Saturday, November 29, 2008

1984 sikh riot victims-मैं ट्रांसपोर्टर बनना चाहता था

10-सुरजीत सिंह
मैं ट्रांसपोर्टर बनना चाहता था
पहले त्रिलोक पुरी में रहने वाले सुरजीत सिंह सरकार द्वारा आवंटित मकान संख्या सी-49 ए तिलक विहार में रहते हैं। पेशे से आटो चालक 36 वर्षीय सुरजीत सिंह ने दंगो में अपने पिता और सगे संबंधियों समेत कुल 18 लोगों को खो दिया।
उस समय अपनी अवस्था के बारे में बताते हुए सुरजीत कहते हैं कि ‘इस दंगे ने हमें मानसिक रूप से काफी परेशान किया एक तरह से वह हमारा बचपन था। हमने जो बचपन में देखा उसका हमारे मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा। अगर ये हादसा हमारे साथ नहीं होता तो शायद मैं ट्रांसपोर्टर होता। क्योंकि मैं ट्रांसपोर्टर बनना चाहता था।ज्
उनका गुस्सा जितना दंगाइयों को लेकर है उतना प्रशासन को लेकर भी है। क्योंकि उनका कहना है कि ‘यह हादसा बिना सरकारी शह के नहीं हुआ। इस पूरे प्रकरण में पुलिस मूक दर्शक बनी रही। उन्होंने पुलिस पर आरोप लगाते हुए कहा कि पुलिस जानबूझ कर दंगाइयों को बढ़ावा दे रही थी।ज्
उनका कहना है कि अपनी आंखों के सामने अपने परिजनों का दुर्दशा देखना काफी दुखद था। वह इस समय आटो चलाते हैं उनका कहना है कि ‘अगर ऐसे हादसे नहीं होते तो आज हमारी स्थिति शायद इससे बेहतर होती। क्योंकि हमारी जिम्मेदारी हमारे पिता जी पर थी और पिता जी के न रहने पर यह मेरी मां पर आ गई । हम दो भाई और एक बहन थे। मां को सरकार ने एक अस्पताल में चपरासी की नौकरी दे रखी थी। शुरू में यह नौकरी हमारी रोजी-रोटी का साधन बना क्योंकि हम लोग छोटे थे इसलिए नौकरी नहीं कर सकते थे।ज्
उनका कहना है कि ‘जब मां की तनख्वाह कम पड़ने लगी और हमारी जरूरतें बढ़ने लगी तभी से मैं काम की तलाश करना शुरू कर दिया। चूंकि बहुत पढ़ा नहीं था इसलिए अच्छी जगह पर नौकरी नहीं मिली लेकिन हां काफी तलाश के बाद एक कंपनी में डाई फीटर का काम किया।
मां नौकरी के बाद भी प्राइवेट काम करती थी। हमने काफी मेहनत करके अपने भाई-बहन को पढ़ाया लिखाया। 1996 में मेरी भी शादी हो गई जिससे खर्च और बढ़ गया। इसलिए किराए का आटो चलाना शुरू कर दिया। अब रोज का ताजा कमाना और ताजा खाना।
उनको सरकार को लेकर नाराजगी है कि सरकार जिसे सरकारी सहायता कहती है वह एक आदमी की एक महीने की कमाई से भी कम है क्योंकि यह जितने समय बाद मिली है उससे अधिक उसका वेतन हो जाता। यही नहीं उन्होने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि ‘जिस सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर और एचकेएल भगत ने हमारा घर उजाड़ा सरकार उन्हें प्रश्रय दे रही है। यह हमारे घावों पर नमक छिड़कने जसा है।ज्
यह पूछे जाने पर कि जो सरकारी सहायता मिली उसका उपयोग आपने किस तरह किया?
उनका कहना है ‘उससे हमें काफी राहत मिली, मेरी बहन की शादी उन्ही पैसों से हुई। लेकिन वह सरकार से और सहायता की उम्मीद भी करते हैं जिससे वह अपनी आटो खरीद सकें । उन्हे यह भी अफसोस है कि अगर मैं इस हादसे से प्रभावित नहीं होता शायद एक ट्रांसपोर्टर होता।

1 comments:

kanishk said...

How did you get it Sir? I was trying to get you from a lot of year. I am not making a fun with you. But really you are a different and special for me.

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