Thursday, August 13, 2009

सच का कैसे हो सामना

रज्जन सुल्तानपुरी सुल्तानपुर के हैं कि नहीं ये प्रमाणिक नहीं है लेकिन सुल्तानपुरी उनके नाम के साथ ऐसा चिपका है जसे जलेबी के साथ चाशनी चिपक जाती है। बस उन्होंने किसी तरह खुद को चींटिंयों से बचा कर रखा है नहीं तो उन्हे चींटे कब के चट कर गए होते। उनके स्वभाव से यूं तो सभी वाकिफ थे लेकिन वह नजर-ए-इनायत करते-करते, कब तीर-ए-नज़्ार कर देगें किसी को पता नहीं चलता। अगर बच गए तो तकदीर अच्छी अगर तीर लग गई तो भगवान बचाए...।
उनसे लोग प्रश्न पूछने से कतराते हैं क्योंकि दोहा, छंद यही नहीं विभिन्न विधाओं में वह उसका उत्तर देने में सक्षम हैं। उनकी प्रशंसा कब आलोचना बन जाए कहा नहीं जा सकता। सीधे प्रश्नों के उत्तर भी लताओं जसे होते हैं। समसामयिक मुद्दा दाल पर उनकी परिचर्चा सुनने कई लोग आए, यह परिचर्चा उनके किसी तथाकथित साहित्यकार मित्र छज्जन ने प्रायोजित की थी। वजह यह थी कि इसी बहाने लोग उन्हे भी जान जाएंगे। हुआ भी कुछ ऐसा ही, सभा में तमाम तरह के साहित्यिक और गैर साहित्यिक प्रश्न उठाए गए। बात आते-आते मंहगाई पर टिक गई। कु छ लोग उन्हे राजनीतिक प्रतिनिधि समझ कर प्रश्नों के तीर मारे जा रहे थे लेकि न सभी प्रश्नों के उत्तर वह सधे हुए देते थे। किसी ने अरहर के दाल की चर्चा कर दी, उन्होंने कहा कि अरहर की दाल ने उड़द, मटर, मसूर की लाज रख ली नहीं तो इनको कौन पूछता। अब मूंग की दाल खिचड़ी केवल बीमार ही नहीं खाएंगे, बल्कि मुस्टंडे भी चखेंगे। बात यहीं खत्म नहीं हुई। एक सज्जन ने सवाल उठाया कि दाल के साथ चीनी का भी मामला कुछ ऐसा ही होता जा रहा है। इस पर उनका जवाब था कि चीनी तो शुरू से ही बुर्जआ वर्ग के जीभ का स्वाद बढ़ाती आई है यह तो मजदूरों की दुश्मन है। अब तो अमीर लोग भी मधुमेह के कारण इससे तौबा कर रहे हैं। सभा अब पूरी तरह से असाहित्यिक हो चुकी थी कि किसी सज्जन ने कहा सुना है आप कवि टाइप हृदय रखते हैं उन्होंने गिलौरी मुंह में दबाकर दो इंच में मुस्कान बिखेरी बाद में पता चला कि कुर्ता खराब हो गया है।
इसके बाद रज्जन सुल्तानपुरी ने रिक्शा लिया और बड़े अपनत्व के साथ चल निकले रास्ते भर जी भर के अपनी योग्यता के बारे में बताया उसकी योग्यता जाना। लेकिन उतरते समय किराया को लेकर झकझक हो गई, बात हाथापाई तक आ गई। रिक्शे वाला तुनक खड़ा हो गया और बोला, मां का दूध पिया है तो आ जा.. इस पर रज्जन सुल्तानपुरी ने कहा मां का दूध तो सब पीते हैं तू अमूल या मदर डेरी का दूध पिया है तो हाथ आजमा ले.. रिक्शावाला सच का सामना नहीं कर पाया।
अभिनव उपाध्याय

1 comments:

shreesh prakhar said...

कल्पना हमेशा की तरह सुंदर पर समय की कमी रही होगी लिखते समय...नए दौर की मीडिया में सब कुछ सिंगल क्लिक पे होना चाहिए तो भाई ने सोचा विचार कम...सजाया- संवारा ज्यादा....भाई टिप्पणी देते समय ईमानदार रहूँगा...मुआफ करना......पट्टू.

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