Saturday, May 30, 2009

तुर्की ब तुर्की-

यह व्यंग चुनाव के पहले लिखा गया था-

इंटलैक्चुअल गधा

सूरज तप रहा है और पारा चढ़ रहा है, चुनाव का पारा तो लगता है थर्मामीटर तोड़ कर बाहर निकल आएगा। ऐसे में चुनावी परिचर्चा के लिए सहीराम समेत कई लोग नुक्कड़ पर इकट्ठा हुए। सब लोग नेताओं के क्रिया कलाप पर अपनी चर्चा कर रहे थे। एक सज्जन ने कहा कि ऐसा कवि लोग लिखते हैं कि बरसात में विरहन को प्रिय की याद बहुत सताती है और चुनाव जसे-जसे करीब आता है इस मौसम में नेता लोगों का भी विरह जाग जाता है और वोटरों से मिलने की तड़प अपने चरम पर होती है। किसी ने कहा कि लेकिन हम ये कैसे समङों कि सच्चा नेता कौन है और कौन नेता वोट के लिए वास्तविक मेहनत कर रहा है। इस पर बुद्धिराज ने अपनी राय रखी, देखिए नेता कई प्रकार के होते हैं। कु छ दलीय, कुछ निर्दलीय और कुछ दलदलीय। इसलिए सूक्ष्म अध्ययन के बाद मैंने यह जाना कि जब चुनाव के मौसम में लू चल रही हो, गर्म हवा न चाहने पर भी अंदर तक छौंक दे, दूर-दूर तक चील कौवे न दिखे रात्रि के तीसरे पहर में भी जो नेता करबद्ध नीग्रो सुंदरी की तरह दंक्तपंक्तियां चमकाते हुए आपके सामने वोट के लिए याचना करे तो सुधी जन उस पर विचार अवश्य करें।
इस बात पर सबने सहमति जताई। जनपद के विद्वान और वरिष्ठ नेता प्रोफेसर जनहितराम ने अपने चुनाव चिह्न् गधे के साथ तन्मयता से चुनाव प्रचार शुरू किया। धोबी कमालू ने उनके निवेदन पर अपना गधा दो सौ रुपए दिहाड़ी और दाना-पानी पर एक दिन पहले ही बांध दिया। नेता जी जी तोड़ मेहनत करने लगे लेकिन गधा पहले ही दिन खूब दौड़ा- भागा, अपनी डोर खोल दी, खूंटा उखाड़ दिया, घूम फिर कर आता तो नेता जी को भी दुलत्ती लगा देता। सब परेशान कि इसे क्या हो गया है। धोबी कमालू को बुलाया गया जांच पड़ताल के बाद जॉन स्टुवर्ट मिल की पुस्तक ‘ऑन लिबर्टीज् की चबाई गई लुगदी मिली। प्रोफेसर जनहितराम को पता चल गया कि यह उनकी लाइब्रेरी में रात को घुस गया था। किसी तरह नेता जी ने प्रचार किया लोगों का भारी समर्थन भी मिल रहा था लेकिन गधे पर सबकी दृष्टि थी कहीं वह कोई आतंकी पुस्तक न पढ़ ले। कुछ दिन तक तो सब ठीक रहा लेकिन एक दिन गधा उदास था और सुस्त भी, बच्चे उसे छेड़ रहे थे कोई उसके कान में लकड़ी डालता तो कोई नाक में सींक, गधा पूरे दिन कु छ नहीं खाया, झुग्गी के बच्चों को नंगा देख गधा ने भी अपनी पीठ से कपड़ा गिरा दिया। नेता को गधे का रूप समझ में नहीं आ रहा था। तभी एक किताब वाला धोबी से शिकायत करने आया कि उसके गधे ने गांधी जी की सभी पुस्तकें चबा डाली हैं ।
अभिनव उपाध्याय

Tuesday, May 26, 2009

राजनीति है बड़ी बेवफा..

राजनीति है बड़ी बेवफा..
प्यार और हार का बड़ा गहरा संबंध है कब जीतते-जीतते हार जाएं कहा नहीं जा सकता और इसका स्पष्ट कारण भी सीबीआई दौड़ाने पर भी पता नहीं चलता। जनता से बेइंतहा प्यार करने वाले और अपनी विश्वसनीय जीत की इच्छा पाले नेता प्यारेलाल परिणाम आने के बाद दुखी हैं और अपने समर्थकों से बता रहे रहे हैं कि सच राजनीति बहुत बेवफा टाइप है, और हार के बाद आंसू बेपरवाह निकल रहे हैं। इसके लिए क्या-क्या नहीं किया, बाबूजी से झूठ बोलकर रात-रात भर जागकर जनता के बीच प्रचार करने गया। कई दिनों तक सक्रिय राजनीति में आने के लिए घर का गेंहू चावल तक बेंच दिया, बर्तन बेंचने की कोशिश कर रहा था लेकिन वो तो बेगम ने बेलन उठा लिया। पुज्य पिता जी इसी शोक से चल बसे और अब इस सक्रियता का ये सिला मिलेगा सोचा भी नहीं था।
चुनाव के आश्चर्यजनक परिणाम आने पर नेता जी की चिंता छुपाए नहीं छुपती वो परेशान हैं। उनके सलाहकार सरस जी ने इसका सरल सा उपाय बताया कि आईपीएल को लेकर हो हल्ला था लेकिन सभी टीमों की कमाई हुई जो जीता उसकी बल्ले-बल्ले, जो हारा उसकी भी चांदी चले। इसमें बड़ी भूमिका चियर्स गर्ल ने निभाई क्यों न अब चुनाव प्रचार के लिए भी चियर्स गर्ल को बुलाया जाए। नेता जी भड़क गए उन्होने कहा यह हमारी नैतिकता के खिलाफ है। इस तरह का अब कोई नया सुझाव स्वीकार नहीं किया जाएगा।
नेता जी कोई स्पष्ट निर्णय नहीं ले पा रहे थे तभी कल्लू किसान ने समझाया, नेता जी इस तरह नि राश न हो हमने आपको ही वोट दिया था लेकिन आप हार क्यों गए हमें नहीं पता। हमारे बाबू जी कहते थे रात में जाग कर पढ़ो और सुबह भोर में भी जागका पढ़ो तो शायद हर परीक्षा में जीत पक्की है। इसलिए मेरा भी कहना है कि आप रात में जाकर जनता की नब्ज पढ़ो और फिर सुबह में भी..। नेता जी अब कुत्ते, बिल्ली, गधा, बकरी तक से सलाह ले रहे हैं। नेता जी उन्नत क्वालिटी के सुझाव के इंतजार में हैं लोग तरह-तरह के सुझाव दे रहे हैं कोई कह रहा है पार्टी बदल दें कोई पोशक बदलने की सलाह दे रहा है नेता जी कि बेचैनी बढ़ती जा रही है कि लेफ्ट में जाएं कि राइट में,नार्थ में जाएं कि साउथ में अब तो उनको तरह-तरह के सपने दिन में दिखाई दे रहे हैं। उनकी चिंता बढ़ती जा रही है तभी किसी ने सलाह दी नेता जी अपनी पार्टी बना लीजिए अब आप चुनाव लड़िए नहीं लड़ाइए। उनकी आंखें चमक गई कि हर्रे लगे ने फिटकिरी और माल मिले चोखा।
अभिनव उपाध्याय

राजनीति है बड़ी बेवफा..

राजनीति है बड़ी बेवफा..
प्यार और हार का बड़ा गहरा संबंध है कब जीतते-जीतते हार जाएं कहा नहीं जा सकता और इसका स्पष्ट कारण भी सीबीआई दौड़ाने पर भी पता नहीं चलता। जनता से बेइंतहा प्यार करने वाले और अपनी विश्वसनीय जीत की इच्छा पाले नेता प्यारेलाल परिणाम आने के बाद दुखी हैं और अपने समर्थकों से बता रहे रहे हैं कि सच राजनीति बहुत बेवफा टाइप है, और हार के बाद आंसू बेपरवाह निकल रहे हैं। इसके लिए क्या-क्या नहीं किया, बाबूजी से झूठ बोलकर रात-रात भर जागकर जनता के बीच प्रचार करने गया। कई दिनों तक सक्रिय राजनीति में आने के लिए घर का गेंहू चावल तक बेंच दिया, बर्तन बेंचने की कोशिश कर रहा था लेकिन वो तो बेगम ने बेलन उठा लिया। पुज्य पिता जी इसी शोक से चल बसे और अब इस सक्रियता का ये सिला मिलेगा सोचा भी नहीं था।
चुनाव के आश्चर्यजनक परिणाम आने पर नेता जी की चिंता छुपाए नहीं छुपती वो परेशान हैं। उनके सलाहकार सरस जी ने इसका सरल सा उपाय बताया कि आईपीएल को लेकर हो हल्ला था लेकिन सभी टीमों की कमाई हुई जो जीता उसकी बल्ले-बल्ले, जो हारा उसकी भी चांदी चले। इसमें बड़ी भूमिका चियर्स गर्ल ने निभाई क्यों न अब चुनाव प्रचार के लिए भी चियर्स गर्ल को बुलाया जाए। नेता जी भड़क गए उन्होने कहा यह हमारी नैतिकता के खिलाफ है। इस तरह का अब कोई नया सुझाव स्वीकार नहीं किया जाएगा।
नेता जी कोई स्पष्ट निर्णय नहीं ले पा रहे थे तभी कल्लू किसान ने समझाया, नेता जी इस तरह नि राश न हो हमने आपको ही वोट दिया था लेकिन आप हार क्यों गए हमें नहीं पता। हमारे बाबू जी कहते थे रात में जाग कर पढ़ो और सुबह भोर में भी जागका पढ़ो तो शायद हर परीक्षा में जीत पक्की है। इसलिए मेरा भी कहना है कि आप रात में जाकर जनता की नब्ज पढ़ो और फिर सुबह में भी..। नेता जी अब कुत्ते, बिल्ली, गधा, बकरी तक से सलाह ले रहे हैं। नेता जी उन्नत क्वालिटी के सुझाव के इंतजार में हैं लोग तरह-तरह के सुझाव दे रहे हैं कोई कह रहा है पार्टी बदल दें कोई पोशक बदलने की सलाह दे रहा है नेता जी कि बेचैनी बढ़ती जा रही है कि लेफ्ट में जाएं कि राइट में,नार्थ में जाएं कि साउथ में अब तो उनको तरह-तरह के सपने दिन में दिखाई दे रहे हैं। उनकी चिंता बढ़ती जा रही है तभी किसी ने सलाह दी नेता जी अपनी पार्टी बना लीजिए अब आप चुनाव लड़िए नहीं लड़ाइए। उनकी आंखें चमक गई कि हर्रे लगे ने फिटकिरी और माल मिले चोखा।
अभिनव उपाध्याय

Monday, May 25, 2009

भारत के लोकतंत्र की विजय है 2009 का चुनाव

भारत के लोकतंत्र की विजय है 2009 का चुनाव
लोकसभा चुनाव के बाद आए परिणामों और राजनीति के ऊपर मशहूर पत्रकार और लेखक मार्क टली से साक्षात्कार-
प्रश्न-लोकसभा चुनाव 2009 को आप कैसे देखते हैं?

उत्तर-चुनाव 2009 दरअसल भारतीय लोकतंत्र की जीत है। कांग्रेस बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन फैसला केवल उसके हक में हुआ यह नहीं कह सकते। जिसने काम किया वह जीता। इसी से यह निष्कर्ष निकलता है कि केंद्र सरकार को काम करके दिखाना होगा। जनता ने उसे एक स्थिर सरकार वाली सुविधा भरपूर दी है।
भारत में पंद्रहवीं लोकसभा के आम चुनाव ने दुनिया को दिखा दिया है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और इस बार खास बात रही कि किसी भी दल ने परिणाम पर टीका टिप्पणी न करते हुए अपनी हार स्वीकार की है, जबकि अक्सर देखा गया है कि हार के बाद राजनीतिक पार्टियां इसे पचा नहीं पाती। विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी हार स्वीकार की है। निश्चित तौर पर यह भारत के लोकतंत्र की विजय है।
यह काफी लम्बा चुनाव था जो करीब एक महीने तक चला लेकिन किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के पास खास मुद्दा नहीं था। हम यह भी नहीं कह सकते कि यह जीत स्पष्ट रुप से कांग्रेस की जीत है, क्योंकि हर राज्य में स्थानीय मुद्दे परिणाम के लिए प्रभावी रहे। मिसाल के तौर पर बिहार में नीतीश कुमार का शासन संचालन, महाराष्ट्र में शिवसेना का विभाजन, पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और सिंगूर जसे मुद्दे चुनाव परिणाम को प्रभावी करने वाले कारकों में थे। जिसने विकास किया वह जीता। दिल्ली को ही लें विधान सभा चुनाव हों या लोकसभा चुनाव शीला दीक्षित की छवि विकास करने वाली मुख्यमंत्री की है इसलिए दिल्ली में कांग्रेस की विजय हुई। नीतीश ने भी अच्छी सरकार देने की कोशिश की और इसके अच्छे परिणाम आए। आंध्र प्रदेश में भी राजशेखर रेड्डी ने सुधारात्मक कार्य किए और परिणाम उसके पक्ष में रहे। इसतरह चुनाव परिणाम के लिए कई स्थानीय मुद्दे प्रभावी रहे।
इसमें एक खास बात जो निकल कर सामने आई है वह यह कि जनता ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि जो हमारे लिए काम करे, विकास करे उसको ही चुनाव करेंगे। हांलाकि ऐसा देखा गया है कि प्रदेश में जो सरकार रहती है प्राय: उसका असर लोकसभा चुनावों पर पड़ता है लेकिन ऐसा इस बार नहीं हुआ है। इसमें उत्तर प्रदेश की स्थिति अलग है वहां कांग्रेस ने अपनी सीटें तो बढ़ाई हैं लेकिन मतों का प्रतिशत बहुजन समाज पार्टी के पास अधिक है।

प्रश्न- क्या सरकार के कार्यकाल को लेकर कोई संदेह है?

उत्तर- इस बार कांग्रेस के पास अधिक सीटों को देखकर लगता है कि यह स्थायी सरकार होगी। इसमें अस्थिरता नहीं होगी। कांग्रेस ने इस बार तालमेल बनाने के लिए कोई सिफारिश नहीं की क्योंकि अगर एक पार्टी नहीं साथ देगी तो दूसरी दे देगी और पार्टियां तैयार भी हैं। एक बात और इस बार वामपंथी दल भी नहीं हैं जो बाहर से समर्थन दे रहे हैं या टांग खींच रहे हैं, इसलिए इस बार एक सुदृढ़ सरकार की उम्मीद है।

प्रश्न- जिस तरह क्षेत्रीय पार्टियों को सीटें नहीं मिली हैं क्या ऐसा लगता है कि एक उफान के बाद इनका हस हो रहा है?
उत्तर- क्षेत्रीय पार्टियों की कम सीटें आने पर कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि क्षेत्रीय पार्टियों का भविष्य खतरे में है लेकिन मेरा मानना है कि यह अभी कहना जल्दीबाजी होगी। क्योंकि उत्तर प्रदेश की तरह ही उड़ीसा और तमिलनाडु में भी क्षेत्रीय पार्टियों क ो सीट नहीं मिली हैं लेकिन वोट मिला है।

प्रश्न- इस चुनाव परिणाम को देखते हुए भाजपा के बारे में आप क्या कहेंगे ?

उत्तर- इस समीकरण को देखते हुए लगता है कि सबसे अधिक दिक्कत भारतीय जनता पार्टी के लिए है। भारतीय जनता पार्टी में कुशल नेतृत्व का अभाव है। इसकी विचारधारा में भी विभाजन है। भारतीय जनता पार्टी का एक दल तो विकास चाहता है जबकि दूसरा दल कट्टर हिंदुत्व की बात करता है। इससे भाजपा को खतरा है। कोई भी दल एक साथ दो घोड़ों की सवारी नहीं कर सकता या दो राष्ट्र पर नहीं चल सकता। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी भाजपा को मोदी और वरुण गांधी की लाइन में लाना चाहता है।

प्रश्न- इस सरकार की क्या-क्या चुनौतियां हो सकती हैं?

उत्तर- वर्तमान सरकार की चुनौतियों का जहां तक सवाल है सरकार को शासन प्रणाली में सुधार लाना आवश्यक है। इससे भ्रष्टाचार कम होगा। सरकार जो पैसा विकास पर खर्च करनी चाहती है वह विकास पर ही खर्च हो तब ही विकास होगा। सरकार मूलभूत सुविधाओं के निर्माण में पैसा खर्च करे। चीन में विकास कार्य तेजी से हो रहा है लेकिन भारत में यह दर धीमी है। सरकार पैसा भी लगाती है तो इसे अधिकतर बिचौलिए खा जाते हैं। भाजपा के शासन में सड़क परियोजना जितनी तेजी से चली उसका वह विकास दर कांग्रेस के शासन में नहीं रहा। सरकार को इस पर ध्यान देना होगा।

प्रश्न- भारत का अपने पड़ोसी देशों के संबंधों के बारे में आपका क्या मानना है?

उत्तर- भारत के सार्क देशों से संबंध का मामला भी महत्वपूर्ण है, भारत पड़ोस के देशों के साथ दखलंदाजी नहींे कर सकता क्योंकि वे उसके खिलाफ हो जाएगें। हालांकि श्रीलंका के विकास के लिए भारत कुछ आर्थिक मदद कर सकता है या सुझाव दे सकता है। भारत की पाकिस्तान से बातचीत जारी होनी चाहिए। भारत को यह सोचना भी चाहिए कि पाकिस्तान मुसीबत में फंस गया है। तालिबानियों का बढ़ना भारत के हित में नहीं है। किसी भी हाल में पाकिस्तान का नुकसान भारत के हित में नहीं हो सकता। वर्तमान में दक्षिण एशिया में शांति और सहयोग की आवश्यकता है।

Wednesday, May 6, 2009

तीन कविताएं

छांव

दोपहर की धूप में जब सूख जाता है गला
और चटकने लगता है तलवा
तब बहुत महसूस होती है
छांव तुम्हारे आंचल की।

मेरी...
एक फंतासी ताउम्र की
जब-जब आए सावन,
या जब रंग बिखेरे मौसम,
या छा जाए बसंत की मदमाती खुशबू,
या दिख जाए कोई जोड़ा, हंसता- खिलखिलाता
या जब पोंछता हूं माथे का पसीना
तब याद आ ही जाते हो अक्सर, जिसे लोग कहते थे
मेरी..।



दोस्त-

हां वह यही कहती थी,
जब खुश होती थी
और चहक कर पकड़ा देती थी
चाकलेट का डिब्बा,
या फिर मायूसी में रख देती थी
हथेली पर अपना माथा
और फिर गर्म आंसुओं से भीगती थी अंगुलियां देर तक,
अक्सर चाय का बिल चुकाने की जिद में
वह कर देती थी झगड़ा,
और कुछ देर बाद वह यही कहती कि वह दोस्त है मेरी।
आज भी जब कांच की गिलास सेंकती है हाथ,
वह मिल ही जाती है चाय की चुस्की में,
होंठो पर चिपकती मिठास लिए।

Saturday, May 2, 2009

नेता की फिसलन

नेता की फिसलन
लोग अक्सर पानी कीचड़ या केले के छिलके पर फिसलते हैं लेकिन नेता लोगों की फिसलन में मौसम, कीचड़ या कोई फल कारक नहीं होता इनके लिए तो बस अवसर की बात है जब मौका मिला पल्टी मार गए।
सहीराम की एक ऐसे ही नेता जुगाड़ीराम से मुलाकात हो गई। उम्र अस्सी पार लेकिन सबसे दहाड़ कर कहते हैं कि वही लोकतंत्र के असली पहरुए हैं। सहीराम ने उनसे पूछा कि इस चुनावी समर में आपकी सक्रियता का क्या कारण है? क्या किसी पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं या बस हो हल्ला है? यह सुनते ही जुगाड़ीराम भड़क उठे। उन्होंने जोर देकर कहा आप बच्चों जसा सवाल न करें। हम पैदाइशी नेता हैं। हमारे पुज्य पिता जी नेताओं की सभाओं में भाषण सुनने के लिए खेत जोतना छोड़ देते थे। सहीराम ने फिर पृूछा, अच्छा किस पार्टी को समर्थन कर रहे हैं? शायद ही कोई पार्टी हो जिसको हमने समर्थन न किया हो, बह्मचर्य में क्रांतिकारी कम्युनिस्ट था, गृहस्थ आश्रम में कांग्रेसी रहा वानप्रस्थ में जाने के बारे में सोच रहा था लेकिन जंगल कट कर मकान बन गए इसलिए भाजपा ज्वाइन कर मंदिर-मंदिर घूमने लगा सच कह रहा हूं खूब जोर-जोर से कह रहा था कि मंदिर वहीं बनाएंगे लेकिन न राम सुने न कल्याण और व्यथित मन ने सन्यास के लिए व्याकुल हो गया अभी सन्यास के बारे में विचार बनाया था कि समाजवादियों ने पकड़ लिया अब उम्र के इस पड़ाव पर भी मैंने मुलायम मन से लोहिया-लालू-लल्लन का जप किया लेकिन क्या पता था ये सब इतना बेदर्दी से धकिया देगें।
मतलब पार्टियों की सेवा कर कर के आप बूढ़े हो गए हैं, बूढ़ा होगा तुम्हारा बाप, अभी तो मैं जवान हूं। जोर देकर जुगाड़ी राम चिल्लाए। अच्छा आपका मुद्दा क्या है किस मुद्दे को लेकर चुनाव लड़ना चाहते हैं? इस पर उन्होंने दुखी मन से कहा सहीराम जी यही तो रोना है मेरे जितने भी मुद्दे थे विपक्षी दलों ने चोरी कर लिया है मैंने तो लोगों को इस चुनाव में जुगाड़ के भरोसे जीवन यापन क रने की शिक्षा देने वाला हूं। ये सारी बातें सुनकर जुम्मन मियां ने जम्हाई लेते हुए कहा कि जुगाड़ीराम जी हमें भी कुछ बताइए महंगाई देखकर तो आंसू भी नहीं सूख चुके हैं उन्होंने छट से बताया अब प्याज का पराठा खाएं आंसू फिर निकल पड़ेगें। पिंटू पढ़वइया ने चुनाव और आईपीएल के समय को लेकर और उसमें नियमित पिता जी की डांट से परेशान होने की बात कही कि ‘सरस्वती का ध्यान करो बेटा पढ़ो नहीं तो लक्ष्मी रूठ जाएगी।ज् इस पर जुगाड़ीराम ने बताया कि सरस्वती की वीणा के तार से उल्लू की टांग बांध दो बिना उल्लू के लक्ष्मी जी किस पर बैठ कर जाएंगी। सहीराम ने जुगाड़ीराम से कहा कि नेता जी ये उपाय तो.., कोई बात नहीं कम से कम हम औरों की तरह सच्चाई से मुंह तो नहीं मोड़ रहे हैं।
अभिनव उपाध्याय

मुस्कान के प्रकार

मुस्कान के प्रकार
कवि बिहारी ने मुस्कान पर बहुत कुछ लिखा है, मुस्कान शायरों की पहली पसंद हुआ करती थी। लेकिन अब मुस्कान के प्रकार बदल रहे हैं। जसे प्रोफेशनल मुस्कान, एजुकेशनल मुस्कान, अनप्रोफेशनल मुस्कान, सम मुस्कान, विषम मुस्कान, स्थाई मुस्कान, अस्थाई मुस्कान आदि आदि। मतलब यह है कि आप अगर कहीं जा रहे हैं तो उस अनुसार आपकी मुस्कान होनी चाहिए। कारपोरेट जगत की मुस्कान तो माशाअल्लाह। शायरों ने मुस्कान को कभी नहीं मापा था लेकिन आजकल मुस्कान सेंटी मीटर, इंच और मिली मीटर में नापी जाती है। डेढ़, ढाई या सवा इंच टाइप मुस्कान पर किताब भी आ चुकी है। मुङो चिंता तब होती है कि कहीं साहित्यकारों के पास मुस्कान मापने का नैनो मीटर टाइप पैमाना न आ जाय, विज्ञान से संभव है नहीं तो कला तो है ही।
जबसे प्रेस कांफ्रेंस में जूता चलना शुरु हुआ है एक नई तरह की मुस्कान हमारे नेताओं के चेहरे पर देखने को मिल रही है। यह भी दो प्रकार की है, जूता चलने से पूर्व की मुस्कान और जूता चलने के बाद की मुस्कान। एक चैनल की एंकर ने मुस्कुराते हुए इन दोनों मुस्कानों के मध्य तुलनात्मक विेषण प्रस्तुत किया, सबने मुस्कुराते हुए उसकी प्रशंसा की लेकिन वह समझ नहीं पा रही थी कि ये किस टाइप की मुस्कान है।
सहीराम के पड़ोसी हंसमुख बाबा के शिष्य दुखहरन मास्टर जब क्लास में बच्चे से पूछते हैं कि ‘पज् से क्या होता है बच्चा जोर से बोलता है काइट और तब मास्टर की मुस्कान देखने लायक होती है।
मंहगाई देखकर एक मध्यम वर्गीय कुत्ते की हंसी पर ग्रहण लग गई लेकिन फिर भी वह पूंजीवादी कुत्ते को देखकर गाली देकर तिक्ष्ण मुस्कान बिखेर देता था थोड़ी देर बाद ढेरों सर्वहारा कुत्ते विभिन्न सुरों में गाली देकर पीछे-पीछे मुस्कुरा शुरू कर दिए।
गांव में जो लोग अधिक हंसते हैं उन्हे प्राय: ‘दंत चियारज् संज्ञा से विभूषित किया जाता है। वह भूखे, प्यासे रह लेगें लेकिन मुस्कुराए बिना नहीं रह सकते। कुछ तो विचित्र तरीके से हंसते हैं अगर जोर से हंस दें तो अट्टहास से आस-पास के पशु पंक्षी ही लापता हो जाए। दंत चियार टाइप एक सज्जन सहीराम के गांव में भी थे जिनकी सार्वजनिक मुस्कुराहट प्रसिद्ध थी। गांव में बाढ़ आए या सूखा, हैजा हो या इंसेफेलाइटिस, बारात निकले या जनाजा वह निम्न, मध्यम या उच्च श्रेणियों में मुस्कुरा ही लेते हैं। लेकिन जब उनके गांव में कोई करबद्ध नेता चुनाव प्रचार करने आता है और उसे वोट डालने का निवेदन करता है तो उसकी हंसी रोके नहीं रुकती।
अभिनव उपाध्याय

Saturday, April 25, 2009

किस्मत और मेहनत ने साथ दिया और शोहरत कायम है

किस्मत और मेहनत ने साथ दिया और शोहरत कायम है


हालीवुड में प्रसिद्धि तब मिली जब ज्वेल आफ क्राउन नाटक में उन्हे प्रिंसेस का रोल मिला। अब इंग्लैंड में लोग इन्हे प्रिंसेस के नाम से जानने लगे। इतनी प्रसिद्धि बटोरने के बाद 26 सितम्बर 1987 को सदा के लिए भारत आ गई। लेकिन यहां पर भी काम करना जारी रखा। दिल्लगी, चलो इश्क लड़ाएं, हम दिल दे चुके सनम, सांवरिया, चीनी कम सहित कई फिल्मों में काम किया।
इनके उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए दिल्ली सरकार ने इन्हे 2008 में ‘सदी की लाडलीज् पुरस्कार से नवाजा।
उनकी उम्र के हिसाब से हफीज जालंधरी की गजल ‘अभी तो मैं जवान हूं उन पर सटीक बैठती है और बड़ी तन्मयता से जोहरा सहगल अपने प्रश्ांसकों के कहने पर इसे सुनाती भी हैं।

Friday, April 24, 2009

जब नेहरु जी ने तोहफा भेजा

जब नेहरु जी ने तोहफा भेजा
हमारी शादी इलाहाबाद में अपने रिश्तेदार के यहां 14 अगस्त 1942 को हुई। उस वक्त पूरे भारत में इमरजेंसी लगी थी क्योंकि भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हो गया था और पं जवाहर लाल नेहरु जी जेल में बंद थे जेल से छूटने के बाद उन्होंने हमारे रिश्तेदार के घर तोहफा फिजवाया। यह हमारे लिए नेहरु जी का प्रेम था। शादी के बाद 1943 में जोहरा सहगल अपने पति कामेश्वर सहगल के साथ लाहौर में स्कूल खोला। लेकिन कुछ दिन बाद भारत आ गई। यहां उन्होने 1945 में पृथ्वीराज थियटर ज्वाइन किया और अब अभिनय में पूरी तरह से रम गई। इनकी बहन नुजरा, पृथ्वीराज कपूर के अधिकरत नाटकों में उनकी पत्नी का किरदार निभाती थी। जोहरा सहगल इप्टा से भी जुड़ी रही 1946-47 में यह उसकी वाइस प्रेसीडेंट भी रही। सन उन्नीस सौ पैंतालिस से साठ के बीच ही जोहरा सहगल ने फिल्मों के लिए भी काम किया। उन्होंने गुरुदत्त की बाजी फिल्म में कोरियोग्राफी की, इसी बीच बलराज साहनी के साथ भी काम किया। दिल्ली के शंकर मार्केट में दिल्ली नाट्य अकादमी भी खोला लेकिन वह उसी तरह बंद भी हो गई।

Thursday, April 23, 2009

प्यार किया तो डरना क्या

प्यार किया तो डरना क्या

जोहरा सहगल में काम के प्रति अद्भुद लगाव है और गजब की ऊर्जा भी है कि 97 साल की उम्र में भी वह अपने कार्य के प्रति सजग और सक्रिय हैं। नृत्य के प्रति उनके लगाव के कारण ही उन्होनें सिमतोला नैनीताल में एक नृत्य अकादमी में उनकी मुलाकात कामेश्वर सहगल से हुई। उम्र में साढ़े आठ साल छोटे होने के बाद भी जोहरा ने उनसे शादी की। इस शादी के बारे में वह बड़ा खुल कर बात करती हैं कि हमारा दो साल तक अफेयर चला। मैं बार-बार कहती थी मैं उम्र में तुमसे बड़ी हूं लेकिन कामेश्वर राजी नहीं थे। उन्हे तो बस जोहरा चाहिए...।
वह बताती हैं कि शादी के बारे में भी बड़ा दिलचस्प वाकया हुआ था, इनके पिता जी शादी के लिए राजी नहीं थे इसके कई कारण थे एक तो वो कट्टर मुश्किल थे और शायद उन्हे इसका दुख भी रहा होगा कि मैं उनकी मर्जी से शादी नहीं कर रही थी लेकिन बाद में वह मान गए लेकि न एक शर्त यह थी कि नैनीताल में नहीं करनी है। हमें ये शर्त मंजूर थी।

Wednesday, April 22, 2009

पृथ्वीराज कपूर हमारे देवता थे

पृथ्वी राजकपूूर तो हमारे देवता थे
हिन्दी सिनेमा के युग पुरुष को पृथ्वीराज कपूर को वह देवता कहती हैं। उनका मानना है कि पृथ्वीराज कपूर का नाटक के प्रति जो लगाव था और रचनात्मकता या प्रयोग उन्होने किए वह अद्वितीय है। जोहरा सहगल पृथ्वी राजकपूर के बारे में बताते हुए भाव
विभोर हो जाती हैं वह कहती हैं कि पापा जी जसा इंसान होना मुश्किल है। उनके साथ काम करना गर्व की बात थी। जोहरा सहगल ने पापा जी के साथ काम करना सुखद बताती हैं। वह कहती हैं कि उनकी बहन ने सबसे अधिक पापा जी के साथ काम किया दोनों की जोड़ी लोगों को खूब जंचती थी। अपने बारे में भी वह बताती हैं कि मैंने भी एक पापा जी के साथ एक नाटक में बतौर हिरोइन का रोल किया था। उनका सरल स्वभाव और काम के प्रति लगाव देखकर लोग दंग रह जाते थे।

Tuesday, April 21, 2009

अभी तो मैं जवान हूं

अभी तो मैं जवान हूं

27 अप्रैल को जोहरा सहगल का 97 वां जन्मदिन है उम्र के वह कला जगत की अकेली महिला हैं जिसके ऊपर यह गजल सटीक बैठती है कि अभी तो मैं जवान हूं। यूं तो वह लोगों से कम बातचीत करती हैं लेकिन पिछले महीने अशोक वाजपेयी के सौजन्य से एक कार्यक्रम में उन्होने अपने बारे में बताया निश्चय ही वह क्षण सबके लिए सुखद था लगभग ढाई घंटे उन्होने जिस तरह श्रोताओं को बांध के रखा वह अद्भुत था, उस सुनी गई बात को मैने लिखने का प्रयास किया है, सुझाव, संदेश और आलोचना आमंत्रित है। उम्मीद है उनके बारे में जो जानकारी दी जा रही है आपको पसंद आएगी- यह कड़ी आगे भी जारी रहेगी

१- मैं डांसर बनना चाहती थी
कभी-कभी कु छ लोग समय से आगे निकल जाते हैं। और उनके लिए उम्र कोई मायने नहीं रखती। उम्र में शतक के करीब पहुंच चुकी और आवाज में वो दम कि अनजान आदमी शायद ही जान पाए कि इस शख्सियत की उम्र इतनी है।
27 अप्रैल 1912 में नजीबाबाद मुरादाबाद में जन्मी जोहरा सहगल वालिद मुमताउल्ला खां के पांच बेटियों और दो बेटों में से एक हैं। पिता के प्रगतिशील विचारों के होने के कारण उन्हे और उनकी बहन को पाकिस्तान के लाहौर के क्वीन मेरी कालेज पढ़ने के लिए भेजा गया। नहीं तो उस वक्त एक मुस्लिम समाज में ऐसा करना संभव नहीं था।
कालेज में जोहरा का अंदाज एक टॉम बॉय जसा था। लेकिन नृत्य और संगीत का शौक बेहद था। एक कट्टर मुस्लिम परिवार नृत्य सीखने में यहां भी बाधा बना था लेकिन उनके वालिद ने एक बार फिर उनका कहना माना और वह तीन साल तक जर्मनी में नृत्य सीखा। वहीं पर इनकी पहली मुलाकात उस समय के मशहूर डांस ग्रुप के संचालक उदय शंकर से हुई और बाद में जोहरा जी ने उनके साथ काम भी किया।
अपने एक संस्मरण में वह बताती हैं कि वह 1938 में ही न्यूयार्क और लांस एंजिल्स में काम करने गई।

Thursday, April 16, 2009

मुस्कान के प्रकार

मुस्कान के प्रकार
कवि बिहारी ने मुस्कान पर बहुत कुछ लिखा है, मुस्कान शायरों की पहली पसंद हुआ करती थी। लेकिन अब मुस्कान के प्रकार बदल रहे हैं। जसे प्रोफेशनल मुस्कान, एजुकेशनल मुस्कान, अनप्रोफेशनल मुस्कान, सम मुस्कान, विषम मुस्कान, स्थाई मुस्कान, अस्थाई मुस्कान आदि आदि। मतलब यह है कि आप अगर कहीं जा रहे हैं तो उस अनुसार आपकी मुस्कान होनी चाहिए। कारपोरेट जगत की मुस्कान तो माशाअल्लाह। शायरों ने मुस्कान को कभी नहीं मापा था लेकिन आजकल मुस्कान सेंटी मीटर, इंच और मिली मीटर में नापी जाती है। डेढ़, ढाई या सवा इंच टाइप मुस्कान पर किताब भी आ चुकी है। मुङो चिंता तब होती है कि कहीं साहित्यकारों के पास मुस्कान मापने का नैनो मीटर टाइप पैमाना न आ जाय, विज्ञान से संभव है नहीं तो कला तो है ही।
जबसे प्रेस कांफ्रेंस में जूता चलना शुरु हुआ है एक नई तरह की मुस्कान हमारे नेताओं के चेहरे पर देखने को मिल रही है। यह भी दो प्रकार की है, जूता चलने से पूर्व की मुस्कान और जूता चलने के बाद की मुस्कान। एक चैनल की एंकर ने मुस्कुराते हुए इन दोनों मुस्कानों के मध्य तुलनात्मक विेषण प्रस्तुत किया, सबने मुस्कुराते हुए उसकी प्रशंसा की लेकिन वह समझ नहीं पा रही थी कि ये किस टाइप की मुस्कान है।
सहीराम के पड़ोसी हंसमुख बाबा के शिष्य दुखहरन मास्टर जब क्लास में बच्चे से पूछते हैं कि ‘पज् से क्या होता है बच्चा जोर से बोलता है काइट और तब मास्टर की मुस्कान देखने लायक होती है।
मंहगाई देखकर एक मध्यम वर्गीय कुत्ते की हंसी पर ग्रहण लग गई लेकिन फिर भी वह पूंजीवादी कुत्ते को देखकर गाली देकर तिक्ष्ण मुस्कान बिखेर देता था थोड़ी देर बाद ढेरों सर्वहारा कुत्ते विभिन्न सुरों में गाली देकर पीछे-पीछे मुस्कुरा शुरू कर दिए।
गांव में जो लोग अधिक हंसते हैं उन्हे प्राय: ‘दंत चियारज् संज्ञा से विभूषित किया जाता है। वह भूखे, प्यासे रह लेगें लेकिन मुस्कुराए बिना नहीं रह सकते। कुछ तो विचित्र तरीके से हंसते हैं अगर जोर से हंस दें तो अट्टहास से आस-पास के पशु पंक्षी ही लापता हो जाए। दंत चियार टाइप एक सज्जन सहीराम के गांव में भी थे जिनकी सार्वजनिक मुस्कुराहट प्रसिद्ध थी। गांव में बाढ़ आए या सूखा, हैजा हो या इंसेफेलाइटिस, बारात निकले या जनाजा वह निम्न, मध्यम या उच्च श्रेणियों में मुस्कुरा ही लेते हैं। लेकिन जब उनके गांव में कोई करबद्ध नेता चुनाव प्रचार करने आता है और उसे वोट डालने का निवेदन करता है तो उसकी हंसी रोके नहीं रुकती।
अभिनव उपाध्याय

Monday, April 6, 2009

प्रायोजित प्रेम

प्रायोजित प्रेम
वैलेंटाइन डे के लगभग दो माह बीत जाने के बाद प्रेम की पाठशाला में जब सहीराम पहुंचे तो उन्हे कुछ नए तरह के प्रवचन सुनने को मिले। प्रस्तुत हैं उसके कुछ अंश-
‘प्रेमज् अर्थात अकथनीय, अवर्चनीय और कभी-कभी अदर्शनीय है। लेकिन इधर प्रेम में रिफार्म आया है और वह नए फार्म में दिखाई दे रहा है। जसे ‘प्रायोजित प्रेमज्, गैर चुनावी समय से लेकर चुनावी महापर्व या और भी महत्वपूर्ण मौकों पर प्रेम प्रायोजित टाइप दिखने लगता है।
अब देखिए चुनाव से पूर्व प्रेम के गीत गाने वाले नेता को भगवाधारियों ने ऐसे धार्मिक सन्निपात का इंजेक्शन लगाया कि भाजपा के राम के प्रति उसका प्रायोजित प्रेम उमड़ पड़ा। इसी तरह तथाकथित हिन्दू हृदय सम्राट योगी आदित्यनाथ का हिन्दूओं के प्रति प्रेम भी इसी श्रेणी का है। इसी तरह का प्रेम बहुजन से सर्वजन में तब्दील मायावती का ब्राह्मणों के प्रति भी है। कांग्रेस का मुस्लिमों के प्रति प्रेम भी कुछ इसी टाइप है। कुछ घोषित कम्युनिस्टों का मार्क्स के प्रति प्रेम को भी हम ऐसा ही कह सकते हैं। चुनाव आते ही नेता जी लोगों का जनता के प्रति अथाह प्रेम भी प्रायोजित ही है।
कहने का तात्पर्य यह है कि प्रायोजित प्रेम करने वालों की एक लम्बी श्रृंखला है। वर्तमान में वही सफल हो सकता है जो प्रायोजित प्रेम में महारथ हासिल रखता है। फटाफट क्रिकेट से लेकर आईपीएल तक में चीयर्स गर्ल्स के क्रिकेट प्रेम के बारे में आप क्या कहेगें, कोई उनसे नहीं पूछता कि आप लांग आन या कवर ड्राइव जसा कुछ जानती हैं या नहीं। पानी की टंकी पर चढ़ कर गौरांगवर्णी नायिका के प्रति नायक के प्रेम का इजहार, अक्सर गायन की प्रतियोगिता में रूठने मनाने में क्रिया से लबरेज प्रेम या रैंप पर आधे इंच से सवा इंच में मुस्कुराती गजगामिनी मॉडल का अपने अधोवस्त्र के प्रति प्रेम को भी हम इसी कैटेगरी में रख सकते हैं। पता नहीं कब प्रतियोगी लड़ बैठे और रैम्प की मॉडल का अधोवस्त्र खिसक जाए।
वर्तमान की आर्थिक मंदी ने भी प्रायोजित प्रेम को और भी हवा दी है। प्रायोजित प्रेम का उदाहरण चूल्हे से लेकर आफिस तक में देखा जा सकता है। डैनी बॉयल का भारतीय स्लमडॉगों के प्रति प्रायोजित प्रेम अथाह है। अक्सर अस्पतालों में डाक्टर और नर्स मरीजों से इसी प्रेम के अंतर्गत बंधे होते हैं।
भक्त जनों प्रायोजित प्रेम के अपने-अपने फायदे हैं वरुण गांधी उन्हीं की पार्टी के लोग ईष्र्या करते हैं कि, दंगा कराना और मस्जिद तुड़वाने जसे महान कार्य करने के बाद भी उन्हे वह सम्मान नहीं मिला जो प्रायोजित प्रेम के जरिए इस निर्वतमान कवि को मिल गया। जरुर प्रेम गीत रचने की कला इसमे काम आई होगी। अत: प्रेम शाश्वत है इसे प्रायोजित रुप में ले लाभ होगा। इति !
अभिनव उपाध्याय

Sunday, April 5, 2009

जी चाहता है

जी चाहता है


थक जाए हवा ऐसा दौडूं
छलांग मारूं ऐसा कि टूट जाए बुबका का विश्व कीर्तिमान
नृत्य करुं ऐसा कि, लोग भूल जाएं माइकल जक्शन को
एक ही बार में सातों सुरों को गा जाऊं
नवो रसों को पी जाऊं

जी चाहता है
उड़ता जाऊं आकाश के अंतिम छोर तक
डुबकी लगाऊं पाताल में
और आंखें दिखाऊं शेषनाग को
चिल्लाऊं ऐसा कि
फ ट जाएं परदे बादलोंे के कान के
मेरा जी चाहता है
उछाल दूं हिमालय को उठाकर हथेली से
भर लूं अंजूरी में सातो समंदर
और पी जाऊं एक ही सांस में
जी जाऊं चारो युग
एक ही बार में
मेरा जी चाहता है
क्योंकि ...
आज उसने दे दिया है
हाथ मेरे हाथ में ।

अजय गिरि

Friday, April 3, 2009

प्रिज्म

प्रिज्म

बांट देता है सूर्य की कि रणों को
सात रंगों में
जो हमें रंगहीन दीखती हैं
और हम चमत्कृत होते हैं
कि सूर्य की प्रत्येक पारदर्शी किरणों में
सात रंगों की मोहक दुनिया में

वास्तव में जो रंगहीन दिख रहा है
वह रंगहीन नहीं है
उसके अंदर भी मचलती है
सात रंगों की रंगीन दुनिया
वह भी छिटका सकता है
सतरंगी,मोहक, विस्मयी, रौशनी
इसके लिए आवश्यक है
एक प्रिज्म की
मगर अफसोस-
कि बिक गए हैं प्रिज्म सारे
और कैद हो गए हैं
पब्लिक स्कूल की प्रयोगशालाओं में।
कुमार अजय गिरि
(कुमार अजय गिरि की कविताओं के संकलन बाजार में उपलब्ध में लेकिन आग्रह पर उन्होंने अपनी अप्रकाशित कविताओं को दिया जो कभी आलमारी की दराज में थी। मुङो पसंद आई हैं उनकी कविता उम्मीद है आपको भी पसंद आएगी।)

Wednesday, March 25, 2009

कड़की के आंकड़े

कड़की के आंकड़े

जनाब ये आंकड़े भी बड़ी चीज हैं। और इनके निकालने का अंदाज तो माशाअल्ला। देश में साल भर में कितने मरे, कितने पैदा हुए और कितने मरघटे में हैं से लेकर आगामी सौ साल में कितने पैदा होंगे। यही नहीं कितने जिंदाबाद कहेगें, कितने मुर्दाबाद कहेंगे और कितने दोनों बाद कहेगें। कई एजेंसियों का धंधा भी आंकड़ों से चलता है। और आंकड़ों को बतौर भविष्य जानने की मशीन जसे प्रयोग में लाया जाता है। एक एजेंसी ने तो मुझसे कहा कि हमारी एजेंसी एक सर्वे रिपोर्ट में आपको महानायक घोषित कर देगी। चुनाव में तो हम आंकड़ों का ऐसा चमत्कार करते हैं कि अच्छे-अच्छे बेइमानों को भी पवित्रता का दौरा पड़ने लगता है।
वैसे चुनाव के समय आंकड़े बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जबसे मायावती ने सबसे अधिक ब्राह्मणों को सीट दिया है तबसे ओझाइन, पड़ाताइन, उपधायिन, मिश्राइन समेत तमान ब्राह्मण आइनों ने फेंकन, घुरहू, निरहू, करवारु समेत स्लमडॉग के पापा टाइप लोगों क ो जुटा कर वोट के आंकड़ों का प्रतिशत बढ़ा रही हैं और स्लमडाग को चाकलेट बांटा जा रहा है। आंकड़ों को मेंटेन करने की कोशिश जारी है। आंकड़ा कभी उछल रहा है, कभी लेट रहा है, कभी सरक रहा है। आंकड़ा अमीरी बता रहा है लेकिन बेंचू बीए का लोटा-थाली राशन के चक्कर में बिक चुका है। जीभ को दाल नहीं मिली है, नाक ने देशी घी सूंघकर संतोष कर लिया है।
चुनाव में वोटों के सही आंकड़े आएं इस चक्कर में वरुण का करुण रस उग्र हो चुका है। चुनाव को देखते ही सब आंकड़ों को एक्टिव करना चाहते हैं। चैनल तैयार हैं, अखबार भी फड़फड़ा रहे हैं। शायद चुनाव में टीआरपी और प्रसार संख्या के आंकड़ों में उछाल आ जाए। प्रवचन वाले बाबा भी आंकड़ोंे के फेर में पड़ गए हैं। मंदी में दक्षिणा की दर कम आने से चेहरे पर शिकन है। वह श्लोक , दोहे, चौपाई के साथ फिल्मी तर्जों का तड़का दे रहे हैं कि किसी बहाने भक्तों की भीड़ जुटे।
आंकड़ों की लीला से बेंचू बीए परेशान हैं। सहीराम से अपनी व्यथा कहते उन्होंने समाचार पत्र पकड़ा दिया जिसमें मुख्य खबर थी ‘मंहगाई की दर एक प्रतिशत से भी कमज्। बेचूं बीए दहाड़ लगाकर कह रहे हैं ये कड़की के आंकड़े हैं। वह लोगों के बीच जाकर कह रहे हैं, इन आंकड़ों को ही खाओं, इसे ही पहनों, इसी से नहाओ,इसी की चाय बनाओ ये आंकड़े लम्बे हैं भूखे नंगों इसे लपेट लो। चुनाव के दौर में ऐसी बातें सुन कर नेता जी उग्र हो गए उन्होनें कहा ये विकास के आंकड़े हैं और सच हैं तुम दुष्प्रचार मत करो। बेचू बीए तन गए और बोल पड़े कुछ आंकड़े हमारे पास भी थे लेकिन कोसी बहा ले गई, मुम्बई विस्फोट में जल गए और कुछ विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसान चबा गए।
अभिनव उपाध्याय

Monday, March 23, 2009

महापर्व की परेशानी

सदाचार, प्रचार और शिष्टाचार के माध्यम से अब चुनाव जीतना आंख बंद करके सटीक जगह तीर मारने जसा है। क्या-क्या नहीं करना पड़ता इस महापर्व के लिए। दिन रात एक करने के बाद भी अगर जनता जनार्दन का मूड ठीक रहा तो बात बन जाती है नहीं तो बस ठनठन गोपाल। अपने चुनिंदा समर्थकों के बीच यह बात नेता नेकराम बता रहे थे। सहीराम से अपनी पीड़ा और चुनाव के विषय में अपने अनुभव की बखान नेता नेकराम ने कही।
जनता के बीच उनकी छवि बदीराम के रूप में है। इस बात से सहीराम वाकिफ थे। उन्होंने कहा, लेकिन आपने विकास के नाम पर जनता का विनाश किया है इस बात से तो जनता नाराज है। नेकराम गुस्सा हो गए। उन्होंने कहा कि, सहीराम जी सबसे सामने तो ऐसा न बोलें। इस बार हम चुनाव प्रचार करने का तरीका बदल रहे हैं। लोगों को आध्यात्म के सहारे मन शुद्ध कराएगें और फिर जम्हूरियत, लोकतंत्र और डेमोक्रेसी का मतलब बताएंगे। सहीराम ने कहा लेकिन नेकराम जी इन तीनों का मतलब तो एक ही होता है। नेकराम ने कहा यह सब नहीं जानते हैं। हम योग, जोग और भोग के साथ इसे बताएंगे यकीन मानिए हमारी जनता इसे समझ जाएगी। यही नहीं हम अनुभवी नेताओं की तरह इस बार मोर्चा बनाएंगे, लोगों को बताएंगे कि संगठन में शक्ति है। विपक्षी दल के जासूस ने यह अच्छी खबर अपने दल के पास पहुचा दी फिर क्या था,
इस पर विपक्षी दल के नेता ने भाषण में नेकराम पर निशाना साधते हुए कहा कि, विपक्षी दल मोर्चा बनाने की बात कह रहे हैं लेकिन यह मोर्चा नहीं मिर्चा है। साथियों पहली बार चखने पर इसका स्वाद देर तक बना रहता है और अंतत: पानी पीने के बाद शांत हो जाता है। हमारे नेता बंधुओं आप मोर्चा की चर्चा पर ध्यान न दें, मंहगाई में हो रहे खर्चे के बारे में सोचें।
इसके अलावा वह समर्थकों से कह रहे हैं कि चुनाव लड़ने में नेता से अधिक समर्थकों को ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस मौसम में समर्थकों के कर कमल, बदन हाथी जसे मजबूत, दिमाग साइकिल की तरह तेज और जिंदगी को लालटेन की तरह जला देना पड़ता है।
सभा समाप्त होने के बाद दोनों नेताओं के समर्थक ऊर्जा से लबरेज हैं। नगाड़े बजा रहे हैं। पोस्टर बैनर लगा रहे हैं। लोंगों को भरमा रहे हैं। लेकिन नेताजी आचार संहिता के उल्लंघन की नोटिस देखकर परेशान हैं।

Tuesday, March 17, 2009

खुशी


खुशी

भूख से तड़पते बच्चे को दे दिया है किसी ने सूखी रोटी का टुकड़ा,
ब्ल्यू लाइन बस में मिल गई गाते हुए भिखारी को दस की नोट,
मजदूर पा गया है कई दिनों बाद अपनी पूरी दिहाड़ी,
रिक्शा वाले का बेटा कह रहा है उसे तोतली जुबान में पा..पा..,
साधक ने मिला लिया है सुर में सुर,
फेल होने के बाद, जब कह दिया हो बाबू जी ने कि ‘सब ठीेक हो जाएगा।

Monday, March 16, 2009

भूत-वूत कुछ नहीं होता...

भूत-वूत कुछ नहीं होता...
लोकसभा चुनावों की नजदीकी से राजनीतिक दल बेकरार हो उठे हैं। उनकी बेकरारी उनके बयानों में साफ झलकने लगी है। वैसे तो चुनावी दंगल में उठापटक होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार तीसरे मोर्चे ने पहले स्थापित दो मोर्चो कांग्रेस और भाजपा के लिए मुसीबतें बढ़ा दी हैं। भूत से डरने वाला व्यक्ति बार-बार कहता है भूत-वूत कुछ नहीं होता। कांग्रेस भी कुछ ऐसा ही करती नजर आ रही है। तीसरे मोर्चे से मोर्चा लेने की कमान पार्टी ने अपने तेजतर्रार नेता प्रणव मुखर्जी को दी है। मुखर्जी ने हमला बोलते हुऐ कहा तीसरे मोर्चे के पास न तो कोई राजनीतिक दृष्टि है और न हीं कोई जनहित कार्यक्रम। प्रणव ने अतीत की दुहाई देते हुए कहा कि पहले भी दो बार 1989 और 1996 में तीसरा मोर्चा बना था उसका हस्र किसी से छिपा नहीं है। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी चुप नहीं रह पाए आखिर बोल ही पड़े वैसे तो तीसरा मोर्चा जीतेगा नहीं और अगर जीता भी तो चलेगा नहीं। भगवा पार्टी के सामने तो सबसे बड़ी समस्या पारिवारिक अंतर्कलह पर पर्दा डालने की है। सुधांशु मित्तल को पूर्वोत्तर का कार्यभार सौंपने पर जेटली ने पार्टी अध्यक्ष से खुलकर नाराजगी जताई। मोदी-आडवाणी के बीच टकराव तो गाहे-बगाहे सामने आता ही रहता है। बीजद भी अब तीसरे मोर्चे की तरफ रुख कर चुका है। इनमें से अधिकतर एनडीए का हिस्सा रहे हैं। अपने मुखिया दल से खफा इन दलों ने तीसरे मोर्चे का हाथ थामकर भाजपा के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया है। मुखर्जी और राजनाथ सिंह जी डरने की जरूरत नहीं है, भूत-वूत कुछ नहीं होता।
एक दूसरे के धुर विरोधी कांग्रेस और भाजपा तीसरे मोर्चे को फिजूल का ठहराने में एक दूसरे के सुर में सुर मिला रहे हैं। और क्यों न हो विज्ञान का सर्वमान्य सिद्धांत है कि विपरीत ध्रुवों में गजब का अकर्षण होता है। यह तो हुई विपरीत ध्रुवों के साझा मंच की बात अब बात करें तीसरे मोर्चे की तो यह तो भानुमति का कुनबा है। बेचारे वामदल कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा लाकर कुनबा जोड़ने में लगे हैं। लेकिन जहां माया होगी, वहां पर तो कहीं धूप कहीं छाया वाले हालात तो पैदा ही होते रहेंगे। प्रधानमंत्री पद को लेकर मोर्चे के भीतर जारी उठापटक से भला कौन वाकिफ नहीं है। फिलहाल तो
मायाजाल में उलङो तीसरे मोर्चे को बहन जी ने यह कहकर फौरी राहत दे दी है कि चुनाव नतीजे आने के बाद पीएम पद के बारे में चर्चा होगी। पिछले विधानसभा चुनाव नतीजों से उत्साहित माया मेमसाब ने कह दिया भई नतीजे आ जाने दीजिए, जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी होगी भागीदारी। अब उत्तरप्रदेश में तो माया की सत्ता फिलहाल तो मजबूत ही दिखाई देती है, लेकिन विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में बढ़े मत प्रतिशतों से बहनजी उत्साहित हैं तो अतिविश्वास में रहना ज्यादा ठीक नहीं है।
संध्या द्विवेदी- आज समाज

एक ही थैले के...

गहमा-गहमी...