Tuesday, August 11, 2015

तमस- ये अंधेरा कितना घना है!

रवीन्द्र त्रिपाठी
सांप्रदायिकता के प्रसंग में `तमस’ की याद स्वाभाविक है। भीष्म साहनी का ये उपन्यास हिंदी और भारतीय साहित्य़ में इस कारण भी समादृत है कि ये सांप्रदायिकता की विनाशकारी ताकत और भूमिका को रेखांकित करता है। भीष्म जी ने खुद एक आत्म वक्तव्य में लिखा है  (संदर्भ `भीष्म साहनी- एक मुकम्मल रचनाकार’- प्रकाशक `सहमत’) कि सन् 1970 के इर्दगिर्द महाराष्ट्र के भिवंडी शहर में दंगे के दौरान  वे वहां अपने बड़े भाई बलराज साहनी और फिल्मकार-लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास के साथ  गए थे तो वहां की विभीषिका को देखकर उनके दिमाग में अपने मूल शहर रावलपिंडी की वे यांदे ताजा हो गई जहां आजादी के ठीक पहले दंगे हुए थे। भीष्म जी उसी इलाके में जन्मे थे। `तमस’ के कई , बल्कि ज्यादातर, प्रसंग उस दंगे से ही उठाए गए हैं।   ऐसे में इस उपन्यास  को  सांप्रदायिक मनोवृत्ति को उजागर करनेवाला उपन्यास माना जाए तो इसे में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यशपाल के `झूठा सच’ के  बाद `तमस’ ही  हिंदी में वह रचना है जिसके बारे में ये कहा जा सकता है कि इस भारत विभाजन से जुड़े सांप्रदायिकता के मुद्दे को व्यापक परिप्रेक्ष्य में उठाया है। भीष्म जी की कहानी `अमृतसर आ गया  है’ भी सांप्रदायिक मनोवृत्ति को उजागर करनेवाली रचना है।
  लेकिन कोई बड़ी रचना  किसी खास समस्या, चाहे वो कितनी ही बड़ी क्यों न हो, तक केंद्रित होकर अर्थवान नहीं होती। उसमें कई आवाजें होंती हैं और वे आवाजें समाज और मनुष्य के कई परतों से हमारा साक्षात्कार कराती हैं। `तमस’ को मैं ऐसी ही रचना मानता हूं। अपने प्रकाशन के चासील साल के अधिक बीत जाने के बाद भी अगर ये हमारे समकालीन साहित्य का एक संदर्भ-विंदु बना हुआ है तो इसकी एक वजह, मेरे खयाल से, ये भी है कि  इसमें व्यक्तिगत और सामाजिक मनोविज्ञान की कई गुत्थियां और प्रवृत्तियां हैं, ब्रितानी उपनिवेशवाद के तौर तरीकों से वाकफियत कराने की इसकी क्षमता है और ये फिर हमें उस अंधेरे का पता देती है जो लगातार घना हो रहा है तथा जो भारत में हीं नहीं दुनिया के कई देशों फैल रहा  है। `तमस’ की अंतर्वस्तु इस बात से भी जुड़ी है कि लोग दूसरों को और अपने को किस रूप में पहचानते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो `अपने’ और दूसरे’` का विभाजन ही एक सांप्रदायिक मनोवृत्ति है क्योंकि जब इस तरह का विभाजन करते हैं- यहां उसका तात्पर्य हिंदू बनाम मुसलमान विभाजन से है- तो उसमें दूरी और तनाव अनिवार्य है। हिंसा की आशंका भी।  सामाजिक स्तर पर इस तरह के भेद और विभाजन हर समाज में मौजूद रहते हैं लेकिन जब उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष जैसे ऐतिहासिक आंदोलन की प्रक्रिया में  पर इस विभाजन को पाट कर `नागरिकता’ या `भारतीयता’ की नई संकल्पना पेश की जा रही हो, तो उपनिवेशवादी  ताकतें पुरानी अस्मिताओं को आपस में एक दूसरे के खिलाफ लड़ने के लिए माहौल बनाती है। ` तमस’ में भी हम ऐसा ही होता दिखते हैं। इसलिए मेरी प्रस्तावना है कि ये सिर्फ सांप्रदायिकता को रेखांकित करनेवाला उपन्यास नहीं है।
मोटे तौर पर जिसे पहचान की समस्या या पहचान की राजनीति कहते हैं भारत में उसका सीधा संबंध भारत-पाक विभाजन रहा है और इसी  कारण उपनिवेशवाद से मुक्ति के लिए चले संघर्ष से भी। विभाजन के ठीक पहले भारत में जो सांप्रदायिक उन्माद गहराया उसका उत्स आंतरिक  नहीं था बल्कि बाहरी भी था। जरा देखिए कि उस समय पहचान की राजनीति कैसे काम कर रही थी और कौन सी ताकते थीं जो इस राजनीति में सक्रिय थी।  `तमस’ के शुरुआती पन्नों में आए इस प्रसंग को देखिए- ``नत्थू ने झट से मुड़कर देखा। तीन आदमी गली के मोड़ पर से सहसा प्रकट हो गए थे और नारे लगाने लगे थे। नत्थू को लगा  जैसे गली के बीचोबीच खड़े वो गान-मंडली का रास्ता रोके खड़े हैं। इन तीन आदमियों से एक के सर पर रूमी टोपी थी और आंखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा था। वह आदमी गली के बीचोबीच खड़ा मंडली को ललकारता हुआ सा बोल रहा था:
``कांग्रेस हिंदुओं की जमात है। इसके साथ मुसलमानों का कोई वास्ता नहीं है।‘’
इसका जवाब मंडली की ओर से एक बड़ी उम्र के आदमी ने दिया: `` कांग्रेस  सबकी जमात है। हिंदुओं की, सिखों की, मुसलमानों की। आप अच्छी चक ह जानते हैं महमूद साहिब, आप भी पहले हमारे साथ ही थे।“
और उस वयोवृद्ध ने आगे बढ़कर रूमी टोपीवाले आदमी को बांहों में भर लिया। मंडली में से कुछ लोग हंसने लगे। रूमी टोपीवाले ने अपने को बांहों में से अलग करते हुए कहा:
``यह सब हिंदुओं की चालाकी है, बख्शीजी हम सब जानते हैं। आप चाहे जो कहें कांग्रेस हिंदुओं की जमात है और मुस्लिम लीग मुसलमानों की। कांग्रेस मुसलमानों की रहनुमाई नहीं कर सकती।‘’
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वयोवृद्ध आदमी कह रहा था:
``वह देख लो , सिक्ख भी हैं. हिंदू भी हैं, मुसलमान भी हैं। वह अजीज सामने खड़ा है, हकीम जी खड़े हैं----------‘’
``अजीज और हकीम हिंदुओं के कुत्ते हैं। हमें हिंदुओं से नफरत नहीं, इन कुत्तों से नफरत है।‘’ उसने इतने गुस्से में कहा कि कांग्रेस मंडली के दोनो मुसलमान खिसिया गए।
``मौलाना आजाद क्या हिंदू  है या मुसलमान?’’ वयोवृद्ध ने कहा। ``वह तो कांग्रेस का प्रेसिडेंट है।‘’
मौलाना आजाद हिंदुओं का सबसे बड़ा कुत्ता है।गांधी के पीछे दुम हिलाता फिरता है, जैसे ये कुत्ते आपके पीछे दुम हिलाते फिरते हैं।
इस पर वयोवृद्ध बड़े धीरज से बोले:
``आजादी सबके लिए है। सारे हिंदुस्तान के लिए है।‘’
``हिंदुस्तान की आजादी हिंदुओं के लिए होगी, आजाद पाकिस्तान में मुसलमान आजाद होंगे”
आइए अब चलते हैं उपन्यास के आखिरी हिस्से की ओर जहां शहर में अमन कायम करने के लिए बैठक हो रही है। उसी समय  एक लीगी उठकर खड़ा हो जाता है और कहता है-
`` ले के रहेंगे पाकिस्तान! बख्शी जी, यह फरेब आप छोड़ दें। एक बार मान जाएं कि कांग्रेस हिंदुओं की जमात है, इसके बाद मैं इन्हें गले लगा लूंगा। कांग्रेस मुसलमानों की नुमाइंदगी नहीं कर सकती।“
 ये दो  प्रसंग हैं जिनके माध्यम से ये समझा जा सकता है कि भारत की आजादी की लड़ाई के आखिरी दौर में, जब देश विभाजन की तरफ भी बढ़ रहा था, किस तरह की मानसकिता सक्रिय थी। भारतीयता या मनुष्यता की पहचान धूमिल हो रही थी और उनके ही समानांतर हिंदु या मुसलमान की पहचान  तीखी और आक्रामक हो रही थी। आजादी का मतलब देश के आजाद होने से है –इस स्थापना को ही खंडित किया जा रहा था और धार्मिक अस्मिता पर जोर दिया जा रहा था। यानी ब्रिटेन की गुलामी से आजाद  आम भारतीय को नहीं वरन हिंदू या मुसलमान को होना था- ऐसा माहौल बनाया जा रहा था। और ये भी कि अस्मिता की ये लड़ाई  खुद की अस्मिता को पाने  की उतनी नहीं थी बल्कि दूसरों की अस्मिता को नष्ट करने की थी। मानो जब तक आप दूसरे को खत्म नहीं करेंगे खुद नहीं बचेंगे।
 पहचान की राजनीति या पहचान के नाम पर हत्याएं बीसवीं और इक्सीसवीं सदी की एक बहुत बड़ी परिघटना है। इसीलिए सेकुलर राष्ट्रवाद का विमर्श संकीर्ण और असहिष्णु पहचानवादी विमर्श में बदल गया है। ये सिर्फ  उस भारत में ही नहीं हुआ जो ब्रितानी हुकूमत का गुलाम था बल्कि उस तत्कालीन यूगोस्लाविया में भी हुआ जो एक लंबे समय तक मार्शल टीटो के शासनकाल में सेकूलर रहा। आज यूगोस्वालिया का नामों निशान मिट चुका है और स्लाव, क्रोट या मुस्लिम अस्मिताएं एक दूसरे को हताहत कर क्षत विक्षत हो चुकी हैं। ये पश्चिम एशिया से लेकर पाकिस्तान में हो रहा है जहां शिया बनाम सुन्नी से लेकर कई  तरह की अस्मिताओं के खिलाफ रक्तरंजित लड़ाइयां हो रही हैं। ये आज के हिंदुस्तान में हो रहा है जहां हिंदू- मुस्लिम से लेकर नगा –कूकी विवाद जारी है।
  यहां हम पूछ सकते हैं कि क्या मनुष्य की कोई एकल पहचान हो सकती है? या हम में हर कोई एक साथ कई पहचानों वाला होता है? लेकिन इन पहचानों में तालमेल बिठा कठिन होता है। क्या पहचानवादी राजनीति सिर्फ हिंदू या मुसलमान तक रूकेगी? या हिंदु पहचान की राजनीति करनेवाला धीरे धीरे जातियों की पहचान की राजनीति शुरू नहीं कर देगा या मुसलमान  पहचान की राजनीति करनेवाला क्रमश: शिया, सुन्नी, अहमदिया की राजनीति में नहीं उलझेगा । विश्वमानचित्र पर देखें तो ऐसा ही कई देशों में हो रहा है इसलिए `तमस’ में जिस अंधेरे को रेखांकित किया गया है वो महज एक भारतीय समस्या या सांप्रदायिकता का मसला नहीं। पहचान के नाम पर पूरी दुनिया में हत्याएं हो रही हैं।
    `तमस’ में जिस सांप्रदायिक हिंसा का वृतांत है वो सिर्फ दो धार्मिक समुदायों के बीच तनाव की वजह से नहीं है बल्कि उसके पीछे कई वजहे हैं। एक तो खुद उपनिवेशवाद है। उपन्यास के आरंभ में ही हम पाते हैं कि नत्थू से सुअर मरवाने की पीछे तत्कालीन प्रशासन है जो ब्रितानी हूकूमत के तहत काम कर रहा था। लीजा और रिचर्ड (लीजा रिचर्ड की पत्नी और रिचर्ड अंग्रेज अधिकारी) की बातचीत भी इस सिलसिले में मानीखेज है।  लीजा रिचर्ड से कहती है-
``बहुत चालाक नहीं बनो, रिचर्ड। मैं सब जानती हूं। देश के नाम पर ये लोग तुम्हारे साथ लड़ते हैं और धर्म के नाम तुम इनको आपस में लड़वाते हो। क्यों, ठीक है ना?’’
यानी धर्म के नाम पर लड़ाई  दो तरह के धर्मावलंबियों का आपसी मामला नहीं है। उसके पीछे और शक्तियां हैं।
  मेरे मित्र और राजनीति विज्ञानी प्रकाश उपाध्याय ने एक किताब लिखी है-`प्रिय दुश्मनों की खोज’। कई बार लोग या समुदाय अपने दुश्मनों की खोज करते हैं। प्रकाश उपाध्याय ने इस पुस्तक में लिखा है- दुश्मन बनाने की इस विधि की सबसे पहली शर्त यह है कि यह जनसमूह अपने उन नेताओं का पिछलग्गू बने जो उन्हें इस बात का ज्ञान दें कि वह (यह जनसमूह) हर प्रकाऱ से एक अद्वितीय और अलग संस्कृति, सभ्यता और राष्ट्र है। जैसे भारत के संदर्भ में हिंदु और मुस्लिम राष्ट्रवादियों द्वारा अपनी अलग संस्कृति और सभ्यता के नाम से सामाजिक विभाजन के जो बीज बोए थे उसी के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में मौलिक रूप से भारत और पाकिस्तान नाम के दो अलग अलग राष्ट्रों का निर्माण हुआ था। (प्रिय दुश्मनों की खोज –पृष्ठ 22)।
 तमस में दुश्मनों की खोज की गई है। हिंदूवादी ताकतें अपने मुससमान को प्रिय दुश्मन मानती हैं और मुस्मिल लीग वाले हिंदुओं को। बिना इस बात का अहसास किए कि वे सदियों से एक साथ रह रही हैं वे एक दूसरे को अपना दुश्मन मानती है और एक दूसरे को नष्ट करने के लिए गोला बारूद इकट्ठा करती हैं और एक दूसरे की हत्याएं भी करती हैं। रणबीर नाम के एक युवक के कहने पर इंद्र नाम का नौजवान एक मुसलमान इत्रफरोश की हत्या करता है, यह जानते हुए कि वो (यानी इत्रफरोश) एक बूढ़ा है और सांप्रदायिक तनाव के माहौल में अपने घर से इसलिए निकला है चंद पैसे कमा सके। रणबीर या इंद्र कोई कट्टर हिंदुवादी भी नहीं है। वे अंदर के कुछ कुछ डरपोक भी हैं। लेकिन वे उस कट्टर उन्माद के दबाव में हैं जो दुश्मन की खोज करती है ताकि अपने को, अपनी पहचान को जबरिया दूसरे पर थोप सके।
   `तमस’ में अंधेरा नहीं उजाला भी है। लेकिन बहुत कम। उजाला हम तहां देखते हैं जब वृद्ध हरनाम सिंह अपनी पत्नी के साथ डर की वजह से अपने घर से भागता है और पनाह लेता है एक मुसलमान के यहां। जो औरत उसे पनाह देती है उसे नहीं मालूम को उसका पति और उसका बेटा हरनाम सिंह के घर से लूटपाट करके ही वापस लौंटेंगे। ये उपन्यास का बेहद मार्मिक दृश्य है जिसमें मुसलमान औरत राजो पहले  हरनाम सिंह को पनाह देती है और फिर अपने पति की नाराजगी की आशंका से उससे कहती है कि बाहर जाओ। पर फिर उसे जाने से रोकती भी है। जब राजो का बेटा वापस लौटकर हरनाम सिंह को मारना चाहता है तो भीतर से कमजोर पड़ जाता है और अपना  इरादा बदल  देता है । और जब आधी रात को राजो हरनाम सिंह और उसकी पत्नी राजो के घर से विदा लेते हैं तो वो (यानी राजो) सरदार जी को गहने की वो पोटली भी सौंपती है जिसे उसका पति और बेटा लूटपाट के बाद लाए थे।

पर ये उजाला बहुत मद्धिम है और अंधेरा घना होता जा रहा है। पहचान की राजनीति और पहचान के नाम पर हत्याएं जारी हैं। इस संदर्भ में सांप्रदायिकता एक अपर्याप्त अवधारणा है। भीष्म जी का लेखन हमें इस अहसास की तऱफ ले जाता है कि मनुष्यता की आत्मा को ही लहूलूहान किया जा रहा है। पहचान की राजनीति करनेवाले और उपनिवेशवादी ताकतें (आज के संदर्भ में हम जिनको नवसाम्राज्यवादी ताकतें कह सकते हैं) इस दुरभिसंधि में शामिल हैं और हमें किसी `दूसरे’ के नहीं बल्कि खुद के खिलाफ खड़ा कर रही हैं। क्या `दूसरे’ को  नेस्तनाबूद करने की आकांक्षा हमें अंदर से विकृत नहीं कर देती?   आखिर कौन सी वजह है कि `अमृतसार आ गया है’ कहानी में  बाबू नाम का एक चरित्र ट्रेन पर चढ़ रहे एक मुसलमान वृद्ध की  हत्या कर देता है? क्या इसका सिर्फ फौरी कारण था या उसके भीतर कोई घृणा लगातार संगठित हो रही थी और इसका कोई वैचारिक आधार था? क्या इस घृणा की वजह सिर्फ सांप्रदायिकता है या हमें, यानी हम सबको और मात्र हिंदु या मुसलमान को ही नहीं, अपने भीतर जाकर ये देखना होगा कि कहीं  हम जिसे दुश्मन मान कर हत्या कर रहे हैं वो हम खुद तो नहीं हैं। अर्थात कहीं  हम खुद का शिकार तो नहीं कर रहे हैं?  `अमृतसर आ गया है’ कहानी में वृद्ध की करनेवाले बाबू की मुस्कान  अंत में वीभत्स क्यों हो जाती है?

साभार-साहित्य अकादमी 

(लेखक, समीक्षक और स्तंभकार रवीन्द्र त्रिपाठी द्वारा भीष्म साहनी की जन्म शतवार्षिकी पर साहित्य अकादमी में पढ़ा गया लेख।)



Tuesday, May 28, 2013


गांधी को माओ की बंदूक न थमाओ
सुकमा जिले की घटना ने सलवा जुडूम के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को धो कर रख दिया है, जो उसने मानवाधिकार, राज्य के कर्त्तव्य और आदिवासियों के हक के नाम पर दिया था। आखिर जो लड़ाई आदिवासी और परोक्ष तौर पर माओवादी जीत चुके थे, उसका जश्न महेंद्र कर्मा को मारकर मनाने की क्या जरूरत थी? छत्तीसगढ़ की माओवादी हिंसा न सिर्फ निंदनीय है बल्कि क्रांति के शास्त्रीय सिद्धांतों से विचलन भी है। पं. सुदंरलाल कहते थे कि अगर माओ के हाथ में गांधी की लाठी थमा दें तो वे गांधी लगेंगे और गांधी के हाथ में बंदूक थमा दो तो वे माओ लगेंगे। जरूरत गांधी के हाथ में लाठी की ही है और हो सके तो माओ के हाथ में भी लाठी थमायी जानी चाहिए
छत्तीसगढ़ में माओवादियों ने महेंद्र कर्मा को जिस तरह से मारा, उससे जाहिर होता है कि समाज में बदलाव और विजय उनका लक्ष्य नहीं है बल्कि हिंसा, प्रतिहिंसा और बदला लेने का रोमांच ही उनका असल मकसद है क्योंकि वह महज हत्या और वीरोचित हत्या नहीं थी, बल्कि मौत और क्रूरता का तांडव था। अगर यही माओवाद है तो स्पष्ट तौर पर उससे किसी नए राज्य और नए समाज की रचना नहीं होती। महेंद्र कर्मा को मारे जाने के पीछे साफ वजह सलवा जुड़ूम को बताया जा रहा है। सलवा जुड़ूम यानी शांति मार्च के नाम से उन्होंने जो नक्सल विरोधी अभियान शुरू किया था, वह शांति लाने के बजाय आपसी हिंसा का पर्याय बन गया था। वह विफल रहा और निंदनीय भी था पर हमें ध्यान रखना चाहिए कि उसकी सबसे ज्यादा कड़ी और वैधानिक निंदा सुप्रीम कोर्ट ने की। नंदिनी सुंदर बनाम छत्तीसगढ़ के मुकदमे में न्यायालय ने उस अभियान को न सिर्फ मानवाधिकार का उल्लंघन बताया बल्कि राज्य सरकार को उसे तत्काल बंद करने की सख्त हिदायत भी दी थी।
 इसलिए जिन



वजहों से महेंद्र कर्मा को मारा गया, वे वजहें तो समाप्त हो चुकी थीं और अगर माओवादियों और उनके समर्थकों को आदिवासियों के अधिकारों की चिंता है तो उसकी जीत हो चुकी थी। कम से कम उन्हें यह तो मानना ही होगा कि भारतीय राष्ट्र राज्य और उसकी न्यायपालिका में यह संभावना है कि वह न सिर्फ सलवा जुड़ूम जैसे नक्सलवाद विरोधी जन अभियान को सिरे से खारिज करता है बल्कि आदिवासियों के हक को नवउदारवाद के माध्यम से छीने जाने की कड़ी आलोचना भी करता है। यह वही सर्वोच्च न्यायालय है जो विनायक सेन को माओवादियों का जासूस बताकर सजा दिए जाने को भी नकारने का साहस दिखाता है। ध्यान देने की बात है कि सर्वोच्च न्यायालय के सलवा जुड़ूम के फैसले की दक्षिणपंथी नीतिकारों ने यह कहते हुए कड़ी आलोचना की थी कि न्यायपालिका में वामपंथी बौद्धिकों का कब्जा हो गया है और वे संविधान को अपने ढंग से हांकना चाहते हैं। उनका आरोप था कि वे देश के विकास की रफ्तार को रोककर उस पर समाजवाद का भार डाले रहना चाहते हैं। पर सुकमा जिले की दरभा घाटी की घटना ने सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को धो कर रख दिया है जो उसने मानवाधिकार, राज्य के कर्त्तव्य और आदिवासियों के हक के नाम पर दिए थे। आखिर जो लड़ाई आदिवासी और परोक्ष तौर पर माओवादी जीत चुके थे, उसका जश्न महेंद्र कर्मा को मारकर मनाने की क्या जरूरत थी? यह कहीं से भी माओवाद और क्रांति का दशर्न नहीं है बल्कि हिंसा का दशर्न है जिसके आधार पर जो भी राज्य बनेगा, वह हाथ के बदले हाथ और आंख के बदले आंख के दर्शन में यकीन करेगा। इस हिंसा का असर क्या होगा, यह तो आने वाला समय बताएगा लेकिन इस पर क्षणिक तौर पर माओवादी जीत का अहसास करेंगे और आदिवासियों को हिंसा के नए रोमांच में ढालने की कोशिश करेंगे। संभव है, इस हिंसा से उनके शहरी समर्थक भी खुश हों, जिन्हें लगता है कि नवउदारवाद की हारी हुई लड़ाई और भारतीय राज्य की क्रूरता और अंतरराष्ट्रीय पूंजी को चुनौती देने का यही एक रास्ता है। पर यह रास्ता न तो कहीं से पूंजी का खेल रोक पा रहा है न ही आदिवासी समाज के जीवन को अपेक्षित बेहतरी दे पा रहा है। अगर बुर्जुआ राजनीति के चुनावी लोकतंत्र ने महेंद्र कर्मा जैसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता और आदिवासी समाज के एक जुझारू व्यक्ति को उठाकर अपने ही समाज का दुश्मन बना दिया तो माओवादी भी सैकड़ों आदिवासियों को हिंसक और अपराधी बना रहे हैं। उनका संघर्ष और उसके लिए संसाधनों का इंतजाम जिस तरह के स्रेतों पर निर्भर है, वह अवैध कमाई ही होती है।उनके बंद संगठन में स्त्रियों और दलितों के अधिकार कितने सुरक्षित हैं, इस बारे में भीतर से आने वाली तमाम खबरें चौंकाने वाली कहानी कहती हैं। कभी दलित सवर्णों के लिए बंदूक उठाने से मना करते हैं तो कभी स्त्रियां दैहिक शोषश की शिकायत कर विद्रोह करती हैं। भारत का यह माओवाद जहां गांधीवादी संघर्ष की विफलता से पैदा हुआ राजनीतिक प्रतिरोध है, वहीं वह माओ त्से तुंग के दशर्न से भी भटका हुआ है। जीवन के अंतिम दिनों में आलोक प्रकाश पुतुल को दिए एक इंटरव्यू में नक्सलबाड़ी आंदोलन के नायक रहे कानू सान्याल ने कहा था कि दरअसल माओवाद जैसी कोई चीज होती ही नहीं हैं। उनका मानना था कि माओ भी मार्क्‍सवाद और लेनिनवाद को मानते थे। इसलिए जन संघर्ष के इस सिद्धांत को कानू सान्याल मार्क्‍सवाद लेनिनवाद और माओ के विचार की संज्ञा देते थे। उनका कहना था कि भारतीय क्रांतिकारी पूरी दुनिया की क्रांतियों से सबक लेंगे पर भारतीय क्रांति होगी तो भारतीय तरीके से। यह बात लेनिन और माओ ने भी मानी है कि अगर उनके सामने आज की तरह संसदीय संघर्ष और चुनावी लोकतंत्र का रास्ता उपलब्ध होता तो शायद उन्हें इतनी बड़ी हिंसा का सहारा न लेना पड़ता। अमेरिका के अग्रणी मार्क्‍सवादी नेता बॉब अवेकिन माओवादी माने जाते हैं। उन्होंने साफ तौर पर सचेत किया है कि कम्युनिस्टों को अपना मकसद हासिल करने के लिए सच को विकृत नहीं करना चाहिए। क्रांति के बारे में वे साफ तौर पर कहते हैं कि-क्रांति न तो बदला लेने की कार्रवाई है और न ही मौजूदा वर्गीय ढांचे में कुछ स्थितियां बदले जाने की प्रक्रिया है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता की मुक्ति का उपक्रम है। उनकी इसी बात को बहुत पहले भारत के महान क्रांतिकारी शहीदे आजम भगत सिंह ने भी अपने ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ वाले लेख में माना था कि जनता की बड़े परिवर्तन की लड़ाई अहिंसक ही होगी। छत्तीसगढ़ की माओवादी हिंसा न सिर्फ निंदनीय है बल्कि क्रांति के शास्त्रीय सिद्धांतों से विचलन भी है। आज भले ही भारतीय रक्षामंत्री एके एंटनी कह रहे हों कि माओवादियों पर सेना का प्रयोग नहीं होगा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कानून के काम करने की बात कर रहे हैं लेकिन दरभा घाटी की यह हिंसा स्पष्ट तौर पर दो तरह से रास्ते खोलती है। एक रास्ता फिर उन्हीं कांग्रेसियों की वापसी की तरफ जाता है जिनकी नीतियों ने आदिवासियों को असुरक्षा और अस्तित्व के संकट में डाल रखा है। दूसरी तरफ यह हमला नरेंद्र मोदी जैसे दक्षिणपंथियों के आगमन का मार्ग प्रशस्त करता है और हमारा कॉरपोरेट वर्ग उसी के लिए लालायित है। इस मार्ग से निकलने का तीसरा विकल्प है गांधीवादी तरीके से शोषणविहीन और समतामूलक समाज की तलाश। भारत गांधी का देश है, माओ का नहीं। पंडित सुदंरलाल कहते थे कि अगर माओ के हाथ में गांधी की लाठी थमा दें तो वे गांधी लगेंगे और अगर गांधी के हाथ में बंदूक थमा दो तो वे माओ लगेंगे। जरूरत गांधी के हाथ में लाठी ही रखने की है और हो सके तो माओ के भी हाथ में लाठी ही थमायी जानी चाहिए।


अरुण त्रिपाठी

Monday, April 15, 2013

दिल्ली वालों के दिलों में बसे प्राण



कौन जाए जौक दिल्ली की गलियां छोड़ कर।
दिल्ली के मशहूर शायर जौक ने कभी ये बातें दिल्ली के बारे में कही थीं, लेकिन पुरानी दिल्ली की गलियों से निकलने वाले बहुत से कलाकार कभी यहां लौटकर नहीं आए। बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता प्राण भी उनमें से एक हैं। पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान में कभी वह भी रहते थे। प्राण किशन सिकंद का जन्म 12 फरवरी, 1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान में ही हुआ था। इनके पिता केवल किशन सिकंद सिविल इंजीनियर थे। यह जानकारी होने पर बल्लीमारान के लोगों को फक्र होता है, लेकिन प्राण के बल्लीमारान में बिताए हुए दिन या उनके परिवार के बारे में उन्हें खास जानकारी नहीं है। बल्लीमारान के ही रहने वाले और फिल्म जगत में अपनी किस्मत आजमा चुके शमीम अहमद बताते हैं कि प्राण को दादा साहेब फाल्के अवार्ड मिलने से उन्हें खुशी है। हालांकि यहां के अधिकतर लोगों को यह नहीं पता कि प्राण बल्लीमारान में पैदा हुए थे। उन्होंने बताया कि प्राण बल्लीमारान के चरखावालान में रहते थे।
प्राण ने कनॉट प्लेस के एल दास एंड कंपनी फोटोग्राफर्स, जो वर्तमान में बस दास स्टूडियो है, से अपना करियर शुरू किया था। तब उनका नाम प्राण किशन सिकंद ही था। कनॉट प्लेस के एफ ब्लॉक की 12 नंबर की दुकान समय के साथ बदल गई है, लेकिन दुकान के वर्तमान मालिक किशन दास के दिलों में प्राण के लिए बेहद मोहब्बत है। 69 वर्षीय किशन दास बताते हैं कि प्राण ने यहीं से अपना करियर शुरू किया था ऐसी बात उनकी मां बताती हैं और प्राण ने उनकी फोटो भी खींची थी। पिता लच्छमन दास ने जब 1937 में पार्टनर हसनंद के साथ दुकान खोली, तो इसकी चार शाखाएं थीं लाहौर, शिमला, मसूरी और दिल्ली। प्राण बाद में लाहौर चले गए थे। उनकी दिली इच्छा प्राण से मिलने की है, वह अपने व्यापारिक काम से कई बार मुंबई गए, लेकिन प्राण से नहीं मिल पाने का उन्हे मलाल है। किशन दास ने बताया कि यदि प्राण साहब तीन मई को दादा साहब फाल्के अवार्ड लेने आते हैं तो उनसे जरूर मिलेंगे। यदि स्वास्थ्य खराब होने के कारण नहीं आते हैं तो मुंबई में जाकर उनसे मिलेंगे।
फिल्म पत्रकार और समीक्षक बन्नी रूबेन की पुस्तक '.. एंड प्राण ए बायोग्राफी' में प्राण ने बताया है कि उन्होंने पहली पंजाबी फिल्म 'यमला जट' पाकिस्तान में ही की थी। उसके बाद उन्होंने वहां कई फिल्में कीं।
दिल्ली के पुराने सिनेमा हॉल डिलाइट के अध्यक्ष शशांक रायजादा पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि प्राण साहब उनके यहां मनोज कुमार के साथ 'पूरब-पश्चिम' फिल्म के रिलीज के वक्त आए थे और लगभग ढाई घटे रहे उनके सरल स्वभाव और दमदार अभिनय के लोग कायल हैं।

Sunday, March 3, 2013

यादें याद आती हैं...



महानगर की इस भाग दौड़ में कभी-कभी लगता है कि क्या सचमुच किसी को भूला जा सकता है? क्या यादों के लिए जगह सिमटने लगी है? क्या कि सी के न रहने की जो रिक्तता है वह किसी और से भरी जा सकती है? लेकिन नहीं जब बात किसी प्रिय की हो तो अपनी या पराई लाख व्यस्ततों के बीच उसकी सुखद-दुखद यादें स्मृतियों में कौंध जाती हैं।
मुझे याद आ रही हैं कि आज ही के दिन दो साल पहले छूटे उस भाई, गुरु और सखा की, जिसके निधन की खबर सुनकर फौरन निगम बोध घाट पर जैसे-तैसे भागा था। मेरे शुभचिंतक पूजा सिंह और रंजेश शाही ने मुझे रात एक बजे से कई बार फोन किया, लेकिन मैं सो रहा था और जब फोन पर उनका मैसेज देखा तो थोड़ी देर के सन्न रह गया। तबीयत तो ज्यादा खराब थी, लेकिन इतनी जल्दी साथ छोड़ देंगे ऐसा नहीं सोचा था। मैं गोरखपुर के चर्चित पत्रकार रोहित पांडेय की बात कर रहा हूं। आज उनकी दूसरी पुण्यतिथि है।
दरअसल दो दिन पहले पूजा को फोन किया था और उससे पूछा कि रोहित भाई की पुण्यतिथि पर कुछ करने की सोच रहा हूं। उसने अपनी तरफ से समर्थन की हामी भर  दी। लेकिन अंत तक मैं असमंजस में रहा कि क्या करूं। मुझे रंजेश की बात याद आई जो उसने निगम बोध घाट पर कही थी। उसने कहा था, ‘‘अभिनव, रोहित सर हम सबके बीच एक पुल की तरह थे। वैसे तो हम दिल्ली में रहते हैं, लेकिन उनके बहाने सबसे मुलाकात हो जाती है।’’ एक बार सोचा कि क्यों न फिर हम सब मिलें और कुछ यादों को साझा करें। बहरहाल, सभी  की अपनी व्यस्तता और शायद मेरा निकम्मापन भी, मैंने किसी को कुछ नहीं कहा.
रोहित भाई ने बहुत कम समय में जिंदगी के कई उतार-चढ़ाव देखे। कभी-कभी लगता है कि गोरखपुर को उन्होंने ‘ठीक से’ समझा और शायद गोरखपुर ने उन्हें भी ‘ठीक से’ ही समझा। मृत्यु के बाद हमारे यहां ‘महान’ बना देने की परंपरा है, लेकिन मैं बिना किसी लाग-लपेट के कहूंगा कि जितना मैं जान पाया कि रोहित भाई महान की श्रेणी में नहीं थे और उनको इसकी कभी  लालसा भी  नहीं थी। जिसकी लालसा थी वह अधूरी ही रही। कुछ संयोग ऐसा रहा कि उनकी मृत्यु के दो साल पहले से उनका दिल्ली आना-जाना लगा रहा और इस बीच हम सबसे मिलना-जुलना भी। हम ठीक से उन्हें इसी बीच जान पाए। कभी  खुद फोन कर बुलाते तो कभी  हम बिना बताए पहुंच जाते। केवल मैं नहीं, पूजा तो उनकी पड़ोसन थी और रंजेश भी  प्राय: आता था। यह रोहित भाई का स्नेह ही था कि हम उनके सामने बैठकर घंटों किसी भी मुद्दे पर बिना उनकी सहमति-असहमति के बात कर सकते थे। वह बिना किसी का पक्ष लिए अपनी बात रखते। कई बार ऐसा हुआ कि मेरी और पूजा की तीखी बहस उनके सामने हुई, लेकिन बिना किसी निष्कर्ष के खत्म भी हो गई। तब तुरंत भाई की कोई अपनी राय नहीं होती थी। किसी को बढ़ावा न किसी की खिंचाई। एक संतुलित दर्शक और रह-रह कर दोनों की तरफ से हामी। दरअसल मैं, पूजा और रंजेश उनके शिष्य हैं। वह पूजा के सच्चे अर्थों में मित्र थे। और, सच कहूं तो थोड़ी देर बाद भाई के साथ रहने पर कोई भी  उनसे खुल सकता था और उससे वह उसके ‘जियरा’ का हाल-चाल पूछ सकते थे।
बेबाकी ऐसी की नापसंदगी पर गाली भी  फरार्टेदार और फिर चाय की दावत भी। उनके पढ़ाए गए लगभग सभी छात्रों को ‘भौजी’ की चाय याद है। ऐसा नहीं है कि गोरखपुर के सभी पत्रकार उनके शुभचिंतक ही थे या वह सब पर जान लुटाते थे। कुछ ऐसे लोग भी मिले जो उन्हें पीठ पीछे कुछ भी कहने से नहीं चूकते थे। वजह, विश्वविद्यालय से लेकर प्रेस क्लब की राजनीति में उनका हस्तक्षेप या वैचारिक मतभेद।
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि कुछ मामलों में मैं उनका धुर विरोधी था। हमारा टकराव विचारधारा को लेकर था। अंतिम समय में उन्हें और करीब से जानने का मौका मिला। वह पूरी तरह से संघी थे और खुलकर कहते भी थे, जबकि मेरा झुकाव वाम की तरफ था (है)। वह कम्युनिज्म को अन्य संघियों की तरह आयातित विचारधारा मानते थे और मेरा मानना था कि विचारधारा कहीं की हो, यह कितनी सार्थक है, यह समझने की जरूरत है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अधिकतर लोगों की सोच अभी धर्मनिरपेक्ष नहीं है। दुनिया के नए विचारों और नई अवधारणाओं को कभी जानने, समझने की कोशिश वहां पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रबुद्ध वर्ग कभी  नहीं करता है (मैं प्रबुद्ध नहीं हूं, लेकिन  मैं भी  नहीं कर पाया)। लेकिन जब आप गोरखपुर या ऐसे किसी शहर से बाहर जाएंगे तब आपको केवल भारत नहीं, बल्कि विश्व की गतिविधियों के बारे में जानने, सोचने, समझने की जरूरत पड़ेगी। मेरे अभी  कई मित्र और विश्वविद्यालय के जानने वाले शिक्षक हैं, जो कम्प्यूटर का प्रयोग नहीं करते, ब्लाग, मेल या ई पेपर उन्हें नहीं पता। दुर्भाग्यवश उन्होंने कभी जानने की कोशिश भी  नहीं की। बहरहाल, विचारधारा के निर्माण में तकनीक का प्रयोग भी प्रभावी रूप से उभरा है।

रोहित भाई मेरी भी जबरदस्त आलोचना करते थे, पीठ पीछे नहीं, मुंह पर, सरेआम (यही उनकी खासियत थी)।लेकिन कई बार यदि उनकी शर्ट की तारीफ करता था तो बस मुस्कुराते हुए ये कहकर चुप कि अरे ज्यादा नहीं, बस 25 रुपये मीटर के कपड़े की है। मतलब आलोचना अपनी जगह और सम्बन्ध अपनी जगह. पैसा उनके लिए कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा। ऐसे कई पत्रकार हैं जो खबर बेचकर मालामाल हैं, लेकिन वह अपना खर्च कर पत्रकारिता करते थे। उनका साफ कहना था, ‘‘सभी संपादकों से तुम्हारे अच्छे संबंध हो सकते हैं, बस उनसे नौकरी मत मांगो।’’

एक वाकया याद आता है। अंतिम दिनों में निराश हो गए थे और एक दिन कहा, ‘‘बाबू ऐसा लगता है कि अब बचना मुश्किल है।’’ मैंने कहा, ‘‘जो आप किसी के हाथ में नहीं है उसकी चिंता छोड़िये, कल आबिदा परवीन (पाकिस्तान की मशहूर सूफी गायिका) को सुनने चलते हैं, सूफी गाएंगी तन-मन एक हो जाएगा।’’ भइया उत्साह से चलने के लिए तैयार हो गए। मेरी छुट्टी थी, हम पहले पहुंच गए। आबिदा का गाना शुरू होने में देर थी। लम्बी बातचीत हुई। अचानक उनका मन तीन-चार गानों के बाद बेचैन हो गया।  ऐसा लगा कि वह कुछ सोच रहे हैं। घबराए से बोले, ‘‘चलो अब चला जाए। मन नहीं लग रहा है।’’ आत्मा और परमात्मा, दोनों मे रोहित भाई का दृढ़ विश्वास था और आबिदा का सूफियाना कलाम रूह तक जाता था। वह अभी रूह से कोई संवाद नहीं करना चाहते थे।  हम लौट आए।
भाई ने तीन दिन तक कोई बात नहीं की। एक दिन रात को तीन बजे उन्होंने एक कविता एसएमएस की। मैंने तुरंत उत्तर दिया, ‘अच्छी है।’ लेकिन उनकी कविता में निराशा साफ झलक रही थी। मैंने उसे नोट क्र लिया अभी बहुत खोजने के बाद भी  वह कविता नहीं मिली, फिर कभी साझा करूंगा।
कभी-कभी  मुझे लगता कि क्या उन्होंने जीने की आस सचमुच छोड़ दी थी? लेकिन अगले ही पल मुझे उनकी मूलचंद अस्पताल की हालत याद आती है। उनके बड़े भाई  ने मुझे फोन किया, ‘‘रोहित मूलचंद अस्पताल में भर्ती हैं तुम आ जाओ।’’ मैं कुवैत एम्बेसी में एक प्रेस कांफ्रेंस में था। भागा-भागा गया उनकी वह स्थिति देखी, जिसकी कल्पना नहीं कर सकता था। वह छटपटा रहे थे, बेचैन थे। ये बेचैनी दर्द की थी, जीजीविषा की थी। वहां से उन्हें फिर एम्स ले जाया गया, लेकिन वहां भी बेड की दिक्कत आ रही थी। डॉक्टर का साफ कहना था कि अब घर ले जाओ। लेकिन उनकी वह स्थिति देखकर रूह कांप गई। जब दर्द होता था तो किसी की नहीं सुनते थे। मुझसे वह स्थिति देखी नहीं जा रही थी और मैं कुछ देर रुकने के बाद चला गया।
उन्हें अभी  बहुत कुछ करना था। बहुत कुछ लिखना था, कई अधूरे ख्वाब पूरे करने थे। आखिर बच्चों के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया था, थिसिस भी  अधूरी थी। दिल्ली में पत्रकारिता का सपना बस सपना रह गया। यह भी अजीब विडंबना है कि उनके पढ़ाए हुए लोग आज अखबारों और चैनलों में विभिन्न पदों पर हैं, लेकिन उन्हें कभी किसी भी अखबार ने बतौर रिपोर्टर नौकरी नहीं दी और न इतना पैसा कि वह अपने बाद अपने परिवार के बारे में सोच सकें । जब बात स्थाई करने की आई तो ऐसी स्थिति नहीं रही। लेकिन गोरखपुर के पत्रकारों का उनके प्रति स्नेह ही था कि उन लोगों ने उनकी हर तरह से मदद की।
रोहित भाई भी  अपने शिष्यों, मित्रों और जानने वालों के लिए हमेशा खड़े रहे। अंतिम समय तक लाभ लेने वालों ने उन्हें नहीं छोड़ा। डॉक्टर के लाख मना करने के बावजूद वह उनसे बात करने वालों के फोन सुनते थे। लेकिन कभी अपने लिए किसी से कुछ नहीं कहा।
प्रभाष जोशी सहित कई ऐसे पत्रकारों,साहित्यकारों से उनका गहरा लगाव था। प्रभाष जी के निधन की खबर उन्होंने सुबह मुझे फोन पर दी थी और खराब सेहत के बावजूद उनके घर गए थे। अभी पिछले साल जब काशीनाथ सिंह को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था तो मैं उनका इंटरव्यू करने गया था। जब मैंने उनसे उनकी रचना ‘रेहन पर रग्घू’ को लेकर बात की तो उन्होंने रोहित पांडेय का नाम लिया। उनका कहना था, ‘‘इस पुस्तक के परिप्रेक्ष्य में रोहित ने मेरा पहला इंटरव्यू लिया था।’’
मेरे लिए इन सब बातों को याद करना एक बार फिर उस पीड़ा से गुजरना है। बहुत कुछ है और बहुत यादें हैं, लेकिन कुछ ऐसा भी है जिसका अपराधबोध होता है, जैसे- अब हम दिल्ली में रहने वाले दोस्त आपस में नहीं मिल पाते। दिल्ली में उनके भाई के घर मार्च 2011 के बाद फिर मैं जाने की हिम्मत नही जुटा पाया। मैं एक बार भी  उनकी पत्नी और बच्चों का हाल-चाल नहीं ले पाया।
ऐसा लगता है कि हम सचमुच कंक्रीट के जंगल में संवेदनाओं को खोते जा रहे हैं। हम मशीन हो रहे हैं, जो जड़ है जिसके चलने की ध्वनि तो है, लेकिन गति नहीं है। और इसके जिम्मेदार हम खुद हैं। अब कोई ऐसा नहीं है हमारे बीच  जो फकीरी का मतलब समझाए, बताए, बुलाए और लड़ने का जज्बा पैदा करे। आज मेरे जैसे पत्रकारिता में ही नहीं बहुत से  क्षेत्रों में उनके जानने वाले लोग हैं जो उनके आत्मीय हैं जिनके पास काफी कुछ हैं उनके बारे में कहने के लिए, गिले-शिकवे भी होंगे तो स्नेह भी होगा। मेरे पास भी है बहुत कुछ लेकिन कुछ साझा कर रहा हूँ।
उनकी कमी, उनका स्नेह, उनसे मतभेद, सबका अपना स्थान है। और इसके साथ ही मैं उनको अपनी श्रद्धांजलि देता हूँ।  रोहित भाई, आपकी मौजूदगी की यादें आज आपकी गैर मौजूदगी में भी हमें रास्ता दिखाती हैं और सदा दिखाती रहेंगी।

नमन! 

Wednesday, February 20, 2013

समझ और दृष्टिकोण


सीएसडीएस के फैलो डॉक्टर हिलाल अहमद से अभिव्यक्ति की आज़ादी और उसके आयाम से सम्बन्धित मेरी बातचीत पर आधारित एक लेख आज राष्ट्रीय सहारा अख़बार के हस्तक्षेप में 'समझ और दृष्टिकोण' शीर्षक के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित है . पढ़े आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है. 


अपने देश में अभिव्यक्ति की आजादी के दो पक्ष हैं। एक पक्ष अभिव्यक्ति की आजादी को कानूनसम्मत और उदारवादी सिद्धांतों पर आधारित बताता है। उस पर कोई अंकुश नहीं लगाया जा सकता। इसके विपरीत, दूसरे पक्ष का कहना है कि धर्म-संस्कृति आस्था के संवेदनशील मसले हैं। इनके विरुद्ध जाने से किसी भावनाएं आहत हो सकती हैं। इसलिए अभिव्यक्ति की आजादी आस्था से बढ़कर नहीं हो सकती। तो ये दो पक्ष हैं। उदारवादी दर्शन के दो प्रकार हैंनका रात्मक और सकारात्मक। नकारात्मक उदारवाद व्यक्ति को ही मूल मानते हुए उस पर किसी अंकुश का विरोध करता है। वहीं, सकारात्मक उदारवाद के नजरिये से व्यक्ति समाज के साथ रहता है। इसलिए उसकी बंदिश और आजादी समाज से अलग नहीं हैं। व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता तभी संभव है, जब वह उस समाज में रहे। टीएच ग्रीन, हेराल्ड जे लॉस्की जैसे ख्यातिनाम दार्शनिक इसी दूसरे सकारात्मक दृष्टिकोण के हैं। वे मानते हैं कि व्यक्ति समाज में फलता-फूलता है और उसके आदर्श इसी सामाजिक संदभरे में ही फलीभूत होते हैं। इसीलिए एक पूरी पण्राली जिसे संविधानवाद कहा जाता है; वह व्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा कुछ नियमों से तय कर देता है। चूंकि संविधान लचीला होता है और इसके निर्माता समय और जरूरतों के हिसाब से इसे बदलते रहते हैं। इसलिए व्यक्तियों और समाजों के बीच की एक गतिशीलता बनी रहती है। इस संदर्भ में, भारत में जब भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात की गई है, वह हमेशा सामाजिक संदभरे में की गई है। वह ‘एब्सल्यूट’ नहीं है। इस तरह से हम देखें तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बात करना अपराध हो जाएगा, जो गलत होगा। उदारवाद में ही यह बात मौजूद है कि जो एब्सल्यूट है, उसके ऊपर संविधान की व्यवस्था है। यह पहला सिद्धांत है। दूसरे, कठमुल्ला और पोंगा पंडित हैं, जिनका मानना है कि व्यक्ति नहीं, समाज सवरेपरि होता है। इस तर्क से मेरे इत्तेफाक न रखने की दो वजहें हैं। पहली, तो यह कि जिस इस्लाम, हिन्दुत्व या ईसाइयत को हम जानते हैं, वह अपने आप में एक आधुनिक रूप लिए हुए है और इसका आधुनिक रूप, जिसे हम मानते हैं, उसका मतलब एक रचा-बसा, लिखित, संविधान- सम्मत रीति-पण्राली है। यह स्वरूप आधुनिकता ने दिया है। मध्यकाल में धर्म के मामले में बहुत खुलापन है। वहां आज के जैसे धर्मातरण के झगड़े ऐसे नहीं दिखते। दरअसल, जिस धर्म को हम आज जानते हैं, वह 19वीं सदी की देन है। आधुनिकता भी उसी सदी की देन है। इससे पहले धर्म और आधुनिकता पर बहसें नहीं मिलतीं। कबीर की साखी समाज और धर्म के आंतरिक रिश्तों को लेकर है। कहने का मतलब यह कि 19वीं सदी में धर्म को जो लिखित शक्ल दिया गया, वह अलिखित रूप में पहले से मौजूद था। बहरहाल, 19वीं सदी में जो धर्म बना, उसमें धर्म का एक ऐसा स्वरूप निकल कर आया जो सीमाओं से बंधा था। इससे ही धार्मिंक आस्थाएं तय होने लगीं। आज जिन आस्थाओं का हवाला दिया जाता है, वे तमाम आधुनिक आस्थाएं हैं। इसीलिए उन पर कंफ्लिक्ट है। धर्म संरचना में एकरूपता लाने की प्रक्रिया आधुनिक प्रक्रिया है जो ब्रिटिश शासनकाल में शुरू हुई। तब यहां सभी धर्मो में सुधार आंदोलन हुए। इसे आज की ईसाइयत के रूप में व्यवस्थित तरीके से लाया गया। इसमें ही यह तय हुआ कि ये मानेंगे, वो नहीं मानेंगे। जैसे इस्लाम में चित्र पर बनाने पर पाबंदी लगी। हालांकि ईरान में ऐसे बेशुमार लोग थे, जो चित्र बनाते थे। हिंदू धर्म में गाय नहीं खाई जाती लेकिन ऐसे बहुत-से कबीले हैं, जो अपने हिंदू मानते हैं और गाय खाते हैं। इस तरह सभी धर्मो में यह तय हुआ कि किसकी अनुमति है और किसकी अनुमति नहीं है। अब सवाल है कि इनके मूल्य क्या हैं, जिनका धर्म संकट में आ जाता है। जिस तरह उदारवादी बिना लिब्रलिज्म को समझे कह देते हैं कि ‘एब्सल्यूट लिबर्टी’ होनी चाहिए। लेकिन यह एब्सल्यूट शब्द उदारवाद की तरफ नहीं निरंकुशता की तरफ जाता है। पूरे यूरोप में, अमेरिका में, थॉमस पेन से लेकर हेराल्ड लॉस्की और आज भी, इस पर र्चचा है कि सीमा थोपी नहीं जा सकती। यह उपजी होती है। वह वहां गलत हैं और जहां-जिनका धर्म संकट में आ जाता है। जैसे एमएफ हुसैन का हिंदू देवी-देवताओं का अर्धनग्न चित्र बनाना। इसके चलते धर्म संकट आने का मतलब है कि उनकी नजर के अलावा और किसी नजरिये से भगवान- पैगम्बर को देखने की कोशिश हुई तो उनकी भावनाओं के विपरीत होगी, चोट पहुंचाएगी। जो ऐसा करेगा वह दंड का भागी होगा। ये बात हिंदू और इस्लाम दोनों धर्मो के खिलाफ चली जाती है। कुरान में ऐसी कई आयतें हैं, जो कहती हैं कि ‘बख्श दो यदि बुरा करे कोई’। शरीयतें इसी तरह बनी हैं, जब सवाल उठने लगे तो इस्लाम में उन्हें नये तरीके से परिभाषित किया गया। फिर नया इस्लाम आया, नए कानून बनें। तो यह बहस है। मेरा कहना है कि अपना संशिलष्ट समाज है। अगर आप असहमत हैं फिर भी बात करना न छोड़ें। अगर आप बात नहीं करेंगे तो अभिव्यक्ति सीमित होकर रह जाएगी। अभिव्यक्ति न तो पूर्ण है, न मिश्रित।

यह आम बहस की बात है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा होनी चाहिए कि नहीं? इस पर आम बहस होनी चाहिए। अब प्रगाश ग्रुप की बात करें तो मुफ्ती साहब ने एक बयान जारी कर कहा कि यह फतवा नहीं था। उनका कहना था कि औरतों को गाना नहीं गाना चाहिए और इस्लाम में संगीत मना है। ये दोनों बातें इस्लाम के दृष्टिकोण से गलत हैं। इस्लाम में संगीत की एक लम्बी परंपरा है। बहुत-सी कश्मीरी औरतें गणतंत्र दिवस की परेड में अपने पारंपरिक गीत- संगीत का प्रदर्शन करती हैं। मतलब यह कि एतराज इस्लामिक दृष्टिकोण से ही यह दुरु स्त नहीं है। कमल हासन की विश्वरूपम का हर जगह अलग-अलग तरीके से विरोध हुआ। इसके पीछे केवल मुस्लिम विरोध ही नहीं था। बहुत-से लोगों ने कहा कि इस फिल्म में विवादित कुछ भी नहीं था। आज मुसलमान तो ऐसा सिंबल है कि उसे यदि उछाल दो तो उसे अंतरराष्ट्रीय पब्लिसिटी मिल जाती है। आज दुनिया बनाम इस्लाम का विमर्श है। ऐसे में प्रचार आसान है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में हमें दो-तीन मुद्दों पर बात करनी पड़ेगी, एक बात लीगल फेमवर्क की है। इसका मतलब यह नहीं है कि इसको बैन कर दो या उठा लो। इसके तीन स्तर हैं। पहला स्तर संविधान का है। इसका मतलब है कि यह हमारा बेसिक ढांचा है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में इसको देखिए। फिर हमारे पास व्यवस्थित कानून हैं; जैसे इंडियन पीनल कोड, सेंसर बोर्ड आदि। ये मुद्दे पर बने कानून हैं। तीसरा, इन पर अमल करने/कराने वाली संस्थाएं हैं। इसके आगे मसले पर व्यापक परिर्चचा होनी चाहिए। इसके तीन रूप हैं-व्यापक जन संवाद, मीडिया और पॉलिसी। सरकार को एक पॉलिसी फ्रेमवर्क बनाना चाहिए जिसमें मीडिया सहित दूसरे लोगों को जोड़ा जाए। सरकार और राजनीति को इससे अलग नहीं रख सकते। हम कम राजनीतिक हैं, तभी यह विवाद है। लिहाजा, हमें ज्यादा राजनीतिक होना पड़ेगा। जब एक व्यापक प्रक्रिया शुरू हो जो मूलभूत सवालों को उठाए और इसके तीन तरीके मैंने बताए हैं। पहला, कानून जिसमें तीन स्तर हैं-संविधान, दूसरे कानून और पॉलिसी। दूसरा स्तर है, संस्थाओं का प्रतिनिधित्व। और आखिर है, लोगों के विचारों को बांटने का। हमें और लोकतांत्रिक और ज्यादा राजनीतिक होना पड़ेगा। अभी हम थोड़ी-सी राजनीति और थोड़ी-सी नीति लेकर चल रहे हैं, ऐसा आगे ठीक नहीं होगा।

अभिनव उपाध्याय की बातचीत पर आधारित

Friday, November 16, 2012

उन स्त्रियों से शिकायत है- चित्रा मुद्गल





 जब हम स्त्री विमर्श की बात करते हैं तो यह संतुलित विमर्श होना चाहिए न कि घृणा के उबाल के साथ। मेरा यह मानना है कि अब संतुलित विमर्श का समय है; क्योंकि स्त्री के उत्थान में पुरुषों का योगदान भी कम नहीं है। पहले ऐसा मानकर चला जा रहा था कि स्त्री को जीवन जीने का अधिकार नहीं है। उन्हें पशुओं की तरह समझा गया। लेकिन इस तरह के सच के पीछे संतुलन का अभाव है। मानवीय सत्ता बराबर है और मेरा मानना है कि इसमें बराबर की साझेदारी होनी चाहिए। चाहे वह संबंध, पति-पत्नी का हो, बाप-बेटी का हो या भाई-बहन का। लेकिन पुरातन समय से जब हम पितृसत्ता की बात करते हैं तो पुरुषों को बलशाली माना गया है। स्त्री को हमेशा कोमलांगी, भ्रूण धारण करने वाली, बच्चे पैदा करने वाली, जननी, विरासत को आगे बढ़ाने वाली ही माना गया है। तब ऐसा था कि पुरुष किसी विशेष स्त्री का पुरुष नहीं होता था। जब संबंधों में समरसता बढ़ी तो वह स्त्री से ईमानदारी की अपेक्षा करने लगा। स्वयं को स्वामी समझने लगा। पितृसत्ता का अर्थ हो गया कि काम के बंटवारे में संतुलन का अभाव। धीरे-धीरे ये संबंध समाज में शोषित-शोषक संबंध को जन्म देता चला गया।
 एक ऐसा भी समय आया जब माना गया कि स्त्री को जीने का अधिकार नहीं है। पितृसत्तात्मक समाज के बदले सोच से मिला स्पेस धर्म भी स्त्री को विशेष रूप से देखते हैं। धर्म स्त्री के जीवन मूल्यों में उदात्तता चाहते हैं। धर्म जब आम स्त्री के सामने आता है। प्राय: यही बताता है कि उसे क्या करना है?लेकिन 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इन स्थितियों का विरोध हुआ और यह विरोध पितृसत्ता की तरफ से ही हुआ। राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद विद्यासागर स्त्री की हिमायत में आगे आए। उनके प्रयासों से स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण में अवश्य ही बदलाव आया यद्यपि पितृसत्ता की जड़ें फिर भी गहरी रहीं। हालांकि मेरा मानना है कि 15 प्रतिशत पितृसत्तात्मक समाज यह मानता है कि स्त्री-पुरुष बराबर हैं। यह वर्ग अपनी बेटी और बेटा की पढ़ाई पर समान खर्च करता है। स्त्री का महत्त्व समाज में और जीवन में समझ रहा है। रोजगार में उसकी भागीदारी को बढ़-चढ़ कर सपोर्ट कर रहा है। यह वर्ग रोजगार के क्षेत्र में चेतना फैलाने के लिए आगे आ रहा है। 
परिवर्तन वैचारिक रूप से चल रहा है। इसी व्यवस्था में अब सबको फायदा मिल रहा है और ऐसे में अवसर मिलने पर रोजगार में स्त्रियों ने यह साबित कर दिया है कि वह किसी पुरुष से दैहिक शक्ति में भले कमजोर हैं लेकिन मानसिक क्षमता,मेधा शक्ति, प्रतिभा शक्ति, निष्ठा शक्ति में वह पुरुषों के बराबर हैं। पितृसत्तात्मक समाज में ही स्त्री मुक्ति और उनके आगे बढ़ने का अवसर आया है। रोजगार में स्त्रियों की भागीदारी को देखकर बिना रोजगार वाली स्त्रियां भी खुश हैं। अब एक साधारण मां भी यह कहती है, ˜मेरी बेटी अध्यापिका बन जाएगी तो उसकी जिंदगी बदल जाएगी। उसे वह दु:ख नहीं झेलने पड़ेंगे जो मुझे झेलने पड़े।’ रोजगार के अवसर मिलने पर स्त्री अब स्वयं को साबित कर रही है। एक संतुलन स्थापित कर रही है। लेकिन विडंबना है कि कार्यस्थल पर पुरुष को प्राय: स्त्री केवल देह के रूप में नजर आती है। उसे उसकी उपस्थिति में कम मेधा के बल पर पाई गई उपलब्धि नजर आती है। फिर भी स्त्री अब देह से ऊपर उठ रही है। वह पुरुषों से बराबरी में कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है। लेकिन अब भी आधे से ज्यादा देश स्त्री का आकलन उसके काम से नहीं बल्कि उसके रूप यौवन से करता है। ऐसे में स्त्रियों के सामने बहुत चुनौतियां हैं। स्त्री विमर्श नहीं लिव-इन-रिले शनशिप मुझे उन स्त्रियों से भी शिकायत है, जो सफलता के लिए मेहनत और मेधा नहीं बल्कि ‘शार्ट कट’ अपनाती हैं। मुझे ऐसे स्त्री विमर्श पर क्रोध आता है। जो अपनी सफलता के लिए अपने सहकर्मी या बॉस के समक्ष बिछ जाती हैं।
 दरअसल, तब आप खिलौना बन जाती हैं। कुछ स्त्रियां कहती हैं कि हम स्वतंत्र हैं। उनका कहना है कि हम चाहे जिसके साथ रह सकते हैं। देह हमारी है और हम अपना संबंध किसी के साथ बनाने के लिए स्वतंत्र हैं। वह लिव- इन-रिलेशनशिप में विश्वास करती हैं। मेरा मानना है कि यह स्त्री विमर्श नहीं है। यह बंधन से मुक्त होना नहीं बल्कि कहीं न कहीं बंधन में रहना है। यह कहीं न कहीं पितृसत्ता के आगे समर्पण है। ऐसे में संतुलन और विवेक बहुत जरूरी है। आर्थिक सत्ता महिलाओं को उद्दाम यौनिकता के शिखर पर ले जा रही है। आप किस रूप में छली जा रही हैं, इसे समझने की जरूरत है। यह सोचना होगा कि यदि परस्त्री गमन किसी स्त्री को पीड़ा दे सकता है तो स्त्री का परपुरुष गमन भी पुरुष के लिए पीड़ादायक हो सकता है। बहरहाल, इन सबके बावजूद स्त्री अपनी अस्मिता की चुनती को स्वीकार कर रही है। ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं; जहां पहले पुरु षों का वर्चस्व था लेकिन अब उस क्षेत्र में स्त्रियां भी काबिज हो रही हैं। स्त्री समाज को रच सकती है, बना सकती है लेकिन यह परिवर्तन घर से शुरू करना होगा। यह समाज यदि बदल सकता है तो स्त्री ही इसे बदल सकती है।



चित्रा जी से अभिनव उपाध्याय की बातचीत

Saturday, August 11, 2012


भटकाव नहीं है यह

अन्ना आंदोलन को एक राजनीतिक विकल्प देने की राह पर आगे बढ़ने की सलाह देने वालों में सर्वप्रमुख प्रो. योगेंद्र यादव से अभिनव उपाध्याय की बातचीत


आप इस पूरे घटनाक्रम को किस तरह से देखते हैं? 

पिछले डेढ़ साल से चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की दिशा और दशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है। मैं समझता हूं कि शुरू से ही इस आंदोलन में तीन धाराएं थीं। पहली धारा राजनीति विरोध और राजनीति मात्र से खड़ा करने की धारा थी। दूसरी धारा कांग्रेस विरोध को तरजीह देने की थी, चाहे उससे भाजपा या अन्य विपक्षी दलों को लाभ हो। तीसरी धारा लोकतांत्रिक राजनीति के भीतर लेकिन स्थापित ढांचे से बाहर थी। पिछले साल भर से समय-समय पर यह तीसरी धारा प्रबल हुई है। इस अनशन को खत्म करते वक्त राजनीतिक विकल्प बनाने की घोषणा इस बुनियादी बदलाव का संकेत देती है। घोषणा भले ही जल्दी में की गई, लेकिन यह प्रक्रिया दीर्घकालिक थी।

क्या यह आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है?

 मैं नहीं समझता कि यह भटकाव है। ऐसा उन लोगों और इस आंदोलन के कार्यकर्ताओं को लग सकता है जो विरोध को एक गैर राजनीतिक काम मानते हैं। मैं मानता हूं कि इस देश में भ्रष्टाचार का विरोध करना अपने आप में राजनीति की शुरु आत करता है। भ्रष्टाचार की जड़ राजनीति में है तो उसका निदान करने की हर कोशिश अंतत: हमें राजनीति की ओर ही ले जाएगी। यूं भी लोकतांत्रिक समाज में किसी भी बुनियादी सार्वजनिक मुद्दे पर आमूल-चूल परिवर्तन की कोशिश लोकतांत्रिक राजनीति से परे रहकर नहीं की जा सकती। चोर दरवाजे से राजनीति करने से बेहतर है कि खुलकर और पूरी जिम्मेदारी से राजनीति की जाए। इस लिहाज से मैं राजनीतिक विकल्प बनाने की इस चेष्टा को आंदोलन का भटकाव नहीं, बल्कि उसकी तार्किक परिणति के रूप में देखता हूं।

कुछ लोग इसकी तुलना जयप्रकाश आंदोलन से कर रहे हैं, क्या आंदोलन उसी तरफ जा रहा है?

 हमें अतिशयोक्तिसे बचना चाहिए। मैंने खुद जयप्रकाश नारायण का आंदोलन नहीं देखा, लेकिन जितना पढ़ा-सुना है, उससे लगता है कि वह आंदोलन ज्यादा व्यापक और गहरा रहा होगा। लेकिन इस आंदोलन का जन-उभार, लोगों की स्वत: स्फूर्त भागीदारी और पूरे सत्ता प्रतिष्ठान को चुनौती देने की जिद, उस आंदोलन की याद जरूर दिलाती है।

जिस राजनीतिक विकल्प की बात की जा रही है, क्या वह कोई लोकतांत्रिक बदलाव ला सकता है? 

संभावना है लेकिन गारंटी नहीं। एक ऐतिहासिक अवसर हमारे सामने है। यदि अन्ना आंदोलन देश भर में चल रहे जनांदोलनों से रिश्ता बनाए और अपने विचार और संगठन को एक बड़े उद्देश्य से जोड़ सके तो यह संभावना बनती है। एक वैकल्पिक किस्म की राजनीति स्थापित हो सकेगी। दूसरी ओर यह खतरा है कि केवल चुनावी राजनीति के फेर में पड़कर आंदोलनकारी भी स्थापित राजनीति का हिस्सा बन जाएंगे।

इसकी आगे की नीति क्या होगी?

 यदि यह आंदोलन संपूर्ण क्रांति के उद्देश्य से बंधा है, जैसा कि अरविंद केजरीवाल ने कहा तो उसे अपनी विचारधारा का पुनर्निर्माण करना होगा। इस आंदोलन की शुरु आत भ्रष्टाचार विरोध के एक सूत्र से हुई। शुरू से ही इसमें देशभक्तिका विचार भी जुड़ा हुआ था। हाल ही में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने इसे ‘स्वराज’ के विचार से भी जोड़ा है। अब चुनौती है कि इन तीन सूत्रों को एक समग्र विचार का स्वरूप दिया जाए। नेताओं और अफसरों के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के साथ भ्रष्टाचार को जन्म देने वाली नीतियों और व्यवस्था पर भी एक दृष्टि बनाई जाए। एकांगी और संकीर्ण देशभक्तिकी जगह इस देश के अंतिम नागरिक की निष्ठा जीतने वाले राष्ट्रवाद की कल्पना की जाए। गांधीजी के स्वराज की कल्पना से स्वराज आए। इस वैचारिक चुनौती के अलावा बड़ी सांगठिनक चुनौतियां भी हैं कि ऐसा राजनीतिक संगठन कैसे बने जो स्थापित पार्टी की बीमारियों से मुक्त रह सके। इस देश की क्षेत्रीय और सामाजिक विविधता को आत्मसात कैसे किया जाए? संगठन में मर्यादा बनाने के लिए क्या प्रक्रिया बनाई जाए? आंतरिक लोकतंत्र की व्यवस्था सुदृढ़ कैसे हो? साथ ही देशभर के जनांदोलनों के साथ रिश्ता कैसे बनाया जा सके? यह सब आसान काम नहीं है।

आप भी इससे जुड़े हैं, आपकी इसमें क्या भूमिका है?

 पिछले साल अप्रैल में ही मैंने इस आंदोलन का स्वागत किया था। इसकी कमजोरियों और खतरों को दर्ज करते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ घटना बताया था। अगस्त के महीने में रामलीला मैदान में मैंने दो-तीन बार संबोधन भी किया और कहा कि यह आंदोलन एक अन्ना हजारे का नहीं देश के हर कस्बे, हर गांव में बैठे किसी न किसी अन्ना का है। उसके बाद लोकपाल बिल पर हुई बहस में मैंने आंदोलनकारियों को सिर्फ एक पार्टी का विरोध करना और भाजपा जैसी पार्टी का समर्थक दिखने के प्रति आगाह किया था। दिसम्बर में भी मैंने रामलीला मैदान से संबोधन किया था। इस बार भी मैंने इस आंदोलन के शुभचिंतक की हैसियत से जंतर मंतर से कई बार बोला। जिन लोगों ने पत्र लिखकर अनशन समाप्त करने और वैकल्पिक राजनीति की शुरु आत का अनुरोध किया था, मैं उनमें से एक था। ऐसा नहीं है कि अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों की हर बात से मैं सहमत हूं। मुझे लगता है कि उनके लोकपाल बिल में कमजोरियां थीं और अरु णा राय और साथियों द्वारा दिए गए प्रस्ताव पर ज्यादा गौर करना चाहिए था। फिर भी यदि आंदोलनकारियों की कमजोरी और सत्ता के भ्रष्टाचार और अहंकार में से मुझे किसी एक को चुनने के लिए कहा जाएगा तो जाहिर है कि मैं

इस आंदोलन का भविष्य किस तरह से देखते हैं? राजनैतिक आंदोलनों के बारे में भविष्यवाणी करना समझदारी नहीं है। आंदोलन के साथियों को बहुत आशाएं हैं, शायद जरूरत से ज्यादा। आलोचकों के मन में आशंकाएं हैं, शायद जरूरत से ज्यादा। भाविष्य इस पर निर्भर करेगा कि यह आंदोलन कितनी गंभीरता और गहराई से चुनौतियों का सामना करेगा जिसका जिक्र हमने पहले किया है।

Thursday, February 16, 2012

अलविदा शहरयार....

मैं अमिताभ का प्रशंसक हूं। वह बड़े कलाकार हैं। उनके हाथ से ज्ञानपीठ सम्मान लेने से मुङो खुशी होगी। जब ज्ञानपीठ सम्मान की घोषणा हुई तो मैने उनसे फोन पर बात की तब शायद वह अलीगढ़ थे। डॉ. अख्लाक मोहम्म खान ‘शहरयार उर्दू के चौथे साहित्यकार हैं, जिन्हें देश में साहित्य सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किया गया है। उन्हें यह पुरस्कार उर्दू साहित्य में उनके योगान के लिए दिया गया। लेकिन आमजन तो शहरयार को उनके लिखे गीत से जानता था। फिल्मों से उनको गहरा लगाव तो नहीं था लेकिन विषय पर वह जरूर ध्यान देते थे उन्होने क भी फिल्मों में गीत लेखन को गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि वह अपने लेखन से कभी समझौता नहीं करना चाहते थे। उन्होने एक बातचीत में तल्खी के साथ कहा था कि, अब उस तरह की फिल्में कहां बनती हैं। देखिए मैं कभी मुम्बई काम की तलाश में गया ही नहीं। मुङो कुछ फिल्मों के लिए बुलाया गया तो मैं गया। वो खास फिल्में थी, उसमें कहानी थी, उन फिल्मों का एक खास मकसद था। जाहिर है गाने पसंद किए गए। लेकिन आजकल की फिल्मों में कहानी होती ही नहीं है। एक ही तरह की मोहब्बत है जो हर फिल्म में हो रही है। लब्ज भी समझ में नहीं आते। बस धुनें हैं और लब्ज उनमें लिपटे रहते हैं। लेकिन उन्हे अमिताभ और रेखा की फिल्में पसंद थी। पुरस्कारों की घोषणा के बाद उन्होंने कहा कि वह आज भी अमिताभ की फिल्में देखते हैं। अमिताभ जिस ऊर्जा से काम करते हैं वह काबिले तारीफ है।

शहरयार ने गमन (1978), उमरा जान (1981) और अंजुमन (1986) के गीत लिखा है। उमराव जान के अलावा कोई और फिल्म तो विशेष नहीं चली लेकिन फिल्मों में लिखे इनके गाने आज तक उसी ललक से सुने जाते हैं। राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान साहित्य अकादेमी में साहित्य परिचर्चा के लिए आए थे मैं बस तफरी के मूड में साहित्य अकादेमी जाता था लेकिन टकरा गए, सो वहीं कमरे में बैठ के कुछ देर बातें कर ली और उन्होने मुङो खुशी खुशी समय भी दिया। मेरा सवाल भाषाओं की चिंता पर था मैने पूछा था कि, उर्दू को बढ़ाा देने के लिए सरकारी प्रयास जारी है? लेकिन क्या लगता है आपको उर्दू कितनी तरक्की कर रही है? और उन्होने बेबाकी से कहा, बहुत तरक्की कर रही है। उर्दू से मोहब्बत करनेोले और पढ़ने-लिखनेोले ऐसा कर कर रहे हैं। उर्दू को ो तमाम सुधिा हासिल है जो किसी भी जुबान को होनी चाहिए। सिलि सर्सि में यह एक षिय भी है। कुछ प्रदेशों की बोली में भी यह शामिल है। अकादमी भी है। दिल्ली और बिहार में द्वितीय भाषा है कश्मीर में पहली भाषा है। मौलाना आजाद उर्दू युनिसिर्टी है। दूरदर्शन का चैनल भी है। सरकार तो पैसा ही दे सकती है यह हिन्दी के साथ भी हो रहा है। हिन्दुस्तान में प्रॉसपेरिटी का मतलब यह हो गया है कि हम अपने कल्चर से दूर हो जाएं। अब मैनेजमेंट और बिजनेस की जो संस्कृति आ गई है उसमें हम अपनी भाषा को न जानने में फक्र महसूस करते हैं। उर्दू, हिन्दी अब मातृभाषा नहीं बल्कि मुंहबोली मां हो गई है। मामला यह है कि जब हम मकान से फ्लैट में आते हैें तो बदल जाते हैं। क्षेत्नीय जुबान में सब अपनी भाषा जानते हैं लेकिन हिन्दी उर्दू में ऐसा है जो जानते हैं वो भी शर्मिदगी महसूस करते हैं। अब सवाल हिन्दी को लेकर था कि, हिन्दी उर्दू में बहुत लिखा जा रहा है लेकिन पाठक कितने हैं? उन्होने कहा जितने पाठक पहले थे उतने पाठक अब भी हैं। पाठक कम हो रहे है, ये सब बहुत से धोखे हैं। न्यूज चैनल के आने के बाद कहा जाता था कि अखबार खत्म हो जाएगे लेकिन यह और बढ़ा। किसी ने किसी को रिप्लेस नहीं किया ह। धोखा हो रहा है कि ऐसा हो जाएगा। जिसका महत् है ह अब भी अपनी जगह कायम है। किताबें छप रही हैं, बिक रही हैं इसमें कोई मायूसी की बात नहीं है।
आपने भारत से बाहर के देशों में भी यात्नाएं की हैं हां के साहित्य को किस तरह से देखते है?
उन्होन बताया मानीय समस्या सबके यहां एक जैसी है। उनकी परंपरा, उनकी प्राथमिकता, उनकी संस्कृति अलग है और यह हमारे यहां से भिन्न है। तो उसका प्रभा है उन पर।
मैने पूछा ऐसे शायरों के बारे में क्या कहेंगे जो मंचो पर भी दिख रहे हैं और फिल्मों में भी लिख रहे हैं, मसलन गुलजार और जोद अख्तर? उन्होने बताया ये फिल्मों में पहले आए, मंच से इनका कोई लेना देना नहीं था। फिल्मों की जह से मंच पर बुलाए जाते हैं। शायर की हैसियत से उन्होने अपने को कभी परिचित नहीं कराया। दोनों की शायरी पर किताबें हैं लेकिन यह लेखक फिल्मों और किताबों में अलग अलग है। अंत में मैने देश के हालात के बारे में पूछा कि देश के तर्मान हालात के बारे में आप क्या कहना चाहेगें? और उन्होने उतनी ही संजीदगी से उत्तर दिया,हमें अपनी जुबान, अपने मजहब, हिन्दुस्तान से मोहब्बत करने का पूरा हक है। लेकिन इस मोहब्बत से हिन्दुस्तान में झगड़ा नहीं पैदा होना चाहिए। हिन्दुस्तान साथ में रहना चाहिए। जिससे हिन्दुस्तान में टकरा हो ऐसी मोहब्बत से बचना चाहिए। मैं कहना चाहूंगा कि, यही एक हम है, जो औरों को जीने की हसरत है। कहीं पर है कोई ऐसा, जिसे मेरी जरूरत है।
बातचीत खत्म हुई और एक आत्मीय मुस्कान से साथ हमने विदा ली। जब शहरयार के इंतकाल की खबर सुनी तो वही सब बातें एक बार फिर आंखों के सामने आने लगी और मुंह से अनायास निकला अलविदा।

Tuesday, January 31, 2012

मतदान की आंधी में मुद्दे

अरुण कुमार त्रिपाठी

सोमवार को पंजाब और उत्तराखंड और उससे पहले मणिपुर में जिस तरह मतदान की आंधी चली है उसे देखकर यही लगता है कि इस देश की जनता की दीवानी है और उस दीवानगी को बढ़ाने में राजनीतिक दलों के साथ भगवान भी लगे हुए हैं। अगर एेसा न होता तो बुरे मौसम के कारण चुनाव प्रचार को बाधित करने वाले उत्तराखंड में चुनाव के दिन धूप न खिली होती। पर इन चुनावों में हमेशा की भांति जिस तरह राजनीतिक दल मूल मुद्दों के भटकते रहे हैं उससे लगता है कि वे जनता की इसी दीवानगी का फायदा उठाते रहते हैं। इससे यह भी लगता है कि जनता मतदान को ही लोकतंत्र समझ कर उसके नशे में झूम रही है और राजनीतिक दल और उसे चलाने वाला कारपोरेट तंत्र उसे छलते हुए धन और सत्ता के मजे लूट रहा है। या फिर इसका मतलब यह भी हो सकता है कि जो जनता कुछ महीने पहले बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के साथ देश की मौजूदा राजनीति के प्रति अरुचि दिखाते हुए उसे बदलने को आतुर थी वह उसी को मजबूत करने को आतुर है। वही मणिपुर जहां पिछले दो महीनों तक नाकेबंदी चली और पूरे राज्य में हाहाकार मच गया था और वही राज्य जहां सश बल विशेष अधिकार अधिनियम को समाप्त करने के लिए इतना लंबा आंदोलन चल रहा है, वहां इसी लोकतंत्र में आस्था जताते हुए 82 प्रतिशत मतदान हुआ। इसी तरह वह पंजाब जहां कांग्रेस और अकाली दल दोनों पार्टियों पर भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार के अपने-अपने ढंग के आरोप चल रहे थे, वहां की जनता ने 77 प्रतिशत मतदान किया। दिलचस्प बात यह है कि पंजाब के उस मालवा इलाके में जहां किसानों और मजदूरों ने सबसे ज्यादा आत्महत्याएं की हैं भारी मतदान हुए। संगरूर जिले में 80 प्रतिशत मतदान और मुक्तसर में 84 प्रतिशत मतदान तक मतदान हुआ है। उससे भी रोचक तथ्य यह है कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के चुनाव क्षेत्र लांबी में 86 प्रतिशत और मनप्रीत सिंह बादल के चुनाव क्षेत्र गिद्दरवाह में 88 प्रतिशत तक मतदान हुआ है। उसके विपरीत जीत और मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के क्षेत्र पटियाला शहर में ‘महज 73 प्रतिशत मतदान हुआ है। उधर उत्तराखंड में हुआ 70 प्रतिशत मतदान एक दशक का सबसे ज्यादा मतदान है।


इन मतदानों के बाद राजनीतिक दल इसकी अपने-अपने ढंग से व्याख्या कर रहे हैं। सत्तारूढ़ पार्टियों का दावा है कि यह तो उसे फिर से सत्ता में लौटाने के लिए हुआ मतदान है और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा भी है कि उन्हें 80 सीटें मिलेंगी। दूसरी तरफ विपक्षी दलों का कहना है कि यह सत्ता विरोधी मतदान की आंधी है। जनता शासक दलों के नाकारापन और भ्रष्टाचार से ऊबी हुई है। इसलिए यह वोट उन्हें सत्ता से हटाने के लिए पड़े हैं। लेकिन उत्तराखंड और पंजाब दोनों में शासक और विपक्षी दलों के बीच बराबरी का टक्कर बताने वाले भी कम विश्लेषक नहीं हैं। जाहिर है परिणाम तो छह मार्च को ही सामने आएंगे लेकिन एक जो सबसे बड़ा परिणाम आया है वह लोकतंत्र के प्रति आस्था और रुचि का। इस देश में जब-जब लोकतंत्र से ऊबने और उसके नाकाम होने का हल्ला मचता है, तब-तब जनता उसमें डूब कर आस्था व्यक्त करती है। इसलिए यह दावा करने वाले भी खूब हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन फुस्स हो गया। एक तरफ भारतीय संसद ने भ्रष्टाचार विरोधी कानून को खारिज कर दिया तो दूसरी तरफ जनता ने भी उन्हीं पार्टियों के तंत्र में ज्यादा रुचि दिखाई जिन्होंने उसे पास नहीं होने दिया। अन्ना आंदोलन जिस प्रकार कांग्रेस पार्टी को निशाना बना रहा था (हालांकि निशाना बनाने लायक आचरण भाजपा सहित अन्य क्षेत्रीय दलों का भी पर्याप्त था) उसके होते हुए अगर चार राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आ गई और उत्तर प्रदेश में उसकी सीटें बढ़ गईं तो अन्ना आंदोलन का क्या अर्थ रह जाएगा? या रामदेव का ही क्या मतलब होगा?
मामला भ्रष्टाचार का ही नहीं लोगों के अस्तित्व और जीवन का भी है। समस्याएं उत्तर प्रदेश जसे पिछड़े राज्य की ही नहीं हैं, समस्याएं पंजाब जसे अगड़े राज्य की भी गंभीर हैं। पंजाब की अर्थव्यवस्था ठहरी हुई है। बेरोजगारी बढ़ी है। आज वहां कोई निवेशक आने को तैयार नहीं है। दूसरी तरफ नशे की गिरफ्त में फंसे युवाओं की पीड़ा अलग है। इसके उदाहरण के तौर पर पंजाब के चार गांव बलरां, जज्जर, हरकिशनपुर, मलसिंह वाला हैं। पंजाब के इन गांवों ने अगर हरित क्रांति का सुख भोगा है तो अब वे उसके अभिशाप को ङोलने को विवश हैं। संगरूर जिले के बलरां गांव में 85 आत्महत्याएं हो चुकी हैं। उसी तरह हरकिशनपुर एेसा गांव है जहां कभी लोगों ने बोर्ड लगा दिया था कि यह गांव बिकाऊ है। जज्जर और मल¨सहवाला गांव रासायनिक खादों और कीटनाशकों का जहर ङोल रहे हैं। वहां कई लोगों का मौतें हो चुकी हैं और दर्जनों अपाहिज हो चुके हैं। लोग कैंसर से पीड़ित हैं। विडंबना देखिए कि राजनीतिक दल खेती के तरीके में बुिनयादी परिवर्तन करने के बजाय महज मुफ्त बिजली देने और कुछ दूसरे किस्म की राहत देने का वादा करके चल देते हैं। वे उस प्रणाली का विकल्प ढूंढने की बात बिल्कुल नहीं करते जिसके चलते यह स्थितियां आई हैं।
एेसी ही चिंताजनक स्थितियां उत्तराखंड में हैं। वहां उत्तराखंड क्रांतिदल जसी जिन पार्टियों ने अलग राज्य के लिए आंदोलन किया उनका अस्तित्व समाप्त हो चुका है। वे या तो राष्ट्रीय दलों में विलीन हो चुकी हैं या फिर मुरझा गई हैं। पर्वतीय राज्य जिस मकसद के लिए बना था वह तो भुला दिया गया और फिर उन्हीं मैदानी इलाकों और तराई में विकास हो रहा है जिनके नाते पहाड़ उजड़ रहे थे। देहरादून, हरिद्वार और नैनीताल के तराई वाले इलाके की आबादी 20 प्रतिशत के करीब बढ़ी है वहीं अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जसे जिलों की आबादी घट रही है।
दिलचस्प बात यह है कि सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने घोषणा पत्रों और दृष्टिपत्रों में विकास का दावा किया है लेकिन उसके लिए वे कौन सा नजरिया अपनाएंगे यह साफ नहीं है। उत्तर प्रदेश के विखंडन को मुख्यमंत्री मायावती ने एक चुनावी मुद्दा बनाकर उछाला था। वह मुद्दा इस चुनाव की आंधी में बह गया है। किसी अन्य दल को तो छोड़िए बसपा भी उन पर चर्चा नहीं कर रही है। उसके कार्यकर्ताओं को यह डर सता रहा है कि कहीं प्रदेश बंट जाने से बहनजी की हैसियत कम न हो जाए। उधर भट्टा परसौल और टप्पल के किसानों का कहना है कि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने उनके मुद्दों को उठाकर वाहवाही तो खूब लूटी लेकिन उनके लिए कुछ किया नहीं। बल्कि उन्होंने उनका इस्तेमाल किया।
सवाल उठता है कि क्या भारी मतदान की आंधी में जनता के मुद्दे उड़ गए? या वे छह मार्च को किसी नए रूप में प्रकट होने का इंतजार कर रहे हैं? या हमारा लोकतंत्र मुद्दों को हल करने के बजाय चलती का नाम गाड़ी बन कर गया है और उसमें समाधान के लिए उसके समांतर सतत प्रयास जरूरी है?

Sunday, January 29, 2012

कागजों में सिमटा है गणतंत्र

सुनील गंगोपाध्याय

जिस संविधान को अंगीकार किए जाने की खुशी में हम भारत के नागरिक गणतंत्र दिवस मनाते हैं आज उसी के मूल्यों को ताक पर रख दिया गया है। समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व यानी समाजवाद के जिन मूल्यों को स्थापित करने और जिनकी रक्षा करने का संकल्प इस गणतंत्र में किया गया है, वे सभी तार-तार हो रहे हैं। लेखकीय स्वतंत्रता को कुचले जाने का नमूना जयपुर साहित्य सम्मेलन में दिखाई दिया, तो देश की बड़ी आबादी की बदहाली हमारे समता संबंधी दावों की रोज कलई खोलती है। दंगे और वैमनस्यता हमारी धर्मनिरपेक्षता औ्र बंधुत्व को खंडित करते हैं। एेसे में लोकतंत्र एक दस्तावेज से बाहर निकाल कर साकार करने की जरूरत है।

भारत में गणतंत्र लागू किए हुए भले ही 62 साल बीत गए हैं, लेकिन मुङो लगता है कि यह व्यवस्था सिर्फ कागजों तक ही सीमित होकर रह गई है। कम से कम हमारे आसपास जो कुछ हो रहा है, उससे तो यही लगता है कि हमारा देश चंद राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के हाथों में गिरवी है।
ताजा घटना जयपुर में देखने को मिली है, जब सारी तैयारियों के बाद सलमान रुश्दी को साहित्य उत्सव में भाग नहीं लेने दिया गया। यहां तक रुश्दी की आवाज को इस कदर दबाने की कोशिश की गई कि उनके वीडियो कांफ्रेंसिंग को भी प्रतिबंधित कर दिया गया, जिसके माध्यम से वह अपने प्रशंसकों को संबोधित करना चाहते थे। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर इस तरह की हरकत अपने आप में शर्मनाक घटना है। हमारा गणतंत्र हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन असलियत में ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता, जिससे यह साबित हो सके। अगर ऐसा कुछ होता तो सलमान रुश्दी को जयपुर आने दिया जाता और एक ऐसा खुशनुमा माहौल तैयार किया जाता, जिसमें कि वह अपना वक्तव्य रख सकते।
सच्चाई तो यह है हम एक बेहद खराब दौर से गुजर रहे हैं, जहां न तो वैचारिक स्वतंत्रता है और न ही कुछ करने की आजादी। रुश्दी को जयपुर न आने देने के विरोध में चार लेखकों ने प्रतिबंधित द सेटेनिक वर्सेस के कुछ उद्धरण पढ़े, उन पर आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं, यह शर्मनाक घटना है। साहित्य एक ऐसी पवित्र विधा है, जो कभी किसी की भावनाओं को आहत नहीं कर सकती। हाल के दिनों में इस तरह की कई घटनाएं हुई हैं, जिससे भारत की सहिष्णुता की छवि प्रभावित हुई है। हमारा देश आदिकाल से गंभीर और सहिष्णु माना जाता रहा है, लेकिन तस्लीमा नसरीन, सलमान रुश्दी या एम एफ हुसैन के साथ जो कुछ भी हुआ है, उसके लिए हमारा समाज और हमारी राजनीतिक व्यवस्था ही उत्तरदायी है। मुट्ठी भर लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन करने के बाद तस्लीमा नसरीन को कोलकाता से खदेड़ दिया गया, वहीं भारत से दूर त्रासद जीवन जी रहे, एम एफ हुसैन ने अपनी अंतिम सांस लंदन में ली। यही सब सलमान रुश्दी के साथ हुआ है।

मैं लंबे समय आम जन-जीवन से जुड़ा हुआ। मैने आम आदमी के साथ अपना सरोकार रखा है। मुङो बेहतर पता है कि भारत में संविधान लागू होने के 62 साल बीत जाने जाने के बाद भी हमारी आबादी का एक बड़ा तबका आजादी और गणतंत्र का मतलब नहीं समझता। यह हमारी विफलता है कि 62 साल बाद भी गणतंत्र का उत्सव देश के आम आदमी तक नहीं पहुंच सका है। समाजवाद हमारे समाज का एक महत्वपूर्ण मूल्य है। लेकिन लगता है कि समाजवाद को देश के राजनीतिक दलों ने पूरी तरह से भुला दिया है। यहां तक कि जो पार्टियां खुद के समाजवादी होने का दंभ भरती हैं, उनका भी समाजवाद से कोई लेना-देना नहीं रह गया है। आजादी के आंदोलन के दौरान ही यह साफ हो गया था कि भारत में समाजवादी सत्ता की स्थापना होगी।

आजादी के समय डॉ. राधाकृष्णन ने कहा था कि जब हम आजाद हो रहे हैं, तो हमारे राष्ट्रीय चरित्र में जो खामियां थीं, उन्हें हमें सुधारना होगा। हमारी खामियां हैं चरित्र की, तानाशाही की, असहिष्णुता की, अंधविश्वास की और संकुचित मनोवृत्ति की। हमें विकास के लिए शिक्षा, धैर्य, एक-दूसरे के विचारों के सहने व समझने की वृत्ति आवश्यक है। जब हम इन गुणों को अर्जित करेंगे, तभी हमारा देश विकास के राजपथ पर चल सकेगा। लेकिन अब लगता है कि हमारे देश के पहले की और वर्तमान सरकारों ने राधाकृष्णन सरीखे राष्ट्र निर्माताओं की चेतावनियों की उपेक्षा की। यही वजह है कि हम संविधान और संविधान निर्माताओं की अपेक्षा के अनुकूल नहीं बन सके। संविधान द्वारा स्थापित तमाम मूल्यों की अवहेलना पूरे देश में हो रही है। संविधान के अनुसार हमने अपने देश को प्रजातांत्रिक स्वरूप दिया है।

प्रजातांत्रिक व्यवस्था में शासन का संचालन राजनीतिक पार्टियां करती हैं, लेकिन हमारे देश में राजनीतिक दलों की जो स्थिति है, उसमें कहा जा सकता है कि उनके हाथ में प्रजातंत्र सुरक्षित नहीं है। इन राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी खामी है कि इनमें आंतरिक प्रजातंत्र नहीं है, तो वे देश में प्रजातंत्र की परिकल्पना को कैसे साकार कर सकते हैं। देश में लोकतंत्र कहने भर को है, लेकिन वास्तव में देश की राजनीति में आम आदमी की भूमिका शून्य है।

आम आदमी इतना असहाय हो गया है कि वह चाहे या न चाहे, सरकारें बन ही जाती हैं और नेतागण अपना पेट भरने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं। कानून व्यवस्था की हालत इतनी अधिक खराब है कि इस संबंध में तो चर्चा करना ही समय की बर्बादी माना जाने लगा है, लेकिन इसका खामियाजा हम सभी भुगत रहे हैं।

संविधान का एक और मूल्य है धर्म निरपेक्षता। हाल के दिनों में हमने धर्म निरपेक्षता को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी है। धर्म निरपेक्षता के विरोधी इस मूल्य के को कमजोर करने में लगे, वहीं, संविधान के इस मूल्य का समर्थन करने वाले लोग मौनव्रत धारण किए हुए हैं। सांप्रदायिक दंगे धर्मनिरपेक्षता का नींव हिलाते रहे हैं। भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है। देश में लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन हो रहा है। देश की अधिसंख्य आबादी अब मानने लगी है कि भारत का प्रशासन अब चरित्रवान व्यक्तियों के हाथ में नहीं है।

राजनीतिक दलों को और समाज के अगुवा लोगों को एक साथ बैठकर इस बात पर विचार करना चाहिए कि गणतंत्र दिवस मनाया जाना कितना प्रासंगिक रह गया है। जब तक इस देश की राजनीति को इसकी मिट्टी से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता है।

संतोष मिश्र से बातचीत पर आधारित

एक ही थैले के...

गहमा-गहमी...