Tuesday, May 9, 2017

भक्तिकाव्य की पेचीदगियां


रवीन्द्र त्रिपाठी

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह हिदी के उन आलोचकों में से हैं जिन्होंने मध्यकालीन भक्ति कविता से लेकर आधुनिक साहित्य का गहन 
अध्ययन किया है। हालांकि उनके सक्रिय जीवन के बीस वर्ष शिक्षक आंदोलन से संबधित रहे और देश तथा दिल्ली के विश्वविद्यालयी शिक्षक ट्रेड यूनियन को उन्होंने अपने वक्त में बेहद प्रभावशाली बनाया। और इसी कारण वे बीस बरस ऐसे भी रहे जिसमें आधुनिक हिंदी आलोचना को नुकसान भी हुआ। ये मूल्य निर्णय देना कठिन है कि कौन-सा काम ज्यादा जरूरी था- शिक्षक आंदोलन या हिंदी आलोचना? पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि अगर वे बीस बरस उन्होंने आलोचना को पूरी तरह दिए होते तो वह और अधिक समृद्ध होती।
उनकी नई किताब `पांच भक्त कवि’ (प्रकाशक-भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीच्यूशनल एरिया, लोदी रोड नई दिल्ली,-3, मूल्य- 350 रुपए) कबीर, सूर, तुलसी, जायसी और मीरा की काव्य मीमांसा है। पुस्तक की तीन महत्त्वपूर्ण विशेषताएं हैं- एक तो इसमें पांचों भक्त-कवियों की पर लिखी गई अन्य पूर्ववर्ती आलोचनाओं का संक्षिप्त वृंतात है जिससे पाठक को ये पता चल जाता है इस कवि पर हिंदी के किस वरिष्ठ आलोचक ने क्या और कौन सी अहम स्थापनाएं की हैं। इस लिहाज से जो पाठक पांचों भक्ति कवियों को पहली बार जानने का प्रयास कर रहे हैं उनके लिए ये पुस्तक एक प्रामाणिक मार्गदर्शिका है। ऐसे पाठकों में छात्र भी हो सकते हैं और मध्यकालीन कविता के प्रेमी भी। पुस्तक की दूसरी विशेषता है कि ये बेहद सहज और संप्रेषणीय भाषा में लिखी गई है और कई सैद्धांतिक प्रत्ययों को भी सरलता से पेश करती है। और तीसरी विशेषता ये है कि इसमें कुछ नई और मौलिक स्थापनाएं भी हैं जो इन कवियों के अध्ययन की नई दिशाओं की तरफ भी ले जाती है। वैसे भी अच्छे कवियों या साहित्यकारों के बारे में कोई व्याख्या आखिरी नहीं होती है। इसलिए रामचंद्र शक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी और राम विलास शर्मा जैसे दिग्गजों या अन्य महत्त्वपूर्ण आलोचकों के विश्लेषण बावजूद भक्तिकालीन हिंदी कविता को नई निगाह से देखने की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। वक्त के साथ साहित्य और समाज के बारे में नवीन दृष्टिकोण आते रहते हैं और अध्ययन, मनन और मूल्यांकन को प्रभावित करते रहते हैं। मिसाल के लिए जब कबीर पर गंभीर आलोचना-कर्म शुरू हुआ तो उस समय दलित विमर्श नहीं उभरा था। अब जब दलित विमर्श समकालीन बौद्धिक प्रक्रिया का एक अनिवार्य पहलू बन चुका है जो कबीर पर नई अंतर्दृष्टियां विकसित हो रही है। इसलिए किसी बड़े कवि का कोई मूल्याकंन कभी खत्म नहीं होता। होना भी नहीं चाहिए। अच्छी कविता के अर्थ और आशय धीरे धीरे खुलते हैं। शताब्दियों या सहस्राब्दियों तक ये सिलसिला चलता रहता है। महाभारत और रामायण के प्रसंग में ये बात तो आम आदमी भी महसूस करता है।
कबीर पर चर्चा के क्रम में मुरली बाबू ने देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय की पुस्तक `दर्शनशास्त्र के स्रोतका एक प्रसंग उद्धृत किया है जो `मैत्रीया `मैत्रायणी उपनिषदका अंश है। अनुवाद सुशीला डोभाल का है और उक्त उपनिषद का ये अंश इस तरह का है- 
`कुछ लोग ऐसे हैं जो निरंतर मौजमस्ती करते हैं, निरंतर प्रवास करते हैं, निरंतर दान मांगते रहते हैं, निरंतर हस्तशिल्प पर निर्वाह करते हैं। इतना ही नहीं ऐसे लोग भी हैं जो नगरों में भिखारी हैं, जो अपात्रों के लिए बलिकर्म करते हैं, जो शूद्रों के शिष्य हैं और जो शूद्र होते हुए भी अपने विशेष प्रकार के शास्त्रों के ज्ञाता है। और इतना ही नहीं, ऐसे लोग भी हैं जो धूर्त हैं, जो अपने बालों का जूड़ा बनाते हैं, नर्तक हैं, भाड़े के टट्टू हैं, धार्मिक भिक्षु हैं, अभिनेता हैं, राजसेवा से निष्कासित हैं, इत्यादि। और इतना ही नहीं, ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं कि धन के बदले हम यक्षों, राक्षसों, भूतों, भूतदलों, प्रेतों, सर्पों और पिशाचों आदि के दुष्प्रभावों को दूर करते हैं। औऱ कुछ अन्य भी हैं जो मिथ्या रूप से लाल वस्त्र, कुंडल एवं कपाल धारण करते हैं। और इतना ही नहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें वेदों ने आस्था रखनेवालों को पीड़ित करने में बड़ा आनंद मिलता है। वे छलपूर्ण तर्कों, मिथ्या और कुतर्कपूर्ण उदाहरणों द्वारा आस्थावानों के भ्रमित करना चाहते हैं। ऐसे लोगों की संगति नहीं करनी चाहिए। सच्ची बात ये है कि ऐसे प्राणी स्पष्ट रूप से दस्यु हैं, स्वर्ग के अयोग्य हैं। क्योकि कहा गया है कि आत्मा का नकार करनेवाले सिद्धांत के मायाजाल के कारण. मिथ्या तुलनाओं एवं प्रमाणों के कारण विचलित हुआ संसार यह नहीं देखता कि ज्ञान और अज्ञान में क्या भेद है?’

मैं मैत्री या मैत्रायनी उपवनिषद के बारे में ज्यादा नहीं जानता है। लेकिन मुरली बाबू ने जिस उद्धरण को उद्धृत किया है उसे विश्लेषित किया जाना चाहिए। पता नहीं इस उपनिषद का रचनाकाल क्या है? पर जब का भी लिखा हुआ हो कुछ चीजें साफ प्रकट होती हैं
1)इसके रचनाकार के मन में न्रर्तकों और अभिनताओं के लिए विशेष सम्मान नहीं है। कलाकारों के लिए भी नहीं।

2) इसके रचनाकाल में शूद्र खास तरह के शास्त्र रच रहे थे और उन शास्त्रों के प्रति आस्थारखनेवाले भी समाज में मौजूद थे। वे शास्त्र कौन थे? इनका अनुसंधान किया जाना चाहिए।

3) उपनिषद वेदों के बाद की रचनाएं हैं इसलिए वे वेदांत कहे जाते हैं। स्वाभाविक हैं कि वे वेद सम्मत समाज बनाने की वकालत करें। लेकिन जो मुख्य उपनिषदों में सामाजिक टिप्पणियां नहीं के बराबर हैं। पर मैत्री या मैत्रायणी जैसे उपनिषद कब लिए गए, इसमें दूसरे धर्मों और कलाकारों के प्रति जो नजरिया विकसित हुआ उनपर भी चर्चा होनी चाहिए। अब मांडूक्य, केन या कठ जैसे उपनिषदों के अलावा हमारा ध्यान अन्य उपनिषदों की तरफ भी जाना चाहिए तभी हम वेद प्रधान समाज के उत्तर काल को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और जान सकते हैं कि तत्कालीन समाज में किस तरह की बहसें थीं। हालांकि वेद विरोधी धार्मिक आंदोलनों की संख्या कम से कम पचास थी। उनके में से कितने के शेष या अवशेष अभी मौजूद हैं? इन आंदोलनों का परिपाक कैसे हुआ?

नाथपंथ और कबीर का रिश्ता क्या था- इस पर कई तरह के विचार हैं और कबीर साहित्य के विद्वानों में इसे लेकर मतभेद है। इस पुस्तक से इस बारे में विचार वैभिन्य का परिचय भी मिलता है। पर इस बारे में भी कोई स्थायी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। मुरली बाबू ने खुद कुमार गंधर्व के कबीर गायन के बारे में वसंत पोतदार की इन पंक्तियों को उद्धृत किया है- `नाथपंथियों की निर्गुण शैली बिल्कुल अलग है। घने जंगलों में धूनी जलाकार वे रम जाते थे। समाज से उनका खास संबंध नहीं होता था। उनका जीवन, उनकी दुनिया ही निराली। वह उनकी गायकी से दृश्यमान होती है- इसका कुमार जी को बोध हुआ। जीवन भर के उनके असीम विश्वास में से उनके स्वर उत्पन्न होते हैं यह कुमार जी ने ताड़ लिया और उन स्वरों पर उन्होंने प्रभुत्व कायम किया। सिर्फ निर्गुण स्वर ही नहीं निर्गुण जीवन के दिगंबरत्व, औदासीन्य और फक्कड़पन से तादात्म्य पाने में वे सफल हो गए।
क्या नाथपंथ और कबीर के रिश्ते पर नए परिप्रेक्ष्य में बात नहीं होनी चाहिए? कबीर नाथपंथी थे या नहीं, थे तो कितने प्रतिशत थे- ये सब अकादमिक सवाल बन जाते हैं। अगर कुमार गंधर्व और नाथपंथी योगियों के संगीत की तरफ हमारा ध्यान जाता है तो क्या इस पक्ष की भी अनदेखी की सकती है कि परवर्ती नाथपंथियों ने भी कबीर को अपने तरीके से सिरजा। क्या जो नाथपंथी घने जंगलों में कबीर गाते थे उनके स्वरों के माध्यम से भी उनके अपने कबीर की रचना नहीं हो रही थी? 
हिंदी की अकादमिक आलोचना ने कबीर-साहित्य का गहन अध्ययन किया है इसमें संदेह नहीं। विदेशी अध्येताओं ने भी कबीर और उनकी वाणी का विद्वतापूर्ण अध्ययन किया है इसमें भी दो राय नहीं। पर इस पक्ष की ओर हमारा, यानी आलोचक समाज का, ध्यान जाना चाहिए कि कबीर को सिर्फ अकादमिक संदर्भ में नहीं समझा जा सकता है। कई कबीर हैं और सबके के सब अपने ढंग से प्रामाणिक (या अप्रामाणिक) हैं। कबीरपंथियों और नाथपंथियों के भी अपने अपने कबीर हैं। कबीर को ईश्वर मानने वाले भी हैं। कबीर की कौन-सी रचना प्रामाणिक और कौन प्रक्षिप्त इस पर भी विद्वानों में कई राय हैं। होनी भी चाहिए और अकादमिक आलोचना का कर्तव्य बनता है कि वह प्राणामिक रचना या रचनाओं को सामने लाए। आखिर अध्ययन- अध्यापन की भी एक संरचना होती है। हालांकि इसी का प्रतिपक्ष ये भी है कि कबीर रचित कई पद लोकरचित भी हैं (ये बात कुछ हद तक अन्य भक्त कवियों के बारे में सही है, विशेषकर मीरा के बारे में।) इसलिए प्रामाणिक कबीर भी एक मिथक है (प्रामाणेक मीरा भी)। आज भी हम कबीर का अद्ययन करते हुए अपने अपने कबीर की निर्मिति करते हैं। चाहे अकादमिक विद्वान हों या कबीर-भक्त- सब कबीर की अपनी मूर्ति बनाते हैं। ये कोई उलटबांसी या अंतरविरोधी वक्तव्य नहीं है। लोकरचित और व्यक्तिरचित इन दोनों के मेल में कई गुत्थियां होती हैं जिनको समझना और समझाना एक अनंत प्रक्रिया में चले जाना है। एक गुत्थी को सुलझाइए तो दूसरी सामने आती है और दूसरी तो सुलझाइए तो तीसरी और ये सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। और इसका आनंद भी है।
भक्ति आंदोलन के अध्येताओं में पुरुषों की प्रधानता रही है।विशेषकर भारतीय अध्येताओं में। ये अपने में कोई आरोप नही हैं। पर ये भी गौर करने की बात है कि अगर मीरा का अध्ययन महिला अध्येता करें तो क्या नई अंतर्दृष्टियां विकसित होंगी? हिंदी में मीरा साहित्य की कोई गंभीर महिला अध्येता है इसकी मुझे जानकारी नहीं। मीरा साहित्य के हिंदी में जो अध्येया हैं वे मुख्यत: पुरुष हैं। अंग्रेजी में कुमकुम सांगरी ने अवश्य मीरा का एक ऐसा अध्ययन किया है जिसके बारे में काफी लोग जानते हैं। वैसे पूछा जा सकता है कि क्या मीरा-साहित्य के पुरुष अध्येताओं ने उनके प्रति सम्मान नही दिखाया और क्या इन पुरुष आलोचकों का विश्लेषण मीरा के साथ न्याय नहीं करता। अवश्य करता है और पुरुष अध्येताओं ने मीरा के प्रति पर्याप्त सम्मान भी दिखाया है। अन्य आलोचकों के अलावा माधव हाड़ा की किताब `पंचरंग चोला पहर सखी रीतो इसका नवीनतम प्रमाण है। लेकिन हमारा ध्यान इस तरफ भी जाना चाहिए कि पूरी दुनिया में जेंडर-डिस्कोर्स यानी लैंगिक विमर्श भी बढ़ रहा है महिला दृष्टिकोण को जानना या उसकी मांग करना आलोचना पद्धति के लोकतांत्रिक विस्तार की आकांक्षा से भी जुडा है। कई देशों की तरह भारत में मध्यकाल कई समूहों (जातियों) और स्त्रियों के आत्म (अग्रेजी का `सेल्फ’) के दमन का कालखंड रहा है। मीरा के भक्तिकाव्य में स्त्रियों के वैयक्तिक आत्मदमन और व्यवस्था द्वारा नियोजित `आत्म- दमनके विरुद्ध आवाज है। मीरा के आत्म को दबाने की कोशिश उनके परिवार द्वारा भी हुई और उस सामाजिक व्यवस्था द्वारा भी जो इस समय प्रचलित थी। इसलिए मीरा का काव्य वैयक्तिक और सामूहिक- दोनों ही तरह के आत्मदमन, का प्रतिकार भी है। मीरा जब कहती हैं- 
माई सांवरे रंग राची/ साज सिंगार बांध पग घुंघरू, लोकलाज तज नाची/ गयां कुमत लयां साधां संगत स्याम प्रीत सग सांची।तो उसमें आत्म के विनाश का वैयक्तिक और सामूहिक निषेध भी है। ये समझने की बात है कि कबीर, तुलसी, जायसी, सूर जैसे भक्त कवियों की तरह मीरा इस संसार को मिथ्या और माया नहीं मानतीं। मनोविज्ञान से प्राप्त अंतरदृष्टियां भी मीरा काव्य को और गहरे में समझने में हमारी मदद कर सकती हैं।
जाहिर है भक्ति काव्य में कई आवाजें हैं और इनको सुनना आलोचक का काम है। पर ये इतना आसान नहीं है क्योंकि ये आवाजों का ये समुच्चय जटिल विधान में बुना हुआ है। इसलिए भक्तिकाव्य के विश्लेषण की चुनौतियां बनी रही हैं।
वक्त और स्थान की कमी की वजह यहां तुलसी, जायसी औऱ सूरदास कुछ भी बात नहीं हो सकी। बेहतर होगा कि पाठक इस पुस्तक को पढ़ें और अपनी निजी राय बनाएं। आखिर में इतना जरूर जोड़ना चाहूंगा कि भक्ति काव्य को समझने की एक दृष्टि `लोक बनाम शास्त्रके द्वंद्व वाली भी रही है। पर ये दृष्टि अपर्याप्त इसलिए हैं कि शास्त्र संबंधी जो परिभाषा हमारे अकादमिक विद्वानों मे है वह भी समस्या मूलक है। क्या शास्त्र वही है जो संस्कृत में लिखा गया है? काल, संवेदना की गहराई और जन भावना ने भक्तिकालीन कवियों की रचनाओं को भी शास्त्र बना दिया है। कम से कम `रामचरित मानसऔर `पद्मावत’- दोनों काव्यग्रंथ के अलावा शास्त्र भी हैं। अकादमिक विदवानों को शास्त्र संबंधी अपनी धारणा भी बदल लेनी चाहिए। खासकर मध्यकालीन कविता को समझने के लिए।

Saturday, April 15, 2017

इस गरुड़ को किसने देखा है?

रवीन्द्र त्रिपाठी


तिरुपति हवाई अड्डे पर `गरुड़के मूर्तिशिल्प को जिन्होंने देखा है वे बिना और कुछ कहे ये समझ  सकते हैं कि अरुण पंडित किस तरह के विलक्षण कलाकार या मूर्तिशिल्पी हैं। गरुड़ पौराणिक मिथकीय पक्षी है और भगवान विष्णु का वाहन माना जाता है। लोकविश्वास है कि गरुड़ के डैने इतने ताकतवर और ऊर्जावान हैं उनके फड़फड़ाते ही धरती हिल सकती है और व्योम में बवंडर आ सकता है। गरुड़ उड़ान का भी पर्याय है। इसके साथ पारंपरिक लोकस्मृति और शास्त्रस्मृति जुड़ी है। इस लिहाज से कह सकते हैं कि गरुड़ का ये मूर्तिशिल्प भी पारंपरिकता का विस्तार है।
 पर सिर्फ इसी निष्कर्ष पर टिके रहना सही नहीं होगा। बेशक ये लग सकता है कि अरुण का ये, गरुड़वाला, और दूसरे मूर्तिशिल्प पारंपरिक भारतीय मिथक और मूर्तिशिल्प के विस्तार हैं। और ऐसा लगने का कारण भी है।  अरुण अपने मूर्तिशिल्पों में बहुगुणिता ( MULTIPLE)की संकल्पना का काफी प्रयोग करते हैं। (बहुगुणिता  से आशय मूर्तिशिल्प में किसी खास अंग या अंश का बहुल प्रयोग है। पारंपरिक भारतीय मिथक में शिव के तीन नेत्र माने गए हैं, रावण के दस सिर, दुर्गा के आठ या दस हाथ। ये बहुगुणिता के उदाहरण हैं। भारतीय मूर्तिशिल्प में इनके प्रयोग सदियों से दिखने को मिलते रहे हैं।) पर अरुण के भीतर जो बहुगुणिता है, वह सचेत रूप से आधुनिक है, पारंपरिक नहीं। अरुण ने आधुनिक प्रक्रिया में करते करते ये बहुगुणितता विकसित की है। गरुड़ के मूर्तिशिल्प में डैने की जगह हाथ हैं, बारह हाथ। ये बारह हाथ इस तरह शिल्पित हुए हैं कि डैने की तरह लगते हैं लेकिन ये समकालीन मनुष्य के उड़ान की आकांक्षा के प्रतीक भी हैं।


 अप्रेल 2016 में ललित कला अकादेमी में अरुण पंडित के मूर्तिशिल्पों की जो प्रदर्शनी लगी थी उस वक्त भी कला-रसिकों ने महसूस किया कि अरुण मूर्तिशिल्प में अपने नए और मौलिक मुहावरे के साथ आए हैं। उनके किसी मूर्तिशिल्प में मुंह कई होते हैं, किसी में हाथ कई, किसी में ऊंगलियां कई तो किसी में पैर कई। ये समकालीन भारतीय मूर्तिशिल्प के संसार में एक साथ बहुत नया लगता है और बहुत पुराना भी। कुछ लोगों के लिए ये संकरता या हाइब्रिडिटी है। पर ऐसा है नहीं। ये अरुण की मौलिकता है कि वे एक नजर में उत्तर- आधुनिक लगते हैं और उसी नजर में प्राचीन भारतीय मूर्तिकला के नए वंशज भी। हां, ऐसा अकस्मात नहीं हुआ है। करते करते यानी एक प्रक्रिया के तहत अरुण ने अपनी निजी शैली बनाई है।  इस प्रक्रिया के शुरू होने की कहानी कुछ साल पुरानी है। ये कॉलेज ऑफ आर्ट के एमएफए करने के दौरन शुरू हुआ।
  बिहार में जन्में और वहीं के निवासी अरुण जब सन् 1995 में पटना  के कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स से बीएफए करने के बाद एमएफए करने दिल्ली पहुंचे और दिल्ली के कॉलेज ऑफ आर्ट्स में दाखिला लिया तो वहां एक नया माहौल था। उनको अंग्रेजी नहीं आती थी और दिल्ली में पढाई अंग्रेजी माध्यम में होती थी। खासकर कला –इतिहास की पढाई। शुरू में अरुण के पल्ले कुछ नहीं पड़ता था। और यही उनको गुरु के रूप में मिलीं रुबीना करोड़े। वे उस समय कॉलेज ऑफ आर्ट्स में कला- इतिहास पढ़ाती थी। हालांकि वे अंग्रेजी में पढ़ाती थी लेकिन उनके पढाने के ढंग में इतनी आत्मीयता और दृष्टिसंपन्नता थी कि अरुण का कला के प्रति नजरिया बदलने लगा। आधुनिक कला की बारीकियां भी समझ में आने लगीं।  कोंस्टान्टीन ब्रांकुसी के एक प्रसिद्ध मूर्तिशिल्प `बर्ड इन  स्पेस (ब्रांकुसी ने इस नाम से एक ही आकार में कई मूर्तिशिल्प बनाएं हैं।) के विश्लेषण से उनको अंतर्दृष्टि मिली।  इस मूर्तिशिल्प में कहीं कोई चिड़िया यानी `बर्ड नहीं है। या कहीं पंख नहीं है जिनसे चिड़ियों का एहसास हो। फिर इसका नाम `बर्ड इन स्पेस क्यों? ब्रांकुसी ने इस सवाल के जवाब के क्रम में कहा था कि जब नेत्रहीन इसे छूकर महसूस करेंगे तो उनको लगेगा कि कोई चीज, हवा में ऊपर की ओर जा रही है। यानी कला आपके दिमाग में एक इंप्रेसन बनाती है। कोई जरूरी नहीं कि पूरी चिड़िया ही बनाई जाए तभी उसका आभास हो। आप चीजों को कैसे देखते हैं इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है। ये जो आभास (यानी `इंप्रेशन’) की अवधारणा है उसने अरुण को छू लिया और अब उनकी कला रचना के केंद्र में है। वे आज भी  आभास पक्ष  को ध्यान में रखकर मूर्तिशिल्प बनाते हैं।
कॉलेज ऑफ आर्ट्स में प्राणनाथ मागो जैस अच्छे अध्यापक भी थे। मागो विद्यार्थी अरुण  से कई तरह के सवाल करते थे। उस दौरान उनको परेशानी होती थी कि ये क्या पूछा जा रहा है। एक मुश्किल ये भी थी कि अर्थाभाव के कारण पढ़ाई जारी रखने के लिए अरुण को बाहर काम भी करना पड़ता था, इसलिए पढ़ने लिखने के लिए जरूरी समय़ नहीं मिलता था। मागो के सवाल उनको विचलित करते रहते थे। मागो अक्सर पूछते कि फलां मूर्तिशिल्प का टेक्सचर ऐसा क्यों हैं, फलां में संतुलन क्यों नहीं है। आदि आदि। उनके जवाब के क्रम में ही अरुण ने अपने विशिष्ट मुहावरे की तलाश की। उनके मूर्तिशिल्पों में आकृतियों के भीतर बहुगुणितता वाला पक्ष इसी क्रम में उभरा। कुछ अन्य कई मूर्तिशिल्पियों की तरह अरुण सांचो (MOULD) का प्रयोग करते हैं। ये अलग बात हैं कि सांचों के प्रयोग जैसा वे करते हैं वैसा दूसरे मूर्तिशिल्पी अमूमन नहीं करते हैं। अरुण आकृतिमूलक कलाकार हैं लेकिन उनकी आकृतियां सामान्य नहीं होतीं। उनके मूर्तिशिल्पों में आकृतियों का विखंडन होता है। रूप का विखंडन होता है। ऐसा लगता है कि किसी कलाकार ने कुछ आकृतियां बनाईं फिर उनको एक साथ मिलाकर जोरों से दबा दिया जिससे वे आपस में चिपक गईं। फिर उन चिपकी हुई आकृतियों को किसी  धड़, चाहे वह मनुष्य का हो या किसी पशु-पक्षी का, के साथ मिलाकर एक मूर्तिशिल्प तैयार कर लिया। कभी कभी तो कोई धड़ भी नहीं होता। 


 पर ऐसा भी नहीं है कि ये सिर्फ रूप के प्रयोग है। हालांकि रूप पर अरुण बहुत जोर देते हैं। लेकिन हर शिल्प अपने में किसी न किसी संवेदनशील विषय की अभिव्यक्ति होती है। जैसे उनकी कलाकृति `मां को लीजिए। इसमें महिला के धड़ के भीतर  एक मुखाकृति है जिसके तीन नाक, तीन होठों वाली एक आकृति है। ऐसा भी लग सकता है कि ये मुखाकृति उस महिला की गोद में है। इसे देखने के दौरान कई तरह के विचार आते हैं। क्या ये मां के गर्भ के भीतर एक शिशु है या कई शिशु हैं या उसकी गोद में बैठे उसके बच्चे हैं? इन सवालों को छोड़ भी दें तो यहां मां की एक नई छवि है जो पांरपरिक भी है और नई भी। अरुण के दूसरे मूर्तिशिल्पों को देखने से भी कई खयाल एक साथ उभरते हैं और साथ ही संवेदना की कई परतें भी।  यही अरुण की सबसे बड़ी खासियत हैं। उनके यहां रूप का ऐश्वर्य भी हैं और संवेदना की गहराई भी। दोनों का अद्भुत मिलन। जो व्यक्ति आधुनिक कला की बारीकी से अपरिचित है उसे उनकी कलाकृतियों के आस्वाद में कोई मुश्किल नहीं होता। और जो कला के जानकार हैं या उत्तर- आधुनिक कला के पेरौकार हैं उनको भी अपने लिए अरुण के यहां काफी कुछ मिलेगा। ऐसा बहुत कम समकालीन कलाकारों के साथ हो पाता है। मेरा खयाल है कि बिहार से बाहर या दिल्ली आकर जिन कलाकारों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई है उनमें अरुण पंडित सबसे अलग हैं  और मौलिक भी। मेरा अपना मानना ये भी है कि आनेवाले बरसों में वे भारतीय मूर्तिकला को नई ऊंचाई तक ले जाएंगे।
 



Tuesday, March 28, 2017

बज्जू भाई



राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक राम गोपाल बजाज (बज्जू जी) के जीवन के छुए और अनछुए पहलुओं के बारे में उनके मित्र वरिष्ठ नाट्य एवं कला समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी का लेख...


 राम गोपाल बजाज का बचपन घोर अभाव में बीता। उनके नाम में बजाज जरूर जुड़ा हुआ है लेकिन वे बजाज परिवार में नहीं जन्में। एक ऐसे मारवाड़ी बनिया परिवार में उनका जन्म हुआ जो घोर दारिद्य में जी रहा था। उस परिवार में जन्मे सभी बच्चे दूसरे मारवाड़ी परिवार में गोद लिए गए। बज्जू भाई बजाज परिवार में गोद लिए गए इसलिए उनका सरनेम बजाज है। उनके दूसरे सहोदर भाइयों के सरनेम अलग अलग हैं क्योंकि वे अलग अलग परिवारों में पले और गोद लिए गए। इस हिसाब से देखें तो बज्जू भाई का जीवन एक उपन्यास की मांग करता है। कोई चाहे तो उस पर एक बड़ा टीवी धारावाहिक भी बना सकता है। बहुत कम जिंदगियां ऐसी होती हैं जिनमें इतने घुमाव गलियां होती हैं।

बज्जू भाई। यानी राम गोपाल बजाज। कुछ लोगों के लिए बजाज साहब। देश और हिंदी के बहुचर्चित नाट्य निर्देशक और अभिनेता।
बात 1989 की है। मैं फ्रीलांसिग करता था और `दिनमान’ (जो अब बंद हो गया है) के लिए रंगमंच पर लिखता था। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (जिसे आम बोलचाल में एनएसडी या स्कूल भी कहते हैं) में उन दिनों कुछ मुद्दों को लेकर छात्रों और नाट्य विद्यालय प्रशासन में मतभेद हुए। इनमें एक मुद्दा खैरुद्दीन नाम के एक छात्र का वार्षिक परीक्षा में अनुत्तीर्ण होना भी था। (खैरुद्दीन भी आजकल नाट्य निर्देशक बन चुके हैं और दिल्ली में ही रहते हैं।) कुछ और मामले भी इसमें जोड़े गए। नाट्य विद्यालय में छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ। इस सब में बज्जू भाई को भी लपेटा गया शायद इसलिए कि वे उन दिनों निर्देशक का कार्यभार संभाले हुए थे। वैसे चर्चा ये भी थी कि नाट्य विद्यालय की फैकल्टी की आंतरिक राजनीति की वजह से ही ये आंदोलन चला। बहरहाल, मामला गरमाने लगा। मीडिया में भी इसकी चर्चा हुई। तब कवि-कलासमीक्षक विनोद भारद्वाज `दिनमानमें संस्कृति संबंधी लेखों के प्रभारी थे। उन्होंने मुझसे कहा कि नाट्य विद्यालय में चल रहे आंदोलन को लेकर एक लेख दे दीजिए। मैं तब बजाज साहब के नाटक देखे थे। और रंजीत कपूर द्वारा निर्देशिक `एक रूका हुआ फैसलामें उनका अभिनय भी देखा था। किंतु उनसे परिचय नहीं था। 
जब मैं इस `दिनमानवाले लेख के सिलसिले में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बहावलपुर हाउस वाले परिसर में पहुंचा तो देखा कि एक आदमी अपनी ही एक आदमकद कैनवास पर रेखांकन-पेंटिग जैसी बनी आकृति के सामने खड़ा हुआ है। वह रेखांकन-पेंटिंग आंदोलनकारी छात्रों ने बनाई थी। उस पेंटिग के सामने मझोले कद वाला व्यक्ति खड़ा था। न मोटा और न दुबला पतला। गंजा होता सिर। जींस का जैकेट और पैंट पहने हुए। ये भी नोट किया वह शख्स साथ में खड़े दो तीन लोगों को मजे लेकर उस रेखांकन-पेंटिंग बारे में कुछ बता रहा है। यदा कदा हंसते हुए । साथ वाले भी कभी कभी हंस रहे थे। एक तरह से ठिठोली का वातावरण था। ऐसा लग रहा था कि पेंटिंग का कोई अध्यापक अपने विद्यार्थियों या सहयोगियों को अपने को केंद्र में रखकर बने किसी पोर्ट्रेट या कलाकृति की बारीकियां समझा रहा हो या उसकी कमियां निकाल रहा हो। ये राम गोपाल बजाज थे जो अपने ही खिलाफ चल रहे आंदोलन का मजा ले रहे थे। 
ये मेरी उनसे पहली मुलाकात थी।
वह परिचय धीरे धीरे प्रगाढ़ होता गया और आज वे या तो मेरे परिवार के सदस्य हैं या ये भी कह सकते हैं कि मैं उनके परिवार का सदस्य हूं। आज उस आंदोलन वाले वाकये के अठाईस साल हो चुके हैं। इस दौरान बज्जू भाई राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक (1995-2001) बने और वहां से सेवा निवृत्त भी हो गए। और उनसे मेरी प्रगाढ़ता कुछ ऐसी हुई कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय मेरा, कुछ लोगों की निगाह में, एक अस्थायी पता बन गया। वैसे रंगमंच में मेरी रुचि तो पहले भी थी लेकिन दिल्ली रंगमंच के अंत:पुर में मेरा प्रवेश बजाज साहब ने ही कराया। एक तो होता है कि आप नाटक देखते हैं और फिर उस पर लिखते हैं। दूसरा ये होता है कि रंगमंच के संसार के अंदरुनी संसार के भीतर जाते हैं और जो चीजें सार्वजनिक जानकारी में नहीं आतीं उनसे भी बावस्ता होते हैं। ये सब मेरे साथ बज्जू भाई से नजदीकी संबंध के कारण ही हुआ। उनसे मेरा रिश्ता इतना करीबी हो गया कि मेरे अनुरोध पर उन्होंने उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में वंसुधरा स्थित जनसत्ता हाउसिंग सोसाइटी की सदस्यता ली और मेरे पड़ोसी होकर बारह-तेरह साल रहे। अब पिछले कुछ साल से वे महाराष्ट्र में लोनावाला के करीब रह रहे हैं। लेकिन कोई हफ्ता नहीं जाता जब उनका फोन न आता हो और लंबी बात न होती हो। कई मर्तबे तो हफ्ते में तीन-चार दिन। उनके साथ मेरी यादों का एक विशाल कोष है, जिनके आधार पर पूरी किताब बन सकती है। फिलहाल कुछ ही यहां पेश कर रहा हूं। 
बज्जू भाई को मुद्दा बनाकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में कभी आंदोलन हुआ, ये एक छोटा-सा तथ्य है। बड़ा ये है कि उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कई पूर्व छात्रों की जितनी सहायता की उतना वहां के किसी और शिक्षक या निदेशक ने किया हो इसकी मुझे जानकारी नहीं। आज मुंबई फिल्मी दुनिया में कई ऐसी नामी हस्तियां हैं जिनको अगर वक्त पर बज्जू भाई ने आर्थिक मदद न की होती तो वे शायद उस मुकाम पर नहीं पहुंच पाते। संभवत: उन लोगों को आज अच्छा न लगे इसलिए उनके नाम नहीं ले रहा हूं लेकिन एक वाकया जरूर सबके साथ बांटना चाहूंगा जो मुझे अमिताभ श्रीवास्तव उर्फ बॉबी जी ने सुनाया था और आज भी अक्सर सुनाते रहते हैं। वे इसके सहभागी रहे हैं। 


उन दिनों बज्जू भाई मंडी हाउस के पास ही रेलवे क्वार्टर में किराए पर रहते थे। अमिताभ जी भी एनएसडी पास करने के बाद उनके साथ ही रहते थे। एक दिन सुबह पांच- साढ़े पांच बजे बज्जू भाई ने अमिताभ जी को जगाया और कहा –`चल केके के यहां चलते हैं। मुझे आभास हो रहा है कि वो किसी आर्थिक संकट में है।केके यानी केके रैना, जो आज मुबंई रंगमंच के चर्चित व्यक्ति हैं। रैना उन दिनों दिल्ली में कालीबाड़ी इलाके में रहते हैं। बज्जू भाई और अमिताभ श्रीवास्तव ने मंडी हाउस से टैक्सी ली और कालीबाड़ी पहुंच गए। रैना को जगाया। वो भी भौंचक कि इतनी सुबह दोनों वहां कैसे? पूछा कि बात क्या है? बज्जू भाई ने कुछ नहीं कहा किंतु उनके हाथ में पांच सौ रूपए रखे और टैक्सी से वापस। रैना ने उस समय तो कुछ नहीं कहा मगर दोपहर में मंडी हाउस पहुंचे। फिर बज्जू भाई को ढूंढा और पूछा कि माजरा क्या है? पैसे क्यों दिए? बज्जू भाई ने बताया कि `यार मुझे लगा कि तू किसी आर्थिक संकट में है। रैना ने कहा कि नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है और उन्होंने पांच सौ रूपए लौटाने चाहे। लेकिन बज्जू भाई ने लिए नहीं। 
बज्जू भाई की ये आदत रही कि जिसे मदद के लिए पैसे दिए उससे ये अपेक्षा कभी नहीं कि पैसा वापस दे। पर इसी तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। ऐसा नहीं है कि वे बड़े पैसे वाले हों या उनको कभी पैसे का संकट नहीं रहा हो। अमिताभ श्रीवास्तव इसी सिलसिले में दूसरा किस्सा बताते हैं। घटना 1981-82 की है। बज्जू भाई तब पाटियाला में पढ़ा रहे थे। एक दिन अमिताभ श्रीवास्तव ने देखा कि मंडी हाउस के गोलंबर (जो अब नहीं है क्योंकि मेट्रो स्टेशन बनने के बाद उस जगह को नए तरीके से सजाया संवारा गया है।) पर बज्जू भाई अकेले बैठे हैं। अमिताभ श्रीवास्तव ने पूछा - `बात क्या है, आपको को पाटियाला में होना चाहिए।उनको जवाब मिला- `यार पाटियाला जाने के लिए बस के पैसे तो हैं लेकिन उतने भर ही हैं। रिक्शे-स्कूटर के लिए भी कुछ चाहिए। रास्ते में चायपानी भी करनी होगी। और वहां रिजू (बज्जू भाई का पुत्र) अकेला है। समझ में नहीं आता हूं कि क्या करू?’। अमिताभ श्रीवास्तव भी उन दिनों फ्रीलांसर थे और उनके पास भी पैसे नहीं थे। इसलिए वे भी मदद करने की स्थिति में नहीं थे। पता नहीं, बाद में क्या हुआ और बज्जू भाई कैसे पाटियाला पहुंचे। पर ये घटना दिखाती है बज्जू भाई खुद मुफलिसी में रहे हैं लेकिन दूसरों की सहायता करने की उनकी भावना कभी दबी नहीं।
ऐसा नहीं है कि बज्जू भाई सिर्फ आर्थिक मदद ही करते रहे हों। अपने कई पूर्व छात्रों के निर्देशकीय व्यक्तित्व को बनाने में बज्जू बाई ने जो साहस दिखाया वो बतौर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय निदेशक कोई और नहीं दिखा सका। चार नाम लेना चाहूंगा। एक तो रायस्टन एबल, दूसरा निखिलेश शर्मा, तीसरा रविजिता गोगोई और चौथा चितंरजन त्रिपाठी। इन चारों को बज्जू भाई ने एनएसडी पास करने के कुछ ही दिनों के बाद रंगमंडल यानी रेपटरटरी में नाटक निर्देशित करने करने को कहा था। अमूमन एनएसडी ग्रेजुएट को रंगमंडल के नाटक का निर्देशन का मौका मिलने में कई साल लग जाते हैं। कई तो आज तक नहीं कर पाए हैं। लेकिन बज्जू भाई ने इन चारों को बहुत जल्द वो मौका दिया। रॉयस्टन एबल आज देश विदेश में इवेंट करने के लिए मशहूर हैं। निखिलेश शर्मा मुंबई में हैं और शायद फिल्म-टीवी लेखन कर रहे हैं। रविजिता गोगोई असम में हैं और वहां की चर्चित रंग निर्देशक हैं। चितरंजन भी बॉलीवुड में सक्रिय हैं और नाटकों का निर्देशन भी करते रहते हैं। चारों का अपना व्यक्तित्व बन गया है। रायस्टन और निखिलेश एक ही बैच में थे। रविजिता और चितरंजन अलग अलग बैच में।
रॉयस्टन ने जो नाटक रंगमंडल के लिए निर्देशित किया था वो था मिखाइल बुल्गाकोव द्वारा लिखित `मोलियर। पीयूष मिश्र ने उसका हिंदी अनुवाद किया था। निखिलेश शर्मा ने धर्मवीर भारती की काव्य रचना `कनुप्रियाका निर्देशन किया था जिसमें आज `बैंडित क्वीनके लिए चर्चित अभिनेत्री सीमा विश्वास ने मुख्य भूमिका निभाई थी। रविजिता ने जयशंकर प्रसाद के `ध्रुवस्वामिनीका निर्देशन किया था। चितरंजन त्रिपाठी ने अजय शुक्ला द्वारा लिखित `ताज महल का टेंडरनिर्देशित किया था जो एक जबर्दस्त कॉमेडी रहा। हाल के वर्षों की सबसे सफल कॉमेडी। इसकी सफलता ऐसी रही है कि एक साल पहले चितरंजन को फिर से इसी नाटक का निर्देशन करने के लिए रंगमंडल में बुलाया गया ।
अजय़ शुक्ला की बात चली तो लगे हाथ ये भी बता दिया जाए कि बज्जू भाई हिंदी में मौलिक नाटकों की खोज में वे हमेशा लगे रहे और कई मौलिक हिंदी नाटक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में उनके कारण हुए। अजय शुक्ला के अलावा कई ऐसे नाम हैं जिनके नाटक पहली बार या तो बज्जू भाई ने किए या उनके कारण हुए। सुरेंद्र वर्मा के दो नाटक `सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तकऔर `कैद ए हयातपहली बार राम गोपाल बजाज ने ही रंगमंडल के लिए किए। सुरेंद्र वर्मा की बतौर नाटककार की जो उपबल्धियां रहीं उनके पीछे इन प्रस्तुतियों की बड़ी भूमिका है। भानु भारती ने दूधनाथ सिंह का लिखा `यमगाथारंगमंडल के लिए तब किया था जब बज्जू भाई रंगमंडल के प्रभारी थे। रंजीत कपूर ने जब `खबसूरत बहू’ ( लेखक-नाग बोडस) किया, जिसमें भी सीमा विश्वास ने ही केंद्रीय भूमिका अदा की थी, तो उसके पीछे भी बज्जू भाई थी। वो स्क्रिप्ट भी उनकी ही खोज थी। बोडस नाटक लिखते थे परंतु उनकी कोई राष्ट्रीय छवि नहीं थी। बज्जू भाई ने उनको भारतीय रंगमंच के क्षितिज पर लाया। उनकी वजह से ही बोडस का दूसरा नाटक `थैंकू बाबा लोचनदासभी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के रंगमंडल ने किया जिसका निर्देशन बीएम शाह ने किया था। बज्जू भाई ही तब रंगमंडल के प्रभारी थे।
कथाकार महेंद्र भल्ला की परवर्ती दिनों में नाटककार की छवि बनी तो उसकी वजह भी बज्जू भाई द्वारा निर्देशित उनका पहला नाटक `दिमागे हस्ती दिल की बस्ती है कहां है कहांहै। हालांकि तब बज्जू भाई एनएसडी के निर्देशक नहीं रह गए थे और इस पद पर देवेंद्र राज अंकुर आ गए थे। पर इस नाटक को करने की तैयारी उन्होंने निर्देशक रहते ही शुरू कर दी थी पर अतिव्यस्तता के कारण उसे कर नहीं पाए थे। भल्ला के दूसरे नाटक `ठीक ऐन उस चीज के आमने सामनेका निर्देशन देवेंद्र राज अंकुर ने किया। कृष्ण बलदेव वैद के नाटक `भूख आग हैभी मंचन बजाज साहब के निर्देशन में हुआ। 
ये सही है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की बुनियाद खड़ी करने में इब्राहीम अल्काजी की बड़ी भूमिका रही। ये भी असंदिग्ध है कि उन्होंने नाट्य प्रशिक्षण की जो आधारशिला रखी उसकी वजह से कई अच्छे अभिनेता और निर्देशक रंगमंच के क्षितिज पर आए। अल्काजी अपनी तरह के अद्वितीय रंग व्यक्तित्व हैं और उनका कोई मुकाबला नहीं। किंतु उसके बाद एनएसडी के सबसे कल्पनाशील निदेशक बज्जू भाई ही हुए और इस संस्था की परिधि का विस्तार जितना उन्होंने किया वह कोई और नहीं कर सका। उनके चलाए कुछ कार्यक्रम तो अब बंद ही हो गए। जैसे `श्रुति। बज्जू भाई द्वारा बनाई गई परिधि अब छोटी पड़ती जा रही है।
बजाज साहब ने अपने कार्यकाल में हिंदी की नाट्य पत्रिका `रंग प्रसंगकी शुरुआत की। उनके कार्यकाल के दौरान ही राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में `श्रुतिकार्यक्रम शुरू हुआ जिसमें हिंदी के वरिष्ठ या युवा, लेकिन चर्चित कथाकार या कवि आकर रचना पाठ करते थे। इस कारण हिंदी भाषी समाज और नाट्य विद्यालय का एक गहरा जीवंत रिश्ता बन गया था। बज्जू भाई ने ही बहावलपुर हाउस परिसर में `सम्मुखथिएटर बनवाया और फिर `अभिमंचबनाना शुरू किया जो अंकुर जी के कार्यकाल में पूरा हुआ। 1996 में बज्जू भाई ने बतौर निदेशक स्कूल के दीक्षांत समारोह के अवसर पर `एकल अभिनय नाट्य समारोह करायाजिसमें लक्ष्मण देशपांडे, वीणापाणि चावला से लेकर नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेताओं ने शिरकत की। उस दीक्षांत समारोह में धर्मवीर भारती मुख्य अतिथि थे। बज्जू भाई की पहल से और उनके निदेशकीय कार्यकाल में एनएसडी ने बच्चों के लिए `जश्ने बचपनऔर `बाल संगमजैसे वार्षिक कार्यक्रम शुरू किए जो बाल रंगमंच को देश भर में आगे बढ़ाने में उत्प्रेरक साबित हुए। आज भी ये दोनों समारोह होते हैं।


और सबसे बढ़कर तो ये कि उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने `भारत रंग महोत्सव’ (भारंगम) शुरू किया। ये 1999 की बात है। जहां तक मेरी जानकारी है `भारंगमशुरू करने का आरंभिक विरोध एनएसडी की फैकल्टी में था। ये बज्जू भाई के व्यक्तित्व का दबाव था कि `भारंगमशुरू हुआ और आज ये आयोजन सिर्फ एनएसडी ही नहीं भारतीय रंगमंच का सबसे बड़ा ब्रांड बन गया है। स्थिति ऐसी हो गई है कि जिस निर्देशक या ग्रूप के नाटक का चयन भारंगम में नही हुआ उसे लगता है कि या तो उसके नाटक करने का कोई अर्थ नहीं है या वो ये आरोप लगाता है कि `भारंगममें चयन की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ है। यहां याद रखनेवाली बात ये भी है कि बज्जू भाई के निर्देशक रहते भारंगम में एक साल 100 से अधिक नाटक हुए। इस रिकार्ड बाद में दुहराया नहीं जा सका। उनकी संगठन क्षमता का इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके कार्यकाल में `भारंगमके आयोजन के लिए उतना बड़ा लश्कर भी नहीं था जितना आज होता है। चंद लोगों के सहारे ही वे ये काम करते थे। तब वे मयूर विहार वे ` कला विहार अपार्टमेंटमें रहते थे और यहां रात में कई बार गोष्ठियां जमती थीं जिनमें मैं भी यदा कदा रहता था। फिर रात भी वहीं बीतती थी। बजाज साबह बहुत अच्छे मेहमानबाज हैं और चाहे वे कला विहार में रहे हों या जनसत्ता अपार्टमेंट में उनके फ्लैट पर दोस्तों का जमावड़ा होता था।
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भारंगमके आरंभिक दिनों की चर्चा कर रहा था। तब मैं देखता था कि सुबह छह बजे के करीब जागने के बाद वे अक्सर फोन से ही आयोजन की तैयारी के लिए लग जाते थे। `भारंगमजब शुरू हुआ था तो मोबाइल का चलन नहीं था। इससे भी अनुमान लगाया जा सकता है वे इसे किस चुनौतीपूर्ण समय में करते थे और कैसे करते थे। कुछ लोगों को उन्होंने वायरलेस सेट खरीद कर दिए थे जो रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट पर अतिथियों को लाने के काम में लगे थे।
आज देश के अकादमिक संस्थानों में जेंडर जस्टिस की चर्चा होती है और इसी कारण उनमें लड़कियों का प्रवेश भी बढ़ रहा है। ये सब अब सहज तरीके से हो रहा है। पर बीस साल पहले ये उतना सहज नहीं था। ऐसे में कोई ये सोच सकता है कि अगर किसी सत्र में सिर्फ बीस छात्र-छात्राओं का चयन होना है तो उनमें से दस छात्राएं हो सकती हैं? बज्जू भाई ने ये किया। वो भी बिना किसी आरक्षण के। 1995 में वे निदेशक बने और 1996 वाले सत्र में कुल बीस छात्र-छात्राओं में दस लड़कियों का चयन हुआ। ये शायद इत्तफाक था कि उन दस में आठ या नौ मुसलिम लड़कियां थीं। उस समय के लिहाज के एक बड़ा कदम था जो एनएसडी में ही फिर से दुहराया नहीं जा सका। वो करने में कैसे कैसे पेंच फंसे थे इसका बयान एनएसडी के एक अध्यापक अब्दुल लतीफ खटाना से कोई सुन सकता है। 
नाटक के अलावा बज्जू भाई का दूसरा प्रेम हिंदी कविता है। वैसे तो दिनकर और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना भी उनके प्रिय हैं पर उनके सर्वाधिक तीन प्रिय कवि हैं- अज्ञेय, कुंवर नारायण और कुमार अंबुज। उनके पास अगर कोई झोला या बैग है तो तय मानिए कि उसमें इन तीन से किसी न किसी एक का कोई काव्य-संग्रह जरूर होगा। हो सकता है कि तीनों के हों। यदि आप उनके करीबी हैं, जिनकी संख्या काफी है, और आपकी मुलाकात ऐसे समय में हो गई है जब उनके पास समय हो, तो आपको वे इनमें से किसी कवि की दो-तीन कविताएं पढ़कर जरूर सुनाएंगे। ये संख्या ज्यादा भी हो सकती है। संभावना इसकी भी है कि आपको वे कहें कि- `आज घर चलो, अज्ञेय की कविताएं सुनाऊंगाँ। ये भी हो सकता है कि उनको किसी की नई कविता बेहद पसंद आए तो आपको फोन पर ही सुनाने लगें।
2016 के `भारंगममें भाग लेने जब वे दिल्ली आए तो अशोक होटल में ठहरे थे। एक दिन बाथरूम में गिर पड़े और गंभीर रूप से घायल हो गए है। चार-पांच दिनों तक अस्पताल में रहे और फिर बंगाली मार्केट वाले एनएसडी के गेस्ट हाऊस में। उस समय, `भारंगमखत्म होने के बाद, विनोद भारद्वाज की पहल से एनएसडी में कुंवर नारायण की कविताओं के पाठ का एक आयोजन रखा गया था। इसकी रूपरेखा पहले से बन गई थी और तय था कि बज्जू भाई कुंवर नारायण की कुछ कविताओं का वाचन करेंगे। उस सिलसिले में आरंभिक बातचीत करने मैं, बज्जू भाई और विनोद भारद्वाज कुंवर नारायण के घर भी गए थे। कुंवरजी के यहां हम सबका जिस आत्मीय ढंग से स्वागत हुआ वो एक अलग स्मृतिलेख का विषय है। खैर, उस मुलाकात के बाद बज्जू भाई दुर्घटनाग्रस्त हो गए। अब मेरे मन में भी तथा विनोद जी के मन में भी संशय था कि इस हालत में बज्जू भाई का कार्यक्रम में भाग लेना और कविताओं का वाचन करना संभव नहीं होगा। बल्कि मैंने तो सुझाव भी दिया कि बज्जू भाई, जोखम मत मोल लीजिए। लेकिन कविता और कुंवर नारायण की कविताओं के प्रति उनका लगाव ऐसा है कि उस अस्वस्थ हालत में भी वे ह्वील चेयर पर आए और अपने उसी उत्साह और ऊर्जा के साथ उन्होंने कुंवर जी की कविताएं सार्वजनिक रूप से पढ़ीं जो पहले के वाचनों में दिखती रही हैं।
बतौर नाट्य निर्देशक भी उनकी कई स्मृतियां मेरे मानस पटल हैं। एक बार वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए विद्याधर पुंडलीक के नाटक `चार्वाकका निर्देशन कर रहे थे। इसका रिहर्सल वे रात में करते थे। तब मैं `जनसत्ताअखबार में काम करता था। कई बार वे मुझे रात में ही रिहर्सल देखने के लिए बुला लिया करते थे। जिस स्थान पर रिहर्सल चल रहा था उसका डिजाइन कुछ ऐसा था कि उसे गड्ढा नुमा बनाया गया। एक रात जब मैं रिहर्सल देख रहा था तब बज्जू भाई किसी अभिनेता को कुछ बताने के लिए इतनी तेजी से नीचे उतरे कि शरीर अंसुतलित हो गया। जहां तक मुझे याद है उनके पैर में हेयरलाइन फ्रैक्चर हो गया था। 
वे बतौर नाट्य निर्देशक अपने अभिनेतों की सुख सुविधा का काफी खयाल रखते हैं। ये भी मैंने बहुत कम निर्देशकों में देखा है। अपने अभिनेता और दूसरे साथी सही समय पर खा रहे हैं या नहीं, उनको चाय मिली या नहीं या उनके रात में घर जाने का क्या इंतजाम है- इन सब पर उनकी पैनी नजर रहती है। एक दम परफेक्ट। इसलिए उनके नाटकों में अभिनेताओं या तकनीशिनों को किसी तरह का तनाव नहीं होता और नाटक भी बड़े आराम से तैयार होता है। 
मैंने उनके द्वारा निर्देशित कई नाटक देखे हैं। लेकिन उनका जो नाटक मेरे दिल में खुबा हुआ है वह है `कैद ए हयात।ये मिर्जा गालिब की जिदंगी पर आधारित है। श्रीवल्लभ व्यास ने इसमें केंद्रीय भूमिका निभाई थी। यानी गालिब की। और गालिब की प्रेमिका की भूमिका सीमा विश्वास ने निभाई थी। शुरुआती प्रदर्शनों मे हिमानी शिवपुरी गालिब की पत्नी की भूमिका में थीं। इसका प्रारंभिक प्रदर्शन एनएसडी के उस स्टूडियो थिएटर में हुआ था जो तब साहित्य अकादेमी की तीसरी मंजिल पर था। वह स्टूडियो थिएटर अब नहीं है। उस जगह पर आज अकादेमी का एक सभागार बन गया है।
कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो कहेंगे कि बज्जू भाई रंगमंच की राजनीति भी करते हैं। कुछ चर्चित नाट्य निर्देशक अपने साथ हुए वाकये सुनाएंगे और कहेंगे- `मेरे साथ बज्जू ने ये किया।या वे किसी और के साथ हुए वाकये सुनाएंगे कि `बज्जू ने निर्देशक रहते फलां का नाटक कुछ शो के बाद बंद कर दिया। यही नहीं, एनएसडी में आज भी कई ऐसे कर्मचारी और कुछ अध्यापक भी मिल जाएंगे जो उनकी तनी हुई भृकुटि और एक जगह जमी निगाह को देखकर सहम जाएंगे। बाज वक्त बज्जू भाई एक जगह खड़े हो जाते हैं, आंखों को उस आदमी पर जमाते हैं जिसके साथ कोई मामला हो, उसको घूरते हैं और सिर को थोड़ा हिलाते हैं। हालांकि ये एक अभिनेता की अदा है, मगर इसे बज्जू भाई ने एनएसडी के भीतर एक पॉलिटिशयन का अंदाज भी बना दिया है। सामने वाला सोचता है कि मेरे खिलाफ कुछ पक रहा है। वो एक मनोवैज्ञानिक खौफ की मन:स्थिति में चला जाता है और परेशान हो जाता है। कुछ मर्तबा तो बज्जू भाई भी ये सुनाते मिल जाएंगे – `मैंने फलां को ठीक कर दिया 
इन सबके बावजूद ये भी कहना पड़ेगा कि बज्जू भाई ठोंक के चुनौती देते हैं और कोई ये नहीं कह सकता कि उसके साथ दगा किया गया। किसी को चुनौती दी तो खुल्लमखुल्ला। मुझे याद है आज के वरिष्ठ रंगकर्मी प्रसन्ना ने एनएसडी के लिए गिरीश कार्नाड का नाटक `अग्नि और बरखाकिया था। प्रसन्ना और बज्जू भाई की काफी दोस्ती रही। किसी बात पर प्रसन्ना से उनकी ठन गई। मैं तब `जनसत्तामें ही था और रात में आईटीओ पर हनुमान मंदिर के पीछे एक ढाबे पर खाना खा रहा था। हमउम्र रंगकर्मी अविनाश देशपांडे भी साथ थे। कुछ देर बाद बज्जू भाई भी आ गए। वे कुछ ढाबों के मुरीद रहे हैं जिनमें एक ये भी है। मुझे देखा तो बोले- `अग्नि और बरखादेखा कि नहीं। मैंने कहा- `अभी नहीं देखा। बोले, `दो-तीन दिनों में देख लो क्योंकि उसे बंद कर रहा हूं।दिलचस्प ये है कि उस नाटक की प्रस्तुति आगे न हो इसके लिए चिट्ठी उन्होने गिरीश कार्नाड से लिखवा ली। आज भी ये रहस्य है कि गिरीश को उन्होंने क्या पाठ पढ़ाया था? मेरी प्रसन्ना से भी गहरी दोस्ती रही और आज भी कायम हैं। और दोनों, ये जानते हुए कि मेरी दूसरे से गहरी दोस्ती है, मुझसे संबंध बनाए रखते हैं। ये उन दोनों की खूबी है।
मेरा अपना मानना है कि बज्जू भाई के भीतर एक हठी व्यक्तित्व उस समय जाग जाता है जब उनको लगता है कि कोई लंगड़ी मारने का प्रयास कर रहा है। फिर वे समझौता नहीं करते। एक तरफ तो वे दानवीर हैं और कोई चीज उनके पास है या उनके सामर्थ्य में है तो उसे मांगने पर अस्वीकार नहीं करेंगे। परंतु अगर सामनेवाले ने किसी तरह का दबाव बनाया तो फिर बज्जू भाई दबंग हो जाते हैं। उन्होंने झुकना नहीं सीखा है भले ही उनको जाती नुकसान हो। 
राम गोपाल बजाज का बचपन घोर अभाव में बीता। उनके नाम में बजाज जरूर जुड़ा हुआ है लेकिन वे बजाज परिवार में नहीं जन्में। एक ऐसे मारवाड़ी बनिया परिवार में उनका जन्म हुआ जो घोर दारिद्य में जी रहा था। उस परिवार में जन्मे सभी बच्चे दूसरे मारवाड़ी परिवार में गोद लिए गए। बज्जू भाई बजाज परिवार में गोद लिए गए इसलिए उनका सरनेम बजाज है। उनके दूसरे सहोदर भाइयों के सरनेम अलग अलग हैं क्योंकि वे अलग अलग परिवारों में पले और गोद लिए गए। इस हिसाब से देखें तो बज्जू भाई का जीवन एक उपन्यास की मांग करता है। कोई चाहे तो उस पर एक बड़ा टीवी धारावाहिक भी बना सकता है। बहुत कम जिंदगियां ऐसी होती हैं जिनमें इतने घुमाव गलियां होती हैं। 
बज्जू भाई आजकल दिल्ली में नहीं रहते पर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मानसिक रूप से अभी भी वे दिल्ली में ही रहते हैं। खासकर एनएसडी और मंडी हाउस के परिसर में उनका मन रमता है। उनसे जब भी, बातें होती हैं, इस इलाके का जिक्र जरूर आता है। `बंटी और बबलीफिल्म में `कजरारे कजरारेवाला गाना है। उसमें एक जगह ये पंक्तियां आती हैं- `तुझसे मिलना पुरानी दिल्ली में/ छोड़ आए निशानी दिल्ली में/ बल्लीमारां से दरीबे तलक/ तेरी मेरी कहानी दिल्ली में।बज्जू भाई के पुराने मित्र, चाहे वे पुरुष हो या स्त्री, इस गीत को गाते हुए अगर `बल्लीमारां से दलीबे तलककी जगह `रवींद्र भवन से बहावलपुर हाउस तलककर दें तो ये उनके संबंधों को याद दिलानेवाली पंक्तियां होंगी। ऐसे पुरुषों और स्त्रियों की काफी बड़ी संख्या है।


पता- ई- 102, जनसत्ता अपार्टमेंट्स, सेक्टर -9, वसुंधरा, गाजियाबाद-201012
मोबाईल-9873196343



एक ही थैले के...

गहमा-गहमी...