Sunday, March 3, 2013

यादें याद आती हैं...



महानगर की इस भाग दौड़ में कभी-कभी लगता है कि क्या सचमुच किसी को भूला जा सकता है? क्या यादों के लिए जगह सिमटने लगी है? क्या कि सी के न रहने की जो रिक्तता है वह किसी और से भरी जा सकती है? लेकिन नहीं जब बात किसी प्रिय की हो तो अपनी या पराई लाख व्यस्ततों के बीच उसकी सुखद-दुखद यादें स्मृतियों में कौंध जाती हैं।
मुझे याद आ रही हैं कि आज ही के दिन दो साल पहले छूटे उस भाई, गुरु और सखा की, जिसके निधन की खबर सुनकर फौरन निगम बोध घाट पर जैसे-तैसे भागा था। मेरे शुभचिंतक पूजा सिंह और रंजेश शाही ने मुझे रात एक बजे से कई बार फोन किया, लेकिन मैं सो रहा था और जब फोन पर उनका मैसेज देखा तो थोड़ी देर के सन्न रह गया। तबीयत तो ज्यादा खराब थी, लेकिन इतनी जल्दी साथ छोड़ देंगे ऐसा नहीं सोचा था। मैं गोरखपुर के चर्चित पत्रकार रोहित पांडेय की बात कर रहा हूं। आज उनकी दूसरी पुण्यतिथि है।
दरअसल दो दिन पहले पूजा को फोन किया था और उससे पूछा कि रोहित भाई की पुण्यतिथि पर कुछ करने की सोच रहा हूं। उसने अपनी तरफ से समर्थन की हामी भर  दी। लेकिन अंत तक मैं असमंजस में रहा कि क्या करूं। मुझे रंजेश की बात याद आई जो उसने निगम बोध घाट पर कही थी। उसने कहा था, ‘‘अभिनव, रोहित सर हम सबके बीच एक पुल की तरह थे। वैसे तो हम दिल्ली में रहते हैं, लेकिन उनके बहाने सबसे मुलाकात हो जाती है।’’ एक बार सोचा कि क्यों न फिर हम सब मिलें और कुछ यादों को साझा करें। बहरहाल, सभी  की अपनी व्यस्तता और शायद मेरा निकम्मापन भी, मैंने किसी को कुछ नहीं कहा.
रोहित भाई ने बहुत कम समय में जिंदगी के कई उतार-चढ़ाव देखे। कभी-कभी लगता है कि गोरखपुर को उन्होंने ‘ठीक से’ समझा और शायद गोरखपुर ने उन्हें भी ‘ठीक से’ ही समझा। मृत्यु के बाद हमारे यहां ‘महान’ बना देने की परंपरा है, लेकिन मैं बिना किसी लाग-लपेट के कहूंगा कि जितना मैं जान पाया कि रोहित भाई महान की श्रेणी में नहीं थे और उनको इसकी कभी  लालसा भी  नहीं थी। जिसकी लालसा थी वह अधूरी ही रही। कुछ संयोग ऐसा रहा कि उनकी मृत्यु के दो साल पहले से उनका दिल्ली आना-जाना लगा रहा और इस बीच हम सबसे मिलना-जुलना भी। हम ठीक से उन्हें इसी बीच जान पाए। कभी  खुद फोन कर बुलाते तो कभी  हम बिना बताए पहुंच जाते। केवल मैं नहीं, पूजा तो उनकी पड़ोसन थी और रंजेश भी  प्राय: आता था। यह रोहित भाई का स्नेह ही था कि हम उनके सामने बैठकर घंटों किसी भी मुद्दे पर बिना उनकी सहमति-असहमति के बात कर सकते थे। वह बिना किसी का पक्ष लिए अपनी बात रखते। कई बार ऐसा हुआ कि मेरी और पूजा की तीखी बहस उनके सामने हुई, लेकिन बिना किसी निष्कर्ष के खत्म भी हो गई। तब तुरंत भाई की कोई अपनी राय नहीं होती थी। किसी को बढ़ावा न किसी की खिंचाई। एक संतुलित दर्शक और रह-रह कर दोनों की तरफ से हामी। दरअसल मैं, पूजा और रंजेश उनके शिष्य हैं। वह पूजा के सच्चे अर्थों में मित्र थे। और, सच कहूं तो थोड़ी देर बाद भाई के साथ रहने पर कोई भी  उनसे खुल सकता था और उससे वह उसके ‘जियरा’ का हाल-चाल पूछ सकते थे।
बेबाकी ऐसी की नापसंदगी पर गाली भी  फरार्टेदार और फिर चाय की दावत भी। उनके पढ़ाए गए लगभग सभी छात्रों को ‘भौजी’ की चाय याद है। ऐसा नहीं है कि गोरखपुर के सभी पत्रकार उनके शुभचिंतक ही थे या वह सब पर जान लुटाते थे। कुछ ऐसे लोग भी मिले जो उन्हें पीठ पीछे कुछ भी कहने से नहीं चूकते थे। वजह, विश्वविद्यालय से लेकर प्रेस क्लब की राजनीति में उनका हस्तक्षेप या वैचारिक मतभेद।
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि कुछ मामलों में मैं उनका धुर विरोधी था। हमारा टकराव विचारधारा को लेकर था। अंतिम समय में उन्हें और करीब से जानने का मौका मिला। वह पूरी तरह से संघी थे और खुलकर कहते भी थे, जबकि मेरा झुकाव वाम की तरफ था (है)। वह कम्युनिज्म को अन्य संघियों की तरह आयातित विचारधारा मानते थे और मेरा मानना था कि विचारधारा कहीं की हो, यह कितनी सार्थक है, यह समझने की जरूरत है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अधिकतर लोगों की सोच अभी धर्मनिरपेक्ष नहीं है। दुनिया के नए विचारों और नई अवधारणाओं को कभी जानने, समझने की कोशिश वहां पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रबुद्ध वर्ग कभी  नहीं करता है (मैं प्रबुद्ध नहीं हूं, लेकिन  मैं भी  नहीं कर पाया)। लेकिन जब आप गोरखपुर या ऐसे किसी शहर से बाहर जाएंगे तब आपको केवल भारत नहीं, बल्कि विश्व की गतिविधियों के बारे में जानने, सोचने, समझने की जरूरत पड़ेगी। मेरे अभी  कई मित्र और विश्वविद्यालय के जानने वाले शिक्षक हैं, जो कम्प्यूटर का प्रयोग नहीं करते, ब्लाग, मेल या ई पेपर उन्हें नहीं पता। दुर्भाग्यवश उन्होंने कभी जानने की कोशिश भी  नहीं की। बहरहाल, विचारधारा के निर्माण में तकनीक का प्रयोग भी प्रभावी रूप से उभरा है।

रोहित भाई मेरी भी जबरदस्त आलोचना करते थे, पीठ पीछे नहीं, मुंह पर, सरेआम (यही उनकी खासियत थी)।लेकिन कई बार यदि उनकी शर्ट की तारीफ करता था तो बस मुस्कुराते हुए ये कहकर चुप कि अरे ज्यादा नहीं, बस 25 रुपये मीटर के कपड़े की है। मतलब आलोचना अपनी जगह और सम्बन्ध अपनी जगह. पैसा उनके लिए कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा। ऐसे कई पत्रकार हैं जो खबर बेचकर मालामाल हैं, लेकिन वह अपना खर्च कर पत्रकारिता करते थे। उनका साफ कहना था, ‘‘सभी संपादकों से तुम्हारे अच्छे संबंध हो सकते हैं, बस उनसे नौकरी मत मांगो।’’

एक वाकया याद आता है। अंतिम दिनों में निराश हो गए थे और एक दिन कहा, ‘‘बाबू ऐसा लगता है कि अब बचना मुश्किल है।’’ मैंने कहा, ‘‘जो आप किसी के हाथ में नहीं है उसकी चिंता छोड़िये, कल आबिदा परवीन (पाकिस्तान की मशहूर सूफी गायिका) को सुनने चलते हैं, सूफी गाएंगी तन-मन एक हो जाएगा।’’ भइया उत्साह से चलने के लिए तैयार हो गए। मेरी छुट्टी थी, हम पहले पहुंच गए। आबिदा का गाना शुरू होने में देर थी। लम्बी बातचीत हुई। अचानक उनका मन तीन-चार गानों के बाद बेचैन हो गया।  ऐसा लगा कि वह कुछ सोच रहे हैं। घबराए से बोले, ‘‘चलो अब चला जाए। मन नहीं लग रहा है।’’ आत्मा और परमात्मा, दोनों मे रोहित भाई का दृढ़ विश्वास था और आबिदा का सूफियाना कलाम रूह तक जाता था। वह अभी रूह से कोई संवाद नहीं करना चाहते थे।  हम लौट आए।
भाई ने तीन दिन तक कोई बात नहीं की। एक दिन रात को तीन बजे उन्होंने एक कविता एसएमएस की। मैंने तुरंत उत्तर दिया, ‘अच्छी है।’ लेकिन उनकी कविता में निराशा साफ झलक रही थी। मैंने उसे नोट क्र लिया अभी बहुत खोजने के बाद भी  वह कविता नहीं मिली, फिर कभी साझा करूंगा।
कभी-कभी  मुझे लगता कि क्या उन्होंने जीने की आस सचमुच छोड़ दी थी? लेकिन अगले ही पल मुझे उनकी मूलचंद अस्पताल की हालत याद आती है। उनके बड़े भाई  ने मुझे फोन किया, ‘‘रोहित मूलचंद अस्पताल में भर्ती हैं तुम आ जाओ।’’ मैं कुवैत एम्बेसी में एक प्रेस कांफ्रेंस में था। भागा-भागा गया उनकी वह स्थिति देखी, जिसकी कल्पना नहीं कर सकता था। वह छटपटा रहे थे, बेचैन थे। ये बेचैनी दर्द की थी, जीजीविषा की थी। वहां से उन्हें फिर एम्स ले जाया गया, लेकिन वहां भी बेड की दिक्कत आ रही थी। डॉक्टर का साफ कहना था कि अब घर ले जाओ। लेकिन उनकी वह स्थिति देखकर रूह कांप गई। जब दर्द होता था तो किसी की नहीं सुनते थे। मुझसे वह स्थिति देखी नहीं जा रही थी और मैं कुछ देर रुकने के बाद चला गया।
उन्हें अभी  बहुत कुछ करना था। बहुत कुछ लिखना था, कई अधूरे ख्वाब पूरे करने थे। आखिर बच्चों के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया था, थिसिस भी  अधूरी थी। दिल्ली में पत्रकारिता का सपना बस सपना रह गया। यह भी अजीब विडंबना है कि उनके पढ़ाए हुए लोग आज अखबारों और चैनलों में विभिन्न पदों पर हैं, लेकिन उन्हें कभी किसी भी अखबार ने बतौर रिपोर्टर नौकरी नहीं दी और न इतना पैसा कि वह अपने बाद अपने परिवार के बारे में सोच सकें । जब बात स्थाई करने की आई तो ऐसी स्थिति नहीं रही। लेकिन गोरखपुर के पत्रकारों का उनके प्रति स्नेह ही था कि उन लोगों ने उनकी हर तरह से मदद की।
रोहित भाई भी  अपने शिष्यों, मित्रों और जानने वालों के लिए हमेशा खड़े रहे। अंतिम समय तक लाभ लेने वालों ने उन्हें नहीं छोड़ा। डॉक्टर के लाख मना करने के बावजूद वह उनसे बात करने वालों के फोन सुनते थे। लेकिन कभी अपने लिए किसी से कुछ नहीं कहा।
प्रभाष जोशी सहित कई ऐसे पत्रकारों,साहित्यकारों से उनका गहरा लगाव था। प्रभाष जी के निधन की खबर उन्होंने सुबह मुझे फोन पर दी थी और खराब सेहत के बावजूद उनके घर गए थे। अभी पिछले साल जब काशीनाथ सिंह को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था तो मैं उनका इंटरव्यू करने गया था। जब मैंने उनसे उनकी रचना ‘रेहन पर रग्घू’ को लेकर बात की तो उन्होंने रोहित पांडेय का नाम लिया। उनका कहना था, ‘‘इस पुस्तक के परिप्रेक्ष्य में रोहित ने मेरा पहला इंटरव्यू लिया था।’’
मेरे लिए इन सब बातों को याद करना एक बार फिर उस पीड़ा से गुजरना है। बहुत कुछ है और बहुत यादें हैं, लेकिन कुछ ऐसा भी है जिसका अपराधबोध होता है, जैसे- अब हम दिल्ली में रहने वाले दोस्त आपस में नहीं मिल पाते। दिल्ली में उनके भाई के घर मार्च 2011 के बाद फिर मैं जाने की हिम्मत नही जुटा पाया। मैं एक बार भी  उनकी पत्नी और बच्चों का हाल-चाल नहीं ले पाया।
ऐसा लगता है कि हम सचमुच कंक्रीट के जंगल में संवेदनाओं को खोते जा रहे हैं। हम मशीन हो रहे हैं, जो जड़ है जिसके चलने की ध्वनि तो है, लेकिन गति नहीं है। और इसके जिम्मेदार हम खुद हैं। अब कोई ऐसा नहीं है हमारे बीच  जो फकीरी का मतलब समझाए, बताए, बुलाए और लड़ने का जज्बा पैदा करे। आज मेरे जैसे पत्रकारिता में ही नहीं बहुत से  क्षेत्रों में उनके जानने वाले लोग हैं जो उनके आत्मीय हैं जिनके पास काफी कुछ हैं उनके बारे में कहने के लिए, गिले-शिकवे भी होंगे तो स्नेह भी होगा। मेरे पास भी है बहुत कुछ लेकिन कुछ साझा कर रहा हूँ।
उनकी कमी, उनका स्नेह, उनसे मतभेद, सबका अपना स्थान है। और इसके साथ ही मैं उनको अपनी श्रद्धांजलि देता हूँ।  रोहित भाई, आपकी मौजूदगी की यादें आज आपकी गैर मौजूदगी में भी हमें रास्ता दिखाती हैं और सदा दिखाती रहेंगी।

नमन! 

Wednesday, February 20, 2013

समझ और दृष्टिकोण


सीएसडीएस के फैलो डॉक्टर हिलाल अहमद से अभिव्यक्ति की आज़ादी और उसके आयाम से सम्बन्धित मेरी बातचीत पर आधारित एक लेख आज राष्ट्रीय सहारा अख़बार के हस्तक्षेप में 'समझ और दृष्टिकोण' शीर्षक के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित है . पढ़े आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है. 


अपने देश में अभिव्यक्ति की आजादी के दो पक्ष हैं। एक पक्ष अभिव्यक्ति की आजादी को कानूनसम्मत और उदारवादी सिद्धांतों पर आधारित बताता है। उस पर कोई अंकुश नहीं लगाया जा सकता। इसके विपरीत, दूसरे पक्ष का कहना है कि धर्म-संस्कृति आस्था के संवेदनशील मसले हैं। इनके विरुद्ध जाने से किसी भावनाएं आहत हो सकती हैं। इसलिए अभिव्यक्ति की आजादी आस्था से बढ़कर नहीं हो सकती। तो ये दो पक्ष हैं। उदारवादी दर्शन के दो प्रकार हैंनका रात्मक और सकारात्मक। नकारात्मक उदारवाद व्यक्ति को ही मूल मानते हुए उस पर किसी अंकुश का विरोध करता है। वहीं, सकारात्मक उदारवाद के नजरिये से व्यक्ति समाज के साथ रहता है। इसलिए उसकी बंदिश और आजादी समाज से अलग नहीं हैं। व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता तभी संभव है, जब वह उस समाज में रहे। टीएच ग्रीन, हेराल्ड जे लॉस्की जैसे ख्यातिनाम दार्शनिक इसी दूसरे सकारात्मक दृष्टिकोण के हैं। वे मानते हैं कि व्यक्ति समाज में फलता-फूलता है और उसके आदर्श इसी सामाजिक संदभरे में ही फलीभूत होते हैं। इसीलिए एक पूरी पण्राली जिसे संविधानवाद कहा जाता है; वह व्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा कुछ नियमों से तय कर देता है। चूंकि संविधान लचीला होता है और इसके निर्माता समय और जरूरतों के हिसाब से इसे बदलते रहते हैं। इसलिए व्यक्तियों और समाजों के बीच की एक गतिशीलता बनी रहती है। इस संदर्भ में, भारत में जब भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात की गई है, वह हमेशा सामाजिक संदभरे में की गई है। वह ‘एब्सल्यूट’ नहीं है। इस तरह से हम देखें तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बात करना अपराध हो जाएगा, जो गलत होगा। उदारवाद में ही यह बात मौजूद है कि जो एब्सल्यूट है, उसके ऊपर संविधान की व्यवस्था है। यह पहला सिद्धांत है। दूसरे, कठमुल्ला और पोंगा पंडित हैं, जिनका मानना है कि व्यक्ति नहीं, समाज सवरेपरि होता है। इस तर्क से मेरे इत्तेफाक न रखने की दो वजहें हैं। पहली, तो यह कि जिस इस्लाम, हिन्दुत्व या ईसाइयत को हम जानते हैं, वह अपने आप में एक आधुनिक रूप लिए हुए है और इसका आधुनिक रूप, जिसे हम मानते हैं, उसका मतलब एक रचा-बसा, लिखित, संविधान- सम्मत रीति-पण्राली है। यह स्वरूप आधुनिकता ने दिया है। मध्यकाल में धर्म के मामले में बहुत खुलापन है। वहां आज के जैसे धर्मातरण के झगड़े ऐसे नहीं दिखते। दरअसल, जिस धर्म को हम आज जानते हैं, वह 19वीं सदी की देन है। आधुनिकता भी उसी सदी की देन है। इससे पहले धर्म और आधुनिकता पर बहसें नहीं मिलतीं। कबीर की साखी समाज और धर्म के आंतरिक रिश्तों को लेकर है। कहने का मतलब यह कि 19वीं सदी में धर्म को जो लिखित शक्ल दिया गया, वह अलिखित रूप में पहले से मौजूद था। बहरहाल, 19वीं सदी में जो धर्म बना, उसमें धर्म का एक ऐसा स्वरूप निकल कर आया जो सीमाओं से बंधा था। इससे ही धार्मिंक आस्थाएं तय होने लगीं। आज जिन आस्थाओं का हवाला दिया जाता है, वे तमाम आधुनिक आस्थाएं हैं। इसीलिए उन पर कंफ्लिक्ट है। धर्म संरचना में एकरूपता लाने की प्रक्रिया आधुनिक प्रक्रिया है जो ब्रिटिश शासनकाल में शुरू हुई। तब यहां सभी धर्मो में सुधार आंदोलन हुए। इसे आज की ईसाइयत के रूप में व्यवस्थित तरीके से लाया गया। इसमें ही यह तय हुआ कि ये मानेंगे, वो नहीं मानेंगे। जैसे इस्लाम में चित्र पर बनाने पर पाबंदी लगी। हालांकि ईरान में ऐसे बेशुमार लोग थे, जो चित्र बनाते थे। हिंदू धर्म में गाय नहीं खाई जाती लेकिन ऐसे बहुत-से कबीले हैं, जो अपने हिंदू मानते हैं और गाय खाते हैं। इस तरह सभी धर्मो में यह तय हुआ कि किसकी अनुमति है और किसकी अनुमति नहीं है। अब सवाल है कि इनके मूल्य क्या हैं, जिनका धर्म संकट में आ जाता है। जिस तरह उदारवादी बिना लिब्रलिज्म को समझे कह देते हैं कि ‘एब्सल्यूट लिबर्टी’ होनी चाहिए। लेकिन यह एब्सल्यूट शब्द उदारवाद की तरफ नहीं निरंकुशता की तरफ जाता है। पूरे यूरोप में, अमेरिका में, थॉमस पेन से लेकर हेराल्ड लॉस्की और आज भी, इस पर र्चचा है कि सीमा थोपी नहीं जा सकती। यह उपजी होती है। वह वहां गलत हैं और जहां-जिनका धर्म संकट में आ जाता है। जैसे एमएफ हुसैन का हिंदू देवी-देवताओं का अर्धनग्न चित्र बनाना। इसके चलते धर्म संकट आने का मतलब है कि उनकी नजर के अलावा और किसी नजरिये से भगवान- पैगम्बर को देखने की कोशिश हुई तो उनकी भावनाओं के विपरीत होगी, चोट पहुंचाएगी। जो ऐसा करेगा वह दंड का भागी होगा। ये बात हिंदू और इस्लाम दोनों धर्मो के खिलाफ चली जाती है। कुरान में ऐसी कई आयतें हैं, जो कहती हैं कि ‘बख्श दो यदि बुरा करे कोई’। शरीयतें इसी तरह बनी हैं, जब सवाल उठने लगे तो इस्लाम में उन्हें नये तरीके से परिभाषित किया गया। फिर नया इस्लाम आया, नए कानून बनें। तो यह बहस है। मेरा कहना है कि अपना संशिलष्ट समाज है। अगर आप असहमत हैं फिर भी बात करना न छोड़ें। अगर आप बात नहीं करेंगे तो अभिव्यक्ति सीमित होकर रह जाएगी। अभिव्यक्ति न तो पूर्ण है, न मिश्रित।

यह आम बहस की बात है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा होनी चाहिए कि नहीं? इस पर आम बहस होनी चाहिए। अब प्रगाश ग्रुप की बात करें तो मुफ्ती साहब ने एक बयान जारी कर कहा कि यह फतवा नहीं था। उनका कहना था कि औरतों को गाना नहीं गाना चाहिए और इस्लाम में संगीत मना है। ये दोनों बातें इस्लाम के दृष्टिकोण से गलत हैं। इस्लाम में संगीत की एक लम्बी परंपरा है। बहुत-सी कश्मीरी औरतें गणतंत्र दिवस की परेड में अपने पारंपरिक गीत- संगीत का प्रदर्शन करती हैं। मतलब यह कि एतराज इस्लामिक दृष्टिकोण से ही यह दुरु स्त नहीं है। कमल हासन की विश्वरूपम का हर जगह अलग-अलग तरीके से विरोध हुआ। इसके पीछे केवल मुस्लिम विरोध ही नहीं था। बहुत-से लोगों ने कहा कि इस फिल्म में विवादित कुछ भी नहीं था। आज मुसलमान तो ऐसा सिंबल है कि उसे यदि उछाल दो तो उसे अंतरराष्ट्रीय पब्लिसिटी मिल जाती है। आज दुनिया बनाम इस्लाम का विमर्श है। ऐसे में प्रचार आसान है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में हमें दो-तीन मुद्दों पर बात करनी पड़ेगी, एक बात लीगल फेमवर्क की है। इसका मतलब यह नहीं है कि इसको बैन कर दो या उठा लो। इसके तीन स्तर हैं। पहला स्तर संविधान का है। इसका मतलब है कि यह हमारा बेसिक ढांचा है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में इसको देखिए। फिर हमारे पास व्यवस्थित कानून हैं; जैसे इंडियन पीनल कोड, सेंसर बोर्ड आदि। ये मुद्दे पर बने कानून हैं। तीसरा, इन पर अमल करने/कराने वाली संस्थाएं हैं। इसके आगे मसले पर व्यापक परिर्चचा होनी चाहिए। इसके तीन रूप हैं-व्यापक जन संवाद, मीडिया और पॉलिसी। सरकार को एक पॉलिसी फ्रेमवर्क बनाना चाहिए जिसमें मीडिया सहित दूसरे लोगों को जोड़ा जाए। सरकार और राजनीति को इससे अलग नहीं रख सकते। हम कम राजनीतिक हैं, तभी यह विवाद है। लिहाजा, हमें ज्यादा राजनीतिक होना पड़ेगा। जब एक व्यापक प्रक्रिया शुरू हो जो मूलभूत सवालों को उठाए और इसके तीन तरीके मैंने बताए हैं। पहला, कानून जिसमें तीन स्तर हैं-संविधान, दूसरे कानून और पॉलिसी। दूसरा स्तर है, संस्थाओं का प्रतिनिधित्व। और आखिर है, लोगों के विचारों को बांटने का। हमें और लोकतांत्रिक और ज्यादा राजनीतिक होना पड़ेगा। अभी हम थोड़ी-सी राजनीति और थोड़ी-सी नीति लेकर चल रहे हैं, ऐसा आगे ठीक नहीं होगा।

अभिनव उपाध्याय की बातचीत पर आधारित

Friday, November 16, 2012

उन स्त्रियों से शिकायत है- चित्रा मुद्गल





 जब हम स्त्री विमर्श की बात करते हैं तो यह संतुलित विमर्श होना चाहिए न कि घृणा के उबाल के साथ। मेरा यह मानना है कि अब संतुलित विमर्श का समय है; क्योंकि स्त्री के उत्थान में पुरुषों का योगदान भी कम नहीं है। पहले ऐसा मानकर चला जा रहा था कि स्त्री को जीवन जीने का अधिकार नहीं है। उन्हें पशुओं की तरह समझा गया। लेकिन इस तरह के सच के पीछे संतुलन का अभाव है। मानवीय सत्ता बराबर है और मेरा मानना है कि इसमें बराबर की साझेदारी होनी चाहिए। चाहे वह संबंध, पति-पत्नी का हो, बाप-बेटी का हो या भाई-बहन का। लेकिन पुरातन समय से जब हम पितृसत्ता की बात करते हैं तो पुरुषों को बलशाली माना गया है। स्त्री को हमेशा कोमलांगी, भ्रूण धारण करने वाली, बच्चे पैदा करने वाली, जननी, विरासत को आगे बढ़ाने वाली ही माना गया है। तब ऐसा था कि पुरुष किसी विशेष स्त्री का पुरुष नहीं होता था। जब संबंधों में समरसता बढ़ी तो वह स्त्री से ईमानदारी की अपेक्षा करने लगा। स्वयं को स्वामी समझने लगा। पितृसत्ता का अर्थ हो गया कि काम के बंटवारे में संतुलन का अभाव। धीरे-धीरे ये संबंध समाज में शोषित-शोषक संबंध को जन्म देता चला गया।
 एक ऐसा भी समय आया जब माना गया कि स्त्री को जीने का अधिकार नहीं है। पितृसत्तात्मक समाज के बदले सोच से मिला स्पेस धर्म भी स्त्री को विशेष रूप से देखते हैं। धर्म स्त्री के जीवन मूल्यों में उदात्तता चाहते हैं। धर्म जब आम स्त्री के सामने आता है। प्राय: यही बताता है कि उसे क्या करना है?लेकिन 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इन स्थितियों का विरोध हुआ और यह विरोध पितृसत्ता की तरफ से ही हुआ। राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद विद्यासागर स्त्री की हिमायत में आगे आए। उनके प्रयासों से स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण में अवश्य ही बदलाव आया यद्यपि पितृसत्ता की जड़ें फिर भी गहरी रहीं। हालांकि मेरा मानना है कि 15 प्रतिशत पितृसत्तात्मक समाज यह मानता है कि स्त्री-पुरुष बराबर हैं। यह वर्ग अपनी बेटी और बेटा की पढ़ाई पर समान खर्च करता है। स्त्री का महत्त्व समाज में और जीवन में समझ रहा है। रोजगार में उसकी भागीदारी को बढ़-चढ़ कर सपोर्ट कर रहा है। यह वर्ग रोजगार के क्षेत्र में चेतना फैलाने के लिए आगे आ रहा है। 
परिवर्तन वैचारिक रूप से चल रहा है। इसी व्यवस्था में अब सबको फायदा मिल रहा है और ऐसे में अवसर मिलने पर रोजगार में स्त्रियों ने यह साबित कर दिया है कि वह किसी पुरुष से दैहिक शक्ति में भले कमजोर हैं लेकिन मानसिक क्षमता,मेधा शक्ति, प्रतिभा शक्ति, निष्ठा शक्ति में वह पुरुषों के बराबर हैं। पितृसत्तात्मक समाज में ही स्त्री मुक्ति और उनके आगे बढ़ने का अवसर आया है। रोजगार में स्त्रियों की भागीदारी को देखकर बिना रोजगार वाली स्त्रियां भी खुश हैं। अब एक साधारण मां भी यह कहती है, ˜मेरी बेटी अध्यापिका बन जाएगी तो उसकी जिंदगी बदल जाएगी। उसे वह दु:ख नहीं झेलने पड़ेंगे जो मुझे झेलने पड़े।’ रोजगार के अवसर मिलने पर स्त्री अब स्वयं को साबित कर रही है। एक संतुलन स्थापित कर रही है। लेकिन विडंबना है कि कार्यस्थल पर पुरुष को प्राय: स्त्री केवल देह के रूप में नजर आती है। उसे उसकी उपस्थिति में कम मेधा के बल पर पाई गई उपलब्धि नजर आती है। फिर भी स्त्री अब देह से ऊपर उठ रही है। वह पुरुषों से बराबरी में कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है। लेकिन अब भी आधे से ज्यादा देश स्त्री का आकलन उसके काम से नहीं बल्कि उसके रूप यौवन से करता है। ऐसे में स्त्रियों के सामने बहुत चुनौतियां हैं। स्त्री विमर्श नहीं लिव-इन-रिले शनशिप मुझे उन स्त्रियों से भी शिकायत है, जो सफलता के लिए मेहनत और मेधा नहीं बल्कि ‘शार्ट कट’ अपनाती हैं। मुझे ऐसे स्त्री विमर्श पर क्रोध आता है। जो अपनी सफलता के लिए अपने सहकर्मी या बॉस के समक्ष बिछ जाती हैं।
 दरअसल, तब आप खिलौना बन जाती हैं। कुछ स्त्रियां कहती हैं कि हम स्वतंत्र हैं। उनका कहना है कि हम चाहे जिसके साथ रह सकते हैं। देह हमारी है और हम अपना संबंध किसी के साथ बनाने के लिए स्वतंत्र हैं। वह लिव- इन-रिलेशनशिप में विश्वास करती हैं। मेरा मानना है कि यह स्त्री विमर्श नहीं है। यह बंधन से मुक्त होना नहीं बल्कि कहीं न कहीं बंधन में रहना है। यह कहीं न कहीं पितृसत्ता के आगे समर्पण है। ऐसे में संतुलन और विवेक बहुत जरूरी है। आर्थिक सत्ता महिलाओं को उद्दाम यौनिकता के शिखर पर ले जा रही है। आप किस रूप में छली जा रही हैं, इसे समझने की जरूरत है। यह सोचना होगा कि यदि परस्त्री गमन किसी स्त्री को पीड़ा दे सकता है तो स्त्री का परपुरुष गमन भी पुरुष के लिए पीड़ादायक हो सकता है। बहरहाल, इन सबके बावजूद स्त्री अपनी अस्मिता की चुनती को स्वीकार कर रही है। ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं; जहां पहले पुरु षों का वर्चस्व था लेकिन अब उस क्षेत्र में स्त्रियां भी काबिज हो रही हैं। स्त्री समाज को रच सकती है, बना सकती है लेकिन यह परिवर्तन घर से शुरू करना होगा। यह समाज यदि बदल सकता है तो स्त्री ही इसे बदल सकती है।



चित्रा जी से अभिनव उपाध्याय की बातचीत

Saturday, August 11, 2012


भटकाव नहीं है यह

अन्ना आंदोलन को एक राजनीतिक विकल्प देने की राह पर आगे बढ़ने की सलाह देने वालों में सर्वप्रमुख प्रो. योगेंद्र यादव से अभिनव उपाध्याय की बातचीत


आप इस पूरे घटनाक्रम को किस तरह से देखते हैं? 

पिछले डेढ़ साल से चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की दिशा और दशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है। मैं समझता हूं कि शुरू से ही इस आंदोलन में तीन धाराएं थीं। पहली धारा राजनीति विरोध और राजनीति मात्र से खड़ा करने की धारा थी। दूसरी धारा कांग्रेस विरोध को तरजीह देने की थी, चाहे उससे भाजपा या अन्य विपक्षी दलों को लाभ हो। तीसरी धारा लोकतांत्रिक राजनीति के भीतर लेकिन स्थापित ढांचे से बाहर थी। पिछले साल भर से समय-समय पर यह तीसरी धारा प्रबल हुई है। इस अनशन को खत्म करते वक्त राजनीतिक विकल्प बनाने की घोषणा इस बुनियादी बदलाव का संकेत देती है। घोषणा भले ही जल्दी में की गई, लेकिन यह प्रक्रिया दीर्घकालिक थी।

क्या यह आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है?

 मैं नहीं समझता कि यह भटकाव है। ऐसा उन लोगों और इस आंदोलन के कार्यकर्ताओं को लग सकता है जो विरोध को एक गैर राजनीतिक काम मानते हैं। मैं मानता हूं कि इस देश में भ्रष्टाचार का विरोध करना अपने आप में राजनीति की शुरु आत करता है। भ्रष्टाचार की जड़ राजनीति में है तो उसका निदान करने की हर कोशिश अंतत: हमें राजनीति की ओर ही ले जाएगी। यूं भी लोकतांत्रिक समाज में किसी भी बुनियादी सार्वजनिक मुद्दे पर आमूल-चूल परिवर्तन की कोशिश लोकतांत्रिक राजनीति से परे रहकर नहीं की जा सकती। चोर दरवाजे से राजनीति करने से बेहतर है कि खुलकर और पूरी जिम्मेदारी से राजनीति की जाए। इस लिहाज से मैं राजनीतिक विकल्प बनाने की इस चेष्टा को आंदोलन का भटकाव नहीं, बल्कि उसकी तार्किक परिणति के रूप में देखता हूं।

कुछ लोग इसकी तुलना जयप्रकाश आंदोलन से कर रहे हैं, क्या आंदोलन उसी तरफ जा रहा है?

 हमें अतिशयोक्तिसे बचना चाहिए। मैंने खुद जयप्रकाश नारायण का आंदोलन नहीं देखा, लेकिन जितना पढ़ा-सुना है, उससे लगता है कि वह आंदोलन ज्यादा व्यापक और गहरा रहा होगा। लेकिन इस आंदोलन का जन-उभार, लोगों की स्वत: स्फूर्त भागीदारी और पूरे सत्ता प्रतिष्ठान को चुनौती देने की जिद, उस आंदोलन की याद जरूर दिलाती है।

जिस राजनीतिक विकल्प की बात की जा रही है, क्या वह कोई लोकतांत्रिक बदलाव ला सकता है? 

संभावना है लेकिन गारंटी नहीं। एक ऐतिहासिक अवसर हमारे सामने है। यदि अन्ना आंदोलन देश भर में चल रहे जनांदोलनों से रिश्ता बनाए और अपने विचार और संगठन को एक बड़े उद्देश्य से जोड़ सके तो यह संभावना बनती है। एक वैकल्पिक किस्म की राजनीति स्थापित हो सकेगी। दूसरी ओर यह खतरा है कि केवल चुनावी राजनीति के फेर में पड़कर आंदोलनकारी भी स्थापित राजनीति का हिस्सा बन जाएंगे।

इसकी आगे की नीति क्या होगी?

 यदि यह आंदोलन संपूर्ण क्रांति के उद्देश्य से बंधा है, जैसा कि अरविंद केजरीवाल ने कहा तो उसे अपनी विचारधारा का पुनर्निर्माण करना होगा। इस आंदोलन की शुरु आत भ्रष्टाचार विरोध के एक सूत्र से हुई। शुरू से ही इसमें देशभक्तिका विचार भी जुड़ा हुआ था। हाल ही में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने इसे ‘स्वराज’ के विचार से भी जोड़ा है। अब चुनौती है कि इन तीन सूत्रों को एक समग्र विचार का स्वरूप दिया जाए। नेताओं और अफसरों के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के साथ भ्रष्टाचार को जन्म देने वाली नीतियों और व्यवस्था पर भी एक दृष्टि बनाई जाए। एकांगी और संकीर्ण देशभक्तिकी जगह इस देश के अंतिम नागरिक की निष्ठा जीतने वाले राष्ट्रवाद की कल्पना की जाए। गांधीजी के स्वराज की कल्पना से स्वराज आए। इस वैचारिक चुनौती के अलावा बड़ी सांगठिनक चुनौतियां भी हैं कि ऐसा राजनीतिक संगठन कैसे बने जो स्थापित पार्टी की बीमारियों से मुक्त रह सके। इस देश की क्षेत्रीय और सामाजिक विविधता को आत्मसात कैसे किया जाए? संगठन में मर्यादा बनाने के लिए क्या प्रक्रिया बनाई जाए? आंतरिक लोकतंत्र की व्यवस्था सुदृढ़ कैसे हो? साथ ही देशभर के जनांदोलनों के साथ रिश्ता कैसे बनाया जा सके? यह सब आसान काम नहीं है।

आप भी इससे जुड़े हैं, आपकी इसमें क्या भूमिका है?

 पिछले साल अप्रैल में ही मैंने इस आंदोलन का स्वागत किया था। इसकी कमजोरियों और खतरों को दर्ज करते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ घटना बताया था। अगस्त के महीने में रामलीला मैदान में मैंने दो-तीन बार संबोधन भी किया और कहा कि यह आंदोलन एक अन्ना हजारे का नहीं देश के हर कस्बे, हर गांव में बैठे किसी न किसी अन्ना का है। उसके बाद लोकपाल बिल पर हुई बहस में मैंने आंदोलनकारियों को सिर्फ एक पार्टी का विरोध करना और भाजपा जैसी पार्टी का समर्थक दिखने के प्रति आगाह किया था। दिसम्बर में भी मैंने रामलीला मैदान से संबोधन किया था। इस बार भी मैंने इस आंदोलन के शुभचिंतक की हैसियत से जंतर मंतर से कई बार बोला। जिन लोगों ने पत्र लिखकर अनशन समाप्त करने और वैकल्पिक राजनीति की शुरु आत का अनुरोध किया था, मैं उनमें से एक था। ऐसा नहीं है कि अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों की हर बात से मैं सहमत हूं। मुझे लगता है कि उनके लोकपाल बिल में कमजोरियां थीं और अरु णा राय और साथियों द्वारा दिए गए प्रस्ताव पर ज्यादा गौर करना चाहिए था। फिर भी यदि आंदोलनकारियों की कमजोरी और सत्ता के भ्रष्टाचार और अहंकार में से मुझे किसी एक को चुनने के लिए कहा जाएगा तो जाहिर है कि मैं

इस आंदोलन का भविष्य किस तरह से देखते हैं? राजनैतिक आंदोलनों के बारे में भविष्यवाणी करना समझदारी नहीं है। आंदोलन के साथियों को बहुत आशाएं हैं, शायद जरूरत से ज्यादा। आलोचकों के मन में आशंकाएं हैं, शायद जरूरत से ज्यादा। भाविष्य इस पर निर्भर करेगा कि यह आंदोलन कितनी गंभीरता और गहराई से चुनौतियों का सामना करेगा जिसका जिक्र हमने पहले किया है।

Thursday, February 16, 2012

अलविदा शहरयार....

मैं अमिताभ का प्रशंसक हूं। वह बड़े कलाकार हैं। उनके हाथ से ज्ञानपीठ सम्मान लेने से मुङो खुशी होगी। जब ज्ञानपीठ सम्मान की घोषणा हुई तो मैने उनसे फोन पर बात की तब शायद वह अलीगढ़ थे। डॉ. अख्लाक मोहम्म खान ‘शहरयार उर्दू के चौथे साहित्यकार हैं, जिन्हें देश में साहित्य सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किया गया है। उन्हें यह पुरस्कार उर्दू साहित्य में उनके योगान के लिए दिया गया। लेकिन आमजन तो शहरयार को उनके लिखे गीत से जानता था। फिल्मों से उनको गहरा लगाव तो नहीं था लेकिन विषय पर वह जरूर ध्यान देते थे उन्होने क भी फिल्मों में गीत लेखन को गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि वह अपने लेखन से कभी समझौता नहीं करना चाहते थे। उन्होने एक बातचीत में तल्खी के साथ कहा था कि, अब उस तरह की फिल्में कहां बनती हैं। देखिए मैं कभी मुम्बई काम की तलाश में गया ही नहीं। मुङो कुछ फिल्मों के लिए बुलाया गया तो मैं गया। वो खास फिल्में थी, उसमें कहानी थी, उन फिल्मों का एक खास मकसद था। जाहिर है गाने पसंद किए गए। लेकिन आजकल की फिल्मों में कहानी होती ही नहीं है। एक ही तरह की मोहब्बत है जो हर फिल्म में हो रही है। लब्ज भी समझ में नहीं आते। बस धुनें हैं और लब्ज उनमें लिपटे रहते हैं। लेकिन उन्हे अमिताभ और रेखा की फिल्में पसंद थी। पुरस्कारों की घोषणा के बाद उन्होंने कहा कि वह आज भी अमिताभ की फिल्में देखते हैं। अमिताभ जिस ऊर्जा से काम करते हैं वह काबिले तारीफ है।

शहरयार ने गमन (1978), उमरा जान (1981) और अंजुमन (1986) के गीत लिखा है। उमराव जान के अलावा कोई और फिल्म तो विशेष नहीं चली लेकिन फिल्मों में लिखे इनके गाने आज तक उसी ललक से सुने जाते हैं। राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान साहित्य अकादेमी में साहित्य परिचर्चा के लिए आए थे मैं बस तफरी के मूड में साहित्य अकादेमी जाता था लेकिन टकरा गए, सो वहीं कमरे में बैठ के कुछ देर बातें कर ली और उन्होने मुङो खुशी खुशी समय भी दिया। मेरा सवाल भाषाओं की चिंता पर था मैने पूछा था कि, उर्दू को बढ़ाा देने के लिए सरकारी प्रयास जारी है? लेकिन क्या लगता है आपको उर्दू कितनी तरक्की कर रही है? और उन्होने बेबाकी से कहा, बहुत तरक्की कर रही है। उर्दू से मोहब्बत करनेोले और पढ़ने-लिखनेोले ऐसा कर कर रहे हैं। उर्दू को ो तमाम सुधिा हासिल है जो किसी भी जुबान को होनी चाहिए। सिलि सर्सि में यह एक षिय भी है। कुछ प्रदेशों की बोली में भी यह शामिल है। अकादमी भी है। दिल्ली और बिहार में द्वितीय भाषा है कश्मीर में पहली भाषा है। मौलाना आजाद उर्दू युनिसिर्टी है। दूरदर्शन का चैनल भी है। सरकार तो पैसा ही दे सकती है यह हिन्दी के साथ भी हो रहा है। हिन्दुस्तान में प्रॉसपेरिटी का मतलब यह हो गया है कि हम अपने कल्चर से दूर हो जाएं। अब मैनेजमेंट और बिजनेस की जो संस्कृति आ गई है उसमें हम अपनी भाषा को न जानने में फक्र महसूस करते हैं। उर्दू, हिन्दी अब मातृभाषा नहीं बल्कि मुंहबोली मां हो गई है। मामला यह है कि जब हम मकान से फ्लैट में आते हैें तो बदल जाते हैं। क्षेत्नीय जुबान में सब अपनी भाषा जानते हैं लेकिन हिन्दी उर्दू में ऐसा है जो जानते हैं वो भी शर्मिदगी महसूस करते हैं। अब सवाल हिन्दी को लेकर था कि, हिन्दी उर्दू में बहुत लिखा जा रहा है लेकिन पाठक कितने हैं? उन्होने कहा जितने पाठक पहले थे उतने पाठक अब भी हैं। पाठक कम हो रहे है, ये सब बहुत से धोखे हैं। न्यूज चैनल के आने के बाद कहा जाता था कि अखबार खत्म हो जाएगे लेकिन यह और बढ़ा। किसी ने किसी को रिप्लेस नहीं किया ह। धोखा हो रहा है कि ऐसा हो जाएगा। जिसका महत् है ह अब भी अपनी जगह कायम है। किताबें छप रही हैं, बिक रही हैं इसमें कोई मायूसी की बात नहीं है।
आपने भारत से बाहर के देशों में भी यात्नाएं की हैं हां के साहित्य को किस तरह से देखते है?
उन्होन बताया मानीय समस्या सबके यहां एक जैसी है। उनकी परंपरा, उनकी प्राथमिकता, उनकी संस्कृति अलग है और यह हमारे यहां से भिन्न है। तो उसका प्रभा है उन पर।
मैने पूछा ऐसे शायरों के बारे में क्या कहेंगे जो मंचो पर भी दिख रहे हैं और फिल्मों में भी लिख रहे हैं, मसलन गुलजार और जोद अख्तर? उन्होने बताया ये फिल्मों में पहले आए, मंच से इनका कोई लेना देना नहीं था। फिल्मों की जह से मंच पर बुलाए जाते हैं। शायर की हैसियत से उन्होने अपने को कभी परिचित नहीं कराया। दोनों की शायरी पर किताबें हैं लेकिन यह लेखक फिल्मों और किताबों में अलग अलग है। अंत में मैने देश के हालात के बारे में पूछा कि देश के तर्मान हालात के बारे में आप क्या कहना चाहेगें? और उन्होने उतनी ही संजीदगी से उत्तर दिया,हमें अपनी जुबान, अपने मजहब, हिन्दुस्तान से मोहब्बत करने का पूरा हक है। लेकिन इस मोहब्बत से हिन्दुस्तान में झगड़ा नहीं पैदा होना चाहिए। हिन्दुस्तान साथ में रहना चाहिए। जिससे हिन्दुस्तान में टकरा हो ऐसी मोहब्बत से बचना चाहिए। मैं कहना चाहूंगा कि, यही एक हम है, जो औरों को जीने की हसरत है। कहीं पर है कोई ऐसा, जिसे मेरी जरूरत है।
बातचीत खत्म हुई और एक आत्मीय मुस्कान से साथ हमने विदा ली। जब शहरयार के इंतकाल की खबर सुनी तो वही सब बातें एक बार फिर आंखों के सामने आने लगी और मुंह से अनायास निकला अलविदा।

Tuesday, January 31, 2012

मतदान की आंधी में मुद्दे

अरुण कुमार त्रिपाठी

सोमवार को पंजाब और उत्तराखंड और उससे पहले मणिपुर में जिस तरह मतदान की आंधी चली है उसे देखकर यही लगता है कि इस देश की जनता की दीवानी है और उस दीवानगी को बढ़ाने में राजनीतिक दलों के साथ भगवान भी लगे हुए हैं। अगर एेसा न होता तो बुरे मौसम के कारण चुनाव प्रचार को बाधित करने वाले उत्तराखंड में चुनाव के दिन धूप न खिली होती। पर इन चुनावों में हमेशा की भांति जिस तरह राजनीतिक दल मूल मुद्दों के भटकते रहे हैं उससे लगता है कि वे जनता की इसी दीवानगी का फायदा उठाते रहते हैं। इससे यह भी लगता है कि जनता मतदान को ही लोकतंत्र समझ कर उसके नशे में झूम रही है और राजनीतिक दल और उसे चलाने वाला कारपोरेट तंत्र उसे छलते हुए धन और सत्ता के मजे लूट रहा है। या फिर इसका मतलब यह भी हो सकता है कि जो जनता कुछ महीने पहले बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के साथ देश की मौजूदा राजनीति के प्रति अरुचि दिखाते हुए उसे बदलने को आतुर थी वह उसी को मजबूत करने को आतुर है। वही मणिपुर जहां पिछले दो महीनों तक नाकेबंदी चली और पूरे राज्य में हाहाकार मच गया था और वही राज्य जहां सश बल विशेष अधिकार अधिनियम को समाप्त करने के लिए इतना लंबा आंदोलन चल रहा है, वहां इसी लोकतंत्र में आस्था जताते हुए 82 प्रतिशत मतदान हुआ। इसी तरह वह पंजाब जहां कांग्रेस और अकाली दल दोनों पार्टियों पर भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार के अपने-अपने ढंग के आरोप चल रहे थे, वहां की जनता ने 77 प्रतिशत मतदान किया। दिलचस्प बात यह है कि पंजाब के उस मालवा इलाके में जहां किसानों और मजदूरों ने सबसे ज्यादा आत्महत्याएं की हैं भारी मतदान हुए। संगरूर जिले में 80 प्रतिशत मतदान और मुक्तसर में 84 प्रतिशत मतदान तक मतदान हुआ है। उससे भी रोचक तथ्य यह है कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के चुनाव क्षेत्र लांबी में 86 प्रतिशत और मनप्रीत सिंह बादल के चुनाव क्षेत्र गिद्दरवाह में 88 प्रतिशत तक मतदान हुआ है। उसके विपरीत जीत और मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के क्षेत्र पटियाला शहर में ‘महज 73 प्रतिशत मतदान हुआ है। उधर उत्तराखंड में हुआ 70 प्रतिशत मतदान एक दशक का सबसे ज्यादा मतदान है।


इन मतदानों के बाद राजनीतिक दल इसकी अपने-अपने ढंग से व्याख्या कर रहे हैं। सत्तारूढ़ पार्टियों का दावा है कि यह तो उसे फिर से सत्ता में लौटाने के लिए हुआ मतदान है और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा भी है कि उन्हें 80 सीटें मिलेंगी। दूसरी तरफ विपक्षी दलों का कहना है कि यह सत्ता विरोधी मतदान की आंधी है। जनता शासक दलों के नाकारापन और भ्रष्टाचार से ऊबी हुई है। इसलिए यह वोट उन्हें सत्ता से हटाने के लिए पड़े हैं। लेकिन उत्तराखंड और पंजाब दोनों में शासक और विपक्षी दलों के बीच बराबरी का टक्कर बताने वाले भी कम विश्लेषक नहीं हैं। जाहिर है परिणाम तो छह मार्च को ही सामने आएंगे लेकिन एक जो सबसे बड़ा परिणाम आया है वह लोकतंत्र के प्रति आस्था और रुचि का। इस देश में जब-जब लोकतंत्र से ऊबने और उसके नाकाम होने का हल्ला मचता है, तब-तब जनता उसमें डूब कर आस्था व्यक्त करती है। इसलिए यह दावा करने वाले भी खूब हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन फुस्स हो गया। एक तरफ भारतीय संसद ने भ्रष्टाचार विरोधी कानून को खारिज कर दिया तो दूसरी तरफ जनता ने भी उन्हीं पार्टियों के तंत्र में ज्यादा रुचि दिखाई जिन्होंने उसे पास नहीं होने दिया। अन्ना आंदोलन जिस प्रकार कांग्रेस पार्टी को निशाना बना रहा था (हालांकि निशाना बनाने लायक आचरण भाजपा सहित अन्य क्षेत्रीय दलों का भी पर्याप्त था) उसके होते हुए अगर चार राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आ गई और उत्तर प्रदेश में उसकी सीटें बढ़ गईं तो अन्ना आंदोलन का क्या अर्थ रह जाएगा? या रामदेव का ही क्या मतलब होगा?
मामला भ्रष्टाचार का ही नहीं लोगों के अस्तित्व और जीवन का भी है। समस्याएं उत्तर प्रदेश जसे पिछड़े राज्य की ही नहीं हैं, समस्याएं पंजाब जसे अगड़े राज्य की भी गंभीर हैं। पंजाब की अर्थव्यवस्था ठहरी हुई है। बेरोजगारी बढ़ी है। आज वहां कोई निवेशक आने को तैयार नहीं है। दूसरी तरफ नशे की गिरफ्त में फंसे युवाओं की पीड़ा अलग है। इसके उदाहरण के तौर पर पंजाब के चार गांव बलरां, जज्जर, हरकिशनपुर, मलसिंह वाला हैं। पंजाब के इन गांवों ने अगर हरित क्रांति का सुख भोगा है तो अब वे उसके अभिशाप को ङोलने को विवश हैं। संगरूर जिले के बलरां गांव में 85 आत्महत्याएं हो चुकी हैं। उसी तरह हरकिशनपुर एेसा गांव है जहां कभी लोगों ने बोर्ड लगा दिया था कि यह गांव बिकाऊ है। जज्जर और मल¨सहवाला गांव रासायनिक खादों और कीटनाशकों का जहर ङोल रहे हैं। वहां कई लोगों का मौतें हो चुकी हैं और दर्जनों अपाहिज हो चुके हैं। लोग कैंसर से पीड़ित हैं। विडंबना देखिए कि राजनीतिक दल खेती के तरीके में बुिनयादी परिवर्तन करने के बजाय महज मुफ्त बिजली देने और कुछ दूसरे किस्म की राहत देने का वादा करके चल देते हैं। वे उस प्रणाली का विकल्प ढूंढने की बात बिल्कुल नहीं करते जिसके चलते यह स्थितियां आई हैं।
एेसी ही चिंताजनक स्थितियां उत्तराखंड में हैं। वहां उत्तराखंड क्रांतिदल जसी जिन पार्टियों ने अलग राज्य के लिए आंदोलन किया उनका अस्तित्व समाप्त हो चुका है। वे या तो राष्ट्रीय दलों में विलीन हो चुकी हैं या फिर मुरझा गई हैं। पर्वतीय राज्य जिस मकसद के लिए बना था वह तो भुला दिया गया और फिर उन्हीं मैदानी इलाकों और तराई में विकास हो रहा है जिनके नाते पहाड़ उजड़ रहे थे। देहरादून, हरिद्वार और नैनीताल के तराई वाले इलाके की आबादी 20 प्रतिशत के करीब बढ़ी है वहीं अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जसे जिलों की आबादी घट रही है।
दिलचस्प बात यह है कि सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने घोषणा पत्रों और दृष्टिपत्रों में विकास का दावा किया है लेकिन उसके लिए वे कौन सा नजरिया अपनाएंगे यह साफ नहीं है। उत्तर प्रदेश के विखंडन को मुख्यमंत्री मायावती ने एक चुनावी मुद्दा बनाकर उछाला था। वह मुद्दा इस चुनाव की आंधी में बह गया है। किसी अन्य दल को तो छोड़िए बसपा भी उन पर चर्चा नहीं कर रही है। उसके कार्यकर्ताओं को यह डर सता रहा है कि कहीं प्रदेश बंट जाने से बहनजी की हैसियत कम न हो जाए। उधर भट्टा परसौल और टप्पल के किसानों का कहना है कि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने उनके मुद्दों को उठाकर वाहवाही तो खूब लूटी लेकिन उनके लिए कुछ किया नहीं। बल्कि उन्होंने उनका इस्तेमाल किया।
सवाल उठता है कि क्या भारी मतदान की आंधी में जनता के मुद्दे उड़ गए? या वे छह मार्च को किसी नए रूप में प्रकट होने का इंतजार कर रहे हैं? या हमारा लोकतंत्र मुद्दों को हल करने के बजाय चलती का नाम गाड़ी बन कर गया है और उसमें समाधान के लिए उसके समांतर सतत प्रयास जरूरी है?

Sunday, January 29, 2012

कागजों में सिमटा है गणतंत्र

सुनील गंगोपाध्याय

जिस संविधान को अंगीकार किए जाने की खुशी में हम भारत के नागरिक गणतंत्र दिवस मनाते हैं आज उसी के मूल्यों को ताक पर रख दिया गया है। समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व यानी समाजवाद के जिन मूल्यों को स्थापित करने और जिनकी रक्षा करने का संकल्प इस गणतंत्र में किया गया है, वे सभी तार-तार हो रहे हैं। लेखकीय स्वतंत्रता को कुचले जाने का नमूना जयपुर साहित्य सम्मेलन में दिखाई दिया, तो देश की बड़ी आबादी की बदहाली हमारे समता संबंधी दावों की रोज कलई खोलती है। दंगे और वैमनस्यता हमारी धर्मनिरपेक्षता औ्र बंधुत्व को खंडित करते हैं। एेसे में लोकतंत्र एक दस्तावेज से बाहर निकाल कर साकार करने की जरूरत है।

भारत में गणतंत्र लागू किए हुए भले ही 62 साल बीत गए हैं, लेकिन मुङो लगता है कि यह व्यवस्था सिर्फ कागजों तक ही सीमित होकर रह गई है। कम से कम हमारे आसपास जो कुछ हो रहा है, उससे तो यही लगता है कि हमारा देश चंद राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के हाथों में गिरवी है।
ताजा घटना जयपुर में देखने को मिली है, जब सारी तैयारियों के बाद सलमान रुश्दी को साहित्य उत्सव में भाग नहीं लेने दिया गया। यहां तक रुश्दी की आवाज को इस कदर दबाने की कोशिश की गई कि उनके वीडियो कांफ्रेंसिंग को भी प्रतिबंधित कर दिया गया, जिसके माध्यम से वह अपने प्रशंसकों को संबोधित करना चाहते थे। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर इस तरह की हरकत अपने आप में शर्मनाक घटना है। हमारा गणतंत्र हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन असलियत में ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता, जिससे यह साबित हो सके। अगर ऐसा कुछ होता तो सलमान रुश्दी को जयपुर आने दिया जाता और एक ऐसा खुशनुमा माहौल तैयार किया जाता, जिसमें कि वह अपना वक्तव्य रख सकते।
सच्चाई तो यह है हम एक बेहद खराब दौर से गुजर रहे हैं, जहां न तो वैचारिक स्वतंत्रता है और न ही कुछ करने की आजादी। रुश्दी को जयपुर न आने देने के विरोध में चार लेखकों ने प्रतिबंधित द सेटेनिक वर्सेस के कुछ उद्धरण पढ़े, उन पर आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं, यह शर्मनाक घटना है। साहित्य एक ऐसी पवित्र विधा है, जो कभी किसी की भावनाओं को आहत नहीं कर सकती। हाल के दिनों में इस तरह की कई घटनाएं हुई हैं, जिससे भारत की सहिष्णुता की छवि प्रभावित हुई है। हमारा देश आदिकाल से गंभीर और सहिष्णु माना जाता रहा है, लेकिन तस्लीमा नसरीन, सलमान रुश्दी या एम एफ हुसैन के साथ जो कुछ भी हुआ है, उसके लिए हमारा समाज और हमारी राजनीतिक व्यवस्था ही उत्तरदायी है। मुट्ठी भर लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन करने के बाद तस्लीमा नसरीन को कोलकाता से खदेड़ दिया गया, वहीं भारत से दूर त्रासद जीवन जी रहे, एम एफ हुसैन ने अपनी अंतिम सांस लंदन में ली। यही सब सलमान रुश्दी के साथ हुआ है।

मैं लंबे समय आम जन-जीवन से जुड़ा हुआ। मैने आम आदमी के साथ अपना सरोकार रखा है। मुङो बेहतर पता है कि भारत में संविधान लागू होने के 62 साल बीत जाने जाने के बाद भी हमारी आबादी का एक बड़ा तबका आजादी और गणतंत्र का मतलब नहीं समझता। यह हमारी विफलता है कि 62 साल बाद भी गणतंत्र का उत्सव देश के आम आदमी तक नहीं पहुंच सका है। समाजवाद हमारे समाज का एक महत्वपूर्ण मूल्य है। लेकिन लगता है कि समाजवाद को देश के राजनीतिक दलों ने पूरी तरह से भुला दिया है। यहां तक कि जो पार्टियां खुद के समाजवादी होने का दंभ भरती हैं, उनका भी समाजवाद से कोई लेना-देना नहीं रह गया है। आजादी के आंदोलन के दौरान ही यह साफ हो गया था कि भारत में समाजवादी सत्ता की स्थापना होगी।

आजादी के समय डॉ. राधाकृष्णन ने कहा था कि जब हम आजाद हो रहे हैं, तो हमारे राष्ट्रीय चरित्र में जो खामियां थीं, उन्हें हमें सुधारना होगा। हमारी खामियां हैं चरित्र की, तानाशाही की, असहिष्णुता की, अंधविश्वास की और संकुचित मनोवृत्ति की। हमें विकास के लिए शिक्षा, धैर्य, एक-दूसरे के विचारों के सहने व समझने की वृत्ति आवश्यक है। जब हम इन गुणों को अर्जित करेंगे, तभी हमारा देश विकास के राजपथ पर चल सकेगा। लेकिन अब लगता है कि हमारे देश के पहले की और वर्तमान सरकारों ने राधाकृष्णन सरीखे राष्ट्र निर्माताओं की चेतावनियों की उपेक्षा की। यही वजह है कि हम संविधान और संविधान निर्माताओं की अपेक्षा के अनुकूल नहीं बन सके। संविधान द्वारा स्थापित तमाम मूल्यों की अवहेलना पूरे देश में हो रही है। संविधान के अनुसार हमने अपने देश को प्रजातांत्रिक स्वरूप दिया है।

प्रजातांत्रिक व्यवस्था में शासन का संचालन राजनीतिक पार्टियां करती हैं, लेकिन हमारे देश में राजनीतिक दलों की जो स्थिति है, उसमें कहा जा सकता है कि उनके हाथ में प्रजातंत्र सुरक्षित नहीं है। इन राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी खामी है कि इनमें आंतरिक प्रजातंत्र नहीं है, तो वे देश में प्रजातंत्र की परिकल्पना को कैसे साकार कर सकते हैं। देश में लोकतंत्र कहने भर को है, लेकिन वास्तव में देश की राजनीति में आम आदमी की भूमिका शून्य है।

आम आदमी इतना असहाय हो गया है कि वह चाहे या न चाहे, सरकारें बन ही जाती हैं और नेतागण अपना पेट भरने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं। कानून व्यवस्था की हालत इतनी अधिक खराब है कि इस संबंध में तो चर्चा करना ही समय की बर्बादी माना जाने लगा है, लेकिन इसका खामियाजा हम सभी भुगत रहे हैं।

संविधान का एक और मूल्य है धर्म निरपेक्षता। हाल के दिनों में हमने धर्म निरपेक्षता को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी है। धर्म निरपेक्षता के विरोधी इस मूल्य के को कमजोर करने में लगे, वहीं, संविधान के इस मूल्य का समर्थन करने वाले लोग मौनव्रत धारण किए हुए हैं। सांप्रदायिक दंगे धर्मनिरपेक्षता का नींव हिलाते रहे हैं। भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है। देश में लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन हो रहा है। देश की अधिसंख्य आबादी अब मानने लगी है कि भारत का प्रशासन अब चरित्रवान व्यक्तियों के हाथ में नहीं है।

राजनीतिक दलों को और समाज के अगुवा लोगों को एक साथ बैठकर इस बात पर विचार करना चाहिए कि गणतंत्र दिवस मनाया जाना कितना प्रासंगिक रह गया है। जब तक इस देश की राजनीति को इसकी मिट्टी से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता है।

संतोष मिश्र से बातचीत पर आधारित

Wednesday, January 25, 2012

जाति और डेरों का लोकतंत्र

यह जानकार हैरानी होती है कि पंजाब के ज्यादातर राजनेता चुनावी वैतरणी पार करने के लिए डेराओं के चक्कर लगा रहे हैं। सबसे ज्यादा भीड़ डेरा सच्चा सौदा के बाबा गुरमीत राम रहीम के यहां हो रही है। हाल ही में कांग्रेस की नेता प्रणीत कौर और रनिंदर सिंह ने बाबा से मुलाकात की है। बाबा के प्रमुख लोगों की समिति पंजाब विधानसभा के चुनावों में अपनी भूमिका तय करने के लिए बैठक कर रहे हैं और जसा कि संकेत मिले हैं कि उनके असर को देखते हुए वे आगामी 30 तारीख को किंगमेकर की भूमिका निभा सकते हैं। पंजाब में बाबा के पचास लाख अनुयायी बताए जाते हैं और उनका राज्य की 117 में से 55 विधानसभा पर जोर और अन्य 30 सीटों पर असर बताया जाता है। इनमें कई क्षेत्र राज्य के 67 सीटों वाले मालवा क्षेत्र में पड़ते हैं।
पंजाब से सटे हरियाणा के सिरसा में डेरा सच्चा सौदा का आश्रम चलाने वाले बाबा राम रहीम वही हैं जिन पर अपनी दो शिष्याओं के साथ बलात्कार और अन्य आपराधिक मामले हैं और उनकी भूमिका पर पारंपरिक और अनुदार सिख पंथ को कड़ी आपत्तियां हैं जिसके चलते दंगे वगैरह भी हो चुके हैं। शायद इसीलिए उम्मीद की जा रही है कि इस बार भी डेरा सच्चा सौदा के लोग शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के हितों की रक्षा करने वाले शिरोमणि अकाली दल को उसी तरह से धक्का देंगे जसा उन्होंने 2007 के चुनावों में दिया था। यानी उनका झुकाव कांग्रेस की तरफ हो सकता है और हो सकता है जल्दी ही इस बारे में कोई परोक्ष या प्रत्यक्ष बयान भी आ जाए। यही स्थिति पंजाब के अन्य डेरों की भी है। पंजाब के तमाम डेरों में राजनीतिक दलों की भीड़ बढ़ती जा रही है। डेरा सच्चा सौदा ही नहीं संत रविदास के आदर्शो पर बना डेरा सचखंड, आशुतोष महराज का दिव्य ज्योति संस्थान , रोपड़ का बाबा भनियारेवाला और अन्य डेरों में राजनीतिक दल समर्थन मांगने और उनके मुद्दों को महत्व देने के लिए दौड़ रहे हैं। निरंकारियों का अपना दायरा है। यानी मध्ययुगीन डेरों के आगे आधुनिक राजसत्ता नतमस्तक हो रही है ताकि वह अपने लिए पर्याप्त ताकत बटोर सके।
दरअसल आधुनिक लोकतंत्र जिन दबाव समूहों के संगठनों के माध्यम से अपने को चलाना चाहता था उसका कोई आधुनिक स्वरूप विकसित करने में वह विफल रहा है। यही वजह है कि राजनीतिक दलों के ट्रेड यूनियनों और कर्मचारी संगठनों या किसान संगठनों के पास जाने की खबरें कम आती हैं। या तो डेरा में माथा टेकने की खबरें आती हैं या गुरुद्वारों में। उसी तरह से उत्तर प्रदेश की पार्टियां विभिन्न जातिगत संगठनों के पास दौड़ती नजर आती हैं। उत्तर प्रदेश में जाति और धर्म के संगठन हैं जरूर पर उतने व्यवस्थित नहीं हैं जितने पंजाब वगैरह में। यही वजह है कि वहां राजनीति करने के लिए कई जाति के संगठन खड़े किए गए हैं। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि वहां जातिविरोधी आंदोलन लगातार उतना शक्तिशाली नहीं रहा जितना पंजाब और देश के अन्य हिस्सों में। आज जब उसका बहुजन समाज पार्टी के माध्यम से उसका एक आक्रामक राजनीतिक स्वरूप उभरा है तो वह अपने को सामाजिक स्तर पर भी गोलबंद कर रहा है।
ऊपरी तौर पर देखने से लगता है कि पंजाब के भीतर राजनीति ने धर्म के साथ घालमेल किया है और वहां चाहे अकाली दल हो या कांग्रेस दोनों धर्मनिरपेक्ष राजनीति के मूल्यों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। अकाली दल की राजनीति को कभी धर्म और उसके संस्थानों से अलग हो ही नहीं पाई लेकिन कांग्रेस की भी मजबूरी उन्हीं धार्मिक संस्थानों के भीतर राजनीति करने की है जिनकोवह अपने सिद्धांत के विरुद्ध मानती है। तो क्या मान लिया जाए कि 62 गणतंत्र दिवस और 65 स्वाधीनता दिवस देखने के बाद वह वैसी नहीं हो सकी है जसी उससे अपेक्षा थी? भारतीय राजनीति की इन्हीं आशंकाओं को संविधान निर्माता डा भीमराव आंबेडकर ने अपने ढंग से व्यक्त किया था। उनका कहना था कि अगर समाज में समानता नहीं होगी तो इस लोकतंत्र में तमाम तरह की विकृतियां पैदा होंगी और संविधान का बार-बार उल्लंघन होगा।
चाहे पंजाब के डेरे हों या उत्तर प्रदेश के जाति संगठन या कर्नाटक के लिंगायत मठ उन सब की भूमिका इसलिए बढ़ी है क्योंकि समाज में असमानता बरकरार है और राजनीतिक दल उसे दूर करने में उस गति से सफल नहीं हो पा रहे हैं जसे होना चाहिए। पंजाब के डेरे एक तरह से गुरुद्वारों पर काबिज जाट सिखों के वर्चस्व के विरुद्ध एक चुनौती हैं। बाबा राम रहीम के ज्यादातर अनुयायी दलित और छोटी जातियों से संबंधित हैं। इन जातियों ने कभी कांग्रेस के साथ अपना गठजोड़ बनाया था लेकिन उनसे अपेक्षा पूरी न होते देख अपने धार्मिक और सामाजिक संगठनों को मजबूत करने पर जोर दिया। यह विडंबना है कि जिस हिंदू धर्म की जातिगत असमानता और अन्य बुराइयों से ऊब कर सिख धर्म निकला था वह अपने उन आदर्शो पर खरा नहीं उतरा। पंजाब के गुरुद्वारों में दलित सिखों को वह सम्मान नहीं मिलता जिसकी उन्हें अपेक्षा रहती है। यही कारण है कि उन्होंने अपने डेरों के माध्यम से जातिगत वर्चस्व को चुनौती दी है और आज भी वे आदि धरम, रविदासी और रामदासी जसे तमाम समुदायों से अपनी पहचान बनाते हैं। मालवा में सिख धर्म को दलितों(चमारों) ने बड़ी संख्या में अपनाया था। जबकि दोआबा के दलितों ने वैसा नहीं किया। उधर माझा इलाके में रामदासी और रविदासी समुदायों का जोर है। असमानता और उपेक्षा से उत्पन्न उनकी पीड़ा है और उसके खिलाफ नाराजगी व्यक्त करने के अपने तरीके हैं। इसी नाराजगी को व्यक्त होने और बराबरी आने से रोकने के लिए सवर्ण समाज भी धर्म का ही सहारा लेता है। अगर उत्तर प्रदेश में दलितों और पिछड़ों के उभार के समय भाजपा ने मंदिर आंदोलन चलाकर उन्हें रोकना चाहा तो पंजाब में अकाली और पारंपरिक तौर पर अनुदार सिख डेरों के खिलाफ आक्रामक होते रहते हैं।
लेकिन डेरों ने समाज के महज असमानता के खिलाफ पंथीय गोलबंदी ही नहीं की है बल्कि समाज की अन्य बुराइयों के खिलाफ भी आवाज उठाई है। आज पंजाब के 40 से 60 प्रतिशत युवक नशे के शिकार हैं। अक्सर डेरों में घरों की महिलाएं रोती हुई यह अपील करने पहुंचती हैं कि उनके बेटे या पति को नशे से बचाया जाए। डेरे वाले नशे से बचने की अपील जारी भी करते हैं। पंजाब की दूसरी बड़ी समस्या जमीन का क्षरण है। वहां की मिट्टी की उर्वरता न सिर्फ खोती जा रही है बल्कि कई इलाकों का पानी जहरीला होता जा रहा है। नदियों की दशा बहुत खराब है। उमें्र दत्त जसे लोगों की अगुआई में खेती बिरासत मिशन इस दशा को सुधारने के लिए प्रयासरत है।
जाहिर सी बात है कि पूंजीवाद के साथ मिलकर चलने वाले राजनीतिक दलों ने सत्ता हासिल करने और शासन चलाने के लक्ष्य पर अपने को कें्िरत किया लेकिन वे सामाजिक बदलाव और पर्यावरण जसे मुद्दो को छोड़ रखा है। डेरे वाले उसी खाली जमीन को भर रहे हैं। अब कोई उन्हें धर्म में राजनीति का घालमेल कहे तो कहता रहे। भारतीय राजनीति की विविधता का यही रंग है।

अरुण कुमार त्रिपाठी

Sunday, December 25, 2011

लालू के लोकतंत्र की हंसी

अरुण कुमार त्रिपाठी

गुरुवार को लोकसभा में लोकपाल विधेयक पेश किए जाते समय लालू प्रसाद के भाषण के समय उठती हंसी को देख और सुनकर रघुवीर सहाय की ‘हंसो, हंसो, जल्दी हंसो कविता याद आ गई। करीब साढ़े तीन दशक पहले लिखी गई यह कविता नेताओं की भ्रष्ट और क्रूर होती जमात पर व्यंग्य है। वह कहती है-
लोकतंत्र का अंतिम क्षण है कह कर आप हंसे
निर्धन जनता का शोषण है, कह कर आप हंसे,
आप सभी हैं भ्रष्टाचारी, कह कर आप हंसे,
चारों ओर बड़ी लाचारी, कह कर आप हंसे,
कितने आप सुरक्षित होंगे कह कर आप हंसे
जाहिर है सामाजिक, धार्मिक टकराव से थककर वर्गीय टकराव की तरफ बढ़ते और पूंजीवाद के वैश्विक संकट का राष्ट्रीय समाधान निकालने में नाकाम होते लोकतंत्र में तेजी से पसरती उदासी के बीच राजद नेता लालू प्रसाद की हंसोड़ शैली का थोड़ा बहुत विनोद सभी को अच्छा ही लगता है। लालू इस शैली में माहिर हैं और उन्होंने सभी का ध्यान भी खींचा और खूब मनोविनोद किया। लेकिन क्या लालू प्रसाद के व्याख्यान को महज मनोविनोद की शैली में रखा जा सकता है? लोगों का कहना है कि गुरुवार के भाषण से लालू छा गए। राजनीतिक पृष्ठभूमि में जा चुके लालू प्रसाद इस तरह के अवसर ढूंढते रहते हैं और उनके लिए यह एक मौका था जिसमें वे चर्चा में भी आएं और कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी के प्रति इतनी वफादारी जाहिर करें कि देर सबेर उसी तरह मंत्री पद मिल जाए जिस तरह अजित सिंह को प्राप्त हो जाए। लेकिन उनके मनोविनोदी भाषण में कुछ एेसे विचार भी व्यक्त किए गए जो उनके अपने ही नहीं थे। उन के पीछे कहीं कांग्रेस की मौन स्वीकृति थी और कांग्रेस की ही क्यों तमाम राजनीतिक दलों को अपनी बात लग रही थी। वरना क्या वजह है कि छोटी-छोटी बात पर विरोध और हंगामा खड़ा करने वाले सांसद लालू की बात का मजा लेने के साथ कहीं अंदर से तादात्म्य भी कायम करते लगे। हालांकि लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव इससे पहले भी कई मौकों पर एकजुट रहे हैं, लेकिन इस बार तो लालू प्रसाद ने अपनी एकता शिवसेना जसी पार्टी के साथ भी कायम कर ली।
दरअसल लालू प्रसाद की बात पर हंसने और मजा लेने वाले सांसदों को देखकर यही लग रहा था कि भारतीय राजनीति में विचारों का अंत भले न हुआ हो लेकिन विचार शून्यता तो आ ही गई है। आखिर ऐसा क्या हो गया कि जो लालू प्रसाद डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय तक भारतीय राजनीति और समाज में होने वाले क्रांतिकारी परिवर्तन के नायक जसे दिखते थे वे आज मसखरे हो गए? उसी तरह धर्मनिरपेक्षता के दुघर्ष योद्धा के तौर पर उभरे मुलायम सिंह को क्या हो गया कि वे समाजवादी सिद्धांतों के आधार पर कोई नई पहल करने के बजाय अक्सर लालू और शरद के साथ संकीर्ण गठजोड़ ही बनाने की फिराक में रहते हैं?
बहुत संभव है कि लालू, मुलायम और शरद यादव पूरी ईमानदारी से यह महसूस करते हों कि लोकपाल जसी संस्था का बनना हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भस्मासुर साबित होगा। इसके पीछे विकें्रीकरण के सिद्धांत की मान्यता और लोकतंत्र के प्रति सदिच्छा भी हो सकती है। लेकिन वह सदिच्छा तब कहां चली जाती है जब लोकपाल में आरक्षण के प्रावधान का सवाल आता है। यानी वैसे तो लोकपाल बुरा है लेकिन बन रहा है तो उसमें आरक्षण भी कर दिया जाए। जो लोकपाल वैसे ही बुरा है वह आरक्षण की व्यवस्था के बाद कैसे अच्छा हो जाएगा यह बात समझ से परे है। दरअसल राजनीति के सारे कार्यक्रम किसी सिद्धांत के बजाय महज स्वार्थ और साजिश के आधार पर गढ़े जा रहे हैं। यही वजह है कि समय-समय पर अच्छी भूमिका भी निभाने वाले यह तीनों पिछड़े नेता अब गाढ़े मौकों पर फच्चर फंसाते दिखते हैं। फच्चर फंसाना भी उतना बुरा नहीं है जितना उससे आगे का रास्ता न दिखाना। अगर उनकी समाज और प्रशासन को बेहतर बनाने के बारे में कोई सोच है तो उसे प्रकट करते हुए आगे आना चाहिए। लेकिन सोच और विचार से ज्यादा उनकी राजनीति पर महत्वाकांक्षा और साजिश का सिद्धात हावी है। उन्हें लगता है कि वे देश के प्रधानमंत्री बनने ही वाले हैं और लोग उन्हें रोकने की साजिश करने में लगे हैं। उन्होंने सामाजिक परिवर्तन के बारे में सीमित सक्रियता दिखाने के बाद राजनीतिक यथास्थितिवाद को अपना लिया। रही कांग्रेस की बात तो आजादी के बाद वह देश के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे में स्वत: बदलाव करने से भागती रही है। वह एक यथास्थितिवादी पार्टी रही है जो समाज में उठने वाले तमाम व्रिोहों को अपने भीतर आत्मसात करने के जुगाड़ में रही है। इसी को राजनीतिशाी रजनी कोठारी कांग्रेस प्रणाली की संज्ञा देते रहे हैं। लेकिन पिछले बीस सालों में उसकी धुरी आर्थिक और दक्षिणपंथी हो गई है और यही कारण है कि राजनीति के नए ध्रुव ही नहीं मध्यमार्ग पर भी लौटने में उसे मुश्किल हो रही है। वह जाति की सच्चाई को पकड़ नहीं पा रही है उदारीकरण के मोह को छोड़ नही पा रही है।
संघ परिवार और उससे जुड़ी भारतीय जनता पार्टी अपने माफिक राजनीतिक बदलाव तो चाहती रही है, लेकिन सामाजिक स्तर पर महज हिंदू और मु्स्लिम संबंधों में तब्दीली की हिमायती रही है। वह मूल रूप से एक अनुदार पार्टी है जो कांग्रेस के विपरीत सामाजिक बदलावों को सांप्रदायिक प्रतिक्रिया के साथ अपनाती रही है। रही कम्युनिस्टों की वैचारिक चेतना की बात तो पश्चिम बंगाल का चुनाव हारने के बाद उनकी जमात में बौद्धिक सन्नाटा छाया हुआ है। उन्हें इंतजार है इतिहास के करवट लेने का।
लड़खड़ाते उदारीकरण और ध्वस्त समाजवाद के बीच भारतीय राजनीति वैचारिक जड़ता की शिकार हो चुकी है। इस जड़ता को थोड़ा बहुत अन्ना हजारे और उनके साथियों ने तोड़ने की कोशिश की है, लेकिन उनकी भी सारी कोशिश संस्थावादी एनजीओ मानसिकता में अटक गई है। आंदोलन में शामिल लोग वैेचारिक आंदोलन चला पाने की स्थिति में नहीं हैं। वे सूचना के अधिकार और सरकार की तरफ से दिए गए सामाजिक कार्यो को संपन्न कर पैसा कमाने के माहिर लगते हैं। उन्हें तिरंगे के राष्ट्रवाद और लोगों की भ्रष्टाचार विरोधी भावनाओं को छूना तो आता है लेकिन उनमें वह क्षमता नहीं है कि लोहिया और जेपी की तरह व्यवस्था के आर्थिक और राजनीतिक पहलुओं का वैकल्पिक विमर्श प्रस्तुत कर सकें। उसके लिए हमें भारतीय समाज के बदले हुए चरित्र पर अमेरिकी सर्वेक्षण एजेंसियों और क्रूर राजनीतिक हितों से दूर हटकर और ऊपर उठ कर विचार करना होगा। तरक्की के ढेर सारे दावों के बावजूद भारतीय समाज मौजूदा आर्थिक ढांचे से सहज नहीं है, लेकिन उसके सामने कोई नया स्वरूप है भी नहीं। हमारी राजनीति पद और पैसे की भूलभुलैया में भटक गई है। उसमें मजा तो बहुत है लेकिन रोशनी और हवा के लिए कोई खिड़की और रोशनदान नहीं है। एेसे में उसके पास लालू के प्रहसन पर हंसने के अलावा कोई ‘चारा नहीं है।

Tuesday, December 20, 2011

हमारे तीन नायक

दिलीप कुमार, राजकपूर और देव आनंद के रूप में जो हरदिल अजीज त्रिमूर्ति थी उसमें देव आनंद के जाने के बाद अब दिलीप ही हमारे बीच हैं। पर इन तीनों ने मिलकर रुपहले पर्दे पर जो जादू बिखेरा उसका असर हमेशा बना रहेगा।

राजकपूर का जब निधन हुआ तब एक अखबार में उन पर कई लेखों के साथ राजू भारतन का एक लेख राज-देव-दिलीप की त्रिमूर्ति पर था। लेख छोटा था, उसमें उन्होंने बताया था कि किस तरह इन तीनों ने हिंदी फिल्मों का कायाकल्प किया। कहानी, गीत-संगीत, संवाद अदायगी से लेकर पूरा कलेवर, और व्याकरण बदल दिया। उनका कहना था कि आपस में और दूसरे कलाकारों से तुलना में हमेशा मतभेद की गुंजाइश रहती है पर इन तीनों के काम को जोड़कर देखा जाये तो उनका योगदान अतुलनीय हे। ठीक-ठीक शब्द तो याद नहीं पर वह लेख खत्म इन शब्दों से होता था कि सुपर स्टार और महानायक आते-जाते रहेंगे पर यह तिकड़ी हमेशा कायम रहेगी।

इसी दौरान ‘जी मैगजीन ने एक पूरा अंक इन्हीं तीनों पर केंद्रित निकाला। सुनीलदत्त, शम्मीकपूर, शशिकपूर, धर्मेन्द्र, मनोजकुमार से लेकर जितेंद्र तक सबकी राय दिलीप-राज-देव के बारे में ली गयी सभी ने उन्हें अपना आदर्श माना और उनके काम को अविस्मरणीय कहा। नये-नये टीवी चैनलों में से किसी एक पर किसी समारोह के दौरान उपस्थिति फिल्मी हस्तियों से, जिनमें निर्माता, निर्देशक, संगीतकार, अभिनेता-अभिनेत्री शामिल था पूछा जा रहा था सबसे बड़ा रोमांटिक कौन? उसमें होड़ दिलीप-देव में नजर आयी और ज्यादातर ने देव आनंद को अल्टीमेट कहा यह रेखांकित करते हुए कि गानों में उनका यह तत्व सबसे उभार पर नजर आता है। देव को श्रद्धांजलि देते हुए दिलीप कुमार ने भी कहा कि रोमांटिक सीनों में वह हम तीनों में सबसे बेहतरीन था।
तीनों के बीच उम्र में एक-एक साल का अंतर था, दिलीप फिर देव फिर राज। इनकी पहली फिल्में भी इसी क्रम से आयीं-नदिया के पार (दिलीप), हम एक हैं (देव आनंद) और नील कमल (राज कपूर)। 1994 से यह सिलसिला शुरू हुआ और ताज्जुब यह है कि 1949 आते-आते तीनों जसे आगे तस्वीर बदलने के लिए तैयार हो गए। 1949 में ही राजकपूर-दिलीपकुमार-नरगिस की महबूब खां निर्मित प्रेम त्रिकोणीय फिल्म ‘अंदाज आयी थी। दिलीप तो अभिनय में मंज ही चुके थे पर राजकपूर की एक्टिंग भी लाजवाब थी, खासकर उन दृश्यों में जहां वे दिलीप कुमार का सामना कर रहे होते थे। दिलीप कुमार के अभिनय की बात करें तो बलराज साहनी जसे अभिनेता की बात याद आती है। इसी के आसपास एक और प्रेम त्रिकोण वाली फिल्म आयी थी, ‘हलचल। वामपंथी राजनीति के कारण बलराज जेल में थे और शूटिंग के लिए पुलिस के पहरे में आते थे। अपनी फिल्मी आत्मकथा में उन्होंने लिखा कि मैं देखता कि शूटिंग के पहले दिलीप और नरगिस मजे से बातें करते रहते और शूटिंग शुरू होते ही दिलीप तो जसे अपने पात्र में प्रवेश कर जाते जबकि कैमरे के सामने मेरा चेहरा मुङो पत्थर सा वजनी लगता। एक दिन मैंने दिलीप से पूछ ही लिया, यार तुम ऐसा कैसे कर लेते हो। दिलीप कुमार ने जो जवाब दिया वह बलराज साहनी को बेहद नागवार गुजरा। उन्होंने कुछ ऐसा कहा था कि भगवान की कृपा है और कुछ दोस्तों्र की मेहरबानी।
1949 ही वह वक्त था जब बाम्बे टॉकीज की, जिसके सर्वेसर्वा उन दिनों अशोक कुमार थे फिल्म ‘जिद्दी में देव आनंद को सफलता का स्वाद मिल चुका था और उन्होंने अपनी कंपनी बना ली थी जिसको चेतन आनंद ने नाम दिया ‘नवकेतन। खुद राजकपूर ने अपनी फिल्में इसी के आसपास शुरू कीं। इसी समय से जसे तीनों अपनी तरह की फिल्मों के लिये जुट गए और इसके लिए बेहतरीन दिमागों को अपने लिये जुटाने लगे। दिलीप तलत मुकेश से होते हुए रफी तक पहुंचे। ‘अंदाज से मजरूह को छोड़ नौशाद शकील से जुड़े और उन्होंेने मिलकर दिलीप की छवि को अपने गीत-संगीत से घनीभूत किया। वहीं राज ने ख्वाजाअहमद अब्बास, शंकर जयकिशन, शैलेंद्र-हसरत और मुकेश-मन्नाडे से अपनी फिल्मों को नई ऊंचाइयां दीं। देव आनंद का मामला कुछ अलग था। उनके यहां प्रतिभाओं का आना-जाना लगा रहा। चेतन, गुरुदत्त, राज खोसला के बाद उन्हें ‘गाइड के रूप में छोटे भाई गोल्डी विजय आनंद मिले। साहिर, मजरूह, शैलेंद्र, हसरत, नीरज सबने देवमार्का बेजोड़ गाने लिखे और धुरी सचिनदेव बर्मन रहे पर दूसरे संगीतकारों के साथ भी उनका साथ निभा। रफी-किशोर-हेमंत उनके प्रिय गायक रहे पर शायद महेंद्र कपूर को छोड़ उन्होंने उस दौर के सभी गायकों को आवाजें लीं।
‘मुगले आजम में शहजादा सलीम के रूप में दिलीप कुमार ने जिस अंदाज से संवाद अदायगी की वह एक ऐतिहासिक मोड़ की तरह थी जहां अकबर यानी पृथ्वीराज कपूर की संवाद अदायगी की पुरानी शैली विदा हो रही थी। ‘बाजी से देव आनंद और ‘आवारा से राजकपूर फिल्म कथाओं की विषय-वस्तु बदलनी शुरू कर दी। फिर इसके बाद पूरी फिल्मी दुनिया ही बदल गयी। प्रेम की तीन धाराएं चल निकलीं। दर्शकों के तीन वर्ग बन गए। और दिलीप-देव-राज की तूती बोलने लगी। अमिताभ से एक बार पूछा गया कि उनके अभिनय में दिलीप की छाया दिखती है तो पलटकर उन्होंने पूछा कि कौन है जिसमें नहीं दिखती, ‘आदमी फिल्म में तो गजब यह हुआ कि ऐन दिलीप कुमार के सामने मनोज कुमार उनकी ही एक्टिंग कर रहे थे। राज कपूर ने जरूर अपने लिए ‘आवाराज् की एक ऐसी छवि गढ़ी जिसे फिर कोई नहीं अपना पाया। पर उस जमाने में कौन बेहतर एक्टर है इस पर मुकाबले में दिलीप और राज कपूर ही रहते थे। इन दोनों से अलग देव आनंद ने अपनी छवि शहरी प्रेमी की बनायी। खास बात यह है कि ‘एंटी हीरो का जो क्रेज इन दिनों है देव उसे ‘बाजी से लगातार करते रहे। अपने दो महान समकालीनों से अलग उन्होंने जो अपनी रूमानी छवि बनायी वह जादू की तरह असरकारी हुई और ‘हीरो शब्द के तिलिस्म के सबसे करीब वही रहे। खास बात यह भी कि देव आनंद की फिल्मों के गाने लोकप्रियता में बेमिसाल रहे और इसमें भी उन्होंने दोनों पीछे छोड़ दिया। शायद किसी एक अभिनेता पर सबसे ज्यादा सुरीले और लोकप्रिय गाने उन्हीं के पास हैं। शम्मी कपूर के गाने भी बेजोड़ रहे हैं। एक बार उन्होंने स्वीकार किया था कि गीतों पर होंठ संचालन के लिए उन्हें देव साब से ही प्रेरणा मिली।
इन तीनों की लोकप्रियता कालातीत रही। जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कहा था कि इस देश में लोग दो ही लोगों की बात सुनते हैं, मेरी और दिलीप कुमार की। राज कपूर ‘शो मैन कहलाये और उनके मुकाबले में जब बाद में सुभाष घई को ‘शो मैन कहा जाने लगा तो वे खुद इससे शर्माते से रहे। दर्शकों की कई पीढ़ी ही नहीं अभिनेताओं की कई पीढ़ी इनकी दीवानी रही। धर्मेन्द्र आज भी बटुए में दिलीप कुमार की फोटो रखते हैं और दिल में तीनों की। राजेश खन्ना देव आनंद को आदर्श और प्रेरणादायी मानते हैं और ताज्जुब करते हैं कि 1970 में जब उनकी ‘दो रास्ते, ‘बंधन, ‘सच्चा झूठा खूब चली थी तो उनसे ज्यादा धूम ‘जानी मेरा नाम की थी।
आपस में तीनों के रिश्ते दोस्ताना थे। राज और दिलीप ज्यादा घनिष्ठ थे पर देव से दोनों की यारी थी। देव ने एक इंटरव्यू में कहा कि ‘युसूफ जब तक सुहागरात के लिए कमरे में नहीं चला गया, तब तक मैं उसकी शादी में मौजूद रहा, तीनों में स्वस्थ स्पर्धा थी। फिल्में और उनकी अपनी शैली इतनी अलग थी कि उस पर कोई झगड़ा संभव नहीं, पर फिल्मी दुनिया में उनकी अपनी फालोइंग थी। अपने-अपने कैम्प थे। एक दूसरे के काम के प्रति सम्मान था। नेहरू-युग में तीनों अपने-अपने ढंग से उसे फिल्मों में रंग देते रहे और बाहर समाज में उस दौर में इकट्ठे दिखते थे। कृष्ण मेनन और कृपलानी के चुनाव में मेनन के साथ तीनों थे और प्रचार में उनकी फोटो भी छपती थी। पर फिल्मी दुनिया जसी जटिल और मतलबी दुनिया में संबंधों में उतार-चढ़ाव आते ही हैं। इनके साथ भी यही हुआ। देव को बुरा लगा जब जीनत राज के कैम्प में चली गईं और ‘मेरा नाम जोकर जसी महत्वाकांक्षी फिल्म के पिटने का एक कारण राज ने उसी समय आयी ‘जानी मेरा नाम को माना। फिर जब राज ने ‘बॉबी बनायी तो लोगों ने इसे ‘राज का दर्शकों से बदला कहा।
राज कुछ जल्दी चले गए। दिलीप-देव के संबंधों के बारे में कई बातें उड़ती रहीं। किसी भी फिल्मी समारोह में एक होता तो दूसरा नहीं। राज कपूर पर जब डाक टिकट जारी हुआ तब दोनों आए और एक अंग्रेजी अखबार ने इसे नोट करते हुए कैप्शन में लिखा अर्से बाद दोनों साथ दिखायी दिये। कहा तो यह भी गया कि देव को दादा साहब फाल्के सम्मान के लिए कमेटी में दिलीप ने उनका विरोध किया। देव आनंद इस हिसाब से ज्यादा साफ-सुथरे थे कि उन्होंने कोई गलत टिप्पणी नहीं की और अंत तक जब भी मौका आया दिलीप और राज की भूरि-भूरि प्रशंसा की। दिलीप-राज जरूर बाद के वर्षो में उनका नाम लेने से कतराते रहे। देव आनंद के निधन के बाद भी कलकत्ते के एक अखबार की खबर ने संबंधों में कुछ काला होने के संकेत दिये। मृत्यु से चार घंटे पहले देव आनंद ने लंदन से फोन पर अपने सचिव मोहन को कहा कि अगर मैं लौट आया तो मैं खुद जाऊंगा नहीं तो ग्यारह दिसंबर को 89 गुलाब लेकर युसूफ के घर जाना। वह दिलीप का 89 जन्मदिन था। दिलीप देव के दुख में पार्टी नहीं करना चाहते थे पर शायद एक-दूसरे से भिड़ंत कराने वाले महाप्रेमियों के कारण वह पार्टी हुई और देव आनंद का सचिव सायरा बानू और दूसरे स्टाफ को फोन-पर-फोन करता रहा पर किसी ने सुना नहीं। इसी खबर में देव के हवाले से यह भी कहा गया था कि वे अपनी आत्मकथा का विमोचन युसूफ से कराना चाहते थे। सायरा बानू ने उनसे कहा कि वे बताएंगी पर फिर फोन भी नहीं किया। देव इस पर दुखी थे कि सौजन्यता में पलटकर फोन तो करना था। संबंधों में उलटफेर आते रहते हैं पर यह असंदिग्ध है कि मिलकर दर्शकों से जो संबंध इन्होंने बनाए वे अमिट रहने वाले हैं। ‘आवारा गया, ‘बंबई का बाबू भी गया। सौभाग्य से ‘देवदास हमारे बीच है, अपने समय की एक अविरल बहती प्रगाढ़ धारा के रूप में, जिसमें वे दोनों धाराएं भी अंत:सलिला हैं।

मनोहर नायक

Tuesday, December 6, 2011

याद किया दिल ने, कहां हो तुम..

मनोहर नायक

‘गाइड में राजू यानी देवानंद की मौत हो या न हों इस बारे में अलग-अलग राय थी। इस बहस में एक बार खीझकर विजय आनंद ने कहा था,‘दिलीप कुमार मर सकता है देवांनद नहीं मर सकता। जाहिर है उनका आशय फिल्मों में मरने से था लेकिन अंत में मरने पर ही फैसला हुआ और वही फिल्म देव साब की अमर फिल्म मानी गयी। फिल्मों में जो यौवन, ऊर्जा, स्टाइल, खिलंदड़ापन देवानंद लेकर आये वो बेजोड़ है और ये चीजें दरअसल उनके जीवन से उनकी फिल्मों में रूपांतरित होती रही। लगातार आगे बढ़ने का जज्बा, जीवन यानी भविष्य को लेकर उत्कट प्रेम और विश्वास, अपने में मग्न, पलटकर पीछे न देखने की जिद इनसे बनते रहे देव आंनद। एक और ‘देव इसी में साथ-साथ घूमते-मिलते रहे, जिसे लोग एटर्नल रोमांटिक के रूप में कहते-जानते रहे- एक दूसरे ‘देवज् यानी ‘प्रेम पुजारी शोखियां, मस्ती, शराब और शबाब के शाश्वत रोमानी तत्वों से मिलकर बने। रूपहले पर्दे पर इन दो छवियों के मेल से बनी इंद्रधनुषी छवि का जादू 50-60 के दशक में सिर चढ़कर बोला और छह दशक तक लोगों को मुग्ध किये रहा। लोगों ने प्रेम से तब उन्हें ‘सदाबहार कहा। महानायकों के इस दौर में तीन नायकों: दिलीप कुमार, राजकपूर और देवानंद जिस तरह से हिंदी सिनेमा का कायाकल्प किया, वह अकल्पनीय है। नए- पुराने में ही नहीं समकालीनों में भी तुलना होती है। दिलीप-राज-देव के चाहने वालों में श्रेष्ठ की बहस होती ही रही है। पर तुलनाओं को एक तरफ रखें तो यह असंदग्धि रूप से कहा जा सकता है कि भारतीय सिनेमा की यह त्रिमूर्ति अजर-अमर है।

दरअसल ये प्रेम की तीन धाराएं थी। दिलीप कुमार की ‘देवदास वाली धारा, राज कपूर की ‘आवारा वाली धारा, देवानंद की ‘बंबई की बाबू वाली धारा। दिलीप कुमार का बेहतरीन अभिनेता और उनकी ‘गंगा जमुना को अभिनय की पाठ्य पुस्तक मानने वाले, राजकपूर को उम्दा निर्देशक कहने वाले, देवानंद शायद तीनों में तीसरे नंबर पर थे। कहते हैं कि उस दौर में फिल्म पत्रिकाओं में यह अलिखित सा नियम था कि इनका एक साथ जिक्र आने पर दिलीप-राज- देव का रहेगा। इसी का हवाला देते हुए जब एक बार देवांनद से पूछा गया कि इसका मतलब तो यह हुआ कि आप थर्ड बेस्ट थे, तो उन्होंने कहा था कि ‘हमारे बीच टकराव नहीं था। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा थी। ऐसे किसी नियम को मैं नहीं जानता, हम तीनों अपने-अपने काम में मग्न थे, हमारी फिल्मों का क्षेत्र बेहद अलग था, पर एक बात बिना किसी दंभ के मैं कह सकता हूं कि जब मैं अपने एलीमेंट में होता हूं, तब मुङो कोई परास्त नहीं कर सकता।

शायद देव के इसी बात में उनके लीजेंड होने का राज छिपा हुआ है। वे खुद का बेहद खराब एक्टर(फिल्मों में आने से पहले संघर्ष वाले दौर में ख्वाजा अहमद अब्बाज द्वारा लिखित नाटक‘जुबैदा में हीरो चेतन आंनद के छोटे भाई बने देवांनद से रिहर्सल के दौरान झल्लाकर निर्देशक बलराज साहनी ने कहा था ‘यार देव तू कभी एक्टर नहीं बन सकता बन सकता। ) मानने वाले, बेहद सीमित अदाकारी और अदाओं वोलद देव साहब फिल्मों की निर्मम दुनिया में दौड़ में बराबर बने ही नहीं रहे, बल्कि अपने दोनों प्रतिभाशाली समकालीनों की बराबरी में दौड़ते रहे। यह ताज्जुब में डालता है। शायद 1957 में गजब ही हुआ जब फिल्म फेयर अवॉर्ड में सर्वश्रेष्ठ एक्टर के लिए तीनों के ही नाम थे तब ‘काला पानी के लिए देवानंद को अवॉर्ड मिला।

फिर भी इस बात पर आम सहमति रही कि तीनों में सर्वश्रेष्ठ दिलीप कुमार ही हैं। लेकिन स्टारडम देवानंद का बड़ा रहा। उनके पहनावे, चाल-ढाल, हेयर स्टाइल आदि का जितना क्रेज रहा और जिस तरह अपनाया गया, उसकी कोई मिसाल रहीं। किसी को बने-ठने देखकर यही फब्ती सुनाई देती है कि ‘बड़ा देवानंद बना फिरता है।ज् कुछ ही माह पहले ‘ द हिंदूज् में दिलीप कुमार की एक टिप्पणी ने हैरत में डाला। दिलीप कुमार से जब राज-देव के बारे में पूदा गया, तो उन्होंने कहा ‘अगर मैं लीजेंड हूं, तो वे दोनों भी लीजेंड हैं। अब आवारा में राज जबरदस्त तो गाइड में देव बेजोड़। देवानंद जसा सुंदर चेहरा इंडस्ट्री में आज तक नहीं आया।

देवानंद की खास बात इसी में है कि उन्होंने किस तरह अपनी सीमाएं पहचानी और उसे चमकाकर एक अद्वितीय पारी खेली। देवानंद के नक्कालों की सूची भी लंबी है और इसमें कमल हसन भी हैं, जिन्होंने एक बार कहा था कि उन जसा करने की कोशिश में कभी सफल नहीं हुआ। फिल्म ‘सौदागर में सुभाष घई, विवेक मुसरान को यही टिप्स देते थे कि वैसा ही करो जसा देवानंद करते थे। इस फिल्म के एक समीक्षक ने यह बात नोट करते हुए लिखा कि विवेक युवा देवानंद की याद दिलाते हैं देवानंद का करिश्मा यही था कि उनकी छवि लोगों की स्मृति में टंक गई। दिलचस्प बात यह है कि यह पीढ़ी दर पीढ़ी हुआ।

‘सिने ब्लिट्ज पत्रिका में ‘देवी ने अपने कॉलम में तबके सुपर स्टार राजेश खन्ना को जज करते हुए लिखा कि ‘मैं वॉकर लेकर बच्चे को घुमाता फिरूं, तब भी ये जनाब हीरो बनते रहेंगे। हीरो नाम का जो जादुई शब्द है शायद देवानंद इसके सबसे करीब थे। एक अत्यंत उज्जवल छवि उन्होंने गढ़ी लगभग वैसी जसी ‘बात एक रात कीज् के गाने में चित्रित होती है। ‘ऐसे में कहीं प्यारे/ झील के किनारे/हंस अकेला निकले/ ऐसे ही देखो जी/ ये मनमौजी/ मौजों के सीनों पार चले/ चांद सितारों के तले।

उनके परिश्रम, लगर और मर्मपक्ष की बातें करें, तो फिर ‘ तेरे घर के सामनेज् की ये पंक्तियां दिल में बसने लगती हैं : ‘दिल में वफाएं हों, तो तूफां किनारा है। बिजली हमारे लिए प्यार का इशारा हैज् या ‘दिल में जो प्यार हो तो, आग भी फूल है। सच्ची लगन जो हो तो पर्वत भी धूल है।ज् 1944 अगस्त के एक बारिश भरे दिन में जेब में तीस रुपए लिए गुरदासपुर से लाला किशोरीमल के तीसरे नंबर के बेटे की बंबई पहुंचने और लंबा संघर्ष के बाद सफलता चूमने की यह कहानी दिलकश और रोमांचक है। छह दशक के इस सफर में तीन दशक सफलता के रहे और बाद के तीन घोर असफलता के। उकनी फिल्में एक ही दिन में थियेटर से उतरीं, पर न देव की छवि धूमिल हुई और न लोगों का प्रेम कम हुआ और न उनका उत्साह और जीवट। विजय आनंद ने एक बार कहा था िक देव साहब जो कुछ करते हैं मैं उन्हें करने देता हूं। अमिता मलिक ने अपने कॉलम में लगभग अपील भी की कि देव जो कर रहे हैं, उन्हें करने दिया जाए। उनके अत्यंत प्रतिभाशाली दोस्त गुरुदत्त नाकामी नहीं ङोल पाए जबकि देव आगे बढ़ते रहे। अपनी शर्तो पर जाहिर है उनकी छवि कामयाब छवि थी। देव की छवि में सम्मोहन था। एक दिलकश अदा थ्ज्ञी। यह वह छवि थी जिसमें फिजा ही बदल दी। रवींद्रनाथ ने जवाहर लाल नेहरू के राजनीति में आगमन को लेकर जो कहा था उसे बदलकर हम कह सकते हैं : ‘देवानंद का फिल्मों में आना वसंत का आना था।

नवकेतन के जरिए उन्होंने अपने तरह की फिल्में बनाईं। गुरुदत्त, राज घोसला जसे कितने लोगों को सामने लाए, पर फिर देव का नहीं, उनकी फिल्मों का जादू उतरता गया। लोग उनकी उत्साह-ऊर्जा की तराीफ करते हुए भी सवाल करने लगे, ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला और ‘गाता रहे मेरा दिल तो ठीक है पर देवसाहब ‘फिर ेस वह सावन अब क्यों न आए पर वे दुखी न हो, इसलिए कि इस बातों का अंदाज वही होता था कि देव साबह ‘यह प्यार है पर गिला नहीं¯.

देवसाहब अपनी शर्तो पर काम करते रहे। इमरेजेंसी के खिलाफ उठकर खड़े हुए, लोगों से वादा निभाते रहे। इंडस्ट्री में सबसे शरीफ माने गए, समझौता कभी किया नहीं। हां, अपनी छवि का ख्याल रखा। अपनी फिल्मों में ज्यादा से ज्यादा सूट बूट में रहे। शांताराम को मास्टर साब जसा मानते हरे, तो कभी उनके पास फटके नहीं। ‘इंसानियत को छोड़ दें, तो कभी और किसी बड़े कलाकर के साथ काम नहीं किया, लोगों ने आत्ममुग्ध कहा तो बोले, ‘इसी से हासिल हुआ आत्मविश्वास।

देवानंद के अनगिनत किस्से हैं, उनकीं उदारता, मददगारी के किस्से जानकी दास की किताब के पन्नो में ‘देवीज् जसों के स्तंभों तक में थे। देवी ने तो मरने से पहले देवानंद से मिलने की ख्वाहिश जताई थी। देवानंद का जाना प्रेम की दूसरी धारा का लुप्त हो जाना है। एक युग का अवसान होगा। यह एक संयोग है कि साल के शुरू में हमने अपने एक बड़े कलाकार हुसैन को खोया, जो नब्बे पार होकर भी बेहद सक्रिय और जीवन्तता से सराबोर थे और साल के अंत में उन्हीं जसे देवानंद को खोया तो अब संयोग यही है कि दोनों ने अंतिम सांसे लंदन में ली और अंतिम क्रिया भी वहीं पर हुई।

लेखक आज समाज के स्थानीय संपादक हैं.

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