Thursday, September 15, 2011

निजी सपनों में खो गई एक क्रांति

अरुण कुमार त्रिपाठी

अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव ने बहन मायावती को बेचैन कर रखा है। कभी भूमि अधिग्रहण विरोधी किसान आन्दोलन कभी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में घोटाले और हत्याएं तो कभी दलितों पर अत्याचार की घटनाओं ने उनसे की गई उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है जिसके कारण वे मुलायम सिंह को हराकर सत्ता में आई थीं। बीच में सैंडल खरीदने के लिए खाली विमान मुंबई भेजने जसी खबरों से उनकी विलासिता हास्यास्पद तरीके से उजागर होती रहती है। लेकिन जाति के जिस आधार और जिस गठजोड़ ने उन्हें सत्ता में पहुंचाया था वह उनसे अभी भी विमुख नहीं हुआ है। यही वजह है कि उनके विरोधी भी न तो निश्िंचत हैं न ही चैन से बैठ पा रहे हैं। विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे के साथ हाल में हुए मायावती के विवाद ने उनके व्यक्तित्व की एक झलक दे दी है। यूरोप के कई देशों से भी बड़े उत्तर प्रदेश जसे विशाल राज्य की चार बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद वे सहज नहीं हो पाई हैं। एक तरफ वे अपने स्वभाव के कारण मनमानी भी करती रहना चाहती हैं तो दूसरी तरफ असाधारण महत्वाकांक्षा के कारण अपनी छवि की भी जेड प्लस सुरक्षा करना चाहती हैं। यही वजह है कि उन्होंने जूलियन असांजे की स्थिति को जाने बिना उन्हें पागलखाने में भेजने की बात कह डाली। हो सकता है कि बहन मायावती की टिप्पणी उनके कम जानकारी वाले मतदाताओं को काफी मजेदार लगी हो कि उन्होंने अपने एक आलोचक के लिए आगरा के पागलखाने के दरवाजे खोल दिए हैं। लेकिन जिसे भी यह पता होगा कि असांजे अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए इंग्लैंड में नजरबंद है, उसे यह साफ लगेगा कि बहन जी को न तो अंतरराष्ट्रीय स्थितियों की जानकारी है न ही उनमें लोकतांत्रिक सहनशीलता। अगर उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्थितियों की जानकारी होती तो वे पहले उन अमेरिकी राजनयिकों और अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की आलोचना करतीं जिन्होंने इस तरह के नकारात्मक केबल भेजे थे और जिसे हिलेरी ने स्वीकार किया। इसीलिए मायावती से सहज और मजेदार टिप्पणी असांजे की थी कि , ‘‘ अगर मायावती उन्हें राजनीतिक शरण दें तो वे भारत आने को तैयार हैं और वे जो विमान भेजेंगी उनमें वे उनके लिए लंदन की अच्छी सैंडल भी लेते आएंगे। मायावती की कार्यशैली से सवर्ण समाज हतप्रभ है और वह अंग्रेजी पढ़ा लिखा वर्ग भी जिसके लिए लोकतंत्र भ्रलोक की व्यवस्था है। इसलिए मायावती जो कुछ कर रही हैं और जिस तरह से कर रही हैं उसकी व्याख्या तब तक नहीं की जा सकती जब तक दलित समाज की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और मायावती की निजी महत्वाकांक्षा को समझा नहीं जाता। दलित समाज की महत्वाकांक्षा देश की सत्ता पर उसी तरह से काबिज होना है जिस तरह से स्वाधीनता के बाद कांग्रेस के माध्यम से पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में ब्राह्मण काबिज थे। बस फर्क यह है कि इस राजनीतिक समीकरण में वे ब्राह्मणों की जगह पर दलितों को रखना चाहते हैं और दलितों की जगह पर ब्राह्मणों को। उत्तर प्रदेश में मायावती ने यह समीकरण बना लिया है और देश भर में उसे बनाया जाना है। पर यह काम इतना आसान नहीं है। अपने छोटे से सलाहकारों के समूह के साथ मायावती सोचती हैं कि यह काम उसी तरह से हो जाएगा जिस तरह से लोकतंत्र के चमत्कार ने उन्हें चौथी बार मुख्यमंत्री बनवा दिया। उन्होंने गठबंधन दौर की इस राजनीति में इं्र कुमार गुजराल, मनमोहन सिंह जसे जनाधार विहीन नेताओं और एचडी देवगौड़ा जसे क्षेत्रीय नेता को प्रधानमंत्री बनते देखा है। इसलिए सोचती हैं कि देश की आबादी में बड़ी भागीदारी रखने वाले दलितों के नेता को कभी न कभी प्रधानमंत्री बनने का मौका तो मिलेगा। अपनी इसी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए वे चारों तरफ से संसाधन और सत्ता जुटाने में लगी हैं। इस काम में उनका जोर साधन की पवित्रता पर नहीं साधन की प्रचुरता पर है। उनके लिए साधन की पवित्रता , नैतिकता और त्याग जसे मूल्य मनुवादी और सवर्ण समाज के मूल्य हैं जिसका दलितों के भौतिकवाद से क्या लेना देना। उनका सारा जोर इस बात है कि जो कुछ किया जाए वह कानूनी हो और फिर कानून बनाना तो अपने हाथ में है। इसीलिए भ्रष्टाचार विरोध और नैतिकता का वह आग्रह उनकी समझ में नहीं आता जिसके लिए कुछ सवर्ण गांधीवादी और हिंदुत्ववादी गुहार लगाया करते हैं। इसके जवाब में या तो भ्रष्टाचारी सवणोर्ं का उदाहरण पेश कर दिया जाता है या फिर यह कहा जाता है कि यह सब मनुवादी साजिश का हिस्सा है। मायावती पर ताज कोरीडोर और आंबेडकर, छत्रपति साहूजी महराज, कांशीराम पार्क के नाम पर प्रदेश में मूर्ति स्थापना के लिए हजारों करोड़ रुपए बर्बाद करने का आरोप है और इसकी जांच भी सीबीआई कर रही है। हाल में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में हुए घोटाले और लखनऊ में पहले अस्पताल में और फिर जेल में दो बड़े डाक्टरों की हत्या ने बसपा और उसके गोरखधंधे पर काफी कुछ रोशनी डाली है। बताया जाता है कि टू-जी से भी बड़ा घोटाला है। इसी तरह हाल में यमुना एक्सप्रेस वे और गंगा एक्सप्रेस वे नाम पर जमीनों के अधिग्रहण से भी काफी विवाद उठा है। उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने का नारा देकर 2007 में सत्ता में आईं मायावती ने एक तरफ इन योजनाओं के माध्यम से प्रदेश के विकास का प्रचार किया है तो दूसरी तरफ इसका विरोध करने वाले किसानों का दमन भी किया है। यही कारण था कि उनकी सरकार के खिलाफ किसानों को एकजुट करने के लिए कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसौल से अलीगढ़ के टप्पल तक पदयात्रा भी कर डाली। इस यात्रा ने मायावती की छवि को नुकसान पहुंचाया और कांग्रेस के असर को थोड़ा बढ़ाया था। लेकिन इस बीच उठे अन्ना हजारे के आंदोलन ने जब कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाना शुरू किया तो मायावती ने राहुल गांधी से हुए नुकसान की कसर पूरी कर डाली। उन्होंने अपने प्रदेश में अन्ना हजारे के समर्थन में प्रदर्शन करने की पूरी छूट दे डाली। आमतौर पर वे आंदोलनों पर लाठीचार्ज करने और उसे कुचलने के लिए जानी जाती हैं। उनकी कोशिश उन सवर्ण मतदाताओं को खुश करने की थी जो बसपा से जुड़े हैं और अन्ना के समर्थक हो गए थे। लेकिन जब उन्होंने देखा कि अन्ना आंदोलन से उनका अपना दलित मतदाता बिदक रहा है और मोहल्लों में संविधान रक्षा समितियां बन रही हैं तो उन्होंने आंदोलनकारियों को चेतावनी भी दे डाली। यानी विकीलीक्स ने अमेरिकी राजनयिकों के माध्यम से मायावती को जितना समझा है वह नाकाफी है। मायावती भले लिखा हुआ भाषण पढ़ती हों लेकिन वे लिखी हुई बातो को छोड़कर आगे निकलने की सामथ्र्य रखती हैं। वे भले अपने विरोधियों के लिए कटु हो जाती हों, लेकिन चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के साथ उनकी राजनीति न तो पहले जसी अड़ियल है न ही उनका व्यक्तित्व। वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए किसानों को ज्यादा मुआवजा देने का भी एलान कर डालती हैं और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का भी समर्थन कर डालती हैं। गौर करने लायक है कि 2008 के परमाणु करार के बाद जिस रिश्वत कांड के कारण समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी के साथ भारतीय जनता पार्टी बदनामी की दाग ओढ़े हुए है उसमें बहन जी और उनकी पार्टी यूपीए के खिलाफ वामपंथी मोर्चे के साथ खड़ी थी। वाममोर्चा ने तो उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना ही दिया था। मायावती की सबसे बड़ी कमी यह है कि उनके पास किसी बड़ी राजनीतिक दृष्टि या सिद्धांत का अभाव है। लेकिन उनकी खूबी यह है कि वे सत्ता की चाभी यानी गुरुकिल्ली पाना और उसका इस्तेमाल करना जानती हैं। वे बाबा साहेब आंबेडकर का सिद्धांत रटने में लगी होतीं तो वहीं पड़ी होतीं जहां आज महाराष्ट्र और कर्नाटक के तमाम दलित पैंथर आंदोलनकारी। वे व्यावहारिक हैं और महत्वाकांक्षा के लिए सपा, भाजपा, कम्युनिस्ट और कांग्रेस किसी से भी समजौता कर सकती हैं। वे अपनी छवि के प्रति उतनी लापरवाह भी नहीं हैं जितना बताया जाता है। एक बेहतर छवि को पाने और सत्ता के शिखर तक पहुंचने के लिए वे कोई भी समझौता कर सकती हैं किसी से भी किनारा कर सकती हैं। इससे उनके और उनके मतदाताओं के किसी सिद्धांत पर आंच नहीं आती। पर यहीं पर वह नव जनवादी क्रांति खो जाती है जिसकी उम्मीद तमाम सिद्धांतकार दलितों से करते रहे हैं।

Wednesday, September 14, 2011

पाखंड है हिंदी दिवस मानना- अशोक वाजपेयी

प्रत्येक वर्ष हिन्दी दिवस सरकारी उत्सव के रूप में मनाया जाता है। प्रस्तुत है हिन्दी दिवस और उसकी स्थिति पर वरिष्ठ साहित्यकारों की बातचीत-

अशोक वाजपेयी-(कवि, आलोचक)

भारत में हिन्दी के नाम पर लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। ऐसे हिन्दी दिवस मनाना किसी पाखंड से कम नहीं है। हिन्दी सिनेमा, मीडिया और बाजार से बढ़ रही है। यदि मनाना ही है तो हिन्दी प्रदेशों में मातृभाषा दिवस मनाएं या भारतीय भाषा दिवस मनाया जाना चाहिए।

नित्यानंद तिवारी-(आलोचक)

हिन्दी दिवस सरकार का आनुष्ठानिक व्यापार बन गया है। इस व्यापार को बदलने की जरूरत है। सरकार का राजभाषा विभाग है, जो तरह-तरह की योजनाएं चलाता है। हिन्दी के विकास के लिए दूसरी तरफ सरकार का ही ज्ञान आयोग है, जिसमें एक सदस्य को हिन्दी में बोलने के बाद माफी मांगनी पड़ी। यह विरोधाभास है। ऐसा लगता है कि राममनोहर लोहिया के बाद भारतीय भाषाओं के आंदोलन की बात पुरानी पड़ गई है। अब हमें औपनिवेशिक मानसिक ढांचे को तोड़ने की जरूरत है। बिना इसके भारतीय भाषाएं महत्व नहीं पा सकती। यदि प्राथमिक कक्षाओं में हिन्दी की स्थिति सुधरती है यह हिन्दी के विकास के लिए शुभ संकेत है।

रामशरण जोशी-(साहित्यकार)

सवाल हिन्दी दिवस की प्रासंगिकता या अप्रासंगिकता का नहीं है। मूल प्रश्न यह है कि हिन्दी को हम किस तरह से देखते हैं। हिन्दी दिवस के ऐसे आयोजन औपचारिकता मात्र होते हैं। लेकिन ऐसे दिवस के मौके पर हमें आत्मविवेचन का अवसर भी मिलता है। ऐसे में इन आयोजनों का तात्कालिक महत्व तो है। मेरा मानना है कि आजादी के बाद हिन्दी का विस्तार हुआ है। यह हिन्दी के लिए उत्सव का काल है विलाप का नहीं। मैं हिन्दी को राष्ट्रीय अस्मिता के नाम पर देखता हूं।

अर्चना वर्मा-(साहित्यकार)

हम हिन्दी के विकास के लिए इसे केवल दिवस के रूप में नहीं देख सकते। लेकिन कोई एक दिन तो है जिसे हम हिन्दी दिवस के रूप में याद करते हैं। लेकिन यह विडंबना है कि फिर हम उसे भूल जाते हैं। लेकिन इससे हिन्दी को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। हाल के आए आंकड़े बताते हैं कि एक बड़ी आबादी है जिसकी शिक्षा हिन्दी में हो रही है। हिन्दी संपर्क की भाषा तो बहुत पहले से है लेकिन अब यह बाजार की भाषा भी बन रही है। ऐसे में हम अब हिन्दी को नकार नहीं सकते। पहले के मुकाबले अब हिन्दी में अंधकार की स्थिति नहीं है। लेकिन यह जरूर है कि हिन्दी बोलने वालों के साथ अभी आत्मविश्वास नहीं जुड़ा है। ऐसा इसलिए भी है कि भारत काफी समय तक गुलाम रहा है और गुलाम हमेशा अपने मालिक की तरह बनना चाहता है।

Friday, August 19, 2011

लोकपाल क्रांति के भावी पंद्रह दिन

अरुण कुमार त्रिपाठी

अगले पंद्रह दिन भारतीय राजनीति में जनलोकपाल क्रांति के रूप में दर्ज होने जा रहे हैं। इस दौरान जनता की जागरूकता का स्तर बढ़ेगा और उसका क्रांतिकरण तेज होगा। दूसरी तरफ जनता से भयभीत जनप्रतिनिधि और उन्हें शरण देने वाली लोकतांत्रिक संस्थाएं अपने भीतर बेचैनी महसूस करेंगी। उन पर बदलने या टूटने का दबाव होगा। यह हमारे लोकतांत्रिक पूंजीवाद में बदलाव और उथल पुथल का दौर है। देखना है एक गांधीवादी आंदोलन की नैतिक ताकत से देश बेहतर भविष्य की ओर जाता है या फिर उस पर कोई अशुभ दृष्टि पड़ जाती है।
अगले पंद्रह दिन भारतीय राजनीति के लिए बड़े अहम होने जा रहे हैं। इस दौरान अन्ना हजारे, उनके साथियों और उनके साथ बाकी देश ने जनलोकपाल का जो सुंदर सपना देखा है वह साकार भी हो सकता है या देश भारी राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर सकता है। इससे कोई दमनकारी व्यवस्था भी निकल सकती है। कें्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम और उनके मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने अन्ना हजारे और उनके साथियों को रामलीला मैदान में पंद्रह दिन की इजाजत देकर अपना संकट टालना चाहा है। लेकिन लगता नहीं कि वह टला है। अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन डा मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चल रही यूपीए सरकार के सिर पर चक्र की तरह मंडरा रहा है और या तो वह उससे अपना काम करवा लेगा या उसको जाने के लिए मजबूर कर देगा।
यह पं्रह दिन अंग्रेजी में कानूनी बातें करने के नहीं, जनता की भाषा में राजनीतिक संवाद करने के होंगे। जो करेगा वही आगे टिकेगा। कांग्रेस के लिए यह गंभीर चुनौती का दौर है। क्योंकि उसका धर्मनिरपेक्षता का एजेंडा पीछे चला गया है। राहुल गांधी का किसान आंदोलन का एजेंडा अन्ना के आंदोलन में समाहित हो गया है। रहे मनमोहन सिंह तो क्या वे युवाओं को एक सुरक्षित भविष्य का आश्वासन दे पाएंगे?
इस दौरान राजनीतिक प्रणाली पर नए सिरे से बहस खड़ी हो सकती है और अगर संसद उस बहस को सार्थक और समर्थ ढंग से नहीं उठा सकती तो उसे अपने नए स्वरूप के लिए तैयारी करनी होगी। इस दौरान जन प्रतिनिधियों और नौकरशाही के चरित्र पर भी बहस होगी और एक नए किस्म का जनमत बनेगा। वह जनमत आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र की दिशा निर्धारित करेगा। लेकिन उससे भी आगे जाकर यह पं्रह दिन भारतीय राजनीति में नए तरह का ध्रुवीकरण पैदा करने वाले हो सकते हैं। उसमें यूपीए के घटक दल कोई नया रुख ले सकते हैं और फिर किसी तीसरे मोर्चे के गठन की सुगबुगाहट हो सकती है। जाहिर सी बात है कि यह समय विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के लिए सर्वाधिक अनुकूल है। लेकिन उसे संसदीय बहसों में कौशल दिखाने के बजाय जमीन पर भी निष्ठा और पारदर्शिता दिखानी होगी। उसे कई राज्यों में बैठे अपने भ्रष्ट नेताओं के भविष्य पर भी सोचना होगा। कल्पनाशील नेतृत्व पैदा करना होगा और जनता की नब्ज पर अन्ना हजारे की तरह हाथ रखना होगा? क्या वह रख पाएगी? अगर नहीं तो वह तमाशबीन बनकर रह जाएगी।
अन्ना हजारे के आंदोलन के पहले चरण की समाप्ति पर तमाम समाजवादी और वामपंथी बुद्धिजीवी और कार्यकर्ता इसे सरकार और आंदोलन की सांठगांठ बता रहे थे। उनका मानना था कि यह आंदोलन सरकार ने ही आयोजित करवाया है और इसीलिए सरकार के मंत्रियों ने स्वयं अन्ना हजारे से मिलकर समझौता किया और लोकपाल मसौदा समिति का गठन कर डाला। लेकिन वह गलतफहमी जल्दी ही खत्म हो गई जब उस समिति में शामिल सदस्यों के खिलाफ फर्जी सीडी जारी होने लगी और कांग्रेस के प्रवक्ता द्वेषपूर्ण बयान देने लगे। पर इससे मिलीभगत का आरोप समाप्त हो गया। फिर भी अन्ना से चिढ़े तमाम आंदोलनकारी यह आरोप लगाते रहे कि वे तो कायर हैं। अनशन तो हर कोई कर लेगा। गिरफ्तारी करके तो दिखाएं। इस बीच भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में योग गुरु बाबा रामदेव का दुखांत प्रहसन भी उपस्थित हो गया। अन्ना हजारे ने अपनी नैतिक शक्ति से बार-बार सरकार को ललकारा और रामदेव प्रसंग से सबक भी लिया और ताकत भी।
लेकिन अन्ना और उनके साथियों ने सबसे ज्यादा राजनीतिक परिपक्वता का परिचय स्वतंत्रता दिवस और 16 अगस्त को दिया। स्वतंत्रता दिवस पर अन्ना हजारे का संबोधन लाल किले से दिए गए प्रधानमंत्री के संबोधन पर भारी पड़ा। लेकिन उससे भी बड़ी उम्मीद जब दिखी जब अन्ना हजारे ने 16 अगस्त को दिल्ली में पूरे शांत भाव से गिरफ्तारी दी और बाद में तिहाड़ जेल पहुंच कर अपने उन तमाम आलोचकों को खामोश कर दिया जो उन्हें कायर बताते हुए ललकार रहे थे कि वे गिरफ्तारी देकर तो दिखाएं।
दरअसल अन्ना हजारे ने अपनी गिरफ्तारी और बाद में छोड़े जाने के बावजूद तिहाड़ से बाहर निकलने से मना कर एक तरफ सरकार को यह बता दिया कि उन्हें जेल से डर नहीं लगता, दूसरी तरफ अपने समर्थकों के बीच साहस का संचार कर दिया। यही वजह है कि पुलिस की तरफ से छोड़े जाने के बावजूद उनके साथी छत्रसाल स्टेडियम छोड़ने को तैयार नहीं हुए। उधर लोग बढ़-बढ़ कर गिरफ्तारी देते रहे और तिहाड़ जेल के बाहर जमे रहे। एक बार फिर युवाओं में राजनीतिक आंदोलनों का औचित्य सिद्ध हुआ है और वे सत्तर और अस्सी के दशक की तरह सत्ता के भय से मुक्त हो रहे हैं और लोहिया व जेपी की यादें ताजा हो रही हैं।
अन्ना हजारे के इस आंदोलन के पीछे उनके साथियों की तैयारी भी है और बहुत कुछ स्वत:स्फूर्त भी। तैयारी इसलिए कि विधिवत योजना के साथ काम करने वाली संगठित सरकारी व्यवस्था को कोई सोच समझ कर काम करने वाली टीम ही कदम कदम पर मात दे सकती है। अभी तक एेसा ही रहा है। अन्ना ने संयम नहीं खोया है और रामलीला मैदान में बैठने से पहले उन्होंने पुलिस को विधिवत यह हलफनामा दिया है कि अगर कोई भी गड़बड़ी होती है या कानून का उल्लंघन होता है वे उसके लिए जिम्मेदार होंगे।
अब सवाल उठता है कि लोकपाल क्रांति के लिए खड़ा हुआ अन्ना हजारे का यह राष्ट्रव्यापी आंदोलन क्या महज एक विधेयक पास करवा कर शांत हो जाएगा? क्या इतने बड़े राष्ट्रीय जन उभार को परिवर्तनकारी एेसे ही व्यर्थ जाने देंगे? क्या वे इससे परिवर्तन का कोई बड़ा कार्यक्रम तय नहीं करेंगे? अव्वल में तो इतनी जल्दी उम्मीद नहीं है, लेकिन अगर सरकार प्रधानमंत्री को उसके दायरे में लाने को तैयार हो गई तो यह उनकी बड़ी जीत होगी, पर क्या इतनी जीत से वे संतुष्ट हो जाएंगे? हो भी सकते हैं और नहीं भी। अन्ना हजारे के आंदोलन में जिस तरह के लोग हैं और जिस तरह के लोग जुड़ रहे हैं वे उसके स्वरूप को लगातार व्यापक बना सकते हैं। मेधा पाटकर का आना आदिवासी और विस्थापन के सवाल को गंभीरता के साथ इस आंदोलन से जोड़ेगा। मेधा आएंगी तो उनके साथ जनांदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय भी सक्रिय होगा। जाहिर सी बात है कि इस आंदोलन में गांधीवादी, संघ से जुड़े राष्ट्रवादी, रेडिकल वामपंथी और आदिवासी और किसान भी जुड़ रहे हैं और वे इसके दायरे को व्यापक बना सकते हैं। शांति भूषण, प्रशांत भूषण और मेधा पाटकर इसके एजेंडे में जन प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का कार्यक्रम भी शामिल करवाना चाहते हैं। वे जनोन्मुखी भूमि अधिग्रहण नीतियों तक ही सीमित नहीं रहेंगे बल्कि जल, जंगल, जमीन के बारे में कुछ ठोस नीतियों की भी मांग करेंगे।
लेकिन इस आंदोलन से जिस तरह से विभिन्न राज्यों, गावों और शहरों के युवा और हर उम्र के नागरिक जुड़ रहे हैं उससे साफ है कि इसमें राष्ट्रीय ही नहीं स्थानीय एजेंडा भी रहेगा। स्थानीय एजेंडे के मद्देनजर ही जनलोकपाल बिल के साथ ही लोकायुक्त की संस्था बनाने की मांग चल रही है। यह आंदोलन दिल्ली की भ्रष्ट केन्द्रीय सरकार पर तो भारी पड़ ही सकता है राज्य की भ्रष्ट सरकारों के लिए भी दिक्कत खड़ी कर सकता है। इस आंदोलन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसे अहिंसक बनाए रखने की है। दूसरी बड़ी चुनौती इसे जाति और धर्म के आधार पर विभाजित होने से रोकने की है। अगले पंद्रह दिन विघ्नसंतोषी शक्तियां सक्रिय हो सकती हैं। अगर प्रतिक्रांति की ताकतों को रोका जा सका तो निश्चित तौर पर यह कारवां क्रांति की ओर जा रहा है।

Sunday, August 14, 2011

दुर्भाग्यपूर्ण है देश में है शिक्षा की दोहरी प्रणाली


आजादी के 64 सालों के बाद एक बार फिर लोगों के सामने मूल्यांकन का प्रश्न है। नई आर्थिक शक्ति के रूप में उभरे इस देश में अभी बुनियादी जरूरतों में सुधार की गुंजाइश बाकी है। ऐसी ही बुनियादी जरूरत हमारी शिक्षा है। आजादी के बाद शिक्षा की स्थिति पर प्रसिद्ध चिंतक पुष्पेश पंत का कहना है कि भले ही आजादी को 64 साल हो गए हों लेकिन इसके बाद भी शिक्षा की स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। देश में शिक्षा की स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। यहां पूरी तरह से दोहरी प्रणाली है। एक अमीर आदमी के लिए शिक्षा और दूसरा गरीब आदमी के लिए शिक्षा। आम आदमी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाता है जिसकी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। कुछ साधन संपन्न लोग ही अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिला पा रहे हैं। हमारे देश का दुर्भाग्य यह है कि हमारे यहां कपिल सिब्बल जसे मंत्री हैं जिन्होंने विदेश में शिक्षा ग्रहण की है और उनको भारतीय शिक्षा प्रणाली की समझ ही नहीं है। मैं शिक्षा के स्तर में गिरावट के लिए आरक्षण की गलत नीतियों को भी दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूं। क्योंकि हमारे यहां मेरिट और आरक्षण में बिल्कुल संतुलन नहीं है और यह किसी भी हालत में शिक्षा के लिए घातक है। जब शिक्षा की बात होती है तो हमारे यहां लोग केवल उच्च शिक्षा, आईआईटी, आईआईएम की बात करते हैं लेकिन जब तक शिक्षा में वर्ण व्यवस्था रहेगी तब तक इसमें कोई सुधार की गुंजाइश नहीं है।
साहित्यकार और प्राध्यापक सुधीश पचौरी का कहना है कि मैं आजादी के बाद शिक्षा की स्थिति को सकारात्मक रूप से देखता हूं। मेरा मानना है कि हमारा देश अभी विकासशील देश है। हमारे यहां गुणात्मक सुधार भी हो रहे हैं। आज दिल्ली विश्वविद्यालय की रैंकिंग विश्व में 300वीं है देश में यह पहले स्थान पर है। इसने जेएनयू को भी पीछे छोड़ दिया है। लेकि न प्राथमिक स्तर पर सरकारी स्कूलों की स्थिति अच्छी नहीं है क्योंकि वहां राज्यों का संरक्षण नहीं है। अब शिक्षा के नए आयाम उभर रहे हैं। पुरानी युनिवर्सिटियों का क्षय हो रहा है। एक जमाने में स्कूलों की संख्या कम थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। मैं आरक्षण की प्रणाली को भी गलत नहीं ठहराता क्योंकि वंचित वर्ग के लिए भी तो लोगों को आगे आना चाहिए। आरक्षण के उचित परिणाम आए हैं। लेकिन मैं फिर कहना चाहता हूं कि इसका एक आधार आर्थिक भी हो। राज्यों को उच्च शिक्षा पर भी ध्यान देना चाहिए। आज उच्च शिक्षा में 85 प्रतिशत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग खर्च कर रहा है और राज्य मात्र 15 प्रतिशत ऐसे में शिक्षा पर राज्य को अपने खर्च अधिक करने होंगे। मुङो लगता है कि शिक्षा का जितना नुकसान कॉरपोरेट हाउसों ने नहीं किया है उससे अधिक राजनीतिक हस्तक्षेप ने किया है। विश्वविद्यालयों को स्वायत्त किए जाने की जरूरत है।


अपनी पुरानी शान में दिखेगा राय पिथोरा

भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा एक बार फिर दिल्ली को उसकी पुराने रौनक में लाने के लिए वह विभिन्न ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण कर रहा है। पुरातत्व विभाग राय पिथौरा के किले संरक्षित करके पुन: उसकी शान वापस दिलाने की कोशिश कर रहा है। 1150 में इस किले को चौहानों ने तोमरों को हराकर इस पर कब्जा कर लिया था लेकिन ऐसा कहा जाता है कि कुतुबु्ीन ऐबक चौहानों को हराकर 1192 में ‘किला राय पिथौरा पर अधिकार कर लिया और इसे अपनी राजधानी बनाया। कभी इसा किले के 13 द्वार थे, जिसमें बरका,हौजरानी,और बायूं द्वार अब भी मौजू हैं। पुरातत्व विभाग इसकी साफ सफाई और खुदाई कर इसकी रौनक वापस लाने का भरपूर प्रयास कर रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के दिल्ली सर्किल के अधीक्षण पुरातत्वविद मोहम्मद केके ने बताया कि इस किले का अपना ऐतिहासिक महत्व है। हालांकि दीवारों के अलावा इसका अन्य अवशेष दिखाई नहीं दे रहा है। यह दीवार लगभग 2 किमी लम्बी है। इसके संरक्षण का काम 2008 से चल रहा था हालांकि अब भी इसमें काफी काम करना बाकी है। इसके संरक्षण में लगभग एक करोड़ की लागत आई है।
इसके ऐतिहासिक महत्व के बारे में भारतीय पुरात् र्सेक्षण के शेिषज्ञोई डी शर्मा के अनुसार, बारहीं सी में शाकंभरी के चौहान शासक ग्रिहराज चतुर्थ ने तोमरों से ल्लिी छीन ली और उसके पौत्र पृथ्ीराज तृतीय ने लालकोट का स्तिार किया। यह स्तिारित नगर ही ‘किला राय पिथौराज् के रूप में लोकप्रिय हुआ, जो ल्लिी के सात नगरों में से एक है। इसे पृथ्ीराज राय पिथौरा के नाम से भी जाना जाता था। भारतीय पुरातत्व विभाग के एक अधिकारी से प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्खनन में पता चलता है कि प्रारंभिक किला योजनानुसार आयताकार था और पश्चिम की तरफ पत्थर से बनी इसकी ऊंचीीारें थी। प्राचीरों के बाहर खाई थी, जो अब कुछ ही जगह शेष है। पत्थरों से बनीीारें ढाई से तीन मीटर तक मोटी है।



कुंजुम, एक अनूठा अंजुमन



रवीन्द्र त्रिपाठी


दिल्ली का हौ़ज खास विलेज अब गांव नहीं है। दिल्ली के कई दूसरे विलेज की तरह एक बेहद आधुनिक , बल्कि उत्तर-आधुनिक जगह हैं जहां के पार्क में आप शाम को प्रवचन के रूप में राम कथा भी सुन सकते हैं और अत्याधुनिक फैशन और कला के दर्शन भी कर सकते हैं। इसी हौज खास विलेज में कुंजुम कैफे है जो अपने तरह की अनोखी जगह है। यहां आप दिन भर बैठे रह सकते हैं और कोई आपसे कहने नहीं आएगा कि बहुत हो गया, अब उठ जाइए।
यहां आप कॉफी पी सकते हैं और कोई आपसे पैसा मांगने नहीं आएगा। और काफी भी पुराने कॉफी हाफस वाली बेस्वाद नहीं। बेहद स्वादिस्ट ब्लैक कॉफी बिस्कुट के साथ। हां बाहर निकलते समय़ एक पेटी में आप अपनी श्रद्धा के मुताबिक जितना पैसा डालना चाहे डाल सकते हैं।
आप दिल्ली के बियाबान में अकेले हैं तो यहां बैठे किसी शख्स से दोस्ती भी गांठ सकते हैं। या अपने दोस्तों के साथ यहां दिन भर बैठकर किसी मसले पर बात भी कर सकते हैं, पेंटिग या स्केचिंग भी।
शनिवार के लगभग साढे बारह बजे हैं और मैं कुजुम कैफे में प्रवेश करती हूं। चार पांच लोग ही हैं। मैं कुजुंम कैफे की शुरुआत करनेवाले अजय जैन से मिलना चाहता हू। मालूम होता है वो विदेश में हैं और कई दिनों के बाद आएंगे। लेकिन उनकी एक सहयोगी श्रुति से मुलाकात होती है। वे कुंजुम कैफ के बारे में थोड़ा सा बताती हैं और कुछ जानकारियां ईमेल करने के कहती हैं। मैं एक मोढे पर बैठ जाता हूं और किताबें पलटने लगता हूं। लकड़ी के कुछ रैक बने हैं जिनपर कुछ किताबें और पुरानी पत्रिकाएं पड़ी हैं। ज्यादातर किताबें और पत्रिकाएं यात्रा से संबंधित हैं। अजय जैन खुद भी एक यात्रा-लेखक हैं। जून 2010 में उन्होंने कुंजुम कैफे शुरू किया था। एक औपचारिक कैफे की परिकल्कना उनके मन में थी जहां किसी तरह का दबाव और तनाव न हो। जहां यात्राओं में रुचि रखने वाले लोग आपस में बतिया सकें और जानकारियां ले-दे सकें।
बहरहाल मोढ़े पर बैठे बैठे मैं फोटोग्राफी की एक किताब उठा लेता हूं। ये होमाई व्यारवाला नाम की महिला फोटोग्राफर पर आधारित है। होमाई भारत की पहली महिला फोटोग्राफर हैं जिनको बाजाप्ता सरकारी मान्यता मिली हुई थी। भारत की आजादी की लड़ाई और आजाद भारत के कई ऐसे फोटोग्राफ उनके लिए हैं जो अब लोकस्मृति के हिस्सा बन गए है।. खासकक पंडित जवाहर लाल नेहरू ऐसे फोटो उन्होंने लिए जो इतने आम फहम हो गए हैं कि किसी को याद नही कि वे किसके लिए हुए हैं। किताब पर हल्की नजर मारते हुए पाता हूं कि उनको इसका बात का गहरा दुख रहा कि 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिरला मंदिर में मौजूद होते हुए भी वे उनकी हत्या की तस्वीर नहीं ले पाईं जबकि उस दौरान वे हर रोज बापू के फोटो खींचतीं थीं। लेकिन 30 जनवरी 1948 को उनका मूड ऐसा हुआ कि वे फोटो नही ले सकीं। होमाई पारसी समुदाय से ताल्लुक रखती थीं और गुजरात के नवसारी मै पैदा हुई थीं। हेनरी कार्तिए ब्रेसों और मार्गरेट बोर्के ह्वाइट की तरह होमाई भी फोटोग्राफी को कलात्मक बुलंदी तक ले गईं।
संयोग से मार्गरेट भी महिला फोटोग्राफर ही थीं। होनाई की जीवन की कहानी बड़ी रोमांचक है। अपने आखिरी वर्षो में वे दिल्ली छोड़कर चली गईं और गुमनाम सी रहीं।
कुजुंम कैफे की दीवारों को बड़े अच्छे फोटोटोग्राफ लगे हैं। बाघ और हाथी के नेचर फोटोग्राफ्स के साथ साथ आम जिंदगी के कई लम्हें यहां कैद हैं। आप इन्हें खरीद भी सकते हैं। शायद उनकी कमाई का एक यही जरिया है। हालांकि यह अनुमान ही है। श्रुति से यह बात मैं पूछता नहीं हूं। अजय जैन होते तो पूछता। फिलहाल जानकारी के लिए बता दिया जाए कि अगर आपकी फोटोग्राफी में रुचि हैं तो कुंजुम कैफे की तरफ आपको ऐसे मेंटर मिल सकते हैं जो आपको बेहतर फोटोग्राफर बनने के गुर दे सकें। हां, इसकी फीस होती है। यही नहीं अगर आप लेखक बनना चाहते तो भी कुजुंम कैफे की सेवाएं आपके लिए हैं। सिर्फ लिखने के लिए नहीं बल्कि अपनी किताब प्रकाशित करने के लिए भी। अजय जैन ने खुद भी अपनी एक यात्रा किताब लिखी और प्रकाशित की है। नाम है- `पीप पीप डोंट स्लीप’
कुंजुंम कैफे में अकेले बैठे लोग अक्सर अपने लैपटॉप पर काम करते दिखते हैं। यहां वाई फाई की सुविधा भी है। एक बीस-बाईस साल के एक नौजवान को मैं अपने लैपट़ॉप पर काम करते देखता हूं। मैं नौजवान के करीब जाता हूं और नाम पूछता हैं। पता चला वे गौरव चौहान हैं और पीतमपुरा में रहते हैं। यानी हॉजखास विलेज से लगभग बीस-पचीस किलोमीटर दूर से यहां आए हैं। वे महीने में एक दिन यहां जरूर आते हैं। गौरव भी यात्रा में काफी रुचि रखते हैं। वे खुद यात्रा का व्यवसाय शुरु करना चाहते हैं। गौरव बताते हैं कि इस समय भारत में यात्रा का व्यवसाय हर साल दस फीसदी के हिसाब से बढ़ रहा है लेकिन एडवेंचर स्पोर्ट्स का व्यवसाय पचीस फीसदी के हिसाब से बढ़ रहा है। स्कूबा डाइविंग और ट्रैकिंग जैसे ए़डवेंचर स्पोर्ट्स युवकों में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। कई ट्रैवल एजेंसी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। गौरव अपना ब्लॉग शुरू करने जा रहे हैं जिसमें एडवेंचर स्पोर्ट्स के बारे में जानकारियां दी जाएंगी।
अब आप पूछेंगे कि कुंजुम कैफे नाम कैसे पड़ा। तो आपको बता दें कि हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्फीति वाले इलाके में कुंजुम नाम की एक घाटी है। उसी से यह नाम लिया गया है। वहां से चलते हुए मैं `पीप पीप डोंट स्लीप’ की एक प्रति खरीदता हूं।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

Tuesday, August 9, 2011

नहीं रहा ध्रूपद का धुरंधर


अभिनव उपाध्याय
अद्भुत आलाप की शक्ति, सहजता एंv पारंपरिक बंदिशों से शास्त्रीय गायक उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर किसी परिचय के मोहताज नहीं थे। गुरुवार 27 जुलाई को उनका देहावसान हो गया। संगीत मर्मज्ञों का मानना है कि उनकी मृत्यु से शास्त्रीय संगीत जगत को गहरी क्षति पहुंची है।
अलर, राजस्थान में 1927 में जन्में उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर ध्रुपद संगीतज्ञों के प्रतिष्ठित घराने से ताल्लुक रखते थे। संगीत में उनकी प्रारंभिक दीक्षा अपने प्रसिद्घ पिता उस्ताद अल्लाबंदे रहीमुद्दीन खान डागर से हुई, आगे चलकर उस्ताद नसीरूद्दीन डागर, इमामुद्दीन डागर एं हुसैनुद्दीन डागर के संरक्षण में प्रशिक्षित हुए थे। उन्होंने जियाउद्दीन खान डागर से र्रूीणा मे प्रशिक्षण भी प्राप्त किया था।
ध्रुपद के महान गुरूओं के बीच उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर अपने आलाप की शक्ति, सहजता एं पारंपरिक बंदिशों के समृद्घ संग्रहण के कारण जाने गए, जिनमे से कुछ बारहीं एं तेरहीं शताब्दियों की हैं। संगीत साधना के सुदीर्घ जीन में े अपने राग-स्तिार एं लय-ताल पर प्रीणता उनमें अदभुत थी।
आल इंडिया रेडियो एं दूरदर्शन के नैत्यिक कलाकार रहें उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर ने देश के अलावा विदेशी आयोजनों में भी अपनी अमिट छाप छोड़ देने वाली प्रस्तुतियां दीं।
एक प्राध्यापक के रूप में उस्ताद जी ने रीन््र भारती श्ििद्यालय, कोलकाता में अध्यापन भी किया। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन््र ने उनकी कला पर शिष्ट प्रलेखन भी तैयार किया। उनके बारे में शास्त्रीय संगीत के बनारस घराने के प्रसिद्ध गायक पंडित राजन मिश्र का कहना है कि उनका न रहने से शास्त्रीय संगीत जगत में एक परंपरा का अवसान हो गया है। मैं इसे अपनी व्यक्तिगत क्षति भी मानता हूं। हमसे उनका बहुत प्रेम था हमने कई बार साथ-साथ अपनी प्रस्तुतियां दी। सही मायने में ध्रुपद का अंदाज उनके पास था। उनका निधन ध्रुपद के एक महान स्तंभ का समाप्त हो जाना है। अब उनके सिखाए गए लोगों की यह जिम्मेदारी है कि वह उनकी परंपरा को आगे बढ़ाएं।
अपनी उत्कृष्ट संगीतज्ञता के लिए उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर र्ष 1993 में संगीत नाटक अकादेमी सम्मान, र्ष 1996 में साहित्य कला परिषद् सम्मान, र्ष 2002 में बिहार ध्रुपद रत्न सम्मान, र्ष 2003 में राजस्थान संगीत नाटक अकादेमी सम्मान एं र्ष 2008 में पद्म भूषण से सम्मानित किये गये। हिन्दुस्तानी संगीत में उल्लेखनीय योगदान के लिए इस र्ष उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर को संगीत नाटक अकादेमी का रत्न सदस्य चुना गया। संगीत नाटक अकादेमी की उपाध्यक्ष शांता सरबजीत ¨सह का मानना है कि डागर साहब ने ध्रुपद की अनगिनत पीढ़ियों की परंपरा को न केवल जीवित रखा बल्कि बतौर एक धरोहर उन्होने हमें सौंपा। उनके निधन से भारतीय शास्त्रीय गायकी को गहरी क्षति पहुंची है।
प्रसिद्ध संतूर वादक पं भजन सोपोरी उनसे आत्मिय लगाव था उनका कहना है कि संतूर वादक पं भजन सोपोरी का कहना है कि डागर साहब में जो लगन 50-60 के दशक में थी उसी लगन,तालीम के साथ उसी सिद्धता को उन्होने बरकरार रखा। उन्होने एक शैली के साथ राग की ऐतिहासिकता पर काम किया। वह एक ही थे जो ध्रुपद के महान फनकार थे। मुङो याद है पिछले वर्ष नवंबर में हमारा उनके साथ बनारस में अंतिम कंसर्ट था। उनका न होना एक बड़ी क्षति है।
लेखक संगीतज्ञ पं विजय शंकर मिश्र का कहना है कि उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर ने न केवल अपनी परंपरा के सर्वाधिक विद्वान व श्रेष्ठ कलाकार थे। ध्रूपद के वह सबसे महत्वपूर्ण कलाकार थे। वह स्वामी हरिदास की परंपरा से जोड़ते थे और अपने नाम के साथ डागर लिखते थे। मुसलमान होते हुए भी उन्हे संस्कृत सहित अन्य भाषाओं का ज्ञान था वह धारा प्रवाह संस्कृत के श्लोक बोलते थे। गंगा जमुनी तहजीब के भी वह जबरदस्त हिमायती थे। उनका शुरूआती जीवन संघर्षमय रहा लेकिन कभी भारत छोड़कर विदेश जाना पसंद नहीं किए। उनको भारत से गहरा लगाव था।








Thursday, July 14, 2011

किसान के सम्मान में समाधान

अरुण कुमार त्रिपाठी

उदारीकरण के साथ पैदा हुई गांव और खेती की समस्या विश्वव्यापी है। मायावती के राज्य में होने वाला टकराव उसका एक स्थानीय रूप है। वह पूरे देश में किसी न किसी रूप में चल रहा है। मायावती इस वैश्विक पूंजीवाद की समस्या को अपनी स्थानीय राजनीतिक जरूरत और दलितवाद के आधे अधूरे दर्शन से हल करना चाहती हैं। जबकि कांग्रेस अपनी ही सरकार के खिलाफ विपक्ष की भूमिका निभा कर । प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून भी किसानों को ध्यान में रख नहीं उन परियोजनाओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है जो शुरू होने का इंतजार कर रही हैं। इसलिए इस समस्या का हल किसान की तरफ से खोजने पर ही निकलेगा।

पश्चिम बंगाल के सिंगुर और नंदीग्राम से लेकर दिल्ली के आसपास के उत्तर प्रदेश के इलाकों में मची ग्रामीण अशांति का एक ही समाधान है। वह है किसान और खेती का सम्मान। जिस तरह महाभारत में भीष्म ने कहा है कि जंगल बचाना है तो सिंह को बचाओ उसी तरह से कहा जा सकता है कि ग्रामीण इलाकों की अशांति मिटानी है तो किसानों को सम्मान दो। जंगल में तमाम जीव होते हैं लेकिन उनके कें्र में सिंह ही होता है, वैसे ही ग्रामीण जीवन में तमाम तरह के व्यवसायों के बीच खेती एक प्रमुख व्यवसाय है और किसान उसका मुख्य कर्ताधर्ता। उसकी उपेक्षा कर ग्रामीण जीवन में शांति कायम नहीं की जा सकती। यह गलती पूंजीवाद भी करता है और यही गलती मार्क्सवाद भी करता है। इसीलिए दोनों को दिक्कत पेश आती है। वे अपनी पूंजी और विचार के अहंकार में उसके महत्व को भूल जाते हैं और नतीजतन वे अपने ही समाज से लड़ने लगते हैं। यही काम उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती अपने दलितवाद के अतिरिक्त आत्मविश्वास में कर रही हैं और उनके लिए इसके बुरे परिणाम के संकेत मिलने लगे हैं।

भूमि अधिग्रहण पर यह चर्चा बहुत जोरों से है कि 1894 के कानून के आधार पर अब काम नहीं किया जा सकता। अब हमें नए कानून की जरूरत है। सवाल उठता है कि उस नए प्रस्तावित कानून का उद्देश्य क्या है? उसका दर्शन क्या है? अगर उसका दर्शन और उद्देश्य वही है जो उन्नीसवीं सदी के कानून का था तो उससे उसी तरह का टकराव पैदा होगा जो पहले होता रहा है। यह बात अलग है कि अंगेजों ने भारत का ज्यादा उद्योगीकरण नहीं किया इसलिए उस पर आज की तरह टकराव नहीं हुआ। उनका मकसद अपने फौजी इस्तेमाल और औपनिवेशिक शोषण के लिए जमीन का अधिग्रहण करना था इसलिए उन्हें ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं थी। लेकिन विकास की नई महत्वाकांक्षा पर सवार आजाद भारत की सरकारों को ज्यादा से ज्यादा उद्योगीकरण की जरूरत और हमारे संसाधनों को ज्यादा से ज्यादा बाजार में लाना है इसलिए उन्हें ज्यादा जमीनें चाहिए और टकराव भी ज्यादा हो रहे हैं।

लेकिन जमीन अधिग्रहण के लिए बना यह कानून जिस सिद्धांत पर आधारित है वह ब्रिटेन का सत्रहवीं सदी का सिद्धांत है। उस सिद्धांत के अनुसार जमीन पर राज्य का अधिकार प्रमुख होता है। इसे इमिनेंट डोमेन का सिद्धांत कहते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य सार्वजनिक हित में किसी की भी जमीन को ले सकता है और उसका जो चाहे वह उपयोग कर सकता है। बदले में राज्य उसे मुआवजा वगैरह देने का एक फार्मूला तय करेगा। ब्रिटेन में अब यह सिद्धांत देशी नहीं विदेशी मामलों पर लागू होता है। जबकि भारत में यह अभी भी अपने कमजोर और असंगठित नागरिकों पर लागू होता आ रहा है। यही वजह है कि इस पर टकराव बढ़ रहा है। जो लोग इस समस्या का हल मुआवजा बढ़ाने को मान रहे हैं वे भी एक दिन महसूस करेंगे कि वह तात्कालिक हल है। जिन राज्यों में बढ़ा हुआ मुआवजा देकर लोगों को बहला-फुसला कर जमीन ले ली जा रही है, वहां लोगों को विरोध और व्रिोह करने से एक ही बात रोक रही है और वह है किसानों का सम्मान। जिस दिन वहां भी किसानों का सम्मान समाप्त हो जाएगा उस दिन वहां भी अशांति आने से रोकी नहीं जा सकती। इसीलिए भारत के पूर्व अनुसूचित जाति जनजाति आयुक्त डा ब्रह्मदेव शर्मा कहते हैं कि कोई सरकार अपने समाज से नहीं लड़ सकती। वह थोड़े दिन उसे घेर जरूर सकती है लेकिन उससे जीत नहीं सकती। हरियाणा में राज्य सरकार ने अभी भी अपने समाज से जंग नहीं छेड़ी है। इसलिए उसकी मुआवजा नीति की सराहना हो रही है। लेकिन जिस दिन वह किसानों का सम्मान छोड़ कर उनसे लड़ने लगेगी उस दिन उसे भी दिक्कतें पेश आएंगी।
उत्तर प्रदेश में मायावती किसानों को ब्लैकमेल कर रही हैं। दरअसल ब्लैकमेल अन्ना हजारे का आंदोलन नहीं था बल्कि ब्लैकमेल मायावती सरकार की नीतियां हैं। वे कभी दमन करती हैं और कभी मुआवजा राशि बढ़ाती हैं। कभी किसानों को अपराधी घोषित कर उन पर इनाम रखती हैं और कभी उन इलाकों में अपने मंत्री भेज कर उन्हें पटाती हैं। वास्तव में उन्होंने सामाजिक न्याय के सिद्धांत के साथ उदारीकरण के सामाजिक अन्याय और दमन के सिद्धांत का घालमेल बना लिया है। वे जाति के सिद्धांत से अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद की समस्या हल करना चाहती हैं। यही उनकी परेशानी की वजह है।
लेकिन यह मामला यूपी तक ही सीमित नहीं है। यह अखिल भारतीय मामला है, बल्कि विश्वव्यापी है। बड़ी परियोजनाओं के लिए जमीनों का अधिग्रहण और उसके विरोध में स्थानीय निवासियों का संघर्ष पूरी दुनिया में चल रहा है और हमारी सरकार को उससे सबक लेते हुए अपनी नीतियों में बदलाव करना चाहिए। लेकिन नीतियों में बदलाव का मतलब यह कतई नहीं है कि महज कानून की धाराएं बदल दी जाएं और इरादा व दर्शन पहले वाला ही रखा जाए। भारत सरकार ढांचागत योजनाओं के विकास के लिए विदेशी निवेशकों का बेसब्री से इंतजार कर रही है। उसका लक्ष्य 11 वीं पंचवर्षीय योजना में 500 अरब डालर और अगले दस सालों में 1.7 खरब अमेरिकी डालर का निवेश आकर्षित करना है। अभी यह लक्ष्य बहुत कम हासिल हुआ है। भारत की ढांचागत परियोजनाओं में विदेशी निवेशकों की भागीदारी महज 8 से 10 प्रतिशत ही है। जाहिर है हमारी सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में जो बदलाव कर रही है वह किसानों के हितों को ध्यान में रखकर नहीं उन्हें जसे तैसे शांत रखने के लिए कर रही है। उसका लक्ष्य उन निवेशकों के लिए रास्ता साफ करना है जो भारत में शुरू हो चुके विकास के एक्सप्रेस वे पर निगाह गड़ाए बैठे हैं। न कि किसानों की समस्या और चिंता को दूर करना है।
यही वजह है कि प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून में निजी हित और कंपनियों के हित के आधार पर सरकार को जमीन अधिग्रहण की और व्यापक छूट दी गई है। उस छूट के अनुसार अगर किसी व्यक्ति के पास परियोजना के लिए 70 प्रतिशत जमीन है तो सरकार उसके लिए बाकी 30 प्रतिशत जमीन का अधिग्रहण कर देगी। स्पष्ट है कि लोगों की राय लिए जाने और उसे ज्यादा महत्व देने और निजी और सार्वजनिक की स्पष्ट व्याख्या किए जाने की जरूरत है। यह साफ किए जाने की जरूरत है कि बहुफसली जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा। पिछले 20 सालों में जितनी जमीन का अधिग्रहण हुआ है उस पर श्वेत पत्र भी जारी किया जाना चाहिए। सरकार को बताना चाहिए कि जितनी जमीन का अधिग्रहण हुआ है उसका क्या उपयोग हो रहा है और वह कैसे सार्वजनिक हित में है। उससे भी बड़ी बात है कि महज राहुल गांधी के दबाव में ही नहीं अपने विवेक के लिहाज से भी सरकारों और नीति निर्माताओं और जनमत बनाने वालों को किसानों की तरफ से सोचना चाहिए। किसान को सम्मान देंगे टकराव अपने आप टल जाएगा।

Friday, June 10, 2011

तुम पर फिदा, हुसैन!



'दोस्तो, कला की दुनिया एक है। हुस्न और फन हर जा मौजूद है। ज़रूरत है बस उस एक नज़र की जो उन्हें जान सके पहचान सके। आप सब जानते हैं कि पेंटिंग मेरी उम्र भर की साधना है। मेरी जिèन्दगी है, फिल्में मेरा पैशन है। मैं, आज वतन से दूर हूं। पर यह कहानी उस शख़्स की है, जिसकी सुबह-ओ-शाम हिंदुस्तानी आस्वाद, रंगों, बुनावट और रूपरेखाओं से रोशन है। खाक -ए-वतन की यही ख़्ाुशबू मेरे सपनों को आज भी मुअत्तनू और गुलज़ार रखती है। मैं अपनी सरज़मीं को झुक कर सलाम करता हूं। मेरी दुनिया वहीं है, जहां आप सब हैं। खाक-ए-वतन का मुझको हर ज़र्रा देवता है।’

ये मकबूल फिदा हुसैन साहब हैं जिन्होंने यह बात दो साल पहले नवंबर 2००9 में कही थी। उनके चौरानबे जन्मदिन पर जिया प्रकाशन ने एक ई-बुक निकाली थी जिसमें एनीमेशन के साथ हुसैन के चित्र और उनकी ज़ुबानी 'कुछ आपबीती, कुछ जगबीती, कुछ गौर-ओ-फिक्र, कुछ जज्बात थ्ो।’ वहां एक पेंटर की आंखों से देखने के लिए उस चित्रकार ने अपना हृदय खोल कर रख दिया था। 'तहरीर तस्वीर बन गयी थी और तस्वीर तहरीर।’ यानी लफ्ज तस्वीरों की तरह और तस्वीरें थीं लफ़्जों के मानिंद।


हुसैन अब नहीं हैं। निस्संदेह वे आधुनिक भारतीय कला के सबसे बड़े और पहचाने जाने वाले नाम थ्ो। कई लोगों की मृत्यु पर रस्मी तौर पर युग बीत जाने की बात कही जाती है पर हुसैन का न रहना निश्चित ही एक युग का अवसान है। यह दुर्भाग्यपूणã है कि हमारा यह सबसे बड़ा कलाकार बरसों से मातृभूमि से बाहर रहा। वे मजाक में अपने को अंतरराष्ट्रीय जिप्सी कहते थ्ो पर कहीं अंदर गहरी टीस थी वतन से दूर होने की। वे अपने को भारतीय मूल का चित्रकार ही कहते रहे। यहां तक कि कतर ने जब उन्हें नागरिकता दी तो एक घोड़े के रेखांकन के ऊपर उन्होंने लिखा : 'मुझ भारतीय मूल के पेंटर, एमएफ हुसैन को 95 साल की उम्र में कतर की नागरिकता का सम्मान दिया गया है।’ एक इंटरव्यू में उन्होंने मंुबई लौट जाने के लिए अपनी तड़प को बताया था।


हुसैन की मशहूरी दुनिया भर में थी। वे शायद सबसे मंहगे पेंटर भी थ्ो। फिल्में भी बनायीं, जिसका उन्हें नशा-सा था। अत्यंत प्रसिद्ध और अति विवादास्पद, वे दोनों ही थे। खबरों में हमेशा बने रहते। कुछेक सदाबहारों में वे अन्यतम थ्ो। वे हमेशा कुछ नया करते रहते, जिसे उनके प्रशंसक 'ख़्ाूब से ख़्ाूबतर की जुस्तजू’ मानते थ्ो। देश की कट्टर हिंदू ब्रिगे्रड को वे फूटी आंखों नहीं सुहाते थ्ो। दरअसल हुसैन साहब कला को जानने-पहचानने की जिस नज़र की बात करते हैं उसका वहां घोर अभाव है। लिहाज़ा उनकी कलाकृतियां नष्ट की जाती रहीं, स्टूडियो, घर पर हमला होता रहा। उनके खिलाफ सैकड़ों मामले दायर कि ये गये। न सरकार ने कुछ किया न उस चैनली मीडिया ने ही कोई दबाव बनाया जो दम भरता है कि अगर वह तब रहा होता तो बाबरी मस्जिद न ढहायी जा पाती। चाहकर भी वे देश नहीं लौट पाए। शायद लंदन में ही उनका अंतिम संस्कार हो। कू-ए-यार में उन्हें भी दो गज जमीं नसीब न हो सक ी।

हुसैन का जीवन उनकी कला की तरह ही सघन और चित्ताकर्षक था। दोनों की दुनिया इतनी विशद है जहां लोगों, घटनाओं का आना-जाना लगा रहता है। शायद इसीलिए वे अवाम के फनकार कहे जाते रहे। उनकी जीवन-कथा बेहद रोमांचक और छैल-छबीली है। इस कदर ठेठ भारतीय और दिलचस्प कि उनकी कही वह अनूठी टिप्पणी याद आती है कि, 'मैं तो अखिल भारतीय सर्कस का रंगीला जोकर हूं।’ जिया प्रकाशन ने जो ई-बुक निकाली थी वह जैसे ज़िन्दगी का सफरनामा है। बदलते वक़्तों का गवाह। इसमें वे उस फनकार की कहानी सुनाते हैं जिसने डेढ़ साल की उम्र में अपनी मां को खो दिया, जो इंदौर की गलियों में ख्ोला और बड़ौदा में पढ़ा। कई बार मोहब्बत करता है और नाकाम होता है। उबरता है और अपने विचारों, कल्पनाओं को कैनवास पर उतारता है। और जब हजारहा मुसीबतों को ठेल कर वह एमएफ हुसैेन के रूप में उभरता है तो दुनिया उसे दिलचस्पी और हैरत से देखने लगती है।

इकतालिस शीर्षकों की इस ई-बुक में हुसैन निखालिस हिंदुस्तानी सुर्ख-स्याह और जीवंत रंगों में नमूदार होते हैं। यहां हुसैन की भाषा अद्भुत असर छोड़ती है। सीधी-सच्ची और विश्वसनीय। वे फे्रमों में सोचते दिखते हैं और छवियों में शब्दोंे को अंकित करते हैं। यहां आप हुसैन को देखते हैं और बहुत कुछ समझ पाते हैं। बचपन की खुशियां। स्कूल से बच्चों का गेंदों की तरह निकलना। मां का चेहरा याद न रहने का दर्द और मदर टेरेसा के ममत्व के विस्तार में उसकी पनाह। पिता की शादी की खुशी। इतना बड़ा होना की दादा की अचकन की जेब तक पहंुचने लगना। दादा की मृत्यु के बाद उसी अचकन को ओढ़कर सोना मानो दादा की गोद में सोये हों। नूर-ए-नज़र बाईसिकिल, जिसके क रियर पर बैठ उसे ऐसे चलाना मानो साइकिल हमारी गोद में है या हम साइकिल की गोद में।ड्राइंग मास्साब ने जब बनाने को कहा तो उनके ब्लैकबोर्ड की चिड़िया ज्यों की त्यों नोटबुक में आ बैठी। नंबर मिले दस में से दस। चाचा की दुकान का हिसाब दिया दस रुपए ओर बैठे-बैठे स्केच बनाये बीस। जमना जिसे पानी भरते देखते, बल्कि दोनों देखते ओर देते एक-दूसरे को दाद-सी। उसे नीच लाल खां दर्जी ने रख्ौल बनाकर तबाह कर दिया। पहली आइल पेंटिंग की, 'सिंहगढ़ फिल्म’ के इस पर्चे को देखकर चचा नाराज पर पिता ने कहा, 'जाओ बेटा ज़िन्दगी को रंग से भर दो।’लोहिया का स्केच बनाया। डाक्टर साहब बेहद खुश। बाहों में भींच लिया और वह भींच ताउम्र ढीली न पड़ी। लेकिन नेहरू का स्केच देखकर लोहियाजी नाराज़। उनसे कहा, 'डाक्टर साहब मार्डन आर्ट बेहद लोकतांत्रिक चीज है। उसकी खूबी यही कि आप उसे अपनी तरह से समझें।’ उन्हीं का मान रखने के लिए बनायीं रामायण पर डेढ़ सौ पेंटिंग। चार पेंटर दोस्त : मड़बड़ोचां का बल छाबड़ा, कपड़कांज का तैयब मेहता, करोलबाग का रामकुमार और गिरयाम पतली गली का गायतोंडे। कभी नहीं भूली इंदौर की वह नदी जिसके एक किनारे गुलेर शाह का मज़ार और दूसरे किनारे पर शिवालय। जिस उम्र में भी पहंुचा वहां तो छुआ जरूर दोनों के बीच बहते जल को। ये थ्ो हमारे हुसैन जिन पर फिदा एक बड़ी दुनिया। फिदा ही नहीं उनकी कृतज्ञ भी बहुत!


मनोहर नायक - लेखक आज समाज अख़बार के स्थानीय संपादक हैं .

Sunday, June 5, 2011

जरूरत समस्या को समझने कि


वर्तमान में बहस के कुछ चर्चित मुद्दों में माओवादियों का मुद्दा प्रमुख है। लेकिन जनमानस का एक बड़ा तबका माओवादियों, नक्सलियों और आदिवासियों की समस्याओं को लेकर भ्रमित है। यही नहीं दिलचस्प तो यह है कि जब भी नक्सलियों की तरफ से कोई कार्रवाई होती है वह संचार माध्यमों के लिए एक बड़ी खबर है। भूमंडलीकरण और उदारीकरण की दौड़ में जहां मुनाफा संबधों को तौलता है वहां भी इनकी खबरों के पाठक बहुत हैं। सवाल यही है आखिर जिसे मीडिया से लेकर सरकार तक लगभग आतंकवादी बताते फिर रहे हैं उन्हे बुद्धिजीवियों का इतना समर्थन क्यों मिल रहा है? निश्चित रूप से सभी बुद्धिजीवी देशद्रोही नहीं हो सकते। माओवादियों, आदिवासियों और नक्सलियों को जानने, समझने और उनके बारे में लोगों की राय से इतर अपनी व्यक्तिगत राय बनाने के लिए वाणी प्रकाशन की त्रैमासिक पत्रिका वर्तिका के अक्टूबर से दिसम्बर 2010 का अंक एक उपयोगी सामग्री साबित हो सकती है। महाश्वेता देवी और अरुण कुमार त्रिपाठी के संपादन में निकलने वाली यह पत्रिका नए विमर्श के साथ मोआवादियों के इतिहास को भी समझने का मौका देता है। पत्रिका संपादकीयमाओ गांधी के देश में गांधी और माओत्से तुंग के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन मात्र नहीं है बल्कि एक वर्तमान परिवेश में उसकी प्रासंगिकता को लेकर भी एक सवाल खड़ा करता है। संपादक अरुण कुमार त्रिपाठी लिखते हैं किनव उदारवाद के खिलाफ लड़ रहे माओवादियों और गांधीवादियों की चिंता तो एक जसी है। पर उनके बीच हिंसा की गहरी खाई है। माओवादी हिंसा छोड़ने को तैयार नहीं हैं और गांधीवादी हिंसा का किसी भी तरह से समर्थन कर नहीं सकते।

महाश्वेता देवी का लेखलाल गढ़ के लिए सरकार जिम्मेदारज् आम जन की आवाज की बुद्धिजीवी द्वारा सही होने का ठप्पा है। इस लेख में लेखिका ने वह सब कह दिया है जो जनता की आवाज थी और चुनाव के बाद परिणाम ने अब वहां कुछ कहने के लिए छोड़ा नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार इरा झा काबस्तर का दर्द तो समझोज् पढ़ कर ऐसा लगता है कि आदिवासियों के जंगल,जमीन और जल को हड़पकर सरकार किस तरह उन्हें बेघर कर रही है। लेखिका यह लेख व्यक्तिगत अनुभवों के कारण और प्रामाणिक और प्रासंगिक हो गया है। आज बस्तर ही नहीं बल्कि और इलाकों के आदिवासी भी अपनी जमीन होने के बावजूद दोयम दर्जे की जिंदगी जी रहे हैं। दंतेवाड़ा पर अरुंधती राय के लेख को केंद्र में रखकर सुनील का लिखा गया लेख केवल वहां की आंतरिक समस्याओं से अवगत कराता है अपितु उसके समाधान की तरफ भी अग्रसित करता है। पत्रिका में बीडी शर्मा का साक्षात्कार कई मुद्दों पर एक साथ प्रहार करता है और यह बताने की कोशिश करता है कि वास्तव में हम एक तरफा शांति की बात नहीं कर सकते। इस पत्रिका का हर लेख जानकारी परक है लेकिन मैं खास दो लोगों की विशेष बात करना चाहूंगा, पहला अनिल चमड़िया के लेखदर्द बढ़ता ही गया और चारु मजूमदार के पुत्र अभिजीत मजूमदार के एक साक्षात्कार का। अनिल चमड़िया बड़ी बेबाकी से इस बात को प्रस्तुत करते हैं कि सरकार किस तरह दबाव में है कि व्यक्ति जब एक अर्थशास्त्री होता है तो उसे नक्सलवाद एक समस्या दिखती है जो असंतोष और अधिकारों के मिलने के कारण है जबकि वही व्यक्ति जब प्रधानमंत्री बनता है तो उसे नक्सलवाद देश के लिए सबसे बड़ा खतरा लगने लगता है। अनिल चमड़िया लिखते हैंनक्सलवादियों को जिन इलाकों में सरकार सबसे सक्रिय बताती है वे कौन से इलाके हैं! जहां देश की आखिरी पंक्ति में खड़ी जमात रहती है। जहां वह रहती है उसके घर के नीचे खनिज संपदा है। प्राकृ तिक संसाधनों से वह भरपूर है। जंगह है। पानी है। लोगों को जीने के अधिकार से वंचित रखा गया है। सरकार उन्हे बंदूकधारी बता रही है।ज् अभिजीत मजूमदार ने आलोक प्रकाश पुतुल से बातचीत में स्वीकार किया है कि ‘..आदिवासियों को हिम्मत दिलाने की जरूरत है उनके लिए लड़ने की जरूरत है और इस दिशा में माओवादी काम कर रहे हैं। लेकिन आज के हिन्दुस्तान में भुखमरी है, बेकारी है। अगर आप इसको मुद्दा नहीं बनाएंगे, आप एक बड़ी आबादी के केवल एक हिस्से को ध्यान में रखेंगे, केवल आदिवासी की बात करेंगे तो आपका आंदोलन ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगा। यह स्वीकारोक्ति यह बयां करती है कि अब मुद्दा बंदूक के बल पर रोटी छीनने का नहीं है।इस पत्रिका में डा. प्रेम सिंह, सच्चिदानंद सिंहा,डा. अरविंद पांडेय, प्रियदर्शन सहित अन्य लोगों के लेख बेहद सधे हुए और ज्ञानवर्धक है कुल मिलाकर यह एक संग्रहणीय अंक है।

अभिनव उपाध्याय

एक ही थैले के...

गहमा-गहमी...