Wednesday, September 9, 2009

मंहगाई में प्रेम पत्र

हे मन प्रिये, मैं सच कहता हूं चाहो तो वित्तमंत्री की कसम खिला लो। जब मैंने पत्र लिखना शुरू किया तभी कलम रुक-रुक कर चलने लगी। मैं जान गया कि इसे भी पैसेंजर ट्रेन वाली आदत पड़ गई है। लेकिन कलम की स्याही जवाब दे गई। मध्य रात्रि को घनघोर गर्मी में जूझते हुए जब पड़ोसी से कलम के लिए दरवाजा खटखटाया तो उसे लगा कि यह फिर चाय पत्ती मांगने आ गया। बहुत मनुहार के बाद जब उसे विश्वास हुआ कि मैं वास्तव में कलम पिपासू हूं तो उसने दरवाजा खोला और फिर कलम देकर झट से बंद कर दिया। सच मानो तुम्हे पत्र लिखते समय कलेजा सेंसेक्स की तरह ऊपर नीचे हो रहा है। मेरे हृदय में तुम्हारा जो स्थान है वह निश्चित रूप से सोने के भाव की तरह है जो नीचे होने वाला नहीं है।
यह सत्य है कि हमारे-तुम्हारे बीच पक्ष-विपक्ष की तरह वार्तालाप नहीं हुआ लेकिन प्रेम के राज्य में मुख की अपेक्षा नेत्र अधिक बोलते हैं। आजकल प्रेम राज्य में सूखा है सरकारी घोषणा के बावजूद भी मेरे मन के रेगिस्तान में किसी जलबोर्ड का पानी नहीं आया है। सच कहूं तो जल बोर्ड का पानी घर पर भी नहीं है। इसलिए सूखा दो तरफा है। हां एकाध बार बारिश हुई लेकिन कम्बख्त छत भी सरकारी व्यवस्था की तरह कमजोर निकली और बस भीग गया कागज। बहरहाल तुम चिंता मत करो।
कल कबीर को पढ़ रहा था। प्रेम गली अति सांकरी, यामे दुई न समाय। यह बिल्कुल सच है। प्रेम की गली में मंहगाई और मैं एक साथ नहीं रह सकते। मंहगाई के कारण मेरा प्रवेश लगभग वर्जित है। मन रोटी दाल के भाव देखकर चिहुंक जाता है। प्रणय, परिणय और प्रीत के बीच मंहगाई की घोड़ी दुलत्ती झाड़ रही है। प्रेम का मुहावरा प्रचलित है ‘लव मी एंड लव माई डागज् मतलब, हे प्रिये तुम मुङो चाहो तो मेरे चाहने वालों को भी चाहो। मुङो पता है शायद तुम यह कहो लेकिन, इस मंहगाई में एक ही भारी पड़ रहा है अत: उम्मीद है कि भावनाओं को समझोगी। अब दूसरी कलम भी जवाब दे रही है अत: हे.. पत्र का उत्तर शीघ्र पाने की आकांक्षा के साथ आपका गरीब नाथ।
शीघ्र पत्र आया.. हे गरीब नाथ, मैं आपकी भावनाओं को समझ रही हूं अत: जब आर्थिक मंदी बीत जाए तब ट्राई करना। अभी मेरे पास भी वक्त नहीं है आजकल रोज शॉपिंग में व्यस्त रहती हूं। तुम्हारी..सुखहरणी
अभिनव उपाध्याय

2 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

महंगाई जो कल मुर्गी थी
आज अरहर की दाल हो गई
दाल जो काली थी
आज गोरी और लाल हो गई।

श्रीश प्रखर said...

"कल कबीर को पढ़ रहा था। प्रेम गली अति सांकरी, यामे दुई न समाय। यह बिल्कुल सच है। प्रेम की गली में मंहगाई और मैं एक साथ नहीं रह सकते। मंहगाई के कारण मेरा प्रवेश लगभग वर्जित है। मन रोटी दाल के भाव देखकर चिहुंक जाता है। प्रणय, परिणय और प्रीत के बीच मंहगाई की घोड़ी दुलत्ती झाड़ रही है.."

सुन्दर रीति से बेबाक-बयानी , वाह मौला.......शादी इसीलिये नहीं कर रहे है ना......:)

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