कथाकार संजीव गहरे सरोकारों के लेखक हैं। वे भीतर-बाहर एक जसे हैं। कोई बनावटीपन, कोई कृत्रिमता नहीं। करीब डेढ़ सौ कहानियां और उपन्यास लिखने के बाद भी उनका लेखन जारी है। यह उनके लेखन और मानवीय संवेदनाओं को उसकी संपूर्णता में पकड़ने की भूख ही है, जो उनसे बीहड़ यात्राएं कराती रहीं। प्रेमचंद की तरह अपने को गारकर उन्होंने कथा-साहित्य की जो थाती पेश की है, उसका मूल्यांकन होना अभी बाकी है। ग्रामीण और छोटे कस्बे के परिवेश से आने वाले संजीव में महानगरीय सभ्यता का प्रभाव लक्षित नहीं होता। या कहें कि यह उनके अंदर की जीवटता और खुद्दारी है जो परेशानी और बीमारी के बावजूद उन्हें तोड़ नहीं पाती। साहित्य सृजन, प्रकाशन और सम्मान की संभावनाओं वाली दिल्ली भी उन्हें रास नहीं आई। वह गांव जाने की बात करते हैं। जसे दाने की तलाश में अपने घोंसले से दूर आई चिड़िया अपने घोंसले की ओर देखती है, वैसे ही संजीव अपने गांव की ओर देखने लगे हैं। संजीव के लेखन की खासियत है कि वह अपने कथा-सूत्र, विचार और चरित्रों के विस्तार और प्रभाव के लिए सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों, आकड़ों और तथ्यों की गहरी जांच-पड़ताल करते हैं। लेखक संवेदनशील होता है, वह समाज के सभी स्तरों पर होनेवाली हलचलों के प्रति सजग रहता है। संजीव अपने लेखन के प्रति खासे ईमानदार और सरोकारों को लेकर प्रतिबद्ध हैं। लेखक समाज के संदर्भो से जितने गहरे अर्थो में जुड़ा होता है, उसकी सृजनशीलता उतनी ही प्रामाणिक और असरदार होती है। गत दो दशक में उदारीकरण, भूमंडलीकरण का प्रभाव समाज पर स्पष्ट रूप से दिखता है। बाजारू संस्कृति मानवीय मूल्यों को ठंडा कर उन्हें मिटाने पर तुली है। एक पीढ़ी है जो कंप्यूटर और इंटरनेट के साथ बड़ी हुई है। उसके अपने सरोकार हैं। राजनीति स्खलित हुई है। तकनीकी विकास और संस्कृतियों के मेल ने नैतिक और अनैतिक होने का विमर्श पैदा किया है। समाज को उद्वेलित और परिचालित करने करने वाली विचारधाराओं, घटनाओं, स्थितियों पर लेखक, कवि और कथाकार की पैनी नजर रहती है। साहित्यकार अपने समय के संदर्भो, तनाव और दबाव से गुजरता है। एेसे समय में संजीव जसा संवेदनशील कथाकार का क्या सोचना है,यह साहित्य सेवियों और प्रेमियों के जानने का विषय हो सकता है। इन्हीं मुद्दों को समेटते हुए प्रस्तुत है वरिष्ठ कथाकार संजीव से बातचीत पर आधारित यह लेख-
गत दशक में किए गए राजनीतिक फैसलों का असर इस दशक में साफ दिख रहा है। उदारीकरण ने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है। ग्लोबल विलेज और ग्लोबल कल्चर के संपर्क में आने पर देश में एक नई संस्कृति उभरी है। सामाजिक क्षेत्र में भी बदलाव असमान्य रूप में हैं। राजनीति अधोपतन की ओर अग्रसर है। तकनीकी क्षेत्र में हुई तरक्की ने सुख और सुविधा के उपकरण देने के साथ ही मानवीय मूल्यों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है। रिश्तों और संबंधों को एक नए तरीके से देखने के लिए विवश किया है।
सामाजिक बदलाव एक सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन यह प्रक्रिया अपने यहां सामान्य नहीं है। अपने यहां समाज की कई तहें और परते हैं। समाज का एक तबका उत्तर आधुनिकता में जी रहा है, तो एक वर्ग आज भी 14वीं सदी की रूढ़ और दकियानूस मान्यताओं से जकड़ा है। उदारीकरण का लाभ जो समाज के सभी वर्गो तक पहुंचना चाहिए था, वह अब तक नहीं पहुंचा है। पैसे और सुख भोगने की लपलपाती महात्वाकांक्षा ने अमीर और गरीब के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है। कुछ लोगों के पास अथाह संपदा और पैसा है, जबकि देश में करोड़ों की संख्या में एेसे गरीब लोग हैं, जो सपने देखकर मरने के लिए अभिशप्त हैं। गरीबों को सपना दिखाने का छलावा बहुराष्ट्रीय कंपनियां कर रही हैं। जिनके पास पैसा है, वह अपने सपनों को पूरा कर ले रहा है और जिसके पास नहीं है, वह अपने सपनों को पूरा करने के लिए चोरी, बेइमानी करने के सिवाय और क्या कर सकता है। कंपनियां गरीबों का सपने दिखाकर मार रही हैं। चिंता की बात है कि शहरी जीवन की तमाम बुनियादी जरूरतों को अपना खून-पसीना बहाकर पूरा करने वाले इस बड़े वर्ग की सुध न तो सरकार और न ही सभ्य समाज ले रहा है। उन्हें मात्र उतना ही दिया जा रहा है, जिससे वे अपनी दो जून की रोटी की जुगाड़ कर लें। उन्हें हाशिये पर जिंदा रखने की कोशिश की जाती है ताकि हिपोक्रेटिक समाज के जीवन में किसी तरह का अवरोध उत्पन्न न हो।
इधर, सामाजिक मूल्यों को बिगाड़ने और मानवीय संबंधों को छिन्न-भिन्न करने का काम बाजारवादी शक्तियों ने बड़ी तेजी से किया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां एक साजिश के तहत मनुष्य को उसके सरोकारों और मूल्यों से काटने में लगी हैं। अपने फायदे के लिए ये कंपनियां भोगवादी संस्कृति का एेसा जाल बुन रही हैं, जिसमें फंसकर मनुष्य केवल उपभोक्ता बनता जा रहा है। सारे रिश्ते, नेह-छोह को तिलांजलि देकर वह आत्ममुग्धता का शिकार हो गया है। संबंधों के जिस उष्मा से जीवन परिचालित और उसमें ऊर्जा का संचार होता है। उपभोक्तावादी संस्कृति ने उसी पर कुठाराघात किया है। राजनीति की गर बात करें तो सामाजिक मंच पर राजनीतिक शक्तियां क्षीण हुई हैं। मौजूदा समय की राजनीतिक शक्तियां नक्सलबाड़ी आंदोलन को एक गाली के रूप में देखती और उसे प्रचारित करती हैं। एेसी दृष्टि रखने वाली शक्तियां जनता को लूटने का ही काम करती हैं। और एेसा करने में उनकी मित्र शक्तियां कभी प्रत्यक्ष और कभी प्रच्छन्न रूप में उन्हें मदद पहुंचाती रही हैं। राजनीति राज करने की नीति है। लेकिन राजनीति में आज दल, बल और छल का बोलबाला है। झूठ बोलकर जनता को बरगलाया जा रहा है। नेताओं में ढोंग और प्रपंच इस कदर हावी है कि उनकी कथनी-करनी में कोई मेल और सामंजस्य नहीं दिखता है।
सन् 90 के शुरुआती दशक के उदारवादी ढांचे के तहत शुरू हुई बाजार की व्यवस्था और तकनीकी उन्नयन ने पहले से स्थापित सामाजिक मान्यताओं को झकझोर दिया है। इसे लेकर नैतिक और अनैतिक होने का विमर्श भी चलता रहता है। दरअसल, नैतिकता की कोई परिभाषा आज तक बन ही नहीं पाई है। मेरी मानें तो कथनी और करनी में भेद मिट जाए तो यही सबसे बड़ी नैतिकता है। हर समाज की अपनी नैतिकता होती है। दबाव में हर देश और व्यक्ति जीता है। कहीं न कहीं और किसी ओर हम सभी दबाव में जीते हैं। नैतिकता इस दबाव को मुक्त करने में है। समाज में कुछ घटनाएं एेसे सामने आ रही हैं जो क्षणिक आवेग का परिणाम हैं। पुराने निकषों पर नए प्रतिमानों को नहीं कसा जा सकता। होमोसेक्सुअलिटी, गेअटी और लेस्बियन जसे संबंध समाज के सामने हैं। उन्हें वर्षो से चले आ रहे मानदंडों को आधार बनाकर हम नहीं देख सकते। इनके लिए हमें एक नई दृष्टि विकसित करनी होगी। इन आवर्जनाओं से निपटने के लिए समाज को ही कुछ करना होगा। बिना रिश्तों के समाज की कल्पना भी संभव नहीं है। दरअसल, नैतिक और अनैतिक घोषित करने के कोई तय मानदंड नहीं हैं। इसके विरोध में वही लोग खड़े हो रहे हैं, जिनका इससे कोई लेना देना नहीं है।
तकनीकी विकास ने असंभव सी लगने वाली चीजों को संभव बना दिया है। विज्ञान, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, सड़क की दशा में सुधार हुआ है। फिर भी इसका लाभ सुदूर गांवों तक नहीं पहुंचा है। शिक्षा, रोजगार, सामाजिक न्याय और सुरक्षा प्रत्येक नागरिक का बुनियादी अधिकार है। व्यवहार के स्तर पर न जाने कितने कालाहाड़ी सरकारी दावों को मुंह बिराते नजर आते हैं। जरूरत गरीबी की दंश और अपनी अस्मिता के लिए जद्दोजहद कर रहे लोगों को बचाने की है। ये लोग समाज की मुख्यधारा की जरूरतों को पूरा करने के बाद भी नारकीय जीवन जीन के लिए बेबस हैं। हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से कानून बनाकर सभी के लिए शिक्षा अनिवार्य करने का प्रयास सराहनीय है। बहुत सारे प्रांतों की सरकारें शिक्षा के लिए रियायतें दे रही हैं। लेकिन इनमें व्यावहारिक स्तर पर बहुत सारी खामियां हैं। सुधार के लिए उठाए गए ज्यादातर कदम कागजी साबित हुए हैं। इसके अलावा विधवा पेंशन, वृद्धा पेंशन, काम के बदले अनाज, नरेगा जसे कार्यक्रमों से उम्मीद बंधती है।
इस दशक में मीडिया काफी शक्तिशाली होकर उभरा है। लेकिन मनोरंजन चैनलों पर रियल्टी शो में दिखाए जाने वाले भौडेंपन को देखकर कुफ्र होता है। ‘सच का सामनाज् करने वाले खेतों, खलिहानों और जंगलों में मर रहे हैं। विडंबना है कि सच के नाम पर झूठ और फरेब का व्यवसाय करने वाले करोड़ों का कारोबार कर रहे हैं। ग्लैमर और पैसे के इस खेल में यथार्थ को झुठलाया जा रहा है। देश की हकीकत के बारे में दिखाने और बताने से मीडिया परहेज करने लगा है। वहां भी ग्लैमर और पैसे की तूती बोलती है। इस दशक में महिलाओं की स्थिति पहले से कहीं ज्यादा बदली है। वे प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों को चुनौती पेश कर रही हैं। उनका जीने, रहने और सोचने का ढंग और दायरा बदला है। लेकिन इतना कुछ बदलने के बाद भी पुरुषों का उनके प्रति नजरिया मध्ययुगीन वाला ही है। थोड़ा सा खुरचने पर मनुष्य का मध्यकालीन वहशीपन सामने आ जाता है। हरियाणा की कल्पना चावला स्त्रियों की उपलब्धता की सबसे बड़े प्रतीक के रूप में देखी जा सकती हैं, लेकिन उसी हरियाणा में महिलाओं पर खाप पंचायतों का फरमान कथित सभ्य मनुष्यता पर कलंक लगा देता है।
देश के सामने चुनौतियां और समस्याएं अनेक हैं, लेकिन समाज के विकास में सबसे बड़ा अवरोध जाति व्यवस्था है। इसे समाप्त करने की जरूरत है। यदि एेसा चलता रहा तो देश एक बार फिर से दासता की जंजीरों में जकड़ जाएगा।
राजनीतिक शक्तियां आत्ममुग्धता की शिकार हैं, उनमें बिखराव है। जनता सीपीआईएमएल और अन्य राजनीतिक पार्टियां जुगनुओं की तरह हैं, उनसे अंधेरा नहीं मिट सकता। सवाल है कि यदि सत्ता पाने के लिए धुर विरोधी पार्टियां एक हो सकती हैं, तो वे जनता के लिए क्यों एक नहीं हो सकतीं। राजनीतिक शक्तियां जनता के हित के बारे में बात तो करती हैं, लेकिन वास्तव में वे अपना हित साधने में ही लगी हैं। वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक अधोपतन के बारे में शहीद भगत सिंह ने पहले ही कह दिया था कि यदि समाज की वर्जनाओं को रोका नहीं गया तो वे अधोपतन की ओर ले जाएंगी। फिर भी इतनी चिंताएं होने के बावजूद मैं निराश नहीं हूं। मुङो देश की युवा पीढ़ी पर भरोसा है। बुरा समय आने पर युवा आगे आते हैं और वे देश और समाज को एक नई दिशा देते हैं।
आलोक कुमार से बातचीत पर आधारित
Saturday, October 24, 2009
Sunday, October 18, 2009
उपेक्षा का दंश ङोल रहा बलबन का मकबरा

शासक इतिहास गढ़ता है। लेकिन इतिहास को संरक्षित करने की जिम्मेदारी आने वाली पीढ़ी की होती है। पुरातात्वि दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण शहर दिल्ली ऐतिहासिक इमारतों और मकबरे की उपेक्षा ङोल रहा है। इस कड़ी में महत्वपूर्ण स्थान है मेहरौली का आर्कियोलॉजिकल पार्क जहां ऐतिहासिक महत्व के 40 स्थान हैं लेकिन अधिकर स्थानों पर खंडहर ही दिखाई पड़ते हैं इन्हीं खंडहरों के बीच है गुलाम वंश के शासक गयासुद्दीन बलबन का मकबरा। यहां पर बिखरे टूटे पत्थर और मक बरे में के भीरत की गंदगी इसकी स्थिति खुद-ब-खुद बयां कर देते हैं।
वर्षो से उपेक्षा का दंश ङोल रहे इस पार्क में मरम्मत की पहल इंडियन नेशनल ट्रस्ट फार आर्ट एंड कल्चर (इंटैक) ने शुरु की बाद में इसे आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) ने भी आगे
बढ़ाया लेकिन वर्तमान में भी यह सरकारी उपेक्षा का शिकार बना हुआ है।
ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व से सम्पन्न गयासुद्दीन बलबन का मकबरा भारत में मेहराब और गुम्बद का सबसे पहला उदाहरण माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार गयासुद्दीन बलबन इल्तुतमिश का तुर्की गुलाम था जो नसिरुद्दीन महमूद के शासनकाल में वजीर के पद पर आसीन हुआ था। महमूद की मृत्यु होने पर वह गद्दी पर बैठा और अपनी मृत्यु होने तक 24 वष तक शासन करता रहा। इतिहासकारों ने इसका शासनकाल 1266-1287 माना है।
मकबरे का मुख्य द्वार भी अपनेआप में अनूठा है। इसमें प्रवेश करते ही हिन्दू मंदिरों की तरह डिजाइन देखने को मिलती है जबकि पृष्ठ भाग पर मस्जिद के आकार का गेट और संभवत: यह भारत का पहला गेट है जहां मुख्य द्वार का छत गुम्बद का आकार न होकर के पिरामिड के आकार का है।
अनगढ़े पत्थरों से निर्मित इस मकबरे एक भाग पर गयासुद्दीन बलबन की कब्र है। यह माना जाता है कि मकबरे में पूर्व की ओर ध्वस्त आयताकार कक्ष में बलबन के पुत्र मुहम्मद की कब्र थी जो खां शहीद के नाम से मुलतान के आसपास सन् 1285 में मंगोलों के विरुद्ध युद्ध में मारा गया।
इस ऐतिहासिक मकबरे की उपेक्षा के बारे में पूछने पर एएसआई के एक अधिकारी ने बताया कि हम इसकी देखरेख के लिए प्रयासरत हैं और पिछले वर्ष इस पर काम भी हुआ है और इस वर्ष भी इसके संरक्षण का काम जल्द ही शुरु हो जाएगा।
Friday, October 16, 2009
दीपावली

कोने-कोने पहुंचे प्रकाश
दूर तिमिर हो, छाए उजास
मन में जागे ज्ञान की प्यास
इस दीपावली यही है आस।
बच्चों का बचपन हो जगमग
मिले-जुले सब हिल-मिल सज-धज
आएं सबको खुशियां रास
इस दीपावली यही है आस।
पक्षियों के लिए मुसीबत की रात बनकर आती दीवाली

दीपों का पर्व दीवाली। हरेक वर्ष यह लोगों के लिए खुशियों की सौगात लेकर आती है। लोग इसे धूमधाम से मनाने के लिए प्रतीक्षारत रहते हैं। लेकिन जहां एक ओर लोग पटाखे जलाकर आनंद लेते हैं वहीं पूरी रात इसके शोर से पशु-पक्षियों की नींद हराम हो जाती है। नवजात पक्षियों का तो मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है और हृदयाघात जसी परेशानी आने से मृत्यु तक भी आ जाती है। इसलिए दीवाली की रात पक्षियों के लिए कयामत की रात बनकर आती है। इस संबंध में दिल्ली विश्वविद्यालय के वन्य जीव विशेषज्ञ डा. एम. शाह अहमद का कहना है कि साल के दो दिनों का यह त्योहार पक्षियों के लिए नई बात जसी है। क्योंकि बहुत सी पक्षियां इस समय अंडे देती हैं और उनके बच्चे पटाखों की तेज आवाज सहन नहीं कर पाते। उन्हें पता भी नहीं चलता कि आखिर ये धमाके कहां हो रहे हैं। इन धमाकों से पक्षियों के बच्चों की हृदयगति रुक जाती है या वे अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं। ऐसा भी देखा गया है कि कुछ तो उस इलाके को छोड़कर दूर चले जाते हैं और फिर नहीं आ पाते। कुछ ऐसा ही हाल कुत्तों की नई प्रजाति के साथ भी होता है। पामेलियन कुत्ते तो पटाखों के इन धमाकों से कांप तक जाते हैं और कोना पकड़कर दुबक कर बैठ जाते हैं। एक अन्य वन्य जीव विशेषज्ञ का कहना है कि अफगानिस्तान में तो युद्ध के बाद पशु-पक्षियों की क्या स्थिति हो जाती है इस पर गहन शोध और अध्ययन हो चुके हैं। लेकिन भारत में ऐसा नहीं हुआ है। दीपावली के बाद कई जगहों पर पक्षियों के शव मिलते हैं लेकिन लोग इसे सामान्य रूप से लेते हैं। इसलिए हमें इस अवसर पर पशु-पक्षियों के साथ सहानुभूति दिखाने की जरूरत है।
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Sunday, October 11, 2009
जिसको हम जानते हैं मकबरे से

शासक केवल शासन ही नहीं करता बल्कि अपनी निशानी के रुप में कुछ अविस्मरणीय छोड़कर जाना भी चाहता है। सैय्यद वंश के शासक मुबारक शाह ने मकबरे के रुप में ऐसी निशानी छोड़ी है। सैय्यद वंश द्वारा निर्मित अष्टभुजाकार मकबरे का यह अच्छा उदाहरण माना जाता है।
1421 से 1434 तक शासन करने वाले मुबारक शाह ने सेकी साम्राज्य को न केवल राजपूतों के अतिक्रमण से बचाया बल्कि मुबारकाबाद जसे सुन्दर शहर की परिकल्पना भी की और उसके निरीक्षण के दौरान अपने विश्वास पात्रों द्वारा मारा भी गया।
सैय्यद वंश के शासन में निर्मित यह मकबरा आजकल मुबारक शाह की मजार तक अतिक्रमण से घिरा है। इस बारे में दिल्ली सरकार और एएसआई समेत पुरातात्वि स्मारकों को संरक्षण देने वाले संस्थानों ने कुछ विशेष नहीं किया है। कुछ वर्ष पूर्व मकबरे के सुन्दरीकरण के नाम पर वहां की फर्श पर पत्थर लगाने का काम तो किया गया लेकिन वह भी अधूरा पड़ा है। मकबरे की दीवारों की दरार यहां स्पष्ट रुप से देखी जा सकती हैं। यहां पर जाने के लिए कोई सीधा रास्ता नहीं है। कोटला मुबारकपुर गांव में स्थित इस मकबरे तक जाने के लिए टेढ़े-मेढ़े और तंग रास्तों से जाया जा सकता है। लेकिन इसे ठीक से देखना मुमकिन नहीं है क्योंकि मकबरे के चारो ओर लगभग तीन फीट छोड़कर ऊंचे-ऊंचे मकान बनाए गए हैं। यही नहीं इस मकबरे के चबूतरे का उपयोग गांव के लोग द्वारा त्योहारों के या शादी विवाह के अवसर पर सार्वजनिक उपयोग के लिए किया जाता है।
इस मकबरे से थोड़ी दूर पर एक मस्जिद भी है। लेकिन यह मस्जिद किसी छोर से दिखाई नहीं देती लगभग 100 मीटर अंदर एक मस्जिद भी है जिसका संबंध मुबारक शाह की कत्ल से जुड़ा हुआ है। यहां अतिक्रमण इस हद तक है कि मस्जिद की दीवारों के ऊपर से लोगों ने दीवार खड़ी कर दी है और निर्माण कार्य करवा रखा है।
इस गांव का अपना इतिहास है पहले इसे मुबारकाबाद कहा जाता था।
याहिया बिन अहमद सिरहिन्दी ने तारीख ए मुबारक शाही में लिखा है कि, मुबारकाबाद को मुबारक शाह ने 1434 में बसाया था। इस जगह को खराबाबाद-ए-दुनिया कहा जाता था जिसका मतलब बेकार जगह से है। लेकिन मुबारक शाह ने इसको नए शहर के रू प में बसाया। इस मकबरे के समीप की मस्जिद के निर्माण के निरीक्षण के दौरान जुमा के नमाज के समय ही उसके विश्वसनीय लोगों द्वारा 19 फरवरी 1434 में उसकी हत्या कर दी गई। इस हत्या का षणयंत्रकारी मिरान सदर था।
यह मकबरा कई कारणों से अपनी विशिष्टता के लिए जाना जाता है। संभवत: यह पहला पठानोत्तर शैली का मकबरा है जो चबूतरे के ऊपर बनाया गया है। यही नहीं इसमें लाल बलुए पत्थरों और रंगीन टाइल्स का इस्तेमाल किया गया है। गांव के एक व्यक्ति ने बताया कि पहले चबूतरा ऊंचा था लेकिन स्थानी लोगों ने इस पर मिट्टी डालकर इसे सड़क के बराबर बना दिया है।
पूर्णत: सरकारी उपेक्षा का शिकार इस मस्जिद और मकबरे के बारे में एएसआई ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। एएसआई के एक अधिकारी ने बताया कि वहां से अतिक्रमण हटाने की कोशिश हो चुकी है लेकिन फिर से लोगों ने कब्जा जमा रखा है। इस पर जल्द ही उचित कदम उठाया जाएगा।
धार्मिक मान्यता भी है इस मकबरे की-
इस मकबरे की एक धार्मिक मान्यता भी है। मकबरे के अंदर सात कब्र है। स्थानीय लोग एक कब्र मुबारक शाह की मानते हैं शेष उसके परिजनों की। गांव के लोगों का मानना है कि जब भी कोई नया कार्य शुरू होता है तो इस मकबरे में पूजा अर्चना की जाती है। शादी के खास अवसर पर दूल्हा घोड़ी चढ़ने पर पहले मकबरे में मत्था टेकता है और उसके बाद मंदिर में जाता है।
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Sunday, October 4, 2009
अरे, ये तो रजिया की कब्र!

मुस्लिम और तुर्की इतिहास में पहली महिला शासिका रजिया सुल्तान की मजार सैकड़ों वर्षो से धूप-बारिश ङोलती प्रशासिन उपेक्षा की शिकार बनी अतिक्रमण से घिरी हुई है। तुर्कमान गेट के भीतर और काली मस्जिद के समीप तंग गलियों के बीच इस शासिका की कब्र है। लेकिन वहां तक पहुंचना आसान नहीं है। यहां पर अधिकरत लोगों को पता नहीं है कि यह रजिया सुल्तान की ही कब्र है। ऊंचे मकानों के बीच गंदी और तंग गलियों से होकर वहां जाया जा सकता है लेकिन कोई प्रमाणिक जानकारी देने वाला बोर्ड या एएसआई द्वारा नियुक्त चौकीदार नहीं है जो इस कब्र के बारे में लोगों को बता सके। यही नहीं यहां पर असंवैधानिक रुप से रोज नमाज भी पढ़ी जाती है। चारो ओर से अतिक्रमण से घिरी इस कब्र की देखरेख के लिए कोई नहीं है।
इल्तुतमिश की योग्य और साहसी बेटी रजिया सुल्तान लगभग 1236 में सिंहासन पर बैठी लेकि न अधिक दिनों तक शासन नहीं कर पाई और उनके भाई मैजुद्दीन बेहराम शाह ने सिंहासन पर कब्जा कर लिया। हालांकि इतिहासकार सतीश चन्द्र ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ मेडिवियल इंडिया में लिखा है कि उसके छोटे भाई रक्तुद्दीन ने पिता की मृत्यु के बाद छह महीने तक शासन संभाला एक विद्रोह में 9 नवम्बर 1236 को रक्तुद्दीन तथा उसकी मां शाह तुर्कानी की हत्या कर दी गई। इसके बाद रजिया सुल्तान ने शासन संभाला। लेकिन ऐसा कहा जाता है कि रजिया का अपने सिपहसालार जमात उद-दिन-याकूत जो एक हब्शी था के साथ प्रेम प्रसंग चल रहा था जो मुस्लिम समुदाय को मंजूर नहीं था। इससे उसके राज्यपालों में असंतोष था अंतत: भटिंडा का राज्यपाल मल्लिक इख्तियार-उद-दिन अल्तुनिया समेत अन्य राज्यपालोंे ने विद्रोह कर दिया इनसे लड़ते हुए याकूत मारा गया और दबाव में आकर रजिया ने अल्तुनिया से शादी कर ली। इसी बीच रजिया के भाई मौजुद्दीन बेहराम शाह ने सत्ता हथिया ली। अपनी सल्तनत की वापसी के लिए रिाया और उसके पति अल्तुनिया ने उसके भाई बेहराम शाह से युद्ध किया जिसमें 14 अक्टूबर 1240 को दोनों मारे गए।
ग्लोरिया स्टिनिम ने अपनी पुस्तक, ‘हर स्टोरी: वुमेन हू चेंज्ड द वर्ल्डज् में उस समय की मुस्लिम व्यवस्था के बारे में लिखा है कि, रजिया को भी अन्य मुस्लिम राजकुमारियों की तरह सेना का नेतृत्व तथा प्रशासन के कार्यो में अभ्यास कराया गया ताकि जरुरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल किया जा सके।
उस समय दिल्ली सल्तनत की शासिका रिाया सुल्तान की वास्तविक कब्र को लेकर मतभेद है। लेकिन अधिकतर विद्वानों ने तुर्क मान गेट के पास ही इसकी वास्तविक स्थिति को बताया है। ऐसा माना जाता है कि इस कब्र की गुम्बद पैंतीस वर्ग फीट रही होगी हांलांकि अब यह अतिक्रमण से ग्रस्त है गुम्बद की कोई निशानी नहीं दिखाई देती है। अब यह मात्र आठ फीट की ऊंचाई से घिरी कब्र है जिसके चारो ओर ऊंची-ऊंची इमारतें हैं। तीन फीट पांच इंच चौड़ी और लगभग आठ फीट लम्बी रजिया सुल्तान की कब्र के पास एक और कब्र है ऐसा माना जाता है कि वह रजिया की बहन शजिया बेगम की है।
इतिहास में इतनी महत्वपूर्ण जगह की प्रशासनिक उपेक्षा इस तरह से है कि वहां पर फै ली गंदगी के कारण पर्यटक भी वहां जाने से कतराते हैं। इस संबंध में आर्कियोलोजिकल सर्वे आफ इंडिया के सुप्रिमटेंडेंट आर्कियोलाजिस्ट का कहना है कि हम इस संबंध में पूरी कोशिश कर रहे हैं। यहां पर हो रही अवैध नमाज और अतिक्रमण से संबंधित मामला अदालत में चल रहा है लेकिन हमें पूरी तरह से और भी सरकारी एजेंसियों की मदद चाहिए तथा स्थानिय निवासियों में भी अपनी संपदा को लेकर जागरुकता होनी चाहिए। हम अपनी तरफ से भी ये सब करने के लिए पूरी तरह प्रयास कर रहे हैं।
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Monday, September 28, 2009
एक थे बनारसी प्रिंसेप

जेम्स प्रिंसेप गजब के प्रतिभाशाली व्यक्ति। उनका व्यक्तित्व बहुमुखी था। इस सब से अलग एक खास बात यह थी कि बनारस से उनको अगाध प्रेम था। बनारस ही नहीं, बल्कि गंगा को भी वे ‘हमारी गंगाज् कहते थे। बनारस के लिए जितना जेम्स प्रिंसेप ने किया वह अतुलनीय है। शायद ही किसी एक शहर के लिए एक व्यक्ति ने इतना किया होगा। ओपी केजरीवाल ने पिं्रसेप की इस काम को लेकर और उनके परिवार से मिली सामग्री के आधार पर एक पुस्तक तैयार की है जिसे पिलग्रिम्स पब्लिशिंग ने हाल ही में प्रकाशित किया है। केजरीवाल जेम्स की बायोग्राफी और भारत में प्रिंसेप परिवार के इतिहास पर भी काम कर रहे हैं। उनसे इस किताब और इसके अद्भुत नायक पर यह बातचीत अभिनव उपाध्याय ने की है।
प्रश्न- जेम्स प्रिंसेप के लिए ‘बहुमुखी प्रतिभावानज् शब्द भी शायद कम पड़ेगा? आप जेम्स की प्रतिभा को कैसे व्याख्यायित करेंगे? उनका कौन सा रूप आपको सबसे अधिक आकर्षित करता है?
उत्तर- बहुत से प्रतिभाशाली व्यक्ति हुए हैं लेकिन उनका किसी एक विशेष विषय में ही नाम हुआ है। जसे सुकरात को हम एक दार्शनिक के रूप में ही जानते हैं, मोजार्ट को एक श्रेष्ठ संगीतज्ञ के रूप में। लेकिन उसका व्यक्तित्व बहुमुखी था। मुङो लगता है कि वह लियोनाडरे द विंची के करीब था। लेकिन लियोनाडरे द विंची और उसमें फर्क है, जेम्स प्रिंसेप जो करता था उसके बारे में लिखता था। उसके लेख विभिन्न विधाओं में हैं। उसने ब्राह्मी लिपि पढ़कर भारत को अशोक का उपहार दिया। हमारे भारतीय इतिहास का बहुत बड़ा प्रतिशत या तो उसने खोजा है या उसमें हिस्सा लिया है। उसने कनिष्क, गुप्त वंश आदि अनेक वंशों को पढ़ा। प्राचीन राजवंशों की खोज में भी उसका योगदान है। वह बांसुरी बजाता था, नाटक करता था और भी बहुत कुछ..
प्रश्न- जेम्स प्रिंसेप की ‘बनारस की खोज और बनारस निर्माणज् की मुख्य बातें क्या थीं, जो इस किताब में आई हैं?
उत्तर-जेम्स ने बनारस की खोज नहीं की इसका निर्माण किया। बनारस का पहला नक्शा जेम्स ने बनाया। वहां के लोगों की प्रामाणिक जनगणना, सबसे पहले भूमिगत नाली प्रणाली उसने बनवाई जो आज भी काम कर रही है। किसी ने उसके बारे में कहा है कि वह आधुनिक बनारस का निर्माता था, जिससे मैं पूर्णत: सहमत हूं। वहां पर उसने कर्मनाशा नदी का पुल बनवाया। उसका निर्माण कार्य देखने वह रोज 30 किमी घोड़े से जाता था। उस पुल पर आज भी गाड़ियां चलती हैं। अब तक कोई भी व्यक्ति बनारस के लिए इतना काम नहीं किया है। उसने बनारस के हर घर का नक्शा बनाया। बनारस के प्रति उसका प्रेम आदरणीय था, क्योंकि वह गंगा नदी को अपने लेखों में ‘हमारी गंगा जीज् कहकर संबोधित करता है।
प्रश्न- जेम्स प्रिंसेप को बनारस पर जारी सामग्री में से इस पुस्तक को जारी करने में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
उत्तर- जेम्स प्रिंसेप के बारे में भारत में कुछ खास नहीं मिला। मैं लंदन में प्रिंसेप खानदान के बारे में खोज कर रहा था कि वहां से कुछ मिल जाए। इसके लिए वहां की फोन डायरेक्ट्री में प्रिंसेप परिवार से संबंधित नम्बर लिया।
उनसे मिलने गया लेकिन वे लोग भी जेम्स के बारे में अधिक नहीं जानते थे। उन्होंने अन्य लोगों के नम्बर दिए लेकिन कुछ बात नहीं बनी। कुछ दिन बाद उन्होंने कहा कि उनके पास एक पुराना बक्सा है शायद उसमें उसकी जरूरत की कुछ चीजें हों। उस बक्से को खोलने पर उसमें अद्भुत सामग्री मिली। मैं उसे भारत लाना चाहता था लेकिन वे लोग भारत के लोगों को लापरवाह मानते हैं। मैं लगातार उनके संपर्क में रहा। एक दिन उन्होंने बताया कि वह घर खाली कर रहे हैं और मैं वह सामग्री ले आया। उसके बाद मैंने अपनी किताब एशियाटिक सोसायटी आफ बंगाल में एक अध्याय जेम्स प्रिंसेप पर लिखा।
प्रश्न-इस किताब को तैयार करने में कितना समय लगा?
उत्तर- इस किताब को तैयार करने में तीन साल लग गए। लेकिन इस परिवार पर मैं पिछले 15 सालों से काम कर रहा हूं। मेरा मानना है कि आधुनिक भारत का इतिहास प्रिंसेप के बिना नहीं लिखा जा सकता। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि इसके नाम को बनारस के अधिकतर लोग नहीं जानते। उसने वहां पर सोसायटी फार दी सेप्रेशन आफ द वायस नामक संस्था बनाई।
प्रश्न- बनारस पर बहुत लिखा जा चुका है। आपका काम इससे किस तरह से अलग है?
उत्तर- इसकी कोई तुलना नहीं हो सकती। उन्नीसवीं शताब्दी का सही इतिहास इस किताब में मिलता है। सबका दृष्टिकोण अलग है। इसमें जेम्स प्रिंसेप के योगदान को लेकर उस समय के दृश्य उपस्थित किए गए हैं। अब तक बनारस को लेकर जेम्स प्रिंसेप पर कुछ नहीं लिखा गया है। काशी का एकमात्र इतिहास डा. मोतीचन्द ने ‘काशी का इतिहासज् लिखा लेकिन जेम्स प्रिंसेप के बारे में कुछ नहीं था। इसके नए संस्करण में मैंने एक लेख जेम्स प्रिंसेप लिखा। यह दुखद है कि अभी तक इस बुद्धिजीवी पर लोगों ने ध्यान नहीं दिया।
प्रश्न-बनारस को लेकर हमेशा से एक सम्मोहन रहा है। क्या आपमें भी किसी तरह का सम्मोहन था? इसे यह किताब किस तरह तृप्त कर पाती है?
उत्तर- बनारस के प्रति मेरे मन में एक समर्पण की भावना है। जब सेवानिवृत्ति के बाद बनारस गया तो वहां ‘वाराणसी जागृति मंचज् से जुड़ा लेकिन मुङो बतौर केंद्रीय सूचना आयुक्त बनाकर दिल्ली बुला लिया गया। इसके बाद फिर बनारस गया। वहां गंगा के बचाव के लिए ‘गंगा महासभाज् में भाग लिया। यह गौर करने वाली बात है कि विश्व के लोग भारत के और किसी शहर को इतना नहीं जानते जितना बनारस को जानते हैं। यह किताब भी इसी समर्पण का प्रतिफल है। अगले साल तक दो और किताबें बनारस पर आ जाएंगी।
प्रश्न- इस किताब के पृष्ठों में रेखांकनों, चित्रों में जो बनारस उभरता है, उसके बरक्स आज का बनारस अपने तमाम सम्मोहन के बावजूद, कहां ठहरता है? इस किताब पर काम करते हुए यह बात भी आपके दिमाग में जरूर आई होगी?
उत्तर- काश! वह बनारस अब होता, वह माहौल वापस आ सकता। अब बनारस भीड़, गंदगी, प्रदूषण से पटा है। वहां की संस्कृति भी लुप्त हो रही है। बनारस के पक्का महल में, जो पुराने बनारस के नाम से जाना जाता है के एक सज्जन ने जेम्स प्रिंसेप के बारे में बताया कि वह हम लोगों से अधिक बनारसी था। उसे लोग ‘बनारसी प्रिंसेपज् कहते थे। मुङो कोई विदेशी ऐसा नहीं मिला जो किसी शहर के निर्माण उसकी संस्कृति में इतना रच-बस गया हो। कुछ हद तक डेविड हेयर को कह सकते हैं क्योंकि कोलकाता के प्रति उसके मन में अगाध प्रेम था। लेकिन फिर भी इतना नहीं जितना जेम्स का बनारस के प्रति था।
प्रश्न- जेम्स प्रिंसेप की बायोग्राफी पर भी आप काम कर रहे हैं? साथ ही भारत में प्रिंसेप परिवार के इतिहास पर भी, अपने इस काम के बारे में बताएं?
उत्तर- प्रिंसेप परिवार की चार पीढ़ियों के 17 सदस्य भारत आए थे। दूसरी पीढ़ी के सात भाई एक साथ भारत में कार्यरत रहे। उसके भाई एडवोकेट जनरल, चीफ सेक्रेटरी, द्वारका नाथ टैगोर के बिजनेस पार्टनर, आर्किटेक्ट, जिसने बिस्टेल में राजा राम मोहन राय की समाधि डिजाइन की थी और सुन्दरवन का नक्शा बनाया था। एक भाई अर्थशास्त्री था जिसने बैलेंस आफ ट्रेड पर काम किया।
एक भाई उपन्यासकार था। उसने ‘द बाबूज् नामक उपन्यास लिखा जो संभवत: पहला विदेशी उपन्यासकार है जिसने भारतीय चरित्रों को प्रमुखता दी।
लेकिन इन सबमें जेम्स प्रिंसेप विलक्षण था। उसके पिता जॉन प्रिंसेप नील की खेती करने वाले पहले विदेशी थे। इंग्लैंड में उसने ‘गरीबदासज् नाम से वहां के अखबार में कई लेख लिखे। उसमें उसने भारतीयों की वकालत की है। इंग्लैड की संसद में भारतीय किसानों की स्थिति का दुखद वर्णन किया है। जेम्स प्रिंसेप के भाई एच.टी. प्रिंसेप ने उस समय मैकाले की शिक्षा प्रणाली का विरोध किया था। उसने मैकाले के खिलाफ एक साक्षरता अभियान भी चलाया था।
प्रश्न- प्रिंसेप के प्रेम या विवाह के बारे में कुछ बताएं?
उत्तर-उसकी बायोग्राफी पर काम करते समय एक बात सामने आती है कि 1826 में अपने परिवार के साथ वह कोलकाता गया। वहां उसे एक लड़की पसंद आई। लेकिन उसने देखा कि वह उसके छोटे भाई के प्रति आकर्षित है। इससे उसका मन खिन्न हो गया और वह भारी मन से बनारस लौट आया। यह बात उसके भाई विलियम जोन्स की डायरी में है। बाद में उसकी शादी हैरियट से हुई। जेम्स अंतिम दिनों में अपनी स्मृति खो बैठा था। उसकी पत्नी ने उसकी काफी सेवा की थी। अंतत: जेम्स 1840 में चल बसा।
प्रश्न- इस किताब पर काम करते हुए आप किन अनुभवों से गुजरे?
उत्तर- अच्छा अनुभव रहा लेकिन काम आसान नहीं था। हमारी पहली किताब में जेम्स पर एक अध्याय है। उसके बाद उसके परिवार के बारे में जानने में और ललक जागी और लिखना शुरू किया। प्रिंसेप खानदान बहुत ही प्रतिभाशाली खानदान था। उसके हर सदस्य पर एक किताब लिखी जा सकती है। हमने किताब लिखने के सिलसिले में बिखरे हुए प्रिंसेप खानदान के कई लोगों को मिलाया।
प्रश्न-अपना कोई रोचक अनुभव?
उत्तर- 2003 में एक स्कालरशिप मिलने पर मैं अपनी पत्नी के साथ इंग्लैंड गया था वहां पर एक सज्जन फ्रे ड पिल मिला जो भारत में 10 वर्ष रह चुके थे। इसलिए वे भारत से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी अपने पास रखते थे। यहां की पेंटिंग्स, लेख, किताबें आदि। उन्हें जब पता चला कि एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल मैंने लिखी है तो वह खुश हो गए। उन्होंने हमें लंच पर बुलाया काफी दिलचस्प बातें हुईं। उनके परिवार में कोई नहीं था। मैं चाहता था कि वह अपनी किताबें मुङो दे दें। फिर उन्होंने हमें डिनर पर भी बुलाया। बात धीरे-धीरे आगे बढ़ी जब उन्हें पता चला कि हम यहां रिसर्च के लिए आए हैं और हास्टल में रह रहे हैं तो उन्होंने यूरोप टूर पर जाने से पहले अपने पांच कमरों के मकान में हमें रहने के लिए कहा। यह हमारे लिए अच्छा था। मैं जब वापस आया तो उनसे संपर्क में बना रहा। जब उन्हें पता चला कि उन्हे कैंसर है और वह कम दिनों के मेहमान हैं तो उन्होंने अपनी किताबों और पुराने सामानों का संग्रह ब्रिटिश म्यूजियम के नाम अपनी वसीयत में कर दिया। और हमें सूचित किया कि अगर वह बचा हुआ कुछ चाहते हैं तो संपर्क कर सकते हैं। मैं इंग्लैंड गया उनसे बात की और उनके इस संग्रह के महत्व को भारत के लिए महत्वपूर्ण बताया। फिर उन्होंने अपनी वसीयत निरस्त करके मेरे नाम की। लगभग 100 से अधिक बक्सों में वह सामान उनके मरने के बाद भारत आया। ऐसा पहली बार हुआ था कि विदेश से कोई धरोहर भारत आई हो। यह अमूल्य धरोहर है। हमने उसे बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी के भारत कला भवन में रखवाया और उसके नाम से यह गैलरी जिसे भारी संख्या में लोग देखने आते हैं।
प्रश्न- क्या इस पुस्तक की कीमत इसके बहुत से इच्छुक पाठकों तक पहुंचने में बाधक नहीं होती?
उत्तर- यह सही है, लेकिन प्रकाशक का अपना दृष्टिकोण है, वे इसे एक संग्रहणीय पुस्तक बनाना चाहते हैं। इसके निर्माण में लागत भी अधिक आई है। लेकिन जेम्स प्रिंसेप की जीवनी आने पर यह शिकायत दूर हो जाएगी।
प्रश्न- अंत में आप जेम्स प्रिंसेप के बारे में क्या कहना चाहते हैं?
उत्तर- अगर मानव इतिहास में कुछ प्रतिभाशाली व्यक्तियों की सूची बनाई जाए उसमें मेरे अनुसार जेम्स प्रिंसेप का स्थान सबसे ऊपर आएगा।
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Saturday, September 26, 2009
नानी की कहानी में जोड़ो पानी

गौहर रजा
चंद्रमा पर पानी होने की पुष्टि होना निश्चित रूप से धीरज बधाने वाली बात है। मनुष्य पहली बार 1969 में चंद्रमा पर कदम रखा। तभी से चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी का पता लगाने के लिए खोज शुरू हो गई। अमेरिका, रूस और भारत के खगोल वैज्ञानिकों ने पानी की मौजूदगी को लेकर तमाम शोध किए। अमेरिका और रूस ने मिशन भेजे। लेकिन यहां मैं एक बात और जोड़ना चाहूंगा कि चंद्रयान -1 के इस खुलासे के पहले अब तक चंद्रमा से प्राप्त आंकड़ों और जानकारियों पर दुनिया के वैज्ञानिकों में मतैक्य नहीं था। वैज्ञानिकों का एक धड़ा चंद्रमा पर पानी होने के पक्ष में था, जबकि एक तबका पानी होने के तर्क को खारिज करता आया है। लेकिन चंद्रयान-1 पर गए नासा के ‘मून मैपरज् ने चंद्रमा पर पानी होने की ताकीद कर दी है। यही नहीं बहुत पहले अपोलो-9 द्वारा लाए गए चट्टान भी इस बात की जानकारी देते हैं कि चंद्रमा पर पानी की संभावना है। लेकिन वैज्ञानिकों का एक समूह उस डाटा पर विश्वास नहीं करता था। आज 40 साल बाद यह बात साबित हो गई। सन 1998-99, 2007 और अब 2009 में चंद्रमा पर पानी होने की बात स्वीकारी गई है। सिर्फ निश्चित सिद्धांत न होने के कारण इतना समय निकल गया।
चंद्रयान-1 के कारण पहली बार हमारे पास आंकड़े भी हैं और एक निश्चित सिद्धांत भी। यह सिद्धांत सूर्य से आने वाली हवाओं पर आधारित है, जिससे हाइड्रोजन आयन समृद्ध होता है। सूर्य की किरणें जब किसी भी चीज से टकराती हैं, तो उससे वे संपृक्त हो जाती हैं। इसी कारण यह ओएच बांड बनाती हैं और आक्सीजन के साथ आसानी से जुड़ती हैं। पहली बार हमारे पास यह सिद्धांत मौजूद है। जहां तापमान कम होता है, वहां पानी का बनना सामान्य प्रक्रिया है। इससे यह माना जाता है कि चंद्रमा के निचली सतहों पर पानी हो सकता है। यह सिद्धांत है कि जहां सूरज ढल रहा होता है, वहां पानी अधिक होता है, जिस तरह ध्रुवों पर पानी अधिक है। यहां पर एेसा सूर्य के तिरछी किरणों के आने के कारण है। लेकिन जहां पर सूर्य की सीधी किरणें पड़ती हैं, वहां पर यह संभावना कम होने लगती है। भारत को मार्च 2009 में ही चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी का पता चल गया था। इसे चंद्रयान ने साबित किया है। निश्चित रूप से यह दुनिया के लिए बड़ी उपलब्धि है। और इस उपलब्धि पर भारत को सौ प्रतिशत गर्व है। निश्चित रूप से विकासशील देशों में यह उपलब्धि हासिल करने वाला भारत पहला देश है। आज अगर गैलीलियो जिंदा होता तो वह शायद धरती का सबसे खुश इंसान होता। उसने जो बात पहले कही, आज सही साबित हो रही है।
चांद पर पानी किस रूप में है। यह कहना कठिन है, क्योंकि इसे लेकर अभी केवल कयास ही लगाए जा सकते हैं। प्रामाणित तथ्यों का अभाव है। लेकिन यह खुशी की बात है कि चंद्रमा पर जीवन संभव है। थोड़ी मुश्किलें आ सकती हैं। लेकिन चंद्रमा पर जीवन बनाया जा सकता है। लेकिन इससे पहले अभी यह पता लगाना जरूरी है कि वहां पानी कितना और किस रूप में है। अभी चंद्रमा पर पानी की मात्रा को लेकर स्थितियां साफ नहीं हो पाई हैं। अब चंद्रयान के इस खुलासे के बाद निश्चित तौर पर अमेरिका, रूस और चीन चंद्रमा पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे। चंद्रमा पर पानी होने की पुष्टि से अन्य ग्रहों पर भी पानी, जीवन की संभावना तलाशने में मदद मिलेगी। यदि आने वाले दिनों में वैज्ञानिक चंद्रमा पर आधार शिविर बनाने में सफल हो जाते हैं तो अन्य ग्रहों और आकाश गंगा को खंगालने में काफी मदद मिल सकती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि चंद्रयान-1 की इस सफलता से इसरो ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगाई है। उसने इतिहास रचा है। लेकिन चंद्रमा पर पानी होने की खोज का श्रेय हम केवल इसरो या केवल नासा को नहीं दे सकते। यह विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में जुटे दुनिया भर के वैज्ञानिकों का मिला जुला प्रयास है। इसमें सभी का योगदान है। लेकिन भारत के लिए यह विशिष्ट उपलब्धि है। और प्रत्येक भारतीय इस उपलब्धि पर गौरवान्वित और फख्र महसूस कर सकता है। अब चंद्रमा पर पानी होने की पुष्टि ने उसकी खूबसूरती में और इजाफा कर दिया है। चांद पहले से और शीतल होगा। शायरों के लिए चांद अब पहले वाला चांद नहीं रहेगा।
(अभिनव उपाध्याय से बातचीत पर आधारित)
Friday, September 25, 2009
सादगी भी एक अदा ठहरी
भई, अपनी तो सरकार वही जो अदा रखती हो। सादगी के हो-हल्ले में लगा कि ये बेनाज-बेअदा बला कहां से आयी! अब मुतमइन हुए कि अरे यह सादगी भी एक अदा ही ठहरी। आज के खुल्लम-खुल्ला खुलेपन में लाज की गठरी बनी न जाने कहां सिमटी-सिकुड़ी बैठी थी। उसे उठाकर सरेबाजार फिर ले आयी सरकार तो शायद इस ख्याल से कि दुनिया देखे कि हमारी यह भी है कि एक अदा और! बेहद जतन से इसकी मिजाजपुर्सी चली। जरा सी ठेस जिससे लगी उस पर लानत भेजी। इसलिए ही तो शशि थरूर की, अब के जो लौटे सफर से खूब मेहमानी हुई। सोनियाजी, प्रणब दा और एंटनी साहब के दर-दर भटके। समझ में आ गया न हम सादगी समङो, न राजनीति समङो!
असल में गलती न थरूर की है न कृष्णा की, न उन किसी की भी जो घोर गरीबी और अंधेरों में रह रहे इस महादेश के करोड़ों लोगों से बेखबर, चमक-दमक के दिलदादा हैं। अब उनसे अपने बहिश्त को जनता के दोजख में डाल देने की उम्मीद करना मासूमियत ही है। देश की फिजां ही बदली हुई है। जलवों की लूट है। जश्नों की धूम है। कमाने-धमाने-खर्चने की छूट है। उदारीकरण में जीवन ही जीवन है। मरण तो उसके बाहर है। ऐसे में उल्टी गंगा बहाना अकारथ ही जाएगा। चील से मांस की रखवाली और घोड़े से घास से यारी की गुजारिश बेजा है। हफीज जलंधरी की ‘अभी तो मैं जवान हूंज् नज्म याद आती है- ‘सुनो जरा शेखजी/अजीब शै हैं आप भी/ हवाएं इत्रबेश हों/ अदाएं फित्नाखेज हों / तो जोश क्यों न तेज हो/सुगंध ही सुगंध और बाजारू मारक अदाएं! मोह मन मोहे, लोभ ललचाये इसमें नाजायज क्या!
कोई भी चीज, फिर चाहे वह सादगी हो या संयम, संकल्प के बिना बेमानी हैं। और जब तक कोई विचार, उद्देश्य और लक्ष्य न हो, तब तक संकल्प काहे का? बात सन् 1930 की है। मेरे पिता सोलह के होंगे। दुर्गावती की समाधि पर संकल्प लिया। खादी पहनेंगे। आंदोलन में शामिल होंगे। घर में घोर गरीबी। घरवालों की चाहत, कि नौकरी करें। तब आंदोलन के साथ पढ़ाई और पढ़ाई के लिए ट्यूशन करने लगे। 32-33 में खादी की कीमत दोगुनी हो गयी। क्या करें। बापू को चिट्ठी लिखी। अपना हाल बताया। पूछा, संकल्प कैसे पूरा हो? गांधीजी का जवाब आया। ‘डियर गणेश प्रसाद, ‘वेयर देयर इज ए विल, देयर इज ए वे। कट शॉर्ट युअर एक्सपेंसेज। खर, पिता ने आजीवन संकल्प साधा। लेकिन बात गांधीजी की है। उनका एक उद्देश्य था। और खादी उसका एक औजार। इसीलिए एक गरीब छात्र को भी वे सलाह देते हुए निर्मोही थे। अब सोनियाजी ने खुद इकोनॉमी क्लास में यात्रा कर एक संदेश देने की कोशिश की। राहुल और उनकी मजबूरी है सुरक्षा। लेकिन संदेश कौन ले? उल्टे शाही खर्चो और शौक के दफ्तरों की खबरें खुलने लगीं। अगर सादगी योजना है तो उसे वैसे ही लागू होना चाहिए। लेकिन तब फिर सरकारी योजनाओं की तरह सद्गति सादगी को मिलनी ही है।
दरअसल सादगी-संयम सभी सापेक्ष चीजें हैं। आज की सादगी पहले से अलग ही होगी। मुख्य चीज है सार्वजनिक शोभनीयता। उसी में से निकलती या उसके ही बरक्स दिखती है सादगी। और जब आप उसके सामने इसे रखते हैं तो सादगी भी बहुत बड़ी चीज हो जाती है। वह ज्यादा ध्यान, ज्यादा एकाग्रता और प्रयत्न मांगती है। सार्वजनिक शोभनीयता के ख्याल से जो भी असंगत है, हेच-पोच है वहां सादगी, संयम की दरकार है। बोलने-चालने, बर्ताव में। जीवन के सभी अंगों में। समाज-राजनीति-शिक्षा सभी क्षेत्रों में। इनमें जो भी फूहड़ है वहां सादगी की जरूरत है। भाजपा खुद मानती है कि चुनाव में अनाप-शनाप बोलना महंगा पड़ा। पता नहीं वह और उसके परिवारी कब समङोंगे कि हुसैन के साथ सलूक भी उनका बेजा और फूहड़ है। फिर एक अदद अनुपात और संतुलन भी चाहिए। ताजा मिसाल महाराष्ट्र के होने वाले चुनाव की है। कांग्रेस हो या भाजपा सभी के नेता पुत्र-पुत्रियों के लिए टिकटार्थी हैं। राष्ट्रपति के पुत्र भी। सोचिए सार्वजनिक शोभा के लिए यह सब कितना भदेस और त्रासद है। कांग्रेस की सरकार है इसलिए उसकी भूमिका बड़ी, नेतृत्वकारी है। यह कहना दूर की कौड़ी नहीं है कि महाराष्ट्र और अन्य जगहों का यह परिवारवाद आपकी सादगी के परखचे भी उड़ाता है। राहुल की युवा संगठनों में लोकतंत्र लाने की कोशिश को तो यह मजाक बनाता ही है। चुनाव महत्वपूर्ण है, चयन भी उतना ही और शोभनीयता भी उतनी ही। अफसोस यह है कि कोई भी चीज यहां मुद्दा या बहस नहीं बन पाती। गुजरात के दंगों पर बहस शुरू करो तो 84 की बात छेड़ दी जाती है। उस पर करो तो कोई बात और अधबीच शुरू हो जाती है। सादगी पर भी यही हुआ। फिजूलखर्ची के किस्सों में और दिखावा-छलावा के आरोप में वह धंस गयी। अजब हाल है मंत्री और मीडिया सादगी नहीं समझते। एक मुख्यमंत्री, सरकार-संगठन मजाक नहीं समझते। मुख्य विपक्षी दल कला नहीं समझता। थरूर बच गए पर हुसैन तो यहां के निकाले हुए ही हैं।
मनोहर नायक
असल में गलती न थरूर की है न कृष्णा की, न उन किसी की भी जो घोर गरीबी और अंधेरों में रह रहे इस महादेश के करोड़ों लोगों से बेखबर, चमक-दमक के दिलदादा हैं। अब उनसे अपने बहिश्त को जनता के दोजख में डाल देने की उम्मीद करना मासूमियत ही है। देश की फिजां ही बदली हुई है। जलवों की लूट है। जश्नों की धूम है। कमाने-धमाने-खर्चने की छूट है। उदारीकरण में जीवन ही जीवन है। मरण तो उसके बाहर है। ऐसे में उल्टी गंगा बहाना अकारथ ही जाएगा। चील से मांस की रखवाली और घोड़े से घास से यारी की गुजारिश बेजा है। हफीज जलंधरी की ‘अभी तो मैं जवान हूंज् नज्म याद आती है- ‘सुनो जरा शेखजी/अजीब शै हैं आप भी/ हवाएं इत्रबेश हों/ अदाएं फित्नाखेज हों / तो जोश क्यों न तेज हो/सुगंध ही सुगंध और बाजारू मारक अदाएं! मोह मन मोहे, लोभ ललचाये इसमें नाजायज क्या!
कोई भी चीज, फिर चाहे वह सादगी हो या संयम, संकल्प के बिना बेमानी हैं। और जब तक कोई विचार, उद्देश्य और लक्ष्य न हो, तब तक संकल्प काहे का? बात सन् 1930 की है। मेरे पिता सोलह के होंगे। दुर्गावती की समाधि पर संकल्प लिया। खादी पहनेंगे। आंदोलन में शामिल होंगे। घर में घोर गरीबी। घरवालों की चाहत, कि नौकरी करें। तब आंदोलन के साथ पढ़ाई और पढ़ाई के लिए ट्यूशन करने लगे। 32-33 में खादी की कीमत दोगुनी हो गयी। क्या करें। बापू को चिट्ठी लिखी। अपना हाल बताया। पूछा, संकल्प कैसे पूरा हो? गांधीजी का जवाब आया। ‘डियर गणेश प्रसाद, ‘वेयर देयर इज ए विल, देयर इज ए वे। कट शॉर्ट युअर एक्सपेंसेज। खर, पिता ने आजीवन संकल्प साधा। लेकिन बात गांधीजी की है। उनका एक उद्देश्य था। और खादी उसका एक औजार। इसीलिए एक गरीब छात्र को भी वे सलाह देते हुए निर्मोही थे। अब सोनियाजी ने खुद इकोनॉमी क्लास में यात्रा कर एक संदेश देने की कोशिश की। राहुल और उनकी मजबूरी है सुरक्षा। लेकिन संदेश कौन ले? उल्टे शाही खर्चो और शौक के दफ्तरों की खबरें खुलने लगीं। अगर सादगी योजना है तो उसे वैसे ही लागू होना चाहिए। लेकिन तब फिर सरकारी योजनाओं की तरह सद्गति सादगी को मिलनी ही है।
दरअसल सादगी-संयम सभी सापेक्ष चीजें हैं। आज की सादगी पहले से अलग ही होगी। मुख्य चीज है सार्वजनिक शोभनीयता। उसी में से निकलती या उसके ही बरक्स दिखती है सादगी। और जब आप उसके सामने इसे रखते हैं तो सादगी भी बहुत बड़ी चीज हो जाती है। वह ज्यादा ध्यान, ज्यादा एकाग्रता और प्रयत्न मांगती है। सार्वजनिक शोभनीयता के ख्याल से जो भी असंगत है, हेच-पोच है वहां सादगी, संयम की दरकार है। बोलने-चालने, बर्ताव में। जीवन के सभी अंगों में। समाज-राजनीति-शिक्षा सभी क्षेत्रों में। इनमें जो भी फूहड़ है वहां सादगी की जरूरत है। भाजपा खुद मानती है कि चुनाव में अनाप-शनाप बोलना महंगा पड़ा। पता नहीं वह और उसके परिवारी कब समङोंगे कि हुसैन के साथ सलूक भी उनका बेजा और फूहड़ है। फिर एक अदद अनुपात और संतुलन भी चाहिए। ताजा मिसाल महाराष्ट्र के होने वाले चुनाव की है। कांग्रेस हो या भाजपा सभी के नेता पुत्र-पुत्रियों के लिए टिकटार्थी हैं। राष्ट्रपति के पुत्र भी। सोचिए सार्वजनिक शोभा के लिए यह सब कितना भदेस और त्रासद है। कांग्रेस की सरकार है इसलिए उसकी भूमिका बड़ी, नेतृत्वकारी है। यह कहना दूर की कौड़ी नहीं है कि महाराष्ट्र और अन्य जगहों का यह परिवारवाद आपकी सादगी के परखचे भी उड़ाता है। राहुल की युवा संगठनों में लोकतंत्र लाने की कोशिश को तो यह मजाक बनाता ही है। चुनाव महत्वपूर्ण है, चयन भी उतना ही और शोभनीयता भी उतनी ही। अफसोस यह है कि कोई भी चीज यहां मुद्दा या बहस नहीं बन पाती। गुजरात के दंगों पर बहस शुरू करो तो 84 की बात छेड़ दी जाती है। उस पर करो तो कोई बात और अधबीच शुरू हो जाती है। सादगी पर भी यही हुआ। फिजूलखर्ची के किस्सों में और दिखावा-छलावा के आरोप में वह धंस गयी। अजब हाल है मंत्री और मीडिया सादगी नहीं समझते। एक मुख्यमंत्री, सरकार-संगठन मजाक नहीं समझते। मुख्य विपक्षी दल कला नहीं समझता। थरूर बच गए पर हुसैन तो यहां के निकाले हुए ही हैं।
मनोहर नायक
Tuesday, September 22, 2009
गंगा- जमुनी तहजीब का कलावा
शेराज अहमद, अनारू, जुबैर, इसरार अहमद और ऐसे ही करीब 100 से भी ज्यादा लोग हर सुबह हिंदू धर्म के सबसे पवित्र धागे को अपनी मेहनत से तैयार करते हैं। यह दिलचस्प है कि जो धागा हिंदू धर्म में सबसे पवित्र व अहम माना जाता है उसे मुस्लिम धर्म के 22 घरों के करीब सौ से भी ज्यादा लोग तैयार करते हैं। जी हां हिंदू धर्म में सबसे पवित्र माने जाने वाले कलावा, कलाई नारा या रक्षा सूत्र को पूरे विश्व में एक ही जगह बनाया जाता है। संगम की पावन धरती प्रयाग (इलाहाबाद) से करीब 40 किलोमीटर की दूरी पर लालगोपाल गंज कस्बा पड़ता है और यही पर स्थित दो गांव अल्हादगंज व खंजानपुर में दिन रात कलावे (रक्षा सूत्र) बनाने का काम किया जाता है। नवरात्रि के समय कलावे की मांग बढ़ जाने पर यहां पर दिन रात कलावे व माता की चुनरी बनाने का काम तेजी से होते देखा जा सकता है। अल्हादपुर गांव के नफीस अहमद बताते हैं कि उनके दादा-परदादा इस काम को करते आ रहे हैं। यह काम पुश्तैनी हो चुका है नफीस अपने बच्चों को भी इस काम में लगा चुके हैं। नफीस ने बताया कि करीब 100 साल से यह काम पूरी दुनिया में सिर्फ इन्हीं दो गावों में किया जाता है। मुस्लिमों में रंगरेज बिरदारी ही इस काम को अंजाम दिया करती है। नफीस के यहां कलावे बनाने का काम प्रत्येक सुबह तीन बजे से शुरू हो जाता है। कच्चा माल भिवंडी से आता है जिसे लाछा या नारा कहा जाता है। यह 40 से 45 रुपए प्रति किलो के हिसाब से मिलता है। इसको घर की महिलाएं धागे के रूप में कई लच्छों में बांटतीं हैं। इसके बाद काम होता है रंगाई का। लाल व पीले रंगों को क्रमश: कांगो लाल व खपाची पीला कहा जाता है जिसे कानपुर से मंगाया जाता है। लच्छों को गर्म रंगीन पानी में डालकर सुखाने के लिए रखा जाता है। और फिर तैयार होता है रक्षासूत्र। रोजा रह रहे अफरोज रंगरेज ने बताया कि हर दिन उसे 40 से 60 किलो लच्छे को रंगना होता है। बीस किलो को एक नग या ताव कहा जाता है। एक ताव को तैयार करने के लिए यहां के लोगों को सत्तर रुपए मिलते हैं। प्रतिदिन 100 से ज्यादा लोग रंगाई के इस काम को करते हैं और तैयार करते हैं 20 से 30 कुंतल कलावा। मार्केट में कलावे की सप्लाई 55 से 60 रुपए प्रति किलो के रेट पर की जाती है। 15 रुपए के इस मुनाफे में 22 घर व सैकड़ों लोग अपनी जीविका चलाते हैं। 19 साल के रहमान कहते हैं कि जिसने जितना काम किया होता है उसे उसकी मजदूरी का पैसा तुरंत मिल जाता है। इसी गांव में आदिल सलाम उर्फ दलाल चुनरी बनाने का काम करते हैं। चुनरी के लिए कच्चा माल अहमदाबाद से लाया जाता है जिसमें नमकी कलर का प्रयोग कर विभिन्न डिजाइन देने के बाद चुनरी तैयार की जाती है। छोटी और बड़ी साइज की चुनरी तैयार करने के बाद इनमें इंटरलाकिंग का काम गांव की महिलाएं घरों में करतीं हैं। 100 चुनरी की इंटरलाकिंग 20 से 25 रुपए के रेट पर की जाती है। रेहाना खातून 70 साल की हैं और सुबह घर के काम काज से खाली होकर दिन भर इसी काम में मशगूल हो जातीं हैं। रेहाना ने बताया कि नवरात्रि और मेले में चुनरी की मांग तेज हो जाती है। रेहाना के शौहर का इंतकाल 20 साल पहले हो गया था और तब से वह अपनी दो बेटियों और तीन बेटों की पढ़ाई का खर्चा इसी से निकाल रही हैं। इस धंधे में मंदी का कोई असर पड़ने के बारे में आदिल उर्फ दलाल ने बताया कि पूरी दुनिया में वास्तविक कलावा लालगोपालगंज में ही बनाया जाता है और इसी कारण भारत ही नहीं बल्कि मलेशिया, नेपाल, ब्रिटेन, अमेरिका, लंदन पाकिस्तान जसे देशों में भी इसकी सप्लाई की जाती है। भारत के सभी प्रसिद्ध मंदिरों में कई महीनों पहले से ही आर्डर देकर थोक के भाव कलावे व चुनरी बनवाई जातीं हैं। मैहर, मुंबा देवी, विंध्याचल, वैष्णो देवी, कालका जी, ज्वाला देवी, बालाजी मंदिर, सिद्धीविनायक जसे तमाम बड़े धार्मिक स्थलों के आर्डर महीनों पहले यहां पर आ चुके हैं। आदिल बताते हैं कि वर्तमान में आदमी कम पड़ जाते हैं लेकिन सप्लाई पूरी नहीं हो पाती है। आज के दिन में अल्हादपुर व खंजान पुर के लोगों के पास इतना काम है कि वह 24 घंटे भी काम करें तो भी डिमांड पूरी नहीं की जा सकती है। प्राइवेट कंपनियों के कलाई नारा बनाने के काम में कूदने पर यहां का रंगरेज समुदाय खासा नाखुश है इनका मानना है कि सरकार को इस काम को बढ़ावा देना चाहिए। सरकार की ओर से एक रुपए की भी मदद न मिलने से गांव वाले खासे नाराज हैं। लेकिन काम इतना ज्यादा है कि किसी को गिला तक करने की फुर्सत नहीं हैं। बिजली समय पर आ जाती है तो चुनरी में डिजाइन व प्रेसिंग का काम समय पर हो जाता है वरना रंगाई व धुलाई के लिए कुएं व हैंडपंप के पानी पर ही आश्रित रहना पड़ता है। गांव की दो मस्जिदों के इर्द-गिर्द रहने वाले इन लोगों की दिनचर्या पांचो वक्त नमाज अदा कर इस धागे में रंग घोलने तक सीमित है। इनके बच्चे इन धागों व चुनरियों को सुखाने के लिए खेतों में ले जाया करते हैं। खेतों में फैले रंगीन धागे व चुनरयिां सुबह के वक्त किसी मनोरम दृश्य से कम नहीं होते हैं। 12 साल के सादिक उर्फ सोनू को इन लाल रंग के धागों से खेलना अच्छा लगता है, उसे नहीं पता कि इन धागों की अहमियत क्या है, वह तो बस इतना जानता है कि उसके अब्बू व भाईजान सुबह तीन बजे से ही इन धागों व चुनरियों को रंगने में व्यस्त थे और अब उसकी जिम्मेदारी है कि जब ये सूख जाएं तो करीने से इनको घर ले जाकर अम्मी को देना है। गांव के ही एक मस्जिद के मौलवी अश्फाक अहमद ने नमाज अदा करने के बाद बातचीत में बताया कि यह एकता का जीता जागता प्रमाण ही है कि हिंदू धर्म के सबसे बुनियादी व अनिवार्य वस्तु से मुस्लिम समुदाय का एक हिस्सा अपनी रोजी रोटी चला रहा है। सरकार को इस छोटे लेकिन महत्वपूर्ण व्यवसाय को व्यवस्थित करने के लिए कुछ मदद करनी चाहिए।
सर्वेश उपाध्याय
चित्र- अभिषेक शुक्ल
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Wednesday, September 9, 2009
मंहगाई में प्रेम पत्र
हे मन प्रिये, मैं सच कहता हूं चाहो तो वित्तमंत्री की कसम खिला लो। जब मैंने पत्र लिखना शुरू किया तभी कलम रुक-रुक कर चलने लगी। मैं जान गया कि इसे भी पैसेंजर ट्रेन वाली आदत पड़ गई है। लेकिन कलम की स्याही जवाब दे गई। मध्य रात्रि को घनघोर गर्मी में जूझते हुए जब पड़ोसी से कलम के लिए दरवाजा खटखटाया तो उसे लगा कि यह फिर चाय पत्ती मांगने आ गया। बहुत मनुहार के बाद जब उसे विश्वास हुआ कि मैं वास्तव में कलम पिपासू हूं तो उसने दरवाजा खोला और फिर कलम देकर झट से बंद कर दिया। सच मानो तुम्हे पत्र लिखते समय कलेजा सेंसेक्स की तरह ऊपर नीचे हो रहा है। मेरे हृदय में तुम्हारा जो स्थान है वह निश्चित रूप से सोने के भाव की तरह है जो नीचे होने वाला नहीं है।
यह सत्य है कि हमारे-तुम्हारे बीच पक्ष-विपक्ष की तरह वार्तालाप नहीं हुआ लेकिन प्रेम के राज्य में मुख की अपेक्षा नेत्र अधिक बोलते हैं। आजकल प्रेम राज्य में सूखा है सरकारी घोषणा के बावजूद भी मेरे मन के रेगिस्तान में किसी जलबोर्ड का पानी नहीं आया है। सच कहूं तो जल बोर्ड का पानी घर पर भी नहीं है। इसलिए सूखा दो तरफा है। हां एकाध बार बारिश हुई लेकिन कम्बख्त छत भी सरकारी व्यवस्था की तरह कमजोर निकली और बस भीग गया कागज। बहरहाल तुम चिंता मत करो।
कल कबीर को पढ़ रहा था। प्रेम गली अति सांकरी, यामे दुई न समाय। यह बिल्कुल सच है। प्रेम की गली में मंहगाई और मैं एक साथ नहीं रह सकते। मंहगाई के कारण मेरा प्रवेश लगभग वर्जित है। मन रोटी दाल के भाव देखकर चिहुंक जाता है। प्रणय, परिणय और प्रीत के बीच मंहगाई की घोड़ी दुलत्ती झाड़ रही है। प्रेम का मुहावरा प्रचलित है ‘लव मी एंड लव माई डागज् मतलब, हे प्रिये तुम मुङो चाहो तो मेरे चाहने वालों को भी चाहो। मुङो पता है शायद तुम यह कहो लेकिन, इस मंहगाई में एक ही भारी पड़ रहा है अत: उम्मीद है कि भावनाओं को समझोगी। अब दूसरी कलम भी जवाब दे रही है अत: हे.. पत्र का उत्तर शीघ्र पाने की आकांक्षा के साथ आपका गरीब नाथ।
शीघ्र पत्र आया.. हे गरीब नाथ, मैं आपकी भावनाओं को समझ रही हूं अत: जब आर्थिक मंदी बीत जाए तब ट्राई करना। अभी मेरे पास भी वक्त नहीं है आजकल रोज शॉपिंग में व्यस्त रहती हूं। तुम्हारी..सुखहरणी
अभिनव उपाध्याय
यह सत्य है कि हमारे-तुम्हारे बीच पक्ष-विपक्ष की तरह वार्तालाप नहीं हुआ लेकिन प्रेम के राज्य में मुख की अपेक्षा नेत्र अधिक बोलते हैं। आजकल प्रेम राज्य में सूखा है सरकारी घोषणा के बावजूद भी मेरे मन के रेगिस्तान में किसी जलबोर्ड का पानी नहीं आया है। सच कहूं तो जल बोर्ड का पानी घर पर भी नहीं है। इसलिए सूखा दो तरफा है। हां एकाध बार बारिश हुई लेकिन कम्बख्त छत भी सरकारी व्यवस्था की तरह कमजोर निकली और बस भीग गया कागज। बहरहाल तुम चिंता मत करो।
कल कबीर को पढ़ रहा था। प्रेम गली अति सांकरी, यामे दुई न समाय। यह बिल्कुल सच है। प्रेम की गली में मंहगाई और मैं एक साथ नहीं रह सकते। मंहगाई के कारण मेरा प्रवेश लगभग वर्जित है। मन रोटी दाल के भाव देखकर चिहुंक जाता है। प्रणय, परिणय और प्रीत के बीच मंहगाई की घोड़ी दुलत्ती झाड़ रही है। प्रेम का मुहावरा प्रचलित है ‘लव मी एंड लव माई डागज् मतलब, हे प्रिये तुम मुङो चाहो तो मेरे चाहने वालों को भी चाहो। मुङो पता है शायद तुम यह कहो लेकिन, इस मंहगाई में एक ही भारी पड़ रहा है अत: उम्मीद है कि भावनाओं को समझोगी। अब दूसरी कलम भी जवाब दे रही है अत: हे.. पत्र का उत्तर शीघ्र पाने की आकांक्षा के साथ आपका गरीब नाथ।
शीघ्र पत्र आया.. हे गरीब नाथ, मैं आपकी भावनाओं को समझ रही हूं अत: जब आर्थिक मंदी बीत जाए तब ट्राई करना। अभी मेरे पास भी वक्त नहीं है आजकल रोज शॉपिंग में व्यस्त रहती हूं। तुम्हारी..सुखहरणी
अभिनव उपाध्याय
Sunday, August 30, 2009
यह जिन्न है कि ..
बचपन में अलादीन का चिराग से निकला जिन्न कभी-कभी सपने में आ जाता था लेकिन एक बार साध्वी सुगंधा का प्रवचन सुना कि सब गायब। लेकिन जिन्न होता है कि नहीं इस बात की पुष्टि रह-रह कर संदेह पैदा करती है। मान लेते हैं कि नहीं होता है तो बार-बार जिन्ना का जिन्न बोतल से बाहर क्यों आ जाता है। और अगर मान लेते हैं कि होता है तो मुंहमांगी मुराद पूरी क्यों नहीं कर देता। जनाब जिन्न को लेकर मामला आम आदमी के लिए ही क्रिटिकल नहीं है पार्टियों के नेताओं को भी सपने आते हैं। आज का जिन्न बहुत उदार है बिना रगड़े बाहर निकल कर कहता है कि ‘क्या हुक्म है मेरे आका!ज्। जिन्ना का जिन्न तो हमेशा के लिए चिराग से बाहर आकर किताबों में बस गया है। रसातल में जा रही पार्टी को उबारने के लिए अक्सर जिन्ना का जिन्न किताबों से बाहर आता है और दो चार को लपेट कर चला जाता है। लेकिन इससे किसी को खास नुकसान नहीं होता है। मीडिया को मसाला मिल जाता है। बुद्धिजीवी बहस के लिए बुलाए जाते हैं। अखबार वाले भी पन्ने रंगते हैं। पाकिस्तान-भारत नए सिरे से रिश्तों की गरमाहट और ठंडई महसूस करते हैं।
एक विज्ञापन कंपनी ने सहीराम से आइडिया मांगा कि धंधा मंदा है क्या किया जाए? वह बोले, बस कुछ नहीं अपने ग्राहक से कह दो कि वह चिल्लाकर एक बार कह दे कि जिन्ना सेक्युलर नेता था। बाकी काम उसका जिन्न संभाल लेगा।
भाजपा के आडवाणी को जिन्ना प्रेम हुआ कि पार्टी ने कमर कस ली। अब जसवंत सिंह ने अपनी किताबों में जिन्ना को कुछ- कुछ कह दिया। पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। चक्र सुदर्शन की तरह जिन्ना का जिन्न घूम रहा है जो मिला उसे लपेटा, जो छूट गया उसे अगली बार के लिए छोड़ दिया। जिन्न को सुदर्शन ने भी पकड़ लिया और वही बात कह दी जो जिन्ना प्रेमियों ने कही थी। बस मामले ने तूल पकड़ लिया। आश्चर्य की बात यह है कि जिन्न को खुद पता नहीं है कि उसके पास कितनी शक्ति है। वह तो बस ऐसे ही लोगों को छूता है कि असर दिखने लगता है। यह असर अगर चुनाव में दिखा तो चारों तरफ जिन्न ही जिन्न की चर्चा होने लगेगी। बाकी मुद्दों को भूत पकड़ लेगा और शायद पार्टयां दाल-रोटी का भाव भी भूल जाएं।
अभिनव उपाध्याय
एक विज्ञापन कंपनी ने सहीराम से आइडिया मांगा कि धंधा मंदा है क्या किया जाए? वह बोले, बस कुछ नहीं अपने ग्राहक से कह दो कि वह चिल्लाकर एक बार कह दे कि जिन्ना सेक्युलर नेता था। बाकी काम उसका जिन्न संभाल लेगा।
भाजपा के आडवाणी को जिन्ना प्रेम हुआ कि पार्टी ने कमर कस ली। अब जसवंत सिंह ने अपनी किताबों में जिन्ना को कुछ- कुछ कह दिया। पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। चक्र सुदर्शन की तरह जिन्ना का जिन्न घूम रहा है जो मिला उसे लपेटा, जो छूट गया उसे अगली बार के लिए छोड़ दिया। जिन्न को सुदर्शन ने भी पकड़ लिया और वही बात कह दी जो जिन्ना प्रेमियों ने कही थी। बस मामले ने तूल पकड़ लिया। आश्चर्य की बात यह है कि जिन्न को खुद पता नहीं है कि उसके पास कितनी शक्ति है। वह तो बस ऐसे ही लोगों को छूता है कि असर दिखने लगता है। यह असर अगर चुनाव में दिखा तो चारों तरफ जिन्न ही जिन्न की चर्चा होने लगेगी। बाकी मुद्दों को भूत पकड़ लेगा और शायद पार्टयां दाल-रोटी का भाव भी भूल जाएं।
अभिनव उपाध्याय
Saturday, August 29, 2009
अभी तो मैं जवान हूँ

सुप्रसिद्ध कथाकार और हंस के संपादक राजेन्द्र यादव 28 अगस्त को 80 वर्ष के हो गए । इस उम्र में भी वे वैसे ही जुझारू, बौद्धिक रूप से सजक और रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं जिसके लिए उन्हे शुरू से ही जाना जाता है। भारतीय वंचित समाजों के लिए भूमिका ऐतिहासिक महत्व की है। बहस तलब हर मुद्दे-प्रसंग पर राजेन्द्र यादव एक नई दृष्टि लेकर आए हैं। नयापन उनकी विशिष्टता है जिसके कारण वे हिन्दी जगत की चेतना पर हमेशा अपना दबदबा बनाए रखते हैं। इस उम्र में भी उनकी सक्रियता के पीछे उनका नयापन है। वे खुद कहते हैं कि नयापन का अर्थ है जिज्ञासा और भविष्य को देखने की क्षमता। सालगिरह के अवसर पर मशहूर कथाकार, विचारक और ‘हंसज् के संपादक राजेन्द्र यादव से पंकज चौधरी की बातचीत
प्रश्न 1-मशहूर कथाकार संजीव ने अपने एक इंटरव्यू में आपको ‘बांका जवानज् कहा था। आपकी सक्रियता, गतिशीलता और लड़ाकू तेवर को देखते हुए अभी भी संजीव की बात आपके ऊपर सटिक बैठती है। हालांकि अब आप अस्सी पार के हो गए हैं। इस उम्र में आकर मेरा ख्याल है कि एकाध अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए तो हिन्दी के अमूमन मूर्धन्य भसिया जाते हैं?
-मैं मानता हूं कि आदमी उम्र से वृद्ध नहीं होता। उम्र शरीर की होती है, मन की नहीं। जब तक आपको संसार की सुंदरता आकर्षित करती है तब तक उम्र आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। मैं अभी भी भीतर से अपने-आपको युवा ही महसूस करता हूं। उम्र का अर्थ होता है जिज्ञासा और भविष्य को देखने की क्षमता। इस अर्थ में मैं भविष्यवादी हूं और जो मैं नहीं हूं उसे युवा मित्रों की आंखों में देखकर प्रेरणा पाता हूं। कुछ अतीतजीवी लोग बीस-पच्चीस वर्षो में ही बूढ़े होने लगते हैं। जो यथास्थिति को तोड़ नहीं सकता वह किस बात का युवा है। युवा होने का मतलब है कि मूल मान्यताओं, परंपराओं या विश्वासों को मानने से इनकार करना। हमारे बाप-दादा जहां खड़े थे अगर हम भी वहीं खड़े रहें तो फिर मैं समझता हूं कि हमारा जन्म लेना ही व्यर्थ है।
प्रश्न 2-उम्र के इस मोड़ पर आकर क्या कभी आपको ऐसा लगा कि जीवन अकारथ गया, व्यर्थ गया। आप फलां किताब लिखना चाहते थे, लिख नहीं पाए। कुछ और बड़े कामों को अंजाम देना चाहते थे, दे नहीं पाए। आपने कहीं लिखा है कि यदि आपका पैर सही होता तो आप लेखक की जगह पालिटिशियन होते?
-जितने भी असंतोष हैं सब युवा होने के प्रमाण हैं। मुङो वही सब करना है जो अभी तक मैं नहीं कर पाया। यहां मैं यह बात तुम्हें बता दूं कि पैर का टूटना मेरे लिए कभी भी बाधा नहीं बना। मैं पूरे भारतवर्ष और विदेशों में घूमा हूं। पहाड़ों से लेकर कन्याकुमारी तक। जीवन में कहीं भी ये भावना आड़े नहीं आई कि मुझमें कोई कमी भी है। हां, इसका एक फायदा यह हुआ कि मेरा ध्यान अध्ययन की ओर उत्तरोत्तर बढ़ता चला गया। अभी तक लगभग मेरी 60 किताबें छप चुकी हैं और आठ-दस छपने की तैयारी में हैं। फिर भी मुङो लगता है कि अभी तक मैंने ऐसा कुछ नहीं लिखा जो मेरा अपना हो।
प्रश्न 3- स्त्री विमर्श के आप बड़े पैरोकार हैं। यूपीए-2 का जब गठन हुआ तो कांग्रेस ने तीन महीने के अंदर महिला आरक्षण विधेयक पर मुहर लगाने की बात की। पेंच इसमें यह है कि इस आरक्षण का दलित और पिछड़ी जातियों के नेताओं ने विरोध करना शुरू कर दिया है। माननीय शरद यादव ने तो यहां तक कह दिया कि अगर यह विधेयक अपने मौजूदा स्वरूप में पास होता है तो मैं सुकरात की तरह जहर खा लूंगा। इनका तर्क है कि राजनीति में दलित और पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधित्व को कम करने के लिए ‘महिला आरक्षणज् जसा षड्यंत्र रचा गया है। दूसरी ओर इनका कहना है कि हां, ‘आरक्षण के अंदर अगर आरक्षणज् हो तो इस विधेयक को पारित करने पर विचार किया जा सकता है। मेरा ख्याल है कि ‘आरक्षण के अंदर आरक्षणज् का जो तर्क है उसमें दम है, क्योंकि मायावती जसी पावरफुल दलित महिला के लिए भी रीता बहुगुना जोशी जसी महिला दिन-दहाड़े अपशब्दों का इस्तेमाल कर देती हैं?
- ये सारी की सारी राजनीति की बातें हैं जो समय और सुविधा को देखकर की जाती हैं। इन्हें गंभीरता से लेनी भी चाहिए और नहीं भी लेनी चाहिए। सही है कि महिला विधेयक अगर पास हुआ तो ऊंचे, प्रभावशाली और सम्पन्न महिलाएं ही विधायिका में छा जाएंगी। इस विधेयक में ऐसा प्रावधान जरूर होना चाहिए कि पिछड़ी और दलित जातियों की महिलाओं को सामने आने का अवसर मिले। अवसर मिलेगा तो मैं समझता हूं कि वे योग्यता भी अर्जित कर लेंगी। सारा खेल अवसरों का है। योग्यता तो बाद की चीज है। अभी तो यह भारत भी सन् 47 में दी गई उस स्वतंत्रता जसा ही लगता है जब उच्च सवर्ण पुरुषों ने सारे शासन को हथिया लिया और महिलाएं और दलित लम्बे वक्त तक इस भ्रम में बने रहे कि यह स्वतंत्रता उन्हें भी मिली है। भ्रम भंग की प्रक्रिया में महिला और दलित आंदोलन सामने आए। डा. आम्बेडकर ने तब भी इस स्वतंत्रता का विरोध किया था। आज अगर महिलाएं ऊंचे पदों पर दिखाई देती हैं तो हम इसे पचा नहीं पाते। जहां तक अशालीन शब्दों के प्रयोग की बात है तो क्या हमने कभी संसद और विधानसभाओं में उन दृश्यों की समीक्षा की है जहां एक-दूसरे को भयंकर गालियां दी जाती हैं। कुर्सियां फेंकी जाती हैं और बाहर निकलकर समझ लेने की धमकियां दी जाती हैं। सही है कि रीता बहुगुना जोशी को ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए था। मगर जब पूरे राजनीति के कुएं में ही भांग पड़ी हो तो अकेले इन्हें ही दोष देना क्यों जरूरी है।
प्रश्न 4-‘हंसज् ने एक लम्बे अरसे तक हिन्दी पट्टी में वैचारिक उत्तेजना पैदा करते रहने का काम किया। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श और उत्तर आधुनिकता जसे विमर्शो को हिन्दी में पैदा करने का श्रेय ‘हंसज् को जाता है। आपके लम्बे-लम्बे सम्पादकीय लेखों ने हमारे जसे युवा लेखकों का निर्माण किया है। ‘हंसज् जब अपने शिखर पर था तो ज्ञानरंजन का वह कथन मुङो याद आता है जिसमें उन्होंने कहा था कि राजेन्द्र यादव ने सारे सरस्वतियों को ‘हंसज् में बिठा रखा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से ‘हंसज् का वो ‘तेजज् पता नहीं कहां गुम हो गया है। अब तो मैं इसे 1-5 में भी नहीं रखता?
- जितनी बातें तुमने ‘हंसज् के बारे में बताई हैं इस संदर्भ में मेरा कुछ भी कहना इसलिए गलत है क्योंकि हंस की उपलब्धियों की चर्चा करना पाठकों का काम है मेरा नहीं। कुछ पाठक तो यह भी कहते हैं कि ‘हंसज् ने जिस तरह की जागरूकता पाठकों में फैलाई है वैसी जागरूकता न कभी किसी पत्रिका ने फैलाई थी और न ही स्वतंत्रता के बाद के किसी भी आंदोलन ने। मगर मैं मानता हूं कि ये सब हिम्मत बढ़ाने की बातें हैं। मुझसे जो बन पड़ा वो मैंने अपने मित्रों की मदद से ही की। हां, ये सही है कि आप हमेशा एक आवेग, गुस्से और उत्तेजना में नहीं बने रहते। ठहराव भी आता है। हो सकता है ‘हंसज् में इधर कोई ठहराव आया हो, मगर शायद हम भारतीयों की आदत है कि जो कुछ पहले हो चुका है वही महान है। जो मिठाइयां और चाट हमने अपने बचपन में खाए थे वैसी आज कहीं नहीं मिलती। जबकि स्थिति यह है कि दोनों पकवानों की कलाओं और स्वाद में बहुत संपन्नता आई है। ‘हंसज् को लेकर तुम्हारी बातों में भी यही है। और यहां तुम्हारा पुराण मोह दिखाई देता है।
प्रश्न 5- ‘हंसज् के सलाना कार्यक्रम में हाल ही में डा. नामवर सिंह ने जिस तरह से दलित लेखक अजय नावरिया के लिए ‘लौंडाज् शब्द का इस्तेमाल किया है, उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम होगी। क्योंकि बिहार और उत्तर प्रदेश में ‘लौंडाज् शब्द के क्या मायने हैं इसको नामवर सिंह से बेहतर कौन जानता होगा। लेकिन यह भी तो सच है कि आप अजय नावरिया को जरूरत से ज्यादा प्रमोट करते रहते हैं। आपके इसी प्रमोशन के कारण बहुत सारे दलित लेखक भी आपके खिलाफ हो गए हैं?
-इसका जवाब मैं ‘हंसज् के अगस्त अंक में दे चुका हूं। वैसे दिल्ली और आगरा की मुसलमानी संस्कृति में ‘लौंडाज् शब्द प्यार में इस्तेमाल किया जाता है। ‘यह आप का लौंडा है।ज् बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो यह शब्द ‘लमड़ाज् हो जाता है। खर! हिन्दी का तीसरा शब्द ‘चेष्टाज् मराठी में अश्लील प्रयत्नों के लिए इस्तेमाल होता है, जिस तरह हिन्दी के ‘बालज् और बांग्ला के ‘बालज् में जमीन आसमान का अंतर है। इसलिए इतना ही नहीं नामवरजी की बाकी बातों को भी गंभीरता से लेने की क्या जरूरत है। वे कहते चाहे जो हों लेकिन वे मूलत: स्त्री, दलित या युवा विमर्श को बहुत समर्थन नहीं देते। ये उनका पुराना रवैया है। उस दिन वे राहुल गांधी की युवा राजनीति को भी साहित्य के आगे चराते रहे।
प्रश्न 6- हिन्दी में दलित विमर्श को शुरू हुए 20 वर्षो से अधिक हो गए हैं। इन वर्षो के दरम्यान एक-से-एक ब्रिलिएंट दलित चिंतक पैदा हुए हैं। मसलन डा. धर्मवीर, कंवल भारती, तुलसीराम, चंद्रभान प्रसाद। इस क्रम में मैं राजेन्द्र यादव और मुद्राराक्षस का भी नाम लेना चाहूंगा। हालांकि आप और मुद्राराक्षस दलित नहीं हैं। मेरे कहने का मतलब यह है कि जिस दलित विमर्श ने एक-से-एक धुरंधर रैडिकल विचारक पैदा किए हों और जिनके विचारों की प्रखरता ने हजार वर्षो के सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य पर सवाल खड़े कर दिए हों, वहां कायदे का एक भी कविता संग्रह, कहानी संग्रह या उपन्यास देखने को क्यों नहीं मिलता? क्या मैं यह मानकर चलूं कि अभी हिन्दी का दलित विमर्श कुछ अच्छी आत्मकथाओं को यदि छोड़ दिया जाए तो रचनात्मक साहित्य की पीठिका ही तैयार कर रहा है?
- हो सकता है कि तुम्हारी बात सही हो। मगर मुङो ऐसा लगता है कि जिस साहित्य में विचार, विवेचना और विश्लेषण का वर्चस्व होता है वहां रचनात्मक साहित्य प्राय: कमजोर हो जाता है या सिर्फ फार्मूलाबद्ध होकर के ही रह जाता है। मार्क्सवादी वैचारिकता को लेकर जो साहित्य रचा गया है उसमें भी बहुत कुछ ऐसा ही है। और यह हमें याद भी नहीं रहता या इसे हम याद भी रखने लायक नहीं समझते। वैसे भी हिन्दी में दलित चेतना राजनीतिक आंदोलनों के बाद आई है। जबकि मराठी में फुले से लेकर अब तक दलित जागरूकता ने ही वहां के रचनाकार और विचारक पैदा किए। चूंकि दलितों और स्त्रियों के पास अपना कोई इतिहास नहीं होता और वहां सिर्फ मालिकों के शासन में रहने वाले स्वामीभक्तों का इतिहास होता है। इसलिए दलित और स्त्रियां अपने आपसे ही इतिहास का प्रारंभ मानती हैं और यह सही भी है। स्वाभाविक है कि ऐसी मानसिकता में आत्मकथाएं ही आएंगी जो वर्तमान से लेकर भविष्य की ओर जाती हुई दिखाई देंगी। वर्तमान से अतीत की ओर तो सिर्फ यातना, प्रताड़ना और शोषण का लंबा इतिहास है इसलिए मैंने पहले भी कई बार कहा है कि हमारे साहित्य का मूलमंत्र ‘सत्यम, शिवम, सुंदरमज् का कुलीनतावादी दृष्टिकोण नहीं हो सकता, बल्कि यातना, संघर्ष और स्वप्न का जुझारू सिद्धांत है।
प्रश्न 7- संजीव और उदय प्रकाश हमारे दौर के दो विशिष्ट कथाकार हैं। संजीव एक ओर जहां, चालू शब्दों में कहें कि प्रेमचंद की परंपरा को लगातार विकसित और समृद्ध करते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उदय प्रकाश साहित्य की दुनिया में जहां कुछ भी नया हो रहा है, उसका प्रयोग बहुत ही खूबसूरती से अपनी कहानियों में करते दीख रहे हैं। कहानी की सेहत के ख्याल से इसीलिए दोनों का महत्व है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उदय प्रकाश के नाम को जिस तरह से उछाला जा रहा है और संजीव के नाम को भुलाने का प्रयास दिख रहा है, उसके पीछे आप क्या देखते हैं?
-संजीव शुद्ध भारतीय गांवों और कस्बों की संघर्ष चेतना के कथाकार हैं। उनके पास जो जानकारियां, शोध और कलात्मक संतुलन हैं वे शायद ही हिन्दी के किसी लेखक के पास हों। निश्चय ही उनकी रचनाओं में प्रेमचंद से ज्यादा विविधता ही नहीं बल्कि अनेक तरह के पात्रों की विशेषताएं भी हैं। उदय प्रकाश देशी-विदेशी रचनाकारों के गंभीर पाठक रहे हैं। उनके पास एक चमकदार और विचारगर्भी भाषा है और वे अपनी भाषा से खेलना जानते हैं। इसी के बल पर वे लम्बे-लम्बे विवरणों और नाटकीयता से पाठकों को बांधे रखते हैं। उन्होंने बहुत कम कहानियां लिखी हैं लेकिन वे निश्चय ही बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि हिन्दी के ये दोनों कथाकार अपने-अपने क्षेत्र में विलक्षण हैं। पाठकों का दृष्टिकोण इनके प्रति वही है जो बड़े और छोटे शहरों के समाजकर्मियों की होती है। एक मीडिया के केन्द्र में होता है और दूसरा सिर्फ स्थानीय हो सकता है, जो स्थानीय है वह ज्यादा मूलगामी कार्य कर रहा है।
प्रश्न 8- हिन्दी अकादमी के विवाद का पटाक्षेप हो गया है। अशोक चक्रधर उपाध्यक्ष के रूप में अकादमी के कार्यो को अंजाम दे रहे हैं। आप लोगों का ‘चक्रधर मिशनज् फेल हो चुका है। अशोक चक्रधर के पीछे आपलोग लट्ठ लेकर इसलिए पड़ गए क्योंकि वे एक मंचीय और हास्य कवि हैं। हिन्दी साहित्य में अभी भी हास्य और लोकप्रियता को इस तरह से देखा जाता है जसे ‘ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत।ज् मेरा मानना है कि जीवन में और प्रकृति में जिस तरह की डायवर्सिटी है, मतलब जीवन में यदि गंभीरता है तो हास्य भी है। दुख है तो सुख भी है, घृणा है तो प्रेम भी है। मतलब जीवन और प्रकृति में एकरसता नहीं है। तो फिर साहित्य में यह डायवर्सिटी क्यों नहीं होनी चाहिए?
- शब्दों के ये विलोम हमें कहीं नहीं ले जाते। व्यक्तिगत रूप से अशोक चक्रधर को मैं आज भी बहुत प्यार करता हूं और मानता हूं कि उन्होंने कविता के मंच को जो सम्मान वापस दिलाया है उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। ज्यादातर कवि जो राजू श्रीवास्तव के प्रतिलोम दिखाई देते हैं। मगर मैं अपने बेटे को चाहे जितना प्यार करता होऊं और उसकी योग्यता से खुद भी आतंकित होऊं लेकिन मैं उसे शायद युद्ध के किसी मोर्चे का इंचार्ज बनाने से पहले कई बार सोचूं। पिछला अध्यक्ष तो लगभग निष्क्रिय ही था। मगर अशोक एक एजेंट के तौर पर लाए गए हैं। उनका समर्थन करने वालों के नाम अगर आप देखेंगे तो पाएंगे कि या तो सब भाजपा से जुड़े रहे हैं या लगभग ढुलमुल किस्म के रचनाकार हैं। पुरानी कार्यकारिणी के लगभग सारे महत्वपूर्ण सदस्यों ने त्यागपत्र दे दिए हैं। अब अशोक अपने मत के उन्हीं लोगों को कार्यकारिणी में लाएंगे जो उनकी योजनाओं को कार्यरूप दे सकें। इस प्रक्रिया में सबसे अधिक खेदजनक कृष्ण बलदेव वैद को बदनाम करना है। भाजपा के एक कार्यकर्ता ने तो बाकायदा वैद की रचनाओं को अश्लील रेखांकित कर दिया है। मुङो नहीं लगता कि कृष्ण बलदेव जसी भाषा, शब्दों पर उनका अधिकार और खिलंदड़ी शैली किसी और लेखक के पास है। उन्होंने गहरी अंतर्दृष्टियों के साथ अपने पात्रों की मानसिकताओं को पकड़ने की कोशिश की है। अगर तथाकथित अश्लीलता और पोर्नोग्राफी के आधार पर ही साहित्य का मूल्यांकन करना हो तो कालिदास का तुसंहार, जयदेव के रति वर्णन या रीतिकाल को कूड़े में डाल देना चाहिए। चलिए कृष्ण बलदेव वैद न सही, लेकिन केदारनाथ सिंह और रमणिका गुप्ता को तो इस सम्मान का मैं सबसे बड़ा अधिकारी मानता हूं। केदारनाथ सिंह के बारे में कुछ कहना जरूरी नहीं है, मगर जिस लगन और समर्थन से रमणिका गुप्ता ने पूर्वोत्तर प्रांतों के आदिवासियों पर काम किया है वह अभी तक किसी ने नहीं किया है। स्त्री और दलितों का एजेंडा तो है ही लेकिन आदिवासियों पर किया गया उनका यह काम बड़े से बड़े सम्मान का अधिकारी है।
Wednesday, August 26, 2009
एक माया मिस्र की
मधुकर उपाध्याय
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती अपनी मूर्तियों के कारण सुर्खियों और विवाद में हैं। अमरत्व की कामना, इतिहास में गुम न हो जाने की आशंका और इसलिए अपने को समाज पर थोपने की कोशिश कम ही कामयाब होती है। मिस्र की महिला बादशाह हातशेपसत की कहानी भी कुछ यही बताती है। उसे भी यही खौफ था कि इतिहास कहीं मुङो भुला न दे। उसने भी मूर्तियां बनवाईं। 1458 ईसा पूर्व हातशेपसत की मृत्यु हुई तब शासक बने उनके सौतेले बेटे ने अपनी मां के सारे स्मारक नष्ट करने का आदेश दिया। शाही मैदान से उसकी ममी भी हटवा दी। फिर हातशेपसत का नाम जिंदा है। तो क्या इतिहास को मिटा देने की कोशिश में समाज में अपनी स्वीकार्यता थोपने की तरह ही नाकाम रहती है।
कई बार ऐसा लगता है कि कुछ चीजें पहली बार हो रही हैं और ऐसी चीजों के लिए ‘इतिहास अपने को दोहराता हैज् एक बेमानी कथन है। दरअसल, इसकी असली वजह शायद यह है कि इतिहास की हमारी समझ और पीछे जाकर चीजें टटोलने की क्षमता सीमित है। जसे ही इतिहास का कोई नया पन्ना खुलता है, पता चलता है कि आज जो हो रहा है, वह कोई नई बात नहीं है। दुनिया ऐसे लोग और उनकी बेमिसाल सनक पहले भी देख चुकी है।
दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक मिस्र की सभ्यता है, जिसका लिखित इतिहास सवा पांच हजार साल पुराना है। उसके प्राचीनतम साक्ष्य तीन हजार वर्ष ईसा पूर्व से पहले के हैं। उसकी वंश परंपरा पांच हजार साल पहले शुरू होती है और लगातार तीन हजार साल तक चलती है। इसी परंपरा में बीस वर्ष का एक ऐसा कालखंड आता है, जिसमें मिस्र की बादशाहत एक महिला के हाथ में थी। सामाजिक स्थितियों और परंपराओं में महिला शासक की स्वीकार्यता नहीं थी। इसलिए उस ‘महिला बादशाह-हातशेपसतज् को तकरीबन पूरा कार्यकाल पुरुष बनकर पूरा करना पड़ा। इस घटना का उल्लेख दस्तावेजों में है कि उसे ‘शी किंगज् कहा जाता था। हातशेपसत का कार्यकाल असाधारण उपलब्धियों वाला था। वह एक कुशल शासक थी। नई इमारतें तामीर कराने में उसकी दिलचस्पी थी। राजकाज से आम लोगों को कोई शिकायत नहीं थी। बल्कि उसके बीस साल के कार्यकाल को मिस्र के स्वर्णिम युग की तरह याद किया जाता है। हातशेपसत का कार्यकाल 1479 से 1458 ईसा पूर्व में था। एक अध्ययन के अनुसार, हातशेपसत की मां अहमोज एक राजा की पुत्री थी। उसके पिता टुटमोज प्रथम सही मायनों में राजशाही खानदान के नहीं थे। इसकी वजह से हातशेपसत को थोड़ी सामाजिक स्वीकार्यता मिली, जिसका फायदा उठाकर उसने अपने पति के निधन के बाद सत्ता पर कब्जा कर लिया। हालांकि टुटमोज प्रथम ने अपने सौतेले बेटे को गद्दी सौंपी थी लेकिन वह कभी सत्ता में रह नहीं पाया।
पूरा इतिहास कुछ इस तरह गडमड था कि हातशेपसत की मौजूदगी और बेहतरीन सत्ता संचालन के बावजूद उसे स्थापित करने के ठोस प्रमाण नहीं मिल रहे थे। कुछ अमेरिकी और मिस्री विद्वानों को अचानक एक दिन एक खुली कब्र मिली, जिसके बाहर एक ममी पड़ी थी। यह अनुमान लगाना किसी के लिए भी असंभव होता कि मिस्र के शासक रह चुके किसी व्यक्ति के साथ इस तरह का व्यवहार हो सकता है कि उसकी ममी खुले में पड़ी हो। यह बात सौ साल पुरानी है। करीब 75 साल पहले एक और मिस्री विद्वान को उस ममी के पास सोने के गहने मिले। इससे उसे संदेह हुआ कि यह ममी किसी साधारण व्यक्ति की नहीं हो सकती। पूरी चिकित्सकीय प्रक्रिया के बावजूद ममी का काफी हिस्सा नष्ट हो गया था और ले-देकर एक दांत सही सलामत मिला। उसी दांत के सहारे हातशेपसत की पहचान हुई और फिर उस ममी को सम्मानपूर्वक स्थापित किया गया।
हातशेपसत का शासन दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है। पहले हिस्से में करीब छह वर्ष तक वह टुटमोज द्वितीय के बेटे के उत्तराधिकारी के रूप में शासन करती रही। सारे फैसले उसके होते थे लेकिन नाम उस नाबालिग बच्चे का रहता था। छह साल बाद हातशेपसत ने नाबालिग टुटमोज तृतीय को बेदखल कर दिया और खुद सत्ता संभाल ली। इसके बावजूद महिला के रूप में समाज के सामने जाने का साहस हातशेपसत नहीं जुटा सकी और हमेशा पुरुषों के कपड़े पहनती रही। इतना ही नहीं, उस समय की तमाम प्रतिमाओं में भी उसे पुरुष की तरह चित्रित किया गया।
शक्तिशाली फरोहा होने के बावजूद समाज द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के डर की वजह से हातशेपसत में एक तरह का जटिल व्यक्तित्व विकसित हुआ। उसे यह डर हमेशा लगा रहता था कि ताकतवर पुरुष प्रधान मिस्री समाज उसे खारिज कर देगा। उसका योगदान भुला देगा और उसका अस्तित्व इतिहास से मिटा दिया जाएगा। साढ़े तीन हजार साल पुरानी इस इतिहास-कथा ने हातशेपसत के इसी डर और चिंता के कारण एक नया मोड़ लिया। उसने तय कर लिया कि आगे का पूरा शासन वह एक पुरुष फरोहा की तरह चलाएगी और एक अभियान चलाकर समाज में अपनी छवि एक पुरुष की तरह स्थापित करेगी। उसकी बाद की प्रतिमाओं में उसके महिला होने के संकेत तक नहीं मिलते बल्कि चेहरे पर दाढ़ी भी दिखती है। ऐसे कई दस्तावेज मिलते हैं, जिसमें हातशेपसत ने कहा कि वह शासन करने के लिए भेजी गई ईश्वरीय देन है। इसी दौरान उसने यह फैसला लिया कि पूरे साम्राज्य में उसकी विराट प्रतिमाएं लगाई जाएंगी, ताकि किसी को उसके फरोहा होने पर संदेह न रह जाए। मिस्र के छोटे से छोटे इलाके तक संदेश भेजे गए कि हातशेपसत बादशाह है और कोई उसे चुनौती देने की कोशिश न करे। इसी के साथ उसने एक शब्द गढ़ा, जिसे ‘रेख्तज् कहते थे और इसका अर्थ था-आम लोग। मिस्र की जनता को हातशेपसत प्राय: ‘मेरे रेख्तज् कहती थी और हर फैसला यह कहकर करती थी कि रेख्त की राय यही है। लोकप्रियता हासिल करने की सारी सीमाएं हातशेपसत ने तोड़ दीं। हातशेपसत ने लगभग बीस साल के अपने शासन के दौरान हमेशा यह ख्याल रखा कि उसके किसी फैसले पर नील नदी के दोनों ओर बसे रेख्त की राय क्या होगी। एक दस्तावेज में उसने यहां तक लिखा कि अगर रेख्त की मर्जी नहीं होगी तो मेरा दिल धड़कना बंद कर देगा।
हातशेपसत की मृत्यु 1458 ईसा पूर्व में हुई, जिसके बाद उसके सौतेले बेटे टुटमोज तृतीय ने उन्नीसवें फरोहा के रूप में सत्ता संभाली। अपनी सौतेली मां की तरह टुटमोज तृतीय को भी स्मारक बनाने का शौक था। मुर्गी को भोजन की तरह इस्तेमाल करने की परंपरा उसी ने शुरू की और उन्नीस साल के शासन में सत्रह सैनिक अभियान चलाए और कामयाब रहा। अपने शासनकाल के अंतिम दौर में उसने अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट होकर आराम से रहने की जगह एक अजीबोगरीब फैसला किया। यह फैसला था-अपनी सौतेली मां हातशेपसत द्वारा निर्मित सारे स्मारक और उसकी सारी प्रतिमाएं नष्ट कर देने का ताकि इतिहास में उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाए। टुटमोज तृतीय अपने इस अभियान में भी सफल रहा और अपनी सौतेली मां को उसने साढ़े तीन हजार साल के लिए इतिहास से गायब कर दिया। इतना ही नहीं, उसने अपनी सौतेली मां की ममी को भी फरोहा के शाही मैदान से हटा दिया। उसे एक ऐसी जगह ले जाकर रखा, जहां किसी को संदेह ही न हो कि वह हातशेपसत हो सकती है।
निश्चित तौर पर अमरत्व की कामना, इतिहास में खो जाने के डर और समाज में अपनी स्वीकार्यता थोपने की कोशिश में किए गए प्रयास कभी पूरी तरह कामयाब नहीं हो सकते। लेकिन साथ ही यह भी लगता है कि इतिहास को नष्ट करने या उसे मिटा देने की कोशिश भी उतनी ही नाकामयाब होती है।
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती अपनी मूर्तियों के कारण सुर्खियों और विवाद में हैं। अमरत्व की कामना, इतिहास में गुम न हो जाने की आशंका और इसलिए अपने को समाज पर थोपने की कोशिश कम ही कामयाब होती है। मिस्र की महिला बादशाह हातशेपसत की कहानी भी कुछ यही बताती है। उसे भी यही खौफ था कि इतिहास कहीं मुङो भुला न दे। उसने भी मूर्तियां बनवाईं। 1458 ईसा पूर्व हातशेपसत की मृत्यु हुई तब शासक बने उनके सौतेले बेटे ने अपनी मां के सारे स्मारक नष्ट करने का आदेश दिया। शाही मैदान से उसकी ममी भी हटवा दी। फिर हातशेपसत का नाम जिंदा है। तो क्या इतिहास को मिटा देने की कोशिश में समाज में अपनी स्वीकार्यता थोपने की तरह ही नाकाम रहती है।
कई बार ऐसा लगता है कि कुछ चीजें पहली बार हो रही हैं और ऐसी चीजों के लिए ‘इतिहास अपने को दोहराता हैज् एक बेमानी कथन है। दरअसल, इसकी असली वजह शायद यह है कि इतिहास की हमारी समझ और पीछे जाकर चीजें टटोलने की क्षमता सीमित है। जसे ही इतिहास का कोई नया पन्ना खुलता है, पता चलता है कि आज जो हो रहा है, वह कोई नई बात नहीं है। दुनिया ऐसे लोग और उनकी बेमिसाल सनक पहले भी देख चुकी है।
दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक मिस्र की सभ्यता है, जिसका लिखित इतिहास सवा पांच हजार साल पुराना है। उसके प्राचीनतम साक्ष्य तीन हजार वर्ष ईसा पूर्व से पहले के हैं। उसकी वंश परंपरा पांच हजार साल पहले शुरू होती है और लगातार तीन हजार साल तक चलती है। इसी परंपरा में बीस वर्ष का एक ऐसा कालखंड आता है, जिसमें मिस्र की बादशाहत एक महिला के हाथ में थी। सामाजिक स्थितियों और परंपराओं में महिला शासक की स्वीकार्यता नहीं थी। इसलिए उस ‘महिला बादशाह-हातशेपसतज् को तकरीबन पूरा कार्यकाल पुरुष बनकर पूरा करना पड़ा। इस घटना का उल्लेख दस्तावेजों में है कि उसे ‘शी किंगज् कहा जाता था। हातशेपसत का कार्यकाल असाधारण उपलब्धियों वाला था। वह एक कुशल शासक थी। नई इमारतें तामीर कराने में उसकी दिलचस्पी थी। राजकाज से आम लोगों को कोई शिकायत नहीं थी। बल्कि उसके बीस साल के कार्यकाल को मिस्र के स्वर्णिम युग की तरह याद किया जाता है। हातशेपसत का कार्यकाल 1479 से 1458 ईसा पूर्व में था। एक अध्ययन के अनुसार, हातशेपसत की मां अहमोज एक राजा की पुत्री थी। उसके पिता टुटमोज प्रथम सही मायनों में राजशाही खानदान के नहीं थे। इसकी वजह से हातशेपसत को थोड़ी सामाजिक स्वीकार्यता मिली, जिसका फायदा उठाकर उसने अपने पति के निधन के बाद सत्ता पर कब्जा कर लिया। हालांकि टुटमोज प्रथम ने अपने सौतेले बेटे को गद्दी सौंपी थी लेकिन वह कभी सत्ता में रह नहीं पाया।
पूरा इतिहास कुछ इस तरह गडमड था कि हातशेपसत की मौजूदगी और बेहतरीन सत्ता संचालन के बावजूद उसे स्थापित करने के ठोस प्रमाण नहीं मिल रहे थे। कुछ अमेरिकी और मिस्री विद्वानों को अचानक एक दिन एक खुली कब्र मिली, जिसके बाहर एक ममी पड़ी थी। यह अनुमान लगाना किसी के लिए भी असंभव होता कि मिस्र के शासक रह चुके किसी व्यक्ति के साथ इस तरह का व्यवहार हो सकता है कि उसकी ममी खुले में पड़ी हो। यह बात सौ साल पुरानी है। करीब 75 साल पहले एक और मिस्री विद्वान को उस ममी के पास सोने के गहने मिले। इससे उसे संदेह हुआ कि यह ममी किसी साधारण व्यक्ति की नहीं हो सकती। पूरी चिकित्सकीय प्रक्रिया के बावजूद ममी का काफी हिस्सा नष्ट हो गया था और ले-देकर एक दांत सही सलामत मिला। उसी दांत के सहारे हातशेपसत की पहचान हुई और फिर उस ममी को सम्मानपूर्वक स्थापित किया गया।
हातशेपसत का शासन दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है। पहले हिस्से में करीब छह वर्ष तक वह टुटमोज द्वितीय के बेटे के उत्तराधिकारी के रूप में शासन करती रही। सारे फैसले उसके होते थे लेकिन नाम उस नाबालिग बच्चे का रहता था। छह साल बाद हातशेपसत ने नाबालिग टुटमोज तृतीय को बेदखल कर दिया और खुद सत्ता संभाल ली। इसके बावजूद महिला के रूप में समाज के सामने जाने का साहस हातशेपसत नहीं जुटा सकी और हमेशा पुरुषों के कपड़े पहनती रही। इतना ही नहीं, उस समय की तमाम प्रतिमाओं में भी उसे पुरुष की तरह चित्रित किया गया।
शक्तिशाली फरोहा होने के बावजूद समाज द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के डर की वजह से हातशेपसत में एक तरह का जटिल व्यक्तित्व विकसित हुआ। उसे यह डर हमेशा लगा रहता था कि ताकतवर पुरुष प्रधान मिस्री समाज उसे खारिज कर देगा। उसका योगदान भुला देगा और उसका अस्तित्व इतिहास से मिटा दिया जाएगा। साढ़े तीन हजार साल पुरानी इस इतिहास-कथा ने हातशेपसत के इसी डर और चिंता के कारण एक नया मोड़ लिया। उसने तय कर लिया कि आगे का पूरा शासन वह एक पुरुष फरोहा की तरह चलाएगी और एक अभियान चलाकर समाज में अपनी छवि एक पुरुष की तरह स्थापित करेगी। उसकी बाद की प्रतिमाओं में उसके महिला होने के संकेत तक नहीं मिलते बल्कि चेहरे पर दाढ़ी भी दिखती है। ऐसे कई दस्तावेज मिलते हैं, जिसमें हातशेपसत ने कहा कि वह शासन करने के लिए भेजी गई ईश्वरीय देन है। इसी दौरान उसने यह फैसला लिया कि पूरे साम्राज्य में उसकी विराट प्रतिमाएं लगाई जाएंगी, ताकि किसी को उसके फरोहा होने पर संदेह न रह जाए। मिस्र के छोटे से छोटे इलाके तक संदेश भेजे गए कि हातशेपसत बादशाह है और कोई उसे चुनौती देने की कोशिश न करे। इसी के साथ उसने एक शब्द गढ़ा, जिसे ‘रेख्तज् कहते थे और इसका अर्थ था-आम लोग। मिस्र की जनता को हातशेपसत प्राय: ‘मेरे रेख्तज् कहती थी और हर फैसला यह कहकर करती थी कि रेख्त की राय यही है। लोकप्रियता हासिल करने की सारी सीमाएं हातशेपसत ने तोड़ दीं। हातशेपसत ने लगभग बीस साल के अपने शासन के दौरान हमेशा यह ख्याल रखा कि उसके किसी फैसले पर नील नदी के दोनों ओर बसे रेख्त की राय क्या होगी। एक दस्तावेज में उसने यहां तक लिखा कि अगर रेख्त की मर्जी नहीं होगी तो मेरा दिल धड़कना बंद कर देगा।
हातशेपसत की मृत्यु 1458 ईसा पूर्व में हुई, जिसके बाद उसके सौतेले बेटे टुटमोज तृतीय ने उन्नीसवें फरोहा के रूप में सत्ता संभाली। अपनी सौतेली मां की तरह टुटमोज तृतीय को भी स्मारक बनाने का शौक था। मुर्गी को भोजन की तरह इस्तेमाल करने की परंपरा उसी ने शुरू की और उन्नीस साल के शासन में सत्रह सैनिक अभियान चलाए और कामयाब रहा। अपने शासनकाल के अंतिम दौर में उसने अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट होकर आराम से रहने की जगह एक अजीबोगरीब फैसला किया। यह फैसला था-अपनी सौतेली मां हातशेपसत द्वारा निर्मित सारे स्मारक और उसकी सारी प्रतिमाएं नष्ट कर देने का ताकि इतिहास में उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाए। टुटमोज तृतीय अपने इस अभियान में भी सफल रहा और अपनी सौतेली मां को उसने साढ़े तीन हजार साल के लिए इतिहास से गायब कर दिया। इतना ही नहीं, उसने अपनी सौतेली मां की ममी को भी फरोहा के शाही मैदान से हटा दिया। उसे एक ऐसी जगह ले जाकर रखा, जहां किसी को संदेह ही न हो कि वह हातशेपसत हो सकती है।
निश्चित तौर पर अमरत्व की कामना, इतिहास में खो जाने के डर और समाज में अपनी स्वीकार्यता थोपने की कोशिश में किए गए प्रयास कभी पूरी तरह कामयाब नहीं हो सकते। लेकिन साथ ही यह भी लगता है कि इतिहास को नष्ट करने या उसे मिटा देने की कोशिश भी उतनी ही नाकामयाब होती है।
Thursday, August 13, 2009
सच का कैसे हो सामना
रज्जन सुल्तानपुरी सुल्तानपुर के हैं कि नहीं ये प्रमाणिक नहीं है लेकिन सुल्तानपुरी उनके नाम के साथ ऐसा चिपका है जसे जलेबी के साथ चाशनी चिपक जाती है। बस उन्होंने किसी तरह खुद को चींटिंयों से बचा कर रखा है नहीं तो उन्हे चींटे कब के चट कर गए होते। उनके स्वभाव से यूं तो सभी वाकिफ थे लेकिन वह नजर-ए-इनायत करते-करते, कब तीर-ए-नज़्ार कर देगें किसी को पता नहीं चलता। अगर बच गए तो तकदीर अच्छी अगर तीर लग गई तो भगवान बचाए...।
उनसे लोग प्रश्न पूछने से कतराते हैं क्योंकि दोहा, छंद यही नहीं विभिन्न विधाओं में वह उसका उत्तर देने में सक्षम हैं। उनकी प्रशंसा कब आलोचना बन जाए कहा नहीं जा सकता। सीधे प्रश्नों के उत्तर भी लताओं जसे होते हैं। समसामयिक मुद्दा दाल पर उनकी परिचर्चा सुनने कई लोग आए, यह परिचर्चा उनके किसी तथाकथित साहित्यकार मित्र छज्जन ने प्रायोजित की थी। वजह यह थी कि इसी बहाने लोग उन्हे भी जान जाएंगे। हुआ भी कुछ ऐसा ही, सभा में तमाम तरह के साहित्यिक और गैर साहित्यिक प्रश्न उठाए गए। बात आते-आते मंहगाई पर टिक गई। कु छ लोग उन्हे राजनीतिक प्रतिनिधि समझ कर प्रश्नों के तीर मारे जा रहे थे लेकि न सभी प्रश्नों के उत्तर वह सधे हुए देते थे। किसी ने अरहर के दाल की चर्चा कर दी, उन्होंने कहा कि अरहर की दाल ने उड़द, मटर, मसूर की लाज रख ली नहीं तो इनको कौन पूछता। अब मूंग की दाल खिचड़ी केवल बीमार ही नहीं खाएंगे, बल्कि मुस्टंडे भी चखेंगे। बात यहीं खत्म नहीं हुई। एक सज्जन ने सवाल उठाया कि दाल के साथ चीनी का भी मामला कुछ ऐसा ही होता जा रहा है। इस पर उनका जवाब था कि चीनी तो शुरू से ही बुर्जआ वर्ग के जीभ का स्वाद बढ़ाती आई है यह तो मजदूरों की दुश्मन है। अब तो अमीर लोग भी मधुमेह के कारण इससे तौबा कर रहे हैं। सभा अब पूरी तरह से असाहित्यिक हो चुकी थी कि किसी सज्जन ने कहा सुना है आप कवि टाइप हृदय रखते हैं उन्होंने गिलौरी मुंह में दबाकर दो इंच में मुस्कान बिखेरी बाद में पता चला कि कुर्ता खराब हो गया है।
इसके बाद रज्जन सुल्तानपुरी ने रिक्शा लिया और बड़े अपनत्व के साथ चल निकले रास्ते भर जी भर के अपनी योग्यता के बारे में बताया उसकी योग्यता जाना। लेकिन उतरते समय किराया को लेकर झकझक हो गई, बात हाथापाई तक आ गई। रिक्शे वाला तुनक खड़ा हो गया और बोला, मां का दूध पिया है तो आ जा.. इस पर रज्जन सुल्तानपुरी ने कहा मां का दूध तो सब पीते हैं तू अमूल या मदर डेरी का दूध पिया है तो हाथ आजमा ले.. रिक्शावाला सच का सामना नहीं कर पाया।
अभिनव उपाध्याय
उनसे लोग प्रश्न पूछने से कतराते हैं क्योंकि दोहा, छंद यही नहीं विभिन्न विधाओं में वह उसका उत्तर देने में सक्षम हैं। उनकी प्रशंसा कब आलोचना बन जाए कहा नहीं जा सकता। सीधे प्रश्नों के उत्तर भी लताओं जसे होते हैं। समसामयिक मुद्दा दाल पर उनकी परिचर्चा सुनने कई लोग आए, यह परिचर्चा उनके किसी तथाकथित साहित्यकार मित्र छज्जन ने प्रायोजित की थी। वजह यह थी कि इसी बहाने लोग उन्हे भी जान जाएंगे। हुआ भी कुछ ऐसा ही, सभा में तमाम तरह के साहित्यिक और गैर साहित्यिक प्रश्न उठाए गए। बात आते-आते मंहगाई पर टिक गई। कु छ लोग उन्हे राजनीतिक प्रतिनिधि समझ कर प्रश्नों के तीर मारे जा रहे थे लेकि न सभी प्रश्नों के उत्तर वह सधे हुए देते थे। किसी ने अरहर के दाल की चर्चा कर दी, उन्होंने कहा कि अरहर की दाल ने उड़द, मटर, मसूर की लाज रख ली नहीं तो इनको कौन पूछता। अब मूंग की दाल खिचड़ी केवल बीमार ही नहीं खाएंगे, बल्कि मुस्टंडे भी चखेंगे। बात यहीं खत्म नहीं हुई। एक सज्जन ने सवाल उठाया कि दाल के साथ चीनी का भी मामला कुछ ऐसा ही होता जा रहा है। इस पर उनका जवाब था कि चीनी तो शुरू से ही बुर्जआ वर्ग के जीभ का स्वाद बढ़ाती आई है यह तो मजदूरों की दुश्मन है। अब तो अमीर लोग भी मधुमेह के कारण इससे तौबा कर रहे हैं। सभा अब पूरी तरह से असाहित्यिक हो चुकी थी कि किसी सज्जन ने कहा सुना है आप कवि टाइप हृदय रखते हैं उन्होंने गिलौरी मुंह में दबाकर दो इंच में मुस्कान बिखेरी बाद में पता चला कि कुर्ता खराब हो गया है।
इसके बाद रज्जन सुल्तानपुरी ने रिक्शा लिया और बड़े अपनत्व के साथ चल निकले रास्ते भर जी भर के अपनी योग्यता के बारे में बताया उसकी योग्यता जाना। लेकिन उतरते समय किराया को लेकर झकझक हो गई, बात हाथापाई तक आ गई। रिक्शे वाला तुनक खड़ा हो गया और बोला, मां का दूध पिया है तो आ जा.. इस पर रज्जन सुल्तानपुरी ने कहा मां का दूध तो सब पीते हैं तू अमूल या मदर डेरी का दूध पिया है तो हाथ आजमा ले.. रिक्शावाला सच का सामना नहीं कर पाया।
अभिनव उपाध्याय
Wednesday, August 12, 2009
चरणदास चोर : खेलो और, और!

मो. रजा़
मशहूर नाटककार हबीब तनवीर का नाटक ‘चरनदास चोर फिर सुर्खियों में है। मंच पर कई बार अपनी काबिलियत साबित कर चुका यह मशहूर नाटक अब राजनीतिक गलियारों में अटक गया है। ‘चरनदास चोर नाटक को कुछ समुदायों की भावनाओं पर आघात करने वाला बताकर छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है। इससे कला मंच से जुड़े लोगों और बुद्धिजीवियों में रोष हैं। इन लोगों का कहना है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है।
‘चरनदास चोर नाटक कई बरसों से खेला जा रहा है। देश-दुनिया में उसको सराहा गया है। नाटक में ऐसा कुछ नहीं है जिससे किसी समुदाय को ठेस पहुंचे। यह नाटक ईमानदारी और सच बोलने की सीख देता है। यह कोई नया नाटक नहीं है बल्कि 1975 से लगातार मंचित हो रहा है। अपने जमाने में यह नाटक इतना मशहूर हुआ कि जाने-माने निर्देशक श्याम बेनेगल ने स्मिता पाटिल को लेकर एक फिल्म भी बनाई। यह फिल्म काफी चर्चित रही। छत्तीसगढ़ सरकार की इस करनी पर संस्कृतिकर्मियों, साहित्यकारों में बेहद क्षोभ है। हबीब तनवीर साहब का निधन हुए अभी दो महीने हुए हैं। उनके नाटक को प्रतिबंधित करने को मरणोपरांत उनका अपमान माना जा रहा है। वैसे भी यह सीधे-सीधे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है। हबीब तनवीर का यह नाटक दुनिया भर में मशहूर और प्रशंसित हुआ। उनके नाटकों ने जन-मानस को गहरे तक प्रभावित किया। हबीब साहब और उनकी कला का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर असर अगाध है। सुप्रसिद्ध कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने भी अपने स्तंभ ‘कभी-कभार में लिखा है-‘देश में ही नहीं, किसी हद तक सारी दुनिया में अगर छत्तीसगढ़ किसी एक व्यक्ति के नाम से जाना जाता है तो वह हबीब तनवीर है। आज भी वे छत्तीसगढ़ की सबसे उजली और अमिट तस्वीर हैं। उसी हबीब के नाटक को निहायत साम्प्रदायिक आधार पर प्रतिबंधित करने की हिमायत उसी छत्तीसगढ़ सरकार ने की है। विनायक सेन की बेवजह गिरफ्तारी की देश भर में निंदा होती रही है। नक्सलियों की चुनौती का सामना करने में विफल यह सरकार उनके जनसंहार का अमानवीय तरीका अपना रही है। उसे हाल के चुनावों आदि में जो सफलता मिली है वह उसकी इस लांछित छवि को धो-पोंछ नहीं सकती। उसने अब इस प्रतिबंध द्वारा उस छवि को और मलिन कर लिया है। उसकी सख्त निंदा तो की ही जानी चाहिए। उसके अलावा छत्तीसगढ़ सरकार के किसी आयोजन में न सिर्फ उस प्रदेश के लेखकों-कलाकारों को भाग न लेकर उसका बहिष्कार कम से कम तब तक करना चाहिए जब तक यह प्रतिबंध वापस नहीं लिया जाता।ज्
ऑल इंडिया रेडियो में चीफ प्रोड्यूसर ड्रामा के पद से रिटायर सत्येन् शरत् इसे अज्ञानता से उपजा विवाद बताते हैं। वे कहते हैं कि इतने सालों बाद नाटक पर प्रतिबंध लगाया जाना सरासर गलत है। उन्होंने कहा कि 1975 से लगातार खेले जा रहे इस नाटक का प्रत्येक शो हाउसफुल रहा है। उन्होंने कहा कि ‘चरनदास चोर को 1982 में एडिनबर्ग फ्रिंज महोत्सव में पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। उसके बाद नाटक के विषय में यह कहा जाना कि यह किसी समुदाय के लोगों की आस्था को ठेस पहुंचाता है, गलत है। उन्होंने कहा कि नाटक के माध्यम से यह बताने की कोशिश की गई है कि एक चोर जो झूठ न बोलने की कसम खाता है, अंत में उसे मार दिया जाता है।
दरअसल नाटक के बीच में हबीब जी द्वारा चोर के पात्र को एक गाने के माध्यम से दर्शाया गया है ‘एक चोर ने रंग जमाया सच बोल के, संसार में नाम कमाया सच बोल के, धोखे में गुरु को वचन दिया, सच्चाई निभाने का प्रण किया और ऐसा प्रण किया कि पूरा निभा लिया। चोर चरनदास कहलाया सच बोल के।
संक्षेप में इस नाटक की कथा इस प्रकार है ‘एक चोर जिसका यह मानना है कि ईश्वर ने किसी को राजा बनाया, किसी को मंत्री बनाया, मुङो ईश्वर ने चोर बनाया इसलिए मैं चोरी करूंगा। एक दिन चरनदास एक सोने की थाली चोरी कर भाग रहा था उसके पीछे महल के सिपाही पड़े थे। बचने के लिए चरनदास एक ढोंगी के पास चला जाता है। सिपाही आकर उस ढोंगी से पूछते हैं कि क्या तुमने किसी चोर को देखा, वो कहता है कि नहीं। सिपाही चले जाते हैं। ढोंगी चरनदास से कहता है कि तुम चोरी छोड़ दो। चरनदास कहता है कि मैं चोरी नहीं छोड़ सकता हूं। बदले में ढोंगी चरनदास से चार वचन लेता है। पहला तुम कभी किसी देश के राजा नहीं बनोगे। दूसरा सोने-चांदी के बर्तन में खाना नहीं खाओगे। तीसरा किसी रानी से शादी नहीं करोगे। चौथा, हाथी-घोड़े की सवारी नहीं करोगे। चरनदास तैयार हो जाता है अंत में वह चरनदास से एक और वचन लेता है कि तुम कभी झूठ नहीं बोलोगे। चरनदास कहता है कि अगर मैं सच बोलूंगा तो पकड़ा जाऊंगा। ढोंगी कहता तुम अगर मुङो ये वचन दोगे तभी मैं तुम्हें अपना शिष्य बनाऊंगा। चरनदास यह सोचकर यह सारे वचन दे देता है कि एक चोर के नसीब में सोने-चांदी के बर्तन में खाना खाना, हाथी घोड़े की सवारी करना आदि कहां लिखा है। लेकिन धीरे-धीरे ये सारी घटनाएं चरनदास के जीवन में आती हैं। एक दिन चरन दास महल से पांच सोने की मोहरे चुराता है। खजाने के सिपाही सोचते हैं कि चरनदास ने पांच मोहरे चुराई हैं मैं भी पांच चुरा लेता हूं और इल्जाम चरनदास पर जाएगा। लेकिन महल में चरनदास पांच सोने की मोहरे चुराने की बात स्वीकार करता है। रानी उसके सच बोलने की बात पर खुश हो जाती है और वह उसे छोड़ देती है। रानी सिपाहियों को चरनदास को बुलाने के लिए हाथी-घोड़े भेजती हैं कि जाओ चरनदास को ले आओ। चरनदास आने से मना कर देता। रानी उसे जेल में डाल देती है। जेल में उसे सोने के बर्तन में खाना खाने के लिए दिया जाता है। चरनदास खाना नहीं खाता। अंत में रानी उससे शादी करने के लिए कहती है चरनदास मना कर देता है। रानी कहती है कि तुम किसी को यह मत बताना कि मैंने तुमसे शादी के लिए कहा था। लेकिन चरनदास शादी की बात लोगों से बताने को कहता है जिस पर रानी कहती है कि अगर जिंदा बचोगे तो बताओगे और रानी सिपाहियों को बुलाकर उसे मरवा देती है। इस तरह इस नाटक का मार्मिक अंत होता है।
सत्येन् शरत् ने कहा कि आज हबीब तनवीर हमारे बीच नहीं हैं इसलिए इस तरह की बात की जा रही है। उन्होंने कहा कि आज हबीब साहब जिंदा होते तो उनकी कलम में वो ताकत थी कि इस विरोध का मुंहतोड़ जवाब देते। उन्होंने सरकार द्वारा नाटक पर प्रतिबंध लगाए जाने की कड़े शब्दों में आलोचना की है। नाटक का दर्शक यह क भी सोच भी नहीं सकता था कि सच बोलने की इतनी सजा दी जा सकती है या सच बोलना वाकई इतना खतरनाक साबित होगा। अब जहां लगातार झूठ का बोलबाला है वहां चरनदास चोर समाज को एक नई सीख देता है।
‘जिस लाहौर.... खूब वेख्या

सुप्रसिद्ध कहानीकार-नाटककार असगर वजाहत ने भारत-पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी को अपने मशहूर नाटक ‘जिस लाहौर नहीं वेख्या ओ जन्माई नई में उभारा था। इस नाटक को बेहद सराहा गया और देश-विदेश में इसके खूब मंचन हुए। हबीब तनवीर ने 1990 में इसे पहली बार दिल्ली में मंचित किया था। दो दशक बीत जाने के बाद भी इसे बराबर खेला जा रहा है। हबीब तनवीर की याद में अब इसे चौदह अगस्त को वाशिंगटन में खेला जाएगा। इस नाटक को लेकर मोहम्मद रजा ने असगर वजाहत से बातचीत की है। उसी पर आधारित यह लेख।
भारत-पाकिस्तान विभाजन को छह दशक से भी ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन विभाजन का दर्द आज भी दोनों देशों के लोगों के दिलों में एक नासूर बनकर जिंदा है। विभाजन के इसी दर्द को हिन्दी के प्रसिद्ध कहानीकार-नाटककार असग़र वजाहत ने अपने नाटक ‘जिस लाहौर नहीं वेख्या ओ जन्माइ नई में प्रस्तुत किया है।
‘जिस लाहौर नहीं वेख्या का सबसे पहले मंचन मशहूर नाटककार स्व. हबीब तनवीर ने दिल्ली के श्रीराम सेंटर में 27 सितंबर 1990 को किया था। नाटक को उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली। इसके बाद नाटक का कई देशों और भाषाओं में मंचन किया गया, जिसे लोगों ने खूब सराहा। नाटक का दिल्ली, मुंबई, वाशिंगटन, लंदन और सिडनी जसे शहरों में भी मंचन किया गया, जिससे नाटक को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी खूब ख्याति मिली। इसी कड़ी में वाशिगंटन के जॉन एफ केनेडी सेंटर में नाटककार हबीब तनवीर की याद में 14 अगस्त 2009 को नाटक का मंचन किया जा रहा है।
‘जिस लाहौर नहीं वेख्या की विषयवस्तु का सूत्र उर्दू के पत्रकार संतोष भारती की किताब ‘लाहौरनामा की देन है। संतोष भारती 1947 में लाहौर से दिल्ली आ गए थे। इस दौरान हुए दंगों में संतोष के भाई की दंगाइयों ने हत्या कर दी थी।
लेखक का संबंध उस पंजाब से नहीं है, जिसने विभाजन के दर्द को ङोला और न वे निजी रूप से उस युग के साक्षी रहे हैं, लेकिन उन्होंने विभाजन के उस युग पर कलात्मक ढंग से लिखा है। असगर वजाहत ने ‘जिस लाहौर नहीं वेख्या नाटक को केवल मानवीय त्रासदी तक सीमित नहीं किया है, बल्कि दोनों समुदायों के मनोविज्ञान को समझने का प्रयास किया है। इस प्रयास का उद्देश्य यह बताता है कि दोनों समुदायों के बीच क्या हुआ कि सांस्कृतिक एकता, मोहल्लेदारी, प्रेम, विश्वास और भाईचारा समाप्त हो गया था। लेखक ने यह दर्शाया है कि समाजविरोधी तत्व किस तरह से धर्म का फायदा उठाते हैं। पात्रों का विकास तार्किक है तथा नाटक में पंजाब और लखनऊ की संस्कृतियों का मानवीय स्तर पर समागम अत्यंत संवेदनशील है। बुद्धिजीवियों और साधारण जनता के बीच का जो संबंध होना चाहिए, वह नाटककार ने मौलवी, कवि और जनसाधारण का प्रतिनिधित्व करने वाले पात्रों के माध्यम से दर्शाया है। नाटक का जो नया पक्ष लेखक को अन्य लेखकों से अलग करता है, वह यह है कि उसमें मौलवी को संकुचित विचारों वाला दकियानूसी नहीं चित्रित किया गया है। असगर वजाहत का मौलवी खलनायक नहीं है। वह हर तरह से मानवीय है। मस्जिद में मौलवी की हत्या एक प्रतीक है, जिसके माध्यम से स्वार्थी तत्वों द्वारा धर्म तथा जीवन के महान मूल्यों को नष्ट कर देने की बात कही गई है।
नाटक में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद पैदा हुई स्थिति को बड़े ही कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। नाटक में दिखाया गया है कि लखनऊ से विस्थापित एक परिवार को लाहौर में 22 कमरों की एक बड़ी सी हवेली मिलती है। लेकिन उन्हें अपने घर के मुकाबले यह हवेली कुछ भी नहीं लगती। विभाजन के बाद जहां काफी सारे हिंदू पाकिस्तान से हिन्दुस्तान चले जाते हैं, वहीं एक बुढ़िया अपना घर छोड़कर नहीं जाती और फसाद के वक्त अपने घर में छिप जाती है। उसके घर को खाली समझकर कस्टोडियन वालों ने लखनऊ से विस्थापित एक परिवार सिकंदर मिर्जा को एलाट कर दी जाती है। जब इस परिवार को पता चलता है कि यह बुढ़िया इस हवेली में है तो वो उसे वहां से हटाने की काफी कोशिश करते हैं।
इसी सिलसिले में सिकंदर मिर्जा का लड़का मोहल्ले के ही एक पहलवान से उस बुढ़िया को हटाने की बात करता है। पहलवान सिकंदर मिर्जा से बुढ़िया को जान से मारने की बात कहता है, जिसे मिर्जा और उसके परिवार वाले मना कर देते हैं। धीरे-धीरे उस बुढ़िया की हमदर्दी सिकंदर मिर्जा के साथ-साथ पूरे मोहल्ले में रहने वाले सभी मुस्लिम परिवार से हो जाती है। एक दिन अचानक उस बुढ़िया की मौत हो जाती है। उसकी मौत से सिकंदर मिर्जा के साथ-साथ मोहल्ले वालों को बहुत दुख होता है। बुढ़िया के क्रिया-कर्म के लिए मौलवी से सलाह ली जाती है तो मौलवी कहता है कि बुढ़िया हिन्दू थी, लिहाजा उसका अंतिम संस्कार उसी के धर्म के अनुसार किया जाना चाहिए। मौलवी की ये बात पहलवान को नागवार गुजरती है और वे मस्जिद में मौलवी की हत्या कर देता है।
वर्तमान में इस जब इस वैश्विक व्यवस्था में आतंकवाद, इस्लामिक कट्टरवाद और उपनिवेशवाद के दौर में मुसलमानों की छवि खराब की जा रही है और जहां मूल्य कमजोर होते जा रहे हैं, लोग अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं, वहां यह नाटक एक विभाजन की त्रासदी के बाद लोगों के मनोभावों को समझने और संवेदनाओं को सुरक्षित रखते हुए मूल्यों को संरक्षित करने का प्रयास करते हैं। दर्शक इसे देखकर विभाजन के छह दशक बाद भी इससे जुड़ा हुआ महसूस करता है।
(यह चित्र जिन्हे लाहौर नहीं वेख्या के प्रथम मंचन का है। )
Sunday, August 9, 2009
खुश रखे, खुश करे सो पुरस्कार !
विश्वनाथ त्रिपाठी
पुरस्कारों पर बात करना मेरा प्रिय विषय नहीं है। कुछ साहित्यकार ऐसे हो सकते हैं जो पुरस्कार पाने की उम्मीद रखते हैं और पुरस्कार न पाने से कुंठित होते हैं। कु छ ऐसे भी साहित्यकार हो सकते हैं जो पुरस्कारों की दौड़ में नहीं रहते हैं। कुछ लोग जो अपने लेखन से इतना संतुष्ट हों या पाठकों का प्रेम मिला हो वो पुरस्कार न मिलने से चिंतित नहीं होते। पुरस्कारों की चिंता इसके व्यवस्थापकों को करनी चाहिए रचनाकारों को इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए कि उन्हे पुरस्कार मिला या नहीं। यदि किसी को पुरस्कार मिलता है तो बाकी रचनाकारों को इसमें खुशी होनी चाहिए उसे खुशी-खुशी मनाना चाहिए।
हिन्दी जगत में वह स्थिति आदर्श होती कि जिसे पुरस्कार के लिए नामित किया है वह स्वयं दूसरे को हकदार बताता। साहित्य जगत में ऐसी स्थितियां होनी चाहिए लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ है। अमरकांत की पुस्तक ‘इन्हीं हथियारों सेज् को और मेरी पुस्तक ‘नंगा तलाई का गांवज् को साहित्य अकादमी के पुरस्कार के लिए चुनना था, निर्णायक डा. निर्मला जन ने जब मुङो बताया कि उन्होने अमरकांत की पुस्तक को चुना है तो मैंने कहा कि आप ने ऐसा निर्णय लेकर स्वयं को, मुङो और अकादमी को कलंकित होने से बचा लिया। कहां अमरकांत और कहां मैं! उन्हे यह पुरस्कार बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। जब मैंने अमरकांत को फोन करके बधाई दी तो उन्होंने सरल स्वर में कहा था कि यह पुरस्कार आपको है। मुङो अफसोस है कि मैं यह बात कह रहा हूं लेकिन मैं शायद एकाध समीक्षक में से हूं जिसने इस उपन्यास की प्रशंसा की थी।
जो लोग साहित्य उद्योग में रहते हैं जो अच्छाइयां न देखकर बुराइयां देखते हैं उनका नाम ज्यादा होता है। अशोक वाजपेयी ने भी साहित्य अकादमी सम्मान लेने के बाद विनोद शुक्ल को यह पुरस्कार मिलने की बात की थी। डा. राम विलास शर्मा की कृति ‘निराला की साहित्य साधनाज् को जब चुना गया तो इसमें तीन निर्णायक थे, सुमित्रा नंदन पंत, बाल कृष्ण राव और पं हजारी प्रसाद द्विवेदी। इस पुस्तक में पंत की छवि को ध्वस्त किया गया है। बाल कृष्ण राव की भी आलोचना की गई है। इन दोनों ने इस पुस्तक की संस्तुति की और पंत ने तो कहा कि बाकी सभी किताबों को कूूड़े में फेंक देना चाहिए।
जब हम साहित्य अकादमी पर बातें करते हैं तो सब बुरे ही नहीं दिखते। कई बड़े साहित्यकार हैं जिन्हे पुरस्कार नहीं मिला, निराला, रेणु, मुक्तिबोध आदि रचनाकारों को साहित्य अकादमी नहीं मिला। रचनाकारों के बड़े होने का मानदंड पुरस्कार नहीं हो सकता। साहित्य अकादमी की स्थापना नेहरु ने फ्रेंच अकादमी के आधार पर की थी। फ्रेंच अकादमी में 40 सदस्य होते थे जिन्हे चालीस कालजयी (फोर्टी मार्टल) कहा जाता है। इसके पहले अध्यक्ष पं नेहरू थे। मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि उन्होंने न किसी का नाम प्रस्तावित किया था और न ही किसी का विरोध किया था। साहित्य अकादमी के पुरस्कार के लिए दिनकर ने दबाव डाला था कि यशपाल के उपन्यास झूठा-सच को पुरस्कार न मिले क्योंकि इसमें नेहरू की आलोचना की गई उस वर्ष यशपाल को पुरस्कार नहीं मिला। भाषाओं से हिन्दी का क्षेत्र काफी बड़ा है। इसमें कई योग्य साहित्यकार हैं इसलिए हिन्दी पुरस्कारों में विवाद है। दिल्ली में ही कई योग्य साहित्यकार हैं, कोई न कोई छूट ही जाता है। के न्द्रीय साहित्य अकादमी की स्थिति प्रांतीय अकादमियों से अच्छी हैं। यहां राजनीति का हस्तक्षेप कम है। जब मार्कण्डेय सिंह दिल्ली के उप-राज्यपाल थे, तब हिन्दी अकादमी दिल्ली की कार्यकारिणी में भीष्म साहनी, राजेन्द्र यादव, असगर वजाहत, स्वयं मैं था, प्रो. हरभजन उपाध्यक्ष थे तब त्रिलोचन शास्त्री और मन्मथ नाथ गुप्त को सम्मान लेने के लिए उनके पैर पकड़ कर मनाना पड़ा था कि आप सम्मान ले लें। हिंदी अकादमी से संबंधित लोग जो उससे जुड़े रहते थे उन्हे किसी प्रकार की वित्तीय सहायता अकादमी की तरफ से नहीं दी जाती थी। जब हरभजन सिंह हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष थे। वे बीमार थे और आर्थिक संकट से गुजर रहे थे लेकिन चूंकि वह उपाध्यक्ष थे इसलिए उन्होंने अकादमी की तरफ से कोई सहायता राशि नहीं ली।
जब पीके दवे दिल्ली के राज्यपाल थे तो उस समय हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष नामवर सिंह थे। तब शलाका सम्मान के लिए कृ ष्णा सोबती और साहित्यकार सम्मान के लिए मुङो नामित किया गया था लेकिन भाजपा शासन में मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा ने तीन साल तक यह पुरस्कार हमें नहीं दिया। इस पर कृष्णा सोबती ने पत्र लिखकर पुरस्कार लेने से मना कर दिया। इसके बाद मैंने भी मना कर दिया। बाद में जब जनार्दन द्विवेदी हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष बने तो दोनों को सम्मान दिया।
अरुण प्रकाश जसे स्वाभिमानी साहित्यकार बहुत कम है । मुझसे छोटे हैं लेकिन उन लोगों में से हैं जिनसे मैं मर्यादा की शिक्षा लेता हूं। घोर आर्थिक संकट से गुजरे लेकिन उनके अंदर भारी जीजिविषा है और मैनें उसे कभी टूटते नहीं देखा। बीमारी से जूझ रहे अरुण प्रकाश ने हाल ही में बिहार सरकार का सम्मान लेने से मना कर दिया क्योंकि वहां की सरकार भाजपा समर्थित है। वे हमारे निकट हैं लेकिन पुरस्कार न लेने की बात पुष्पराज ने बताई उन्होंने स्वयं नहीं बताई। यह एक नैतिक मर्यादा और आचरण है जो साहित्यकार को अपने समय का सभ्य और सुसंस्कृ त नागरिक बनाता है। एक तरफ ऐसे लोग भी हैं और दूसरी तरफ वे हैं जो स्वार्थान्ध होकर विज्ञापनी मानसिकता से ग्रस्त हैं ।
(अभिनव उपाध्याय से बातचीत पर आधारित)
आज समाज से साभार
पुरस्कारों पर बात करना मेरा प्रिय विषय नहीं है। कुछ साहित्यकार ऐसे हो सकते हैं जो पुरस्कार पाने की उम्मीद रखते हैं और पुरस्कार न पाने से कुंठित होते हैं। कु छ ऐसे भी साहित्यकार हो सकते हैं जो पुरस्कारों की दौड़ में नहीं रहते हैं। कुछ लोग जो अपने लेखन से इतना संतुष्ट हों या पाठकों का प्रेम मिला हो वो पुरस्कार न मिलने से चिंतित नहीं होते। पुरस्कारों की चिंता इसके व्यवस्थापकों को करनी चाहिए रचनाकारों को इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए कि उन्हे पुरस्कार मिला या नहीं। यदि किसी को पुरस्कार मिलता है तो बाकी रचनाकारों को इसमें खुशी होनी चाहिए उसे खुशी-खुशी मनाना चाहिए।
हिन्दी जगत में वह स्थिति आदर्श होती कि जिसे पुरस्कार के लिए नामित किया है वह स्वयं दूसरे को हकदार बताता। साहित्य जगत में ऐसी स्थितियां होनी चाहिए लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ है। अमरकांत की पुस्तक ‘इन्हीं हथियारों सेज् को और मेरी पुस्तक ‘नंगा तलाई का गांवज् को साहित्य अकादमी के पुरस्कार के लिए चुनना था, निर्णायक डा. निर्मला जन ने जब मुङो बताया कि उन्होने अमरकांत की पुस्तक को चुना है तो मैंने कहा कि आप ने ऐसा निर्णय लेकर स्वयं को, मुङो और अकादमी को कलंकित होने से बचा लिया। कहां अमरकांत और कहां मैं! उन्हे यह पुरस्कार बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। जब मैंने अमरकांत को फोन करके बधाई दी तो उन्होंने सरल स्वर में कहा था कि यह पुरस्कार आपको है। मुङो अफसोस है कि मैं यह बात कह रहा हूं लेकिन मैं शायद एकाध समीक्षक में से हूं जिसने इस उपन्यास की प्रशंसा की थी।
जो लोग साहित्य उद्योग में रहते हैं जो अच्छाइयां न देखकर बुराइयां देखते हैं उनका नाम ज्यादा होता है। अशोक वाजपेयी ने भी साहित्य अकादमी सम्मान लेने के बाद विनोद शुक्ल को यह पुरस्कार मिलने की बात की थी। डा. राम विलास शर्मा की कृति ‘निराला की साहित्य साधनाज् को जब चुना गया तो इसमें तीन निर्णायक थे, सुमित्रा नंदन पंत, बाल कृष्ण राव और पं हजारी प्रसाद द्विवेदी। इस पुस्तक में पंत की छवि को ध्वस्त किया गया है। बाल कृष्ण राव की भी आलोचना की गई है। इन दोनों ने इस पुस्तक की संस्तुति की और पंत ने तो कहा कि बाकी सभी किताबों को कूूड़े में फेंक देना चाहिए।
जब हम साहित्य अकादमी पर बातें करते हैं तो सब बुरे ही नहीं दिखते। कई बड़े साहित्यकार हैं जिन्हे पुरस्कार नहीं मिला, निराला, रेणु, मुक्तिबोध आदि रचनाकारों को साहित्य अकादमी नहीं मिला। रचनाकारों के बड़े होने का मानदंड पुरस्कार नहीं हो सकता। साहित्य अकादमी की स्थापना नेहरु ने फ्रेंच अकादमी के आधार पर की थी। फ्रेंच अकादमी में 40 सदस्य होते थे जिन्हे चालीस कालजयी (फोर्टी मार्टल) कहा जाता है। इसके पहले अध्यक्ष पं नेहरू थे। मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि उन्होंने न किसी का नाम प्रस्तावित किया था और न ही किसी का विरोध किया था। साहित्य अकादमी के पुरस्कार के लिए दिनकर ने दबाव डाला था कि यशपाल के उपन्यास झूठा-सच को पुरस्कार न मिले क्योंकि इसमें नेहरू की आलोचना की गई उस वर्ष यशपाल को पुरस्कार नहीं मिला। भाषाओं से हिन्दी का क्षेत्र काफी बड़ा है। इसमें कई योग्य साहित्यकार हैं इसलिए हिन्दी पुरस्कारों में विवाद है। दिल्ली में ही कई योग्य साहित्यकार हैं, कोई न कोई छूट ही जाता है। के न्द्रीय साहित्य अकादमी की स्थिति प्रांतीय अकादमियों से अच्छी हैं। यहां राजनीति का हस्तक्षेप कम है। जब मार्कण्डेय सिंह दिल्ली के उप-राज्यपाल थे, तब हिन्दी अकादमी दिल्ली की कार्यकारिणी में भीष्म साहनी, राजेन्द्र यादव, असगर वजाहत, स्वयं मैं था, प्रो. हरभजन उपाध्यक्ष थे तब त्रिलोचन शास्त्री और मन्मथ नाथ गुप्त को सम्मान लेने के लिए उनके पैर पकड़ कर मनाना पड़ा था कि आप सम्मान ले लें। हिंदी अकादमी से संबंधित लोग जो उससे जुड़े रहते थे उन्हे किसी प्रकार की वित्तीय सहायता अकादमी की तरफ से नहीं दी जाती थी। जब हरभजन सिंह हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष थे। वे बीमार थे और आर्थिक संकट से गुजर रहे थे लेकिन चूंकि वह उपाध्यक्ष थे इसलिए उन्होंने अकादमी की तरफ से कोई सहायता राशि नहीं ली।
जब पीके दवे दिल्ली के राज्यपाल थे तो उस समय हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष नामवर सिंह थे। तब शलाका सम्मान के लिए कृ ष्णा सोबती और साहित्यकार सम्मान के लिए मुङो नामित किया गया था लेकिन भाजपा शासन में मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा ने तीन साल तक यह पुरस्कार हमें नहीं दिया। इस पर कृष्णा सोबती ने पत्र लिखकर पुरस्कार लेने से मना कर दिया। इसके बाद मैंने भी मना कर दिया। बाद में जब जनार्दन द्विवेदी हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष बने तो दोनों को सम्मान दिया।
अरुण प्रकाश जसे स्वाभिमानी साहित्यकार बहुत कम है । मुझसे छोटे हैं लेकिन उन लोगों में से हैं जिनसे मैं मर्यादा की शिक्षा लेता हूं। घोर आर्थिक संकट से गुजरे लेकिन उनके अंदर भारी जीजिविषा है और मैनें उसे कभी टूटते नहीं देखा। बीमारी से जूझ रहे अरुण प्रकाश ने हाल ही में बिहार सरकार का सम्मान लेने से मना कर दिया क्योंकि वहां की सरकार भाजपा समर्थित है। वे हमारे निकट हैं लेकिन पुरस्कार न लेने की बात पुष्पराज ने बताई उन्होंने स्वयं नहीं बताई। यह एक नैतिक मर्यादा और आचरण है जो साहित्यकार को अपने समय का सभ्य और सुसंस्कृ त नागरिक बनाता है। एक तरफ ऐसे लोग भी हैं और दूसरी तरफ वे हैं जो स्वार्थान्ध होकर विज्ञापनी मानसिकता से ग्रस्त हैं ।
(अभिनव उपाध्याय से बातचीत पर आधारित)
आज समाज से साभार
Saturday, August 8, 2009
दिल्ली से गायब होती गौरैया

चूं चू करती आई चिड़िया, दाल का दाना लाई चिड़िया। ये गीत बच्चे कभी मुंडेरों पर गौरैया देखकर जोर से गाते थे। लेकिन अब न मुंडेरों पर गौरैया दिखती है और न ही बच्चों के मुंह से ये गीत सुनाई देते हैं। घर, रसोई और बरामदे में कभी अपनी आवाज से गुलजार करने वाली गौरैया अब नहीं दिखती। इस संबंध में यमुना बायोडायवर्सिटी पार्क के वन्य जीव विशेषज्ञ फैय्याज ए खुदसर का कहना है कि अगर शहरों में गौरैया नहीं दिख रही तो इसके कई प्रमुख कारण हैं, जिसमें कबूतरों की संख्या में इजाफा भी है क्योंकि दिल्ली में कबूतरों को दाना दिया जाता है, जिससे कबूतर एक जगह इकट्ठा हो जाते हैं और उसी इलाके में उनकी संख्या बढ़ती जाती है। अब जहां गौरैया रहती थी, वहां कबूतर रहने लगे हैं। गौरैया का वैज्ञानिक नाम पैसर डोमेस्टिकस है, जिससे इसे घरेलू चिड़िया कहा जाता है। लेकिन दुर्भाग्यवश दिल्ली में ऐसे मकान बनाए जा रहे हैं कि उनमें चिड़ियों के लिए जगह नहीं है। गौरैया कीड़ों में इल्लियां खाती हैं, जिसमें प्रोटीन मिलती ये इल्लियां मिट्टियों में होती हैं, लेकिन दिल्ली में अब जमीन पर भी कंक्रीट बिछाई गई है इसलिए इनको खाद्य सुरक्षा नहीं मिल पा रही है। इसके अतिरिक्त इन्हें प्रजनन करने के लिए जगह का अभाव है।
हालांकि इस संबंध में दिल्ली विश्वविद्यालय में पर्यावरण विभाग में वन जीव विशेषज्ञ डा. एम शाह हुसैन का कहना है कि गौरैया बड़े शहरों की चिड़िया नहीं है। लेकिन दिल्ली में इसे रहने के लिए माकूल जगह नहीं है। झाड़ियां कम हो गई हैं। ये घास, पौधों के बीज खाती हैं। लेकिन अब दिल्ली में सजावटी पौधे लगाए जा रहे हैं, जो इसके लिए उपयोगी नहीं है। दिल्ली के आसपास के क्षेत्र में जो खेत हैं, उनके बीज वह दवाओं के छिड़काव के कारण नहीं खा सकते। लेकिन इस संबंध में ओखला पक्षी विहार के संरक्षक जेएन बनर्जी का कहना है कि गौरैया आजकल बड़े होटलों में भी खाने में प्रयोग हो रही है, जिससे इसकी संख्या तेजी से घटी है।
अभिनव उपाध्याय
Wednesday, August 5, 2009
बदले कैसे कैसे रंग
आप एक बार फिर सुन लीजिए, यह अंतिम चेतावनी है समय से आइए नहीं तो गैरहाजिरी लग जाएगी फिर यह मत कहिएगा कि तनख्वाह कट गई। जबसे बड़े बाबू की गैरहाजिरी में छोटे बाबू को मझले बाबू का कार्यभार सौंप दिया गया है तब से उनकी मानसिक स्थिति पर अतिरिक्त बोझ भी पड़ गया और वह प्राय: जूनियर, थोड़ा सा सीनियर और मौका मिले तो मुस्कुराते हुए सीनियर लोगों को भी सीख दे देते थे। लेकिन दिक्कत यह होती थी कि उन्हे अपने कर्तव्य का ज्ञान कभी-कभी होता था जब कार्यभार सौंपा जाता था। वह प्राय: दफ्तर में आम नागरिक की तरह नमक, तेल, दाल,चावल का भाव लगाते और घर जाते ही बाबू बन जाते। पत्नी से चाय, पानी, रोटी से लेकर जूते में पालिश तक करवाते। सामान खरीदने के लिए पैसे निकालना उनके लिए प्रसव पीड़ा से अधिक कष्टदायक था। इन सारी व्यथाओं से तंग आकर
उन्होनें तलाक दे दिया। काफी दिनों तक वे दुखी रहे लेकिन कब तक रहते। कुछ दिनों बाद उन्होंने दूसरी शादी रचा ली लेकिन शादी कुछ-कुछ राखी के स्वयंवर जसी थी। वह खर्च के बोझ से दबे जा रहे हैं। कभी-कभी आफिस में बाबू और घर पर पति बनने की कोशिश कर रहे हैं । लेकिन कभी सफल कभी विफल। अब वह लोगों को आप बीती सुनाते हैं । इसी बीच वह सहीराम से टकरा गए, उनका चेहरा देखकर सहीराम ने उनसे पूछा दिया, ‘क्या बात है आजकल चेहरे से बाबूगिरी नहीं दिख रही।ज् उन्होंने मुंह लटकाकर कहा कि जबसे नई बीबी ने दादागिरी दिखाई है तब से आफिस और घर दोनों जगह पति बनकर रहने लगे हैं। सहीराम के साथ एक और सज्जन बीच में ही बोल पड़े कि पत्नी के मायके जाने के बाद भी यह इत्र लगाकर साते हैं लेकिन स्वप्न सुंदरी टिकती नहीं है । रात में सूंघकर चली जाती है। इससे इनकी कोमल भावनाएं निरंतर आहत होती हैं। सहीराम ने उनकी आपबीती सुनकर कहा कि परेशान मत हो पत्नी से सुप्रीम कोर्ट के जज तक भयभीत हैं। आप पत्नी के मायके वालों की सेवा किया करें उन्हें, खुश रखें महंगे तोहफे और खाने के सामान लाया करें। उन्होनें इस बात को गांठ बांध लिए और अपने ससुर के आने पर उन्होंने दाल का सूप और फूलों की जगह गोभी रख दिया पत्नी के कारण पूछने पर कहा कि अभी बाजार में दोनों के भाव आसमान छू रहे हैं।
अभिनव उपाध्याय
उन्होनें तलाक दे दिया। काफी दिनों तक वे दुखी रहे लेकिन कब तक रहते। कुछ दिनों बाद उन्होंने दूसरी शादी रचा ली लेकिन शादी कुछ-कुछ राखी के स्वयंवर जसी थी। वह खर्च के बोझ से दबे जा रहे हैं। कभी-कभी आफिस में बाबू और घर पर पति बनने की कोशिश कर रहे हैं । लेकिन कभी सफल कभी विफल। अब वह लोगों को आप बीती सुनाते हैं । इसी बीच वह सहीराम से टकरा गए, उनका चेहरा देखकर सहीराम ने उनसे पूछा दिया, ‘क्या बात है आजकल चेहरे से बाबूगिरी नहीं दिख रही।ज् उन्होंने मुंह लटकाकर कहा कि जबसे नई बीबी ने दादागिरी दिखाई है तब से आफिस और घर दोनों जगह पति बनकर रहने लगे हैं। सहीराम के साथ एक और सज्जन बीच में ही बोल पड़े कि पत्नी के मायके जाने के बाद भी यह इत्र लगाकर साते हैं लेकिन स्वप्न सुंदरी टिकती नहीं है । रात में सूंघकर चली जाती है। इससे इनकी कोमल भावनाएं निरंतर आहत होती हैं। सहीराम ने उनकी आपबीती सुनकर कहा कि परेशान मत हो पत्नी से सुप्रीम कोर्ट के जज तक भयभीत हैं। आप पत्नी के मायके वालों की सेवा किया करें उन्हें, खुश रखें महंगे तोहफे और खाने के सामान लाया करें। उन्होनें इस बात को गांठ बांध लिए और अपने ससुर के आने पर उन्होंने दाल का सूप और फूलों की जगह गोभी रख दिया पत्नी के कारण पूछने पर कहा कि अभी बाजार में दोनों के भाव आसमान छू रहे हैं।
अभिनव उपाध्याय