Sunday, August 9, 2009

खुश रखे, खुश करे सो पुरस्कार !

विश्वनाथ त्रिपाठी
पुरस्कारों पर बात करना मेरा प्रिय विषय नहीं है। कुछ साहित्यकार ऐसे हो सकते हैं जो पुरस्कार पाने की उम्मीद रखते हैं और पुरस्कार न पाने से कुंठित होते हैं। कु छ ऐसे भी साहित्यकार हो सकते हैं जो पुरस्कारों की दौड़ में नहीं रहते हैं। कुछ लोग जो अपने लेखन से इतना संतुष्ट हों या पाठकों का प्रेम मिला हो वो पुरस्कार न मिलने से चिंतित नहीं होते। पुरस्कारों की चिंता इसके व्यवस्थापकों को करनी चाहिए रचनाकारों को इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए कि उन्हे पुरस्कार मिला या नहीं। यदि किसी को पुरस्कार मिलता है तो बाकी रचनाकारों को इसमें खुशी होनी चाहिए उसे खुशी-खुशी मनाना चाहिए।
हिन्दी जगत में वह स्थिति आदर्श होती कि जिसे पुरस्कार के लिए नामित किया है वह स्वयं दूसरे को हकदार बताता। साहित्य जगत में ऐसी स्थितियां होनी चाहिए लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ है। अमरकांत की पुस्तक ‘इन्हीं हथियारों सेज् को और मेरी पुस्तक ‘नंगा तलाई का गांवज् को साहित्य अकादमी के पुरस्कार के लिए चुनना था, निर्णायक डा. निर्मला जन ने जब मुङो बताया कि उन्होने अमरकांत की पुस्तक को चुना है तो मैंने कहा कि आप ने ऐसा निर्णय लेकर स्वयं को, मुङो और अकादमी को कलंकित होने से बचा लिया। कहां अमरकांत और कहां मैं! उन्हे यह पुरस्कार बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। जब मैंने अमरकांत को फोन करके बधाई दी तो उन्होंने सरल स्वर में कहा था कि यह पुरस्कार आपको है। मुङो अफसोस है कि मैं यह बात कह रहा हूं लेकिन मैं शायद एकाध समीक्षक में से हूं जिसने इस उपन्यास की प्रशंसा की थी।
जो लोग साहित्य उद्योग में रहते हैं जो अच्छाइयां न देखकर बुराइयां देखते हैं उनका नाम ज्यादा होता है। अशोक वाजपेयी ने भी साहित्य अकादमी सम्मान लेने के बाद विनोद शुक्ल को यह पुरस्कार मिलने की बात की थी। डा. राम विलास शर्मा की कृति ‘निराला की साहित्य साधनाज् को जब चुना गया तो इसमें तीन निर्णायक थे, सुमित्रा नंदन पंत, बाल कृष्ण राव और पं हजारी प्रसाद द्विवेदी। इस पुस्तक में पंत की छवि को ध्वस्त किया गया है। बाल कृष्ण राव की भी आलोचना की गई है। इन दोनों ने इस पुस्तक की संस्तुति की और पंत ने तो कहा कि बाकी सभी किताबों को कूूड़े में फेंक देना चाहिए।
जब हम साहित्य अकादमी पर बातें करते हैं तो सब बुरे ही नहीं दिखते। कई बड़े साहित्यकार हैं जिन्हे पुरस्कार नहीं मिला, निराला, रेणु, मुक्तिबोध आदि रचनाकारों को साहित्य अकादमी नहीं मिला। रचनाकारों के बड़े होने का मानदंड पुरस्कार नहीं हो सकता। साहित्य अकादमी की स्थापना नेहरु ने फ्रेंच अकादमी के आधार पर की थी। फ्रेंच अकादमी में 40 सदस्य होते थे जिन्हे चालीस कालजयी (फोर्टी मार्टल) कहा जाता है। इसके पहले अध्यक्ष पं नेहरू थे। मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि उन्होंने न किसी का नाम प्रस्तावित किया था और न ही किसी का विरोध किया था। साहित्य अकादमी के पुरस्कार के लिए दिनकर ने दबाव डाला था कि यशपाल के उपन्यास झूठा-सच को पुरस्कार न मिले क्योंकि इसमें नेहरू की आलोचना की गई उस वर्ष यशपाल को पुरस्कार नहीं मिला। भाषाओं से हिन्दी का क्षेत्र काफी बड़ा है। इसमें कई योग्य साहित्यकार हैं इसलिए हिन्दी पुरस्कारों में विवाद है। दिल्ली में ही कई योग्य साहित्यकार हैं, कोई न कोई छूट ही जाता है। के न्द्रीय साहित्य अकादमी की स्थिति प्रांतीय अकादमियों से अच्छी हैं। यहां राजनीति का हस्तक्षेप कम है। जब मार्कण्डेय सिंह दिल्ली के उप-राज्यपाल थे, तब हिन्दी अकादमी दिल्ली की कार्यकारिणी में भीष्म साहनी, राजेन्द्र यादव, असगर वजाहत, स्वयं मैं था, प्रो. हरभजन उपाध्यक्ष थे तब त्रिलोचन शास्त्री और मन्मथ नाथ गुप्त को सम्मान लेने के लिए उनके पैर पकड़ कर मनाना पड़ा था कि आप सम्मान ले लें। हिंदी अकादमी से संबंधित लोग जो उससे जुड़े रहते थे उन्हे किसी प्रकार की वित्तीय सहायता अकादमी की तरफ से नहीं दी जाती थी। जब हरभजन सिंह हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष थे। वे बीमार थे और आर्थिक संकट से गुजर रहे थे लेकिन चूंकि वह उपाध्यक्ष थे इसलिए उन्होंने अकादमी की तरफ से कोई सहायता राशि नहीं ली।
जब पीके दवे दिल्ली के राज्यपाल थे तो उस समय हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष नामवर सिंह थे। तब शलाका सम्मान के लिए कृ ष्णा सोबती और साहित्यकार सम्मान के लिए मुङो नामित किया गया था लेकिन भाजपा शासन में मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा ने तीन साल तक यह पुरस्कार हमें नहीं दिया। इस पर कृष्णा सोबती ने पत्र लिखकर पुरस्कार लेने से मना कर दिया। इसके बाद मैंने भी मना कर दिया। बाद में जब जनार्दन द्विवेदी हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष बने तो दोनों को सम्मान दिया।
अरुण प्रकाश जसे स्वाभिमानी साहित्यकार बहुत कम है । मुझसे छोटे हैं लेकिन उन लोगों में से हैं जिनसे मैं मर्यादा की शिक्षा लेता हूं। घोर आर्थिक संकट से गुजरे लेकिन उनके अंदर भारी जीजिविषा है और मैनें उसे कभी टूटते नहीं देखा। बीमारी से जूझ रहे अरुण प्रकाश ने हाल ही में बिहार सरकार का सम्मान लेने से मना कर दिया क्योंकि वहां की सरकार भाजपा समर्थित है। वे हमारे निकट हैं लेकिन पुरस्कार न लेने की बात पुष्पराज ने बताई उन्होंने स्वयं नहीं बताई। यह एक नैतिक मर्यादा और आचरण है जो साहित्यकार को अपने समय का सभ्य और सुसंस्कृ त नागरिक बनाता है। एक तरफ ऐसे लोग भी हैं और दूसरी तरफ वे हैं जो स्वार्थान्ध होकर विज्ञापनी मानसिकता से ग्रस्त हैं ।
(अभिनव उपाध्याय से बातचीत पर आधारित)
आज समाज से साभार

2 comments:

परमजीत बाली said...

आभार।

अविनाश वाचस्पति said...

सही दृष्टि उचित दिशा

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एक ही थैले के...

गहमा-गहमी...