Friday, July 3, 2009

रंगकर्म से कैसे जाएंगे तनवीर




रंगकर्म से कैसे जाएंगे तनवीर

राजकमल नायक

हबीब तनवीर के जेहन से रंगमंच कभी गैरहाजिर नहीं हो सका। हर पल रंग पल रहा। हर बात रंगमंच की रही। राजकमल नायक ने इस महान कलाकार को ऐसे देखा-पाया। हबीब साहब के साथ कई वर्कशापों में हिस्सा ले चुके और उनके नाटकों में काम कर चुके राजकमल नायक रायपुर में रंगकर्म से जुड़े हैं। ब.ब. कारंत, श्याम बेनेगल की फिल्मों में प्रमुख भूमिकाएं निभाईं और जमकर रंगकर्म किया। ‘रंग-संवादज् पत्रिका भी निकाली। उनकी यादों में हबीब तनवीर।


हबीब तनवीर के जेहन में रंगमंच कभी गैरहाजिर नहीं हो सका। वे खुद चौबीसों घंटे रंगमंच की ‘आन ड्यूटीज् पर रहे। दोनों एक दूसरे के मातहत रहे और वे रंग हबीब हो गए। उनका हर पल रंग पल रहा। हर बात रंगमंच की बात रही। हर कर्म रंगकर्म रहा। तो क्या हबीब कभी रंगमंच के बाहर नहीं होते? जी नहीं। ‘नो एक्जिट!ज् एक बार रंगमंच में एंट्री ली और उसी के होकर रह गए। तनवीर ने रंगमंच का सुनहरा इतिहास रच दिया। कालजयी रंग पुरुष के रंग कलापों ने देश-विदेश में रंगमंच का झंडा गाड़ दिया। उनके पाइप से निकलते धुएं के गुबार का अशांश भी थिएटर की खुशबू से आबद्ध होता था। उनकी छवि बला की थी। कभी वे महान संत की तरह दीख पड़ते, कभी लगता कि वे दार्शनिक हैं, कभी वैज्ञानिक प्रतीत होते तो कभी सामाजिक कार्यकर्ता, कभी रंग धुनी लगते तो कभी शायर वगैरा-वगैरा।
उनके नाटक जितने परम्पराशील नाट्य को रुपायित करते थे उतने ही उत्तर आधुनिक भावबोध को। उनके नाटक देखते हुए स्टेज मानो घुल जाता था। दर्शक और कलाकार एकमेक हो जाते थे। दूरी मिट जाती थी। सब कुछ इतना सहज, इतना अपना, अपने समय का, अपने पास का हो जाता था कि नाटक नहीं दिखता था, जीवन दिखता था, फिर नाटक दिखता था, फिर जीवन दिखता था। ‘टोटल थिएटरज् की परिभाषा जानना है तो हबीब साहब के नाटक देख लो। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ी बोली को स्थानीय से समकालीन बनाया। स्थानीयता से वे वैश्विकता में बोली का बोलबाला हबीब के ही बूते की बात थी। भाषा और बोली के इस कठिन क्षरण काल में हबीब ने रंगमंच के जरिए बोली को जीवित और प्रतिष्ठित कर दिया। वे पाठ पढ़ा गए कि लोकमंच के तत्वों, उसकी ऊर्जा, उसकी ताकत के बल पर उपजाया हुआ रंगमंच किसी भी आधुनातन रंगमंच से कमतर नहीं वरन एक कदम आगे ही है। उपज अभिनय ‘इम्प्रोवाइजेशनज् का जमकर और बेहतर इस्तेमाल हबीब साहब के नाटकों में चार चांद लगाता रहा। कभी-कभी तो प्रस्तुति के दौरान ही उनके कलाकार प्रत्युत्पन्नमति के सहारे समसामयिक घटनाओं को नाटक में समाहित कर लेते थे। रिहर्सल के दौरान हबीब साहब गाइड की तरह अपने कलाकारों से दृश्य उपजाते, संवारने के काम में रत रहते थे। सैकड़ों बार एक ही दृश्य की उठा-पटक, उलट-पुलट, कांट-छांट करना उनका शगल था।
1973 में उनसे अल्प भेंट का सुयोग मुङो मिला। हबीब तनवीर नाचा पर वर्कशाप करने रायपुर आए थे। मैं तब तक रंगमंच का मुरीद बन चुका था। चूंकि वर्कशाप नाचा का, लोक कलाकारों का था अत: मैं बतौर ‘रिहर्सल दिखयाज् उसमें शामिल रहा। हबीब तनवीर को जानने-समझने का मौका तो नहीं मिल पाया परंतु नाचा के सैकड़ा भर कलाकारों की कला के दर्शन करने का बेमिसाल मौका मुङो मिल गया था।
असली मौका मिला 1976 में। रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर में ड्रामा वर्कशाप का आयोजन हबीब तनवीर के निर्देशन में हुआ। छत्तीसगढ के दूर-दराज के कलाकार भी इसमें शिरकत करने आए थे। वर्कशाप में रोज हबीब साहब से बात करने, काम करने के दौरान उनसे निकटता बढ़ी। सातवीं शती के बोधायन रचित संस्कृत प्रहसन ‘नगवद् अज्जुकमज् की तैयारी शुरू हुई। मुङो दो भूमिकाएं करने का मौका मिला। वर्कशाप के दौरान दिन भर हमें हबीबजी नाचा-गम्मत, पंडवानी दिखाते रहते। और खुद भी देखते हुए न जाने क्या बूझते रहते। अपनी निकटता का लाभ उठाते हुए मैंने सकुचाते हुए एक दिन कह ही डाला कि हम सब छत्तीसगढ़ के ही हैं। नाचा गम्मत, पंडवानी देखते ही रहते हैं, कुछ आधुनिक रंगमंच के बारे में बटरेल्ट ब्रेष्ट वगैरा के बारे में बतलाइए। हबीब साहब आग बबूला हो गए। तुम्हें ब्रेष्ट की क्या समझ है? नाचा-गम्मत में तुम्हें ब्रेष्ट नहीं दिखता। अपनी आंखें खोलो, कान और दिमाग खोलो तथी थिएटर समझ में आएगा। यह उम्दा किस्म की फटकार अब तक मेरे काम आती है। उसी दिन शाम को हबीब साहब ने ब्रेष्ट के बारे में, बर्लिनर ऐन्सेम्बल के बारे में बहुत कुछ बताया। समूचे वर्कशाप के दौरान उनसे संबंध बनते-बुनते गए।
संभवत: 1982-83 के आसपास एक और वर्कशाप जो कि मूलत: मास्क निर्माण और उसके उपयोग पर केन्द्रित था, में हबीब साहब के साथ फिर काम करने का अवसर मिला। लंदन की ऐलिजाबेथ लिंच और जिर्रादितबोन हबीब साहब के साथ आई थीं। बड़े-बड़े मास्क जीव-जंतुओं के बनाए गए। हबीब जी ने ही सुझाव दिया कि मास्क का उपयोग करते हुए एक लघु नाटक करना चाहिए। शिविर लगभग समाप्त होने को था। कहानी डेवलप करने में हबीब जी के साथ सभी शिविरार्थी जुटे हुए थे। शो की घोषणा की जा चुकी थी। विश्वविद्यालय के पेड़ों के नीचे खुली जगह में शो करना तय हुआ। बमुश्किल तमाम कथा बन पाई। नाम रखा गया ‘नेटका हांसिस गाज्। शीर्षक छत्तीसगढ़ी में था पर नाटक हिंदी में। मुङो सूत्रधार की बड़ी भूमिका का निर्वाह करना था जिसकी कोई तैयारी नहीं हुई थी। शो के दिन दर्शक आ चुके थे। हबीब साहब बगैर किसी संकोच के, घेरे में खड़े हुए दर्शकों के बीच बैठे मुङो समझा रहे थे कि क्या सीक्वेंस होगा और लगभग क्या कहा जाना है। पाठक विश्वास करें कि अधूरी तैयारी का शो भी ऐसा अद्भुत हुआ कि हम सब भी अवाक् रह गए। हबीब साहब ने मेरी पीठ ठोंक कर ईनाम दिया।
1976 से बने संबंध प्रगाढ़ होते चले गए। अनेक बार मैंने उनके नाटकों को बनते, परिष्कृत होते देखा है। उनके लगभग सभी नाटकों के अनेक प्रदर्शन मैंने देखे। हबीब साहब तथा ‘नया थियेटरज् के कलाकारों ने मेरे कई नाटकों को देखा, पसंद किया, समीक्षा की, बहस की, मार्गदर्शन दिया है। मुङो हबीब साहब से रंगमंच और नाटक पर बहस करने की छूट मिलती रही। 1986 के आसपास ‘भारत भवनज् भोपाल में उनका नाटक ‘हिरमा की अमर कहानीज् हुआ। मैं वहीं रंगमंडल में था। प्रस्तुति के बाद बहिरंग के स्टेज पर मैं उनसे मिलने गया। उन्हें बधाई दी। वे मुङो एक ओर ले गए और पूछा-अब बताओ, कैसा रहा? मैंने कहा-थोड़ा ढीला है। ऐसा लगता है एडिटिंग बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा-नाटक के स्क्रू को तो मैं कसूंगा ही। मैंने कहा, और आपके आदिवासी कलाकार स्टेज पर गोली लगने के बाद गिरकर बहुत देर तक उठते ही नहीं। क्या आपने सायास ऐसा किया है? हबीब साहब बोले-ये आदिवासी कलाकार बस्तर से ढूंढ़कर लाया हूं। कमाल का नाचते-गाते हैं। नाटक की मांग के मुताबिक कुछ मूक दृश्य की रिहर्सल भी इनसे करवाई है। जब इन्हें मंच पर बंदूक का निशाना बनाया जाता है तो ये अपनी तरह से गिरकर मर जाते हैं। और वे सोचते हैं कि अब तो हम मर गए अब उठकर क्यों जाएं और कैसे जाएं? इसीलिए बहुत देर पड़े रह जाते हैं। कई बार तो मंच से इन्हें हकालकर, घसीटकर ले जाना पड़ता है, बत्ती गुल करनी पड़ती है। हबीब साहब और मैं ठठाकर हंस पड़ते हैं।
हबीब साहब के एक ही नाटक का हर प्रदर्शन शने: शने: बदलता जाता है, पकता जाता है। नया थियेटर अपने नामानुरूप रंगरत् रहा है। ‘नया थियेटरज् इसीलिए हमेशा नया बना रहा है क्योंकि वह प्रगतिशील, प्रयोगधर्मी पारंपरिक, वैचारिक आधुनिक के संगुफन को रंजकता से अभिव्यक्त करता रहा है। ‘नया थियेटरज् मनुष्य के अहम् सवालों को, द्वंद्वों को, संघर्षो को प्रकट करता रहा है। यह ‘नया थियेटरज् में ही हो सकता था कि एक ओर खाना पक रहा है या चाय बन रही है तो दूसरी ओर नाट्याभ्यास जारी है। कलाकार अपनी भूमिका करके दौड़ते हुए भात-दाल भी रांध लेता है या खा लेता है और फिर वापस अपनी भूमिका में भी आ जाता है। चावल बीनते हुए अभिनेत्री रोल करते यहां देखी जा सकती है। अभिनेता अपने बच्चे को गोद में लिए अभिनय कर सकता है। सभी को सभी नाटक यहां याद रहते हैं। ‘शो मस्ट गो आनज् सभी के रक्त में हैं। अशिक्षित कलाकारों को रोल याद कराने का जिम्मा हबीब साहब का भी है, साक्षर कलाकारों का भी। रिहर्सल का समय और स्थान कहीं भी, कभी भी, कितना भी हो सकता है। जीवन और नाटक का एका देखना हो तो ‘नया थियेटरज् देख लें।
हबीब तनवीर रंगधुनी थे। शूद्रक का नाटक हो या बाणभट्ट का, शेक्सपीयर का हो या मौलियर का, रवीन्द्रनाथ टैगोर का हो या हबीब जी का स्वरचित सभी छत्तीसगढी बोली में रचकर अपने हो जाते हैं। हिन्दी, उर्दू, छत्तीसगढ़ी, अंग्रेजी का मिश्रित इस्तेमाल भी हबीब साहब ने खूब किया है। संगीत तो उनके नाटकों का अनिवार्य अंग था। लोक धुनों को खंगाल-खंगालकर उन्होंने अपने नाटकों में बड़ी खूबी से पिरोया। शेरो-शायरी और शास्त्रीय संगीत भी उनके नाटकों में आवश्यक उपकरण की तरह उपयोगी साबित हुए। 1994 में संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली के ‘प्रथम युवा निर्देशक वर्कशापज् में देश भर के नामी निर्देशक, रंग विशेषज्ञ हम तेरह युवा निर्देशकों की क्लास लेने आया करते थे। इस चालीस दिवसीय वर्कशाप के लीडर थे प्रख्यात रंग निर्देशक ब.ब. कारंत और रंग मनीषी नेमिचंद्र जन। कारंत मेरे गुरु थे और मैं उनका परम शिष्य। हबीब तनवीर हमारी छह दिवसीय क्लास लेने पहुंचे। कारंतजी ने उन्हें रिसीव करते हुए कहा कि आपके अखाड़े का भी एक युवा निर्देशक यहां आया हुआ है। हबीब साहब ने क्लास में जब मुङो देखा तो बड़े प्रसन्न हुए। छह दिन तक उनसे रंग-मुठभेड़ चलती रही।
हबीब तनवीर लंदन के डंकन रास को अपना गुरु मानते थे। डंकन रास ने उनसे कहा था कि ‘कहानी को खूबसूरती से पूरा कह जाना ही नाटक है।ज् इस ‘खूबसूरतीज् और ‘पूराज् कहने में ही सैकड़ों पापड़ बेलने पड़ते हैं। एक और वाकया हबीब साहब बताते थे। मुम्बई में बलराज साहनी के नाटक में काम करते वक्त कई बार बताने के बावजूद अभिनय में खोट होने पर हबीब तनवीर को बलराजजी ने चांटा जड़ दिया। बाद में अभिनय बढ़िया हो गया। हबीब ने बलराज साहनी से पूछा कि ऐसा क्यों हुआ? इस पर बलराज जी ने कहा-‘यह मसल्स मेमोरी का कमाल है। यह दुखद है कि हबीबजी ‘नया थियेटर की पचासवीं सालगिरह मनाने की तैयारी के बीच हमसे बिछड़ गए। लेकिन वे हमारे रंगकर्म में हमेशा उपस्थित हैं। इसमें वे अनुपस्थित हो ही नहीं सकते।

आज समाज से साभार

1 comments:

shreesh prakhar said...

.भैया तबियत हरी हो गयी इसे पढ़कर

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एक ही थैले के...

गहमा-गहमी...