Tuesday, May 10, 2011

कब रुकेगी जमीन की लड़ाई

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के किसान संघर्ष ने इक्कीसवीं सदी में नया रूप धारण कर लिया है। अंग्रेजी जमान के भूमिअधिग्रहण कानून के तहत पिछले 11 सालों में 27 लाख हेक्टेयर जमीन हथिया ली गई है। इतनी ही जमीन अगले तीन सालों में ली जानी है। सवाल यह है कि क्या हम एक लोकतांत्रिक देश में किसानों को विकास का दुश्मन बताकर इसी तरह उन पर लाठी भांजते रहेंगे और उनकी फसलें जलाते रहेंगे? या उनके भविष्य के साथ देश के भविष्य को जोड़ेंगे? किसान देश और दुनिया की बड़ी आबादी हैं उनके बारे में उदारीकरण की फौरी योजनाएं नहीं चलने वालीं। उसे दीर्घकालिक योजना बनानी ही होगी।
प्रस्तुत है इस संदर्भ में अरुण कुमार त्रिपाठी का लेख.

महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के जतापुर से लेकर उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के भट्टा परसौला तक देश के व्यापक इलाके में जमीन की लड़ाई छिड़ी हुई है। हर जगह पुलिस-प्रशासन देश हित में लाठी भांज रहा है और किसानों को विकास विरोधी बताकर खदेड़ने पर लगा है। सवाल उठता है कि क्या सचमुच देश के सत्ताधारी वर्ग के भीतर देशप्रेम उमड़ आया है और इस देश का किसान, ग्रामीण देश्रोही हो गया है? या यह विकास के नजरिए का ऐसा भ्रम और टकराव है जिसका निकट भविष्य में समाधान होता नहीं दिखता?
इस समस्या को गौर से देखिए तो साफ लगता है कि जो जमीन कभी ग्रामीण समाज के लिए जीविकोपार्जन का साधन हुआ करती थी आज वह लाखों करोड़ों का वारा न्यारा करने वाली सोने का अंडा देने वाली मुर्गी हो गई है। एक तरफ किसान को उस मुर्गी का पेट फाड़ने की सलाह जी जा रही है वहीं बिल्डर, उद्योगपति और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को उसे पालने की सलाह दी जा रही है। जमीन की इस लड़ाई में किसानों की दो धाराएं चल रही हैं।

एक धारा तो यह चाहती है कि जो जमीन उसके पुरखों की विरासत है और हर स्थिति में उसकी आजीविका चलाती है उसे किसी भी तरह से उसके पास रहने दिया जाए। दूसरी धारा व्यावहारिक तरीके से इस समस्या को देखती है। उसका मानना है कि सोने की मुर्गी उद्योगपति ही पाले लेकिन उसके अंडे उसे भी मिलते रहें। जतापुर और ग्रेटर नोएडा के किसानों की मांगों में यही फर्क है। जहां जतापुर के किसान पूरी तरह से परमाणु परियोजना का विरोध कर रहे हैं और अपनी जमीन देने को नहीं तैयार हैं वहीं भट्टा परसौला के किसान अपनी जमीन का ज्यादा मुआवजा चाहते हैं और लंबे समय तक मुआवजा चाहते हैं। ध्यान देने की बात है कि अनिल अंबानी के विद्युत संयंत्र के लिए अधिग्रहीत की गई दादरी की जमीन का मामला भी जतापुर की ही तरह का था। वे किसान जमीन बिल्कुल नहीं देना चाहते थे। इसीलिए बाद में वे कानूनी लड़ाई भी जीते और उन्हें जमीन वापस मिली।
जमीन न देने की राय सिंगुर और नंदीग्राम के किसानों की भी थी और इसीलिए वहां आंदोलन लंबा चला।
अलग-अलग इलाके के किसानों की आर्थिक सुरक्षा और भावी संभावनाएं अलग-अलग है इसलिए उनकी प्रतिक्रिया भी अलग है, लेकिन एक बात साफ है कि अपनी जमीन और आजीविका बचाने के लिए वे मौजूदा सरकारों और कारपोरेट जगत से एक तरह की जंग लड़ रहे हैं। जहां वे कमजोर पड़ते हैं वहां औने-पौने दामों में दबाव डालकर उनकी जमीन ले ली जाती है और जहां ताकतवर पड़ते हैं वहां भयानक संघर्ष छिड़ता है और खून खराबा होता है। यहां यह बात गौरतलब है कि जमीन अधिग्रहण के ज्यादातर मामलों में सरकारी दमन अनिवार्य है। इस दमन के खिलाफ जो किसानों का नेतृत्व करता है उसे या तो ग्रेटर नोएडा के तेबतिया की तरह अपराधी घोषित कर दिया जाता है या नंदीग्राम के आंदोलनकारियों की तरह से माओवादी। संभव है इस संघर्ष में उतरने के बाद वे हिंसक और माओवादी बन जाते हों क्योंकि अगर वे पहले से अपराधी थे तो बाहर कैसे घूम रहे थे और सरकार ने उन पर पहले क्यों नहीं हाथ डाला था। फिर सवाल यह भी है कि जो अपराधी होगा उसे समाज के लिए लड़ने से क्या फायदा मिलेगा? उसे तो कारपोरेट जगत, सरकार और जमीन माफिया से सहयोग कर धन कमाने में अपना उद्धार दिखेगा?
इतिहास गवाह है कि सत्ता के खिलाफ किसानों और आदिवासियों की तरफ से जो भी लड़ने खड़ा होता है उसे सरकार इन्हीं विशेषणों से विभूषित करती है। कभी उसे डाकू बना देती है तो कभी उसके सिर पर ईनाम घोषित कर देती है। अंग्रेजी सरकारें यही करती रही हैं और हमारे लोकतांत्रिक देश की सरकार भी थोड़ी बहुत सहानुभूति का नाटक करने के साथ लगभग यही व्यवहार कर रही है।
पश्चिम बंगाल की जिस वाममोर्चा सरकार को जनता ने किसानों और मजदूरों की सरकार समझा था उसी ने भूमि अधिग्रहण के नाम पर किसानों और मजदूरों पर भयंकर अत्याचार किया। आज अगर मौजूदा चुनाव में उसकी हार होती है तो उसमें सिंगुर और नंदीग्राम कांड का बड़ा योगदान होगा। अगर वह जीतता है तो भी जमीन अधिग्रहण के सवाल पर नए सिरे से विचार करेगा।
दरअसल जमीन अधिग्रहण के सवाल को लोकतांत्रिक देश में न तो स्तालिन की तरह से देखा जाना चाहिए न ही 18 वी सदी के यूरोप की तरह से। इस सवाल को औपनिवेशिक शासन की तरह से भी नहीं देखना चाहिए। उसे एक संवेदनशील लोकतांत्रिक व्यवस्था के चश्मे से देखना चाहिए जिसमें अगर पूंजीपति की संपत्ति का अधिग्रहण न करने का सिद्धांत चलता है तो फिर किसानों को क्यों सताया जाए।
दिक्कत यह है कि हमारी सरकारें आज भी जमीन अधिग्रहण की 1894 की अंग्रेजी जमाने की नीतियों पर चल रही हैं। वह नीति जिसने हमारे किसानों को असामी, रैयत और रियाया बना दिया था और खुद मालकिन बन बैठी थी। आज भी भूमि सुधार के तमाम कानून यही कहते हैं कि सारी जमीन की मूल मालिक सरकार है। संविधान के तीसरे अध्याय के 31 वें अनुच्छेद में दर्ज निजी संपत्ति के मौलिक अधिकार को खत्म किए जाने के बाद भी किसानों के साथ दिक्कतें शुरू हुईं और उसके बाद विस्थापन की समस्या ने जोर पकड़ा।
आज चारों तरफ से जमीन अधिग्रहण की अंग्रेजी जमाने की नीति बदलने की मांग ने जोर पकड़ रखा है। सरकार के पास एनसी सक्सेना समिति का मसौदा रखा भी हुआ है। उस मसौदे में सार्वजनिक उद्देश्य की परिभाषा पर कई संगठनों को आपत्ति है। जाहिर सी बात है कारपोरेट या निजी हित को पहले सार्वजनिक हित बताकर जमीन लेने की रणनीति एक धोखाधड़ी है। जो सरकारें अपने को जनता का प्रतिनिधि बताती हैं उन्हें किसी बड़ी कंपनी की तरफ से ऐसा काम करने से परहेज करना चाहिए।
इस समय भूमि अधिग्रहण नीति को ममता बनर्जी की हर झंडी का इंतजार है। ममता बनर्जी की सहमति पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों पर निर्भर करेगी। अगर उन्हें पूर्ण बहुमत मिलता है तो वे इस कानून में बंगाल की जनता के मुताबिक संशोधन करवाएंगी। अगर उन्हें अपनी सरकार बनाने के लिए कांग्रेस की मदद लेनी पड़ी को इस नीति में कांग्रेस की चलेगी। स्थितियां जो भी हों पर जमीन के मौजूदा संघर्ष में एक तरफ तो वह गरीब-भूमिहीन समाज है जिसे या तो कभी जमीन मिली नहीं और उसने जो थोड़ा बहुत कब्जा किया उसे भी अब छीना जा रहा है। दूसरी तरफ वे खेतिहर और मध्य जातियां हैं जिनकी ताकत अभी भी जमीन है। देश में पिछले 11 सालों में 27 लाख हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण बिना किसी विधिवत नीति के कर लिया गया। अगले तीन सालों में इतनी ही जमीन अधिग्रहीत की जानी है। जाहिर है अब संघर्ष कठिन होगा और वह बिना किसी उदार नीति के संभव नहीं हो पाएगा।

Sunday, May 8, 2011

गाने पचास साल पुराने

मनोहर नायक
कोई बहुत पुराना गाना सुनकर कभी-कभी ताज्जुब होता है कि पचास-साठ साल बीत चुके पर यह अब भी ताजातरीन कैसे बना हुआ है। जाहिर है यह गीत-संगीत-गायकी का मिला-जुला कारनामा है। उन अदाकारों का करिश्मा भी इससे जुड़कर इस जादू को कालातीत बना देता है। ताज्जुब यह भी है कि इन गानों के दीवाने अधेड़ और बूढ़े हो चुके लोग ही नहीं बल्कि दीवानी अभी जवान हो रही पीढ़ी भी है। भले ही जितने भदेस हों इन गानों के रीमिक्स भी उनकी लोकप्रियता ही बताते हैं। फिर टीवी चैनलों, खासतौर पर म्युजिक चैनलों पर चलने वाले पुराने गानों के कार्यक्रम और सुबह से शाम तक एफएम रेडियो पर चलते फिल्म संगीत के सुनहरे दौर के गाने यही बताते हैं कि उनकी मांग और बाजार में कमी नहीं आयी है। उन्नीस सौ इकसठ को ही मिसाल के तौर पर लें तो पाएंगे कि पचास साल पहले इस वर्ष रिलीज हुई कुछ फिल्मों के गाने आज भी चाव से सुने जा रहे हैं और आगे न जाने कब तक सुने जाते रहेंगे।
वैसे सबकी अपनी-अपनी पसंद होती है। अपने प्रिय संगीतकार और गायक/गायिका होते हैं पर तब भी यह कहा जा सकता है कि लोकप्रियता के लिहाज से इस साल जयदेव सबसे आगे नजर आते हैं। नवकेतन की ‘हम दोनों, जिसका इसी साल देव आनंद ने रंगीन संस्करण जारी किया, वह फिल्म जो थी उनकी प्रतिभा को पूरी तरह सामने लायी। अविवाहित जयदेव जीवनभर मुंबई में पेइंग गेस्ट की तरह रहे। नवकेतन से वे अपने गुरु अली अकबर खान के साथ बतौर उनके असिस्टेंट उस समय जुड़े जब खान साहब ‘आंधियां और ‘हमसफर में संगीत दे रहे थे। जयदेव तब दो सौ रुपये माहवार पाते थे। बाद में वे नवकेतन में ही सचिनदेव बर्मन के असिस्टेंट हुए। ‘हम दोनों में उन्हें पहली बार मौका मिला। ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया और ‘अभी न जाओ छोड़कर आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने पहले थे। जयदेव लुधियाना के थे और इस फिल्म के गीतकार साहिर भी वहीं के थे। पहले से एक दूसरे से परिचित थे, पर साहिर मूडी थे। इसी फिल्म के एक और गाने ‘कभी खुद पर कभी हालात पर रोना आया के लिए जयदेव साहिर से एक अंतरा और लिखने के लिए कहते रहे पर उन्होंने नहीं लिखा तो नहीं लिखा। पर एक गाना और था ‘अल्ला तेरो नाम। 1967 में लता ने इसे अपने दस सर्वश्रेष्ठ गीतों में रखा था। यह एक सदाबहार गीत है। रायचंद बोराल को फिल्म संगीत का पिता और खुद को चाचा कहने वाले अनिल विश्वास, जिनके साठ से ज्यादा साल पुराने गीत आज भी रोमांचित कर देते हैं, से जब यह पूछा कि किसी दूसरे कंपोजर का कोई गीत जो लगता हो कि काश, इसे मैंने बताया होता! अनिलदा ने फौरन कहा था, ‘हां जयदेव का, ‘अल्ला तेरो नाम।
लेकिन इकसठ के लिए फि ल्म फेयर अवार्ड न जयदेव को मिला, न साहिर को न रफी को। देव आनंद भी वंचित रहे। गीतकार का अवार्ड ‘घराना फिल्म के ‘हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं के लिए शकील को मिला और ‘ससुराल के ‘तेरी प्यारी प्यारी सूरत को गाने के लिये रफी को मिला। यह गाना आज भी जब बजता है तो लोग साथ-साथ गाने लग जाते हैं। ‘ससुराल, ‘घराना उस दौर में एवीएम, जमनी जसी दक्षिण की कंपनियों की वे पारिवारिक फिल्में थीं जिनकी परिवार के एलबमनुमा शॉट के साथ हैपी एंडिंग हुआ करती थी। फिल्म फेयर का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का अवार्ड ‘घराना के लिए रवि को मिला था। इस फिल्म का एक गीत ‘दादी अम्मा, दादी अम्मा आज भी बच्चों के लिए बना पसंदीदा गाना है। उस साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म थी ‘जिस देश में गंगा बहती है। सर्वश्रेष्ठ अभिनेता भी इसी फिल्म के लिए राजकपूर थे। इसके सभी गाने लाजवाब थे। शंकर जयकिशन, शैलेन्द्र, लता, मुकेश का जलवा इनमें बिखरा हुआ था : ‘हम उस देश के वासी हैं, ‘मेरा नाम राजू, ‘ओ बसंती पवन पागल, ‘बेगानी शादी में, ‘हम भी हैं, तुम भी हो और ‘आ अब लौट चलें।
इसी साल दिलीप कुमार की अपनी फिल्म ‘गंगा जमुनाज् आयी थी और वैजयंतीमाला भर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का अवार्ड मिला था। ‘नैन लड़ जहैं, ‘ढूंढ़ो, ढूंढ़ो रे साजना, ‘दो हंसों का जोड़ा और ‘इंसाफ की डगर पर इसके ये गाने आज भी फीके नहीं पड़े हैं। सुधीर फड़के मराठी फिल्मों की बड़ी हस्ती थे पर हिंदी फिल्में भी उन्होंने कई कीं। जिस एक फिल्म और एक गाने ने उन्हें अपार लोकप्रियता दी वह फिल्म थी ‘भाभी की चूड़ियां और पंडित नरेन्द्र शर्मा का लिखा, लता का गाया गाना था ‘ज्योति कलश झलके। यह जब भी बजता है तो एक मांगलिक भावना जसे आसपास घिर आती है। किसी के एक सर्वश्रेष्ठ गाने की याद करें तो केदार शर्मा निर्देशित ‘हमारी याद आयेगी फिल्म में मुबारक बेगम का गाना याद आता है, ‘कभी तनहाइयों में हमारी याद आएगी। स्नेहल भाटकर के संगीत से सजी इस फिल्म में मुबारक-मुकेश का गाना ‘फरिश्तों की नगरी में आ गया हूं भी एक उम्दा गीत है।
यह साल फिल्मों, गानों और डांस को एक नई शैली देने वाली फिल्म ‘जंगली का भी साल है। जिसकी ‘याहू की गूंज बाद तक सुनाई देती रही। रफी का गाया, हसरत का लिखा एक बेहद मधुर गीत इस फिल्म में था : ‘एहसान तेरा होगा मुझ पर। देव आनंद की ‘जब प्यार किसी से होता है के ‘जिया हो जिया, ‘ये आंखे उफ युम्मा, ‘सौ साल पहले अब भी बार-बार सुनाई पड़ते हैं। थोड़े कम बजने पर अपनी गिरफ्त में लेने वाले गाने भी कम नहीं हैं : ‘दिल मेरा एक आस का पंछी, ‘तुम रूठी रहो (आस का पंछी), ‘इतना न मुझसे तू प्यार जता, ‘आंसू समझ के क्यूं आंख से मुझको गिरा दिया (छाया, संगीत सलित चौधरी), ‘तेरी दुनिया से दूर चले होके मजबूर (जबक), ‘भूली हुई यादों मुङो इतना न सताओ (संजोग), ‘तुम तो दिल के तार छेड़कर सो गए (रूप की रानी चोरों का राजा), ‘वफा जिनसे की बेवफा हो गए (प्यार का सागर), ‘साथ हो तुम और रात जवां (कांच की गुड़िया)।
‘झुमरू फिल्म किशोर कुमार ने बनायी थी। संगीत भी उन्हीं का था। इसके टाइटिल गीत के अलावा ‘कोई हमदम न रहा गीत बेहद संजीदा था। सभी बड़े संगीतकारों, गीतकारों, गायक, गायिकाओं ने अपने हुनर से इस साल को संवारा। पद्मनी ने इस साल ‘जिस देश में गंगा बहती के बाद हिंदी फिल्मोंे से विदा ले ली, वहीं एक दशक की गुमनामी के बाद सुरैया ‘शमा में लौटीं और गुलाम मोहम्मद की धुनों में सजे कैफी के दो मधुर गीत गाये : ‘आपसे प्यार हुआ जाता है, ‘धड़कते दिल की तमन्ना। इतने सुरीले सदाबहार गानों वाले इस साल में एक बिना गानों वाली फिल्म भी आयी, ‘कानून। बीआर चोपड़ा को इसके लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्म फेयर अवार्ड मिला था।

करिश्मा बिन जवाहिरी

अरुण कुमार त्रिपाठी

अल जाहिरी लादेन की तरह से करिश्माई नेता नहीं हैं। हाल में उन पर यह भी आरोप लग रहा है कि ओसामा बिन लादेन के मराने में उनका हाथ है। यह आरोप सऊदी अरब के अखबार अल तन ने अरब सूत्रों के हाले से लगाया है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी भी इसी तरह की बात कर रही है। अल तन का कहना है कि vaजीरिस्तान के कबीलाई इलाकों से एबटाबाद के शहरी इलाकों में लादेन के जाने का फैसला अल जाहिरी ने एक साजिश के तहत कराया था। इस बीच जिस संदेशाहक यानी कुरियर के माध्यम से लादेन का सुराग मिला है ह भी जाहिरी का ही आदमी बताया जाता है। यह भी कहा जा रहा है कि आम धारणा के पिरीत ह कुैती नहीं पाकिस्तानी था। साजिश के इस सिद्धांत के तहत जाहिरी ने ओसामा का सफाया कर संगठन पर कब्जा करने की नीयत से यह सब किया था और आखिर में उसमें कामयाब भी हो गया। पर अल कायदा के इन दो करीबी नेताओं में झगड़े और इस हद तक साजिश होने की बात को अमेरिकी एजेंसियां स्ीकार नहीं कर पा रही हैं। यहां यह साल भी उठता है कि सन 2004 में बीमार हुए ओसामा बिन लादेन को एबटाबाद भेजने की योजना अगर जाहिरी ने बनाई थी तो यह कबीलाई इलाके के मुकाबले उसे सुरक्षित जगह पर भेजने की कोशिश कैसे नहीं कही जाएगी?
लेकिन अल जाहिरी के प्रति अश्विास ही उन्हें अल कायदा का प्रमुख बनने से रोक सकता है, रना उनमें े सारी योग्यताएं हैं जो उन्हें इस जिम्मेदारी का स्त: उत्तराधिकारी बना देती हैं। आमतौर पर संगठन का उसूल नंबर दो के व्यक्ति पर ही यकीन करने का है। ह करिश्माई भले न हों लेकिन एक आतंकादी संगठन के नेता के तौर पर उनकी योग्यता और कुशलता का बार-बार प्रमाण मिल चुका है। ह आतंकादी हमलों के शेिषज्ञ ही नहीं इस्लाम के धर्मशास्त्र के द्विान भी हैं। एक डिग्री धारी सर्जन के तौर पर अपना कैरियर शुरू करनेोले जाहिरी अमेरिका सहित दुनिया के बड़े हिस्से में घूम चुके हैं और उन तमाम इलाकों के मुसलमानों से उनका संपर्क है, जहां पर किसी तरह का टकरा और समस्याएं हैं। बल्कि धार्मिक चिारों के मामले में े लादेन से ज्यादा कट्टर और स्पष्ट बताए जाते हैं।
हिंसक तरीकों में उनकी क्रूरता और आस्था लादेन से भी ज्यादा है। कहा जाता है कि पिछले छह सालों से लगभग निष्क्रिय जीन जी रहे ओसामा बिन लादेन की जगह पर संगठन के पीछे असली दिमाग उन्हीं का है। हमलों की रणनीतियां बनाना, लोगों को संगठित करना और संगठन को ैचारिक आधार देने का काम उन्हीं के जिम्मे था। बीच-बीच में उनके भी टेप जारी होते रहे हैं। जाहिरी के सामने चुनौती यह है कि अमेरिका की नजरों से बचते हुए कैसे े अपने अलकायदा में नई जान फूंकते हैं और कैसे क्रांति के उन हिंसक और कट्टर सिद्धांतों को प्रासंगिक बनाते हैं जिनको उन्हीं के मूल देश की जनता नामंजूर कर चुकी है। मिस्र की राजधानी काहिरा के उपनगरीय इलाके में एक पढ़े-लिखे परिार में 1951 में जन्मे अयमन अल जाहिरी को बचपन से ही पढ़ने-लिखने का अच्छा माहौल मिला और उन्होंने उसका लाभ भी उठाया। उनके पिता फार्माकालोजिस्ट और रसायन शास्त्र के प्रोफेसर थे। उनके पिता के परिार में ज्यादातर द्विान थे और मां के परिार में राजनेता और संपन्न व्यापारी। लेकिन मिस्र की स्थितियों ने बहुत जल्दी ही उन्हें राजनीति की तरफ ठेल दिया। े 14 साल की उम्र में ही मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्य बन गए और पढ़ाई लिखाई के साथ अमेरिका और इजराइल के प्रति नरम रुख रखनेोली सरकार का तख्ता पलटने की तैयारी में लग गए थे। उन्हें इस काम के लिए उनके चाचा और एक शिक्षक ने प्रेरणा दी। उसके बाद कुत्ब नाम के एक नेता को जब मिस्र की सरकार ने 1970 के दशक में फांसी दी तो जाहिरी ने तय किया कि े उनके संदेश को ही आगे बढ़ाएंगे।
अपने देश और दुनिया की समस्याओं का समाधान इस्लामिक शुद्धता और उसके शासन की स्थापना में देखनेोले जाहिरी के जीन में असली बदला तब आया जब 1984 में हज करने गए सऊदी अरब गए और हां उनकी भेंट ओसामा बिन लादेन से हुई। फिर े हीं रुक कर डाक्टरी करने लगे। इससे पहले े इजिप्ट इस्लामी जेहाद में सRिय हो चुके थे और उन्हें तीन साल की सजा हो चुकी थी। इस मुलाकात में लादेन ने उन्हें प्रभाति किया और उनकी अगली मुलाकात 1986 में पेशार में उस समय हुई जब े हां सोयित फौजों से लड़ते हुए घायल अफगानी शरणार्थियों का इलाज करने में जुटे थे। उस समय लादेन हां जेहादी शिरि चला रहे थे। उन्होंने नब्बे के दशक में अपने संगठन ईआईजे का लादेन के संगठन अल कायदा में लिय कर दिया।

े लादेन के सहयोगी ही नहीं निजी फिजीशियन के तौर पर भी रहे और 9/11 के बाद जब अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमला हुआ तो लादेन के परिार को सुरक्षित ईरान पहुंचाया। एक दौर में अल जाहिरी ईरान के एजेंट के तौर पर भी काम करते रहे हैं और उसे यह बताते रहे हैं कि उसके किन द्वीपों पर मिस्र कब्जा करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए ईरान ने उन्हें 20 लाख डॉलर दिया था। लेकिन जाहिरी र्साजनिक तौर पर ईरान की कड़ी निंदा करते रहे हैं।
अल जाहिरी को करीब एक दर्जन नामों से जाना जाता है। उसमें अबू मोहम्मद, अबू फातिमा, मोहम्मद इब्राहीम, अबू अबदालेह, अबू अल मुइज, द डाक्टर , द टीचर, नूर, अबू मोहम्मद, नूर अलदीन, अब्दुल मुआज प्रमुख हैं। उसकी एक ही शादी हुई है और पत्नी अब नहीं हैं। उससे पांच बच्चे हैं जिनमें एक बेटा और चार बेटियां हैं। बेटा बेहद शिष्ट और शालीन है और लड़कियों को जेहाद में शामिल करने के पक्ष में जाहिरी खुद भी नहीं हैं। जाहिरी मुख्य तौर पर 9/11 के बाद जब चर्चा में आए और अमेरिका ने दुनिया के 22 प्रमुख आतंकियों की सूची में उनका नाम जारी किया, तो उनकी पत्नी ने हैरानी जताते हुए कहा कि उन्हें इस बात की बिल्कुल भनक तक नहीं थी कि उनके पति जेहादी हैं। अल जाहिरी पाकिस्तान की लाल मस्जिद पर हुए हमले के पीछे भी रहे हैं और उससे पहले अमेरिकी दूताासों पर हुए हमलों में भी उनकी योजना रही है।
अल जाहिरी के साथ एक ही बात सही है कि उन्होंने इस्लामी दुनिया की तकलीफों को देखकर अपना जीन जोखिम में डाल लिया। लेकिन इजिप्ट इस्लामी जेहाद, अलकायदा तो आजकल अलकायदा इन द इस्लामी मगरिब के सहारे मुसलमानों की आजादी और अमन की तलाश कर रहे जाहिरी एक आत्मघाती नजरिए के साथ मौत के पीछे भटक रहे हैं। लादेन की तरह ही उनका अंत तय हो चुका है बस उसे े कब तक टाल पाते हैं यही उनकी कुशलता है।

Monday, May 2, 2011

पापा कहते थे बड़ा नाम करेगी

अरुण कुमार त्रिपाठी


जून सन 2007 में जब एम के कनिमोझी ने चेन्नई में

संगमम का आयोजन किया तो मुख्यमंत्री, पिता और

द्रमुक प्रमुख मुत्तुअल करुणानिधि ने उन्हें अपना

साहित्यक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। तब किसी को

इस बात का अहसास नहीं था कि साहित्यिक प्रतिभा

की धनी यह शमीर्ली बेटी एक दिन देश के इतिहास

के सबसे बड़े घोटाले की अभियुक्त बनेगी। जाहिर है

पिता की साहित्यिक विरासत को ढोने वाले लोग देश

और दुनिया में कई बार विवादों में आते हैं। लेकिन

महज साहित्यिक प्रतिभा के आधार पर कोई इतना बड़ा

घोटाला नहीं कर सकता। उसके लिए जरूर दूसरे तरह

की प्रतिभा होनी चाहिए। वह प्रतिभा राजनीतिक और

आर्थिक दोनों तरह की चाहिए। इसलिए कनिमोझी ने

पिता की साहित्यिक विरासत से ज्यादा आर्थिक विरासत

को ढोने में ज्यादा रुचि दिखाई और वही वजह है कि

आज सीबीआई उनके दरवाजे तक पहुंच गई है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की

तरह कनिमोझी ने साहित्यिक प्रसिद्धि ओढ़ नहीं रखी

है। वे सचमुच प्रतिभाशाली हैं और राजनीति में आने से

पहले बेहद सामान्य ढंग से जीने में यकीन करती थीं। वे

मुख्यमंत्री की बेटी होते हुए आटोरिक्शा में सहज होकर

आती जाती थीं। तैंतालीस वर्षीय कनिमोझी तमिल की

एक प्रतिष्ठित कवयित्री हैं और उनकी कम से कम

पांच किताबें आ चुकी हैं। वे एक गायिका भी हैं और

उन्होंने एक प्रोडक्शन के लिए अपना कैसेट भी तैयार

करवाया है। वे एक पत्रकार रही हैं और उन्होंने पहले

द हिंदू अखबार के चेन्नई कार्यालय में एक उपसंपादक

का प्रशिक्षण भी लिया है। उसके बाद वे दो तमिल

प्रकाशनों की प्रभारी भी रही हैं। कनिमोझी की इन्हीं

रचनात्मक प्रतिभाओं को देखते हुए उन्हें द्रमुक की

कला, साहित्य और रैशनल्टी विंग का प्रभारी भी बनाया

गया है और तभी पिता करुणानिधि ने उन्हें अपना

साहित्यिक उत्तराधिकारी घोषित किया था। कनिमोझी ने

पहले शिवकाशी के एक व्यापारी से विवाह किया था। पर

वह विवाह चल नहीं पाया। उन्होंने दूसरी बार सिंगापुर के

एक तमिल साहित्यकार से शादी की है।

कनिमोझी का नाम टू-जी घोटाले में कलैगार टीवी की

हिस्सेदारी के कारण आया है। हालांकि इस टीवी समूह

में उनका हिस्सा महज 20 प्रतिशत है और करुणानिधि

की एक अन्य पत्नी दयालुअम्माल का 60 प्रतिशत।

लेकिन सीबीआई की चार्जशीट में दयालुअम्माल के

बजाय कनिमोझी का नाम आने से सभी को हैरानी हुई

है। सीबीआई का कहना है कि कलैगार टीवी में शाहिद

बलवा की कंपनी डीबी रियल्टी ने टू-जी घोटाले से कमाए

गए 200 करोड़ रुपए लगाए हैं, लेकिन चूंकि कनिमोझी

उसके संचालन में सक्रिय थीं, इसलिए उन्हें इस मामले

में अभियुक्त बनाया गया है। यह पूछे जाने पर कि

अब तक कनिमोझी को क्यों नहीं आरोपी बनाया गया,

सीबीआई का कहना था कि वह चार्जशीट के माध्यम से

विधानसभा चुनाव पर असर डालते नहीं दिखना चाहती

थी। जबकि थोड़े दिन देर करने से कोई फर्क नहीं पड़ने

वाला था। लेकिन द्रमुक और करुणानिधि के परिवार

जिसमें वैसे कोई विशेष अंतर नहीं है, उसकी यही राय है

कि दयालु अम्माल को आरोपी बनाए जाने का मतलब

कुछ और होता। तब यह सीधे करुणानिधि पर हमला

होता। जहां तक कनिमोझी को अभियुक्त बनाए जाने

का सवाल है तो उस पर पार्टी पदाधिकारियों के साथ

करुणानिधि के बेटों एमके अझगिरी और एमके स्टालिन

दोनों ने संयम बरतने की सलाह दी है।


दरअसल सन 2007 में जब कनिमोझी राज्यसभा की

सदस्य बनाई गईं तभी से वे पार्टी और परिवार की

आंखों की किरकिरी बनी हुई हैं।उन्हें विरासत की जंग का

एक पक्ष माना जाने लगा था। उनके राजनीतिक उभार

के साथ ही करुणानिधि के परिवार का एक राजनीतिक

सितारा दयानिधि मारन गर्दिश में जाने लगा। उन्हीं

दिनों उनसे दूरसंचार मंत्रालय ले लिया गया और उसका

जिम्मा कनिमोझी के करीबी समझे जाने वाले ए राजा

को दे दिया गया। तेज तर्रार तो दयानिधि मारन भी

काफी माने जाते थे, लेकिन कनिमोझी की निगाह में ए

राजा ज्यादा कुशल थे। कनिमोझी और ए राजा की इस

नजदीकी ने दिल्ली से लेकर चेन्नई तक जो गुल खिलाए

वह अब जगजाहिर है। लेकिन इस दौरान दयानिधि मारन

से उसकी प्रतिस्पर्धा के चलते भी उन्हें साहित्य के

बजाय आर्थिक विरासत संभालने पर मजबूर होना पड़ा।

वह होड़ थी सन टीवी और कलैगार टीवी की। सन टीवी

को दयानिधि मारन संभाल रहे थे और उसी की होड़ में

कलैगार टीवी शुरू किया गया। हालांकि कलैगार टीवी

कभी भी सन टीवी का मुकाबला नहीं कर पाया लेकिन

इस कोशिश में वह लगा जरूर रहा। टू-जी घोटाले का एक

सबक यह भी है कि किस तरह से राजनीति और मीडिया

की होड़ में अच्छी खबरें निकलने और अच्छा काम

होने के बजाय बड़े-बड़े घोटाले हो जाया करते हैं। डीबी

रियल्टी के 200 करोड़ रुपए लगाए जाने के तथ्य को तो

कनिमोझी स्वीकार करती हैं, लेकिन वे उसे कर्ज के तौर

पर मानती हैं।
वे उस पर आयकर भी दिखा रही हैं और

यह भी दावा कर रही हैं कि उसे वापस कर दिया गया है।

कनिमोझी करुणानिधि की तीसरे नंबर की पत्नी

रजतिअम्माल की बेटी हैं। आज परिवार में वे अकेली

पड़ती जा रही हैं। भले ही करुणानिधि उनका कानूनी

तौर पर बचाव करने का दावा कर रहे हैं लेकिन उनके

राजनीतिक बचाव के लिए न तो पार्टी आगे आ रही है

न ही परिवार। उधर कनिमोझी के प्रतिव्दंव्दीं दयानिधि

मारन इस कार्रवाई से बहुत खुश हैं।

राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और घोटाले ने कनिमोझी के

राजनीतिक व्यक्तित्व और छवि को काफी नुकसान

पहुंचाया है। जिस दिन देश के प्रमुख टीवी चैनलों में

उनका नाम चार्जशीट में शामिल किए जाने की खबर

चल रही थी और तमिलनाडु में भी उनके विरोधी चैनल

उसे चिल्ला चिल्ला कर बता रहे थे, उस दिन उनका

कलैगार चैनल मौसम की खबरें बता रहा था। उसका

कहना था कि अगले तीन दिनों तक बादल छाए रहेंगे

और बारिश होती रहेगी। निश्चित तौर पर कनिमोझी

को राजनीतिक बादलों ने घेर रखा है। देखना है कि 13

मई के बाद वे छंटते हैं या और घिरते हैं। इसी के साथ

यह भी सोचना है कि एक रचनात्मक प्रतिभा की धनी

कनिमोझी अपनी कविता और साहित्य से इस नुकसान

की कितनी भरपाई करती हैं ?

Monday, April 25, 2011

भारतीय इतिहास का एक अंश है मैकलुस्की गंज

उपन्यास ‘मैकलुस्की गंज के लिए यूके के इंदु शर्मा कथा सम्मान से सम्मानित पत्रकार और साहित्यकार विकास कुमार झा से अभिनव उपाध्याय की खास बातचीत-


- इंदु शर्मा कथा सम्मान से सम्मानित उपन्यास मैकलुस्की गंज को आप किस रूप में देखते हैं?

यह उपन्यास एंग्लो इंडियन समुदाय के बारे में है। वास्कोडिगामा जब कश्ती पर सवार होकर भारत आया तो अपने साथ कई संताप भी लेकर आया था। क्योंकि वास्कोडिगामा के आने के बाद पुर्तगालियों ने जब व्यवसाय शुरू किया और उनके मुलाजिमों के शारीरिक भूख के लिए पुर्तगाल से महिलाएं आती थी लेकिन धीरे धीरे पुर्तगाली अधिकारियों को जब यह लगा कि यह खर्चीला है तो उन्होंने भारत में ही इसका बंदोबस्त करने का आदेश दिया। सुनियोजित ढंग से यह कहा गया कि पुर्तगाली भारतीय स्त्रियों से संबंध बनाएं और बच्चे पैदा करें। इसके संदर्भ को इसमें रेखांकित किया गया है इसलिए इस उपन्यास को भारतीय इतिहास का एक अंश भी माना जा सकता है क्योंकि उसके बाद डचों और बाद में पुर्तगालियों का भी यही सिलसिला जारी रहाा। और उन्होंने भी संकर संतानों को पैदा किया। यही काम अंग्रेजों ने किया। अंग्रेजों के समय में यह सिलसिला और भी चल पड़ा। लार्ड कर्जन ने एक बार यह भी कहा था कि, ईश्वर ने अंग्रेज बनाए और उन्होंने ही इंडियन बनाए लेकिन हम लोगों ने एंग्लो इंडियन्स बनाए। उनका कहना था कि भारत में वर्ण संकर हम लोगों की देन है। इस समुदाय को शुरू में पिता का गर्व रहा। यह कहते भी थे कि हम साहबों की संतानें हैं। लेकिन अंग्रेजों ने जब चाहा इनका इस्तेमाल किया और जब चाहा इन्हें छोड़ दिया। ये अंग्रेजों के हिमायती रहे। 1934 में साइमन रिपोर्ट में कहा गया कि एंग्लो इंडियन समुदाय की जिम्मेदारी अंग्रेजों की नहीं होगी और बाद में संवैधानिक प्रावधान के अनुसार भारतीय लोक सभा में दो मेम्बर इस समुदाय से नामित किए जाते हैं और प्रदेश की राज्य सभाओं में एक मेंबर नामित किए जाते हैं।

- आप पत्रकार और साहित्यकार दोनों हैं, ये रूप एक दूसरे के लिए सहयोगी हैं या विपरीत?

पत्रकारिता हमें कांटेंट देती है। पत्रकारिता का सुभाषित है कि ‘कांटेंट इज किं गज् अगर मैटर में दम है तो आपकी खबर जोरदार है। साहित्य और पत्रकारिता को हाथ में हाथ मिलाकर चलना चाहिए और गुजरे दौर में अ™ोय, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा पत्रकार और साहित्यकार भी रहे। इन दोनों का संबंध बड़ा गहरा रहा है। पत्रकारिता का कांटेंट और साहित्य की सरलता जरूरी है। पत्रकारिता को साहित्य से संवेदना मिलती थी और साहित्य को पत्रकारिता से क च्चा माल मिलता था। जब से यह दोनों धाराएं अलग हुईं उससे पत्रकारिता और साहित्य दोनों का नुकसान हुआ। लेकिन पत्रकार होते हुए मैंने जो साहित्य की सेवा की है उससे मुङो संतोष है।
मैकलुस्की गंज उपन्यास के पात्र आपको वहां जाने पर मिल जाएंगे और वहां जाकर आप इन पात्रों से मिलकर एक सजीवता का अनुभव करेंगे। यह रीयल लाइफ नावेल है। साहित्य का काम यह है कि वह स्वप्न और सत्य को मिलाकर चले। और वही सार्थक साहित्य होगा। क्योंकि स्वप्न और सत्य जब तक एक नहीं होगा तब तक एक अच्छा साहित्य रचा नहीं जा सकता।
लेकिन पत्रकार को वर्तमान में मुख्य धारा का साहित्यकार नहीं माना जाता है?
हाशिए में फिट करने वाली जो परंपरा रही है उसे बाजारवाद ने उछाला है। अन्यथा बहुत से पत्रकार साहित्यकार हुए हैं। आज बाजारवादी दौर में जब ब्रैंडिंग हो रही है तो यह सवाल खड़े कर रही है। लैटिन अमेरिकी लेखक गैबियल गार्सिया मारकेज जिसने ‘100 इयर्स ऑफ सालिट्युड नामक किताब लिखी वह भी पहले अपने को पत्रकार बाद में साहित्यकार मानते हैं।

लेकिन आपके निकट क्या है, साहित्य या पत्रकारिता?

पत्रकारिता और साहित्य मेरे शरीर के दो फेफड़े हैं जो आवश्यक हैं। यह दो आंख, पांव की तरह है जो सहयोगी हैं इसलिए यह तय करना मुश्किल है।

आप पत्रकारिता और साहित्य में आ रहे बदलाव को किस तरह से देखते हैं?

आज पत्रकारिता और साहित्य दोनों ही बहुत दुर्भाग्यपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। कभी पत्रकार जंगल के शेर की तरह गरजता था आज वह सर्कस के शेर की तरह रिंग मार्स्टर के चाबुक के इशारे पर स्टूल पर जाकर बैठ जाता है। पहले साहित्यकार एक से एक अदभुत रचनाएं देते थे कि समाज में किस तरह से बदलाव होगा। लेकिन आज वह यह देखते हैं कि उन्हें किस तरह से लिखने पर अधिक कमाई होगी। अब दौर बदल रहा है। द गॉड ऑफ स्माल थिंग के लिए अरुधंती राय को करोड़ो रुपए मिले इसलिए वह पढ़ा जाय न कि वह एक अच्छा उपन्यास है इसलिए। इसी तरह मैकलुस्की गंज को इसलिए पढ़ा जाय कि उसे यूके का सम्मान मिला है इसलिए नहीं कि लेखक ने 15 वर्षो की मेहनत इसके लिए की है। यह बाजार वाद का प्रभाव है उसने साहित्य और पत्रकारिता को बुरी तरह से कुचला है। जिस देश या समाज में साहित्य और पत्रकारिता का पतन कराया जाएगा उसे बंदी और बिकाऊ बनाया जाएगा तो उस देश का और समाज का बहुत अहित होगा। उस देश का भविष्य अंधकारमय है।

Sunday, April 10, 2011

आईपीएल नहीं अन्ना चाहिए

अभिनव उपाध्याय
भारत में क्रिकेट एक चस्का है लेकिन कब तक? इस सवाल का जबाब आपको जंतर मंतर पर अन्ना के समर्थन में उतरे युवाओं से मिला। क्रिकेट के बुखार से तपता युवा अब अन्ना के समर्थन में अप्रैल की धूप में तपता रहा। वह गला फाड़-फाड़ कर कहता रहा- ‘अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं। अन्ना के सर्मथन में युवाओं ने अलग-अलग रूप से अपने को अभिव्यक्त किया। कोई नाचा, कोई ताली बजाता रहा और कुछ लोग झंडा लहराते रहे। ऐसा लगता रहा कि देश का युवा अन्ना के इस यज्ञ में अपनी आहुति देना चाहता है।

जामिया मिलिया इस्लामिया में बीबीए द्वितीय वर्ष का छात्र हेनरी अपनी बांह पर ‘नो टाइम फार आईपीएल, इट्स अन्ना टाइमज् लिखकर अन्ना के समर्थन में जंतर-मंतर पर घूम-घूम कर लोगों को प्रोत्साहित किया। भ्रष्टाचार के खिलाफ, अपने अधिकार के लिए। उसका कहना है कि अन्ना के लिए यह केवल उसकी अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि उसका और उसके साथ कुछ और लोग हैं जिन्हे आज आईपीएल से अधिक अन्ना की जरूरत है। क्योंकि क्रिकेट से पहले देश है। जब भारत वर्ल्ड कप जीतता है तो पचास हजार लोग इंडिया गेट पर आ सकते हैं तो देश के लिए क्यों नहीं? क्या युवाओं में यह बदलाव जेपी के आंदोलन जसा नहीं लगता? अब युवा आगे आ रहा है, देश का भावी कर्णधार आगे आ रहा है, और बदलाव के लिए हमेशा युवा ही आगे आया है। हां, माध्यम गांधी, जेपी या अन्ना हो सकते हैं।

शुक्रिया अन्ना हजारे

अन्ना हजारे ने जिस तरह केंद्र सरकार को जन लोकपाल विधेयक के मसले पर रक्षात्मक तेवर अपनाने पर मजबूर कर दिया है ह उतनी बड़ी बात नहीं है। उससे बड़ी बात है कि अन्ना ने देश की जनता के दिल
में एक जज्बा पैदा कर दिया। और यह भी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ एक नई राष्ट्रीय चेतना जगी है।
रविन्द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट




जंतर-मंतर रोड कोई बड़ा मैदान नहीं है। अन्ना हजारे जहां बैठे और जहां लोगों का काफिला आता जाता रहा, एक छोटी सी जगह है। एक चौड़ी सड़क और उसके दोनों तरफ फुटपाथ। एक फुटपाथ पर अन्ना और उनके सहयोगी अनशनकारी बैठे और सामने सड़क पर जनता का हुजूम। दिल्ली और देश के अलग-अलग इलाकों के लोग। बच्चे भी, युवा भी। हिंदू भी, मुस्लिम भी, ईसाई भी। जंतर-मंतर नाम की यह सड़क एक ऐतिहासिक लम्हे की साक्षी बन गई। यहां से सत्ता को चुनौती दी गई। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक छोटे से गांव रालेगन सिद्धि का एक तपस्वी सिर्फ मनमोहन सिंह की सरकार के सामने प्रश्न चिन्ह बनकर नहीं खड़ा हो गया बल्कि देश की जनता की इच्छाओं का प्रतीक भी
बन गया।
सात नंबर की जिस जंतर-मंतर की कोठी के सामने अन्ना ने आमरण अनशन किया, ह कभी सत्ता का प्रतीक भी हुआ करता था। आजादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस का दफ्तर था। 1969 में जब यह कांग्रेस का विभाजन हुआ तो यह संगठन कांग्रेस का दफ्तर बना जिसके नेता मोरारजी देसाई और निजलिंगप्पा थे। आठ साल तक एक पिक्षी पार्टी का दफ्तर रहने के दौरान इसके पेड़ों के पत्ते सूख गए। लेकिन सन् 1977 में फिर से यहां सत्ता की हरियाली लौटी, जब यह जनता पार्टी का दफ्तर बना। 1977 में संगठन कांग्रेस का जनता पार्टी में लिय हो गया। आजकल यहां इसी कोठी में जनता दल (एकीकृत) का दफ्तर है। इस नाते थोड़ी राजनैतिक पहल यहां रहती थी। पर पिछले चार दिन से यह सड़क और स्थान राष्ट्रीय जनउभार का केंद्र बन गया।
आंदोलन में कई ऐसे लोग शामिल हुए जिनको 1974 की याद होगी। जय प्रकाश नारायण के नेतृत् में जब बिहार के छात्र आंदोलन की शुरुआत हुई थी तो पटना का गांधी मैदान भरा था। उसी आंदोलन की चिनगारी ने ऐसा रूप धारण किया कि 1975 में देश में आपातकाल लगा और 1977 में इंदिरा गांधी की पराजय हुई और केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी। आज की तारीख में बहुतों के मन में यह प्रश्न हैं कि क्या अन्ना के नेतत्व में इतिहास फिर दुहराने जा रहा है? उत्तर अभी नहीं मिलेगा। वह भविष्य के गर्भ में है।
इसमें तो कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि आज देश में भ्रष्टाचार 1974 से भी ज्यादा फैल चुका है। राजनैतिक भ्रष्टाचार भी बढ़ा है और नौकरशाही सरकारी दफ्तरों में भी भ्रष्टाचार कम नहीं है। यही नहीं बीस-तीस साल तक जो भ्रष्टाचार अधिकतम लाखों का होता था, अब अरबों का होने लगा है। हर राज्य में और केंद्र में भी भ्रष्टाचार के नए-नए किस्से सामने आ रहे हैं। पहले भ्रष्टाचार के आरोपों से सिर्फ कांग्रेसी सरकारें घिरी रहती थीं। आज लगभग हर पार्टी की सरकारों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक आदमी अपने आप को बेबस महसूस कर रहा है। आकस्मिक नहीं कि देश के कोने-कोने में अन्ना के समर्थन में जलूस निकले, सभाएं हुई और लोग धरने पर बैठे। जंतर-मंतर गांधी मैदान की तुलना में छोटा है। लेकिन, अन्ना का संदेश जय प्रकाश नारायण आंदोलन से ज्यादा तेजी से फैला। सिर्फ चार दिन के भीतर देश के बाल, वृद्ध नारी युवा इससे जुड़े।
यह ठीक कि आज का समय 1974 से काफी अलग है। आज टी चैनलों की जह से किसी आंदोलन के प्रसार में तेजी आ जाती है। इसके अलावा फेसबुक, ट्टिर और दूसरे सोशल नेटर्किंग साइट हैं, जो संदेश को तेजी से फैलाते हैं। अन्ना के अनशन की खबर भी इस कारण अनपेक्षित तीव्रता से फैली। लेकिन इसी का दूसरा पहलू ये भी हैं कि नया मीडिया सबको उपलब्ध है, सिर्फ अन्ना के समर्थकों को नहीं। राजनैतिक पार्टियां भी नए मीडिया का भरपूर उपयोग करती हैं। अगर टेलीजिन नहीं होता तो, क्या क्रिकेट का इस तरह प्रसार-प्रचार होता? क्या टेलीजिन और मीडिया के दूसरे माध्यमों का सामाजिक दायित् नहीं है? अगर नया मीडिया अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभा रहा है तो फिर इस पर सालिया निशान क्यों लगाया जा रहा है?
अब देखें कि अन्ना का संघर्ष यहीं थमता है कि आगे बढ़ता है। अगर यह आंदोलन समझौते के बाद थम जाता है तो उस जनउभार का क्या होगा, जो पूरे देश में फैला। यह सवाल अन्ना के मन में भी उठ रहा होगा।

Sunday, March 27, 2011

लीबियाः आजादी की उड़ान से पहले



अरुण कुमार त्रिपाठी
ट्यूनीशिया से शुरू हुई अरब देशों की लोकतात्रिक क्रांति लीबिया में आकर त्रिशंकु बन गई है। लीबिया की जनता ने कर्नल मुअम्मर गद्दाफी की तानाशाही से आजाद होकर लोकतांत्रिक आकाश में उड़ान भरनी चाही थी, लेकिन उसका इरादा सफल होता इससे पहले उसे युद्ध का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ मार्क्सवादी मुहावरा बोलते हुए जनता का दमन करने वाले कर्नल गद्दाफी और उनकी प्रशिक्षित सेना है तो दूसरी तरफ वकील, प्रोफेसर, इंजीनियर,पूर्व राजनेता और कुछ सैन्य अधिकारी हैं। इस बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के तहत गद्दाफी की सेना पर बमबारी करने वाली अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी सेनाएं हैं। नेशनल ट्रांजिशन कौंसिल के नेतृत्व में संघर्ष कर रही जनता ने नो फ्लाई जोन के प्रस्ताव की मांग तो की थी लेकिन अब उसके भीतर काम करने वाले साम्राज्यवाद विरोधी समूहों को एक नए शिकंजे में फंसने का अहसास भी हो रहा है। उन्हें चिंता यह है कि यह लड़ाई आखिरकार जनता की आजादी के पक्ष में जाने के बजाय तेल के प्यासे पश्चिमी देशों की तरफ जा सकती है।
हालांकि अभी वे इसे गद्दाफी की सेना की बमबारी में जनता के मारे जाने से बेहतर विकल्प समझ रहे हैं। पर आगे कुंआ और पीछे खाई वाली इस स्थिति में कौन बेहतर होगा यह तो समय ही बताएगा। इस तरह की दुविधा लीबिया की जनता के बीच ही नहीं भारत जैसे दुनिया के उन तमाम देशों के भीतर भी है जो पश्चिमी देशों से बिगाड़ भी नहीं करना चाहते और अरब देशों के बारे में अपनी अलग विदेश नीति भी चाहते हैं। वह दुविधा उस समय भी नजर आई जब सुरक्षा परिषद में नो-फ्लाई जोन के प्रस्ताव पर मतदान हुआ। इस प्रस्ताव पर दक्षिण अफ्रीका सहित ब्राजील, भारत, रूस और चीन ने मतदान नहीं किया। यही वजह है कि गद्दाफी के समर्थकों ने अपने प्रदर्शनों में इन देशों को धन्यवाद भी दिया। दरअसल यह देश वैश्विक शक्तियों के माध्यम से गद्दाफी और विद्रोही जनता के बीच बातचीत चाहते थे। उनकी दलील थी कि नो-फ्लाई जोन का प्रस्ताव लागू करने के बाद होने वाली बमबारी से खून खराबा बढ़ेगा और जनता के विद्रोह का पूरा मकसद खत्म हो जाएगा। नो-फ्लाई जोन के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि शुरू में इराक में इसी तरह का हस्तक्षेप किया गया था। पर जब उसका समाधान नहीं निकला तो इससे भी बेहतर परिणाम निकलने की उम्मीद नहीं बनती। उल्टे अगर गद्दाफी सद्दाम हुसैन की गति को प्राप्त करते हैं तो इससे अलकायदा जैसे कट्टरपंथी संगठनों को मजबूत होने का और मौका मिलेगा।
लेकिन भारत, चीन और रूस जैसे देशों के इस नजरिए को एक तरह के पाखंड की भी संज्ञा दी जा रही है। विशेषकर भारतीय विदेश नीति को अमेरिका की ओर ढकेलने को उत्सुक नीति निर्माता भारत की प्रतिक्रिया को कायराना और ढकोसलापूर्ण बता रहे हैं। दलील यह है कि अगर भारत इस हमले के खिलाफ था तो उसे सुरक्षा परिषद में पेश प्रस्ताव पर मतदान का बायकाट करने के बजाय उसका सीधे विरोध करना था। लेकिन वह न तो अमेरिका का बुरा बनना चाहता है न ही गद्दाफी का। एक तरह से यह निर्गुट आंदोलन की नीतियों का बचा हुआ प्रभाव है जिसके जाल से भारत मुक्त नहीं हो पा रहा है।
नो फ्लाई जोन के बहाने हो रही बहस में इसी तरह के ढकोसले का आरोप रूस और चीन जैसे वीटो अधिकार संपन्न देशों पर भी लगाया जा रहा है।


अगर वे चाहते तो नो फ्लाई जोन के प्रस्ताव को वीटो कर सकते थे। इसी के साथ यह सवाल भी प्रमुख है कि नागरिकों पर तानाशाही सत्ता के दमन को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कब और कितने बल प्रयोग की इजाजत दी जा सकती है ? यह सही है कि लीबिया में जो स्थितयां बन गई थीं उसमें गद्दाफी के नागरिक दमन को रोकने के लिए इसके अलावा कोई चारा नहीं दिख रहा था। इसके बावजूद यह खतरा तो बना ही हुआ है कि पिछले दो दशकों में अरब और इस्लामी देशों में लगातार हस्तक्षेप करने वाला अमेरिका ऐसी ही दलीलों का सहारा लेता रहा है। भविष्य में जब उसे ईरान में हस्तक्षेप करना होगा तब भी वह ऐसा ही करेगा।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून और नो फ्लाई जोन पर बहसों के बहाने उन स्थितियों को भुलाया नहीं जा सकता जिसका सामना लीबिया की जनता कर रही है। भारत, चीन और रूस सहित दुनिया के तमाम देशों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे आंदोलनकारी जनता के साथ एकजुटता बनाए रखें। लीबिया की जनता पिछले चालीस सालों से तेल और तानाशाही और अमेरिका बनाम अरब राष्ट्रवाद की चाहरदीवारी में कैद रही है। उसे समृद्धि और सुख सुविधा भले मिली हो लेकिन अपनी इच्छा के मुताबिक लोकतंत्र की खुली हवा में सांस लेने का अवसर नहीं मिला है। इसलिए इस लड़ाई को पश्चिमी देशों की जरूरत बताना उनके साथ अन्याय होगा।
नेशनल ट्रांजिशन कौंसिल को संचालित करने वाले लोग किसी वैचारिक आग्रह से नहीं बंधे हैं और न ही उनका लंबा प्रशासनिक अनुभव है। इस कौंसिल के अध्यक्ष मुस्तफा अब्दुल जलील गद्दाफी सरकार में न्यायमंत्री रहे हैं। इस दौरान और इससे पहले जज रहते हुए वे सुरक्षा बलों के दमन का विरोध और मानवाधिकार का समर्थन करते रहे हैं। इस परिषद में भारत में लीबिया के पूर्व राज्यपाल अली इसावी भी हैं और सुधारवादी नेता मोहम्मद जिबरील भी। उनके अलावा अब्दुल हफीज घोघा जैसे बेंगाजी बार एसोसिशन के आंदोलन से निकले वकील हैं, जो इस आंदोलन के प्रवक्ता हैं।
आरंभ से ही गद्दाफी का दमन झेल रहे नागरिक समाज के ये लोग पश्चिम के विरोधी नहीं पर उससे पहले अपने देश के लिए समर्पित हैं। उन्हें मजबूरी में उनका समर्थन लेना पड़ा है। पूरी दुनिया की कोशिश यही होनी चाहिए कि इस लड़ाई को जीतने का श्रेय उन्हीं को मिले। उसके लिए जरूरी है कि उड़ने और गिरने के बीच फंसी लीबिया की इस त्रिशंकु जनक्रांति का कोई हल निकले।

Sunday, February 13, 2011

बिछड़े हुए काबा के सनम

मनोहर नायक

आज के फैज अहमद फैज की जन्मशती शुरू को रही है। बंटवारे के बावजूद हिंदुस्तान और पाकिस्तान के अवाम के दिल को छूने वाले इस शायर को आज दोनों मुल्कों में याद किया जा रहा है। यहां फैज की इलाहाबाद में फिराक़ गोरखपुरी से हुई मुलाकात के वृतांत के बहाने उनकी याद।



रघुपति सहाय फिराक़ तो पहले ही फरमा चुके थे कि ‘आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हम असरो/ जब तुम कहोगे हमने फिराक़ को देखा था। ज् इलाहाबाद में अखबार में काम करते हुए फिराक़ साहब से एक मुलाकात हो चुकी थी जिसका बखान कर दूसरों को ईष्र्या में डाला जा सकता था। कहते हैं कि भरत जब राम को मनाने चित्रकूट जा रहे थे तब रास्ते में प्रयागराज में भारद्वाज आश्रम रुके। वहां भारद्वाज मुनि ने उनसे कहा था कि मेरे पूर्व जन्मों के पुण्यों का फल यह था कि मुङो राम के दर्शन हुए और राम के दर्शन के प्रताप से अब तुम्हारे दर्शन हुए। अब फिराक़ साहब से मिलने में पुण्य का कोई दांया-बांया हाथ था कि नहीं, मैं नहीं जानता पर बेशक फिराक़ से मिल पाने का पुण्य-लाभ यह जरूर मिला कि फैज अहमद फैज से मिलना नसीब हुआ। शायरी में थोड़ी-बहुत दिलचस्पी थी और फैज का दिल में बड़ा मान था। मान तो फिराक़ का भी था, लेकिन उनकी छवि एक ‘उस्तादज् की रही। उन पर हजारहा किस्से थे और उनका एक आतंक भी था जिस कारण पांच साल में दो बार, वह भी उनके अंत-अंत में ही, मिलना हुआ। फैज का भी उस्तादाना कमाल बेमिसाल था। कुछ गिनने वाले तो पांच ही को उस्ताद मानते हैं, मीर अनीस, मीर तक़ी मीर, मिज़्रा ग़ालिब, अल्लामा इक़बाल और फैज अहमद फैज। असद चचा के भी अपन जबर्दस्त भक्त हैं पर अपने से फैज जसी करीबी शायद इन उस्तादों में से किसी को भी नसीब नहीं हुई। यह फैज की कविता थी जो करीब से करीबतर होती गई। उनसे जब 1982 में इकलौती बार मिला। तब उनका दर्जा दिल में ‘हीरोज् का था। इमर्जेसी के समय उनकी नमें-ग़ज़लें ऐसी लगती थीं जसे इस देश और जनता की आपबीती कह रही हों।
फैज से मिलने में फिराक़ साहब का पुण्य-प्रताप यह था कि यह मिलना उन्हीं के बैंक रोड वाले विश्वविद्यालय के आवास पर हुआ। फैज भारत आए थे और दो दिन इलाहाबाद में मुकाम था। बाकायदा जश्ने फैज कमेटी बनी थी जिसके अध्यक्ष त्रिपाठीजी देवी प्रसाद थे, जो उन दिनों विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र पढ़ा रहे थे। एक दिन पहले ही उन्होंने बता दिया था कि सुबह दस बजे पहुंच जाना फैज फिराक़ से मिलने जाएंगे। बेहद उतावला मैं थोड़े पहले ही पहुंच गया और पाया कि फिराक़ साहब जोकि, कुछ समय पहले उनके जन्मदिन पर जब मैं उनसे मिला था तो बेहद उदास और शिकस्त नज़र आए थे, आज कतई चमक रहे थे। नया कुर्ता पहन रखा था और बेसब्री से फैज का इंतजार करते हुए दो-एक लोगों से बतिया रहे थे। वे बेहद खुश थे और चहक रहे थे। मसलन, लखनऊ में उर्दू के सवाल पर एक ने उनकी तकरीर की तारीफ की तो बोले, ‘अ गुड आरेटरी इज नेवर डिफीटिडज् फिर रुक कर कहा, ‘आरेटरी इज हारलेट ऑफ फाइन आर्ट्सज् (वक्तृता ललित कलाओं की हरजाई है)। तभी कुछ महिला-पुरुषों के साथ फैज नमूदार हुए।
दरवाजे से ही तपाक से दोनों हाथ फिराक़ की ओर बढ़ाये वे उनके पास पहुंचे और उनके हाथों को थाम कर कहा,‘मैं तो यहां पहले भी आ चुका हूं।ज् निश्चित ही आये ही होंगे क्योंकि, 1954 में रिटायर होने के बाद भी फिराक़ ने वह क्वार्टर छोड़ा ही नहीं था। फैज़ अपनी मशहूर चुप्पी के साथ ही यहां मौजूद थे। बोल फिराक़ ही रहे थे, फैज बीच मैं एकाध वाक्य बोल देते। फिराक़ ने तुलसीदास के ‘शेर ‘घन घमंड नभ गजरत घोराज् सुनाकर कहा, चालीस साल तक यह बात समझ नहीं आयी कि सीता राम की ताक़त थीं। मैं उन्हें डरपोक वगैरा मानता रहा। फिर एक और चौपाई इस तारीफ के साथ कि, क्या उपमा दी है, सुनायी। किसी महिला ने तुलना में मीर का शेर कहा तो उसे डपट दिया कि, ‘मीर का नहीं है यारों ने लिख दिया है।ज् पर फिर कि ,‘फिराक़ साहब दीवान में तो मिलता है,ज् ‘तो क्या यारों ने डाल दिया होगा।ज् फिर कुछ उर्दू, कुछ मुल्लाओं के द्वारा उसकी शामत पर बात हुई। फैज ने कहा,‘हमें एक मौलानाजी ग़ालिब पढ़ाते। हर शेर पर कहते आगे बढ़ो बड़ा बेअदबी का शेर है।ज् फिराक ने इस पर हाथ उठाकर जोर से ‘अल्ला हो कहा। दस-पंद्रह मिनट की इस मुलाकात का समापन फिराक़ ने इस इसरार से हुआ कि फैज कुछ सुनाओ। फैज ने बेहद संकोच से कहा,‘आपको में क्या सुनाऊं। आप ही सुनाइये।ज् फिराक ने फौरन ‘अब तो अक्सर चुप चुप से रहे हैंज् ग़ज़्ाल के कुछ शेर सुनाये। फैज ने काफी वाह-वा की, पर अब उनकी बारी थी। फिराक़ ने फिर फरमाइश कर दी थी तो फैा ने ‘ए दिल मेरे मुसाफि़रज् नज़्म सुनायी। फिराक़ ने अचानक कहा,‘फैज तुम हिंदुस्तान चले आओ। फैज कुछ नहीं बोले, कुछ देर गहरी खामोशी रही, जो फिराक़ ने ही यह कहते हुए तोड़ी कि,फैज किसी अंग्रेजी क्रिटिक ने जो बात कही है वह तुम पर पूरी तरह चस्पां होती है- ‘ही रोट लाइक अ पोएट, व्हाट ही फेल्ट लाइक ए मैन।ज्
दूसरे दिन हिंदुस्तानी अकादमी में उनका सम्मान था। तबकी दुबली-पतली शुभा मुदगल ने फैज को उनकी शायरी सुनायी, फिर फैज ने अपना कलाम पढ़ा। बाहर निकलते हुए मैंने कहा कि इंटरव्यू लेना है, तो हंस दिये कि समय नहीं है। फिर शायद मुङो मायूस देखकर कहा, दो घंटे बाद होटल आ जाना, वहां तो नहीं पर कार में अगर जगह हुई तो बैठ जाना, तभी बात कर लेंगे। मैं पहुंच गया। कार में जगह नहीं थी पर इशारा पाकर मैं पिछली सीट पर ठस गया। फैज को कई जगह जाना था। ज्यादातर बात उन्हीं की अन्य साथ वालों से होती रही। कुछ बातें मैंने भी पूछीं। लिखने का कोई मौका ही नहीं था। फिर भी फिराक़ के हिंदुस्तान आ जाने वाले सवाल पर उन्होंने कहा, उनसे मैं क्या कहता। पर अखबारों में यह बात आयी है। आप लोग ये क्यों नहीं सोचते कि घर अगर जेल है तो भी है तो घर ही। उसे वहीं रहकर घर तो बनाना होगा। मैंने उनसे वही नज़्म सुनाने की फर्माइश कर दी ‘जो फिराक़ साहब को सुनायी थी।ज् उन्होंने तुरंत सुनायी। एक अटपटा सा सवाल पूछा, हालांकि किसी पाकिस्तान के आलोचक के हवाले से कि, आपके साथ इतनी चीजें जुड़ी हुई हैं, मसलन अंग्रेजी-अरबी में एम ए, प्रोफेसर, सेना में लेफ्टीनेंट कर्नल, अंग्रेजी अखबार के संपादक, रावलपिंडी केस के अभियुक्त आदि। इस प्रभामंडल के कारण आप बड़े कवि भी हो गये। फैज ने मुस्कुराकर कहा कि जिंदगी के अलग-अलग दौर में मैं यह सब था। मैंने भी पढ़ाई की, नौकरी की। फिर सोच-विचार बढ़ा, उसके हिसाब से जो सही लगा वह किया। पर मैं अंत में एक अदद शायर ही हूं। तुम भी मुझसे इसीलिये ही तो बात कर रहे हो। इस मुलाकात का समापन इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुआ जहां भारी हुजूम के बीच फैज का अभिनंदन हुआ। मंच पर फिराक़, महादेवी ,अश्कजी और अमृतराय भी थे। फिराक़ ने फैज को हिंदुस्तानी तहज़्ाीब का शायर बताते हुए कहा कि उनकी शायरी क्रांति का नगाड़ा नहीं बजाती वह हमें शाइस्तगी से मुतास्सिर करती है। उनकी शायरी में एक पुराने पीपल के पेड़ के नये पत्ते जसी चमक है। उन्होंने ‘कुछ उस फज़्ाां कुछ हसरते परवाज़्ा की बातें करोज् ग़ज़ल भी सुनायी।
फैज आज निन्यानबे साल के होते। आज से उनका जन्मशती वर्ष शुरू हो रहा है। उन्हें गये भी कई बरस हो गये पर उनकी शायरी आज के कठिन और पराजित समय में हमारे और भी करीब है हमें ताक़त और भरोसा देती हुई। एक ‘अजनबी खाक से धुंधला गए निशानों कोज् उजागर करती हुई।
फैज ने शायरी की काया पलट दी। नयी भाषा में नये ख्याल लाये पर अपना नाता बहुत सोच समझकर परंपरा से भी कायम रखा। एक नयी राह ईजाद की। उनका एक शेर है, ‘ऐसे नांदा न थे जां से गुज़्ार जाने वाले/ नासेहो, पन्दगरो रहगुज़र तो देखो।ज् ‘कू-ए यार से सू-ए दारज् तक की इस राह में वे और उनकी शायरी मौहब्बत और इंक़लाब की जुस्तजू करती चलती है। उनकी शायरी में ये दोनों एहसास इस शिद्दत से घुलमिले हैं, एक-दूसरे के पर्याय की तरह। जब वे कहते हैं कि ‘एक ख़ुशबू बदलती रही पैरहन/ एक तस्वीर रात भर गाती रहीज् तो प्रेम और परिवर्तन की आकांक्षा ही कई रंग-रूपों में महकती- गाती रहती है। तमाम आशाएं और इच्छाएं इन्हीं के सबब से हैं: ‘एक उम्मीद से दिल बहलता रहा/ एक तमन्ना सताती रही रात भर। यह उनका कमाल है कि तमाम इंकलाबों के बाद भी उनके बेशुमार प्रशंसकों के दिलों में ‘उस ग़म की सरदारीज् बनी रहती है। और वह शायरी हमारे एकदम पास आकर हमें दिलासा और भरोसा देती है। अभी हमने जनता का अभिक्रम मिस्र में देखा, और वे अपनी शायरी के साथ बहुत याद आए। उस पर भी बात बनती नहीं फैज का कुछ कहे बगैर। वे हमारे सबसे करीब हैं और संकटों के इस लंबे सिलसिले में हमेशा रहेंगे।

Tuesday, January 18, 2011

बदहाल खेती से भड़के गुर्जर

सत्येन्द्र सिंह
वही हुआ, जिसका अनुमान था। फिर झुक गया गुर्जर नेतृतव। 2007 और 2008 में भी ऐसा ही हुआ था। लेकिन तब और अब में कुछ अंतर रहा। उस समय उनका आंदोलन काफी उग्र था। न केवल रेल और सड़क यातायात में व्यधान उपस्थित हुआ था, बल्कि कई लोगों की जान भी चली गई थी। इस बार यह उग्र नहीं था। कहा जा सकता है कि दोनों पक्षों -सरकार और आंदोलनकर्ता- ने अपने पिछले अनुभ से कुछ सीखा। फिर भी गुर्जर नेतृत् कुछ खास अर्जित नहीं कर सका। फिलहाल सरकार जो चाहती थी, वैसा ही हुआ। ऐसा लगता है कि वर्तमान अशोक गहलोत सरकार पूर्ववर्ती वसुंधरा राजे सरकार की तुलना में गुर्जर आंदोलन की प्रकृति को बेहतर ढंग से समझ चुकी थी। उसने ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की, जिससे गुर्जर भड़कें। उन्होंने गुर्जरों को रेल पटरी पर थकाने की रणनीति अपनाई। किसी भी आंदोलन के लंबे समय तक चलने पर उसमें हताशा और फूट पैदा होने लगती है। फिर खेती-बारी करने वाले लंबे समय तक धरना-प्रदर्शन नहीं कर सकते। दूसरी ओर सरकार को आर्थिक नुकसान के अलावा कोई और परेशानी नहीं थी। गुर्जर नेता कर्नल किरोडी सिंह बैंसला को भी इन बातों का अहसास रहा होगा, अन्यथा 17 दिन तक रेल पटरी पर जमे रहने के बाद इस तरह का समझौता करने का कोई ठोस कारण नजर नहीं आता। इसमें उन्हें अपने समाज के भीतर अपना चेहरा छिपाने का एक बहाना भी मिल जाता। साल उठता है कि क्या गुर्जर हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं? इसकी क्या गारंटी है कि सरकार मौजूदा समझौते के तहत उनके हिसाब से कार्राई करेगी ? गौरतलब है कि मार्च 2010 में गुर्जरों और सरकार के बीच एक समझौता हुआ था। इसके अनुपालन को लेकर गुर्जरों की शिकायत रही थी।
कानूनी पेंचीदगियों के मद्देनजर राजस्थान सरकार के लिए गुर्जरों को तुष्ट करना आसान नहीं होगा। फिर राजस्थान उच्च न्यायालय का फैसला भी गुर्जरों के अनुकूल नहीं रहा। आगे क्या होगा, अभी कहना कठिन है। न केवल आरक्षण की अधिकतम सीमा को लेकर पेंच है, बल्कि विशेष पिछड़ा वर्ग के तहत गुर्जरों को दिए जाने वाले आरक्षण के औचित्य पर भी सवाल खड़ा हो चुका है। अगर गुर्जरों की मांग पूरी नहीं हो पाती है, तो क्या े फिर सड़क पर उतर आएंगे? आखिर गुर्जर बार-बार सड़क पर क्यों उतर आते हैं? क्या उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति बहुत खराब है? क्या राजस्थान की बाकी पिछड़ी जातियों की हालत गुर्जरों की अपेक्षा ठीक है? यह साल गहन सामाजिक श्लिेषण की तलाश करता है। पहली नजर में यह आरक्षण प्राप्त जातियों की आपसी प्रतिस्पर्धा का नतीजा लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से कुछ प्रतिद्वंद्वी जातियों के आसपास होते हुए भी प्रशासन में गुर्जरों की भागीदारी उनकी अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। इस लिहाज से अनुसूचित जनजाति में शामिल मीणा समुदाय की प्रशासन में महती भागीदारी उनकी इस भूख को और बढ़ा देती है। इस अंतर्रिोध को मंडल राजनीति ने खूब उभारा। मंडल राजनीति से प्रेरित होकर राजस्थान का जाट समुदाय नब्बे के दशक में आरक्षण की मांग करने लगा था। उन्हें आरक्षण दे भी दिया गया, लेकिन सैंधानिक पेंच के मद्देनजर आरक्षण की सीमा नहीं बढ़ सकी। यह कदम पहले से आरक्षण का लाभ उठा रही पिछड़ी जातियों के हित में नहीं था, क्योंकि जाट बेहतर आर्थिक स्थिति के कारण आरक्षण का लाभ ज्यादा उठा सकते थे। सभाकि था कि गुर्जर जसी जातियां इससे प्रभाति होतीं। यहां समस्या यह थी कि अनुसूचित जनजाति की सूची में गुर्जरों को शामिल करने पर मीणा समुदाय अपने पारंपरिक लाभ से ंचित हो जाता। मीणा समुदाय ने इसका रिोध भी किया।
इस कारण प्रथम दृष्टि में गुर्जर आंदोलन का स्रूप जातीय दिखाई पड़ता है और आर्थिक पक्ष दब जाता है। इससे न केल बुनियादी मुद्दे से लोगों का ध्यान हट जाता है, बल्कि तथाकथित जातीय सर्थ की अधारणा भी प्रतिष्ठित होती है। भारतीय समाज में जाति एक ऐसी संस्था है, जिसके इर्द-गिर्द लोगों को एकजुट करने में मदद मिलती है। लेकिन इस बात को खारिज करना मुश्किल होगा कि गुर्जर आंदोलन आर्थिक सिंगति की विकृत अभिव्यक्ति है। साल उठता है कि पिछले दो दशक में राजस्थान की सरकारों ने हां की ग्रामीण अर्थव्यस्था की सेहत सुधारने पर क्या अपेक्षित ध्यान दिया है? राजस्थान की सरकारें समस्या की जड़ में जाने के बजाय उसका सतही समाधान खोजने में लगी रही हैं। ग्रामीण अर्थव्यस्था के किास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। आरक्षण उसका कारगर समाधान नहीं है।
उदारीकरण के दौर में पिछले 20 षरें में राजस्थान की अर्थव्यस्था का जिस तरीके से किास हुआ है, ह कोई सुखद संकेत नहीं है। जयपुर स्थित कि बस अध्ययन संस्थान के सुनील राय आदि शोधकर्ताओं ने राजस्थान की अर्थव्यस्था के कि बस पैटर्न का जो अध्ययन पेश किया है, उसमें ऐसे आंदोलनों के बीज की तलाश की जा सकती है। यह मूलत: आर्थिक विकास की सिंगति का नतीजा है। 2008-09 में राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) की वृद्धि दर 8 प्रतिशत रही। लेकिन जीएसडीपी में कृषि क्षेत्र का हिस्सा घटता जा रहा है। इस दशक के शुरू में यह 30 प्रतिशत था, जो अब करीब 20 प्रतिशत हो गया है। 1990-91 में राज्य के शुद्ध घरेलू उत्पाद में यह करीब 45 प्रतिशत था। दूसरी ओर राज्य की करीब दो-तिहाई आबादी खेती पर निर्भर है और खेती करनेोलों की संख्या बढ़ती जा रही है। अगर पशुपालन पर नजर डाली जाए, तो उसकी भी तस्ीर अच्छी नहीं है। अकाल के समय में पशुपालन किसानों की रोजी-रोटी का एक प्रमुख आधार होता है, कई इलाकों में कृषि से भी अधिक। राजस्थान के लिए यह और भी महत्पूर्ण है, क्योंकि हां अक्सर अकाल पड़ता रहा है। लेकिन राजस्थान में चरागाह घटते जा रहे हैं। ध्यान देने की बात है कि राजस्थान में आंदोलनरत गुर्जर समुदाय के लोगों की जीविका का प्रमुख आधार कृषि और पशुपालन ही है।
आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यस्था की जो हालत है, ही स्थिति शहरी और अद्र्घ शहरी क्षेत्र की अर्थव्यस्था का नहीं है। इनकी स्थिति बेहतर हुई है और इसका लाभ ग्रामीण क्षेत्रों को कम ही मिला। राज्य की आय में औद्योगिक क्षेत्र का हिस्सा कृषि से ज्यादा हो गया है। यह 30 प्रतिशत से अधिक बताया जा रहा है। पर्यटन और निर्माण क्षेत्र में उल्लेखनीय ृद्घि हुई। यही प्रवित्ती सेवा क्षेत्र में भी दिखाई पडृी। राज्य की आय में इसका हिस्सा सबसे अधिक (40 प्रतिशत से अधिक) हो गया। होटल व्यसाय ने उल्लेखनीय सफलता दर्ज की। लेकिन इस प्रक्रिया में लोगों को रोजगार उपलब्ध करानेोले छोटे-मोटे उद्योग-धंधे बंद होते गए। यहां तक कि कारखानों की संख्या भी घटती गई। उस पर तुर्रा यह कि प्रति कारखाना औसत मजदूरों की संख्या भी घटती गई। दुनिया को दिखाने के लिए सरकार के पास यह रहा कि राजस्थान में निेश बढ़ रहा है। खनन को छोड़ दें, तो किसी और क्षेत्र में रोजगार में ृद्घि नहीं हुई। ऐसा किास किसके हित में होगा, यह सहज ही समझा जा सकता है।
आम आदमी को लाभ पहुंचानेोला यह किास नहीं है। सभाकि था कि इसका लाभ गांों को कम ही मिलता। गांों के पढ़े-लिखे युवाओं को इन जगहों में कम ही रोजगार मिला। खास बात यह कि उनमें से बहुत से ऐसे हैं, जो गां में रहकर खेती नहंीं करना चाहते। यही अंतर्रिोध उनमें असंतोष के रूप में प्रकट हो रहा है, जो जाति के आधार पर आरक्षण जसी मांग के रूप में सामने आ रहा है। यह किसी दूसरे मुद्दे पर किसी और रूप में भी सामने आ सकता है। ह जाति गुर्जर ही नहीं, कोई और भी हो सकती है। सामान्य बुद्घि तो यही कहती है कि इसमें केल युकों को शामिल होना चाहिए था, लेकिन रोजगार कें्िरत आरक्षण के मुद्दे पर युकों के साथ बुजुगरें और महिलाओं का सड़कों पर उतरना समस्या की गहराई का सूचक है। 1857 के गंगा-यमुना दोआब के किसान गिरोह पर शोध करने बेले एरिक स्टोक्स (द पीजेंट आर्म्ड-द इंडियन रिवोल्ट आफ 1857) के अध्येता इसका अनुमान लगा सकते हैं।

(आज समाज से साभार)

Sunday, January 16, 2011

प्रवासी भारतीय अब भी नास्टेल्जिक- सुषम बेदी

न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय में हिन्दी प्राध्यापिका और प्रसिद्ध लेखिका सुषम बेदी से अभिनव उपाध्याय की बातचीत-

भारत और प्रवासी साहित्यकारों की रचनाओं में किस तरह का अंतर आप देखती हैं?

भारत से बाहर अलग-अलग समय पर लोग गए। लोग अपने समय में बंधे होते हैं। शुरू में लिखा गया साहित्य नास्टेल्जिया का लेखन था। कई लोग प्रसाद, निराला आदि को पढ़कर आए तो उसका पूरा प्रभाव उनमें दिखाई देता है। लेकिन अब भी ज्यादातर नास्टेल्जिया का साहित्य लिखा जाता है। मैं वहां रहकर वहां के लोगों के जीवन की नब्ज पकड़ती हूं। भारत में रहकर लिखने वाला भारतीयों को बेहतर और करीब से जानता है। प्रवासी लोग जल्दी खुलते नहीं हैं, वहां पर ज्यादातर साथ पढ़ने वाले लोग मिलते हैं या पब में मिलते हैं और अपने मन की ढेर सारी बातें कह डालते हैं। अन्यथा उनके मन में एक दीवार होती है जिन्हें वे फांदना नहीं चाहते।

भारत और वहां के लोगों में भाषाई अंतर नहीं है। भारत में जितना भाषा का विकास होता है उतना विदेशों में नहीं होता, क्योंकि हम भारत से ही भाषा लेकर गए हैं। हिन्दी में नई शैलियां आई हैं। हर साहित्यकार का अलग ढंग है। ज्यादातर मैं देखती हूं प्रवासी लेखकों के विषय सीमित है, भारत जितनी विविधता वहां के साहित्य में नहीं मिलती। प्रवासियों के सामाजिक, आर्थिक समझौते की समस्याएं वहां की प्रमुख समस्याएं हैं जो कहानियों में दिखती हैं। विदेश में भारतीयों के साथ एक प्रमुख समस्या है कि वह कितना भारत के मूल्यों के साथ जिएं कितना विदेशी मूल्यों के साथ, क्योंकि यहां से जो लोग जाते हैं उनमें अस्मिता का सवाल सबसे बड़ा है कि मैं क्या हूं, कौन हूं, हिन्दुस्तानी हूं या अमेरिकी हूं।
क्योंकि वहां के बच्चे अमेरिकी स्कूलों में पढ़ते हैं। अमेरिकी बच्चों के साथ खेलते हैं शादी भी करते हैं। लड़कियों के सामने डेटिंग एक अहम विषय है। वहां के अभिभावक लड़कियों को इसके लिए मना करते हैं। इससे उनमें काफी तनाव है। मेरी कई कहानियों में भी यह समस्या दिखाई देती है। बहुत पहले सोमा वीरा की कहानी में यह मुद्दे दिखाई देता था। बच्चों पर पढ़ाई के लिए भी मां-बाप दबाव डालते हैं। उनकी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। कोलम्बिया विश्वविद्यालय में भी पढ़ाई के दबाव में बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं। लड़कियों को अपनी वर्जिनिटी को बचाने के लिए बड़ी चिंता रहती है। मेरी कहानी सड़क की लय में यह चिंता भी उभरी है, इसमें मां बाप को असमंजस है कि लड़की को किस हद आजादी दें।
हिन्दी आलोचना अभी भी कविता केन्द्रित है, आपकी क्या राय है?
मैं यह मानती हूं कि हिन्दी का वर्तमान में सबसे सशक्त साहित्य कथा साहित्य है। कविता भी सशक्त है लेकिन आज यह बात नहीं। आलोचकों ने कथा साहित्य पर खूब लिखा है। प्रेमचंद से पहले कथा साहित्य नाम का था। आलोचकों का वर्ग इसे महत्व दे या न दे। लेकिन प्रवासी हिन्दी को नजरंदाज किया गया है तो इसलिए कि इसमें कम लिखा गया है। बाहर से लिखने वाले लोगों को हिन्दी का आलोचक समझ नहीं पाता कि इन्हें किस दायरे में रखा जाए इसलिए नजरंदाज कर देता है, अभी आलोचकों ने कोई ऐसी श्रेणी नहीं बनाई है।

हिन्दी के पांच बड़े कथाकार आप किसे मानती हैं?
इसका जवाब मुश्किल है, क्योंकि हिन्दी में बहुत कथाकार हैं। मुङो सबसे पहले अज्ञेय पसंद हैं, क्योंकि उनका चरित्रों की गहराई और विश्लेषण मुङो बहुत अच्छा लगता है। निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, फनीश्वरनाथ रेणु और मोहन राकेश भी हैं मुङो इनको पढ़ाने का मौका मिला। लेकिन बहुत लेखक हैं यदि किसी और दिन मुझसे कोई पूछे तो मैं शायद कुछ और नाम ले सकूं।
अभी आप नया क्या कर रही हैं?
मेरा नया उपन्यास भारतीय ज्ञानपीठ से छपा है। ‘मैंने नाता तोड़ा, ‘तान और आलाप शीर्षक से आत्मकथा लिखी है, एक और उपन्यास शुरू किया है जो वहां के जीवन की समानांतर जिंदगियां हैं उनको लेकर है।
क्या ऐसा लगता है कि 9/11 के बाद अमेरिका भाषा को लेकर सचेत हो गया है?
बिल्कुल, मैंने अपने एक लेख में शुरुआत ही इससे की है कि हिन्दी उर्दू या अन्य भाषाओं के न आने से अमेरिकीयों को बुद्धू बनाया जा सकता है इसलिए सेना ने हिन्दी, उर्दू, पश्तो, अरबी और वे भाषाएं जिसका रणनीतिक महत्व हो उस पर जोर दिया जा रहा है। अरेबिक को पढ़ाना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
विदेशों में हिन्दुस्तानी बच्चों पर हए हमलों को आप किस तरह से देखती हैं?
रंगभेद के कारण ऐसा हो रहा है। लोग अकेले लोगों को निशाना बनाते हैं। कुछ हमलों के लिए भारतीय भी जिम्मेदार हैं क्योंकि वे अलग-थलग रहते हैं। ये चीज भारत में भी है अगर हिन्दू मुसलमान में भी संपर्क हो तो यहां भी झगड़े शायद न हों।

Friday, December 24, 2010

हिंदी साहित्य में आलोचना एक निष्फल प्रयास है : उदय प्रकाश

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता वरिष्ठ साहित्यकार उदय प्रकाश से अभिनव उपाध्याय की विशेष बातचीत-

-ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी कहानी को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। अब इसके बाद आगे पाठकों के लिए क्या है?

साहित्य अकादमी का यह कदम ऐतिहासिक है। इससे पहले केवल निर्मल वर्मा के कहानी संग्रह को पुरस्कार मिला था। साहित्य में कहानी कभी भी स्वीकृत विधा नहीं रही, लेकिन कहानी बहुत ही महत्वपूर्ण विधा है। मेरा मानना है कि कहानी गद्य में कविता है। प्रेमचंद की रचना ‘गोदान एक महत्वपूर्ण उपन्यास है, लेकिन उनकी कहानियां उससे काफी आगे हैं। चेखव की कहानियों पर कई नाटक हुए हैं। ‘मोहनदासज कहानी को पुरस्कार देना ज्यूरी का साहसिक और महत्वपूर्ण कदम है। अभी हमारी दो कृतियां ‘चीना बाबा और बच्चों के लिए पहली बार एक किताब ‘चकमक आ रही है। इससे पहले बच्चों पर लिखी गई स्पेनिश में एक किताब काफी पसंद की गई थी।

-हिन्दी के अलावा कई और भाषाओं में छपने के कारण आपको एक वैश्विक पहचान मिल रही है, कै सा अनुभव रहा?

किसी भी सफलता के लिए कठिन प्रयास की जरूरत है। यह संघर्षो से हुआ है, इसके पीछे कोई तिकड़म नहीं है। लेखक दलितों से भी दलित और अल्पसंख्यकों से भी अधिक अल्पसंख्यक हैं। वह आरक्षित और उत्पीड़ित हैं। हम सब भुक्तभोगी हैं।किसी भी लेखक की रचना उसका अकेला प्रयास है। इसी प्रयास से अभी तीन और करार करने का प्रस्ताव है। अमेजोन पब्लिशर्स से भी एक करार की बात चल रही है।
-हिन्दी के विस्तार या संरक्षण में भूमिका को किस तरह से देखते हैं?

अंग्रेजी में दो शब्दावलियां है, डेमोगोगी और पेडागोगी। एक राजनीतिक शब्दावली है और दूसरे का प्रयोग शिक्षाशास्त्र के लिए इस्तेमाल किया जाता है। दोनों में हिन्दी की व्यस्तता झूठ के लिए इस्तेमाल की जाती है। हिन्दी का प्रयोग लोग अपने निजी जीवन में कम से कम करते हैं। यह जरूरत के लिए निर्मित की गई भाषा है। राजनीतिक आंदोलन और एकीकरण के लिए इसकी आवश्यकता थी। राष्ट्रवाद और बाजार हिन्दी में मौजूद रहा है और दोनों मनुष्य विरोधी हैं। लेकिन कुल मिलाकर यह हमारी भाषा है।
-आपकी रचना मोहनदास पर फिल्म भी बनी है, कितने संतुष्ट हैं आप?

मैं स्पष्ट कहना चाहता हूं कि, मैं उससे संतुष्ट नहीं हूं। निर्देशक प्रस्ताव लेकर आए थे और हमने सहमति दी लेकिन यदि पोस्ट मार्डन रूरल फिल्म बनाते तो अच्छा होता। फिल्म में चरित्रों का चयन महत्वपूर्ण होता है लेकिन इसमें न्याय नहीं हो पाया जबकि मेरे जानने वाले बहुत से कलाकार उसमें काम करने के लिए तैयार थे।
-सिनेमा के बारे में आपकी क्या राय है?

सिनेमा हिन्दी साहित्य से आगे है। हिन्दी सिनेमा ने जो विभिन्न वर्गो के किया है, कमाल का है। एक फिल्म बनाने वाले को किसी हाल में एक साहित्यकार या आलोचक से कमतर नहीं आंका जा सकता।
-अंत में, हिन्दी के आलोचकों के बारे में आपकी क्या राय है?

देखिए, मेरा मानना है कि हिन्दी में आलोचना नहीं है। यह महज एक निष्फल प्रयास है। हिन्दी गद्य 19वीं सदी की आधुनिकताओं के बीच संभव हुआ। जार्ज लुकाच ने यूरोपीय साहित्य के गहन अध्ययन के बाद कहा कि औद्योगीकरण में गद्य पैदा होता है। लेकिन हिन्दी में गहन अध्ययन का अभाव है, इसमें एक ‘एडहाकिज्म रहा है।

Thursday, November 11, 2010

गाँधी, स्मृति के झरोखे से

मनोहर नायक

ओबामा से लेकर देश के नामी और छुटभैये मूल्य-निरपेक्ष गांधी भक्तों के इस दौर में बुधवार को तीस जनवरी मार्ग स्थित गांधी स्मृति परिसर में कृष्णदेव मदान के संस्मरण सुनना व एके चेट्टियार का गांधी पर वृत्तचित्र देखना अत्यंत भावात्मक अनुभव था। गांधी की शहादत की यह स्थली वैसे भी महात्मा की यादों को जागृत कर देती है। आज जो अनुभव था वह उसे सजल कर देने वाला था। मदान या चेट्टियार का चालू अर्थ में गांधीवाद से कोई लेना-देना नहीं, लेकिन एक शब्द और दूसरे के चलचित्र से गांधी के प्रति उनका अनन्य प्रेम न सिर्फ स्पष्ट था, बल्कि हैरत में डालता और रोमांचित भी करता था।
मदान साहब इस समय छयासी बरस के हैं। जब इस जगह पर गांधीजी के सायंकालीन प्रवचनों को रिकॉर्ड करने की जिम्मेदारी उन्हें मिली, 19 सितंबर, 1947 में, तब वे चौबीस बरस के थे और ऑल इंडिया रेडियो में कार्यक्रम अधिकारी थे। रोज यह काम करना उन्होंने खुद चुना। सिर्फ तीन दिन बीच में ऐसे आए जब उन्हें इससे छुट्टी मिली, एक तो जब गांधीजी कुरुक्षेत्र गए और बाद में दो दिन उपवास पर रहे। तीस जनवरी के अभागे दिन भी वे अपने उपकरणों को साधने में व्यस्त थे। सिर्फ आंख उठाकर उस ओर देखा भर था जहां से गांधी रोज प्रार्थना स्थल तक आते थे। गांधी आते दिखे। वे अपनी तैयारी में फिर लग गए। तभी गोली चलने की आवाज आयी। पहली बार उन्होंने ध्यान नहीं दिया। दूसरी और फिर तीसरी! उन्हें अंत:प्रेरणा से वह लगा, जो हो चुका था। सामान सुरक्षित कर दो-चार मिनट में वे वहां थे। आभा-मनु के कंधों पर हाथ रखे जिस गांधी को आते देखा था, वे निष्प्राण पड़े थे।

कृष्णदेवजी ने वहां उपस्थित लोगों को गांधी में तल्लीन कर दिया। वे अत्यंत सधी वाणी और आत्मीय भाव से उस युगपुरुष को याद कर रहे थे, जिनके बिल्कुल पास बैठकर वे कई महीने रिकॉर्डिग करते रहे। वे माइक लेकर उन जगहों तक गए और सब कुछ चित्रवत बताते रहे। उन्हें आज तक पता नहीं कि वह कौन व्यक्ति था जो गांधी की पार्थिव देह को अकेले कमरे तक उठाकर ले गया। उनका अंदाज था वे बापू के प्राकृतिक चिकित्सक दिनशा मेहता थे। पर बाद में दिनशा मेहता ने बताया कि उन्हें तो बापू ने कराची भेजा हुआ था। मदानजी के दिल को जो बात उस रोज छू गयी, वह थी किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा उस जगह, जहां गांधी गिरे थे, एक छोटी मोमबत्ती जला देना, जो उस अंधकार में कंपकंपाती जलती रही।
मदान साहब ने कहा, ‘उस वक्त आज के जसा सूचना-संचार नहीं था। हादसा शाम 5.17 पर (मदानजी के अनुसार उनकी घड़ी 5.16 बजा रही थी।) हुआ। सबसे पहले माउंटबेटन आए, फिर नेहरू, फिर आजाद और फिर कुछ ही देर पहले बापू से मिलकर गए पटेल आए। और कुछ ही मिनटों में बड़ी तादाद में लोग आने शुरू हो गए। हर मिनट वे बढ़ते जा रहे थे। फिर नेहरू भीगी आंखों से कमरे से निकले। मुख्यद्वार पर आकर अपने को स्थिर किया और फिर ‘हमारे जीवन से प्रकाश चला गयाज् वाला अपना प्रसिद्ध भाषण दिया। मदान साहब ने नेहरू को ‘कवि बताते हुए वह श्रद्धांजलि फिर पढ़ी और कहा नेहरू सुबक रहे थे, पर बहते आंसुओं को वे बहने दे रहे थे।
गांधीजी का प्रवचन आधे घंटे से एकाध मिनट ज्यादा हो जाता था। साढ़े सात बजे उसका प्रसारण आठ बजे के समाचारों से ठीक पहले होता था। टेलीफोन के जरिये गांधी की वाणी आकाशवाणी के कंट्रोल रूप पहुंचती और वहां उसे रिकॉर्ड किया जाता। एक-दो मिनट का भाषण संपादित करना पड़ता। एक दिन हिम्मत कर उन्होंने सुशीला नैयर से कहा कि बापू से उनतीस मिनट बोलने को कहिए जिससे संपादित न करना पड़े। यह सुनते ही वे बिफर गयीं, बोलीं-‘तुम्हारी जुर्रत कैसे हुई उसे एडिट करने की। तुम्हें तो नौकरी से निकाल देना चाहिए। उन्होंने डायरेक्टर जनरल की भी यही मंशा बतायी तो गांधीजी की बेहद करीब रहीं सुशीलाजी ने कहा कि उन्हें भी निकाल देना चाहिए। तब एक दिन मदानजी ने बापू से ही यह कहने का साहस किया, यह मानते हुए कि वे कम से कम निकालने की बात तो नहीं करेंगे। गांधीजी ने उनकी इल्तिजा सुनी और कहा, ‘इसमें क्या है, तुम अंगुली उठा दिया करना। उन्हें रोज अपना काम करते देख वे उन्हें पहचानने लगे थे। मदान साहब ने कहा, उस दिन से बस उनतीस मिनट होते ही मैं अंगुली उठा देता। गांधीजी वाक्य भी पूरा नहीं करते और कहते बस हो गया। उस दिन के बाद से जो भी उनके भाषण हैं वे इसी बात पर खत्म होते थे-‘बस हो गया।

कृष्णदेवजी ने ऐसे कुछेक संस्मरण सुनाए। प्रवचन के पहले सर्वधर्म प्रार्थना होती थी। किसी को कोई आपत्ति हो तो उससे हाथ उठाने को पहले ही कहा गया था। कुरान के पाठ के समय एक सरदारजी गुरुकीरत सिंह नियमित रूप से हाथ उठाते थे। कुछ दिनों बाद गांधी उनका हाथ उठने पर मुस्कुराकर हाथ हिला देते। नवंबर 47 में गांधीजी एक दिन के लिए कुरुक्षेत्र गए थे। वहां शरणार्थियों के शिविर में कंबल नहीं था। तब पंजाब के मुख्यमंत्री गोपीचंद भार्गव थे। दूसरे दिन प्रार्थना सभा में गांधीजी ने इतना भर कहा कि, गोपीचंद का क्या इंतजाम है, कंबल भी नहीं हैं। दूसरे दिन अखबारों में यह बात हेडलाइन बनी। शाम को प्रार्थना सभा में गोपीचंद आगे बैठे हुए थे। उन्होंने वहां दो बार एडविना माउंटबेटेन को भी पालथी मारे बैठे देखा। आजाद, पटेल तो जब-तब आते ही थे। मदानजी से एक व्यक्ति ने सवाल किया, क्या बापू के अंतिम शब्द ‘हे राम थे? उन्होंने कहा, ‘मैंने तो सुना नहीं। मैं कुछ मिनट बाद उस जगह पर पहुंचा। पर यह किंवदंती है तो इसे किंवदंती ही रहने देना चाहिए। बाद में जब उनसे पूछा कि क्या वे अक्सर यहां आते हैं तो उन्होंने कहा, ‘हां, मैं यहां बहुत आता हूं। यह जगह तो मंदिर-मस्जिद से बड़ी जगह है।ज्
अन्नामलई कुरुयाप्पन चेट्टियार की गांधी-प्रेम की कहानी भी विलक्षण है। संयोग से चार नवंबर, 1911 में जन्मे एके चेट्टियार यह जन्मशती वर्ष भी है। 10 सितंबर, 1983 को उनका निधन हुआ। तमिलनाडु में करारकुडी के पास कोट्टायुर में उनका जन्म हुआ था। वे व्यवसायी नाट्टकोट्टई चेट्टियार समुदाय से थे। टोक्यो और अमेरिका में फोटोग्राफी की पढ़ाई की थी। गांधी और सिनेमा का उन्हें सम्मोहन था। दो अक्टूबर, 1937 में न्यूयॉर्क से डबलिन जाते हुए उन्हें सूझा कि क्यों न गांधी पर डाक्यूमेंटरी फिल्म बनाई जाए। अर्थ-संकट था। फिर सभी ने हतोत्साहित भी किया। आखरिश उनके समुदाय ने उनकी मदद की। फिर वे जुट गए। चार महाद्वीपों में एक लाख किलोमीटर से ज्यादा यात्रा कर जिस किसी के पास भी गांधी के फुटेज थे, वे प्राप्त किए।
दुनियाभर के कोई सौ फोटोग्राफरों का तीस साल का काम जमा किया। उनके पास गांधी की पचास हजार फुट की सामग्री जमा हो गई। उसे संपादित कर बारह हजार फुटेज का वृत्तचित्र तैयार किया। काम शुरू करते वक्त वे छब्बीस के थे, फिल्म जब बन गई तब उनतीस के। चेन्नई में 1940 में रॉक्सी सिनेमा में यह रिलीज हुई। फिल्म पहले तमिल में बनी थी, फिर उसे तेलुगू और फिर हिंदी में डब किया गया। हॉलीवुड जाकर उन्होंने इसका अंग्रेजी संस्करण भी तैयार किया। आजादी के पहले राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में फिल्म दिल्ली के रीगल सिनेमा में दिखाई गई थी। तीनों भारतीय भाषाओं की फिल्म करीब दो घंटे से ज्यादा अवधि की थी। लेकिन फिर दशकों से यह फिल्म ओझल रही। इसे ढूंढने की बहुतेरी कोशिश हुई। अंतत: हॉलीवुड वाला इक्यासी मिनट का हिस्सा (ट्वेंटिअथ सेंचुरी प्रॉफिट : महात्मा गांधी) कुछ समय पहले मिला। चेट्टियारजी की यह दास्तान दिलचस्प, प्रेरणास्पद और लंबी है। उन्होंने तमिल में गांधी पर किताब भी लिखी (महात्मा के चरणों में)। उनकी किताब से भी फिल्म के कुछ सुराग मिले। अंग्रेजों ने इसे प्रतिबंधित भी किया था तभी से मूल फिल्म गायब हो गई। लेकिन बुधवार को जो अंग्रेजी संस्करण देखने को मिला वह अद्भुत था। समय का पता ही नहीं चला। 1912 में गांधी के गुरु गोखले दक्षिण अफ्रीका गए थे। उसके अंश तो गांधी पर उपलब्ध फिल्मी फुटेजों में भी कहीं नहीं है। गांधी, कस्तूरबा, पटेल, आजाद सब हैं। नेहरू हैं और सिगरेट हाथ में दबाए उनके पिता मोतीलाल भी, देशबंधु से बतियाते हुए। आजादी का पूरा आंदोलन उस पारदर्शी युग से झांकता और झंकारता दिखाई देता है। एक बच्चे को गोद में लेकर उनका मुक्तहास्य तो एक बच्ची को अपनी सूत की माला पहनाकर दूसरे सिरे में अपना सिर डालने का कौतुक..विनोद! गांधी की अनेक विभोर करती भंगिमाएं तो नेहरू की सम्मोहिनी मुद्राएं। एक पूरा युग आपके सामने जीवंत! फिल्म के समाप्त होने पर रह जाता एक अफसोस, कि, काश, पूरी फिल्म भी देखने को मिल पाती! गांधी-स्मृति का यह आयोजन बेहद आत्मीय था, जिसमें चरखा और गांधी साहित्य देकर मदानजी का सम्मान किया गया। पत्रकार और लेखक देवदत्त ने गांधी की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। गांधी संस्थाओं को फिल्म की सीडी भेंट की गई।

Wednesday, October 13, 2010

कानून को लेकर उदासीनता क्यों?



आजादी के बाद भारत जसे लोकतांत्रिक देश में सूचना के अधिकार कानून को लागू करने में आई दिक्कतों के बाद यह 12 अक्टूबर 2005 को जब लागू हो गया तो अब पांच साल बाद जब कोई प्रशासनिक अधिकारी, अध्यापक और पत्रकार इसके प्रति अनभिज्ञता जताता है तो बरबस यह सवाल उठता है कि इतने महत्वपूर्ण काननू के लागू होने के बाद इतनी उदासीनता क्यो? क्या सरकार इसके प्रति उदासीनता दिखा रही है या आम नागरिक इसके बारे में जानने का इच्छुक नहीं है? या वह इस कानून का प्रयोग करने के बाद इसके परिणाम से हतोत्साहित हो चुका है? हो सकता है यह सभी सवाल सही भी हो या नहीं भी लेकिन जब सरकारी प्रयास की बात आती है तो एक आरटीआई के माध्यम से यह जानकारी मिली कि लोगों को सूचना के अधिकार के बारे में जानकारी देने के लिए विज्ञापन पर मामूली पैसे खर्च किए गए। जबकि अन्य विज्ञापनों में यह खर्च इसके मुकाबले काफी अधिक थे। 2008 में प्रधानमंत्री कार्यालय में विज्ञापन के संबंध में डाली गई एक आरटीआई के आवेदन में पता चला कि कानून लागू होने के बाद डीएवीपी द्वारा इस कानून के प्रति जागरूकता फै लाने के लिए महज 2 लाख रुपए खर्च किए गए। आज भी यह रकम किसी नेता के विज्ञापन के जन्मदिवस या पुण्यतिथि के विज्ञापन से काफी कम है।

गेल ने महासुरक्षा योजना के विज्ञापन में 4,18,22,903 रुपए खर्च किए। यही नहीं 2008-9 में पर्यटन मंत्रालय ने 65 करोड़ रुपए खर्च किए। इस मुकाबले सूचना के अधिकार पर कि या गया खर्च कोई मामूली ही है। इसे प्रसारित करने में फैसलों का महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अगर दिल्ली के बटला हाउस इंकाउंटर का मामला देंखे तो इससे संबंधित मांगी गई सूचना भी खबर बनी। हालांकि प्रशासन कभी भी सूचना देने के पक्ष में नहीं रहा है। इस अधिकार के प्रयोग के लिए जब हम धरातल पर जाएं तो कई दिक्कतें देखते हैं। भारतीय प्रशासन में कहीं यह भाव ही सम्मिलित नहीं है कि वह जनता की सेवा या उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए है। जब वह किसी प्रशासक से इस एक्ट के तहत सवाल पूछता है तुरंत इसका प्रशासक के मन में इसको लेकर एक शंका उत्पन्न होती है कि यह सूचना वह क्यों दे उसके लिए उसके पास बहानों की लम्बी लिस्ट है। चाहे सूचना कितनी भी महत्वपूर्ण हो लेकिन तर्क हमेशा उसके पास रहता है। वजह चाहे तर्क संगत न हो तो भी। दिल्ली के बटला हाउस इंकाउंटर का ही मामला लें। जब इस संबंध में सूचना के अधिकार के तहत अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से सूचना मांगी गई थी तो उसने इसे देने से साफ इंकार कर दिया था हालांकि जानकारी जांच से संबंधित नहीं बल्कि पोस्टमार्टम से संबंधित मांगी गई थी। एम्स ने सूचना का अधिकार कानून-2005 की उपधारा 8(1)बी और उपधारा 8(1)एच का हवाला दिया था। जिसे कानून के जानकारों ने उसी वक्त खारिज कर दिया था। दिलचस्प यह है कि वही रिपोर्ट मानवाधिकार आयोग ने बिना किसी लाग लपेट के दे दिया।


तंत्र की पारदर्शिता, सूचना की स्वतंत्रता अथवा जानने का अधिकार को लेकर भारत में विभिन्न स्तरों पर परिचर्चा हो रही है और इसके कुछ निष्कर्ष भी निकले हैं। लेकिन यह चर्चा जब भी बड़े स्तर पर हुई इसके केन्द्र में सरकारी गोपनीयता कानून यानी आफीसियल सिक्रेट एक्ट आया। सूचना को बेहद गोपनीय रखने वाला यह कानून 1889 में ही अस्तित्व में आ गया था लेकिन इसमें 1923 में बदलाव हुआ। लेकिन कुछ संशोधनों को छोड़ दिया जाए तो यह कानून अब भी उसी रूप में विद्यमान है। हालांकि सूचना के अधिकार कानून में 22 संबंधों में सूचना न देने की बात कानून में है। फिर भी यदि मामला किसी के जीवन से जुड़ा हो तो उस संबंध में सूचना देने पर विचार किया जा सकता है।
सूचनाओं के संबंध में प्रसिद्ध विचारक हेराल्ड लास्की ने कहा था कि ‘जिन लोगों को सही और विश्वसनीय सूचनाएं नहीं प्राप्त हो रही हैं, उनकी आजादी असुरक्षित है। उसे आज नहीं तो कल समाप्त हो जाना है। ..सत्य किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी थाती होती है। जो लोग और जो संस्थाएं उसे दबाने, छिपाने का प्रयास करती हैं अथवा उसके प्रकाश में आ जाने से डरती हैं, ध्वस्त और नष्ट हो जाना ही उसकी नियति है।ज् प्रश्न यह उठता है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में हम तक कितनी सूचनाएं आती हैं। हमारी नौकरशाही हमें किस तरह की और कितनी सूचनाएं मुहैया कराती है।

नौकरशाही के स्वभाव और उसके उसकी कार्यप्रणाली पर प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वेबर की टिप्पणी सटीक बैठती है, कि सरकारी गोपनीयता की अवधारणा नौकरशाही की विशिष्ट इजाद है। नौकरशाही उतनी कट्टरता से किसी और चीज की रक्षा नहीं करती जितनी गोपनीयना की करती है। असीमित सूचनाओं के आधार पर एकत्रित किए गए ज्ञान को गोपनीय रखने का कानून बनवाकर ही वह अपनी श्रेष्ठता स्थापित करती है। इसलिए वह कम जानकार संसद और मूर्ख जनता की भूरि-भूरि प्रशंसा करती है।
हालांकि भारतीय संविधान की धारा 19 में स्पष्टत: है कि ‘हर व्यक्ति को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। बिना किसी हस्तक्षेप के विचार निर्मित करना और उसे व्यक्त करना इस अधिकार में सम्मिलित है। देश की सीमाओं की चिंता किए बगैर किसी भी माध्यम से सूचनाएं एवं विचार एकत्र करने, प्राप्त करने और उन्हे लोगों तक पहुंचाने का अधिकार भी इस अधिकार में शामिल है। लेकिन बस शामिल है। क्योंकि आदाजी के बाद भारत जसे लोकतांत्रिक देश में किसी अलोकतांत्रिक देश के जसे ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन हुआ है। भारत में यह कानून भी विश्व के कई देशों में लागू होने के बाद प्रकाश में आया हालांकि समय समय पर इसके लिए कुछ सरकारी भी प्रयास हुए लेकिन वह बस नाम मात्र के थे। लेकिन कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा 1990 के बाद कई प्रयास सामने आए। 1988 में कर्नाटक में सरकारी प्रयास हुए लेकिन वह बहुत असरदार नहीं रहे। राजस्थान में अरुणा राय, महाराष्ट्र में बाबा आम्टे, मध्यप्रदेश में शंकरगुहा नियोगी, गोवा, तमिलनाडू,उत्तर प्रदेश में सामूहिक प्रयास हुए। लेकिन आज पांच साल बाद यह सवाल एक बार फिर है कि आखिर कितने लोग इसे जान पाए? प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि यह हथियार बंदर के हाथ में कानून है? भारतीय जनता अभी इसके लिए तैयार नहीं है। उधर अगर हम कुकुरमुत्ते की तरह उगे गैर सरकारी संगठनों की आय पर ध्यान दें तो इस कानून के प्रसार के नाम पर उन्होने करोड़ों कमाएं हैं उनके पास सैकड़ों आरटीआई हैं। अब तो वह प्रशासकों को पुरस्कार भी देने लगे हैं लेकिन भारत की एक बड़ी आबादी इससे वंचित है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया भी इसमें बहुत रूचि नहीं दिखा रहा है अभी भारत के बहुत से शहरों में लोग पूछते हैं कि क्या ऐसा भी कोई अधिकार है? बहुत से अखबार और चैनलों में आरटीआई डेस्क नहीं हैं नहीं तो उन्हे भूत प्रेत और अपराध की खबरों के जरिए अपनी टीआरपी के लिए निर्भर नहीं रहना पड़ता। 1936 में जवाहर लाल नेहरु ने एक भाषण में कहा था कि ‘पत्रकारिता और पत्रकारों को आधुनिक युग मे एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी होगी। इस बात की पूरी आशंका है कि भारत में तत्थ्यों और सूचनाओं को छिपा लेने तथा उन पर रोक लगाने का प्रयास किया जाए। यह काम सरकार भी कर सकती है और विज्ञापन दाताओं के दबाव में अखबारी घरानों के मालिकान भी। ...मैं समाचारों और सूचनाओं को प्रतिबंधित करने के सख्त खिलाफ हूं क्योंकि विभिन्न घटनाओं पर राय निर्मित करने के लिए जनता के पास इसके अलावा अन्य कोई साधन नहीं है।

एक ही थैले के...

गहमा-गहमी...