Monday, February 16, 2009

सन्नाटा का संगीत


सन्नाटा का संगीत
संगीत जीवन से जुड़ा वह आवश्यक तत्व है जिसके बिना फीका है सबकुछ। यह किसी भी तत्व से उत्पन्न हो सकती है। चाहे सिल-बट्टे की खट-खट हो या चक्की के दो पाटों का घर्षण, चाहे ओखल में मूसल का प्रहार हो या सूप में उछलते गेहूं की ध्वनि, गरजते बादल हों या बूदों की रिमझिम, ऊंचाई से लहराकर गिरता झरना हो या समुद्र में थिरकती लहरों की उछल-कूद, पंक्षियों की फड़फड़ाहट हो या हवाओं की सरसराहट, सांसों की गति हो या दिल की धड़कन, सब में बसा है एक सुनाई देने वाला संगीत। लेकिन अगर सन्नाटा का संगीत सुनना हो तो पंडित बिरजू जी महाराज की महफिल में शिरकत करें और उनसे इसकी प्रस्तुति के लिए आग्रह करें। इकहत्तर वर्षीय पंडित जी की यौवन मदमाती प्रस्तुति आपको मंत्रमुग्ध कर देगी।
स्पिक मैके के सौजन्य से आयोजित लेडी श्रीराम कालेज में पंडित बिरजू जी महाराज के कथक नृत्य की प्रस्तुति की सूचना जसे मिली मन में एक बेचैनी सी हो गई, क्योंकि मैं कई दिनों से उनका कार्यक्रम देखने की चाहत पाले बैठा था। मेरा मानना है कि दिल्ली की भागमभाग में ऐसे कार्यक्रम अगर आप देखे तो ये आपको रिचार्ज कर देते हैं।
अपने सहकर्मी मित्र आलोक को जब यह बात बताई तो वह खुशी मन से मेरे साथ चलने को तैयार हो गए। वजह मैं जानता हूं, एक तो वह साहित्य प्रेमी हैं और दूसरे संगीत के प्रति अनुग्रही। एक सच यह भी है कि हम दोनों संगीत की गूढ़ता के अल्पज्ञ भी हैं। इसलिए एक दूसरे पर अपनी विद्वता आरोपित, प्रतिरोपित और अंतत: सहमति प्रदान क रते हैं। उनका कम बोलना हमें अवसर देता है।
बहरहाल, हम मदर डेरी से आए नोयडा मोड़ लेकिन कम्बख्त बस छूट गई, भला हो उस माल ढोने वाली टैक्सी का जिसने हमें गन्तव्य तक पहुंचाया। लेकिन हमें देर हो रही थी और आयोजन स्थल हम दोनों ने नहीं देखा था। मुश्किल तब हो गई जब हमें रास्ता भी गलत बता दिया गया। अब ये सोच रहा था कि कहीं कार्यक्रम शुरु न हो जाए लेकिन जब कार्यक्रम में पहुंचे तो पंडित जी ठीक पहले मंच पर आए थे और लोग खड़ा होकर उनका स्वागत कर रहे थे। पंडित जी के प्रशंसकों की भीड़ ने हमें बालकनी में बैठने को मजबूर कर दिया नहीं तो हम पंडित जी को करीब से निहारना चाहते थे। अद्भुत भाव-भंगिमा और घुंघरु की खनक के बीच पंडित जी ने अपने पिता और गुरु पं. लक्षन जी महाराज के बारे में बताते हुए अपना परिचय दिया। कथक और संगीत के बारे में जो उन्होंने बताया उनकी कुछ बातें इस प्रकार हैं, ‘संगीत वह भाषा है जो लय के आंचल में छिपी बैठी है। ताल लय को मात्रा देते हैं और घुंघरु उसे लय देते हैं। लय ईश्वर की कृपा है, यह हमारी जिंदगी है। संगीत हर जगह है। सन्नाटा में भी संगीत है।ज् इस संक्षिप्त उद्बोधन के बाद पंडित जी ने राग मालकोश में, ‘बरनत छवि श्याम सुंदर, लसत अंग पीत बसन, बंक भृकुटि गरे भाल..ज् पर मनमोहक प्रस्तुति दी।
इसके बाद शुरु हुई विशेष प्रस्तुति, मैंने बहुत से शास्त्रीय कार्यक्र म देखें हैं लेकिन ‘सन्नाटा के संगीतज् को सुनने और महसूस करने का यह हमारा पहला अनुभव था। घुंघरु की हल्की खनक और वातावरण की शांति पूर्ण सन्नाटा का आभास दे रही थी।
शरीर की लचक और पैरों की थिरकन से कहीं भी नहीं लगता था कि यह प्रस्तुति इकहत्तर वर्षीय उस जवान की है जो जिसे गुरु मानकर न जाने कितने जवान कथक की शिक्षा लेते हैं।
इस प्रस्तुति के बाद अब बारी थी तीन ताल की पर प्रस्तुति की। पंडित जी ने बताया कि तीन ताल आकाश है और घुंघरु इसमें तारों की भांति चमक रहा है। इसके बाद तीन ताल की पूरी प्रस्तुति में घुंघरु सुरों के बीच टिमटिमाता रहा। फिर पंडित जी ने छन्द, लय, ताल और बोल के माध्यम से कार्यक्रम में तराना, आरोह-अवरोह के बीच लचकती कमर और थिरकते पांव ने ऐसा जादू किया कि दर्शक समूह मंत्रमुग्ध सा देखते रह गये और हर प्रस्तुति पर दर्शकों की अनवरत तालियां बजती रहीं।
इसके बाद की प्रस्तुति भी आकर्षक और आनंदायक भी थी क्योंकि अब नायक और नायिक के यमुना पर मिलन की बारी थी। दरअसल नायक तबला था और नायिका घुंघरु थी। नायक आगे-आगे और नायिका पीछे-पीछे। इस बीच नायक का रुकना, नायिका का उसे चिढ़ाना, नायक का रुठना और नायिका का मनाना, नायिका के पांव में कांटा चुभना और नायक द्वारा निकालना, और एक कहासुनी के बाद अंतत: यमुना के किनारे दोनों का मिलन। इसका कथक के माध्यम से प्रस्तुति पर सैकड़ों हाथों की तालियों की गड़गड़ाहट की गूंज देर तक हाल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही। दर्शकों के लिए इस न भूलने वाली प्रस्तुति के बाद पारंपरिक कथक के साथ कुछ नए प्रयोग पंडित जी ने दिखाए, इसमें सांप-नेवला की लड़ाई, प्रकृति का चित्रण और अंतत: एक आलसी व्यक्ति की गतिविधियों के माध्यम से हास्य प्रस्तुत किया वह किसी भी लाफ्टर शो अधिक मनोरंजक लगी। यही नहीं इशारों में गोपनीय बातचीत की प्रस्तुति ने मानों लोगों को लोट-पोट कर दिया।
और अब अंत में एक ठुमरी की प्रस्तुति, ‘मोरी गागरिया काहे को फोरी रे श्याम, मैं तो गारी दूंगी ना..., जाए कहूंगी नन्द के दुआरे..ज् की प्रस्तुति के साथ इस कार्यक्रम का समापन किया। उनके साथ उस्ताद अकरम खान ने तबले पर थिरकती अंगुलियों का जो जादू बिखेरा उससे सभी दर्शक उद्वेलित हो गए। राजेश प्रसन्ना ने सरोद पर अच्छी प्रस्तुति दी।
इस तरह एक शाम सुहानी बीती। इसके बाद मैं हर उस शाम को जब अकेला होता हूं तो सन्नाटा में संगीत ढूंढता हूं और उसके मिलने पर एक मिठास देर तक महसूस करता हूं।
अभिनव उपाध्याय

हरियाणा का पनिहारी नृत्य - जिसे देखने की प्यास कभी नहीं बुझती

राजस्थान का कालाभेरिया नृत्य- जिसमें थिरकता पोर- पोर

Thursday, February 12, 2009

ये इश्क नहीं आसां...


ं ये इश्क नहीं आसां...
प्रेम दिवस के साथ ही नागफनियां भी उगने लगती हैं। युगल लुकाछिपी शुरु कर देते हैं। ये प्रेम पुजारी बचते रहते हैं कि कहीं श्रीराम भक्तों द्वारा घंटा न बज जाए। सहीराम ने अपने कवि मित्र से पूछा कि इस बार क्या प्रोग्राम है। उन्होनें दबी जुबान से कहा कि क्या बताएं, मंहगाई ने जेब ढीली कर दी है और शिव,राम की सेना ने. . .।
मधुमास मनाने की संभावनाएं बनने से पहले बिगड़ जाती हैं। आप तो जानते ही हैं कि लव मी, लव माई डाग। दरअसल उनका डॉग बेस्लम डॉग है, बहुत चटोर है। हमेशा बढ़िया चाकलेट ही खाता है। लव के चक्कर में डॉग की इतनी सेवा हो गई कि मधु चन्द्रिका की मिलन यामिनी को मंहगाई का ग्रहण लग गया। इस बार मधुमास को खास बनाने की सारी योजनाएं पानी भरती नजर आ रही हैं। फिर भी बड़ी मुश्किल से अठन्नी-चवन्नी जोड़कर रखा था कि 14 फरवरी को प्रेम दिवस मना ही लेंगे लेकिन डर लग रहा है कि पकड़े गए तो स्वघोषित नैतिक ब्रिगेड के सैनिक कहीं तेरही न कर दें। सुना है जितना राम ने सीता को नहीं खोजा था उससे अधिक श्री राम सेना वाले युगलों को खोज रहे हैं। अब सच बताएं सहीराम जी किसी ने सच ही कहा है कि ये इश्क नहीं आसां..।
सहीराम जी पिछले दिनों एक अद्भुत दुर्घटना मेरे साथ हो गई, वसंत के आगमन पर शहर के घोषित रसिकों ने ‘प्रेम पियासाज् कवि सम्मेलन किया उसमें मुङो भी आमंत्रित किया गया था। सच कहूं तो ‘लवज् पर कविता पाठ का आमंत्रण पाकर मन लबालब हो गया। मैंने कविता शुरू की, ‘मोहिनी तेरे नैन कटार, झंकृत होते मन के तारज् अभी स्वर पंचम तक पहुंचा ही था कि मंच के पीछे भगवा और त्रिशूल धारी भाइयों को देखा और श्रृंगार रस की कविता वीर रस में बदल गई। सहीराम ने आगे पूछा, क्या आपने कविता सुनाई? उन्होंने कहा हां लेकिन ऐसे- ‘गोरी तेरे नैन कटार, कर दुश्मन को तार-तार। तोड़, मरोड़ गर्दन उसकी, बैरी छुपा है सीमा पार।ज्
परेशानी तब हो गई जब इस अद्भुत कविता को सुनाकर श्रोताओं ने मुङो श्रृगांर और वीर रस के संयुक्त कवि ‘रसिक विद्रोहीज् की संज्ञा दे दी। रसिक विद्रोही ने आंख बंद कर संत वेलेंटाइन के प्रेम मंत्र का जप किया और प्रार्थना की कि हे संत जी इन घोंघा बसंतों को सपने में समझाओ, साथ में कवि बिहारी से भी अनुरोध किया और कहा, हे रीतिकाल के केशव इन्हे विरह व्यथा से अवगत कराओ शायद इनका पाषाण हृदय पिघल जाए। इस व्यथा को सुनने के बाद सहीराम ने कहा, इस नैतिक ब्रिगेड से मुङो भी चिंता है क्योंकि इश्क तो ऐसा गुनाह है जो शादीशुदा भी करता है।
अभिनव उपाध्याय

बीन की धुन पर अब सांप नहीं, नाचते हैं सपेरे



सांप पर प्रतिबंध के कारण इसमें सपेरों की होती है भागीदारी

सूरजकुं ड मेले में देश के विभिन्न प्रदेशों से आए लोकनृत्यों को देखने में दर्शकों की रुचि रही लेकिन आजकल मेले सपेरा नृत्य की धूम है। लेकिन आश्चर्य इस बात का है यहां बीन की धुन पर सांप नहीं बल्कि सपेरे खुद अपने साथियों के साथ नाचते हैं।
इस सपेरा नृत्य के मुखिया सीसानाथ ने बताया कि अब सरकार ने सांप नचाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। लेकिन दर्शकों को अब भी बीन की धुन सुनने और सांप का नृत्य देखने का शौक है। इसलिए हमारे नृत्य को देखने के लिए देश में ही नहीं विदेशों में भी दर्शकों की कमी नहीं रही।
मूलत: नाथ संप्रदाय के ये सपेरे कानिपा नाथ को अपना गुरू मानते हैं। उनका कहना है कि लोग हमारे बारे में जानना चाहते हैं हमारे नृत्य और बीन की धुन को भी समझना चाहते हैं।
सीसाराम भारत में हरियाणा ट्यूरिज्म की तरफ से इंडिया हैबिटेट सेंटर से लेकर अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर तीस लोगों के साथ प्रस्तुति दे चुके हैं। इसके अलावा वह विश्व के कई देशों में अपनी प्रस्तुति देने गए हैं। इंग्लैंड में बैंड के साथ ‘आन लॉग सांगज् और स्काटलैंड में ‘इमेजिन ग्रेमज् की धुन पर बीन की प्रस्तुति को वह यादगार मानते हैं यही नहीं एक सौ पांच सपेरों के साथ इटली में बीन की प्रस्तुति पर दर्शकों की सराहना वह आजतक नहीं भूलते हैं। वह हरियाणा सरकार का भी धन्यवाद व्यक्त करते हैं कि जो इस कला को जीवित रखने के लिए आर्थिक सहायता और कलाकारों को प्रोत्साहन देती है।

अभिनव उपाध्याय

Saturday, February 7, 2009

एक पत्र कुबेर के नाम

एक पत्र कुबेर के नाम
लोकतंत्र में गणतंत्र को याद करने के बाद मंहगाई की मार से त्रस्त एक भारतीय नागरिक ने स्वर्ग में धन के देवता को एक पत्र लिखा। पत्र इस प्रकार है-
प्रिय कुबेर जी
दंडवत नमस्कार, बिना इस परवाह के कि कपड़े गंदे हो जाएंगे और इस आशा में कि शायद इसी बहाने आपकी तिजोरी की कुंडी खुल जाए और स्वर्ण कलश से छलक कर एक दो स्वर्ण मुद्रा इधर भी आ जाए। बड़ी आशा से यह पत्र आपको लिख रहा हूं। पिछले साल भी लिखा था लेकिन साढ़े नौ महीने तक कोई जवाब नहीं आया और इतने दिनों से मंदी बरकरार है। इसलिए फिर लिख रहा हूं मेहरबानी करके रिसीव कर लीजिएगा मेहरबानी होगी।
कुबेर जी धरती की बुलेटिन आप तक पहुंच रही होगी तो पता तो चल गया होगा कि आजकल कलमकारों के फांके कट रहे हैं, लेकिन आप निश्चिंत रहिएगा पुजारियों की चांदी है। मंदिर में भक्तों की कमी नहीं है। परेशानी कामन मैन को है, दुकानदार उनकी जेब काटने के लिए-नए उस्तरे इस्तेमाल कर रहा है। दुकान पर सामानों की रेट बढ़ते जा रहे हैं लेकिन वहां काम करने वाला नौकर सूखता जा रहा है। हमारी सरकार कोशिश कर रही है कि कुछ जादू हो जाए लेकिन आप तो जानते ही हैं कि ये लोग कितने अनाड़ी हैं।
कुबेर जी, हमारे पंडित जी ने बताया था कि आप देवताओं के वित्तमंत्री हैं शायद इसीलिए टीवी से लेकर फोटू तक में देवी-देवता एकदम चकाचक दिखते हैं, गहनों से लकधक। लेकिन हमारे यहां के वित्त मंत्री थोड़ा उस टाइप के हैं क्या करें एक साथ कई जिम्मेदारियां हैं, लड़खड़ा कर खड़े भी होते हैं तो पड़ोसी देश लंगी लगा देता है। हमारे प्रधानमंत्री भी सत्तर पार के हो गए हैं निर्णय भी उम्र के हिसाब से ही लेते हैं। वो आपके इंद्र का क्या हाल चाल है उनके रंग-ढंग बदले कि अभी..। उनसे कहिएगा इस साल थोड़ी मेहरबानी कर देगें हमारे यहां काफी किसान सूखे के कारण आपके पास चले गए हैं।
एक बात और वो युधिष्ठिर जी के कुत्ते का हाल भी लिखिएगा, हमारे यहां तो स्लमडॉग करोड़पति हो गया है और बेस्लमडॉग कार के शीशे से मुंह निकालकर स्लम वालों को जीभ चिढ़ाता है।
मनोरंजन का भी बुरा हाल है फिल्मों के टिकट मंहगे हो गए हैं, तारिकाओं पर मंदी का असर नहीं है इनका रेट बढ़ता ही जा रहा है। लेकिन आप अपने यहां की उर्वशी और मेनका टाइप तारिकाओं के बारे में थोड़ा डिटेल में दीजिएगा। एक बात भूल ही रहा था हमारे वित्त मंत्री को मंदी से निकलने का हल सपने में जरुर दे दीजिएगा भूलिएगा मत।
क्या करुं लिखना तो बहुत कुछ है लेकिन अभी पन्ना भर गया है और पेन की स्याही भी जवाब दे रही है। हमारे यहां पेट्रोल पर सब्सिडी है लेकिन कागज, कलम को कौन पूछता है। और अंत में लक्ष्मी जी से मेरा हेलो कहिएगा।
शेष सब ठीक है!
आपका दर्शनाभिलाषी
दुखीराम
अभिनव उपाध्याय

Friday, February 6, 2009

कैसी लग रही हूँ मैं....


sambharpuriya dance in orissa


siddh goma dance


badhai dance in madhy predesh


Monday, February 2, 2009

सत्यम् झूठम् सही है लूटम्

सत्यम् झूठम् सही है लूटम्
जनवरी की ठंड का अगर सबसे अधिक असर किसी पर पड़ा है तो वह है शेयर बाजार। आदमी तो फिर भी थोड़ा बहुत बाहर घूम टहल लेता है लेकिन शेयर तो ठंड के मारे उठा ही नहीं। ये आलस्य मीडिया को भी था बम्बई बम धमाके के बाद वह भी मसाले के अभाव में बस इधर उधर की दिखा सुना रहा था। एकाएक रामालिंगा राजू ने अपने क्रिया कलापों की जानकारी देकर लोगों के मिजाज में गर्मी ला दी। शेयर तो फिर भी आराम फरमाता रहा। मीडिया में खबर चल रही थी, सत्यम ने झूठा कारोबार दिखाकर करोड़ों रुपए ठगे। माने रामलिंगा राजू ने बिना गंगा नहाए काजू खाने का इंतजाम कर लिया। लेकिन धन्य हो भारत का सपूत कि पत्र लिखकर धोखाधड़ी की आत्मस्वीकृति कर ली। दो दिन भूमिगत रहा और निकला तो सीधे हवालात।
उसका यह कार्य चर्चा में रहा। इस पर तत्काल टिप्पणी के लिए सहीराम ने बाबा अठन्नी से संपर्क साधा। बाबा अठन्नी से जब सहीराम ने राजू की चर्चा की तो उन्होंने कहा, भक्त सहीराम मैं राजू की कारगुजारियों से तंग आ गया था कितनी बार समझाया कि सारा माल अकेले मत उड़ाओ कुछ आश्रम टाइप जगहों पर भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दिया करो, माघ का महीना है दुनिया बाबाओं को दान पुण्य करती है। लेकिन उसके कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अब बताओ देश की चौथी आईटी कंपनी की उसने तेरही कर दी।
सहीराम ने बाबा अठन्नी से कहा कि, बाबा कुछ भी हो रामलिंगा ने तो शेयर को गंगा में डुबा दिया। एकदम से नाक कटा दी। बाबा अठन्नी ने मुस्कुराते हुए कहा, सहीराम तुम्हे नहीं पता ऐसे लोग दो नाक वाले होते हैं। एक कट भी जाए तो दूसरी लेकर मुस्कुराते हुए जेल के बाहर फ्लाइंग किस देते हुए फिर वापस आ जाते हैं। सहीराम ने गर्दन हिलाते हुए बाबा अठन्नी की बात पर हैरानी जताई और बोले बाबा रामलिंगा राजू ने आत्मस्वीकृति करके अपनी नाक पर ही उस्तरा चला लिया। यही तो बात है भक्त, तुम्हे मार्केट का मंत्र पता नहीं है। राजू की इस क्रिया के बाद न जाने कितने विशेषण जुड़ते गए। सरकार ने भी उस पर अपनी सहानुभूति जता कर मदद करने की अपील की है। राजू ने यह काम अपने आजू-बाजू देखकर किया है।
सहीराम ने कहा, लेकिन कंपनी की तो काफी साख थी अब क्या होगा? होना क्या है इस कंपनी को तो अभी इक्कीसवां लगा है और जवानी में ऐसी गलती हो ही जाती है इसे सरकार भी समझती है और व्यापार भी। एक लाइन में बाबा इस प्रकरण को क्या कहेगें, सहीराम ने पूछा? बाबा ने कहा, सत्यम् झूठम् सही है लूटम्।

Monday, January 12, 2009

डिप्लोमा इन चाटुकारिता

डिप्लोमा इन चाटुकारिता
विश्व आर्थिक मंदी में गोते खा रहा है। कंपनियां लोगों की कास्ट कटिंग कर रही हैं। ऐसे दौर में हमारा काम लोगों को सही तरह से सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में उन लोगों को ट्रेनिंग देना है जो लोगों की तारीफ करने में थोड़ा झिझक महसूस करते हैं। डिप्लोमा इन चाटुकारिता कोर्स के प्रबंधक लम्पट जी बड़े चाव से इसके बारे में सहीराम को बता रहे थे। सहीराम ने उनसे पूछा कि, इस कोर्स को शुरू की जरूरत आपको कैसे महसूस हुई? लम्पट जी ने कहा, यह मेरे व्यक्तिगत अनुभव की देन है। ऐसा हुआ कि मैं एक पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता था लेकिन मुङो चाटुकारिता नहीं आती थी और उम्र के इस पड़ाव पर भी मुङो टिकट नहीं दिया गया। लेकिन राजनीति को छोड़ कर अन्य क्षेत्रों में इसकी क्या उपयोगिता है? सहीराम ने पूछा, लम्पट जी ने मुस्कुराते हुए कहा, लगता है आप भी बिल्कुल सीधे ही हैं, अरे मिनिस्टर से लेकर चपरासी तक इसकी कमी के कारण प्रतियोगिता से बाहर हो जाते हैं और अब तो इसकी जरूरत व्यापक पैमाने पर महसूस होने लगी है।
सहीराम ने इसमें एडमिशन से संबंधित प्रक्रिया पूछी और लम्पट जी ने रिसेप्शन की तरफ इशारा कर दिया। रिसेप्शन पर बैठी चंचला चंद्रमुखी ने ड़ेढ इंच की मुस्कान के साथ ‘हाय हैंडसमज् कहकर उनका स्वागत किया। सहीराम ने उनसे पूछा, कितनी फीस देनी होगी। चंद्रमुखी ने कहा फीस का क्या है इसे डोनेशन ही समझिए यह पब्लिक वेलफेयर में ही है। वैसे आप जसे स्मार्ट के लिए पांच हजार कोई बड़ी रकम नहीं है। अगला सवाल था, यह कोर्स कितने दिनों का है? यह एक हफ्ते के शार्ट टर्म कोर्स की फीस है वैसे हमारे यहां एक महीने, दो महीने से लेकर एक साल तक के कोर्स भी कराए जाते हैं। अगर मास्टर डिग्री या रिसर्च करना हो तो फीस थोड़ी ज्यादा लगेगी लेकिन इसके फायदे की आप कल्पना तक नहीं कर सकते। सहीराम उसकी आंखों की चमक देखकर चौंधिया रहे थे तभी उसने क हा, आप को देखकर ऐसा लगता है कि आप जल्द ही सीख जाएंगे, इसलिए आपके लिए शार्ट टर्म कोर्स ही बेहतर होगा। सहीराम ने फिर पूछा कि आप के यहां कौन-कौन से लोग आते हैं? ओए यंग मैन, ये पूछिए कौन नहीं आता है हमारे यहां राजनीति, फिल्म, कारपोरेट, एजूकेशन, सरकारी मुलाजिम और अलग-अलग क्षेत्रों से लोग आ रहे हैं। पिछले दिनों रिफ्रेशर कोर्स के बदौलत ही कितनों ने इसका लाभ उठाया। अब आप भी देर न करें और दिलखोलकर इसका लाभ लें। उसने मुस्कुराते हुए एक दीर्घ सांस में यह बात कह दी।
सहीराम ने उनका फार्म लौटाते हुए कहा कि, वैसे आपके चेहरे से आपकी उम्र का पता नहीं चलता। रिसेप्शनिस्ट ने फौरन कहा, आप तो पहले से ही एक्सपर्ट हैं।
अभिनव उपाध्याय

Saturday, January 3, 2009

एक न भूलने वाली शाम


एक न भूलने वाली शाम
ऑफिस की भाग-दौड़ और रिपोर्टिग के बाद जब शाम को खबर लिखने बैठा तो मेरे सहकर्मी रत्नाकर मिश्र ने एक बड़ी अच्छी सूचना थी। उन्होनें कहा कि प्रसिद्ध बांसुरी वादक पं.हरिप्रसाद चौरसिया मंडी हाउस के कमानी सभागार में आ रहे हैं और कार्यक्रम शायं सात बजे से है। मैं जल्दी से काम निपटा के उनके साथ 433 नम्बर बस से जंतर-मंतर पहुंच गया और फिर पद यात्रा के बाद आडिटोरियम। श्रोता बड़ी संख्या में कठोर ठंड की परवाह किए बगैर आए हुए थे। औपचारिकताओं के बाद कार्यक्रम शुरू हुआ। पंडित जी ने पहले राग सरस्वती पर आलाप और फिर पं. भवानी प्रसाद के पखावज के साथ जुगलबंदी सुनाई। सुरों के आरोह-अवरोह के बीच बांसुरी और पखावज पर थिरकती अंगुलियां और स्वर लहरियों का आकर्षण दर्शकों को ताली बजाने पर मजबूर कर रहा था। इसके बाद उसी राग में पं योगेश शम्शी के साथ तबले पर जुगलबंदी हुई। बांसुरी और तबले का साथ भी लोगों को खूब भा रहा था। इसके बाद राग यमन में पंडित जी ने सबसे साथ मिलकर बांसुरी बजाई इसमें उनका साथ बांसुरी पर सुनील अछावत और तानपुरे पर रेखा चतुर्वेदी ने दिया।
इसके बाद श्रोता राग भैरवी और दरबारी की मांग करने लगे लेकिन पंडित जी ने कहा कि यह उन रागों को सुनाने का वक्त नहीं है। इसलिए बात पहाड़ी राग पर आकर टिक गई। पंडित योगेश शम्शी की तबले पर थिरकती अंगुलियां और पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी की तान से उठती स्वर लहरियों ने शांत माहौल में भी एक स्पंदन भर दिया था।
शाम जसे जसे ढल रही थी कार्यक्रम अपने चरम पर पहुंच रहा था। बांसुरी की धुन ने अपने मोह पाश में ऐसा बांधा कि श्रोता उसमें खोते चले गए। एक लंबी सांस के बाद बांसुरी की फूंक और उससे उठी जवान स्वर लहरियां चौरसिया जी कि उम्र को नकार रही थी और राग पहाड़ी सुनने पर बस ऐसा ही प्रतीत होता था कि हम दिल्ली में कंक्रीटों के जंगल से निकल कर पहाड़ की उन हसीन वादियों में चले गए हैं जहां हरियाली है, शांति है और लोक धुन पर नाचती पहाड़ी औरतें अपने पहाड़ का बखान कर रही हैं।
कार्यक्रम के समापन के बाद बाहर निकलते ही कपां देने वाली ठंड थी। हमने फुटपाथ पर चाय पी और रत्नाकर ने सिगरेट सुलगाई। रात के साढ़े नौ बज चुके थे अब बस का इंतजार था। मुङेा पहले बस मिल गई और मैं इस न भूलने वाली शाम और बांसुरी की आवाज को अपने मन मस्तिष्क में संजोए चला जा रहा था।
अभिनव उपाध्याय

Wednesday, December 31, 2008

न्याय के लिए आई हूं

न्याय के लिए आई हूं

भारतीय फिल्में, भारतीय संगीत और भारतीय संस्कृ ति से प्रभावित अफगानी लड़की साबरा अफगानिस्तान से भारत तक की यात्रा अपने पति को ढ़ूंढने के लिए की। लेकिन तलाश पूरा होने के बाद उसे अब न्याय के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है।तीस नवम्बर को अपने मां के साथ भारत आई साबरा अपने पति मेजर डा.चंद्रशेखर पंत को तलाशती उसके पास पहुंच गई लेकिन उससे मिलने के बाद अपने पति की प्रतिक्रिया को देखकर वह अवाक साबरा का कहना है कि, सबसे पहले उसने मुङो देखकर यही पूछा कि ‘तुम यहां तक कैसे आ गई। अफगानिस्तान से आए उसे दो साल हो गए थे लेकिन इस बीच उसने मात्र तीन फोन किया और वह भी यह बताने के लिए वह शादीशुदा है और सारा उसे भूल जाए। 20 साल की साबिरा डा. पंत से मुलाकात के बारे में बताती हैं कि ‘मैं काबुल में आई एमएम (इंडियन मेडिकल मिशन) में एक दुभाषिया के रूप में काम कर रही थी, वहां पर मेजर पंत भी थे मैं अफगानी या पस्तो से हिन्दी में बदलती थी। इस बीच मेजर पंत ने उसके सामने शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन उसने बिना परिवार की आज्ञा से इसे मानने से इनकार कर दिया। जब उसने हमारे पिता से बात की तो उन्होंने कहा कि हम लोग हिन्दूओं में शादी नहीं करते इस पर मेजर पंत ने निकाह के लिए इस्लाम कबूल कर मेजर हिम्मत खान बन गया और हिजरी सम्सी 19/8/1385 को उसने मुझसे निकाह किया। हमारे साथ किराए के मकान में पन्द्रह दिन गुजारने के बाद वह भारत आ गया। उसने जाते समय कहा कि वह जल्द ही लौट कर आ जाएगा। लेकिन उसने जब फोन किया तो उसका उत्तर उम्मीदों को तोड़नें वाला था। उसने कहा मैं एक शादीशुदा दो बच्चों का बाप है तुम दूसरी शादी कर लो।ज् मुङो इस तरह के उत्तर की उम्मीद नहीं थी। शादी के दो साल बाद पति के लिए भारत आने के बारे में वह बताती हैं कि, जब आखिरी बार उसने एकदम मना कर दिया और हमारी बिरादरी के लोगों का लगातार दबाव हम पर बनता गया तो हमने मां के साथ भारत आने के बारे में सोचा। अधिक समय वीजा मिलने में लग गया, लेकिन इतने समय बाद भी न्याय न मिलने से वह निराश हैं।साबरा का कहना है कि यहां की सरकार और उत्तराखंड प्रशासन ने भी मेरे साथ काफी सहयोग किया है यही नहीं भारतीय महिला आयोग ने भी सकारात्मक उत्तर दिया और मेरे वीजा की अवधि बढ़ाने का आश्चासन दिया है।साबिरा का कहना है कि अब मैं भी भारतीय हूं और यहां की बहू हूं। अगर मैं दोषी हूं तो मुङो जांच करने के बाद दंड दिया जाय और नहीं हूं तो दोषी को सजा दी जाय। मैं न्याय मांगने आई हूं। साबिरा बताती हैं कि जब मेजर पंत ने पिथौरागढ़ में रहने वाली अपनी पत्नी से मिलवाया तो पहले तो उसकी पत्नी ने कहा कि मैं जानती हूं कि इसने तुमसे शादी की है लेकिन जब उसे पुलिस के सामने बयान देने को कहा गया तो उसने बयान बदल दिया और कहा मुङो इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।साबरा अपने परिवार की हालत बयां करते हुए कहती हैं कि मेरे परिवार में चार बहन और तीन भाई हैं मैं सबसे बड़ी हूं। मेरी अपनी ही बहन जब मुझसे सवाल करती है तो मैं निरूत्तर हो जाती हूं। पड़ोस के लोग भी छींटाकसी क रते हैं। इस संबंध में आपने काई केस भी दायर किया है? यह पूछे जाने पर साबरा का कहना है कि, अभी नहीं, क्योंकि बिना केंद्रीय सरकार की अनुमति के यह संभव नहीं है अभी मैं हाल ही में गृहमंत्री से मिली हूं और उन्होंने मामले पर ध्यान देने का आश्वासन दिया है। यहां की न्याय प्रणाली के बारे में उसका कहना है कि, मुङो जब तक न्याय नहीं मिलेगा मैं लड़ती रहूंगी। साबरा का कहना है, मुङो भारत और अफगानिस्तान में कोई विशेष अंतर नहीं लगता यहां लोग काफी अच्छे हैं। बहुत भारतीय अफगानिस्तान में वर्षो से रह रहे हैं सबका आपस में बहुत भाईचारा है। किसी एक आदमी के बुरा होने से पूरा देश तो बुरा नहीं हो जाता।

यह माया की देवी है

यह माया की देवी है
उत्तर प्रदेश अपने विभिन्न प्रकार के निम्न, मध्यम, मध्यमोत्तम, उत्तम और सर्वोत्तम कार्यो के लिए जाना जाता है। यह खासकर तब और चर्चा में आ जाता है जब वहां विभिन्न तरह की लीलाएं होने लगती है। चाहे अमरमणि प्रेम प्रसंग हो या कविता चौधरी का मामला या कुछ और यहां तरह-तरह की लीलाएं जनता ने देखी। विभिन्न कलाओं में राजनेताओं ने अपनी योग्यता का प्रदर्शन करते हुए पल्टीमार युक्ति से सत्ता प्राप्त की और पुन: अपनी खोई धार्मिक, आर्थिक और नैतिक प्रतिष्ठा को प्राप्त करने में लगे रहे।
अपनी कमाई के बारे में कुछ सोचते कि आर्थिक मंदी ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। इसके असर से परेशान मुखिया मायावती ने अपने धुरंधर कार्यकर्ताओं के ऊपर जन्म दिन की तैयारियों का भारी-भरकम बोझ डाला। सब तो बच गए लेकिन फंस गए बेचारे तिवारी बाबा। अगर चढ़ावे की व्यवस्था न करें तो देवी नाराज और व्यवस्था की तो हिरासत बढ़ गई।
तिवारी बाबा के समर्थकों को नहीं सूझ रहा है कि वह क्या करें देवी की भक्ति मनायें कि नेता जी के पकड़े जाने का शोक। उधर विपक्ष ने चंदा उगाही समिति की प्रिय नेता को ‘माफिया क्वीनज् कह डाला।
सेवक सुटुकुन जनता के बीच जाकर प्राप्त आदेश को प्रसारित कर रहा है कि, देवी दहाड़ रही है। मैं माया हूं मुङो पैसा चढ़ाओ, आर्थिक मंदी ने मेरी भूख और बढ़ा दी है। कार्यकर्ताओं को अपील जारी है। साथ में यह धमकी भी कि अगर इस बार हमारा जन्मदिन नहीं मनाया गया तो अगली बार पैसा भी लूंगी और टिकट भी नहीं दूंगीं। लखनऊ में उनकी मूर्ति में बना पर्स भी यही संकेत कर रहा है। आप लोग इशारों को समझें और राज को राज..
इस पर सभी कार्यकर्ता सकते में हैं लेकिन चिरकुट चतुर्वेदी ने जोर देकर कहा, हम औरैया के लोग गौरैया मार दें तो भी शोर होता है लेकिन दूसरे राज्य के लोग चाहे कुछ भी करें लेकिन चूं तक नहीं होती। ये तो लोकतंत्र में जबरदस्ती है भाई। हमारी बहन जी का अपमान है। हम सभी भाई इसके खिलाफ आन्दोलन करेंगे।
विचारक सुबुद्धि शास्त्री जी ने कहा आपकी बहन जी ने न जाने कितने भाई पाल रखे हैं जो आए दिन किसी न किसी को टपकाते ही रहते हैं। प्रदेश में हाहाकार मची है, अब तो सरकारी महकमें में लोगों को सांप सूंघ गया है। लोग अपने बेटे को डाक्टर, इंजीनियर बनाने के बारे में एक बार सोचेगें कि देवी का शेर आकर चढ़ावा न मांगने लगे। यह देवी साम, दाम, दंड, भेद जसी कलाओं में निपुण है इसकी लीला भी अपरंपार है। सहीराम ने कहा यह माया की देवी है ।

Friday, December 26, 2008

कला फिल्मों पर बाजार का दबाव

कला फिल्मों पर बाजार का दबाव
फिल्म अभिव्यक्ति की वह विधा है जो वर्तमान समय में शायद सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रभावी है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से इक्सवीं सदी के पूर्वार्ध के बीच भारत ही नहीं विश्व सिनेमा ने एक पूरे सौ साल का सुनहरा दौर देखा है। मूक फिल्मों से लेकर वाचाल फिल्मों की लम्बी यात्रा तय की है। उन मानवीय संवेदनाओं को छुआ है जो मार्मिक ही नहीं जीवंत भी हैं। आलमआरा से बोलती फिल्मों की जो शुरूआत हुई वह आज चिल्ला रही है लेकिन वह चीख किसी संवेदना कि नहीं बल्कि उपभोक्तावाद की है। शायद इसी तरह के किसी वाद ने फिल्मों को दो भागों में बांट दिया, कला फिल्में और व्यावसायिक फिल्में। इसी के साथ फिल्म निर्माण की कला भी बाजार देखकर उभरने लगी। और आज विश्व में सबसे अधिक फिल्में हमारे देश में बनाए जाने लगी हैं। लेकिन वहीं एक प्रश्नचिह्न भी खड़ा हो गया कि जो फिल्में बन रही है क्या वह समाज के लिए सार्थक सिनेमा कि उपज मानी जा सकती हैं? प्राय: निर्माता निर्देशकों के बीच यह बहस का मुद्दा रहा है कि सार्थक सिनेमा क्या है? इस पर आज भी एक राय नहीं है। लेकिन कुछ फिल्में ऐसी हैं जो समाज की कसक, पीड़ा, संवेदना और कुंठा को पर्दे पर लाती हैं और दर्शक उसे देखते ही उससे आत्मसात् कर लेता है। इस तरह की फिल्में अधिकतर कला फिल्मों के दायरे में आती हैं। लेकिन वर्तमान में कला फिल्मों का निर्माण करने से निर्देशक कतरा रहे हैं या कला फिल्में बनाने वाले निर्देशक अब व्यावसायिक फिल्मों की ओर रुख करनें लगे हैं।
जब कला फिल्मों की बात आती है तो सत्यजीत रे का नाम पहले लिया जाता है। ‘पाथेर पांचालीज् को देखकर कौन प्रभावित नहीं हुआ है उसे आज भी एक कालजयी कला फिल्म का दर्जा प्राप्त है। इसी तरह विमल दा कि ‘दो आंखे बारह हाथज् हो या ‘दो बीघा जमीनज् या फिर ‘बंदिनीज् इन फिल्मों में कला फिल्मों का संपूर्ण समन्वय देखने को मिल जाएगा। यही कला गुरूदत्त की फिल्मों में भी देखने को मिल जाती है। इसके बाद तो कला फिल्मों कि एक लम्बी श्रृंखला है जो उस दौर में बहुत प्रभावी तो नहीं रही लेकिन हां उसने अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज करा दी। षिकेश मुखर्जी, श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, महेश भट्ट या फिर प्रकाश झा ऐसे निर्देशक आए जिन्होंने कला फिल्मों से ही अपनी शुरुआत की लेकिन समय के साथ साथ उन पर बाजार का बुखार चढ़ने लगा और देखते ही देखते वह भूमंडलीकरण के दबाव को ङोल नहीं सके।
गोविंद निहलानी ने जिस शिद्दत से आक्रोश, अर्धसत्य, गांधी या दृष्टि बनाई थी उसके बाद देव जसी कमार्शियल फिल्म का निर्माण इन फिल्मों से कमाई न होने की परिणति ही है। यही नहीं महेश भट्ट जिनकी शुरुआत ही कला फिल्म सारांश और अर्थ से हुई वह जल्द ही बाजार की समझ जान गए और आशिकी, क्रिमिनल, नाम, दिल है कि मानता नहीं जसी फिल्मों के निर्माण की फैक्ट्री ही खोल ली, जिसमें साल में कई फिल्मों का निर्माण होता है। कुछ इस तरह की बात प्रकाश झा के बारे में भी कही जा सकती है जिन्होनें दामुल, मृत्युदंड, परिणति जसी कला फिल्में तो दीं लेकिन स्पष्ट तौर पर स्वीकार किया कि अब बिना पैसों के काम नहीं चलेगा और अपहरण, गंगाजल जसी फिल्मों का निर्माण किया, परन्तु श्याम बेनेगल ने जिस लगन से अंकुर, निशांत, मंथन, कलयुग या सरदारी बेगम बनाई उसी लगन से मंडी और आरोहण भी बनाया। लेकिन इक्कीसवीं सदी में हरी-भरी और जुबैदा शायद उस अनुरूप नहीं बन पाई।
आज यदि देखा जाए तो कला फिल्मों का निर्माण अब मॉस को ध्यान में रखकर किया जा रहा है न कि क्लास को। क्योंकि फिल्म का निर्माण महज एक जुनून नहीं रह गया है बल्कि यह एक विशुद्ध लाभ का व्यवसाय बन गया है जिसमें कोई निर्माता घाटा सहना नहीं चाहता। इसीलिए इन फिल्मों के प्रमोशन में भी कोई कमी नहीं की जा रही है। आज के निर्माता निर्देशक कला और कमर्शियल फिल्मों में कोई अंतर भी नहीं मानते हैं। उनका मानना है कि जो फिल्में बिजनेस दें वो कमर्शियल फि ल्म हैं, फिर चाहे वो किसी गंभीर विषय पर ही क्यूं न बनी हों। चांदनी बार को ही ले लीजिए। यह परिभाषा बाजार ने दी है। फिर भी आजकल निर्देशकों की एक नई पीढ़ी आई है जिसमें सुधीर मिश्र नें चमेली, हजारों ख्वाहिशें ऐसी, मैं जिंदा हूं या ये वो मंजिल नहीं जसी फिल्में दी। जो एक नई पीढ़ी की शुरुआत मानी गई। इसी तरह अनुराग बसु की फिल्में हैं जो केवल अलग पृष्ठभूमि पर ही नहीं बनी बल्कि एक सामाजिक संक्रमण को बखूबी दर्शाती हैं। इसी तरह रितुपर्णो घोष की चोखेर बाली, रेनकोट या तितली सामाजिक संरचना और मानवीय स्वभाव की अभिव्यक्ति को जिस तरह उद्घाटित किया है, उससे फिल्म जगत में एक नई संभावना देखने को मिली है। कुछ इसी तरह की उम्मीद मधुर भंडारकर से भी जागी है, जब उन्होंने चांदनी बार, पेज थ्री और सत्ता जसी फिल्में समाज और राजनीति के नए समीकरणों परिभाषित किया। नागेश कुकनूर ने जिस बारीकी से डोर का निर्माण किया है उसमे महिला सशक्तीकरण की छाप दिखाई देती है।
सवाल यह है कि ये प्रतिभाशाली निर्देशक अब लीक से हट कर फिल्में तो बना रहे हैं, लेकिन क्या वो बाजार के दबाव का मुकाबला कर पाएंगे? प्रश्न यह उठता है कि जब बाजार कला को नियंत्रित करेगा, तो क्या अभिव्यक्ति का वह रूप सामने आ पाएगा जो दर्शकों के मनोभावों तक पहुंच पाए या उनकी संवेदनाओं को झकझोर दे। या फिर कला फिल्म कही जाने वाली फिल्में भी बाजार के दबाव में मसाले की चाशनी में लग कर आएंगी।
अभिनव उपाध्याय

कैनवस पर आस्था


‘कैनवस पर आस्था
अभिव्यक्ति के अनेक माध्यम है लेकिन जब तूलिका अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है तो कैनवस पर उभरी आकृति कलाकार की मनोवृत्ति स्वयं स्पष्ट कर देती हैं।
डा. निशा जायसवाल एक ऐसी ही कलाकार हैं। जिनकी अभिव्यक्ति का माध्यम तूलिका है और उससे चित्र बनाना एक साधना।
यूं तो वह दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की प्रवक्ता हैं लेकिन कला के प्रति उनका समर्पण देखते ही बनता है। 32 वर्ष से अध्ययन और अध्यापन से समय निकालकर कला की जो साधना वह करती हैं, वह जब लोगों के सामने आई तो कला के पारखियों ने इनकी कृतियों को उत्कृष्ट कृतियों का दर्जा दिया।
दिल्ली के इंडिया हेबिटेट सेंटर में आयोजित इनकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी में आए सोमनाथ चटर्जी, उस्ताद अमजद अली खां, नामवर सिंह, नफीसा अली जसे कद्रदानों ने उनकी कृतियों को देखकर काफी सराहना की। अपनी पेंटिंग्स की पहली प्रदर्शनी पर इस तरह की प्रतिक्रिया को लेकर उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। उनका कहना है कि ‘यह मेरे चित्रों की पहली प्रदर्शनी थी और लोग इसे इतना पसंद करेंगे, मुङो ऐसी उम्मीद नहीं
कला की यह यात्रा कबसे शुरू हुई? पूछने पर वह बताती हैं कि ‘मैं मूलत: पूर्वी उत्तर प्रदेश में पड़रौना के मारवाड़ी परिवार से हूं। इस परिवार की लड़कियां बहुत खूबसूरत मेंहदी अपने हथेलियों पर सजाती थीं। एक दिन उन्होंने भी झाड़ से एक सींक खींचकर अपनी हथेली को मेंहदी से सजा लिया। यह एक छोटा सा प्रयास था लेकिन जिसने भी इसे देखा उसने काफी सराहना की। यहीं से कला के प्रति प्रतिबद्धता जागी और इसके बाद बारीक आकृतियों और रेखाओं को कैनवस पर उतारने लगी। 16 वर्ष की आयु से शुरू कला की यात्रा यह अविराम जारी है।ज्
वह बताती हैं कि ग्रेजुएशन से पहले तो वह कवि बिहारी की नायिकाओं, खजुराहो की मूर्तियों, मयूर पक्षी और सौंदर्य प्रधान अनुकृतियों को अपनी रचना का केंद्र बनाती रही लेकिन ग्रेजुएशन के बाद देवी-देवताओं और मयूर पक्षी पर ही अपनी कला को केंद्रित किया। यह पूछे जाने पर कि आपने देवी-देवताओं और मयूर पर ही अपनी अनुकृतियां क्यों केंद्रित की? उनका कहना है कि ‘ईश्वर में अटूट आस्था के कारण हमने देवी-देवता को चुना। जब मैं ईश्वर की कृतियों को बनाती हूं तो ऐसा लगता है कि ईश्वर स्वयं अपने को बना रहा है। मेरा हाथ तो केवल माध्यम है। मोर पंक्षी के बारे में वह बताती हैं कि, वह उमंग का द्योतक है। वर्तमान समय में भागती-दौड़ती जिंदगी में आदमी के पास बहुत तनाव है। लेकिन एक मोर मदमस्त अपनी धुन में नाचता है और उसे देखकर मन खुश हो जाता है।ज्
डा. निशा की पेंटिंग्स में राजस्थानी लोक कला, विभिन्न देवी-देवताओं के चित्र, ड्रेगन आदि के चित्र भी मोर की पेंटिंग्स में दिख जाते हैं। इसी तरह उनके ‘सूरजज् की कृति में उससे संबंधित बादल, घोड़े आदि उससे संबंधित कई चित्र दिख जाते हैं। डा. निशा ने श्रीनाथ, लक्ष्मी-गणेश और मयूर समेत कुल 19 कृतियां बना चुकी हैं।
लगभग 25 वर्षो में मात्र 19 कृतियां ही बनाए जाने पर उन्होंने बताया कि ‘इस तरह की कृतियां बनाना एक कठिन कार्य है और मैं पेशे से प्रवक्ता हूं इसलिए चित्रकारी के लिए पूरे वर्ष में मुङो मुश्किल से एक से डेढ़ महीने ही मिलते है। गर्मी की छुट्टियों में जब में पड़रौना जाती हूं तभी ये संभव हो पाता है। इसके लिए प्रतिदिन एक बार छ: से सात घंटे तक काम करती हूं। फिर भी कभी-कभी किसी चित्र को पूरा करने में दो से तीन गर्मी की छुट्टियां निकल जाती हैं।
वह बताती हैं, ‘दरअसल चित्रकारी मेरे लिए एक साधना है, एक तपस्या है, एक श्रद्धा है। कभी-कभी लगता है कि ये तनाव मुङो परोक्ष रूप से ऊर्जा देता है। जिसके फलस्वरूप एक सुंदर कृति का सृजन होता है।ज् डा. निशा के चित्र देखने के बाद लगता है कि यह आपसे संवाद करते हैं। यूं तो इन चित्रों की एक नई शैली है लेकिन इस पर लोक कला, तिब्बत की थंकाव व मधुबनी चित्रकारी का प्रभाव देखा जा सकता है। वह बताती है कि ‘मैं यामिनी राय के स्क्रेच से काफी प्रभावित हूं।ज्
इन चित्रों को किस तरह बनाती हैं? पूछने पर वह बताती हैं कि देवी-देवताओं को मैं ब्लैक एंड व्हाइट में बनाती हूं। जिसके लिए मैं ग्राफ पेन का इस्तेमाल करती हूं और मोर के लिए जल रंगों व दो नंबर के ब्रश का सहारा लेती हूं। चित्र चाहे ब्लैक एण्ड व्हाइट हो या रंगीन, दोनों को बनाना एक कठिन साधना जसा है क्योंकि कोई भी लाइन खींचने से पहले मैं सांस रोक लेती हूं, क्योंकि एक गहरी या सामान्य सी सांस भी सारी मेहनत पर पानी फेर सकती है। रंगीन चित्र बनाते समय ब्रश को चूसकर उसे नुकीला बना लेती हूं और फिर उस पर रंग लगाती हूं।ज् अपनी कृतियों के बारे में वह बताती हैं कि ‘मैंने कभी नहीं चाहा कि मेरी कृति केवल बुद्धिजीवी वर्ग की आलोचना तक सीमित रहे। शायद इसीलिए मुङो अमूर्त कला ने कभी आकर्षित नहीं किया। मेरे जीवन से जुड़ा हर व्यक्ति मेरा गुरु है। मेरा प्रशिक्षक है और मेरा समीक्षक है। इन्हीं की प्रतिक्रियाओं ने मुङो अपनी शैली को विकसित करने में सहयोग दिया है। वह कहती हैं कि मैं इस कला को घर-घर तक पहुंचाना चाहती हूं।ज्
-अभिनव उपाध्याय

Saturday, December 20, 2008

यह एफ एम ढेंचू है

यह एफ एम ढेंचू है
सहीराम के पड़ोसी गर्दभानन्द विद्वान होने के साथ- साथ समसामयिक विषयों पर चिंतन भी करते हैं। नाम को लेकर पाठक भ्रम न पालें क्योंकि जब वह बचपन में रोते थे तो गधा देखकर ही चुप होते थे। स्कूल में अध्यापक भी उन्हे प्यार से गधा ही कहते थे। उनका प्रिय पशु गधा ही था। इसलिए मां-बाप ने उनका नाम गर्दभानन्द ही रख दिया।
बहरहाल, आर्थिक मंदी ने न केवल उन्हे नौकरी से निकाला बल्कि उनके विचारों के सेन्सेक्स को भी रसातल में धकेल दिया। अब उनकी बातें सुनने वाला कोई नहीं था। उनकी कुंठा तब और बढ़ गई जब बुश को जूता लगा और वह अपनी भड़ास निकालने के लिए लोगों को खोज रहे थे लेकिन निराशा ही हाथ लगी। किसी सज्जन ने उनकी समस्या को देखकर एक उपाय बताया कि भाई गर्दभानन्द जी, मेरी मानिए तो एक एफएम चैनल खोल लीजिए। इसके कई फायदे हैं, पहला तो यह कि लोगों तक आपकी बात बहुत आसानी से पहुंच जाएगी, दूसरा लोगों का मनोरंजन होगा और तीसरा लोग आपको जानने लगेगें लाभ कि चिंता मत कीजिएगा क्योंकि चुनाव में ही सारा लागत निकल आएगी। गर्दभानंद को बात जंच गई लेकिन इस आर्थिक मंदी के दौर में यह काम इतना आसान नहीं था। किसी ने पुरानी यारी निभाई और पैसा लगा दिया। समस्या इसके नामकरण को लेकर आई। मित्र चौकड़ी राम ने समस्या का हल बता दिया, क्यों न इसका नाम ‘कुकड़ू कूज् रखा जाय। लेकिन गर्दभानंद अड़ गए उन्होंने कहा चौकड़ी वह दिन भूल गए जब तुम्हे क्लास में मुर्गा बनाया जाता था तो मैं जिद करके तुम्हे गधा बनवाता था मेरी पसंद को तुम जानते हो फिर भी..। चौकड़ी ने इस बार दूसरा नाम सुझाया ‘ढेंचूज् और यह नाम गर्दभानन्द को जंच गया। लेकिन लोग क्या कहेगें यह बात उन्हे सता रही थी चौकड़ी ने उन्हे फिर समझाया देखो जब एफएम चैनल का नाम सिटी,टाउन, मिर्ची, टमाटर, रेड, ब्ल्यू यही नहीं बिल्ली की आवाज म्याऊं हो सकता है तो ढेंचू क्यों नहीं हो सकता।
अब चैनल के उद्घाटन में सारे शहर के गधे बुलाए गए उन्होनें सस्वर गान किया और नारियल फोड़कर चैनल शुरू हो गया। उद्घोषक गर्दभानन्द ही थे उन्होनें धीरे-धीरे चैनल की बारीकियां सीखीं और अब एक दम पक्के हो गए। उन्होनें हर गाने के बार एक विज्ञापन और मैसेज करने के लिए श्रोताओं को उकसाने लगे।
उनके एफएम की बानगी देखिए, ‘यह एफएम ढेंचू है, अपने दिल की बात हमारे ढेंचू के साथ। हमारे सवालों के जवाब ढेंचू स्पेस 420 पर मैसेज करके इनाम पाएं।ज् सवाल सीधा सा है, बुश के ऊपर कितने जूते चलाए गए? इनाम है अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रेस कांफ्रे न्स में जाने का सुनहरा मौका। पिंटू पढ़वइया ने फटाफट मोबाइल उठाकर पांच मैसेज किए लेकिन इनाम की घोषणा नहीं हुई। अलबत्ता उद्घोषक ने फोन करके उनसे पूछ जरूर लिया कि आप करते क्या हैं? उन्होंने कहा साइंस का विद्यार्थी हूं? अब आपके लिए आखिरी आसान सवाल, जो जूते बुश को मारे गए थे उसका द्रव्यमान और वेग क्या था? पिंटू ने लाख कोशिश की लेकिन नहीं बता पाए और गर्दभानन्द ने ढेंचू-ढेंचू बोलते हुए गाना चला दिया।
अभिनव उपाध्याय

Thursday, December 4, 2008

artical- सारा खेल टीआरपी का है

सारा खेल टीआरपी का है
चमचमाता स्टेज, शोर करते दर्शक, रंग-बिरंगे कपड़ों में प्रतियोगी, कभी गंभीर तो कभी नाजुक अंदाज में दिखते जज और सर्वगुण सम्पन्न एंकर। आमतौर से यही होता है एक रियलिटी शो में। नाज, अंदाज और नाटक से लबरेज ये रियलिटी शो वास्तव में कितने रियल है, वर्तमान में इसके ऊपर प्रश्नचिह्न लगाए जा रहे हैं। और प्रश्नचिह्न् भी क्यों न लगाए जाएं, क्या शो को हिट करने का एकमात्र साधन विवाद ही है? और विवाद को दर्शाने का माध्यम भी ऐसा कि जसे मंच पर दो प्रतियोगी नहीं, बल्कि दो महारथी युद्ध करने आ रहे हैं। कार्यक्रम के प्रायोजक एक ऐसा रोमांच पैदा करने की कोशिश करते हैं जिसको दर्शक दिल से ले बैठते हैं और फिर वही होता है जो चैनल वाले चाहते हैं। मतलब उनके कार्यक्रम की टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) में इजाफा और दर्शक प्राय: इस भ्रामक रोमांच को देखने के लिए कार्यक्रम की टीआरपी में इजाफा करते हैं।
आजकल लोकप्रिय बनने के एक नए तरीके इन कार्यक्रमों में देखे जा सकते हैं। इसके जज प्रतियोगी को पीट भी सकते हैं। अभी हाल ही में नाइन एक्स चैनल पर एकता कपूर का कार्यक्रम कौन जीतेगा बालीवुड का टिकट का कार्यक्रम चल रहा था। कार्यक्रम बस चल ही रहा था कि उसकी टीआरपी अचानक बढ़ गई वजह वही पुरानी कार्यक्रम में जज की भूमिका निभाने वाले चेतन हंसराज ने एक लड़के को पीट दिया। इसी तरह का एक और रोमांच एक बंगाली टीवी चैनल के रियलिटी शो में हुआ। यह मामला कोलकता की 16 वर्षीय दसवीं की छात्रा शिंजिनी सेनगुप्ता का था। उसे जज ने डांट लगाई और उसकी हालत बिगड़ गई। यह मामला पूरे देश में चैनलों के लिए हॉट न्यूज बन गया।
सवाल यह भी है कि प्रतियोगी को किस बात की सजा दी जा रही है? उनकी यह हालत सिर्फ इसलिए हो रही है कि वे प्रतियोगिता का हिस्सा हैं या नीरसता भरा कार्यक्र म इस तरह के ट्विस्ट से मसालेदार हो जाएगा।
इस चकाचक रियल्टी शो के जजों ने आपसी भिड़ंत क रके भी ऐसे कार्यक्रमों की टीआरपी बढ़ाई हैं। अधिक पीछे जाने की जरूरत नहीं है, 2007 में सा रे गा मा पा के रियल्टी शो में संगीतकार अनु मलिक और गायिका आलिशा चिनॉय के बीच ऐसी ही नोंकझोंक हुई थी वजह आलिशा के पसंदीदा प्रतियोगी को बाहर कर दिया गया था। वॉयस ऑफ इंडिया में बखेड़ा खड़ा करने के उस्ताद हिमेश रेशमिया ने अपने बड़बोलेपन से कार्यक्रम की टीआरपी बरकरार रखी। इसी तरह ललित सेन और गायक अभिजित के वाकयुद्ध ने कार्यक्रम का मसाला बरकार रखा।
इसके अलावा भी ऐसे कार्यक्रमों में रोचकता पैदा करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। सुस्ती से चल रहे कार्यक्रम में यह दिखाया जाता है कि प्रतियोगी को अपने ही बीच की किसी प्रतियोगी से प्रेम हो जाता है या मंच पर प्रतियोगी अपनी साथी महिला प्रतियोगी को प्रपोज कर देता है, इसे और हॉट बनाने के लिए वह किस भी ले सकता है। इस बात में कितनी रियलिटी होती है यह तो पता नहीं, लेकिन कार्यक्रम का एंकर इसे इस अंदाज में प्रस्तुत करता है जसे यह कार्यक्रम का आवश्यक अंग हो।
आजकल छोटे-बड़े सभी चैनल इस तरह के रियलिटी शोज को बढ़ावा दे रहे हैं। झलक दिखला जा, उस्तादों के उस्ताद, छोटे उस्ताद, लिटिल चैंप इत्यादि। यही नहीं अब कार्यक्रम मे रोमांच से भरने के लिए अक्षय कुमार जसे फि ल्म स्टार भी खतरों के खिलाड़ी कर रहे हैं। अगर इन रियलिटी शो को गौर से देखा जाए तो इनमें आने वाले जज भी लगभग वही होते हैं जो पहले के कार्यक्रमों में आए हुए होते हैं। कुछ संगीत गुरुओं के नाम इस प्रकार हैं- इस्माइल दरबार, आदेश श्रीवास्तव, ललित सेन, विशाल- शेखर, प्रीतम आदि लेकिन सबकी महागुरू आशा भोंसले।
इसके पीछे भी मामला टीआरपी का है। ऐसा लगता है कि जो गुरु जितना अधिक विवाद खड़ा करेगा उसे उतनी ही बार जज बनाया जाएगा। और जब दो महारथी संगीत के विश्व युद्ध में लड़ेंगे तो लोग देखेंगे ही।
पर्दे के पीछे की दुनिया भी वास्तविक दुनिया में चमक ला सकती है। बिग बॉस ने शिल्पा शेट्टी खास सेलेब्रेटी बना दिया। लेकिन सबकी किस्मत शिल्पा जसी नहीं है। इंडियन आइडल अभिजीत सावंत फिर किसी स्टार के रूप में नहीं दिखे। अमूमन यही हाल बाद के स्टार प्रतियोगियों का भी रहा।
अब रियलिटी शो का मतलब वाक् युद्ध, प्रतियोगियों की मोहब्बत, तिजारत, रूठना, मनाना, इश्क, मुश्क, गुरुओं का किसी प्रतियोगी पर अपार स्नेह, अनावश्यक टीका टिप्पणी। लेकिन सबकुछ प्रायोजित। चटकारा। एकदम मसालेदार। और जब इतना कुछ एक कार्यक्रम में मिलेगा तो दर्शक निहारेगा ही।
अभिनव उपाध्याय

विनाश काले विपरीत बुद्धि


विनाश काले विपरीत बुद्धि
हे लक्ष्मी मइया पधारो मेरे धाम, स्वागत है। हम आपका अपमान कतई नहीं करेंगे। बुरा हो सांसदों का आपको सबके सामने उछालते हैं और कहते हैं कि आपसे उनका कोई वास्ता नहीं है। जसे जीते लकड़ी मरते लकड़ी जरूरी है उसी तरह बिन लक्ष्मी सब सून। सुन ले माई सुन ले चवन्नी की अरज सुन ले। सहीराम गुजर रहे थे कि देखा चौधरी चवन्नी अगरबत्ती जलाकर लक्ष्मी जी की पूजा कर रहे थे। गौरतलब है कि चौधरी चवन्नी यूं तो बेइमान पार्टी के नेता हैं लेकिन राजनीति की आर्थिक दृष्टि से समीक्षा करने के लिए जाने जाते हैं।
सहीराम पूछ बैठे, चवन्नी जी सुना है सांसदों ने सरकार के पक्ष में वोट देने के लिए पैसा लिया था? चवन्नी जी मंद मुस्कान और तिरछी तकान से बोले- सहीराम जी, रह गए ना सीधे के सीधे। अरे संसद तक पहुंचने के लिए कम पापड़ बेलने पड़ते हैं और रोज-रोज थोड़े ही बिल्ली के भाग्य से छींका टूटता है। बहती गंगा में हाथ धो लेा भाई फिर ना जाने कब मौका मिलेगा।
हमें तो तरस आता है उन सांसदों पर जिन्होंने माता लक्ष्मी का अपमान किया। वो भी सनसनी फैलाने वाले चैनलों के सामने। मुंह लजाकर रह जाता है और सोचकर बुद्धि भी चकरिया जाती है कि कैसे हैं अपने भाई-बंधु। अब आप ही बताइए नेता की कोई जाति होती है अगर ऐसे होगी बिना मुद्रा के पालिटिक्स तो राजनीति का भाग्य तो रसातल में जाएगा ही। जाने कैसे टिकट पा गए मूरख जपाट। अरे, जब लक्ष्मी मेहरबान थी तो सबके सामने छाती पीटकर बताने की क्या जरूरत थी, चले थे बड़के राजा हश्चिन्द्र बनने। दबा लेते अगल-बगल कौन देख रहा है। और यह संसद है, कोई देख भी लेता तो क्या। संसद ने सबकुछ देखा, ये भी देख लेती। लेकिन नहीं, पार्टी भक्ति चरचराई थी। सरकार रोज-रोज थोड़े ही अल्पमत में आती है लेकिन क्या करें सहीराम जी विनाश काले विपरीत बुद्धि। मैंने तो बड़ी कोशिश की थी कि चुनाव जीत जाऊं लेकिन लटक गया। बस जान जाइए कलेजा कचोट कर रह जाता है ऐसे अवसर देखकर।
इस लम्बे उत्तर के बाद सहीराम ने पूछ लिया, वामपंथियों के बारे में क्या खयाल है? मैं तो उन्हे पूरे सावन भर रात्रिभोज कराऊं। इस अल्पमत वाले ड्रामे के सूत्रधार अपने करात भाई तो थे ईश्वर उनकी सत्ता पक्ष से भी दुश्मनी बरकरार रखें। काश मेरे समय तक भी सरकार एकाध बार अल्पमत में आ जाती तो खुदा कसम जितना पैसा वोट पाने में लगाता उससे कई गुना एक वोट देने में वसूल कर लेता, काश..., कहकर चौधरी चवन्नी रुक गए उनके चेहरे पर संसद तक न पहुंच पाने की निराशा थी। सहीराम अभी कुछ पूछना चाहते कि उन्होंने कहा कि उन्हे अगले चुनाव की तैयारी करनी है और उनके पास जरा भी समय नहीं है।
अभिनव उपाध्याय

एक ही थैले के...

गहमा-गहमी...