Saturday, April 15, 2017

इस गरुड़ को किसने देखा है?

रवीन्द्र त्रिपाठी


तिरुपति हवाई अड्डे पर `गरुड़’ के मूर्तिशिल्प को जिन्होंने देखा है वे बिना और कुछ कहे ये समझ  सकते हैं कि अरुण पंडित किस तरह के विलक्षण कलाकार या मूर्तिशिल्पी हैं। गरुड़ पौराणिक मिथकीय पक्षी है और भगवान विष्णु का वाहन माना जाता है। लोकविश्वास है कि गरुड़ के डैने इतने ताकतवर और ऊर्जावान हैं उनके फड़फड़ाते ही धरती हिल सकती है और व्योम में बवंडर आ सकता है। गरुड़ उड़ान का भी पर्याय है। इसके साथ पारंपरिक लोकस्मृति और शास्त्रस्मृति जुड़ी है। इस लिहाज से कह सकते हैं कि गरुड़ का ये मूर्तिशिल्प भी पारंपरिकता का विस्तार है।
 पर सिर्फ इसी निष्कर्ष पर टिके रहना सही नहीं होगा। बेशक ये लग सकता है कि अरुण का ये, गरुड़वाला, और दूसरे मूर्तिशिल्प पारंपरिक भारतीय मिथक और मूर्तिशिल्प के विस्तार हैं। और ऐसा लगने का कारण भी है।  अरुण अपने मूर्तिशिल्पों में बहुगुणिता ( MULTIPLE)की संकल्पना का काफी प्रयोग करते हैं। (बहुगुणिता  से आशय मूर्तिशिल्प में किसी खास अंग या अंश का बहुल प्रयोग है। पारंपरिक भारतीय मिथक में शिव के तीन नेत्र माने गए हैं, रावण के दस सिर, दुर्गा के आठ या दस हाथ। ये बहुगुणिता के उदाहरण हैं। भारतीय मूर्तिशिल्प में इनके प्रयोग सदियों से दिखने को मिलते रहे हैं।) पर अरुण के भीतर जो बहुगुणिता है, वह सचेत रूप से आधुनिक है, पारंपरिक नहीं। अरुण ने आधुनिक प्रक्रिया में करते करते ये बहुगुणितता विकसित की है। गरुड़ के मूर्तिशिल्प में डैने की जगह हाथ हैं, बारह हाथ। ये बारह हाथ इस तरह शिल्पित हुए हैं कि डैने की तरह लगते हैं लेकिन ये समकालीन मनुष्य के उड़ान की आकांक्षा के प्रतीक भी हैं।


 अप्रेल 2016 में ललित कला अकादेमी में अरुण पंडित के मूर्तिशिल्पों की जो प्रदर्शनी लगी थी उस वक्त भी कला-रसिकों ने महसूस किया कि अरुण मूर्तिशिल्प में अपने नए और मौलिक मुहावरे के साथ आए हैं। उनके किसी मूर्तिशिल्प में मुंह कई होते हैं, किसी में हाथ कई, किसी में ऊंगलियां कई तो किसी में पैर कई। ये समकालीन भारतीय मूर्तिशिल्प के संसार में एक साथ बहुत नया लगता है और बहुत पुराना भी। कुछ लोगों के लिए ये संकरता या हाइब्रिडिटी है। पर ऐसा है नहीं। ये अरुण की मौलिकता है कि वे एक नजर में उत्तर- आधुनिक लगते हैं और उसी नजर में प्राचीन भारतीय मूर्तिकला के नए वंशज भी। हां, ऐसा अकस्मात नहीं हुआ है। करते करते यानी एक प्रक्रिया के तहत अरुण ने अपनी निजी शैली बनाई है।  इस प्रक्रिया के शुरू होने की कहानी कुछ साल पुरानी है। ये कॉलेज ऑफ आर्ट के एमएफए करने के दौरन शुरू हुआ।
  बिहार में जन्में और वहीं के निवासी अरुण जब सन् 1995 में पटना  के कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स से बीएफए करने के बाद एमएफए करने दिल्ली पहुंचे और दिल्ली के कॉलेज ऑफ आर्ट्स में दाखिला लिया तो वहां एक नया माहौल था। उनको अंग्रेजी नहीं आती थी और दिल्ली में पढाई अंग्रेजी माध्यम में होती थी। खासकर कला –इतिहास की पढाई। शुरू में अरुण के पल्ले कुछ नहीं पड़ता था। और यही उनको गुरु के रूप में मिलीं रुबीना करोड़े। वे उस समय कॉलेज ऑफ आर्ट्स में कला- इतिहास पढ़ाती थी। हालांकि वे अंग्रेजी में पढ़ाती थी लेकिन उनके पढाने के ढंग में इतनी आत्मीयता और दृष्टिसंपन्नता थी कि अरुण का कला के प्रति नजरिया बदलने लगा। आधुनिक कला की बारीकियां भी समझ में आने लगीं।  कोंस्टान्टीन ब्रांकुसी के एक प्रसिद्ध मूर्तिशिल्प `बर्ड इन  स्पेस’ (ब्रांकुसी ने इस नाम से एक ही आकार में कई मूर्तिशिल्प बनाएं हैं।) के विश्लेषण से उनको अंतर्दृष्टि मिली।  इस मूर्तिशिल्प में कहीं कोई चिड़िया यानी `बर्ड’ नहीं है। या कहीं पंख नहीं है जिनसे चिड़ियों का एहसास हो। फिर इसका नाम `बर्ड इन स्पेस’ क्यों? ब्रांकुसी ने इस सवाल के जवाब के क्रम में कहा था कि जब नेत्रहीन इसे छूकर महसूस करेंगे तो उनको लगेगा कि कोई चीज, हवा में ऊपर की ओर जा रही है। यानी कला आपके दिमाग में एक इंप्रेसन बनाती है। कोई जरूरी नहीं कि पूरी चिड़िया ही बनाई जाए तभी उसका आभास हो। आप चीजों को कैसे देखते हैं इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है। ये जो आभास (यानी `इंप्रेशन’) की अवधारणा है उसने अरुण को छू लिया और अब उनकी कला रचना के केंद्र में है। वे आज भी  आभास पक्ष  को ध्यान में रखकर मूर्तिशिल्प बनाते हैं।
कॉलेज ऑफ आर्ट्स में प्राणनाथ मागो जैस अच्छे अध्यापक भी थे। मागो विद्यार्थी अरुण  से कई तरह के सवाल करते थे। उस दौरान उनको परेशानी होती थी कि ये क्या पूछा जा रहा है। एक मुश्किल ये भी थी कि अर्थाभाव के कारण पढ़ाई जारी रखने के लिए अरुण को बाहर काम भी करना पड़ता था, इसलिए पढ़ने लिखने के लिए जरूरी समय़ नहीं मिलता था। मागो के सवाल उनको विचलित करते रहते थे। मागो अक्सर पूछते कि फलां मूर्तिशिल्प का टेक्सचर ऐसा क्यों हैं, फलां में संतुलन क्यों नहीं है। आदि आदि। उनके जवाब के क्रम में ही अरुण ने अपने विशिष्ट मुहावरे की तलाश की। उनके मूर्तिशिल्पों में आकृतियों के भीतर बहुगुणितता वाला पक्ष इसी क्रम में उभरा। कुछ अन्य कई मूर्तिशिल्पियों की तरह अरुण सांचो (MOULD) का प्रयोग करते हैं। ये अलग बात हैं कि सांचों के प्रयोग जैसा वे करते हैं वैसा दूसरे मूर्तिशिल्पी अमूमन नहीं करते हैं। अरुण आकृतिमूलक कलाकार हैं लेकिन उनकी आकृतियां सामान्य नहीं होतीं। उनके मूर्तिशिल्पों में आकृतियों का विखंडन होता है। रूप का विखंडन होता है। ऐसा लगता है कि किसी कलाकार ने कुछ आकृतियां बनाईं फिर उनको एक साथ मिलाकर जोरों से दबा दिया जिससे वे आपस में चिपक गईं। फिर उन चिपकी हुई आकृतियों को किसी  धड़, चाहे वह मनुष्य का हो या किसी पशु-पक्षी का, के साथ मिलाकर एक मूर्तिशिल्प तैयार कर लिया। कभी कभी तो कोई धड़ भी नहीं होता। 


 पर ऐसा भी नहीं है कि ये सिर्फ रूप के प्रयोग है। हालांकि रूप पर अरुण बहुत जोर देते हैं। लेकिन हर शिल्प अपने में किसी न किसी संवेदनशील विषय की अभिव्यक्ति होती है। जैसे उनकी कलाकृति `मां’ को लीजिए। इसमें महिला के धड़ के भीतर  एक मुखाकृति है जिसके तीन नाक, तीन होठों वाली एक आकृति है। ऐसा भी लग सकता है कि ये मुखाकृति उस महिला की गोद में है। इसे देखने के दौरान कई तरह के विचार आते हैं। क्या ये मां के गर्भ के भीतर एक शिशु है या कई शिशु हैं या उसकी गोद में बैठे उसके बच्चे हैं? इन सवालों को छोड़ भी दें तो यहां मां की एक नई छवि है जो पांरपरिक भी है और नई भी। अरुण के दूसरे मूर्तिशिल्पों को देखने से भी कई खयाल एक साथ उभरते हैं और साथ ही संवेदना की कई परतें भी।  यही अरुण की सबसे बड़ी खासियत हैं। उनके यहां रूप का ऐश्वर्य भी हैं और संवेदना की गहराई भी। दोनों का अद्भुत मिलन। जो व्यक्ति आधुनिक कला की बारीकी से अपरिचित है उसे उनकी कलाकृतियों के आस्वाद में कोई मुश्किल नहीं होता। और जो कला के जानकार हैं या उत्तर- आधुनिक कला के पेरौकार हैं उनको भी अपने लिए अरुण के यहां काफी कुछ मिलेगा। ऐसा बहुत कम समकालीन कलाकारों के साथ हो पाता है। मेरा खयाल है कि बिहार से बाहर या दिल्ली आकर जिन कलाकारों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई है उनमें अरुण पंडित सबसे अलग हैं  और मौलिक भी। मेरा अपना मानना ये भी है कि आनेवाले बरसों में वे भारतीय मूर्तिकला को नई ऊंचाई तक ले जाएंगे।
 



Tuesday, March 28, 2017

बज्जू भाई



राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक राम गोपाल बजाज (बज्जू जी) के जीवन के छुए और अनछुए पहलुओं के बारे में उनके मित्र वरिष्ठ नाट्य एवं कला समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी का लेख...


 राम गोपाल बजाज का बचपन घोर अभाव में बीता। उनके नाम में बजाज जरूर जुड़ा हुआ है लेकिन वे बजाज परिवार में नहीं जन्में। एक ऐसे मारवाड़ी बनिया परिवार में उनका जन्म हुआ जो घोर दारिद्य में जी रहा था। उस परिवार में जन्मे सभी बच्चे दूसरे मारवाड़ी परिवार में गोद लिए गए। बज्जू भाई बजाज परिवार में गोद लिए गए इसलिए उनका सरनेम बजाज है। उनके दूसरे सहोदर भाइयों के सरनेम अलग अलग हैं क्योंकि वे अलग अलग परिवारों में पले और गोद लिए गए। इस हिसाब से देखें तो बज्जू भाई का जीवन एक उपन्यास की मांग करता है। कोई चाहे तो उस पर एक बड़ा टीवी धारावाहिक भी बना सकता है। बहुत कम जिंदगियां ऐसी होती हैं जिनमें इतने घुमाव गलियां होती हैं।

बज्जू भाई। यानी राम गोपाल बजाज। कुछ लोगों के लिए बजाज साहब। देश और हिंदी के बहुचर्चित नाट्य निर्देशक और अभिनेता।
बात 1989 की है। मैं फ्रीलांसिग करता था और `दिनमान’ (जो अब बंद हो गया है) के लिए रंगमंच पर लिखता था। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (जिसे आम बोलचाल में एनएसडी या स्कूल भी कहते हैं) में उन दिनों कुछ मुद्दों को लेकर छात्रों और नाट्य विद्यालय प्रशासन में मतभेद हुए। इनमें एक मुद्दा खैरुद्दीन नाम के एक छात्र का वार्षिक परीक्षा में अनुत्तीर्ण होना भी था। (खैरुद्दीन भी आजकल नाट्य निर्देशक बन चुके हैं और दिल्ली में ही रहते हैं।) कुछ और मामले भी इसमें जोड़े गए। नाट्य विद्यालय में छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ। इस सब में बज्जू भाई को भी लपेटा गया शायद इसलिए कि वे उन दिनों निर्देशक का कार्यभार संभाले हुए थे। वैसे चर्चा ये भी थी कि नाट्य विद्यालय की फैकल्टी की आंतरिक राजनीति की वजह से ही ये आंदोलन चला। बहरहाल, मामला गरमाने लगा। मीडिया में भी इसकी चर्चा हुई। तब कवि-कलासमीक्षक विनोद भारद्वाज `दिनमान’ में संस्कृति संबंधी लेखों के प्रभारी थे। उन्होंने मुझसे कहा कि नाट्य विद्यालय में चल रहे आंदोलन को लेकर एक लेख दे दीजिए। मैं तब बजाज साहब के नाटक देखे थे। और रंजीत कपूर द्वारा निर्देशिक `एक रूका हुआ फैसला’ में उनका अभिनय भी देखा था। किंतु उनसे परिचय नहीं था। 
जब मैं इस `दिनमान’ वाले लेख के सिलसिले में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बहावलपुर हाउस वाले परिसर में पहुंचा तो देखा कि एक आदमी अपनी ही एक आदमकद कैनवास पर रेखांकन-पेंटिग जैसी बनी आकृति के सामने खड़ा हुआ है। वह रेखांकन-पेंटिंग आंदोलनकारी छात्रों ने बनाई थी। उस पेंटिग के सामने मझोले कद वाला व्यक्ति खड़ा था। न मोटा और न दुबला पतला। गंजा होता सिर। जींस का जैकेट और पैंट पहने हुए। ये भी नोट किया वह शख्स साथ में खड़े दो तीन लोगों को मजे लेकर उस रेखांकन-पेंटिंग बारे में कुछ बता रहा है। यदा कदा हंसते हुए । साथ वाले भी कभी कभी हंस रहे थे। एक तरह से ठिठोली का वातावरण था। ऐसा लग रहा था कि पेंटिंग का कोई अध्यापक अपने विद्यार्थियों या सहयोगियों को अपने को केंद्र में रखकर बने किसी पोर्ट्रेट या कलाकृति की बारीकियां समझा रहा हो या उसकी कमियां निकाल रहा हो। ये राम गोपाल बजाज थे जो अपने ही खिलाफ चल रहे आंदोलन का मजा ले रहे थे। 
ये मेरी उनसे पहली मुलाकात थी।
वह परिचय धीरे धीरे प्रगाढ़ होता गया और आज वे या तो मेरे परिवार के सदस्य हैं या ये भी कह सकते हैं कि मैं उनके परिवार का सदस्य हूं। आज उस आंदोलन वाले वाकये के अठाईस साल हो चुके हैं। इस दौरान बज्जू भाई राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक (1995-2001) बने और वहां से सेवा निवृत्त भी हो गए। और उनसे मेरी प्रगाढ़ता कुछ ऐसी हुई कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय मेरा, कुछ लोगों की निगाह में, एक अस्थायी पता बन गया। वैसे रंगमंच में मेरी रुचि तो पहले भी थी लेकिन दिल्ली रंगमंच के अंत:पुर में मेरा प्रवेश बजाज साहब ने ही कराया। एक तो होता है कि आप नाटक देखते हैं और फिर उस पर लिखते हैं। दूसरा ये होता है कि रंगमंच के संसार के अंदरुनी संसार के भीतर जाते हैं और जो चीजें सार्वजनिक जानकारी में नहीं आतीं उनसे भी बावस्ता होते हैं। ये सब मेरे साथ बज्जू भाई से नजदीकी संबंध के कारण ही हुआ। उनसे मेरा रिश्ता इतना करीबी हो गया कि मेरे अनुरोध पर उन्होंने उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में वंसुधरा स्थित जनसत्ता हाउसिंग सोसाइटी की सदस्यता ली और मेरे पड़ोसी होकर बारह-तेरह साल रहे। अब पिछले कुछ साल से वे महाराष्ट्र में लोनावाला के करीब रह रहे हैं। लेकिन कोई हफ्ता नहीं जाता जब उनका फोन न आता हो और लंबी बात न होती हो। कई मर्तबे तो हफ्ते में तीन-चार दिन। उनके साथ मेरी यादों का एक विशाल कोष है, जिनके आधार पर पूरी किताब बन सकती है। फिलहाल कुछ ही यहां पेश कर रहा हूं। 
बज्जू भाई को मुद्दा बनाकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में कभी आंदोलन हुआ, ये एक छोटा-सा तथ्य है। बड़ा ये है कि उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कई पूर्व छात्रों की जितनी सहायता की उतना वहां के किसी और शिक्षक या निदेशक ने किया हो इसकी मुझे जानकारी नहीं। आज मुंबई फिल्मी दुनिया में कई ऐसी नामी हस्तियां हैं जिनको अगर वक्त पर बज्जू भाई ने आर्थिक मदद न की होती तो वे शायद उस मुकाम पर नहीं पहुंच पाते। संभवत: उन लोगों को आज अच्छा न लगे इसलिए उनके नाम नहीं ले रहा हूं लेकिन एक वाकया जरूर सबके साथ बांटना चाहूंगा जो मुझे अमिताभ श्रीवास्तव उर्फ बॉबी जी ने सुनाया था और आज भी अक्सर सुनाते रहते हैं। वे इसके सहभागी रहे हैं। 


उन दिनों बज्जू भाई मंडी हाउस के पास ही रेलवे क्वार्टर में किराए पर रहते थे। अमिताभ जी भी एनएसडी पास करने के बाद उनके साथ ही रहते थे। एक दिन सुबह पांच- साढ़े पांच बजे बज्जू भाई ने अमिताभ जी को जगाया और कहा –`चल केके के यहां चलते हैं। मुझे आभास हो रहा है कि वो किसी आर्थिक संकट में है।‘ केके यानी केके रैना, जो आज मुबंई रंगमंच के चर्चित व्यक्ति हैं। रैना उन दिनों दिल्ली में कालीबाड़ी इलाके में रहते हैं। बज्जू भाई और अमिताभ श्रीवास्तव ने मंडी हाउस से टैक्सी ली और कालीबाड़ी पहुंच गए। रैना को जगाया। वो भी भौंचक कि इतनी सुबह दोनों वहां कैसे? पूछा कि बात क्या है? बज्जू भाई ने कुछ नहीं कहा किंतु उनके हाथ में पांच सौ रूपए रखे और टैक्सी से वापस। रैना ने उस समय तो कुछ नहीं कहा मगर दोपहर में मंडी हाउस पहुंचे। फिर बज्जू भाई को ढूंढा और पूछा कि माजरा क्या है? पैसे क्यों दिए? बज्जू भाई ने बताया कि `यार मुझे लगा कि तू किसी आर्थिक संकट में है’। रैना ने कहा कि नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है और उन्होंने पांच सौ रूपए लौटाने चाहे। लेकिन बज्जू भाई ने लिए नहीं। 
बज्जू भाई की ये आदत रही कि जिसे मदद के लिए पैसे दिए उससे ये अपेक्षा कभी नहीं कि पैसा वापस दे। पर इसी तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। ऐसा नहीं है कि वे बड़े पैसे वाले हों या उनको कभी पैसे का संकट नहीं रहा हो। अमिताभ श्रीवास्तव इसी सिलसिले में दूसरा किस्सा बताते हैं। घटना 1981-82 की है। बज्जू भाई तब पाटियाला में पढ़ा रहे थे। एक दिन अमिताभ श्रीवास्तव ने देखा कि मंडी हाउस के गोलंबर (जो अब नहीं है क्योंकि मेट्रो स्टेशन बनने के बाद उस जगह को नए तरीके से सजाया – संवारा गया है।) पर बज्जू भाई अकेले बैठे हैं। अमिताभ श्रीवास्तव ने पूछा - `बात क्या है, आपको को पाटियाला में होना चाहिए।‘ उनको जवाब मिला- `यार पाटियाला जाने के लिए बस के पैसे तो हैं लेकिन उतने भर ही हैं। रिक्शे-स्कूटर के लिए भी कुछ चाहिए। रास्ते में चायपानी भी करनी होगी। और वहां रिजू (बज्जू भाई का पुत्र) अकेला है। समझ में नहीं आता हूं कि क्या करू?’। अमिताभ श्रीवास्तव भी उन दिनों फ्रीलांसर थे और उनके पास भी पैसे नहीं थे। इसलिए वे भी मदद करने की स्थिति में नहीं थे। पता नहीं, बाद में क्या हुआ और बज्जू भाई कैसे पाटियाला पहुंचे। पर ये घटना दिखाती है बज्जू भाई खुद मुफलिसी में रहे हैं लेकिन दूसरों की सहायता करने की उनकी भावना कभी दबी नहीं।
ऐसा नहीं है कि बज्जू भाई सिर्फ आर्थिक मदद ही करते रहे हों। अपने कई पूर्व छात्रों के निर्देशकीय व्यक्तित्व को बनाने में बज्जू बाई ने जो साहस दिखाया वो बतौर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय निदेशक कोई और नहीं दिखा सका। चार नाम लेना चाहूंगा। एक तो रायस्टन एबल, दूसरा निखिलेश शर्मा, तीसरा रविजिता गोगोई और चौथा चितंरजन त्रिपाठी। इन चारों को बज्जू भाई ने एनएसडी पास करने के कुछ ही दिनों के बाद रंगमंडल यानी रेपटरटरी में नाटक निर्देशित करने करने को कहा था। अमूमन एनएसडी ग्रेजुएट को रंगमंडल के नाटक का निर्देशन का मौका मिलने में कई साल लग जाते हैं। कई तो आज तक नहीं कर पाए हैं। लेकिन बज्जू भाई ने इन चारों को बहुत जल्द वो मौका दिया। रॉयस्टन एबल आज देश विदेश में इवेंट करने के लिए मशहूर हैं। निखिलेश शर्मा मुंबई में हैं और शायद फिल्म-टीवी लेखन कर रहे हैं। रविजिता गोगोई असम में हैं और वहां की चर्चित रंग निर्देशक हैं। चितरंजन भी बॉलीवुड में सक्रिय हैं और नाटकों का निर्देशन भी करते रहते हैं। चारों का अपना व्यक्तित्व बन गया है। रायस्टन और निखिलेश एक ही बैच में थे। रविजिता और चितरंजन अलग अलग बैच में।
रॉयस्टन ने जो नाटक रंगमंडल के लिए निर्देशित किया था वो था मिखाइल बुल्गाकोव द्वारा लिखित `मोलियर’। पीयूष मिश्र ने उसका हिंदी अनुवाद किया था। निखिलेश शर्मा ने धर्मवीर भारती की काव्य रचना `कनुप्रिया’ का निर्देशन किया था जिसमें आज `बैंडित क्वीन’ के लिए चर्चित अभिनेत्री सीमा विश्वास ने मुख्य भूमिका निभाई थी। रविजिता ने जयशंकर प्रसाद के `ध्रुवस्वामिनी’ का निर्देशन किया था। चितरंजन त्रिपाठी ने अजय शुक्ला द्वारा लिखित `ताज महल का टेंडर’ निर्देशित किया था जो एक जबर्दस्त कॉमेडी रहा। हाल के वर्षों की सबसे सफल कॉमेडी। इसकी सफलता ऐसी रही है कि एक साल पहले चितरंजन को फिर से इसी नाटक का निर्देशन करने के लिए रंगमंडल में बुलाया गया ।
अजय़ शुक्ला की बात चली तो लगे हाथ ये भी बता दिया जाए कि बज्जू भाई हिंदी में मौलिक नाटकों की खोज में वे हमेशा लगे रहे और कई मौलिक हिंदी नाटक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में उनके कारण हुए। अजय शुक्ला के अलावा कई ऐसे नाम हैं जिनके नाटक पहली बार या तो बज्जू भाई ने किए या उनके कारण हुए। सुरेंद्र वर्मा के दो नाटक `सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’ और `कैद ए हयात’ पहली बार राम गोपाल बजाज ने ही रंगमंडल के लिए किए। सुरेंद्र वर्मा की बतौर नाटककार की जो उपबल्धियां रहीं उनके पीछे इन प्रस्तुतियों की बड़ी भूमिका है। भानु भारती ने दूधनाथ सिंह का लिखा `यमगाथा’ रंगमंडल के लिए तब किया था जब बज्जू भाई रंगमंडल के प्रभारी थे। रंजीत कपूर ने जब `खबसूरत बहू’ ( लेखक-नाग बोडस) किया, जिसमें भी सीमा विश्वास ने ही केंद्रीय भूमिका अदा की थी, तो उसके पीछे भी बज्जू भाई थी। वो स्क्रिप्ट भी उनकी ही खोज थी। बोडस नाटक लिखते थे परंतु उनकी कोई राष्ट्रीय छवि नहीं थी। बज्जू भाई ने उनको भारतीय रंगमंच के क्षितिज पर लाया। उनकी वजह से ही बोडस का दूसरा नाटक `थैंकू बाबा लोचनदास’ भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के रंगमंडल ने किया जिसका निर्देशन बीएम शाह ने किया था। बज्जू भाई ही तब रंगमंडल के प्रभारी थे।
कथाकार महेंद्र भल्ला की परवर्ती दिनों में नाटककार की छवि बनी तो उसकी वजह भी बज्जू भाई द्वारा निर्देशित उनका पहला नाटक `दिमागे हस्ती दिल की बस्ती है कहां है कहां’ है। हालांकि तब बज्जू भाई एनएसडी के निर्देशक नहीं रह गए थे और इस पद पर देवेंद्र राज अंकुर आ गए थे। पर इस नाटक को करने की तैयारी उन्होंने निर्देशक रहते ही शुरू कर दी थी पर अतिव्यस्तता के कारण उसे कर नहीं पाए थे। भल्ला के दूसरे नाटक `ठीक ऐन उस चीज के आमने सामने’ का निर्देशन देवेंद्र राज अंकुर ने किया। कृष्ण बलदेव वैद के नाटक `भूख आग है’ भी मंचन बजाज साहब के निर्देशन में हुआ। 
ये सही है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की बुनियाद खड़ी करने में इब्राहीम अल्काजी की बड़ी भूमिका रही। ये भी असंदिग्ध है कि उन्होंने नाट्य प्रशिक्षण की जो आधारशिला रखी उसकी वजह से कई अच्छे अभिनेता और निर्देशक रंगमंच के क्षितिज पर आए। अल्काजी अपनी तरह के अद्वितीय रंग व्यक्तित्व हैं और उनका कोई मुकाबला नहीं। किंतु उसके बाद एनएसडी के सबसे कल्पनाशील निदेशक बज्जू भाई ही हुए और इस संस्था की परिधि का विस्तार जितना उन्होंने किया वह कोई और नहीं कर सका। उनके चलाए कुछ कार्यक्रम तो अब बंद ही हो गए। जैसे `श्रुति’। बज्जू भाई द्वारा बनाई गई परिधि अब छोटी पड़ती जा रही है।
बजाज साहब ने अपने कार्यकाल में हिंदी की नाट्य पत्रिका `रंग प्रसंग’ की शुरुआत की। उनके कार्यकाल के दौरान ही राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में `श्रुति’ कार्यक्रम शुरू हुआ जिसमें हिंदी के वरिष्ठ या युवा, लेकिन चर्चित कथाकार या कवि आकर रचना पाठ करते थे। इस कारण हिंदी भाषी समाज और नाट्य विद्यालय का एक गहरा जीवंत रिश्ता बन गया था। बज्जू भाई ने ही बहावलपुर हाउस परिसर में `सम्मुख’ थिएटर बनवाया और फिर `अभिमंच’ बनाना शुरू किया जो अंकुर जी के कार्यकाल में पूरा हुआ। 1996 में बज्जू भाई ने बतौर निदेशक स्कूल के दीक्षांत समारोह के अवसर पर `एकल अभिनय नाट्य समारोह कराया’ जिसमें लक्ष्मण देशपांडे, वीणापाणि चावला से लेकर नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेताओं ने शिरकत की। उस दीक्षांत समारोह में धर्मवीर भारती मुख्य अतिथि थे। बज्जू भाई की पहल से और उनके निदेशकीय कार्यकाल में एनएसडी ने बच्चों के लिए `जश्ने बचपन’ और `बाल संगम’ जैसे वार्षिक कार्यक्रम शुरू किए जो बाल रंगमंच को देश भर में आगे बढ़ाने में उत्प्रेरक साबित हुए। आज भी ये दोनों समारोह होते हैं।


और सबसे बढ़कर तो ये कि उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने `भारत रंग महोत्सव’ (भारंगम) शुरू किया। ये 1999 की बात है। जहां तक मेरी जानकारी है `भारंगम’ शुरू करने का आरंभिक विरोध एनएसडी की फैकल्टी में था। ये बज्जू भाई के व्यक्तित्व का दबाव था कि `भारंगम’ शुरू हुआ और आज ये आयोजन सिर्फ एनएसडी ही नहीं भारतीय रंगमंच का सबसे बड़ा ब्रांड बन गया है। स्थिति ऐसी हो गई है कि जिस निर्देशक या ग्रूप के नाटक का चयन भारंगम में नही हुआ उसे लगता है कि या तो उसके नाटक करने का कोई अर्थ नहीं है या वो ये आरोप लगाता है कि `भारंगम’ में चयन की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ है। यहां याद रखनेवाली बात ये भी है कि बज्जू भाई के निर्देशक रहते भारंगम में एक साल 100 से अधिक नाटक हुए। इस रिकार्ड बाद में दुहराया नहीं जा सका। उनकी संगठन क्षमता का इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके कार्यकाल में `भारंगम’ के आयोजन के लिए उतना बड़ा लश्कर भी नहीं था जितना आज होता है। चंद लोगों के सहारे ही वे ये काम करते थे। तब वे मयूर विहार वे ` कला विहार अपार्टमेंट’ में रहते थे और यहां रात में कई बार गोष्ठियां जमती थीं जिनमें मैं भी यदा कदा रहता था। फिर रात भी वहीं बीतती थी। बजाज साबह बहुत अच्छे मेहमानबाज हैं और चाहे वे कला विहार में रहे हों या जनसत्ता अपार्टमेंट में उनके फ्लैट पर दोस्तों का जमावड़ा होता था।
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भारंगम’ के आरंभिक दिनों की चर्चा कर रहा था। तब मैं देखता था कि सुबह छह बजे के करीब जागने के बाद वे अक्सर फोन से ही आयोजन की तैयारी के लिए लग जाते थे। `भारंगम’ जब शुरू हुआ था तो मोबाइल का चलन नहीं था। इससे भी अनुमान लगाया जा सकता है वे इसे किस चुनौतीपूर्ण समय में करते थे और कैसे करते थे। कुछ लोगों को उन्होंने वायरलेस सेट खरीद कर दिए थे जो रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट पर अतिथियों को लाने के काम में लगे थे।
आज देश के अकादमिक संस्थानों में जेंडर जस्टिस की चर्चा होती है और इसी कारण उनमें लड़कियों का प्रवेश भी बढ़ रहा है। ये सब अब सहज तरीके से हो रहा है। पर बीस साल पहले ये उतना सहज नहीं था। ऐसे में कोई ये सोच सकता है कि अगर किसी सत्र में सिर्फ बीस छात्र-छात्राओं का चयन होना है तो उनमें से दस छात्राएं हो सकती हैं? बज्जू भाई ने ये किया। वो भी बिना किसी आरक्षण के। 1995 में वे निदेशक बने और 1996 वाले सत्र में कुल बीस छात्र-छात्राओं में दस लड़कियों का चयन हुआ। ये शायद इत्तफाक था कि उन दस में आठ या नौ मुसलिम लड़कियां थीं। उस समय के लिहाज के एक बड़ा कदम था जो एनएसडी में ही फिर से दुहराया नहीं जा सका। वो करने में कैसे कैसे पेंच फंसे थे इसका बयान एनएसडी के एक अध्यापक अब्दुल लतीफ खटाना से कोई सुन सकता है। 
नाटक के अलावा बज्जू भाई का दूसरा प्रेम हिंदी कविता है। वैसे तो दिनकर और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना भी उनके प्रिय हैं पर उनके सर्वाधिक तीन प्रिय कवि हैं- अज्ञेय, कुंवर नारायण और कुमार अंबुज। उनके पास अगर कोई झोला या बैग है तो तय मानिए कि उसमें इन तीन से किसी न किसी एक का कोई काव्य-संग्रह जरूर होगा। हो सकता है कि तीनों के हों। यदि आप उनके करीबी हैं, जिनकी संख्या काफी है, और आपकी मुलाकात ऐसे समय में हो गई है जब उनके पास समय हो, तो आपको वे इनमें से किसी कवि की दो-तीन कविताएं पढ़कर जरूर सुनाएंगे। ये संख्या ज्यादा भी हो सकती है। संभावना इसकी भी है कि आपको वे कहें कि- `आज घर चलो, अज्ञेय की कविताएं सुनाऊंगाँ’। ये भी हो सकता है कि उनको किसी की नई कविता बेहद पसंद आए तो आपको फोन पर ही सुनाने लगें।
2016 के `भारंगम’ में भाग लेने जब वे दिल्ली आए तो अशोक होटल में ठहरे थे। एक दिन बाथरूम में गिर पड़े और गंभीर रूप से घायल हो गए है। चार-पांच दिनों तक अस्पताल में रहे और फिर बंगाली मार्केट वाले एनएसडी के गेस्ट हाऊस में। उस समय, `भारंगम’ खत्म होने के बाद, विनोद भारद्वाज की पहल से एनएसडी में कुंवर नारायण की कविताओं के पाठ का एक आयोजन रखा गया था। इसकी रूपरेखा पहले से बन गई थी और तय था कि बज्जू भाई कुंवर नारायण की कुछ कविताओं का वाचन करेंगे। उस सिलसिले में आरंभिक बातचीत करने मैं, बज्जू भाई और विनोद भारद्वाज कुंवर नारायण के घर भी गए थे। कुंवरजी के यहां हम सबका जिस आत्मीय ढंग से स्वागत हुआ वो एक अलग स्मृतिलेख का विषय है। खैर, उस मुलाकात के बाद बज्जू भाई दुर्घटनाग्रस्त हो गए। अब मेरे मन में भी तथा विनोद जी के मन में भी संशय था कि इस हालत में बज्जू भाई का कार्यक्रम में भाग लेना और कविताओं का वाचन करना संभव नहीं होगा। बल्कि मैंने तो सुझाव भी दिया कि बज्जू भाई, जोखम मत मोल लीजिए। लेकिन कविता और कुंवर नारायण की कविताओं के प्रति उनका लगाव ऐसा है कि उस अस्वस्थ हालत में भी वे ह्वील चेयर पर आए और अपने उसी उत्साह और ऊर्जा के साथ उन्होंने कुंवर जी की कविताएं सार्वजनिक रूप से पढ़ीं जो पहले के वाचनों में दिखती रही हैं।
बतौर नाट्य निर्देशक भी उनकी कई स्मृतियां मेरे मानस पटल हैं। एक बार वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए विद्याधर पुंडलीक के नाटक `चार्वाक’ का निर्देशन कर रहे थे। इसका रिहर्सल वे रात में करते थे। तब मैं `जनसत्ता’ अखबार में काम करता था। कई बार वे मुझे रात में ही रिहर्सल देखने के लिए बुला लिया करते थे। जिस स्थान पर रिहर्सल चल रहा था उसका डिजाइन कुछ ऐसा था कि उसे गड्ढा नुमा बनाया गया। एक रात जब मैं रिहर्सल देख रहा था तब बज्जू भाई किसी अभिनेता को कुछ बताने के लिए इतनी तेजी से नीचे उतरे कि शरीर अंसुतलित हो गया। जहां तक मुझे याद है उनके पैर में हेयरलाइन फ्रैक्चर हो गया था। 
वे बतौर नाट्य निर्देशक अपने अभिनेतों की सुख सुविधा का काफी खयाल रखते हैं। ये भी मैंने बहुत कम निर्देशकों में देखा है। अपने अभिनेता और दूसरे साथी सही समय पर खा रहे हैं या नहीं, उनको चाय मिली या नहीं या उनके रात में घर जाने का क्या इंतजाम है- इन सब पर उनकी पैनी नजर रहती है। एक दम परफेक्ट। इसलिए उनके नाटकों में अभिनेताओं या तकनीशिनों को किसी तरह का तनाव नहीं होता और नाटक भी बड़े आराम से तैयार होता है। 
मैंने उनके द्वारा निर्देशित कई नाटक देखे हैं। लेकिन उनका जो नाटक मेरे दिल में खुबा हुआ है वह है `कैद ए हयात।‘ ये मिर्जा गालिब की जिदंगी पर आधारित है। श्रीवल्लभ व्यास ने इसमें केंद्रीय भूमिका निभाई थी। यानी गालिब की। और गालिब की प्रेमिका की भूमिका सीमा विश्वास ने निभाई थी। शुरुआती प्रदर्शनों मे हिमानी शिवपुरी गालिब की पत्नी की भूमिका में थीं। इसका प्रारंभिक प्रदर्शन एनएसडी के उस स्टूडियो थिएटर में हुआ था जो तब साहित्य अकादेमी की तीसरी मंजिल पर था। वह स्टूडियो थिएटर अब नहीं है। उस जगह पर आज अकादेमी का एक सभागार बन गया है।
कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो कहेंगे कि बज्जू भाई रंगमंच की राजनीति भी करते हैं। कुछ चर्चित नाट्य निर्देशक अपने साथ हुए वाकये सुनाएंगे और कहेंगे- `मेरे साथ बज्जू ने ये किया।’ या वे किसी और के साथ हुए वाकये सुनाएंगे कि `बज्जू ने निर्देशक रहते फलां का नाटक कुछ शो के बाद बंद कर दिया’। यही नहीं, एनएसडी में आज भी कई ऐसे कर्मचारी और कुछ अध्यापक भी मिल जाएंगे जो उनकी तनी हुई भृकुटि और एक जगह जमी निगाह को देखकर सहम जाएंगे। बाज वक्त बज्जू भाई एक जगह खड़े हो जाते हैं, आंखों को उस आदमी पर जमाते हैं जिसके साथ कोई मामला हो, उसको घूरते हैं और सिर को थोड़ा हिलाते हैं। हालांकि ये एक अभिनेता की अदा है, मगर इसे बज्जू भाई ने एनएसडी के भीतर एक पॉलिटिशयन का अंदाज भी बना दिया है। सामने वाला सोचता है कि मेरे खिलाफ कुछ पक रहा है। वो एक मनोवैज्ञानिक खौफ की मन:स्थिति में चला जाता है और परेशान हो जाता है। कुछ मर्तबा तो बज्जू भाई भी ये सुनाते मिल जाएंगे – `मैंने फलां को ठीक कर दिया’। 
इन सबके बावजूद ये भी कहना पड़ेगा कि बज्जू भाई ठोंक के चुनौती देते हैं और कोई ये नहीं कह सकता कि उसके साथ दगा किया गया। किसी को चुनौती दी तो खुल्लमखुल्ला। मुझे याद है आज के वरिष्ठ रंगकर्मी प्रसन्ना ने एनएसडी के लिए गिरीश कार्नाड का नाटक `अग्नि और बरखा’ किया था। प्रसन्ना और बज्जू भाई की काफी दोस्ती रही। किसी बात पर प्रसन्ना से उनकी ठन गई। मैं तब `जनसत्ता’ में ही था और रात में आईटीओ पर हनुमान मंदिर के पीछे एक ढाबे पर खाना खा रहा था। हमउम्र रंगकर्मी अविनाश देशपांडे भी साथ थे। कुछ देर बाद बज्जू भाई भी आ गए। वे कुछ ढाबों के मुरीद रहे हैं जिनमें एक ये भी है। मुझे देखा तो बोले- `अग्नि और बरखा’ देखा कि नहीं। मैंने कहा- `अभी नहीं देखा’। बोले, `दो-तीन दिनों में देख लो क्योंकि उसे बंद कर रहा हूं।‘ दिलचस्प ये है कि उस नाटक की प्रस्तुति आगे न हो इसके लिए चिट्ठी उन्होने गिरीश कार्नाड से लिखवा ली। आज भी ये रहस्य है कि गिरीश को उन्होंने क्या पाठ पढ़ाया था? मेरी प्रसन्ना से भी गहरी दोस्ती रही और आज भी कायम हैं। और दोनों, ये जानते हुए कि मेरी दूसरे से गहरी दोस्ती है, मुझसे संबंध बनाए रखते हैं। ये उन दोनों की खूबी है।
मेरा अपना मानना है कि बज्जू भाई के भीतर एक हठी व्यक्तित्व उस समय जाग जाता है जब उनको लगता है कि कोई लंगड़ी मारने का प्रयास कर रहा है। फिर वे समझौता नहीं करते। एक तरफ तो वे दानवीर हैं और कोई चीज उनके पास है या उनके सामर्थ्य में है तो उसे मांगने पर अस्वीकार नहीं करेंगे। परंतु अगर सामनेवाले ने किसी तरह का दबाव बनाया तो फिर बज्जू भाई दबंग हो जाते हैं। उन्होंने झुकना नहीं सीखा है भले ही उनको जाती नुकसान हो। 
राम गोपाल बजाज का बचपन घोर अभाव में बीता। उनके नाम में बजाज जरूर जुड़ा हुआ है लेकिन वे बजाज परिवार में नहीं जन्में। एक ऐसे मारवाड़ी बनिया परिवार में उनका जन्म हुआ जो घोर दारिद्य में जी रहा था। उस परिवार में जन्मे सभी बच्चे दूसरे मारवाड़ी परिवार में गोद लिए गए। बज्जू भाई बजाज परिवार में गोद लिए गए इसलिए उनका सरनेम बजाज है। उनके दूसरे सहोदर भाइयों के सरनेम अलग अलग हैं क्योंकि वे अलग अलग परिवारों में पले और गोद लिए गए। इस हिसाब से देखें तो बज्जू भाई का जीवन एक उपन्यास की मांग करता है। कोई चाहे तो उस पर एक बड़ा टीवी धारावाहिक भी बना सकता है। बहुत कम जिंदगियां ऐसी होती हैं जिनमें इतने घुमाव गलियां होती हैं। 
बज्जू भाई आजकल दिल्ली में नहीं रहते पर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मानसिक रूप से अभी भी वे दिल्ली में ही रहते हैं। खासकर एनएसडी और मंडी हाउस के परिसर में उनका मन रमता है। उनसे जब भी, बातें होती हैं, इस इलाके का जिक्र जरूर आता है। `बंटी और बबली’ फिल्म में `कजरारे कजरारे’ वाला गाना है। उसमें एक जगह ये पंक्तियां आती हैं- `तुझसे मिलना पुरानी दिल्ली में/ छोड़ आए निशानी दिल्ली में/ बल्लीमारां से दरीबे तलक/ तेरी मेरी कहानी दिल्ली में।‘ बज्जू भाई के पुराने मित्र, चाहे वे पुरुष हो या स्त्री, इस गीत को गाते हुए अगर `बल्लीमारां से दलीबे तलक’ की जगह `रवींद्र भवन से बहावलपुर हाउस तलक’ कर दें तो ये उनके संबंधों को याद दिलानेवाली पंक्तियां होंगी। ऐसे पुरुषों और स्त्रियों की काफी बड़ी संख्या है।


पता- ई- 102, जनसत्ता अपार्टमेंट्स, सेक्टर -9, वसुंधरा, गाजियाबाद-201012।
मोबाईल-9873196343



Monday, December 26, 2016

वर्षांत: कहीं सम्मान तो कहीं धूमिल हुई छवि





अभिनव उपाध्याय,  नई दिल्ली


राजधानी में वर्ष भर साहित्य कला और संगीत के क्षेत्र में गहमा गहमी बनी रही। वर्ष के शुरूआत में विश्व पुस्तक मेला, साहित्य अकादमी पुरस्कार, विभिन्न किताबों के आगमन पर चर्चा और संगोष्ठियों का आयोजन किया गया। लेकिन वर्ष भर सबसे अधिक चर्चा इस वर्ष दिल्ली सरकार के हिंदी अकादमी में पुरस्कार को लेकर रही। हिंदी दिवस पर राजधानी में मनाए जाने वाले कार्यक्रम में आयोजित सम्मान समारोह से पहले ही यहां साहित्यकार अपमानित हुए। यह विवाद दिल्ली सरकार के अधीन हिंदी अकादमी का यह ताजा विवाद लेखकों के भाषा दूत सम्मान को लेकर था। अकादमी ने पहले तीन लेखकों को डिजिटल माध्यम में हिंदी संगोष्ठी एवं भाषा दूत सम्मान ग्रहण के लिए आमंत्रित किया लेकिन बाद में ये कहकर खेद जता दिया कि उन्हें गलती से आमंत्रण चला गया था और इसे मानवीय भूल समझा जाए। 
 इसमें दिल्ली के लेखक अशोक कुमार पांडेय,उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद से अरुण देव और इलाहाबाद से संतोष चतुर्वेदी सहित कुछ और लेखक थे। 
दिलचस्प यह था कि अकादमी ने 10 सितंबर को पत्र और फोन के जरिये सूचना भेजी गई थी और सम्मान के लिए सहमति ली गई थी लेकिन 12 सितंबर को हिंदी अकादमी ने मानवीय भूल माना। 
हिंदी अकादमी के इस कृत्य की चौतरफा निंदा हुई और सोशल मीडिया पर भी लोगों ने अपनी टिप्पणी दी। 
साहित्यकार मंगलमूर्ति ने लिखा कि हिंदी अकादमी को जिस कैंची से फीता काटना था उसी से अपनी नाक काट ली,अच्छा है।
पहली हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष ने अपनी विवशता दिखाई और मीडिया से दर्द साझा करते हुए कहा कि मुझे कुर्सी मेज़ की सुविधा के लिये भी सचिव से पूछना पड़ता है। उपाध्यक्ष के लिये न कोई कमरा होता है न गाड़ी। हां मैंने कुछ हस्तक्षेप किया है। पुराने ढर्रे को तोडऩे की कोशिश की है अब जितना भी हो जाये। 
भाषा दूत सम्मान के लिए मुझसे नाम मांगे गए थे जो मैंने दिए, लेकिन मैं न तो चयनकर्ताओं में शामिल हूं और न ही चयन में मेरी किसी तरह की भूमिका रही है। जो नाम मैंने दिए थे उन नामों का चयन ही नहीं किया गया है।
अदीबों का सम्मान करने के लिए जानी जाने वाली अकादमी की छवि इस घटना के बाद धूमिल हुई।
 
विगत वर्ष पुरस्कार वापसी के लिए चर्चा रही साहित्य अकादमी 2016 में विवादों से दूर रही। वयोवृद्ध साहित्यकार रामदरश मिश्र को उनके कविता संग्रह आग की हंसी के लिए, उर्दू में शमीम तारिक को उनकी समालोचना तसव्वुफ और भक्ति के लिए 16 फरवरी को राजधानी में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साहित्यकार रामदरश मिश्र को पुरस्कार देने में देरी के लिए साहित्य अकादमी की कुछ लोगों ने आलोचना भी की। स्वयं रामदरश मिश्र ने कहा कि लोग कह रहे हैं कि काफी देर बाद यह सम्मान आपकी कृति को मिला लेेकिन मैं इसमें क्या कर सकता हूं। मुझे खुशी है। मेरी ही एक कविता है कि जहंा आप पहुंचे छलांगे लगाकर मगर मैं भी पहुंचा वहां धीरे धीरे। 

नौ अक्टूबर को भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विचारक दीन दयाल उपाध्याय के जन्म शताब्दी वर्ष पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके दर्शन को समर्पित कार्यों की एक श्रृंखला दीनदयाल उपाध्याय संपूर्ण वाङ्मय का विमोचन किया। जिसमें पंडित दीन दयाल उपाध्याय के बौद्धिक संवादों, उपदेशों, लेखों, भाषणों और उनके जीवन से जुडी घटनाओं को शामिल किया गया है जिनमें उनके एकात्म मानववाद के दर्शन के बारे में बताया गया है। यह श्रृंखला प्रभात प्रकाशन से आई है। 

साहित्यिक जगत में विशुद्ध साहित्यिक सामग्री इस वर्ष कम आई है। कोई ऐसा कविता संग्रह भी नहीं आया जिस पर चर्चा हो। हालांकि इस बीच पारंपरिक प्रकाशन विधा से हटकर ऑनलाइन प्रकाशन और वेबपोर्टल तथा साहित्यिक ब्लागों पर लिखी गई सामग्रियों की चर्चा रही। ऐसा भी देखा गया कि हिंदी प्रकाशकों की किताबें पहले अंग्रेजी में अनुदित कर फिर उसे हिंदी में लाया गया। जगरनॉट प्रकाशन से प्रियदर्शन और अन्य लेखकों की किताबें इसका उदाहरण है। डिजिटल माध्यम में यह किताबें अधिक बिकी हैं। 
साहित्य अकादमी ने 21 दिसंबर को 2016 के साहित्य अकादमी पुरस्कार की घोषणा भी कर दी और यह पुरस्कार हिंदी के लिए नासिरा शर्मा को उनकी कृति पारिजात के लिए पुरस्कृत किया गया।
अंग्रेजी के प्रतिष्ठित प्रकाशक आक्सफोर्ड प्रेस ने हिंदी में प्रकाशन के शुरूआत की घोषणा भी इसी वर्ष की है। यह साहित्य जगत  के ऐसे बदलाव हैं जो समय के साथ अपने को बदले हैं। 
वर्ष में दो पुस्तक मेला देखने वाला यह शहर किताबों की बिक्री के मामले में उदास रहा। विश्व पुस्तक मेला में जहंा दर्शकों की संख्या बढी और बिक्री कम रही वहीं दिल्ली पुस्तक मेला न अपेक्षित दर्शक आए और न ही बिक्री ही हुई। 
राष्ट्रीय नाट््य विद्यालय में पहली बार हर दो वर्ष पर होने वाला नाटकों का मेला जश्न ए बचपन अब अंतरराष्ट्रीय हो गया यही नहीं आने वाले समय में यहां नाटकों के ओलंपिक करने की घोषणा भी की गई। 

Thursday, December 22, 2016

पूरी दुनिया में महिलाओं की स्थिति एक जैसी: नासिरा शर्मा



महिलाओं के सामाजिक,राजनीति व उनके जीवन के अन्य पहलुओं पर अपनी निगाह रखकर भौगोलिक सीमा से परे जाकर उनके मन की टोह लेने में माहिर और अपने साक्षात्कार, कहानी, उपन्यासों के लिए विख्यात लेखिका नासिरा शर्मा को इस वर्ष हिंदी के लिए उनकी रचना पारिजात के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। प्रस्तुत है वरिष्ठ लेखिका नासिरा शर्मा से अभिनव उपाध्याय की बातचीत-



प्रश्न- यह उपन्यास आपकी अन्य कृतियों से कैसे भिन्न है?

उत्तर- इसके बारे में मैं क्या कह सकती हूं।  मेरे हर उपन्यास का विषय अलग रहता है। इसमें मैंने लखनऊ और इलाहाबाद की पृष्ठभूमि को लिया है कि कैसे अवध की तहजीब बनी उसने लोगों को प्रभावित किया लेकिन अब वो चीज गायब हो गई है। इसमें मैं कर्बला, हुसैनी ब्राह्मण और आधुनिक जमाने की कोशिश को लेकर चली हूं।

प्रश्न-आपके और भी उपन्यास हैं लेकिन लेकिन पारिजात उपन्यास पर आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, आप क्या कहना चाहेंगी?

उत्तर- मुझे तो पता भी नहीं था कि इस पर पुरस्कार मिलेगा। मेरे लिए ये ताज्जुब की बात हुई लेकिन मुझे किसी भी उपन्यास पर मिलता तो ऐसा ही लगता।

प्रश्न-आपका लेखन महिलाओं की दशा दिशा को लेकर भी है चाहे वह खाडी देश की हों या भारत की। आप दोनों देशों की महिलाओं की स्थिति में कितनी समानता या विभिन्नता देखती हैं?

उत्तर- पूरी दुनिया में भावनात्मक रूप से देखें तो महिलाओं की स्थिति एक जैसी ही है। आप चाहे जितने बहादुर हो जाएं लेकिन आपकी भावनाएं तो बहादुर नहीं हो सकती। आप औरत बनके मर्द की तमन्ना करते हैं और मर्द बनके ही औरत की तमन्ना करते हैं। अगर इस्लाम के नजरिए से देखिए तो खाडी के देशों महिलाओं को सब कुछ मिला है लेकिन आजादी नहीं मिली है जिसे हम आजादी कहते हैं। लेकिन हम सारी आजादी पाने के बाद भी दुखी हैं देश में दुष्कर्म उसी रूप में हो रहा है,धर्म की खेती उसी अंदाज से होती है। लेकिन यह भी सच है कि 20 फीसद औरतों ने जो चाहा वो हासिल किया है। ज्यादातर औरतें परेशान हैं। कहीं समाज, राजनीति और अन्य बंदिशें महिलाओं के लिए है। उनकी तकलीफों को समझना मुश्किल है।

प्रश्न- आपने विभिन्न विधाओं में लिखा है, किस विधा में अपने को सहज पाती हैं?
उत्तर- इधर दस बारह सालों में मैंने एक या दो कहानियां लिखी हैं ज्यादातर मेरा समय उपन्यास लेखन में जा रहा है। अगर मैं ये कहूं कि कहानी लिखने में तत्काल आनंद मिलता है लेकिन उपन्यास में अपने आप को उसमें डालना पड़ता। उसके किरदारों के नाम याद रखता आदि काफी मुश्किल काम है।

प्रश्न- पूरे विश्व में आतंकवाद की चर्चा है, एक समूह इसे इस्लामिक आतंकवाद का नाम देता है इसमें महिलाओं की संलिप्तता भी सामने आई है? इसे किस तरह से देखती हैं?

उत्तर- महिलाएं तो खुद समझ रही हैं कि जहां पर अंकुश ज्यादा है वहां भी वह शामिल हैं। मामला सियासी हो या धार्मिक वह पीछे नहीं रह गई है। वह घर में भी भागीदार थी और बाहर भी लेकिन पुरुषों से दुगनी हालत में महिलाएं परेशान हैं। क्योंकि उसके साथ परिवार जुडा है समस्याएं जुडी हैं। यह समय दुख के गीत का समय है।

प्रश्न- यह दुख के गीत का समय है?किस संदर्भ में यह कह रही हैं?

उत्तर- यदि आपका नजरिया वहां जाता है जहां जंग ज्यादा है फसाद हो रहा है तो आपको लगेगा कि बाकी कुछ नहीं है केवल जंग है। मैं ज्यादातर उनके बीच उठती बैठती हूं जहां दुख के साए मंडराते हैं इसलिए मैं ऐसा कह रही हूं और वही मेरे लेखन भी आता है।

प्रश्न- आपने आजाद भारत को बढते हुए देखा लेकिन भूमंडलीकरण के बाद एक अलग तरह का भारत दिख रहा है? इसमें महिलाएं कहां है?

उत्तर- पहले सादगी थी,रिश्तों को लेकर पुरानी कैफियत ज्यादा लोगों में थी। लेकिन बाद में बाजार के पनपने का असर लोगों ने तेजी से लिया और इससे चीजें बहुत रंगीन और शोर शराबे वाली हो गई। धीरे धीरे जब सियासत रंग दिखा रही है तो वह आम आदमी के फायदे में नहीं जा रही है। आम आदमी भयभीत भी है, परेशान भी है और उसको इंसाफ नहीं मिल रहा है। अगर सफाई है तो कूडा आपके घर के सामने रख देते हैं, यदि सरकारी पानी आपके घर के ऊपर गिर रहा है तो एक बोरी सीमेंट की व्यवस्था नहीं हो पा रही है।
पुल,सिनेमाहाल, मॉल बनने से क्या होता है। दूसरा पक्ष भी ऐसे भी कैसे संतुलित हो यह भी देखा जाना जरूरी है। दो रोटी खाकर लोग सकून से जी तो सकें। यह सिलसिला किसी एक सरकार से जुडा नहीं है बल्कि यह हमारी संस्कृति का एक अजीब सा अंग बनता जा रहा है। सब सहो और चुप रहो। हमारे समाज का नैतिक पतन बहुत हुआ है। मानवता धीरे धीरे कम हो गई है।
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कौन हैं नासिरा शर्मा

नासिरा शर्मा का जन्म 1948 में इलाहाबाद में हुआ। उन्होंने फारसी भाषा और साहित्य से एमए किया। हिंदी, उर्दू,पश्तो एवं फारसी पर उनकी गहरी पकड है। वह ईरानी समाज और राजनीति के अतिरिक्त साहित्य, कला  व संस्कृति विषयों की विशेषज्ञ हैं। इराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान व भारत के राजनीतिज्ञों तथा प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों के साथ उन्होंने साक्षात्कार किए जो बहुत चर्चित हुए। सर्जनात्मक लेखन में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के साथ ही स्वतंत्र पत्रकारिता में भी उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया है।
2008 में अपने उपन्यास कुइयाँजान के लिए यूके कथा सम्मान से सम्मानित किया गया। अब तक दस कहानी संकलन, छह उपन्यास, तीन लेख-संकलन, सात पुस्तकों के फ़ारसी से अनुवाद हो चुका है।

नासिरा शर्मा को साहित्य अकादमी पुरस्कार


फरवरी में आयोजित समारोह में दिया जाएगा पुरस्कार
-भाषा सम्मान की घोषणा भी अकादमी ने की


 साहित्य अकादमी ने बुधवार को 24 भाषाओं में अपने वार्षिक साहित्य अकादमी पुरस्कार की घोषणा की। आठ कविता संग्रह, सात कहानी संग्रह,पांच उपन्यास, दो समालोचना, एक निबंध संग्रह और एक नाटक के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार घोषित किए गए। हिंदी भाषा में प्रसिद्ध लेखिका नासिरा शर्मा को उनकी कृति पारिजात के लिए उन्हें पुरस्कार देने की घोषणा की गई। जेरी पिंटो को उनके उपन्यास एम एंउ द बिग हूम तथा उर्दू में निजाम सिद्दिकी को उनकी समालोचना माबाद ए जदिदिआत से नये अहेद की तखलिकियात तक के लिए दिया जाएगा।
नासिरा शर्मा ने इस पुरस्कार पर खुशी जताई और कहा कि यह मेरे लिए चौंकाने वाला समाचार है।
पुरस्कारों की अनुशंसा 24 भारतीय भाषाओं की निर्णायक समितियों द्वारा की गई तथा साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में आयोजित अकादमी के कार्यकारी मंडल की बैठक में बुधवार को इन्हें अनुमोदित किया गया।
 पुरस्कार 1 जनवरी 2010 से 31 दिसम्बर 2014 के दौरान पहली बार प्रकाशित पुस्तकों पर दिया गया है।
साहित्य अकादमी पुरस्कार के रूप में एक उत्कीर्ण ताम्रफलक, शॉल और एक लाख रुपये की राशि प्रदान करेगी। घोषित पुरस्कार 22 फरवरी 2017 को राजधानी में आयोजित एक विशेष समारोह में दिया जाएगा।
इन पुस्कारों की घोषणा साहित्य अकादमी के सचिव डा.के श्रीनिवास राव ने की।
 कविता संग्रह के लिए पुरस्कृत 8 कवि हैं  ज्ञान पुजारी (असमिया), अंजु (अंजलि नार्जारी) (बोडो), कमल वोरा (गुजराती), प्रभा वर्मा (मलयालम), सीतानाथ आचार्य शास्त्री (संस्कृत), गोबिन्दचन्द्र माझी (संताली), नन्द जावेरी (सिन्धी) और पापिनेनि शिवशंकर (तेलुगु)
जबकि
अपने कहानी-संग्रहों के लिए पुरस्कृत सात कहानीकार हैं छत्रपाल (डोगरी), श्याम दरिहरे (मैथिली), मोइराङ्थेम राजेन (मणिपुरी), आसाराम लोमटे (मराठी), पारमिता सत्पथी (ओडिय़ा), बुलाकी शर्मा (राजस्थानी) और वन्नदासन (तमिल)।
जेरी पिंटो (अंग्रेज़ी), नासिरा शर्मा (हिन्दी), बोलवार महमद कुं (कन्नड), एडविन जे.एफ़. डिसोजा (कोंकणी) और गीता उपाध्याय (नेपाली) को उनके उपन्यास हेतु पुरस्कृत किया जाएगा।

नृसिंह प्रसाद भादुड़ी (बाङ्ला) को उनके निबंध के लिए और स्वराजबीर (पंजाबी) को नाटक के लिए तथा अज़ीज़ हाजिनी (कश्मीरी) और निज़ाम सिद्दिक़ी (उर्दू) को समालोचना के लिए पुरस्कृत किया जाएगा।

साहित्य अकादमी ने भाषा सम्मान की भी घोषणा की

साहित्य अकादमी वर्ष 2015 के लिए उत्तरी तथा दक्षिणी क्षेत्रों से कालजयी एवं मध्यकालीन साहित्य में योगदान हेतु दो लेखकों व विद्वानों तथा अकादमी द्वारा ग़ैर-मान्यताप्रदत्त भाषाओं कुडुख, लद्दाखी, हल्बी एवं सौराष्ट्र में योगदान हेतु छह विद्वानों अथवा लेखकों को भाषा सम्मान प्रदान करने की घोषणा की।
साहित्य अकादमी कालजयी एवं मध्यकालीन साहित्य
डा.आनंद प्रकाश दीक्षित को कालजयी एवं मध्यकालीन साहित्य (उत्तरी) में उनके महत्वपूर्ण योगदान हेतु के लिए तथा नागल्ला गुरुप्रसाद राव को कालजयी एवं मध्यकालीन साहित्य ( दक्षिणी) में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए यह सम्मान देगी।
गैर मान्यताप्रदत्त भाषाओं में उनके योगदान हेतु भाषा सम्मान प्रदान किया जाएगा। डा. निर्मल मिंज कुडुख भाषा तथा साहित्य की समृद्धि के लिए दिए गए उनके बहुमूल्य योगदान हेतु उनको भाषा सम्मान दिया जाएगा। प्रो. लोजांग जम्सपाल तथा गिलोंग थुपस्तान पलदान संयुक्त रूप से लद्दाकी भाषा तथा साहित्य की समृद्धि के लिए दिए गए उनके बहुमूल्य योगदान हेतु भाषा सम्मान दिया जाएगा। हरिहर वैष्णव को हल्बी भाषा, डा. टी. आर. दामोदरन तथा टी.एस. सरोजा सुंदराराजन संयुक्त रूप से सौराष्ट्र भाषा तथा साहित्य की समृद्धि के लिए दिए गए उनके बहुमूल्य योगदान हेतु यह सम्मान दिया गया है।
प्रत्येक भाषा सम्मान के अंतर्गत एक लाख रुपए की राशि, एक ताम्र फ लक तथा प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाएगा। संयुक्त विजेताओं के मामले में सम्मान राशि दोनों विजेताओं द्वारा समान रूप से साझा की जाएगी। यह सम्मान विशेष समारोह में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष द्वारा प्रदान किया जाएगा।


Sunday, December 18, 2016

बेकल साहब की श्रद्धांजलि सभा


अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

“भासा ऐसी जनमन बिन पुस्तक के बांचै।
आलोचक बिन सूझ-बूझ के जेहिक जाँचै।।
कविता के लिए इस तरह की सहजता के हिमायती 88 वर्षीय सुप्रसिद्ध कवि बेकल उत्साही का विगत 3 दिसंबर को दिल्ली मे निधन हो गया। शायरी में अपनी ख़ास पहचान बनाने वाले बेकल उत्साही राज्यसभा में 1986 से 1992 तक उत्तर प्रदेश से सांसद की भूमिका में रहे। अदब के कई महत्वपूर्ण सम्मानों से सम्मानित बेकल उत्साही को 1976 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। अवध, उत्तर-प्रदेश के बलरामपुर जिले से ताल्लुक़ रखने वाले बेकल साहब ने पूरी दुनिया में अवध और अवधी का परचम लहराया। ‘साझी संस्कृति’ या गंगा-जमनी तहजीब उनकी रचना में रची बसी है। गुरुवार की शाम, दिनांक 15 दिसंबर’16 को, दिल्ली विश्वाविद्यालय के स्पिक मैके लाॅन में ‘दिल्ली परिछेत्र अवधी समाज’ की तरफ़ से बेकल जी की याद में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया जिसमें अवधी के लिखने वाले लेखको, अध्यापकों शोधाथियों और कविता प्रेमियों ने हिस्सा लिया।
आरंभ में दिवंगत कवि की याद में एक मिनट का मौन रखा गया। इसके बाद अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने उनका संक्षेप में परिचय बताया। उन्होंने बेकल जी के साथ हुई मुलाकातो एवं बातचीत से कुछ प्रसंगों को साझा किया। उन्होनें बताया कि अवधी बेकल साहब की शायरी की बुनियाद है। अवधी में तो उन्होंने क़ाफी कविताएँ लिखी है, और जब अवधी के अलवा हिंन्दी-उर्दू में लिखा तो वहाँ भी अवध और अवधी का रंग क़ायम रहा। उन्होंने एलीटियत और मानकीकरण से भरी शायरी की दुनिया से बग़ावत की। इस बग़ावत के जरिये उन्होने उर्दू कविता के ‘फाॅर्म’ में गीत को शामिल कराया तो दूसरी तरफ़ गाँव की संवेदना को भी दर्ज़ कराया।
इस बग़ावत का मूल्य सही रूप से तब समझा जाता जब उन पर ‘गंवार’ और ‘गवैया’ जैसे जुमलों से हट कर सोचा जाता। यह कविता का कुलीनतावाद था। बुद्धिनाथ मिश्र की आपत्ति ठीक है कि ‘अपनी गांव की संवेदना और गीतों से बेकल उत्साही ने उर्दू के भंडार में बेशकीमती रचनाएँ दी लेकिन उर्दू के ठेकेदारों ने उन्हे ‘बाबा’ कहकर खारिज कर दिया।’ इन हालात से बेअसर हो कर बेकल जी ने अपने ‘मै/मेरे’ को बग़ावत का हथियार बनाते हुए अपने रास्ते का आत्मविश्वास दिखाया-
“ग़ज़ल के शहर में गीतों के गांव बसने लगे
मेरे सफ़र के हैं ये रास्ते निकाले हुए।”
अपनी अवधी बुनियाद को लेकर कोई दोचितापन उनमें नही है-
हमका रस्ता ना बताओ हम देहाती मनई
अवधी हमरी नस नस मा है, हम अवधी का जानेन
अवधी हमका आपन मानिस हम अवधी का मानेन
औरौ भासा न पढ़ाओ हम देहाती मनई।
निराला ने बेकल जैसे लोकभाषा के कवियों को आरंभ में कितना प्रोत्साहित किया था, इसकी भी चर्चा हुई। उन्होनें श्याम नारायण पाण्डेय के देहाती भाषा के विरोध का विरोध करते हुए कहा था कि ‘हल्दी घाटी, चित्तौड़’ बचे, न बचे, लेकिन इनकी कविताएँ रहेंगी। ये माटी के शायर हैं।'
इस मौके पर बेकल उत्साही की कई कविताओं का पाठ भी किया गया। डा. बजरंग बिहारी ‘बजरू’ ने, यह कार्यकम्र उन्हीं की संकल्पना से संभव हुआ, बेकल उत्साही की ‘पुरबही गजल’ का पाठ किया- ‘जेकर ईमान नीमन बा बेकल / बोली बानी मा वहिके असर बा।’ ‘हुड़ुक गीत’,’गीत हमारे सबके लिए हैं’,‘बलम बंबैया न जायौ’,‘भुइदान’,’अवध में आज मचा कोहराम’,’गुलरी कै फूल’.... आदि कविताओं का पाठ किया गया। कविता प्रेमियों ने ‘जुमई खां आजाद’ की ‘कथरी’, रफीक शादनी की ‘जियौ बहादुर खद्दर धारी’, ’धत्त तोरी ऐसी की तैसी’ व ‘उल्लू हौ’ प्रकाश गिरी की ‘साहेब किहे रहौ सुलतानी’ व कृष्णकांत की ‘का हो लड्डन लड्डू खाबो’ का भी पाठ किया।
आज के समय में सांझा संस्कृति के नुमाइंदे कवि के न रहने से सबका मन दुखी था। इस कार्यकम्र की खासियत यह भी थी कि लगभग पूरा ही कार्यक्रम अवधी भाषा में किया गया। 

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