Sunday, October 11, 2009

जिसको हम जानते हैं मकबरे से


शासक केवल शासन ही नहीं करता बल्कि अपनी निशानी के रुप में कुछ अविस्मरणीय छोड़कर जाना भी चाहता है। सैय्यद वंश के शासक मुबारक शाह ने मकबरे के रुप में ऐसी निशानी छोड़ी है। सैय्यद वंश द्वारा निर्मित अष्टभुजाकार मकबरे का यह अच्छा उदाहरण माना जाता है।
1421 से 1434 तक शासन करने वाले मुबारक शाह ने सेकी साम्राज्य को न केवल राजपूतों के अतिक्रमण से बचाया बल्कि मुबारकाबाद जसे सुन्दर शहर की परिकल्पना भी की और उसके निरीक्षण के दौरान अपने विश्वास पात्रों द्वारा मारा भी गया।
सैय्यद वंश के शासन में निर्मित यह मकबरा आजकल मुबारक शाह की मजार तक अतिक्रमण से घिरा है। इस बारे में दिल्ली सरकार और एएसआई समेत पुरातात्वि स्मारकों को संरक्षण देने वाले संस्थानों ने कुछ विशेष नहीं किया है। कुछ वर्ष पूर्व मकबरे के सुन्दरीकरण के नाम पर वहां की फर्श पर पत्थर लगाने का काम तो किया गया लेकिन वह भी अधूरा पड़ा है। मकबरे की दीवारों की दरार यहां स्पष्ट रुप से देखी जा सकती हैं। यहां पर जाने के लिए कोई सीधा रास्ता नहीं है। कोटला मुबारकपुर गांव में स्थित इस मकबरे तक जाने के लिए टेढ़े-मेढ़े और तंग रास्तों से जाया जा सकता है। लेकिन इसे ठीक से देखना मुमकिन नहीं है क्योंकि मकबरे के चारो ओर लगभग तीन फीट छोड़कर ऊंचे-ऊंचे मकान बनाए गए हैं। यही नहीं इस मकबरे के चबूतरे का उपयोग गांव के लोग द्वारा त्योहारों के या शादी विवाह के अवसर पर सार्वजनिक उपयोग के लिए किया जाता है।
इस मकबरे से थोड़ी दूर पर एक मस्जिद भी है। लेकिन यह मस्जिद किसी छोर से दिखाई नहीं देती लगभग 100 मीटर अंदर एक मस्जिद भी है जिसका संबंध मुबारक शाह की कत्ल से जुड़ा हुआ है। यहां अतिक्रमण इस हद तक है कि मस्जिद की दीवारों के ऊपर से लोगों ने दीवार खड़ी कर दी है और निर्माण कार्य करवा रखा है।
इस गांव का अपना इतिहास है पहले इसे मुबारकाबाद कहा जाता था।
याहिया बिन अहमद सिरहिन्दी ने तारीख ए मुबारक शाही में लिखा है कि, मुबारकाबाद को मुबारक शाह ने 1434 में बसाया था। इस जगह को खराबाबाद-ए-दुनिया कहा जाता था जिसका मतलब बेकार जगह से है। लेकिन मुबारक शाह ने इसको नए शहर के रू प में बसाया। इस मकबरे के समीप की मस्जिद के निर्माण के निरीक्षण के दौरान जुमा के नमाज के समय ही उसके विश्वसनीय लोगों द्वारा 19 फरवरी 1434 में उसकी हत्या कर दी गई। इस हत्या का षणयंत्रकारी मिरान सदर था।
यह मकबरा कई कारणों से अपनी विशिष्टता के लिए जाना जाता है। संभवत: यह पहला पठानोत्तर शैली का मकबरा है जो चबूतरे के ऊपर बनाया गया है। यही नहीं इसमें लाल बलुए पत्थरों और रंगीन टाइल्स का इस्तेमाल किया गया है। गांव के एक व्यक्ति ने बताया कि पहले चबूतरा ऊंचा था लेकिन स्थानी लोगों ने इस पर मिट्टी डालकर इसे सड़क के बराबर बना दिया है।
पूर्णत: सरकारी उपेक्षा का शिकार इस मस्जिद और मकबरे के बारे में एएसआई ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। एएसआई के एक अधिकारी ने बताया कि वहां से अतिक्रमण हटाने की कोशिश हो चुकी है लेकिन फिर से लोगों ने कब्जा जमा रखा है। इस पर जल्द ही उचित कदम उठाया जाएगा।

धार्मिक मान्यता भी है इस मकबरे की-
इस मकबरे की एक धार्मिक मान्यता भी है। मकबरे के अंदर सात कब्र है। स्थानीय लोग एक कब्र मुबारक शाह की मानते हैं शेष उसके परिजनों की। गांव के लोगों का मानना है कि जब भी कोई नया कार्य शुरू होता है तो इस मकबरे में पूजा अर्चना की जाती है। शादी के खास अवसर पर दूल्हा घोड़ी चढ़ने पर पहले मकबरे में मत्था टेकता है और उसके बाद मंदिर में जाता है।

1 comments:

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

ये इतिहास के पन्ने सरीखे हैं,,,नोट कर लेने लायक,,,,,उम्दा जानकारी की एक और कड़ी...

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एक ही थैले के...

गहमा-गहमी...