांत देशी नहीं विदेशी मामलों पर लागू होता है। जबकि भारत में यह अभी भी अपने कमजोर और असंगठित नागरिकों पर लागू होता आ रहा है। यही वजह है कि इस पर टकराव बढ़ रहा है। जो लोग इस समस्या का हल मुआवजा बढ़ाने को मान रहे हैं वे भी एक दिन महसूस करेंगे कि वह तात्कालिक हल है। जिन राज्यों में बढ़ा हुआ मुआवजा देकर लोगों को बहला-फुसला कर जमीन ले ली जा रही है, वहां लोगों को विरोध और व्रिोह करने से एक ही बात रोक रही है और वह है किसानों का सम्मान। जिस दिन वहां भी किसानों का सम्मान समाप्त हो जाएगा उस दिन वहां भी अशांति आने से रोकी नहीं जा सकती। इसीलिए भारत के पूर्व अनुसूचित जाति जनजाति आयुक्त डा ब्रह्मदेव शर्मा कहते हैं कि कोई सरकार अपने समाज से नहीं लड़ सकती। वह थोड़े दिन उसे घेर जरूर सकती है लेकिन उससे जीत नहीं सकती। हरियाणा में राज्य सरकार ने अभी भी अपने समाज से जंग नहीं छेड़ी है। इसलिए उसकी मुआवजा नीति की सराहना हो रही है। लेकिन जिस दिन वह किसानों का सम्मान छोड़ कर उनसे लड़ने लगेगी उस दिन उसे भी दिक्कतें पेश आएंगी।
उत्तर प्रदेश में मायावती किसानों को ब्लैकमेल कर रही हैं। दरअसल ब्लैकमेल अन्ना हजारे का आंदोलन नहीं था बल्कि ब्लैकमेल मायावती सरकार की नीतियां हैं। वे कभी दमन करती हैं और कभी मुआवजा राशि बढ़ाती हैं। कभी किसानों को अपराधी घोषित कर उन पर इनाम रखती हैं और कभी उन इलाकों में अपने मंत्री भेज कर उन्हें पटाती हैं। वास्तव में उन्होंने सामाजिक न्याय के सिद्धांत के साथ उदारीकरण के सामाजिक अन्याय और दमन के सिद्धांत का घालमेल बना लिया है। वे जाति के सिद्धांत से अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद की समस्या हल करना चाहती हैं। यही उनकी परेशानी की वजह है।
लेकिन यह मामला यूपी तक ही सीमित नहीं है। यह अखिल भारतीय मामला है, बल्कि विश्वव्यापी है। बड़ी परियोजनाओं के लिए जमीनों का अधिग्रहण और उसके विरोध में स्थानीय निवासियों का संघर्ष पूरी दुनिया में चल रहा है और हमारी सरकार को उससे सबक लेते हुए अपनी नीतियों में बदलाव करना चाहिए। लेकिन नीतियों में बदलाव का मतलब यह कतई नहीं है कि महज कानून की धाराएं बदल दी जाएं और इरादा व दर्शन पहले वाला ही रखा जाए। भारत सरकार ढांचागत योजनाओं के विकास के लिए विदेशी निवेशकों का बेसब्री से इंतजार कर रही है। उसका लक्ष्य 11 वीं पंचवर्षीय योजना में 500 अरब डालर और अगले दस सालों में 1.7 खरब अमेरिकी डालर का निवेश आकर्षित करना है। अभी यह लक्ष्य बहुत कम हासिल हुआ है। भारत की ढांचागत परियोजनाओं में विदेशी निवेशकों की भागीदारी महज 8 से 10 प्रतिशत ही है। जाहिर है हमारी सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में जो बदलाव कर रही है वह किसानों के हितों को ध्यान में रखकर नहीं उन्हें जसे तैसे शांत रखने के लिए कर रही है। उसका लक्ष्य उन निवेशकों के लिए रास्ता साफ करना है जो भारत में शुरू हो चुके विकास के एक्सप्रेस वे पर निगाह गड़ाए बैठे हैं। न कि किसानों की समस्या और चिंता को दूर करना है।
यही वजह है कि प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून में निजी हित और कंपनियों के हित के आधार पर सरकार को जमीन अधिग्रहण की और व्यापक छूट दी गई है। उस छूट के अनुसार अगर किसी व्यक्ति के पास परियोजना के लिए 70 प्रतिशत जमीन है तो सरकार उसके लिए बाकी 30 प्रतिशत जमीन का अधिग्रहण कर देगी। स्पष्ट है कि लोगों की राय लिए जाने और उसे ज्यादा महत्व देने और निजी और सार्वजनिक की स्पष्ट व्याख्या किए जाने की जरूरत है। यह साफ किए जाने की जरूरत है कि बहुफसली जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा। पिछले 20 सालों में जितनी जमीन का अधिग्रहण हुआ है उस पर श्वेत पत्र भी जारी किया जाना चाहिए। सरकार को बताना चाहिए कि जितनी जमीन का अधिग्रहण हुआ है उसका क्या उपयोग हो रहा है और वह कैसे सार्वजनिक हित में है। उससे भी बड़ी बात है कि महज राहुल गांधी के दबाव में ही नहीं अपने विवेक के लिहाज से भी सरकारों और नीति निर्माताओं और जनमत बनाने वालों को किसानों की तरफ से सोचना चाहिए। किसान को सम्मान देंगे टकराव अपने आप टल जाएगा।

Friday, June 10, 2011

तुम पर फिदा, हुसैन!



'दोस्तो, कला की दुनिया एक है। हुस्न और फन हर जा मौजूद है। ज़रूरत है बस उस एक नज़र की जो उन्हें जान सके पहचान सके। आप सब जानते हैं कि पेंटिंग मेरी उम्र भर की साधना है। मेरी जिèन्दगी है, फिल्में मेरा पैशन है। मैं, आज वतन से दूर हूं। पर यह कहानी उस शख़्स की है, जिसकी सुबह-ओ-शाम हिंदुस्तानी आस्वाद, रंगों, बुनावट और रूपरेखाओं से रोशन है। खाक -ए-वतन की यही ख़्ाुशबू मेरे सपनों को आज भी मुअत्तनू और गुलज़ार रखती है। मैं अपनी सरज़मीं को झुक कर सलाम करता हूं। मेरी दुनिया वहीं है, जहां आप सब हैं। खाक-ए-वतन का मुझको हर ज़र्रा देवता है।’

ये मकबूल फिदा हुसैन साहब हैं जिन्होंने यह बात दो साल पहले नवंबर 2००9 में कही थी। उनके चौरानबे जन्मदिन पर जिया प्रकाशन ने एक ई-बुक निकाली थी जिसमें एनीमेशन के साथ हुसैन के चित्र और उनकी ज़ुबानी 'कुछ आपबीती, कुछ जगबीती, कुछ गौर-ओ-फिक्र, कुछ जज्बात थ्ो।’ वहां एक पेंटर की आंखों से देखने के लिए उस चित्रकार ने अपना हृदय खोल कर रख दिया था। 'तहरीर तस्वीर बन गयी थी और तस्वीर तहरीर।’ यानी लफ्ज तस्वीरों की तरह और तस्वीरें थीं लफ़्जों के मानिंद।


हुसैन अब नहीं हैं। निस्संदेह वे आधुनिक भारतीय कला के सबसे बड़े और पहचाने जाने वाले नाम थ्ो। कई लोगों की मृत्यु पर रस्मी तौर पर युग बीत जाने की बात कही जाती है पर हुसैन का न रहना निश्चित ही एक युग का अवसान है। यह दुर्भाग्यपूणã है कि हमारा यह सबसे बड़ा कलाकार बरसों से मातृभूमि से बाहर रहा। वे मजाक में अपने को अंतरराष्ट्रीय जिप्सी कहते थ्ो पर कहीं अंदर गहरी टीस थी वतन से दूर होने की। वे अपने को भारतीय मूल का चित्रकार ही कहते रहे। यहां तक कि कतर ने जब उन्हें नागरिकता दी तो एक घोड़े के रेखांकन के ऊपर उन्होंने लिखा : 'मुझ भारतीय मूल के पेंटर, एमएफ हुसैन को 95 साल की उम्र में कतर की नागरिकता का सम्मान दिया गया है।’ एक इंटरव्यू में उन्होंने मंुबई लौट जाने के लिए अपनी तड़प को बताया था।


हुसैन की मशहूरी दुनिया भर में थी। वे शायद सबसे मंहगे पेंटर भी थ्ो। फिल्में भी बनायीं, जिसका उन्हें नशा-सा था। अत्यंत प्रसिद्ध और अति विवादास्पद, वे दोनों ही थे। खबरों में हमेशा बने रहते। कुछेक सदाबहारों में वे अन्यतम थ्ो। वे हमेशा कुछ नया करते रहते, जिसे उनके प्रशंसक 'ख़्ाूब से ख़्ाूबतर की जुस्तजू’ मानते थ्ो। देश की कट्टर हिंदू ब्रिगे्रड को वे फूटी आंखों नहीं सुहाते थ्ो। दरअसल हुसैन साहब कला को जानने-पहचानने की जिस नज़र की बात करते हैं उसका वहां घोर अभाव है। लिहाज़ा उनकी कलाकृतियां नष्ट की जाती रहीं, स्टूडियो, घर पर हमला होता रहा। उनके खिलाफ सैकड़ों मामले दायर कि ये गये। न सरकार ने कुछ किया न उस चैनली मीडिया ने ही कोई दबाव बनाया जो दम भरता है कि अगर वह तब रहा होता तो बाबरी मस्जिद न ढहायी जा पाती। चाहकर भी वे देश नहीं लौट पाए। शायद लंदन में ही उनका अंतिम संस्कार हो। कू-ए-यार में उन्हें भी दो गज जमीं नसीब न हो सक ी।

हुसैन का जीवन उनकी कला की तरह ही सघन और चित्ताकर्षक था। दोनों की दुनिया इतनी विशद है जहां लोगों, घटनाओं का आना-जाना लगा रहता है। शायद इसीलिए वे अवाम के फनकार कहे जाते रहे। उनकी जीवन-कथा बेहद रोमांचक और छैल-छबीली है। इस कदर ठेठ भारतीय और दिलचस्प कि उनकी कही वह अनूठी टिप्पणी याद आती है कि, 'मैं तो अखिल भारतीय सर्कस का रंगीला जोकर हूं।’ जिया प्रकाशन ने जो ई-बुक निकाली थी वह जैसे ज़िन्दगी का सफरनामा है। बदलते वक़्तों का गवाह। इसमें वे उस फनकार की कहानी सुनाते हैं जिसने डेढ़ साल की उम्र में अपनी मां को खो दिया, जो इंदौर की गलियों में ख्ोला और बड़ौदा में पढ़ा। कई बार मोहब्बत करता है और नाकाम होता है। उबरता है और अपने विचारों, कल्पनाओं को कैनवास पर उतारता है। और जब हजारहा मुसीबतों को ठेल कर वह एमएफ हुसैेन के रूप में उभरता है तो दुनिया उसे दिलचस्पी और हैरत से देखने लगती है।

इकतालिस शीर्षकों की इस ई-बुक में हुसैन निखालिस हिंदुस्तानी सुर्ख-स्याह और जीवंत रंगों में नमूदार होते हैं। यहां हुसैन की भाषा अद्भुत असर छोड़ती है। सीधी-सच्ची और विश्वसनीय। वे फे्रमों में सोचते दिखते हैं और छवियों में शब्दोंे को अंकित करते हैं। यहां आप हुसैन को देखते हैं और बहुत कुछ समझ पाते हैं। बचपन की खुशियां। स्कूल से बच्चों का गेंदों की तरह निकलना। मां का चेहरा याद न रहने का दर्द और मदर टेरेसा के ममत्व के विस्तार में उसकी पनाह। पिता की शादी की खुशी। इतना बड़ा होना की दादा की अचकन की जेब तक पहंुचने लगना। दादा की मृत्यु के बाद उसी अचकन को ओढ़कर सोना मानो दादा की गोद में सोये हों। नूर-ए-नज़र बाईसिकिल, जिसके क रियर पर बैठ उसे ऐसे चलाना मानो साइकिल हमारी गोद में है या हम साइकिल की गोद में।ड्राइंग मास्साब ने जब बनाने को कहा तो उनके ब्लैकबोर्ड की चिड़िया ज्यों की त्यों नोटबुक में आ बैठी। नंबर मिले दस में से दस। चाचा की दुकान का हिसाब दिया दस रुपए ओर बैठे-बैठे स्केच बनाये बीस। जमना जिसे पानी भरते देखते, बल्कि दोनों देखते ओर देते एक-दूसरे को दाद-सी। उसे नीच लाल खां दर्जी ने रख्ौल बनाकर तबाह कर दिया। पहली आइल पेंटिंग की, 'सिंहगढ़ फिल्म’ के इस पर्चे को देखकर चचा नाराज पर पिता ने कहा, 'जाओ बेटा ज़िन्दगी को रंग से भर दो।’लोहिया का स्केच बनाया। डाक्टर साहब बेहद खुश। बाहों में भींच लिया और वह भींच ताउम्र ढीली न पड़ी। लेकिन नेहरू का स्केच देखकर लोहियाजी नाराज़। उनसे कहा, 'डाक्टर साहब मार्डन आर्ट बेहद लोकतांत्रिक चीज है। उसकी खूबी यही कि आप उसे अपनी तरह से समझें।’ उन्हीं का मान रखने के लिए बनायीं रामायण पर डेढ़ सौ पेंटिंग। चार पेंटर दोस्त : मड़बड़ोचां का बल छाबड़ा, कपड़कांज का तैयब मेहता, करोलबाग का रामकुमार और गिरयाम पतली गली का गायतोंडे। कभी नहीं भूली इंदौर की वह नदी जिसके एक किनारे गुलेर शाह का मज़ार और दूसरे किनारे पर शिवालय। जिस उम्र में भी पहंुचा वहां तो छुआ जरूर दोनों के बीच बहते जल को। ये थ्ो हमारे हुसैन जिन पर फिदा एक बड़ी दुनिया। फिदा ही नहीं उनकी कृतज्ञ भी बहुत!


मनोहर नायक - लेखक आज समाज अख़बार के स्थानीय संपादक हैं .

Sunday, June 5, 2011

जरूरत समस्या को समझने कि


वर्तमान में बहस के कुछ चर्चित मुद्दों में माओवादियों का मुद्दा प्रमुख है। लेकिन जनमानस का एक बड़ा तबका माओवादियों, नक्सलियों और आदिवासियों की समस्याओं को लेकर भ्रमित है। यही नहीं दिलचस्प तो यह है कि जब भी नक्सलियों की तरफ से कोई कार्रवाई होती है वह संचार माध्यमों के लिए एक बड़ी खबर है। भूमंडलीकरण और उदारीकरण की दौड़ में जहां मुनाफा संबधों को तौलता है वहां भी इनकी खबरों के पाठक बहुत हैं। सवाल यही है आखिर जिसे मीडिया से लेकर सरकार तक लगभग आतंकवादी बताते फिर रहे हैं उन्हे बुद्धिजीवियों का इतना समर्थन क्यों मिल रहा है? निश्चित रूप से सभी बुद्धिजीवी देशद्रोही नहीं हो सकते। माओवादियों, आदिवासियों और नक्सलियों को जानने, समझने और उनके बारे में लोगों की राय से इतर अपनी व्यक्तिगत राय बनाने के लिए वाणी प्रकाशन की त्रैमासिक पत्रिका वर्तिका के अक्टूबर से दिसम्बर 2010 का अंक एक उपयोगी सामग्री साबित हो सकती है। महाश्वेता देवी और अरुण कुमार त्रिपाठी के संपादन में निकलने वाली यह पत्रिका नए विमर्श के साथ मोआवादियों के इतिहास को भी समझने का मौका देता है। पत्रिका संपादकीयमाओ गांधी के देश में गांधी और माओत्से तुंग के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन मात्र नहीं है बल्कि एक वर्तमान परिवेश में उसकी प्रासंगिकता को लेकर भी एक सवाल खड़ा करता है। संपादक अरुण कुमार त्रिपाठी लिखते हैं किनव उदारवाद के खिलाफ लड़ रहे माओवादियों और गांधीवादियों की चिंता तो एक जसी है। पर उनके बीच हिंसा की गहरी खाई है। माओवादी हिंसा छोड़ने को तैयार नहीं हैं और गांधीवादी हिंसा का किसी भी तरह से समर्थन कर नहीं सकते।

महाश्वेता देवी का लेखलाल गढ़ के लिए सरकार जिम्मेदारज् आम जन की आवाज की बुद्धिजीवी द्वारा सही होने का ठप्पा है। इस लेख में लेखिका ने वह सब कह दिया है जो जनता की आवाज थी और चुनाव के बाद परिणाम ने अब वहां कुछ कहने के लिए छोड़ा नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार इरा झा काबस्तर का दर्द तो समझोज् पढ़ कर ऐसा लगता है कि आदिवासियों के जंगल,जमीन और जल को हड़पकर सरकार किस तरह उन्हें बेघर कर रही है। लेखिका यह लेख व्यक्तिगत अनुभवों के कारण और प्रामाणिक और प्रासंगिक हो गया है। आज बस्तर ही नहीं बल्कि और इलाकों के आदिवासी भी अपनी जमीन होने के बावजूद दोयम दर्जे की जिंदगी जी रहे हैं। दंतेवाड़ा पर अरुंधती राय के लेख को केंद्र में रखकर सुनील का लिखा गया लेख केवल वहां की आंतरिक समस्याओं से अवगत कराता है अपितु उसके समाधान की तरफ भी अग्रसित करता है। पत्रिका में बीडी शर्मा का साक्षात्कार कई मुद्दों पर एक साथ प्रहार करता है और यह बताने की कोशिश करता है कि वास्तव में हम एक तरफा शांति की बात नहीं कर सकते। इस पत्रिका का हर लेख जानकारी परक है लेकिन मैं खास दो लोगों की विशेष बात करना चाहूंगा, पहला अनिल चमड़िया के लेखदर्द बढ़ता ही गया और चारु मजूमदार के पुत्र अभिजीत मजूमदार के एक साक्षात्कार का। अनिल चमड़िया बड़ी बेबाकी से इस बात को प्रस्तुत करते हैं कि सरकार किस तरह दबाव में है कि व्यक्ति जब एक अर्थशास्त्री होता है तो उसे नक्सलवाद एक समस्या दिखती है जो असंतोष और अधिकारों के मिलने के कारण है जबकि वही व्यक्ति जब प्रधानमंत्री बनता है तो उसे नक्सलवाद देश के लिए सबसे बड़ा खतरा लगने लगता है। अनिल चमड़िया लिखते हैंनक्सलवादियों को जिन इलाकों में सरकार सबसे सक्रिय बताती है वे कौन से इलाके हैं! जहां देश की आखिरी पंक्ति में खड़ी जमात रहती है। जहां वह रहती है उसके घर के नीचे खनिज संपदा है। प्राकृ तिक संसाधनों से वह भरपूर है। जंगह है। पानी है। लोगों को जीने के अधिकार से वंचित रखा गया है। सरकार उन्हे बंदूकधारी बता रही है।ज् अभिजीत मजूमदार ने आलोक प्रकाश पुतुल से बातचीत में स्वीकार किया है कि ‘..आदिवासियों को हिम्मत दिलाने की जरूरत है उनके लिए लड़ने की जरूरत है और इस दिशा में माओवादी काम कर रहे हैं। लेकिन आज के हिन्दुस्तान में भुखमरी है, बेकारी है। अगर आप इसको मुद्दा नहीं बनाएंगे, आप एक बड़ी आबादी के केवल एक हिस्से को ध्यान में रखेंगे, केवल आदिवासी की बात करेंगे तो आपका आंदोलन ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगा। यह स्वीकारोक्ति यह बयां करती है कि अब मुद्दा बंदूक के बल पर रोटी छीनने का नहीं है।इस पत्रिका में डा. प्रेम सिंह, सच्चिदानंद सिंहा,डा. अरविंद पांडेय, प्रियदर्शन सहित अन्य लोगों के लेख बेहद सधे हुए और ज्ञानवर्धक है कुल मिलाकर यह एक संग्रहणीय अंक है।

अभिनव उपाध्याय

एक ही थैले के...

गहमा-गहमी...