Tuesday, July 13, 2010

शुक्रिया, फुटबाल! शुक्रिया फीफा!



मनोहर नायक

अब आठवां देश स्पेन! फुटबाल की एक बहुत बड़ी और भव्य दुनिया का विजेता देश। हमेशा चूकता, लेकिन इस सुंदर खेल को अपने खास दिलकश अंदाज में खेलता स्पेन अंतत: ग्यारह जुलाई 2010 को अपना हक पा गया। जोहानीसबर्ग में फाइनल गो उसने उस अंदाज में नहीं जीता जिसकी उम्मीद थी। जर्मनी की मंजी हुई शानदार टीम को जसा खेलकर उसने हराया उसकी फाइनल में एकाध दफा ही झलक दिखी। जर्मनी की टीम भी युवा प्रतिभाशाली खिलाड़ियों से लैस थी। अर्जेटीना जसे दावेदार का उसने वैसा ही मजाक बनाकर रख दिया था जसा स्पेन ने सेमीफाइनल मे उसका मजाक बना दिया था और पहली बार फाइनल में पहुंची थी। दूसरे दावेदार ब्राजील को हराने वाली नीदरलैंड भी उखड़ी हुई थी। एक गोल से पिछड़कर हाफ टाइम के बाद उसका खेल स्तब्ध करने वाला था जिसने अंतत: ब्राजील को वापस मुल्क भेज दिया था। स्पेन की कला नदारद थी तो नीदरलैंड का जोशीला जुझारूपन। उनका खेल ‘फिर भी डटे रहे डचज् मार्का ही रहा और एक सौ अठारहवें मिनट में सबस्टीट्यूट फैबरेगास के पास पर आंद्रेस इनिएस्ता ने उन्हें तीसरी बार भी हाथ मलते रहने छोड़ दिया। एक तरह से देखें तो विश्व कप के कुछेक बेहद उम्दा मैचों के बाद फाइनल फीका था। एकस्ट्रा टाइम के कारण लंबा था और उसमें उबाऊ वाले क्षण भी काफी थे। लेकिन उसका जबर्दस्त आकर्षण था कि आठवां विजेता पहली बार कौन होगा! और आक्टोपस पॉल, बनारसी श्यामा चिड़िया, सिडनी के मगरमच्छ और सिंगापुरी तोते को छोड़िये, भूलिये, जीता वही जो बेहतर था।
बेशक स्पेन बेहतरीन टीम थी। इस टूर्नामेंट की सर्वोकृष्ट। 2008 में यूरो कप जीतने के बाद से वह लगातार शानदार खेल रही थी। एक अत्यंत सुसम्बद्ध टीम। उसके छोटे-छोटे सुंदर पासों वाला खेल ब्राजील के अच्छे दिनों की याद दिलाता था। टॉरेस, इनिएस्ता, विला, पुयोलो, फैबरेगास जसे हुनरमंद और धाक रखने वाले सितारे टीम में एक अदद खिलाड़ी ही नजर आते थे। एक स्वार्थी प्रेडो थे, जो वैसे फाइनल में अपनी निजी महत्वाकांक्षा से मुक्त हो गये थे। इस टीम का लक्ष्य स्पष्ट था और उसने उसे भेद ही दिया। पॉल बाबा का क्या विधि विधान था और मीडिया से मशहूर हुए बाकी ‘ज्योतिषीज् किस कर्मकांड से विजेता तय कर रहे थे यह तो शायद ही पता चल सके लेकिन एक चीज जो खेल में हरदम सूर्यप्रकाश सी स्पष्ट होती है वह है: ‘खेलज्। इसलिये डियेगो माराडोना हों या फुटबाल के नामी और अनाम प्रेमी, ज्यादातर, सभी की पसंद स्पेन पर सिमट आयी थी।


अब फुटबाल क्या सभी खेलों में अंधविश्वास का चलन आम है। निर्णायक क्षणों में प्रशंसक भी सिर ऊपर उठाए बुदबुदाते दिखते हैं। फुटबाल का संसार और उसके दांव और खेलों से कहीं ज्यादा विशाल और व्यापक हैं तो यहां अंधविश्वास भी वैसा ही ज्यादा है। अनंत किस्से हैं। मसलन, किसी टीम के कोच ने मैच के आसपास चिकन खाने पर रोक लगा दी थी। किसी विश्वकप के एक सेमीफाइनल में एक खिलाड़ी ने अपना नाम हटवा लिया क्योंकि उसे लगता था कि इस टीम के खिलाफ जब-जब मैं नहीं खेला तब-तब जीत हुई। खिलाड़ियों को मैदान की घास चूमते, आकाश की ओर देखते, क्रास बनाते और मैदान में घुसते ही गोल पोस्ट में किक लगाते या पोस्टों को चूमते तो हर समय देखा जा सकता है। हारने पर खिलाड़ी मातम मनाते हैं और कुछ को यह सदमा रहता है कि इसलिये हारे क्योंकि पिछली बार जीतने के बाद जर्सी विपक्षी टीम के खिलाड़ी से बदल ली थी। अब इसी बार जर्मनी के कोच जोआकिम लोव स्पेन के खिलाफ सेमीफाइनल में वही जर्सी पहने हुए थे जो उन्हें लगता था उनके लिये जीत का डंका बजा रही है। उनके खिलाड़ियों ने उन्हें उसे धोने तक नहीं दिया था। लेकिन हुआ क्या स्पेन ने अच्छी-खासी टीम की गत बना दी।
इस स्वीकारोक्ति में भला क्या हर्ज की ब्राजील के पुराने शैदायी हमें भी क्वार्टर फाइनल में नीदरलैंड के खिलाफ ब्राजीलियनों को अपनी मशहूर पीली जर्सी में न देखकर खटका हुआ था। लगा था कि जिताने के लिये इस नीली जर्सी की पीली पट्टियां ही काफी नहीं। ब्राजील हार भी गयी। बाद में पढ़ा कि दशकों से ब्राजील इस जर्सी को पहनकर हालैंड से जीतती रही है। लेकिन जर्सियां नहीं जितातीं! दस नंबर की जर्सी की क्या दुर्दशा हुई! काका-मैसी-रूनी सभी फ्लाप। टॉप स्कोरर न होते हुए भी दस नंबर की जर्सी वाला खिलाड़ी टीम की आत्मा होता है, दिल-दिमाग। पेले-प्लातीनी और बैजियो की तरह। वह तो कहिये फोरलैन और श्नाइडर ने उसकी कुछ लाज बचा ली।
ब्राजील के पूर्व कप्तान सोक्रेटीज ने स्पेन को जीतने का हकदार बताते हुए कहा भी था कि अगर मैं अंधविश्वासी होऊं तो मानूंगा कि इस टूर्नामेंट के सारे मैच जीतने वाली नीदरलैंड को ही फाइनल जीतना चाहिए। बात सही है। खेल में ऐसा नहीं होता। पहला ही मैच हारने वाली स्पेन विजेता रही और कोई भी मैच न हारने वाला नीदरलैंड सबसे महत्वपूर्ण, निर्णायक और ऐतिहासिक मैच हार गया। औरों की तरह स्पेन के कोच विसेंट डेल बोस्क को अपनी टीम पर भरोसा था, पर वे किसी मुगालते में नहीं थे। शुरू में ही एक इंटरव्यू मे उन्होंने कहा था, ‘कोई मैच आसान नहीं होता। पेपर पर कोई भी टीम बड़ी हो सकती है पर वह जीते यह शर्तियां नहीं होता।ज् यूं देखें तो वाकई सबसे तगड़ी टीम इंग्लैड की थी। अर्जेटीना और ब्राजील भी। लेकिन सब पूर्व विजेता एक-एक कर बाहर होते गए। ब्राजील की टीम का तो चाल-चलन ही बदल दिया कोच डूंगा ने। उनके लिये ‘जीतज् महत्वपूर्ण थी। जीतने के लिये तो खेला ही जाता है लेकिन जसा कि उरुग्वे के इतिहासकार एडुआडरे गैलियानो कहते हैं कि फुटबाल की यात्रा ‘ब्यूटीज् से ‘ड्यूटीज् हो जाने की है। गोल मारने के बजाय, बचाने पर जोर हो गया है। खिलाड़ी से उसकी सूझबूझ छीन ली गयी है। वह ‘जीतज् का बंदी है। सोक्रेटीज ने अपने एक कॉलम में जसे अपने ही समकालीन डूंगा को ध्यान में रखकर लिखा: ‘बहुत से कोच आजकल आज्ञाकारी और औसत खिलाड़ियों को पसंद करते हैं। ये बिना सोच-विचारे आदेशों को मानते रहते हैं और कलात्मकता की बनिस्बत भद्दे ढंग से खेलकर मैच जीतना चाहते हैं।ज् इतिहास को अपनी आगोश में लेने की कश्मकश वाले फाइनल में ‘जीतज् का यह दबाव दिखा जिसने खेल को भद्दा भी किया और दोनों टीमों का निजी कौशल भी कम किया।
इस विश्व कप ने एक नया विजेता दिया है और बताया है कि फुटबाल की दुनिया बदल रही है। दिग्गज बौने नजर आ रहे हैं। इटली स्लोवाकिया के हाथों पिटती है। सितारों की चमक धूमिल पड़ रही है। गोल्डन ग्लोव पाने वाले इकेर कैसियास हों या इनेएस्ता, जिन्हें रूनी भी सर्वश्रेष्ठ फुटबालर मानते हैं, मुलर हों या विला या फोरलैन या घाना के गोलची किंग्स्टन या जियान या होंडा। नये-नये सितारे उभरे हैं। आगे अफ्रीका और एशिया की चुनौती और तीव्र होगी। खुद फीफा बदल रहा है। चूकों के लिये वह शर्मिदा हुआ और नियम बदलने पर आमादा है। वेवेजुला की गूंजती आवाजों ने उसके कान-कपाट खोल दिये हैं। इसकी गाज तीखी आवाज वाले वेवेजुला पर भी गिरी है। 2014 के लिए उस पर पाबंदी लग गयी है।

वेवेजुला के शोर, जुबलानी पर प्रहार की दुनिया से हम परसों देर रात एकाएक बाहर आ गए। महीने भर तक हम फुटबाल की विराट और रोमांचकारी दुनिया की प्रजा थे। शायद इस दौरान की यह सबसे बड़ी दुनिया होती है। अनेकता में जुनूनी एकता वाली। देशों, भाषाओं की सबसे विविध और रंगीन दुनिया। फीफा जिसकी सरकार होता है और जो अपना काम ‘अरबितरोज् यानी रैफिरियों के जरिये निरंकुश ढंग से चलाता है। इस दुनिया में शामिल रहना अनोखा और लाजवाब था। जसा कि विश्व कप आयोजन समिति के प्रमुख कार्यकारी डैनी जॉर्डान ने कहा कि फुटबाल का यह आयोजन हमें जोड़ता है। अपनी भाषा का एक शब्द ‘उबन्नुज् उन्होंने इस्तेमाल किया जिसका अर्थ है कि हम सब आपस में बंधे हुए हैं। फीफा की यह सरकार दखलंदाजी भी पसंद नहीं करती। फुटबाल तो करामाती है। उथल-पुथल करती है। देश, सरकार उससे डावांडोल होती हैं। पर फीफा डपटे तो नाइजीरिया और फ्रांस सब दुबक जाते हैं। लेकिन लोग, वे तो फुटबाल के जरिये बदला लेते और चुकाते हैं। सोरेज उरुग्वे में ‘हीरोज् तो जाते हैं तो समूचे अफ्रीका में ‘चीटज्। घाना ही नहीं पूरा अफ्रीका उरुग्वे के खिलाफ मैच में नीदरलैंड के समर्थन मे वेवेजुला बजाता है। फीफा ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल इस बार नस्लवाद के खिलाफ किया। और देखिये, नस्लवाद के गढ़ रहे दक्षिण अफ्रीका में और उसके खिलाफ लड़ने वाले अप्रतिम योद्धा नेल्सन मंडेला की उपस्थिति में वह नीदरलैंड हार गया, जिसने औपनिवेशिक दौर में नस्लीय नियम लागू किये थे। लोग कहते रहें, खेल-खेल है, इतिहास -इतिहास। लेकिन फुटबाल का खेल इतिहास से सामना कराता रहता है।

Sunday, July 11, 2010

विमल रॉय: एक यथार्थवादी निर्देशक


फिल्म समाज का आइना है और फिल्मकार समाज को गहराई से देखकर एक कलमकार की तरह उसे पृष्ठों पर उकेरने वाला जनक। प्रसिद्ध फिल्मकार विमल राय उन्हीं फिल्माकारों में से थे जिन्होने समाज की सही दशा अपनी फिल्मों के माध्यम से लोगों के सामने लाए और दर्शकों को एक नए सिनेमा से रूबरू कराया। हम आज उनकी जन्मतिथि को उन्हे याद करते हैं और उनके कार्य को शत शत नमन करते हैं।
हिंदी फि ल्म जगत में मिल राय एक ऐसी सुहानी बयार की तरह आये जिन्होंने अपनी ‘देवदास, दो बीघा जमीन, ‘परणीता, ‘बिराज बहू और बंदिनी जैसी फि ल्मों से मनोरंजक और यर्थाथ सिनेमा की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ दिया । साथ ही उन्होंने फि ल्म निर्माण के लगभग हर पक्ष को एक सर्वथा नया छंद दिया। समीक्षकों के अनुसार उनकी लगभग हर फिल्म विषय को बेहतरीन ढंग से उठाने की कला, संगीत, फिल्मांकन, अभिनय, गीत चिंत्राकन के कारण फि ल्मकारों के लिए आज भी पाठ्यपुस्तक का काम करती हैं। मिल राय की फि ल्में मानीय रिश्तों और समाज की बलती प्रृतियों को बहुत गहराई तक कुरेती हैं और उनकी फ ोटोग्राफि क नजर मधुमति जैसी फि ल्मों में प्रकृति की सूक्ष्म धड़कनों को महसूस करती है। 12 जुलाई 1909 को ढाका में जन्मे मिल राय ने श्याम श्वेत फिल्मों में फि ल्म निर्माण के कुछ ऐसे प्रतिमान गढ़ दिए जिन्हें तोड़ना आज के फि ल्मकारों के लिए भी मुश्किल है।
फि ल्मकार अनर जमाल उनके बारे में कहते हैं कि मिल राय और उनके ौर के फि ल्मकार सामाजिक सरोकारों के प्रति सेंनशील होते थे और उन्हें साहित्य एं संगीत की समझ होती थी। इससे उस ौर के फि ल्मकारों की फि ल्मों में सामाजिक, राजनीतिक, लित मिर्श और महिला मिर्श की स्पष्ट छाप दिखाई है। उनका कहना है कि र्ष 1953 में प्रर्शित उनकी फि ल्म ‘दो बीघा जमीन की प्रासंगिकता को इक्कीसीं सी में देखा जा सकता है। उस वक्त जब दूनिया ने ‘सुपर इकोनामिक जोन का सपना भी नहीं देखा था, मिल राय जैसे यथार्थवादी निर्देशक ने इस बात की कल्पना कर ली थी कि आने वाले समय में इसके नाम पर किसानों और खेतिहर मजूरों को किस तरह के संकट का सामना करना पड़ेगा। फि ल्म समीक्षक और इतिहासकार अमरेश मिश्रा इस संदर्भ में कहते है कि सामाजिक बला के दौर में विमल राय और महबूब दो प्रमुख फि ल्मकार थे। जहां विमल राय लोकतांत्रिक चेतना के वाहक थे और उनकी फि ल्मों का फलक इतना विशाल था कि उन्हें किसी खास विचारधारा से बांधा नहीं जा सकता, दूसरी तरफ महबूब की फि ल्मों का समाजावादी रूझान एकदम स्पष्ट था। विमल राय ने ‘सुजाता के जरिये समाज में व्याप्त छुआछूत की समस्या को परे पर उतारा। वहीं ‘परख के जरिये देश की चुनाव पद्धति को परखने की कोशिश की और यह भष्यिवाणी करी कि इस देश की चुनाव प्रणाली भ्रष्ट होती जा रही है। उन्होंने कहा, ‘‘विमल राय में, व्यासायिक सिनेमा की गहरी समझ थी और हर दर्शक की नब्ज से भली भांति परिचित थे। आजकल के फि ल्मकारों की कई फि ल्में उनकी फि ल्मों से प्रेरित नजर आती हैं। समाज, देश की बुराइयों के साथ ही स्त्रियों की समस्याओं पर भी उनकी दृष्टि थी। हिंदी सिनेमा में आज भी नायक प्रधान फि ल्में बनती हैं, जबकि मिल राय उस क्त नायिकाओं की अभिनय क्षमता को न केल सामने लाये बल्कि उन्होंने फि ल्मों के नाम भी महिलाओं पर रखे। छायाकार के रूप में ‘न्यू थियेटर कंपनी में काम करने वाले विमल राय को निर्देशन का सफ र तय करने में उन्हें आठ साल लग गये। उन्होंने 1944 में पहली हिंदी फि ल्म ‘हमराही का निर्देशन शुरू किया, जो बांग्ला फि ल्म ‘उयेर पाथेज का हिंी संस्करण थी। फिल्म की नई धारा की शुरूआत करने वाला यह सात जनरी 1966 को मुंबई में उनका निधन हुआ। लेकिन फिल्मों और विचारों के माध्यम से वह हमारे बीच सदैव मौजूद रहेंगे।
दीपक सेन

Friday, July 2, 2010

खाप का खौफ कब तक !

पंकज चौधरी

कुछ दिन पहले करनाल जिला अदालत ने मनोज-बबली हत्याकांड के सात अभियुक्तों में से पांच को जब मौत की सजा सुनाई तो खाप के चौधरियों ने आसमान को सर पर उठा लिया था। इन चौधरियों ने तुरंत कुरुक्षेत्र में एक सभा बुलाई और अदालती फैसले को जमकर कोसा। खापों के इन नेताओं ने मनोज-बबली हत्याकांड के दोषियों के प्रति पूरी हमदर्दी जताई और फरमान जारी किया कि मौत की सजा पाए लोगों का मुकदमा हाई कोर्ट में लड़ने के लिए हर परिवार दस-दस रुपए का चंदा जुटाए। इसके अलावा इन्होंने सबसे बड़ा फैसला जो लिया वह यह था कि एक ही गोत्र में शादी पर पाबंदी लगाने के लिए हिन्दू मैरिज एक्ट-1955 में सरकार संशोधन करे। हिन्दू मैरिज एक्ट-1955 के सेक्शन-5 में लिखा है कि ‘उसी स्त्री से विवाह न्यायसंगत है जो मानसिक रूप से स्वस्थ हो, उसे बच्चे पालने में कोई कठिनाई नहीं हो, उम्र 18 साल से ज्यादा हो और पति के साथ ब्लड रिलेशन नहीं हो।ज् मतलब यह ब्लड रिलेशन माता-पिता की ओर से तीन-चार पीढ़ियों तक सीमित रखा गया है।
खाप पंचायतें जो एक ही गोत्र या फिर एक ही गांव के लड़का-लड़की के विवाह कर लेने पर उसे मौत के घाट उतारने का फरमान जारी करती हैं, की सबसे बड़ी आपत्ति तथाकथित जेनेटिक चिंताओं को लेकर है। इनका तर्क है कि एक ही गोत्र के लड़के-लड़की से जो संतान उत्पन्न होगी उसमें कई तरह के की विकृतियां होंगी। मसलन उनमें सफेद दाग, विकलांगता, हीमोफीलिया आदि-आदि बीमारियां हो सकती हैं। इस बात की पुष्टि के लिए जब मैंने कई विकलांग, हीमोफीलिया और सफेद दाग से पीड़ित लोगों से बात की तो पता चला कि उनके माता-पिता तो कोई समगोत्रीय नहीं थे। वे लोग जसा कि हिन्दू विवाह पद्धति का नियम है कि वे एक ही जाति के हों, तो वे वैसे ही थे। इसके अलावा शादी से पहले उनका दूर-दूर तक कोई रिश्ता भी नहीं था। मतलब विकृतियों की समस्या अलग-अलग गोत्रों के बीच हुई शादियों में भी हो सकती है। यह कहना कि सगोत्रीय शादी में ही ये समस्या उत्पन्न होती है, बेबुनियाद है। इस सिलसिले में मैंने मेडिकल साइंस के कुछ प्रगतिशील विशेषज्ञों से भी बात की तो उन सबका मिला-जुलाकर यही जबाव था कि हजारों में किसी एक करैक्टर में ही जेनेटिक विकृतियों की आशंका रहती है।
सारा विवाद इस एक शब्द ‘गोत्रज् को लेकर है। इस शब्द का उल्लेख पहले-पहल गवेद में मिलता है। गवेद की गुरु-शिष्य परंपरा या फिर उस आश्रम की जहां गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान बांटने का काम करते थे जगजाहिर है। कहा जाता है कि यह ‘गोत्रज् शब्द वहीं से आया है। एक आश्रम में शिक्षा लेने वाले लोग सगोत्रीय माने जाते थे और उनके बीच शादी की मनाही थी। हम इस बात से अवगत हैं कि वैदिक काल में जाति के स्थान पर वर्ग अस्तित्व में था और आश्रम में ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य तीनों वर्ग के लोग शिक्षा प्राप्त कर सकते थे। इस आधार पर आश्रम में जब तीनों वर्ग के लोग शिक्षा प्राप्त कर सकते थे तब उनका ‘गोत्र एक कैसे हुआ? गोत्र का आधार जब ब्लड रिलेशन है तब फिर आश्रम के तीनों वर्गो के शिक्षार्थियों का भी जाहिर है, ब्लड ग्रुप अलग-अलग होगा। क्या विभिन्न क्षेत्रों, वर्गो और अनुशासनों से आने वाले लोगों को मनमाने तरीके से एक ही ‘गोत्रज् के खूंटे में बांध दें? और फरमान जारी कर दें की इनके बीच अब रोटी-बेटी का संबंध नहीं हो सकता। तब फिर दुनिया कैसे चलेगी! यह ‘गोत्र शब्द जब से अस्तित्व में आया है तब से ही यह फर्जीवाड़ा है। ये दावे के साथ कहा जा सकता है कि इस देश के 80 प्रतिशत लोगों को उसके ‘गोत्र का कुछ अता-पता नहीं। मैं अपने गांव के एक सम्पन्न मुशहर को जानता हूं, जिनसे श्राद्ध में उनके गोत्र का नाम जब उनके पुरोहित के द्वारा पूछा गया तो वे अकचका कर रह गए और उन्होंने अपने गोत्र का नाम बताने में असमर्थता जताई। तब पुरोहित ने अपने यजमान को अपने गोत्र का नाम दिया और कहा कि आज से आपके गोत्र का नाम हमारे ही गोत्र से चलेगा। और पूरा श्राद्ध पुरोहित के गोत्र से सम्पन्न हुआ। जाहिर है कि पुरोहित के पूर्वजों की आत्मा को ही शांति मिली होगी न कि यजमान के पूर्वजों की आत्मा को।
आदिवासी समाज की जीवन पद्धति को बहुत ही प्राकृतिक और वैज्ञानिक माना जाता है। उस समाज के वैवाहिक आधार को यदि हम देखें तो चौंक जाएंगे। भारत, ब्राजील और अमेरिका की कुछ जनजातियों में भाई-बहन, चाची-भतीजा, मौसी-भांजा और यहां तक कि दादी और पोते के बीच भी शादियां होती हैं। बशर्ते उन लोगों के बीच प्रेम हो। और ऐसी शादियों में उस समाज के चौधरियों और नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मुस्लिम समाज में ‘दूधज् के संबंध को छोड़कर धड़ल्ले से शादियां होती हैं। दक्षिण भारत में तो बहन अपने भाई की बेटी को अपने बेटे से ब्याह करवा देती है। आज जब दुनिया एक गांव में तब्दील हो गई है और कोई भी कहीं भी विचरने के लिए स्वतंत्र है तब फिर दो बालिग को जो एक-दूसरे से प्यार करते हैं और आपसी सहमति से शादी करना चाहते हैं, को मौत के घाट उतार देने का फरमान जारी करना कहां तक उचित कहा जा सकता है।

खाप पंचायतों की ओर से प्रेमियों के लिए मौत के जितने भी फरमान जारी किए जाते हैं उनमें लड़कियों की हत्या की घटनाएं सबसे ज्यादा होती हैं, क्योंकि सामंती समाज में लड़कियां ही घर की इज्जत होती हैं। सामंती समाज का सीधा संबंध खेती और सत्ता से है। हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित क्रांति हुई और इसका फायदा वहां के किसानों को मिला। इस क्षेत्र के किसान अमूमन जाट हैं। हरित क्रांति की समृद्धि के बलबूते ही पिछले 25-30 वर्षो से हरियाणा में जाटों की सरकार है या उसके पास भी सत्ता है। इस सत्ता के नशे में ही वे पंचायती राज व्यवस्था को नहीं मानते और इसके समानांतर उन्होंने खाप पंचायतें चला रखी हैं। एक आंकड़े के अनुसार हरियाणा के 6759 गांवों में 6155 पंचायतों की व्यवस्था है लेकिन कई गांवों में इन पंचायतों की तुलना में खाप पंचायतें ज्यादा प्रभावशाली हैं। मतलब खाप पंचायतें आधुनिक सरकार और राज्य को सीधे-सीधे चुनौती देने का काम करती हैं। पिछले 25-30 वर्षो के दौरान हिन्दीभाषी राज्यों की मध्यवर्ती जातियों के पास भी सत्ता आई है। बिहार और उत्तर प्रदेश की यादव और कुर्मी और हरियाणा की जाट ये तीनों जातियां मध्यवर्ती जातियां तो हैं ही साथ ही ये मार्शल कास्ट भी मानी जाती हैं। मार्शल कास्ट प्राकृतिक रूप से दक्षिणपंथी रुझान की होती हैं। ये महिलाओं और दलितों पर उसी तरह से अत्याचार करेंगे जिस तरह से ब्राह्मण और राजपूत करते हैं। हरियाणा में पिछले दिनों मिर्चपुर में एक दलित पिता और उसकी बेटी को जिंदा जला देने की घटना इसी का ज्वलंत उदाहरण है। बिहार और उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों, ठाकुरों और भूमिहारों के बाद दलितों के ऊपर सबसे ज्यादा अत्याचार यादवों और कुर्मियों ने किए हैं। देखा जाए तो इन मध्यवर्ती जातियों ने आज पहले के ब्राह्मणों और ठाकुरों का स्थान ले लिया है। सती प्रथा और विधवाओं का विवाह नहीं होने देने की समस्याएं पहले निम्न जातियों में दूर-दूर तक देखने को नहीं मिलती थीं। मतलब महिलाओं का दमन यहां नहीं था। महिलाएं यहां स्वतंत्र थीं, क्योंकि वे अपनी आजीविका का साधन खुद जुटाती थीं। महिलाओं का दमन और खाप पंचायतों के फरमान सीधे-सीधे पुरुषवादी, सामंतवादी और वर्चस्ववादी लोगों से जुड़े हुए हैं।

Tuesday, June 15, 2010

अपनी बिरादरी के लोग

राष्ट्रमंडल खेल में लठैतों, कबड्डी खेलने वाले, तीर मारने वाले, तैराकी करने वाले खिलाड़ी टाइप लोगों को दिखाने के लिए दिल्ली को दुल्हन की तरह सजाने की तैयारी सरकार कर रही है। लेकिन यह डर सबसे मन में है कि कहीं कोई आशिक बीच में अड़ंगा न लगा दे। ये डर इस कदर बरकरार है कि बड़े हाकिम अब लोगों को प्यार से समझाने लगे हैं। किसी के साथ भी अभद्रता नहीं की जाएगी। भिखारियों का हाकि मों से हमेशा गुड़-चींटी का रिश्ता रहा है। दिल्ली में कोई भी निजाम बना, भिखारी हमेशा खुश रहे। लेकिन राजधानी में जब से यह फरमान जारी हुआ कि भिखारियों को राष्ट्रमंडल खेल के तहत दिल्ली से पलायन करना पड़ेगा तो दिल्ली के भिखारियों का दिल ही बैठ गया। सबने एक सुर में निजाम को बद्दुआएं दी और कहा लोग आइपीएल में पैसा बना रहे हैं लेकिन बीपीएल के नीचे वालों को कोई नहीं पूछ रहा है। गौरतलब है कि दिल्ली के भिखारियों में एक बड़ी संख्या पोस्टग्रेजुएट भिखारियों की है जो अंग्रेजी सहित विभिन्न भाषाओं के अखबार पढ़ सकते हैं और नए नए लुभावने अंदाज में भीख मांगते हैं। ये हाजिर जवाब भी हैं। मसलन, किसी ने कहा कि हे दिल्ली के अमीर भिखारियों अब तुम्हारी छुट्टी होने वाली है। झट से एक स्मार्ट भिखारी ने कहा क्यों? क्योंकि हम भिखारी हैं। अरे महंगाई ने तो देश को भिखारी बना दिया है। किस-किस को निकालोगे? कहीं ऐसा न हो कि राष्ट्रमंडल खेल के नाम पर बाबू जी लोग देश का बंडल कर के अपना कमंडल भर ले। महोदय निरुत्तर हो गए। यह एक विकट समस्या न बन जाए इसके लिए आला अधिकारियों ने फरमान जारी किया। विदेशी मेहमान जब इतने भिखारी देखेंगे तो हमारे देश की भद्द पिट जाएगी। इन्हें रुख्सत करने का कुछ तो उपाय करना होगा
इतने भिखारी देखकर विदेशी मेहमान एक बार तो समझ ही जाएंगे कि हम सही जगह पर नहीं आए हैं। ये तो पहले कहते ही थे कि भारत जादूगरों और सपेरों का देश है। अब भिखमंगों का देश भी कहने लगेंगे। इस विचार-विमर्श के बीच कटोरा बजाता एक भिखारी आ गया बोला, चाहे लाख कोशिश कर लो हम तो नहीं हिलेंगे। उसने सबके सामने चुनौती रखी। अधिकारी पशोपेश में हैं कि क्या किया जाए। किसी ने कहा माई-बाप हमारी नौकरी का तो कुछ ख्याल करो, मान जाओ। चतुर भिखारी ने फटा पैजामा मोड़ा, कटोरा बजाया और तड़क कर बोला हम राजधानी के मान्यता प्राप्त भिखारी हैं, ऐसे नहीं जाएंगे। तभी एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इनसे कुछ ले दे कर मामला निपटा लो। ये अपनी बिरादरी के मालुम पड़ते हैं। यह सुनते ही भिखारी ने जारे-जोर से कटोरा बजाया और खुशी से दांत बाहर निकाल लिए।

लाइन बदलने की सोच

बजट के बाद आये दो बड़े मध्यम दो तुफानो में एक बाबा समेत कई रसिक टाईप बाबाओं को पकड़ा गया .और दूसरा महा माया मायावती को नोटों की माला पहनाकर सुशोभित किया गया. जब अखबारों के फर्स्ट पेज पर यह समाचार भिखारियों को मिला और महामाया की तस्वीर उन्होंने देखि तो जीभ काटकर रह गए.जब यह समाचार उन्हें मिला की महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करने वाले संसद की नोटों की माला उनके समर्थकों ने खिंच ली तब वह दांतों टेल जीभ काट लिए.गौर तलब है की जब भी कोई धन सम्बन्धी क्खाबर भिखारियों को लगती है यह ऐसे ही जीभ काट लेते हैं. उनके अन्दर अजीब सी बेचैनी आ जाती है.एक भिखारी को जब यह खबर मिली की बाबा लोग अब बालाओं के माध्यम से कमाई कर रहे हैं तो उसने दूरभाष से अपने बाबा मित्र से पूछा की इस तरह के धंधे में कितनी कमी हो जाती है? बाबा ने धंधे के बारे में वही पुराना राग अलापा बस रोटी पानी चल जा रही है , क्या है की बड़ा लफड़ा है . पुलिस तो सूंघती रहती है जब तक दो चार बोटी न फेंको पीछा ही नहीं छोड़ते. भिखारी मन मरकर रह गया .
इच्छाधारी बाबा के पकडे जाने पर सभी बाबाओं को अपनी सुरक्षा की चिंता सता रही थी .साथ में बिजनेस में घटा न हो जय इसके लिए भी परेशान थे. सभी बाबाओं में एक मीटिंग बुलाई, यह मीटिंग श्री श्री 1oo8 गुरुघंटाल जी महाराज के आश्रम में हुई.सभा में इसपर चिंता जताई गई की कुछ लोग इस धंधे को ख़राब कर रहे हैं. न उनमे चतुरता है और न ही चपलता.आखिर बालाओं के साथ विहार करने की क्या जरूरत थी ? हम तो जायेंगे सनम तुमको भी ले जायेंगें. और बाबा सुघर नन्द ने हद कर दी. खु द ही सिने तारिका के साथ रस रचाने लगे. जरा भी आत्म सयम नहीं है. अगर हमलोग अपनी हरकतों में सुधार नहीं करेंगे तो भक्त भड़क जायेंगे.तब हो चूका धंधा.उस बाबा भोग देव को क्या पड़ी थी जो योग सिखाते-सिखाते चुनाव लड़ने के लिए पार्टी बना लिया.थोडा सब्र करता सब मिलकर लड़ते.भाई संगठन में शक्ति है. बहरहाल सभा में यह निर्णय लिया गया की अब सब बाबा संयम से कम लेंगे.और काम करने के त्रिकोण में तबदीली लानी होगी . गुरु घंटाल ने एक और सुझाव दिया की अब हमें अपने-अपने पारम्परिक नाम छोड़कर नए नाम के साथ बाजार में आना चाहिए. सर्व्पथं गुरु घंटाल ने अपना नाम बदलकर कॉर्पोरेट बाबा रखा . नाम बिलकुल समय के अनुकूल था सबको बहुत पसंद आया.बाबा व्यापारिक घरानों के प्रोडक्ट लोंच करने लगे.अब वह जन्मदिन पूजा करने की नहीं बल्कि केक काटने की सलाह देने लगे.उनकी प्रसिद्धि देखा कर और बाबा भी उनसे सलाह लेने आने लगे.बाबा चयितु राम जो किसानो को इस साल कौन सी फसल बोना चाहिए और पानी कब और कितना बरसेगा इसकी भविष्यवाणी करते थे धंधा मंदा होने पर बाबा के पास पहुंचे बाबा ने समस्या सुनी और उनका नाम मानसून बाबा रखने की सलाह दी धंधा चल निकला . बाबा के दर्शन अब चैनलों पर होने लगे.चैनेल की टीआरपी भी उछलने लगी . धन वर्ष से बाबाओं का तन मन डूबने लगा. लोकतंत्र के पहरुए नेता निरंतर हार का मुह देखने के बाद कॉर्पोरेट बाबा की शरण में आये. बाबा ने समझाया , वत्स जो धन पार्टी कोष में देते थे वो अब दान पात्र में दलारो कल्याण होगा. सभी भक्त चुनाव के समय प्रचार करने जायेंगे.
नेता जी बोले , बाबा नाम बदने की जरूरत नहीं पड़ेगी? बाबा ने पूछा तुम्हारा नाम क्या हैं वत्स? नेता जी ने कहा chiraujimal तोता राम. बाबा ने कहा शोर्ट नेम का जमाना है . अबसे तुम्हारा नाम चिरतो रहेगा . फ़ॉर्मूला काम आया नेता जी की विजय हुई. भिखारी अब हर साल बजट के बाद की घटनाओं में उअल्झा है. बाबाओं के चमत्कार देख वह लाइन बदलने की सोच रहा है.

मंहगाई का स्वाद....

सब अपनी-अपनी समस्या के समाधान के लिए बाबा घंटानंद के यहां जाते हैं। सबकी विभिन्न तरह की समस्याएं हैं। लौकिक से लेकर पारलौकिक समस्याओं का समाधान यह अपनी विभिन्न विद्याओं के माध्यम से बताते हैं। ये विद्या उन्हे कहां से मिली और आगे वह किसको इसे प्रदान करेंगे इसके बारे में पूछने पर वह आधे इंच में रहस्यमई मुस्कान बिखेर देते हैं। वह कहते हैं कि वत्स, समाधान से मतलब रखो बहुत जानने की कोशिश करोगे तो व्यवधान पड़ जाएगा।
बहरहाल उनसे समस्या का समाधान जानने राजा रंक भिखारी नर नारी सब बेधड़क आते थे। किसी नेता ने एक बार उनसे पूछा बाबा हर बार चुनाव लड़ता हूं लेकिन जमानत जब्त हो जाती है? बाबा ने फिर एक चिरपरिचित मुस्कान बिखेरी और कहा कि मैं भुक्त भोगी हूं लेकिन इसका एक उपाय है, आप जमानत पहले ही दे दें कि जब्त होने की नौबत ही न आए। प्राय: जब हम कुछ करने में असफल हो जाते हैं तो नेतागिरी करते हैं। लेकिन उसे भी गंभीरता से नहीं। नेतागिरी में यदि कोई गंभीर नहीं है तो निश्चित रूप से यह लोकतंत्र का अपमान है। लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आये दिन लोग प्रश्नचिह्न् खड़ा करते हैं लेकिन इसको लेकर गंभीर नहीं है। बाबा से अपनी समस्या के समाधान के रूप में नेता जी को ऐसी परिचर्चा की उम्मीद नही थी।
पड़ोस की आंटी को अपने बेटे से लेकर समस्या थी वह उसके व्यवहार में हो रहे परिवर्तन से दुखी थी बाबा के दरबार में गई और कहा मेरे बेटे के लिए कुछ करिए। यह अकसर आईपीएल के बाद उदास रहता है। बाबा ने बच्चे को बुलाया और पूछा, बच्चे ने कान में बाबा से सट्टे में धनहानि की बात बताई। बाबा ने कहा चिंता मुक्त हो बालक अब 20-20 का वल्र्ड कप चल रहा है और इसमें मोदी भी नहीं है। इस बार सारी कमी की भरपाई कर लो। खिलाड़ियों ने खुद तो मौज लूटा और अनाड़ियों को भिखमंगा बना दिया। सहीराम की पड़ोसन बासमति की दूसरी समस्या थी वह बाबा के पास गई और बोली, बाबा जी मैं पिछले एक वर्ष से खाना बना रही हूं लेकिन किसी ने मेरी तारीफ नहीं की। मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रह रहा है। मैं खाना दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके बतानी हूं। मैं किस दिशा में मुख करके खाना बनाऊं कि लोगों को खाना स्वादिष्ट लगने लगे? बाबा घंटानंद थोड़ी देर विचार करने के बाद बोले, देवी, तमाम प्रकाशित अप्रकाशित वाचिक और मूक अनेक माध्यमों से अध्ययन के बाद जो ज्ञान मुङो प्राप्त हुआ है इसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि स्वाद का दिशा से कोई संबंध नहीं है लेकिन घर वालों से पूछो कि कहीं मंहगाई ने स्वाद नहीं बिगाड़ दिया है।

तुम्ही से मुहब्बत और तुम्ही से लड़ाई

जनाब तुम्ही से मुहब्बत और तुम्ही से लड़ाई मुहावरे को अगर दृश्य रूप में समझना हो तो एक बार आप नेता सुकंठी से मिल लें। उनके पास प्रेम के से लोगों को प्रेम पाश में बांधने का ऐसा फामूर्ला है कि सबका फार्मूला फेल हो जाता है। सिने सितारों और चांदनियों पर उनका ऐसा जादू चलता है कि बस उनके एक अलाप पर सब सुर में सुर मिला लेते हैं। मंच हो या लंच यह अक्सर उन स्थलों पर अपनी बयानबाजी से मीडिया में छाए रहते हैं। मेरे एक मित्र थोड़े पत्रकार टाइप हैं। कभी कभी उनकी खबरें बस फुसफुसा कर रह जाती हैं। कभी कभी विस्फोट करने के लिए लिखते हैं कि लेकिन एक दम से शांति से छा जाती है। एक दिन उनकी नौकरी पर बन आई। बस किसी ने राय दी और वह झट से नेता सुकंठी से मिले। बोले नेता जी आप कुछ भी बोल दीजिए जो खबर बन जाए, मेरी नौकरी का मामला है। मामला जनता के भला का था उस पत्रकार के परिवार का वोट तो उन्हे मिल ही जाता। उन्होने झट से कहा जल्द ही इस मेरे लोक सभा क्षेत्र में लोगों को मिठाइयां बंटेगी इसके साथ ही जो लोग टीवी में नाचते थे वह खेतों में नाचेंगे। खबर छपी, खबर का असर भी हुआ। सिने तारिकोओं को देखने के लोग पहले नए कपड़े बनवाए, साबुन से नहाया, गेंहूं-चावल बेंच कर झंडा खरीदा। प्रशासन भी जिंस की तरह चुस्त हो गया। पत्रकार की भी बल्ले-बल्ले हो गई। नेता जी की पार्टी से विज्ञापन भी आने लगे। नेता जी ने स्वयं कार्यक्रम में तारिकायों के संग रसभरी नृत्य प्रस्तुति दी। उनकी पार्टी के लगभग उदित और नवोदित दोनों तरह के कार्यकर्ता आए थे। लोगों ने उनसे आशीष लिए। नेता जी को जब लगा कि उनसे अधिक लोकप्रियता उनके कार्यक्रम में आये सुपर स्टार को मिल रही है तो उन्होने तुरंत सुपर स्टार के दुर्दिन के दिन मीडिया के सामने गाने लगे। कुछ दिन बाद सुपर स्टार ने इनकी पार्टी को राम राम कर दिया। नेता जी की महिमा में कोई कमी नहीं आई वह अपनी बोली की गोली चलाते रहे विपक्षी मुस्कुराते रहे। एक दिन किसी मंच पर फिर स्टार से टकरा गए और उन्हे अपना शुभ चिंतक तथा घनिष्ठ मित्र बताया। लंच पर उनसे कहा कि अब स्टार वार खत्म हो गया है। आपकी फिल्में भी ठीक-ठाक चल रहीं हैं। मेरी पार्टी में कार्यकर्ता भी जुड़ रहे हैं। मिल के पार्टी को गति दें तो दोनों की मौजा ही मौजा होगी। भाई स्टार आप मंच पर भाभी जी के साथ आएं तो महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिलेगा। अब गुस्सा को थू करो जी, अरे मुहब्बत तुमसे है तो लड़ाई क्या पड़ोसी से करेंगे?

Wednesday, May 26, 2010

अभी जिंदा है निजामुद्दीन की बावली



प्रसिद्ध सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से बस कुछ ही कदम की दूरी पर स्थित लगभग 800 वर्ष पुरानी बावली अभी जीवित है, मतलब आज भी उसमें पानी आता है। लेकिन कुछ साल पहले यहां आने वाले दर्शकों को यह पता भी नहीं था कि यहां पर इस सूफी संत द्वारा निर्माण कराई गई एक बावली भी है। बावली की वर्तमान स्थिति अब थोड़ी ठीक है लेकिन इसके चारो तरफ ऊंचाई में बने मकान हैं। मकानों से घिरा होने के कारण यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि यहां पर बावली भी है। लेकिन दिलचस्प यह है कि दिल्ली की इस भीषण गर्मी में भी इस बावली में तीन फीट पानी प्रतिदिन निकाला जाता है। बावली के संरक्षण और सफाई का काम कर रहे लोगों ने बताया कि निर्धारित स्तर से रोज तीन फीट पानी और बढ़ जाता है जिसे सफाई के कारण रोज सुबह निकाला जाता है।
स्थानीय निवासी मोहम्मद नियाज बताते हैं कि यह बावली संत निजामुद्दीन ने वुजु के लिए बनवाया था। लेकिन बाद में इस बावली के आसपास बस्तियां बन गईं और इस बावली में उनके घर का गंदा पानी आने लगा। यह बावली निजामुद्दीन के दरगाह के अहाते के उत्तरी फाटक की तरफ है। ऐसी बात प्रचलन में है कि जब इस बावली का निर्माण हो रहा था तभी गयासुद्दीन तुगलकाबाद का निर्माण कराने में व्यस्त था और उसने कारीगरों को कहीं और काम करने से मना कर दिया था परंतु वे रात में इस फकीर के लिए काम करने आते थे लेकिन जब गयासुद्दीन बलबन को पता चला तो उसने तेल बेचने को मना कर दिया जिससे रात को मजदूर काम न कर सकें। लेकिन उन्होंने तेल की जगह बावली के पानी का इस्तेमाल किया और पानी ने तेल की तरह काम किया। इसकी मान्यता के कारण यहां काफी दूर-दूर से लोग आते हैं। इतिहासकारों का मानना है कि यह बावली लोदी काल में निर्मित है। आगा खां ट्रस्ट के आर्किटेक्ट रतीश नंदा का कहना है कि स्थानीय लोगों के सहयोग से इस बावली की सफाई हो रही है। यहां रहने वाले 18 परिवार को पिछले साल दूसरी जगह बसाया गया और उन्हे निश्चित मुआवजा दिया गया। बावली के बारे में एएसआई के मुख्य पुरातत्वविद् मोहम्मद केके ने बताया कि इसकी सफाई और संरक्षण एक लम्बा काम था एएसआई की अनुमति से आगा खां ट्रस्ट इसे बखूबी कर रहा है।

Monday, May 24, 2010

मान्यता प्राप्त अपडेट भिखारी ...

राष्ट्रमंडल खेल में लठैतों, कबड्डी खेलने वाले, तीर मारने वाले, तैराकी करने वाले खिलाड़ी टाइप लोगों को दिखाने के लिए दिल्ली को दुल्हन की तरह सजाने की तैयारी सरकार कर रही है। लेकिन यह डर सबसे मन में है कि कहीं कोई आशिक बीच में अड़ंगा न लगा दे। ये डर इस कदर बरकरार है कि बड़े हाकिम अब लोगों को प्यार से समझाने लगे हैं। किसी के साथ भी अभद्रता नहीं की जाएगी। भिखारियों का हाकि मों से हमेशा गुड़-चींटी का रिश्ता रहा है। दिल्ली में कोई भी निजाम बना, भिखारी हमेशा खुश रहे। लेकिन राजधानी में जब से यह फरमान जारी हुआ कि भिखारियों को राष्ट्रमंडल खेल के तहत दिल्ली से पलायन करना पड़ेगा तो दिल्ली के भिखारियों का दिल ही बैठ गया। सबने एक सुर में निजाम को बद्दुआएं दी और कहा लोग आइपीएल में पैसा बना रहे हैं लेकिन बीपीएल के नीचे वालों को कोई नहीं पूछ रहा है। गौरतलब है कि दिल्ली के भिखारियों में एक बड़ी संख्या पोस्टग्रेजुएट भिखारियों की है जो अंग्रेजी सहित विभिन्न भाषाओं के अखबार पढ़ सकते हैं और नए नए लुभावने अंदाज में भीख मांगते हैं। ये हाजिर जवाब भी हैं। मसलन, किसी ने कहा कि हे दिल्ली के अमीर भिखारियों अब तुम्हारी छुट्टी होने वाली है। झट से एक स्मार्ट भिखारी ने कहा क्यों? क्योंकि हम भिखारी हैं। अरे महंगाई ने तो देश को भिखारी बना दिया है। किस-किस को निकालोगे? कहीं ऐसा न हो कि राष्ट्रमंडल खेल के नाम पर बाबू जी लोग देश का बंडल कर के अपना कमंडल भर ले। महोदय निरुत्तर हो गए। यह एक विकट समस्या न बन जाए इसके लिए आला अधिकारियों ने फरमान जारी किया। विदेशी मेहमान जब इतने भिखारी देखेंगे तो हमारे देश की भद्द पिट जाएगी। इन्हें रुख्सत करने का कुछ तो उपाय करना होगा
इतने भिखारी देखकर विदेशी मेहमान एक बार तो समझ ही जाएंगे कि हम सही जगह पर नहीं आए हैं। ये तो पहले कहते ही थे कि भारत जादूगरों और सपेरों का देश है। अब भिखमंगों का देश भी कहने लगेंगे। इस विचार-विमर्श के बीच कटोरा बजाता एक भिखारी आ गया बोला, चाहे लाख कोशिश कर लो हम तो नहीं हिलेंगे। उसने सबके सामने चुनौती रखी। अधिकारी पशोपेश में हैं कि क्या किया जाए। किसी ने कहा माई-बाप हमारी नौकरी का तो कुछ ख्याल करो, मान जाओ। चतुर भिखारी ने फटा पैजामा मोड़ा, कटोरा बजाया और तड़क कर बोला हम राजधानी के मान्यता प्राप्त भिखारी हैं, ऐसे नहीं जाएंगे। तभी एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इनसे कुछ ले दे कर मामला निपटा लो। ये अपनी बिरादरी के मालुम पड़ते हैं। यह सुनते ही भिखारी ने जारे-जोर से कटोरा बजाया और खुशी से दांत बाहर निकाल लिए।

Monday, May 10, 2010

खारी बावली, अब बस नाम बचा है

शाहजहां की विरासत चांदनी चौक और उसी के समीप खारी बावली। भारत के प्रसिद्ध मसालों, राशन और अन्य चीजों की मंडी। यहां की हर चीज मशहूर है और कभी यहां स्थित बावली भी इतनी ही मशहूर थी जिसका पानी खारा होता था ऐसा स्थानीय लोग कहते हैं। शायद इसीलिए इस जगह का नाम खारी बावली पड़ा। हालांकि अब बस नाम ही बचा है। यहां बावली का कोई नामोंनिशां नहीं है। इस भीड़ भरी बाजार का एक सिरा फतेहपुरी मस्जिद को छूता है। जहां से मेवों की दुकानें शुरू होती हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस सड़क से गुजरने के बाद आज भी एक ठंडक का अहसास होता है।
मेवे की दुकान किए लगभग (75) वर्षीय मूलचंद का कहना है कि कई साल पहले यहां से एक नहर गुजरती थी ऐसा लोग बताते हैं लेकिन बावली किसी ने नहीं देखी। अब बस नाम बचा है। इसी तरह देसी दवाओं के विक्रेता एखलाक का कहना है कि हो सकता है कि यहां किसी कटरे में बावली रही हो लेकिन आज तो उसका कोई अवशेष भी दिखाई नहीं देता। इतिहासकारों का मानना है कि यह बाजार 500 साल पुराना है और यहां बारहों महीने भीड़ लगी रहती थी।
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गलियों से जुड़े इस बाजार में अब भी हर कटरा या बाजार विशेष गंध से अपनी पहचान कराता है। तिलक बाजार में जहां केमिकल और इत्र की खुशबू आती है वहीं गली बाताशान में अचार मुरब्बे और मसालों की, नया बोस में साबुन, पान मसाला आदि दिखेगा तो नया बोस में प्लास्टिक और पत्तल। यहां पर्यटक और खरीदार निरंतर आते रहने से यह दिल्ली का एक भीड़ भरा इलाका है। लेकिन दिलचस्प यह है कि यहां किसी को भी बावली के बारे में जानकारी नहीं है। इंटैक की दिल्ली चैप्टर की सह संयोजक और 19वीं सदी की दिल्ली पर शोधकर्ता स्वप्ना लिडल का कहना है कि यहां की बावली 19वीं सदी के पहले थी। और इस बावली का निर्माण शाहजहांनाबाद के बनने से पहले हुआ था। फोरसी किताब ‘सैर उल मुनाजिलज् के आधार पर उन्होंने कहा कि यहां स्थित बावली का निर्माण 1551 ईस्वी में शेरशाह के बेटे इस्लाम शाह ने कराया था। संभवत: यह मुख्य सड़क के आसपास रही होगी। इसी समय हौजवाली मस्जिद भी बनी थी जो आज भी है। शेरशाह सूरी के समय भी आम नागरिक की सुविधाओं के लिए बहुत से काम हुए थे। उन्होंने बताया कि उस किताब में इसका जिक्र है लेकिन एएसआई ने इस तरह की किसी बावली को चिह्न्ति नहीं किया है। ऐसा अनुमान है कि एएसआई के नामांकन से पहले ही इस बावली का अस्तित्व खत्म हो गया हो।


Sunday, May 9, 2010

पुत्रो कुपुत्रो जायते माता कुमाता न भवती

माँ बस माँ होती है. उसके जैसा कोई नहीं. कितना दुःख सहा लेकिन कुछ नहीं कहा, यहाँ प्रस्तुत है कुछ वरिष्ठ लोगों से उनकी माँ के बारे में की गई बात. आइये जाने अपनी माँ को वो कैसे याद करते हैं.

मां के निकट रहा

राजेन्द्र यादव-
मैं अपनी मां के बेहद निकट रहा हूं। बाप से दूर रहा। पिताजी उस युग के थे जिनके घर में घुसते ही बच्चों को एकदम शांत हो जाना पड़ता था।
अब जब मैं याद करता हूं तो मां कम बाप ज्यादा याद आते हैं। मां महाराष्ट्र की थीं। उनसे हमारा दोस्ताना संबंध था। 16 साल की उम्र में ही उनकी शादी हो गई थी। आगरा आने पर उन्हें भाषा की समस्या आई। पहले उन्होंने यहां की भाषा साीखी लेकिन अंत तक वह ‘आदमी को ‘अदमी बोलती थी। एक दिलचस्प वायका याद आता है, जब भी कोई गलती करता था और बाहर आ जाता था तो मां अंदर से बुलाती थी । वह देहरी से बाहर नहीं जाती थी तो मैं कहता था कि ‘पिटने के लिए आऊंज्।

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दोस्त, गाइड, आलोचक


शोभना नारायण-
मेरी मां मेरी सबसे अच्छी दोस्त थीं आज मैं जो कुछ भी हूं वह अपनी मां कि वजह से ही हूं। वह केवल मां नहीं बल्कि मेरी गाइड, मेरी आलोचक और मुङो समझने वाली भी थी। डांस सीखने के पीछे भी मां थी। जब मैं महज ढाई साल की थी तो मां से यूं ही कह दिया था कि ‘मैं क्या करूंज्? इस पर मां ने कहा था कि ‘तुम नाचो यह उनका अनायास कहना था लेकिन मैंने जिद पकड़ ली। मां मुङो समीप के नाट्य विद्यालय में ले गई। उस शिक्षिका ने मुङो देखकर मां से बोली कि ‘ये क्या आप गोद का बच्चा लेके आई हैं? लेकिन मैंने नाचना सीखा। एक वाकया याद आता है कि जब पड़ोस में एक डांस कंपटीशन था और मैं अभी छोटी थी फिर भी मैं उसमें हिस्सा लेना चाहती थी। एक दिन पहले जब मैंने रिहर्सल देखी तो मेरे तो पसीने छूट गए। मां को बताया, मां ने मना किया लेकिन अब तुम्हारा डांस करना बंद। इससे मैं निराश हो गई। लेकिन मैंने उस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और प्रथम पुरस्कार जीता। उस दिन से आज तक मां के कारण ही नाच रही हूं।

परिवार की धुरी


उदय प्रकाश-
मैंने मां के बिना परिवार को बिखरते हुए देखा है। यह मेरे लिए आत्मपरक घटना है। मेरे पास बचपन में ही मां को खो देने का अनुभव है। इस पर मेरी एक कहानी ‘नेल कटरज् भी है। परिवार समाज की प्राथमिक इकाई होती है और मां इसमें केंन्द्रीय भूमिका में होती है। वह एक ऐसी डंठल है जिससे फूल की पंखुड़ियां जुड़ी होती हैं। मां ही होती है जो बच्चे को नौ महीने अपने गर्भ में रखती है, उसके लिए स्वप्न देखती है। उसके लिए मोजे और कनटोप बुनती है। प्रसव का परम दुखदाई क्षण सहती है। पैदा होने के बाद दो साल तक बच्चे की आंख, भंवे, चेहरे को संवारती है। मां भौतिक होती है।

हमारी हिम्मत भी मां


पं बिरजू महराज-
मां मेरे लिए सब कुछ थी। जब मेरी उम्र साढ़े नौ साल की थी तभी पिता का स्वर्गवास हो गया। उसके बाद से मेरी शिक्षा, नृत्य आदि के लिए उसने निरंतर प्रोत्साहन दिया। मेरी कला में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान है। हमारे गरीबी के दिनों में भी मां ने कभी हमारी हिम्मत नहीं टूटने दी। हमने कुछ समय कानपुर में भी बिताया। वहां 25 रुपए महीने की ट्युशन भी पढ़ाई। बहनों की शादी हो गई थी तो मां हमारे साथ ही रही। उनको गुजरे लगभग 20 साल हो गए हैं। उन्होंने हमेशा हमें ईमानदारी और सच्चाई की राह पर चलना सिखाया। उनकी अंतिम इच्छा थी कि वह गंगा किनारे अंतिम सांस लें और वह पूरी भी हुई। उन्होंने अंतिम सांस इलाहाबाद में ली।

जो सीखा मां से<
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किरण खेर-
अपनी मां से मैं काफी करीब से जुड़ी रही। पिछले साल उनका स्वर्गवास हुआ। आज तक जिन्दगी में जो कुछ भी सीखा उसमें मां का योगदान काफी महत्वपूर्ण था। वह एक प्रतिभाशाली स्टूडेंट,खिलाड़ी थी या यूं कहूं कि आल राउंडर थी। उनको चार बार युनिवर्सिटी में बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड मिला था। वह मेरी बहन के साथ चार साल बैटमिंटन खेली और जीता थी। वह एक अच्छी शिक्षिका भी थी। वह उर्दू की भी स्कालर थी। अक्सर मुङो डांटती थी लेकिन मेरे निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

जिंदगी के लिए वरदान


निदा फाजली-
मैं मां से बेहद करीब से जुड़ा था और इस संबंध में मैंने कोई 20 साल पहले लिखा था ‘मैं रोया परदेश में, भीगा मां का प्यार। दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार।ज् मां एक रचनाकार है जिसका अपना रचना संसार है। मां आगे चलकर धरती हो जाती है। वह जिंदगी के लिए वरदान है। जिन्दगी के लिए उसके अलग-अलग रूप हैं। मेरी बहुत सी रचनाओं में मां रची-बसी है।

साथ गाई हंसध्वनि


बिंदू चावला-
हमारे घराने में अमीर खां साहब ने पिता जी को शिक्षा दी थी। हम सब रामकृष्ण आश्रम जाते थे। मां शारदा को हम मां मानते हैं। वह सरस्वती का रूप हैं और उन्हें भी मां के रूप में मानते हैंे। हमारे लिए वह पूज्यनीय हैं। मेरी अपनी मां किराने घराने की थी। बचपन में गाना मां के तानपुरे से ही सीखा और काफी दिनों तक बजाया। हर कलाकार के जीवन में मां की सबसे बड़ी भूमिका होती है। जब मैं गाती थी तो पिता जी अक्सर मां को चिढ़ाते थे कि जो बेटी गा रही है वह तुमसे हो पाएगा? फिर मां और हम साथ गाते थे। जब पहली बार मैंने गाया तो मां भी मेरे साथ मंच पर गाई।
हमने राग हंसध्वनि गाया। आज भी जब मैं हंसध्वनि गाती हूं तो उसका रिस्पांस सबसे अधिक मिलता है।

बहुत मीठी यादें


कैलाश वाजपेई-
मां का मतलब केवल यही नहीं है कि उसने जन्म दिया है। वाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि। यह संदेश है कि पहले मां फिर मातृभूमि। समय बदलने के साथ चीजें बदली। सभ्यता विकसित होती गई और संस्कृति सिकुड़ती गई। अब सांस्कृतिक शालीनता की बातें बेकार हो गई हैं। भूमंडलीकरण के दौर में मूल्य गड्मगड्ड हो गए हैं। तीर्थस्थान पर्यटनस्थल में बदल गए हैं। पारिवारिक संबंध निस्पंद हो गए हैं।
लेकिन मेरी मां की यादें बहुत मीठी हैं। कई वर्षो बाद जब मैं दिल्ली लौटा तो लखनऊ से मेरी मां मेरे भाई, पिता आदि से झगड़ कर अपने बचाए हुए पैसे और कुछ साड़ियां लेकर दिल्ली आई। वह उन लोगों से कहती थी कि मुङो ‘मान्याज् के पास जाना है लेकिन एक दिन वह बिना किसी को बताए दिल्ली आ गई। जब मैंने उन्हे अपने यहां देखा को मैं दहाड़ मारकर रोने लगा। मुङो दुख है कि जब मेरी मां का स्वर्गवास हुआ तो वह मैं रूस के जंगलों में कहीं किसानों के पास रहा हूंगा क्योंकि उसके स्वर्गवास की खबर मुङो नहीं मिली। मेरी छोटी बहन बताती है कि वह मुङो अंतिम समय में बहुत याद करती थी। मुङो लगता है कि मेरे लिए यदि सबसे अधिक कोई रोया होगा तो वो मां थी।

सुरीली, सरल और दयालु<
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साजन मिश्र-
हम इस मामले में बहुत सौभाग्यशाली हैं कि मां ने हमें अगाध प्रेम दिया। वह हम दोनों भाइयों को साथ ही सुलाती थी। मेरे घर के पास कबीर जी का मंदिर था। वहां पर सुबह पांच बजे घंटी बजते ही मां जगा देती थी। उन्होने संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली थी लेकिन सुन कर वह गाती थी । वह हमें राग अहीर भैरव, ललित आदि की बंदिशे सुनाती थी। वह दयालु और सहज भी थी। मां हमें खूब रियाज करवाती थी। वह ढोलक भी बजाती थी। सुरीली भी थी। हम लोग पिताजी से डरते थे। मां हमें गलतियों पर डांटती थी लेकिन कभी मारा नहीं । हम इस बारे में सौभाग्यशाली हैं कि मेरी चाची ने भी हमें मां के समतुल्य प्रेम दिया। मां और चाची देवरानी-जेठानी थी लेकिन हमेशा बहन जसी रही। इसका ही प्रभाव है कि हम दोनों भाइयों की पत्नियां बिल्कुल बहन जसी रहती हैं।


Wednesday, April 28, 2010

जरूरत है, अच्छी फिल्में

दिल्ली में असम का मशहूर कोहिनूर मोबाइल थिएटर अपनी प्रस्तुति देने आया है। फिल्म, थिएटर से जुड़े
और दूरदर्शन पर आने वाला लोकप्रिय धारावाहिक जासूस विजय में मुख्य किरदार में दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाने वाले आदिल हुसैन से फिल्म, नाटक और उत्तर-पूर्व में सिनेमा के हालात पर उनके की गई लंबी बातचीत के कुछ अंश-


प्रश्न- कमर्शियल फिल्में दर्शकों तक तेजी से पहुंच जा रही हैं लेकि न कला फिल्में नहीं पहुंच पा रही हैं, इसकी क्या वजह मानते हैं?
उत्तर-
दर्शकों को एजुकेट करना या उन तक एक सकारात्मक संदेश पहुंचाने का काम थिएटर कर रहा है। लेकिन फिल्मों का अंदरूनी बड़ा दोष यह है कि इसके लिए अधिक पैसे की जरुरत होती है। अब जो पैसा लगाएगा जो वह पैसा वापस भी चाहता है लेकिन पैसा लगाकर वापस पाने की चाह रखने वाले कम हैं। इसलिए भारतीय दर्शक मसाला टाइप फिल्म ही देखते हैं आएं हैं। उसे ही वे थोड़ा-बहुत अच्छा समझते हैं। लेकिन जब उन्हे अच्छी फिल्में दिखाई ही न जाएं तो उन्हे पता ही नहीं चलेगा कि अच्छी फि ल्में क्या हैं। लेकिन यह प्रोड्यूसर की जिम्मेदारी है कि वह इस कमर्शियलिज्म से हट कर फायदा देखते हुए कुछ बनाने की संभावना है तो उन्हे क रना चाहिए।
प्रश्न- एक बांग्ला फिल्म में सोहा अली के साथ काम किया और इश्कि या में विद्या बालन के साथ दोनों थिएटर से नहीं जुड़ी हैं कैसा अनुभव रहा?
उत्तर- सोहा की वो पहली फिल्म थी। वे काफी एलर्ट थी। डायरेक्टर के साथ उसका अच्छा संबंध था। मेरे साथ भी अच्छे संबंध थे। मैं जब आज भी फिल्म देखता हूं तो लगता है कि सोहा ने अच्छा काम किया है। विद्या बालन एक स्टार है। मुङो एक बार लगा कि मेरा कोई उतना बड़ा नाम नहीं है। मेरे साथ ये कैसा बर्ताव करेंगी लेकिन उन्होने बड़े सम्मान के साथ काम किया।
प्रश्न- इश्किया में नसीरुद्दीन शाह के साथ काम करना कैसा रहा?
उत्तर-
नसीरुद्दीन शाह एनएसडी में मेरे गुरु रहे हैं। 17 साल पहले उन्होने मुङो पढ़ाया था। उनके साथ काम करना बहुत अच्छा लगा। वह बड़े और गुणी कलाकार हैं। मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान है।
प्रश्न- आप की फिल्म फार रियल आ रही है? इसके बारे में कुछ बताइए? किस तरह की फिल्म है यह?
उत्तर-
यह एक पांच साल के बच्चे की नजर से अपने मां-बाप को देखने की कोशिश है। एक अंदरूनी तनाव या पारिवारिक तनाव का बच्चे पर क्या असर होता है बच्चों की मानसिकता और उनके आवेग पर उसका क्या असर होता है। उनके मां-बाप उनके आदर्श होते हैं और उनके तनाव का बच्चे पर क्या असर होता है इस पर आधारित है वह फिल्म। इसे सोहा जन ने बड़ी संवेदनशीलता के साथ बनाया है। जोया हसन को सिंगापुर में बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला है काफी अच्छी कलाकार है वे।
प्रश्न-आपकी आगामी फिल्म कौन सी है?
उत्तर-
एक फिल्म आने वाली है गंगो। महाश्वेता देवी की कहानी पर आधारित है। इसमें एक फोटोग्राफर की भूमिका है मेरी, लीड रोल मे हूं। यह शायद जून-जुलाई में आ जाए।
प्रश्न- आप मूलत: असम से हैं क्या कारण है कि नार्थ ईस्ट के लोग पूरे भारत से पूरी तरह से जुड़ा हुआ नहीं मानते?
उत्तर-
मैं ऐसा नहीं मानता। इस पर मैं टिप्पणी नहीं कर पाऊंगा कि नगा और मणिपुर के लोगों को क्या लग रहा है। नागालैंड के लोग भी मुझसे ऐसा नहीं कहते लेकिन प्रशासन या मीडिया के लोग भी बहुत कम नार्थ इस्ट के लोगों पर ध्यान देते हैं। अगर बम विस्फोट में तीन लोग दिल्ली या गुजरात में मरते हैं तो बड़ी खबर बनती है लेकिन असम में ऐसा हुआ तो कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती और ऐसा मैं बचपन से देख रहा हूं।
दक्षिण भारत के साथ भी ऐसा ही है। कुछ लोगों के साथ ऐसे बर्ताव पर प्रभाव पड़ता है और इससे गलत मनोभाव पैदा होता है। इससे लोग आसानी से बंदूक उठा लेते हैं। अवसरवादी संगठन भी आम लोगों को इस्तेमाल करते हैं इसका असर असम, नगालैंड आदि में हुआ है। विदेशों में ऐसा नहीं है वहां लोग भी जागरूक हैं। विदेश में मुद्दों पर राजनीति और चुनाव होते हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि हम अपने वोट को लेकर जागरूक नहीं हैं।
प्रश्न- असमियां फिल्में अपनी पहचान खोती जा रही हैं क्या वजह है?
उत्तर-
फिल्म निर्माण के लिए पैसे की जरूरत है। पहले लोगों ने फिल्में बनाई लेकिन अब कोई पैसा नहीं लगा रहा है। एक समय असम में 120 हाल थे। अब काफी लोगों ने हाल को गोदाम बना दिया। डीवीडी और सीडी ने भी असर डाला है। लेकिन जो सचमुच सिनेमा से प्यार करते हैं काम कर रहे हैं लेकिन जो बिजनेस करना चाहते हैं वे नहीं बना रहे हैं।
कला को अगर केवल व्यापार मानते हैं तो उसका उद्देश्य अलग हो जाता है । दोनों साथ-साथ रह सकते हैं लेकिन अगर व्यापार कला को प्रभावित करता है तो वह कला नहीं एक प्रोडक्ट हो जाता है। जो आप बालीवुड में देखते हैं। यह आज की बात नहीं है बहुत पहले से हो रहा है।
प्रश्न- डायरेक्शन में आना है कि केवल एक्टिंग करेंगे?
उत्तर-
नाटक में कोई ऐसी कहानी या मुद्दा जो एकदम से छू जाए और मेरे दिल में एक ऐसी खलबली कर पैदा कर दे तो शायद ऐसा करूं। लेकिन कभी -कभी जब फिल्में देखता हूं तो लगता है कि अरे ये क्या हो रहा है।
प्रश्न- मोबाइल थिएटर से जुड़ने का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर-
एक्टर के हैसियत से जो काम आप बार-बार कर रहे हैं तो एक ताजगी महसूस करनी चाहिए। इस तरह से जब आप काम करते हैं तो ऐसा लगेगा कि ये चीज मैं दुहरा नहीं रहा हूं। थिएटर में आप लम्बे समय के रिहर्सल के बाद 200-250 शो करते हैं तो उसमें काम को नए तरह से करने की गुंजाइश रहती है।

Wednesday, April 21, 2010

रिश्ते सुधरते हैं तो खूब हों शादियां : डॉ. फातिमा हसन

पाकिस्तान की जानी-मानी शायरा डॉ. फातिमा हसन पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय मुशायरा ‘जश्ने-बहार में शिरकत करने दिल्ली आई हुई थी। इस मौके पर उनसे शायरी और दोनों मुल्कों के रिश्तों पर किये गए कुछ सवाल-जवाब
सवाल : पाकिस्तान एक अरसे लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठीक करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अब तक उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली है?
जवाब : लोकतांत्रित व्यवस्था सुचारु तरीके से काम करे यह प्रत्येक पाकिस्तानी चाहता है। लेकिन एक तबका है जो राज कर रहा है। ये वो लोग हैं जो संभ्रांत परिवारों से आते हैं। जब तक इनसे निजात नहीं मिलेगी तब तक लोकतंत्र सही मायने में नहीं आएगा। व्यवस्था बदलने में हो सकता है एक या दो पीढ़ी बीत जाए। व्यवस्था बदलने के लिए मध्यम वर्ग और निचले तबके के लोगों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
सवाल : वहां के नागरिक क्या चाहते हैं?
जवाब : पाकिस्तानी नागरिक अपने मत को लेकर जागरूक नहीं है। वह अपने जागीरदार को वोट देकर चला आता है। उसे अपने वोट का मूल्य नहीं पता।
सवाल : हिन्दुस्तान में किन शायरों को पढ़ती हैं?
जवाब : मैं यहां के तकरीबन सभी नामचीन शायरों को पढ़ती हूं। शहरयार, जावेद अख्तर, शायरा शहनाज नबी मुङो बहुत भाते हैं। जाहिदा जदी, दाराबानो वफा का इंतकाल हो गया। इनकी शायरी भी बहुत अच्छी है।
सवाल : पाकिस्तान में शायरी के क्या हालात हैं? वहां संजीदा शायरी को तरन्नुम में पढ़े जाने पर लोगों की कैसी प्रतिक्रिया है?
जवाब : भारत की कोई शायरा पाकिस्तान में जब तरन्नुम में शायरी सुनाती थी तो एक लहर पाकिस्तान में भी आई थी, लेकिन पाकिस्तानी बड़े शायरों ने उनकी कोई हौसलाअफजाई नहीं की। मैंने भी उन मुशायरों में जाने से इनकार कर दिया। अब वहां दो तरह की शायरी है। एक वह जो छप रही है, दूसरी जो मुशायरों में तरन्नुम में सुनाई जा रही है। वैसे, पाकिस्तान में जो लोग तरन्नुम में पढ़ते हैं, उन्हें अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता। लेकिन भारत से कुछ दिनों पहले शहनाज नबी और तरन्नुम रियाज पाकिस्तान आईं तो उन्हें काफी सराहना मिली।
सवाल : भारत आना कितना आसान रहा?


जवाब : अभी पिछले छह महीने में दो बार आई हूं। अब आना आसान है। जश्न-ए-बहार में पहली दफा आई हूं।
सवाल : आपको क्या लगता है, एक-दूसरे देशों के बीच आवाजाही कितनी होनी चाहिए?
जवाब : खूब होनी चाहिए। खासकर युवाओं की। जो बुजुर्ग यहां से पाकिस्तान गए। वे बच्चों को बताते हैं कि मेरा भाई या मामू हिंदुस्तान में है। लेकिन हमारे बाद वाले बच्चों को कोई बताने वाला नहीं है। युवा यहां आएंगे तो पाएंगे कि दोनों मुल्कों में सदियों के रिश्ते हैं। तहजीब, रस्म और रिवाज एक जसे हैं, जुबान एक है, संबंधों और समस्याओं पर फिक्र एक जसी है। इसका बढ़ावा देशों के युवाओं के बीच मेल-जोल होने से और बढ़ेगा।
सवाल : अभी हाल ही में शोएब मलिक और सानिया की शादी हुई है। पाकिस्तान में इस शादी को लेकर कैसी चर्चा है?
जवाब : पाकिस्तान में लोग बहुत खुश हैं। लोग नाच रहे हैं, मिठाइयां बांट रहे हैं। टीवी चैनलों ने इस बारे में इतना दिखाया कि लोगों को शिकायत हो गई कि क्या देश में और कोई समस्या नहीं है। लेकिन एक बात है कि अगर ऐसी शादियों से रिश्ते सुधरते हैं, तो शादियां खूब होनी चाहिए।

कभी ये तैराकों कि बावली थी .....



नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली के लोग जहां कभी तैराकी सीखने के लिए आते थे। और जो कभी तपती गर्मी से झुलस रहे राहगीरों के लिए कुछ पल आराम का स्थल हुआ करती थी वह अग्रसेन की बावली आज उपेक्षा का दंश ङोल रही है। 14 वीं शताब्दी में बनी यह बावली अब सूख चुकी है। दिलचस्प यह है कि दिल्ली के हृदय कनॉट प्लेस के समीप हेली रोड के हेली लेन स्थित यह बावली चारो तरफ से मकानों से घिरी है जिससे किसी बाहरी व्यक्ति को पता भी नहीं चलता कि यहां कोई बावली है। बावली की दीवारों से सटे मकान उस कानून की धज्जियां उड़ाते हैं जिसमें यह कहा गया है कि किसी ऐतिहासिक इमारत के दो सौ मीटर के दायरे में निर्माण कराना कानूनी अपराध है।
60 मीटर लम्बी, 15 मीटर चौड़ी और 103 सीढ़ियों वाली यह बावली तैराकी के लिए विशेष
के लिए विशेष रूप से जानी जाती थी। यहां पर विशेष रूप से उस्ताद होते थे जो लोगों को तैरना सिखाते थे। कभी यह गद्दी फैज खानदान के पास हुआ करती थी। जिसने कई तैराकी के कई शागिर्द तैयार किए। इस खानदान के अखलाक अहमद फै ज का कहना है कि इस बावली की आखिरी गद्दी उन्ही के पास थी। यह गद्दी कई पीढ़ियों से उनके खानदान के पास थी लेकिन अब जब बावली सूखी है तो वहां कोई नहीं आता।
बावली की हालत भी बदहाल है। वहां इसके संरक्षण में रखे गए युवक ने बताया कि इसके ऊपर बने मस्जिद का एक सिरा सन 78 मे बिजली गिरने से टूट गया था। इसके कुछ छज्जे भी गिर चुके हैं। यह बावली स्थानीय लोगों की घोर उपेक्षा की शिकार है। यहां पर फेंके गए कूड़े प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं। बावली के पीछे का लगभग 57 मीटर बड़ा कू आं भी सूख चुका है। लाल बलुए पत्थर से बनी बावली की वास्तु संबंधी विशेषताएं तुगलक और लोदी काल की तरफ संकेत कर रहे हैं लेकिन परंपरा के अनुसार इसे अग्रवाल समाज के पूर्वज अग्रसेन ने बनवाया था। इसलिए इसे अग्रसेन की बावली कहते हैं।
इसक संरक्षण के संबंध में भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) के वरिष्ठ पुरातत्वविद ने बताया कि इसकी स्थिति पहले और भी खराब थी लेकिन एएसआई इसके संरक्षण का कार्य कर रहा है। जल्द ही इसके संरक्षण का कार्य पूरा कर लिया लाएगा।

Wednesday, April 14, 2010

पथिक को तरसती राजों कि बावली

दोस्तों, सूरज आग उगल रहा है, और हम बूँद-बूँद को तरस रहे हैं. लेकिन पहले ऐसा नहीं था. शायद आज हमारी प्यास कुछ ज्यादा बढ़ गई है. अगर आज हम दिल्ली कि बात करें तो कभी यमुना में इतना पानी हुआ करता था कि जिसे लोग केवल पीते नहीं थे बल्कि दिल कि प्यास बुझाते थे. नहाकर, तैर कर,दुबकी लगाकर. लेकिन आज कि यमुना देखकर शायद कृष्ण भी बंशी बजने में संकोच करें. दोस्तों दिल्ली में मुग़ल काल में पानी को लोंगों कि जरुरत मानकर बादशाहों और राजाओं ने बावलियों का निर्माण करवाया था, कुछ बावलियां आज भी मौजूद हैं. हमारी कोशिश है कि दिल्ली कि कुछ बावलियों कि स्थिति से हम आपको रू-ब-रू कराएँगे. उम्मीद है आपके सुझाव हमें प्रेरणा देंगे.



गुजरे जमाने की बात है जब बावलियां जीवन के लिए उतनी ही जरुरी थी जितना घर। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। दिल्ली में मुगल काल में बनी कुछ बावलियां अभी अस्तित्व में हैं। लेकिन इन्हे देख कर यह कहना मुश्किल है कि कभी यह लोगों के लिए जल के बड़े स्रोत के रूप में जानी जाती थी। दिलचस्प यह है कि आज भी भारतीय पुरातत्व विभाग के पास दिल्ली की बावलियों की स्पष्ट जानकारी नहीं है। दिल्ली की बहुत सी बावलियां अब अपना अस्तित्व खो चुकी हैं जो बची हैं वह कूड़े के ढेर में तब्दील हो चुकी हैं और जिन बावलियों में अभी पानी दिखता है वह इतना बदबूदार है कि पर्यटक क्या आम आदमी भी इनके पास फटकना पसंद नहीं करता।
दक्षिण दिल्ली में मेहरौली के पास मेहरौली आर्कियोजिकल पार्क में अधम खां गुम्बद से थोड़ी दूर चार स्तरों वाली राजों की बावली है जिसे राजों की बैन भी कहते हैं। इसके बारे में कहा जाता है संभवत: यह नाम कारीगरों द्वारा इस्तेमाल किये जाने के कारण मिला है। इसकी ऊपरी दीवार के भीतर की सीढ़ियां उसे एक मस्जिद से जोड़ती हैं जिसकी छतरी में 912 हिजरी लिखा है। एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि यह सिकंदर लोदी के शासनकाल (1498-1517) में बनवाया गया था। लेकिन स्थानीय लोगों की और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्थाओं द्वारा उपेक्षित यह बावली आज बस असामाजिक तत्वों का अड्डा बनी है। यहां खुलेआम शराब की बोतलें और अन्य चीजें बिखरी पड़ीं हैं। कूड़े करकट का ढेर भी यहां देखा जा सकता है।
इस ऐतिहासिक बावली की ऐसी उपेक्षा पर भारतीय पुरातत्व विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा पूछे जाने पर उनका कहना है कि मई तक इसके सौंदर्यीकरण का कार्य शुरु कर दिया जाएगा। जहां तक गंदगी की बात है, इसके लिए स्थानीय लोंगो से भी सहयोग की अपेक्षा की जाती है यदि वह जागरुक रहेंगे तो कोई असामाजिक तत्व वहां नहीं आएगा।

Monday, March 29, 2010

लोहिया, एक बहु आयामी व्यक्तित्व

कुर्बान अली


भारत में समाजवादी आंदोलन के संस्थापकों में से एक और राष्ट्रीय आंदोलन के एक प्रमुख हीरो डा. राम मनोहर लोहिया का यह जन्मशताब्दी वर्ष है। डा. लोहिया ने इस देश को आजाद कराने के अलावा स्वतंत्रता के बाद हुई राजनीति में एक अहम रोल अदा किया और देश की राजनीति को कुछ नए मंत्र दिए। डा. लोहिया ने एक बार कहा था कि इस देश के आम आदमी को देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है, सिवाय इसके कि वो यह समझता है कि मैं उसकी बात कहता हूं।
डा. लोहिया का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वह गांधीवादी समाजवादी, जन्म से विद्रोही और राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ लेखक, पत्रकार, सांसद, कानून विद् और भारतीय संस्कृति के बड़े जानकार थे। वह 57 वर्ष की कम उम्र में इतना सब कुछ कर गए जो आम हालात में संभव नहीं होता है। डा. लोहिया के जीवन काल को दो भागों में देखा जाना चाहिए। वह 23 मार्च 1910 को पैदा हुए थे और 1932 तक उन्होने अपनी शिक्षा पूरी की। इस दौरान भी वह कांग्रेस पार्टी और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े रहे। 1933 में जर्मनी से वापस आकर वह पूरी तरह राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े और कांग्रेस पार्टी के सक्रिय सदस्य बने। 1934 में जब कांग्रेस पार्टी के अंदर ही कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया गया तो वह उसके संस्थापक सदस्य थे। 1936 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष पं जवाहर लाल नेहरू ने उन्हे कांग्रेस के विदेश विभाग का सचिव बनाया और डा. लोहिया ने पहली बार कांग्रेस की विदेश नीति का दस्तावेज तैयार किया। 1939 में डा. लोहिया पहली बार कलकत्ता में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार किए गए और फिर 1946 तक तो यह सिलसिला अनवरत चलता रहा। 1942 के अगस्त क्रांति आंदोलन में उन्होने भूमिगत रहकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन 1944 में गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हे लाहौर के किले में भीषण यातनाएं दी गई। उसी समय महात्मा गांधी ने अपनी पत्रिका हरिजन में एक लेख लिखा ‘ जब तक राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश जेल में बंद हैं वह खामोश नहीं बैठ सकते। क्योंकि इनसे बहादुर व्यक्ति को वह नहीं जानते।

देश आजाद हो जाने के बाद डा. लोहिया इस राय के थे कि कांग्रेस पार्टी में रहकर देश के नवनिर्माण का काम किया जाए लेकिन जब कांग्रेस पार्टी ने अपने विधान में यह संशोधन कर दिया कि अलग सदस्यता वाला संगठन पार्टी के अंदर नहीं रह सकता तो फिर वह आचार्य नरेन्द्र देव और जय प्रकाश नारायण के साथ कांग्रेस पार्टी से अलग हो गए और सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया। पहले आम चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी को अपेक्षित सफलता नहंीं मिल पाई। इसलिए समाजवादियों ने 1954 में जेबी कृपलानी की कृषक मजदूर प्रजा पार्टी के साथ विलय कर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया। डा. लोहिया इस नई बनी पार्टी के महासचिव चुने गए और उन्होने ही पार्टी का नीति वक्तव्य तैयार किया और संघर्ष का एक जोरदार कार्यक्रम शुरू किया। उत्तर प्रदेश में सिंचाई की दरों में बढोतरी के खिलाफ (जिसे नहर रेट आंदोलन के रूप में भी जाना जाता है।) डा. लोहिया ने गिरफ्तारी दी और कई माह तक जेल में बंद रहे। इसी दौरान केरल की प्रजा समाजवादी सरकार ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलवा दी जिसमें कई प्रदर्शनकारी मारे गए। डा. लोहिया ने इस अनैतिक काम के लिए अपनी सरकार को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया और जब मुख्यमंत्री पट्टम थानू पिल्लई ने ऐसा करने से इंकार किया तो उन्होने खुद पार्टी महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया। यही घटना एक वर्ष बाद पार्टी में विभाजन का कारण बनी और डा. लोहिया प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से निष्कासित कर दिए गए। इस निष्कासन के बाद उन्होने 1 जनवरी 1956 को अपनी सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया और देश में एक धारदार विपक्षी पार्टी का रोल निभाते हुए एक साथ कई आंदोलन शुरु किए।
डा. लोहिया ने समता मूलक समाज बनाने के अलावा जाति तोड़ो, हिमालय बचाओ, दाम बांधो, भारत पाक महासंघ बनाओ, पिछड़ों को विशेष अवसर दो और नर-नारी समानता के लिए कई ऐतिहासिक आंदोलन चलाए। अपने कार्यकर्ताओं से उनका कहना था कि वोट, जेल और फावड़ा इसके साथ समाज बदलने के लिए उन्हे तैयार रहना चाहिए। देश में रचनात्मक कार्यो के लिए उनका मंत्र था ‘एक घंटा देश को। वह चौखम्भा राज और विकेन्द्रीय करण के बड़े हिमायती थे। और चाहते थे कि गांव, जिला, राज्य और केन्द्र के बीच एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसका सबसे ज्यादा लाभ गांवों को पहुंचे।

डा. लोहिया ने स्वतंत्र भारत की राजनीति में कई प्रयोग किए। 1952,57 और 1962 के तीन आम चुनाव लगातार जीतने के बाद जब देश में यह धारणा बनी कि कांग्रेस पार्टी को सत्ता से नहीं हटाया जा सकता तो 1963 में उन्होने गैर कांग्रेस वाद की राजनीति की शुरूवात की और सभी प्रमुख विपक्षी दलों के बीच वोटों के विभाजन को रोक कर 1967 में गैर कांग्रेस वाद का एक सफल प्रयोग किया। उनकी इसी रणनीति के तहत 9 राज्यों में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी.


लेखक- बीबीसी के पूर्व संवाददाता और वर्तमान में इंडिया न्यूज में कार्यरत हैं.

Saturday, March 13, 2010

भारतीय संस्कृति की खुशबु को बिखेरने की चाहत


?कभी-कभी जब हम कुछ मन से कर रहे होते हैं और अचानक फोन आ जाए तो वह क्षण हमारे लिए बहुत सुखद नहीं होता। कुछ ऐसा ही हुआ जब मेरे मोबाइल की घंटी बजी और मैं एक महत्वपूर्ण खबर लिख रहा था। लेकिन नंबर अनजान था। उठाया तो पता चला कि फोन कीव से है। एक बारगी तो आश्चर्य भी हुआ कि मुङो कीव में कौन जानता है। लेकिन जानने वाले ने ऐसा परिचय बनाया कि एक औपचारिक परिचय अनौपचारिक परिचय में बदल गया। अब मेरे मित्र संजय राजहंस ने मुङो भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद में गान्ना स्मिर्नोआ के भरत नाट्यम की प्रस्तुति की सूचना दी। मुङो यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मैं उत्तर भारतीय नृत्यों और कलाकारों की अपेक्षा भरतनाट्य या उनके कलाकारों को कम जानता हूं और गान्ना तो मेरे लिए बिल्किुल ही नया नाम था। लेकिन मुङो 5 मार्च का इंतजार था क्योंकि उसी दिन यह प्रस्तुति होने वाली थी। मैं अपनी व्यस्तता के बावजूद कार्यक्रम में पहुंचा। अन्य अखबारों में मैंने पहले ही उनकी प्रस्तुति की सूचना पढ़ ली थी।
आईसीसीआर में जब मेरी उनसे बात हुई तो उनकी बात में दृढ़ता थी उन्होने कहा कि मेरी तमन्ना है कि मैं भारतीय संस्कृति की खुशबू को यूक्रेन सहित विश्व के अनेक देशों में फैलाऊं। यूक्रे न के लोग भारत को यहां की फिल्म इंडस्ट्री बॉलीवुड के कारण जानते हैं। मेरी कोशिश है कि भरतनाट्यम को मैं वहां प्रचारित-प्रसारित करूं। उन्हें भारतीय संस्कृति से खासा लगाव है।
निश्चित रूप से यह धारणा किसी भारतीय की लगती है। मुङो यह जानकर खुशी हुई। भरतनाट्यम की नृत्यांगना गान्ना स्मिर्नोआ यूक्रेन के कीव में श्रेवचनको विवि में अध्यापिका भी हैं।


उन्होंने लगभग एक घंटे की प्रस्तुति में उन्होंने दर्शकों को मंत्र-मुग्ध कर दिया। और मैं तो सहसा विश्वास नहीं कर पा रहा था कि गान्ना को संस्कृति के मंत्रों, ताल, गति, हाव-भाव की अच्छी जानकारी है। उन्होंने भारत में विधिवत शिक्षा ली हैं और भरतनाट्यम के प्रति उनकी प्रतिबद्धता नृत्य में भरपूर दिख रही थी।
सर्वप्रथम उन्होंने राग केदारम में आदि ताल में पुष्पांजलि प्रस्तुति की। इसके बाद देवी तोड़ी मंगलम की प्रस्तुति हुई, जो राग मल्लिका और ताल मल्लिका में थी। इसके बाद वरणम की प्रस्तुति ने तो लोगों को बांध दिया। इसमें विशेष रूप से नृत्य और अभिनय का मिश्रण होता है, लेकिन अभिनय की प्रधानता होती है। इसे राग नट कुरंजी और ताल आदि में प्रस्तुत किया गया। मूलत: इसमें भक्ति श्रृंगार होता है। कार्यक्रम का समापन उन्होंने कृष्णलीला का प्रदर्शन किया। एक बातचीत में उन्होने बताया कि वह कीव में ‘नक्षत्रज् नामक एक नृत्य सिखाने का स्कूल भी चलाती हैं और विश्वविद्यालय में इंडियन ओरियंटल डांस पढ़ाती हैं। इसके अलावा वो भारतीय शास्त्रीय नृत्य में शोधरत भी हैं। वह भारतीय नृत्यशास्त्र पर एक पुस्तक भी लिख रही हैं जिसका प्रकाशन जल्द ही होने वाला है।


कार्यक्रम में इनकी प्रस्तुति में वीणा पर श्यामलतानकर ने, नटुवंगम पर इनकी गुरु जयलक्ष्मी ईश्वर ने, मृंदग पर आर केशव तथा स्वर सुधारघुरमन ने दिया था। दिलचस्प यह है कि गान्ना भारतीय मूल के कीव में प्रोफेसर संजय राजहंस की पत्नी हैं, जिन्होंने भारत में शास्त्रीय नृत्य की विधिवत शिक्षा ली है। संजय अब हमारे मित्र हैं और कीव में अंतर्राष्ट्रीय संबंध के प्रोफेसर हैं। उनके मन में यह भारतीय मानस का संकोच भी था शायद बातचीत में उन्होने कभी व्यक्त नहीं होने दिया कि गान्ना उनकी पत्नी हैं यह बात मुङो काफी बाद में पता चली। संजय कीव में होने पर भी उतने ही भारतीय है जितना एक दिल्ली में रहने वाला। संजय जी गान्ना की प्रस्तुति के लिए आप भी बधाई के पात्र हैं। साथ ही वह प्रवासी भारतीय भी जो भारतीय संस्कृति को विदेश में रहने के बावजूद भी न केवल महसूस करते हैं बल्कि उसके प्रचार-प्रसार के लिए प्रयासरत हैं।

Tuesday, March 2, 2010

खेलत फाग बढ़त अनुराग


कथक और होली का गहरा संबंध है। होरी पर ज्ञात-अज्ञात कवियों के अति सुंदर पद हैं। कथक में उन पर भावाभिनय का चलन पुराना है। ब्रज और कृष्ण भी होली से और कथक से इस तरह घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। होली पर बहुत लिखा गया है। वैसे भी होली प्रेम का त्योहार है। त्योहार तो सभी प्रेम का संदेश देते हैं पर होली पर प्रेम ज्यादा उमड़ता है। होली और कथक पर प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना उमा शर्मा से जब मैने इस संबंध में बातचीत की तो कई बातें आई जिससे यह पता चला कि आज का युवा बहुत सी चीजों से अनभिज्ञ है। यह पोस्ट पहले भी डाली जा सकती थी लेकिन मुङो ऐसा लगता है कि इसकी प्रासंगिकता हमेशा बरकरार रहेगी।

कथक और होली का गहरा संबंध है। कथक में होरी, ठुमरी का भाव होता है। ठुमरी गायिकी में बहुत चलती है। होरी में बहुत ठुमरियां हैं। कथक में होली की गजल भी बन सकती है,क्योंकि कथक में हिन्दू-मुस्लिम दोनों की प्रथा है। कथक में ध्रुपद गायिकी के साथ भी नृत्य होता है। ध्रुपद धमार होरी पर चलता है। होरी के ऐसे पद हैं जो कथक से मिलाए जा सकते हैं जसे, ‘मैं तो खेलूंगी उनही से होरी गुइयां, लेइके अबीर गुलाल कुमकुम वो तो रंग से भरी पिचकारी गुंइयां।ज् रसखान ने लिखा है कि ‘खेलत फाग बढत अनुराग, सुहाग सनी सुख की रमकै। कर कुमकुम लैकर कंजमुखी, प्रिय के दृग लावन को झमकै।ज् ऐसे बहुत सुंदर पद कवियों ने लिखे हैं जो हमलोग करते हैं। कथक का यह चलन है जो काफी पुराना है। हालांकि अब ये चीजें बाहर जा रही हैं। कथक में गाकर भाव बताना एक कला है। मैंने अपने गुरु शंभू महाराजजी से यह कला सीखी है इसलिए अभी तक मैं इसे चला रही हूं। कविताओं में होरी का सारा माहौल उभरकर आता है। ये कथक में होता आ रहा है।
कथक में होरी कई तरह से प्रस्तुत होती है। एक तो गाकर भाव बताया जाता है। एक समूह में होली होती है। कविता पर भी होली खेली जाती है। वृंदावन की रासलीला में राधा कृष्ण गोपियां सभी फूल की भी होली खेलती हैं। गुलाल से भी होली होती है। पिचकारी से रंग डालना ये सब कथक नृत्य में भाव भंगिमा से दर्शाया जाता है। यह समूह और एकल दोनों माध्यम से होता है। मैं तो भाव बताकर होली प्रस्तुत करती हूं और यह एक परंपरागत तरीका है। मैं कविताओं को लेकर प्रस्तुति करती हूं।
अज्ञात कवियों ने बहुत से पद लिखे हैं। रसखान, विद्यापति, नजीर अकबराबादी, खुसरो आदि ने होरी के बहुत सुंदर पद लिखे हैं। एक अज्ञात कवि ने लिखा है ‘बा संग फाग खेले ब्रज माहीज्, यह एक विहरिणी नायिका है। इसके अलावा एक कवि ने यह भाव लिखा है कि पीछे आई गोपी और उसने एकदम पीछे से कृष्ण को अचानक अबीर लगाया। ऐसी बहुत सी लोकप्रिय रचनाएं हैं। अज्ञात कवि ने इतने सुंदर ढंग से श्रृंगार का वर्णन किया है होरी के माध्यम से, इसी तरह एक कविता में राधा की ईष्र्या है, इस तरह पदों में विविधता है। होरी और कथक दोनों उत्तर भारतीय हैं। वृंदावन से होरी का गहरा संबंध है। कृष्ण तो होली खेलने में प्रसिद्ध है। सबसे अधिक कृष्ण की होली, वृंदावन से कृष्ण का नटवरी नृत्य कृष्ण की छेड़छाड़ को कथक में अधिकांश रूप से लिया जाता है। उत्तर भारतीय कवियों ने होली पर बहुत लिखा है और कथक में इसका प्रयोग हो रहा है। यदि साहित्य को टटोला जाए तो ऐसे बहुत से पद हैं।
नृत्य से अलग भी होली का अपना महत्व है। एक दूसरे से मिलें तिलक लगाएं। पहले टेसू के फूल से रंग निकाल कर चंदन और केसर का तिलक लगाया जाता था। गुलाल भी बहुत अच्छा होता था। उसमें कुछ मिला नहीं होता था। सब एक-दूसरे के ऊपर रंग लगाते थे। लेकिन बीच में रसायनयुक्त रंगों के प्रयोग होने से रंगों से लोग बचने लगे। गाना बजाना, होरी ठुमरी, भाव के साथ होली मनाने का अपना आनंद है। मैं अपने संस्थान में इसी परंपरा के साथ हर साल इसका जश्न करती हूं।
होली का अपना महत्व है, यह प्रेम भाव बताता है। हमारे सभी त्योहार प्रेमभाव बताते हैं। प्रेम के भाव के साथ यदि आप किसी के साथ होली खेलते हैं तो उससे एक प्रेम उमड़ता है और वास्तव में यह प्रेम की होली है। एक-दूसरे के साथ हंसी-ठिठोली, गाना-बजाना यह सब प्रेम की बातें हैं। इससे आपस में प्रेम बांट सकते हैं। यही सब होली दर्शाती है। होली यह बताती है कि आपमें कोई मतभेद या भेदभाव नहीं है।
प्रसिद्ध नृत्यांगना उमा शर्मा से अभिनव उपाध्याय की बातचीत पर आधारित

रंग गुलाल भरी वह हंसी



निराला का जन्मदिन वसंत पंचमी था तो महोदवी का धुरेड़ी। इलाहाबाद में महिला विद्यापीठ में छात्रावास की छात्राओं के साथ वे खूब होली खेलतीं। हंसती-हंसाती-खिलखिलाती उनकी यह छवि हमेशा होली पर याद आती है। चौदह साल उनके पास रहकर पढ़ीं, उनकी एक छात्रावासी शिष्या गायत्री नायक का आत्मीय संस्मरण।

गुरुजी यानी महादेवी वर्मा की कविताओं, उनके रहन-सहन से उनकी जो छवि हमारे बीच बनी थी उसका दूसरा उलट रूप भी था। इसका अंदाज हमें पहली बार होली के दिन मिला। मैं प्रयाग महिला विद्यापीठ के छात्रावास में रहती थी। गुरुजी के पास प्रतिदिन सायंकाल उस समय के कवियों-साहित्यकारों की बैठक होती थीं। महाकवि निराला और पंतजी भी प्राय: आते थे। इन सबको चाय पिलाने का उत्तरदायित्व मेरा था - चाय बनाते और भेजते समय बैठक से आती चर्चाओं के बीच जोर-जोर से खिलखिलाने की आवाों भी आतीं। एक बार हम छात्राओं के कार्यक्रम में निरालाजी मुख्य अतिथि बनकर हम लोगों के बीच यह कहते हुए आये कि, ‘शेरों की मांद में आज आया है सियार।ज् गुरुजी ने मेरा परिचय कराते हुए कहा कि, ‘गत्ती सितार अच्छा बजाती है।ज् गुरुजी ने मुझसे सुनाने को कहा तो पहले मैंने निरालाजी का गीत ‘आज फिर संवार सितार लोज् सुनाया और फिर सितार भी बजाया।
गुरुजी अपने बंगले से बहुत कम बाहर निकलती थीं- पर जितनी गुरु- गंभीर वे दिखती थीं, उतनी थीं नहीं। हम एम.ए. हिन्दी की छात्राओं को अपने बंगले में पढ़ने को कहतीं - बीच में हमें अच्छा नाश्ता करातीं फिर कहतीं बड़े पेटू हो तुम लोग। हमारे अंग्रेजी के अध्यापक थे मि. सक्सेना। मलिक मोहम्मद जायसी ने अपनी पुस्तक की भूमिका में जो अपना वर्णन किया है लगभग वैसे ही वे थे। अत: हम उन्हें मि. जायसी कहते थे - गुरुजी हमारी यह शैतानी ताड़ गईं और कहा बहुत शैतान हो तुम लोग। हम छात्रावासी लड़कियों के लिये होली का दिन विशेष रहता था। पहले हमें पता नहीं था पर होली की सुबह गुरुजी हम सबको बुलातीं और तीन-चार बाल्टियों में भरे रंग से हमें सराबोर कर देतीं- कोई बच नहीं पाता था - फ्राक और कुर्ते ब्लाउज के अन्दर रंग डालतीं - चेहरों पर हरे-लाल गुलाल लगातीं और सबके चेहरे देखकर खूब हंसती। हमें बाद में पता चला कि धुरेड़ी उनका जन्मदिन था। उस रात वे हमारे साथ मेस में खाना खातीं, बाईजी को विशेष हिदायत रहती खीर-पुड़ी-हलवा बनाने की। हमारे साथ बैठ कर वे भोजन करतीं और फिर छात्रावास की एक-एक लड़की को गुलाल लगाकर गले मिलतीं। बड़वानी की मनोरमा गायकवाड़ से बहुत हल्के मिलतीं क्योंकि उनके दुबले-पतले शरीर की हड्डियां उन्हें गड़ती थीं - पर अपने नाम के अनुरूप शैल बहिनजी से बार-बार मिलतीं, उन्हें देर तक गले लगाये रखतीं, क्योंकि वे अपने नाम के अनुरूप अच्छी गुलगुली थीं। इस तरह गुरुजी के साथ उनका जन्मदिन धुरेड़ी का दिन हंसते-खिलखिलाते बीतता। दसवीं के बाद की परीक्षा देने हमें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय जाना होता था - तो वे बहुत उदास होकर कहतीं तुम लोगों के बिना अच्छा नहीं लगेगा। परीक्षा के बीच यदि होली पड़ती तो वे कह देतीं तुम लोग होली के लिये यहां भाग आना।
तो गुरु- गंभीर महादेवी का खिलखिलाता रूप जो मैंने देखा है- चौदह वर्ष उनके सानिध्य में रहीं हूं- आज भी मन को उनकी खिलखिलाती वह छवि अभिभूत कर देती है। उनके साथ की खेली होली अब भी याद आती है। फिर वैसी सरस रंगभरी होली नहीं खेली- विद्यापीठ छोड़े लगभग बासठ वर्ष हो गये पर विद्यापीठ का छात्रावास, मैदान का कुआं, गुरुजी का दफ्तर और विशेषकर उनका बंगला, बैठक, भक्तिन की रसोई, गुरुजी के साथ खेली होली, उनका सहज-सरल खिलखिल रूप आज भी स्मृति में जीवंत है। उनके सानिध्य में बिताये चौदह वर्ष मेरे जीवन की अनमोल निधि है: ‘कांटों में नित फूलों सा खिलने देना अपना जीवन / क्या हार बनेगा वह प्रसून सीखा न जिसने हृदय को बिंधवानाज्।
आने वाली प्रत्येक होली मेरे लिये मेरी गुरुजी की खिलखिलाती छवि लेकर आती है।

Saturday, February 27, 2010

मेरे महबूब के घर रंग है री...

होली आ गई। लेकिन महानगरी सभ्यता में रंग अपनी चमक खो चुके हैं। ताल । मजीरे । ढोल। से नहीं आती आवाज। अगर आ भी जाए। तो। सब अपनी-अपनी तरह से सुनते हैं। अब वक्त है ऐसा । कि लोग करने लगे। रंगों से परहेज। कु छ लोगों को तो इसलिए भी नहीं लगाया जा सकता कि कहीं वह बुरा न मान जाएं। लेकिन हम कभी बेहया थे। जब बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे। बिना इस परवाह के । लोगों को रंग दिया करते थे। रंग लेकर छुपे रहते थे । या चढ़ जाते थे छत पर । और बस एक ही मकसद । रंगना है। आज कई मकसद है। कई रंग है। अबीर है। लेकिन वक्त रू ठा है। इसीलिए अपनों का साथ छूटा है।
आज बहुत से कवि हैं। होली के गीत लिखने वाले फिल्मी लेखक भी। लेकिन कबीर नही है। नजीर (नजीर अकबराबादी)नहीं है। नहीं है खुसरो । नहीं है विद्यापति। जिनके पद हमें ऐसे भिगो देते थे। कि बस रंग छुड़ाना मुश्किल।
आज सूफी कवि अमीर खुसरो के कुछ पद दे रहा हूं और एक अज्ञात कवि के पद भी जिसमें होली के साथ दर्शन का भी भाव जुड़ा है। यह मेरी तरफ से होली का मुबारकबाद का तरीका। उम्मीद है पसंद आएगा।




आज रंग है ऐ माँ रंग है री, मेरे महबूब के घर रंग है री।
अरे अल्लाह तू है हर, मेरे महबूब के घर रंग है री।

मोहे पीर पायो निजामुद्दीन औलिया, निजामुद्दीन औलिया-अलाउद्दीन औलिया।
अलाउद्दीन औलिया, फरीदुद्दीन औलिया, फरीदुद्दीन औलिया, कुताबुद्दीन औलिया।
कुताबुद्दीन औलिया मोइनुद्दीन औलिया, मुइनुद्दीन औलिया मुहैय्योद्दीन औलिया।
आ मुहैय्योदीन औलिया, मुहैय्योदीन औलिया। वो तो जहाँ देखो मोरे संग है री।

अरे ऐ री सखी री, वो तो जहाँ देखो मोरो (बर) संग है री।
मोहे पीर पायो निजामुद्दीन औलिया, आहे, आहे आहे वा।
मुँह माँगे बर संग है री, वो तो मुँह माँगे बर संग है री।

निजामुद्दीन औलिया जग उजियारो, जग उजियारो जगत उजियारो।
वो तो मुँह माँगे बर संग है री। मैं पीर पायो निजामुद्दीन औलिया।
गंज शकर मोरे संग है री। मैं तो ऐसो रंग और नहीं देखयो सखी री।
मैं तो ऐसी रंग। देस-बदेस में ढूढ़ फिरी हूँ, देस-बदेस में।
आहे, आहे आहे वा, ऐ गोरा रंग मन भायो निजामुद्दीन।
मुँह माँगे बर संग है री।

सजन मिलावरा इस आँगन मा।
सजन, सजन तन सजन मिलावरा। इस आँगन में उस आँगन में।
अरे इस आँगन में वो तो, उस आँगन में।
अरे वो तो जहाँ देखो मोरे संग है री। आज रंग है ए माँ रंग है री।

ऐ तोरा रंग मन भायो निजामुद्दीन। मैं तो तोरा रंग मन भायो निजामुद्दीन।
मुँह माँगे बर संग है री। मैं तो ऐसो रंग और नहीं देखी सखी री।
ऐ महबूबे इलाही मैं तो ऐसो रंग और नहीं देखी। देस विदेश में ढूँढ़ फिरी हूँ।
आज रंग है ऐ माँ रंग है ही। मेरे महबूब के घर रंग है री।
2-
हजरत ख्वाजा संग खेलिए धमाल, बाइस ख्वाजा मिल बन बन आयो
तामें हजरत रसूल साहब जमाल। हजरत ख्वाजा संग..।
अरब यार तेरो (तोरी) बसंत मनायो, सदा रखिए लाल गुलाल।
हजरत ख्वाजा संग खेलिए धमाल।

3-दैया री मोहे भिजोया री शाह निजाम के रंग में।
कपरे रंगने से कुछ न होवत है
या रंग में मैंने तन को डुबोया री
पिया रंग मैंने तन को डुबोया
जाहि के रंग से शोख रंग सनगी
खूब ही मल मल के धोया री।
पीर निजाम के रंग में भिजोया री।

4-तोरी सूरत के बलिहारी, निजाम,
तोरी सूरत के बलिहारी ।
सब सखियन में चुनर मेरी मैली,
देख हसें नर नारी, निजाम...
अबके बहार चुनर मोरी रंग दे,
पिया रखले लाज हमारी, निजाम....
सदका बाबा गंज शकर का,
रख ले लाज हमारी, निजाम...
कुतब, फरीद मिल आए बराती,
खुसरो राजदुलारी, निजाम...
कौउ सास कोउ ननद से झगड़े,
हमको आस तिहारी, निजाम,
तोरी सूरत के बलिहारी, निजाम...

agyat-
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।
बाके कमर में बंसी लटक रही
और मोर मुकुटिया चमक रही
संग लायो ढेर गुलाल,
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।
इक हाथ पकड़ लई पिचकारी
सूरत कर लै पियरी कारी
इक हाथ में अबीर गुलाल
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।
भर भर मारैगो रंग पिचकारी
चून कारैगो अगिया कारी
गोरे गालन मलैगो गुलाल
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।
यह पल आई मोहन टोरी
और घेर लई राधा गोरी
होरी खेलै करैं छेड़ छाड़
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।

एक ही थैले के...

गहमा-गहमी...