Saturday, May 2, 2009
मुस्कान के प्रकार
कवि बिहारी ने मुस्कान पर बहुत कुछ लिखा है, मुस्कान शायरों की पहली पसंद हुआ करती थी। लेकिन अब मुस्कान के प्रकार बदल रहे हैं। जसे प्रोफेशनल मुस्कान, एजुकेशनल मुस्कान, अनप्रोफेशनल मुस्कान, सम मुस्कान, विषम मुस्कान, स्थाई मुस्कान, अस्थाई मुस्कान आदि आदि। मतलब यह है कि आप अगर कहीं जा रहे हैं तो उस अनुसार आपकी मुस्कान होनी चाहिए। कारपोरेट जगत की मुस्कान तो माशाअल्लाह। शायरों ने मुस्कान को कभी नहीं मापा था लेकिन आजकल मुस्कान सेंटी मीटर, इंच और मिली मीटर में नापी जाती है। डेढ़, ढाई या सवा इंच टाइप मुस्कान पर किताब भी आ चुकी है। मुङो चिंता तब होती है कि कहीं साहित्यकारों के पास मुस्कान मापने का नैनो मीटर टाइप पैमाना न आ जाय, विज्ञान से संभव है नहीं तो कला तो है ही।
जबसे प्रेस कांफ्रेंस में जूता चलना शुरु हुआ है एक नई तरह की मुस्कान हमारे नेताओं के चेहरे पर देखने को मिल रही है। यह भी दो प्रकार की है, जूता चलने से पूर्व की मुस्कान और जूता चलने के बाद की मुस्कान। एक चैनल की एंकर ने मुस्कुराते हुए इन दोनों मुस्कानों के मध्य तुलनात्मक विेषण प्रस्तुत किया, सबने मुस्कुराते हुए उसकी प्रशंसा की लेकिन वह समझ नहीं पा रही थी कि ये किस टाइप की मुस्कान है।
सहीराम के पड़ोसी हंसमुख बाबा के शिष्य दुखहरन मास्टर जब क्लास में बच्चे से पूछते हैं कि ‘पज् से क्या होता है बच्चा जोर से बोलता है काइट और तब मास्टर की मुस्कान देखने लायक होती है।
मंहगाई देखकर एक मध्यम वर्गीय कुत्ते की हंसी पर ग्रहण लग गई लेकिन फिर भी वह पूंजीवादी कुत्ते को देखकर गाली देकर तिक्ष्ण मुस्कान बिखेर देता था थोड़ी देर बाद ढेरों सर्वहारा कुत्ते विभिन्न सुरों में गाली देकर पीछे-पीछे मुस्कुरा शुरू कर दिए।
गांव में जो लोग अधिक हंसते हैं उन्हे प्राय: ‘दंत चियारज् संज्ञा से विभूषित किया जाता है। वह भूखे, प्यासे रह लेगें लेकिन मुस्कुराए बिना नहीं रह सकते। कुछ तो विचित्र तरीके से हंसते हैं अगर जोर से हंस दें तो अट्टहास से आस-पास के पशु पंक्षी ही लापता हो जाए। दंत चियार टाइप एक सज्जन सहीराम के गांव में भी थे जिनकी सार्वजनिक मुस्कुराहट प्रसिद्ध थी। गांव में बाढ़ आए या सूखा, हैजा हो या इंसेफेलाइटिस, बारात निकले या जनाजा वह निम्न, मध्यम या उच्च श्रेणियों में मुस्कुरा ही लेते हैं। लेकिन जब उनके गांव में कोई करबद्ध नेता चुनाव प्रचार करने आता है और उसे वोट डालने का निवेदन करता है तो उसकी हंसी रोके नहीं रुकती।
अभिनव उपाध्याय
Saturday, April 25, 2009
किस्मत और मेहनत ने साथ दिया और शोहरत कायम है
हालीवुड में प्रसिद्धि तब मिली जब ज्वेल आफ क्राउन नाटक में उन्हे प्रिंसेस का रोल मिला। अब इंग्लैंड में लोग इन्हे प्रिंसेस के नाम से जानने लगे। इतनी प्रसिद्धि बटोरने के बाद 26 सितम्बर 1987 को सदा के लिए भारत आ गई। लेकिन यहां पर भी काम करना जारी रखा। दिल्लगी, चलो इश्क लड़ाएं, हम दिल दे चुके सनम, सांवरिया, चीनी कम सहित कई फिल्मों में काम किया।
इनके उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए दिल्ली सरकार ने इन्हे 2008 में ‘सदी की लाडलीज् पुरस्कार से नवाजा।
उनकी उम्र के हिसाब से हफीज जालंधरी की गजल ‘अभी तो मैं जवान हूं उन पर सटीक बैठती है और बड़ी तन्मयता से जोहरा सहगल अपने प्रश्ांसकों के कहने पर इसे सुनाती भी हैं।
Friday, April 24, 2009
जब नेहरु जी ने तोहफा भेजा
हमारी शादी इलाहाबाद में अपने रिश्तेदार के यहां 14 अगस्त 1942 को हुई। उस वक्त पूरे भारत में इमरजेंसी लगी थी क्योंकि भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हो गया था और पं जवाहर लाल नेहरु जी जेल में बंद थे जेल से छूटने के बाद उन्होंने हमारे रिश्तेदार के घर तोहफा फिजवाया। यह हमारे लिए नेहरु जी का प्रेम था। शादी के बाद 1943 में जोहरा सहगल अपने पति कामेश्वर सहगल के साथ लाहौर में स्कूल खोला। लेकिन कुछ दिन बाद भारत आ गई। यहां उन्होने 1945 में पृथ्वीराज थियटर ज्वाइन किया और अब अभिनय में पूरी तरह से रम गई। इनकी बहन नुजरा, पृथ्वीराज कपूर के अधिकरत नाटकों में उनकी पत्नी का किरदार निभाती थी। जोहरा सहगल इप्टा से भी जुड़ी रही 1946-47 में यह उसकी वाइस प्रेसीडेंट भी रही। सन उन्नीस सौ पैंतालिस से साठ के बीच ही जोहरा सहगल ने फिल्मों के लिए भी काम किया। उन्होंने गुरुदत्त की बाजी फिल्म में कोरियोग्राफी की, इसी बीच बलराज साहनी के साथ भी काम किया। दिल्ली के शंकर मार्केट में दिल्ली नाट्य अकादमी भी खोला लेकिन वह उसी तरह बंद भी हो गई।
Thursday, April 23, 2009
प्यार किया तो डरना क्या
जोहरा सहगल में काम के प्रति अद्भुद लगाव है और गजब की ऊर्जा भी है कि 97 साल की उम्र में भी वह अपने कार्य के प्रति सजग और सक्रिय हैं। नृत्य के प्रति उनके लगाव के कारण ही उन्होनें सिमतोला नैनीताल में एक नृत्य अकादमी में उनकी मुलाकात कामेश्वर सहगल से हुई। उम्र में साढ़े आठ साल छोटे होने के बाद भी जोहरा ने उनसे शादी की। इस शादी के बारे में वह बड़ा खुल कर बात करती हैं कि हमारा दो साल तक अफेयर चला। मैं बार-बार कहती थी मैं उम्र में तुमसे बड़ी हूं लेकिन कामेश्वर राजी नहीं थे। उन्हे तो बस जोहरा चाहिए...।
वह बताती हैं कि शादी के बारे में भी बड़ा दिलचस्प वाकया हुआ था, इनके पिता जी शादी के लिए राजी नहीं थे इसके कई कारण थे एक तो वो कट्टर मुश्किल थे और शायद उन्हे इसका दुख भी रहा होगा कि मैं उनकी मर्जी से शादी नहीं कर रही थी लेकिन बाद में वह मान गए लेकि न एक शर्त यह थी कि नैनीताल में नहीं करनी है। हमें ये शर्त मंजूर थी।
Wednesday, April 22, 2009
पृथ्वीराज कपूर हमारे देवता थे
हिन्दी सिनेमा के युग पुरुष को पृथ्वीराज कपूर को वह देवता कहती हैं। उनका मानना है कि पृथ्वीराज कपूर का नाटक के प्रति जो लगाव था और रचनात्मकता या प्रयोग उन्होने किए वह अद्वितीय है। जोहरा सहगल पृथ्वी राजकपूर के बारे में बताते हुए भाव
विभोर हो जाती हैं वह कहती हैं कि पापा जी जसा इंसान होना मुश्किल है। उनके साथ काम करना गर्व की बात थी। जोहरा सहगल ने पापा जी के साथ काम करना सुखद बताती हैं। वह कहती हैं कि उनकी बहन ने सबसे अधिक पापा जी के साथ काम किया दोनों की जोड़ी लोगों को खूब जंचती थी। अपने बारे में भी वह बताती हैं कि मैंने भी एक पापा जी के साथ एक नाटक में बतौर हिरोइन का रोल किया था। उनका सरल स्वभाव और काम के प्रति लगाव देखकर लोग दंग रह जाते थे।
Tuesday, April 21, 2009
अभी तो मैं जवान हूं
27 अप्रैल को जोहरा सहगल का 97 वां जन्मदिन है उम्र के वह कला जगत की अकेली महिला हैं जिसके ऊपर यह गजल सटीक बैठती है कि अभी तो मैं जवान हूं। यूं तो वह लोगों से कम बातचीत करती हैं लेकिन पिछले महीने अशोक वाजपेयी के सौजन्य से एक कार्यक्रम में उन्होने अपने बारे में बताया निश्चय ही वह क्षण सबके लिए सुखद था लगभग ढाई घंटे उन्होने जिस तरह श्रोताओं को बांध के रखा वह अद्भुत था, उस सुनी गई बात को मैने लिखने का प्रयास किया है, सुझाव, संदेश और आलोचना आमंत्रित है। उम्मीद है उनके बारे में जो जानकारी दी जा रही है आपको पसंद आएगी- यह कड़ी आगे भी जारी रहेगी
१- मैं डांसर बनना चाहती थी
कभी-कभी कु छ लोग समय से आगे निकल जाते हैं। और उनके लिए उम्र कोई मायने नहीं रखती। उम्र में शतक के करीब पहुंच चुकी और आवाज में वो दम कि अनजान आदमी शायद ही जान पाए कि इस शख्सियत की उम्र इतनी है।
27 अप्रैल 1912 में नजीबाबाद मुरादाबाद में जन्मी जोहरा सहगल वालिद मुमताउल्ला खां के पांच बेटियों और दो बेटों में से एक हैं। पिता के प्रगतिशील विचारों के होने के कारण उन्हे और उनकी बहन को पाकिस्तान के लाहौर के क्वीन मेरी कालेज पढ़ने के लिए भेजा गया। नहीं तो उस वक्त एक मुस्लिम समाज में ऐसा करना संभव नहीं था।
कालेज में जोहरा का अंदाज एक टॉम बॉय जसा था। लेकिन नृत्य और संगीत का शौक बेहद था। एक कट्टर मुस्लिम परिवार नृत्य सीखने में यहां भी बाधा बना था लेकिन उनके वालिद ने एक बार फिर उनका कहना माना और वह तीन साल तक जर्मनी में नृत्य सीखा। वहीं पर इनकी पहली मुलाकात उस समय के मशहूर डांस ग्रुप के संचालक उदय शंकर से हुई और बाद में जोहरा जी ने उनके साथ काम भी किया।
अपने एक संस्मरण में वह बताती हैं कि वह 1938 में ही न्यूयार्क और लांस एंजिल्स में काम करने गई।
Thursday, April 16, 2009
मुस्कान के प्रकार
कवि बिहारी ने मुस्कान पर बहुत कुछ लिखा है, मुस्कान शायरों की पहली पसंद हुआ करती थी। लेकिन अब मुस्कान के प्रकार बदल रहे हैं। जसे प्रोफेशनल मुस्कान, एजुकेशनल मुस्कान, अनप्रोफेशनल मुस्कान, सम मुस्कान, विषम मुस्कान, स्थाई मुस्कान, अस्थाई मुस्कान आदि आदि। मतलब यह है कि आप अगर कहीं जा रहे हैं तो उस अनुसार आपकी मुस्कान होनी चाहिए। कारपोरेट जगत की मुस्कान तो माशाअल्लाह। शायरों ने मुस्कान को कभी नहीं मापा था लेकिन आजकल मुस्कान सेंटी मीटर, इंच और मिली मीटर में नापी जाती है। डेढ़, ढाई या सवा इंच टाइप मुस्कान पर किताब भी आ चुकी है। मुङो चिंता तब होती है कि कहीं साहित्यकारों के पास मुस्कान मापने का नैनो मीटर टाइप पैमाना न आ जाय, विज्ञान से संभव है नहीं तो कला तो है ही।
जबसे प्रेस कांफ्रेंस में जूता चलना शुरु हुआ है एक नई तरह की मुस्कान हमारे नेताओं के चेहरे पर देखने को मिल रही है। यह भी दो प्रकार की है, जूता चलने से पूर्व की मुस्कान और जूता चलने के बाद की मुस्कान। एक चैनल की एंकर ने मुस्कुराते हुए इन दोनों मुस्कानों के मध्य तुलनात्मक विेषण प्रस्तुत किया, सबने मुस्कुराते हुए उसकी प्रशंसा की लेकिन वह समझ नहीं पा रही थी कि ये किस टाइप की मुस्कान है।
सहीराम के पड़ोसी हंसमुख बाबा के शिष्य दुखहरन मास्टर जब क्लास में बच्चे से पूछते हैं कि ‘पज् से क्या होता है बच्चा जोर से बोलता है काइट और तब मास्टर की मुस्कान देखने लायक होती है।
मंहगाई देखकर एक मध्यम वर्गीय कुत्ते की हंसी पर ग्रहण लग गई लेकिन फिर भी वह पूंजीवादी कुत्ते को देखकर गाली देकर तिक्ष्ण मुस्कान बिखेर देता था थोड़ी देर बाद ढेरों सर्वहारा कुत्ते विभिन्न सुरों में गाली देकर पीछे-पीछे मुस्कुरा शुरू कर दिए।
गांव में जो लोग अधिक हंसते हैं उन्हे प्राय: ‘दंत चियारज् संज्ञा से विभूषित किया जाता है। वह भूखे, प्यासे रह लेगें लेकिन मुस्कुराए बिना नहीं रह सकते। कुछ तो विचित्र तरीके से हंसते हैं अगर जोर से हंस दें तो अट्टहास से आस-पास के पशु पंक्षी ही लापता हो जाए। दंत चियार टाइप एक सज्जन सहीराम के गांव में भी थे जिनकी सार्वजनिक मुस्कुराहट प्रसिद्ध थी। गांव में बाढ़ आए या सूखा, हैजा हो या इंसेफेलाइटिस, बारात निकले या जनाजा वह निम्न, मध्यम या उच्च श्रेणियों में मुस्कुरा ही लेते हैं। लेकिन जब उनके गांव में कोई करबद्ध नेता चुनाव प्रचार करने आता है और उसे वोट डालने का निवेदन करता है तो उसकी हंसी रोके नहीं रुकती।
अभिनव उपाध्याय
Monday, April 6, 2009
प्रायोजित प्रेम
वैलेंटाइन डे के लगभग दो माह बीत जाने के बाद प्रेम की पाठशाला में जब सहीराम पहुंचे तो उन्हे कुछ नए तरह के प्रवचन सुनने को मिले। प्रस्तुत हैं उसके कुछ अंश-
‘प्रेमज् अर्थात अकथनीय, अवर्चनीय और कभी-कभी अदर्शनीय है। लेकिन इधर प्रेम में रिफार्म आया है और वह नए फार्म में दिखाई दे रहा है। जसे ‘प्रायोजित प्रेमज्, गैर चुनावी समय से लेकर चुनावी महापर्व या और भी महत्वपूर्ण मौकों पर प्रेम प्रायोजित टाइप दिखने लगता है।
अब देखिए चुनाव से पूर्व प्रेम के गीत गाने वाले नेता को भगवाधारियों ने ऐसे धार्मिक सन्निपात का इंजेक्शन लगाया कि भाजपा के राम के प्रति उसका प्रायोजित प्रेम उमड़ पड़ा। इसी तरह तथाकथित हिन्दू हृदय सम्राट योगी आदित्यनाथ का हिन्दूओं के प्रति प्रेम भी इसी श्रेणी का है। इसी तरह का प्रेम बहुजन से सर्वजन में तब्दील मायावती का ब्राह्मणों के प्रति भी है। कांग्रेस का मुस्लिमों के प्रति प्रेम भी कुछ इसी टाइप है। कुछ घोषित कम्युनिस्टों का मार्क्स के प्रति प्रेम को भी हम ऐसा ही कह सकते हैं। चुनाव आते ही नेता जी लोगों का जनता के प्रति अथाह प्रेम भी प्रायोजित ही है।
कहने का तात्पर्य यह है कि प्रायोजित प्रेम करने वालों की एक लम्बी श्रृंखला है। वर्तमान में वही सफल हो सकता है जो प्रायोजित प्रेम में महारथ हासिल रखता है। फटाफट क्रिकेट से लेकर आईपीएल तक में चीयर्स गर्ल्स के क्रिकेट प्रेम के बारे में आप क्या कहेगें, कोई उनसे नहीं पूछता कि आप लांग आन या कवर ड्राइव जसा कुछ जानती हैं या नहीं। पानी की टंकी पर चढ़ कर गौरांगवर्णी नायिका के प्रति नायक के प्रेम का इजहार, अक्सर गायन की प्रतियोगिता में रूठने मनाने में क्रिया से लबरेज प्रेम या रैंप पर आधे इंच से सवा इंच में मुस्कुराती गजगामिनी मॉडल का अपने अधोवस्त्र के प्रति प्रेम को भी हम इसी कैटेगरी में रख सकते हैं। पता नहीं कब प्रतियोगी लड़ बैठे और रैम्प की मॉडल का अधोवस्त्र खिसक जाए।
वर्तमान की आर्थिक मंदी ने भी प्रायोजित प्रेम को और भी हवा दी है। प्रायोजित प्रेम का उदाहरण चूल्हे से लेकर आफिस तक में देखा जा सकता है। डैनी बॉयल का भारतीय स्लमडॉगों के प्रति प्रायोजित प्रेम अथाह है। अक्सर अस्पतालों में डाक्टर और नर्स मरीजों से इसी प्रेम के अंतर्गत बंधे होते हैं।
भक्त जनों प्रायोजित प्रेम के अपने-अपने फायदे हैं वरुण गांधी उन्हीं की पार्टी के लोग ईष्र्या करते हैं कि, दंगा कराना और मस्जिद तुड़वाने जसे महान कार्य करने के बाद भी उन्हे वह सम्मान नहीं मिला जो प्रायोजित प्रेम के जरिए इस निर्वतमान कवि को मिल गया। जरुर प्रेम गीत रचने की कला इसमे काम आई होगी। अत: प्रेम शाश्वत है इसे प्रायोजित रुप में ले लाभ होगा। इति !
अभिनव उपाध्याय
Sunday, April 5, 2009
जी चाहता है
थक जाए हवा ऐसा दौडूं
छलांग मारूं ऐसा कि टूट जाए बुबका का विश्व कीर्तिमान
नृत्य करुं ऐसा कि, लोग भूल जाएं माइकल जक्शन को
एक ही बार में सातों सुरों को गा जाऊं
नवो रसों को पी जाऊं
जी चाहता है
उड़ता जाऊं आकाश के अंतिम छोर तक
डुबकी लगाऊं पाताल में
और आंखें दिखाऊं शेषनाग को
चिल्लाऊं ऐसा कि
फ ट जाएं परदे बादलोंे के कान के
मेरा जी चाहता है
उछाल दूं हिमालय को उठाकर हथेली से
भर लूं अंजूरी में सातो समंदर
और पी जाऊं एक ही सांस में
जी जाऊं चारो युग
एक ही बार में
मेरा जी चाहता है
क्योंकि ...
आज उसने दे दिया है
हाथ मेरे हाथ में ।
अजय गिरि
Friday, April 3, 2009
प्रिज्म
बांट देता है सूर्य की कि रणों को
सात रंगों में
जो हमें रंगहीन दीखती हैं
और हम चमत्कृत होते हैं
कि सूर्य की प्रत्येक पारदर्शी किरणों में
सात रंगों की मोहक दुनिया में
वास्तव में जो रंगहीन दिख रहा है
वह रंगहीन नहीं है
उसके अंदर भी मचलती है
सात रंगों की रंगीन दुनिया
वह भी छिटका सकता है
सतरंगी,मोहक, विस्मयी, रौशनी
इसके लिए आवश्यक है
एक प्रिज्म की
मगर अफसोस-
कि बिक गए हैं प्रिज्म सारे
और कैद हो गए हैं
पब्लिक स्कूल की प्रयोगशालाओं में।
कुमार अजय गिरि
(कुमार अजय गिरि की कविताओं के संकलन बाजार में उपलब्ध में लेकिन आग्रह पर उन्होंने अपनी अप्रकाशित कविताओं को दिया जो कभी आलमारी की दराज में थी। मुङो पसंद आई हैं उनकी कविता उम्मीद है आपको भी पसंद आएगी।)
Wednesday, March 25, 2009
कड़की के आंकड़े
जनाब ये आंकड़े भी बड़ी चीज हैं। और इनके निकालने का अंदाज तो माशाअल्ला। देश में साल भर में कितने मरे, कितने पैदा हुए और कितने मरघटे में हैं से लेकर आगामी सौ साल में कितने पैदा होंगे। यही नहीं कितने जिंदाबाद कहेगें, कितने मुर्दाबाद कहेंगे और कितने दोनों बाद कहेगें। कई एजेंसियों का धंधा भी आंकड़ों से चलता है। और आंकड़ों को बतौर भविष्य जानने की मशीन जसे प्रयोग में लाया जाता है। एक एजेंसी ने तो मुझसे कहा कि हमारी एजेंसी एक सर्वे रिपोर्ट में आपको महानायक घोषित कर देगी। चुनाव में तो हम आंकड़ों का ऐसा चमत्कार करते हैं कि अच्छे-अच्छे बेइमानों को भी पवित्रता का दौरा पड़ने लगता है।
वैसे चुनाव के समय आंकड़े बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जबसे मायावती ने सबसे अधिक ब्राह्मणों को सीट दिया है तबसे ओझाइन, पड़ाताइन, उपधायिन, मिश्राइन समेत तमान ब्राह्मण आइनों ने फेंकन, घुरहू, निरहू, करवारु समेत स्लमडॉग के पापा टाइप लोगों क ो जुटा कर वोट के आंकड़ों का प्रतिशत बढ़ा रही हैं और स्लमडाग को चाकलेट बांटा जा रहा है। आंकड़ों को मेंटेन करने की कोशिश जारी है। आंकड़ा कभी उछल रहा है, कभी लेट रहा है, कभी सरक रहा है। आंकड़ा अमीरी बता रहा है लेकिन बेंचू बीए का लोटा-थाली राशन के चक्कर में बिक चुका है। जीभ को दाल नहीं मिली है, नाक ने देशी घी सूंघकर संतोष कर लिया है।
चुनाव में वोटों के सही आंकड़े आएं इस चक्कर में वरुण का करुण रस उग्र हो चुका है। चुनाव को देखते ही सब आंकड़ों को एक्टिव करना चाहते हैं। चैनल तैयार हैं, अखबार भी फड़फड़ा रहे हैं। शायद चुनाव में टीआरपी और प्रसार संख्या के आंकड़ों में उछाल आ जाए। प्रवचन वाले बाबा भी आंकड़ोंे के फेर में पड़ गए हैं। मंदी में दक्षिणा की दर कम आने से चेहरे पर शिकन है। वह श्लोक , दोहे, चौपाई के साथ फिल्मी तर्जों का तड़का दे रहे हैं कि किसी बहाने भक्तों की भीड़ जुटे।
आंकड़ों की लीला से बेंचू बीए परेशान हैं। सहीराम से अपनी व्यथा कहते उन्होंने समाचार पत्र पकड़ा दिया जिसमें मुख्य खबर थी ‘मंहगाई की दर एक प्रतिशत से भी कमज्। बेचूं बीए दहाड़ लगाकर कह रहे हैं ये कड़की के आंकड़े हैं। वह लोगों के बीच जाकर कह रहे हैं, इन आंकड़ों को ही खाओं, इसे ही पहनों, इसी से नहाओ,इसी की चाय बनाओ ये आंकड़े लम्बे हैं भूखे नंगों इसे लपेट लो। चुनाव के दौर में ऐसी बातें सुन कर नेता जी उग्र हो गए उन्होनें कहा ये विकास के आंकड़े हैं और सच हैं तुम दुष्प्रचार मत करो। बेचू बीए तन गए और बोल पड़े कुछ आंकड़े हमारे पास भी थे लेकिन कोसी बहा ले गई, मुम्बई विस्फोट में जल गए और कुछ विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसान चबा गए।
अभिनव उपाध्याय
Monday, March 23, 2009
महापर्व की परेशानी
जनता के बीच उनकी छवि बदीराम के रूप में है। इस बात से सहीराम वाकिफ थे। उन्होंने कहा, लेकिन आपने विकास के नाम पर जनता का विनाश किया है इस बात से तो जनता नाराज है। नेकराम गुस्सा हो गए। उन्होंने कहा कि, सहीराम जी सबसे सामने तो ऐसा न बोलें। इस बार हम चुनाव प्रचार करने का तरीका बदल रहे हैं। लोगों को आध्यात्म के सहारे मन शुद्ध कराएगें और फिर जम्हूरियत, लोकतंत्र और डेमोक्रेसी का मतलब बताएंगे। सहीराम ने कहा लेकिन नेकराम जी इन तीनों का मतलब तो एक ही होता है। नेकराम ने कहा यह सब नहीं जानते हैं। हम योग, जोग और भोग के साथ इसे बताएंगे यकीन मानिए हमारी जनता इसे समझ जाएगी। यही नहीं हम अनुभवी नेताओं की तरह इस बार मोर्चा बनाएंगे, लोगों को बताएंगे कि संगठन में शक्ति है। विपक्षी दल के जासूस ने यह अच्छी खबर अपने दल के पास पहुचा दी फिर क्या था,
इस पर विपक्षी दल के नेता ने भाषण में नेकराम पर निशाना साधते हुए कहा कि, विपक्षी दल मोर्चा बनाने की बात कह रहे हैं लेकिन यह मोर्चा नहीं मिर्चा है। साथियों पहली बार चखने पर इसका स्वाद देर तक बना रहता है और अंतत: पानी पीने के बाद शांत हो जाता है। हमारे नेता बंधुओं आप मोर्चा की चर्चा पर ध्यान न दें, मंहगाई में हो रहे खर्चे के बारे में सोचें।
इसके अलावा वह समर्थकों से कह रहे हैं कि चुनाव लड़ने में नेता से अधिक समर्थकों को ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस मौसम में समर्थकों के कर कमल, बदन हाथी जसे मजबूत, दिमाग साइकिल की तरह तेज और जिंदगी को लालटेन की तरह जला देना पड़ता है।
सभा समाप्त होने के बाद दोनों नेताओं के समर्थक ऊर्जा से लबरेज हैं। नगाड़े बजा रहे हैं। पोस्टर बैनर लगा रहे हैं। लोंगों को भरमा रहे हैं। लेकिन नेताजी आचार संहिता के उल्लंघन की नोटिस देखकर परेशान हैं।
Tuesday, March 17, 2009
खुशी

खुशी
भूख से तड़पते बच्चे को दे दिया है किसी ने सूखी रोटी का टुकड़ा,
ब्ल्यू लाइन बस में मिल गई गाते हुए भिखारी को दस की नोट,
मजदूर पा गया है कई दिनों बाद अपनी पूरी दिहाड़ी,
रिक्शा वाले का बेटा कह रहा है उसे तोतली जुबान में पा..पा..,
साधक ने मिला लिया है सुर में सुर,
फेल होने के बाद, जब कह दिया हो बाबू जी ने कि ‘सब ठीेक हो जाएगा।
Monday, March 16, 2009
भूत-वूत कुछ नहीं होता...
लोकसभा चुनावों की नजदीकी से राजनीतिक दल बेकरार हो उठे हैं। उनकी बेकरारी उनके बयानों में साफ झलकने लगी है। वैसे तो चुनावी दंगल में उठापटक होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार तीसरे मोर्चे ने पहले स्थापित दो मोर्चो कांग्रेस और भाजपा के लिए मुसीबतें बढ़ा दी हैं। भूत से डरने वाला व्यक्ति बार-बार कहता है भूत-वूत कुछ नहीं होता। कांग्रेस भी कुछ ऐसा ही करती नजर आ रही है। तीसरे मोर्चे से मोर्चा लेने की कमान पार्टी ने अपने तेजतर्रार नेता प्रणव मुखर्जी को दी है। मुखर्जी ने हमला बोलते हुऐ कहा तीसरे मोर्चे के पास न तो कोई राजनीतिक दृष्टि है और न हीं कोई जनहित कार्यक्रम। प्रणव ने अतीत की दुहाई देते हुए कहा कि पहले भी दो बार 1989 और 1996 में तीसरा मोर्चा बना था उसका हस्र किसी से छिपा नहीं है। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी चुप नहीं रह पाए आखिर बोल ही पड़े वैसे तो तीसरा मोर्चा जीतेगा नहीं और अगर जीता भी तो चलेगा नहीं। भगवा पार्टी के सामने तो सबसे बड़ी समस्या पारिवारिक अंतर्कलह पर पर्दा डालने की है। सुधांशु मित्तल को पूर्वोत्तर का कार्यभार सौंपने पर जेटली ने पार्टी अध्यक्ष से खुलकर नाराजगी जताई। मोदी-आडवाणी के बीच टकराव तो गाहे-बगाहे सामने आता ही रहता है। बीजद भी अब तीसरे मोर्चे की तरफ रुख कर चुका है। इनमें से अधिकतर एनडीए का हिस्सा रहे हैं। अपने मुखिया दल से खफा इन दलों ने तीसरे मोर्चे का हाथ थामकर भाजपा के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया है। मुखर्जी और राजनाथ सिंह जी डरने की जरूरत नहीं है, भूत-वूत कुछ नहीं होता।
एक दूसरे के धुर विरोधी कांग्रेस और भाजपा तीसरे मोर्चे को फिजूल का ठहराने में एक दूसरे के सुर में सुर मिला रहे हैं। और क्यों न हो विज्ञान का सर्वमान्य सिद्धांत है कि विपरीत ध्रुवों में गजब का अकर्षण होता है। यह तो हुई विपरीत ध्रुवों के साझा मंच की बात अब बात करें तीसरे मोर्चे की तो यह तो भानुमति का कुनबा है। बेचारे वामदल कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा लाकर कुनबा जोड़ने में लगे हैं। लेकिन जहां माया होगी, वहां पर तो कहीं धूप कहीं छाया वाले हालात तो पैदा ही होते रहेंगे। प्रधानमंत्री पद को लेकर मोर्चे के भीतर जारी उठापटक से भला कौन वाकिफ नहीं है। फिलहाल तो
मायाजाल में उलङो तीसरे मोर्चे को बहन जी ने यह कहकर फौरी राहत दे दी है कि चुनाव नतीजे आने के बाद पीएम पद के बारे में चर्चा होगी। पिछले विधानसभा चुनाव नतीजों से उत्साहित माया मेमसाब ने कह दिया भई नतीजे आ जाने दीजिए, जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी होगी भागीदारी। अब उत्तरप्रदेश में तो माया की सत्ता फिलहाल तो मजबूत ही दिखाई देती है, लेकिन विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में बढ़े मत प्रतिशतों से बहनजी उत्साहित हैं तो अतिविश्वास में रहना ज्यादा ठीक नहीं है।
संध्या द्विवेदी- आज समाज
ये इश्क नहीं आसां ...
सोमवार को हम मिले, मंगलवार को नैन, रविवार आने तक एक दूसरे से अलग रहना मुश्किल हो गया। चांद-फिजा का इश्क भी कुछ ऐसे ही परवान चढ़ा था। महज दो माह पहले दोनों एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले मुहब्बत के दुश्मन जालिम जमाने को ठेंगा दिखा रहे थे। न जाने इस इश्क को किसकी नजर लग गई की चांद-फिजा से रूठ गया। कल तक आई लव यू और आई कांट लिव विदाउट यू के संदेश भेजने वाला चांद आज नए युग के प्रेमवाहक यंत्र (नया युग का इसलिए क्योंकि कहा जाता है कि पहले प्रेमीजनों के संदेश कबूतर लेकर जाते थे) मोबाईल से तलाक,तलाक, तलाक का संदेश भेज रहा है। उधर फिजा तूफानी हो गई है। उन्होंने भी चांद को दिन में तारे दिखाने की ठान ली है। और पति-पत्नी की बेहद अंतरंग बातों को खुलकर लोगों के बीच बोल रही हैं। उन्होंने उन पर हवस मिटाने और बलात्कार करने का आरोप लगाया है। इतना ही नहीं फिजा को अब अपने पिता की मौत की भी याद आ गई है। उनका कहना है कि जब चांद ने घर पर शादी का प्रस्ताव रखा था तभी मेरे पिता को दिल का दौरा पड़ा था। यानी अब्बा जान, पिता कुछ भी कह लो क्योंकि अब तो फिजा मोहम्मद उर्फ अनुराधा बाली हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मो का बराबर आदर करती हैं। दूसरी तरफ चांद को अब अपनी पहली बीवी और बच्चे याद आ रहे हैं। घर, परिवार और पद की कीमत पर इस्लाम कुबूल कर चांद और फिजा बने, चं्र और अनुराधा के सिर से इतनी जल्दी प्यार का बुखार उतर जाएगा इस बात का तो एहसास मीडिया धुरंधरों को भी नहीं था। वैसे पत्रकारों के अलावा समाज में बुद्धिजीवियों की जमात से कई वर्ग ताल्लुक रखते हैं लेकिन यहां पर पत्रकारों का जिक्र इसलिए किया क्योंकि, क्योंकि उनके सामने नई-नई खबरों को खोजने की चुनौैती बनी रहती है। जसे इस वक्त खबरनवीसों को खाना खराब है कि आखिर चुनाव नतीजे किस पाले में जाएंगे। समीकरण भी बनाने शुरु कर दिए हैं। कौन किससे मिलाएगा हाथ। इतना ही नहीं जोड़-तोड़ से सरकार बनी तो कितने दिनों चलेगी। वगैराह-वगैराह। खैर राजनीति की दशा तो हरी अनंत, हरी कथा वाली है। मेरा मकसद राजनीति करना नहीं था, यह तो बात चली तो दाल भात में मूसर बनने वाली अपनी आदत से मजबूर मैंने अपनी जानकारी आप लोगों से शेयर कर ली। वापस अपने मुद्दे चांद बनाम फिजा पर आते हैं। यह पूरी रामकथा पर खबरनवीसों की लगातार नजर है। चुनाव की चिल्ल-पों के बीच दास्तान-ए-मुहब्बत का जिक्र दर्शकों और टीवी लगातार सीधा प्रसारण करने वालों के लिए राहत का काम करता है। ये इश्क नहीं आसां, इतना तो समझ लीजिए, एक आग का दरिया है और डूब के जाना है। वैसे मामला बेहद व्यक्तिगत है लेकिन लगता है कि फिजा और चांद ने दरिया के किनारे बैठकर ही इश्क कर लिया, डूबने की जरूरत नहीं समझी। डूबे होते तो दूर तक साथ जाते।
Friday, March 13, 2009
बजट के बाहर बजट
इंतजार का फल मीठा होता है, ऐसा घर के बुजुर्ग कहते थे। मुङो भी ऐसी ही उम्मीद थी, खासकर तब जब इंतजार बुजुर्ग ही करा रहे हों। बड़ी आशा से बजट का इंतजार चल रहा था कि शायद कोई जादू हो जाय। शायद इस बार कम दाम होने के कारण दाल उछलकर खुद-ब-खुद कू कर में चली आएगी और हम लोगों को भी गाढ़ी दाल का स्वाद मिलेगा। आलू नाचते हुए थैले में आ गिरेगा और प्याज रोयेगी कि अब तो कोई मुङो ले जाओ। टमाटर मुस्क राकर कहेगा कि टच मी बेबी.टच मी और गोभी के फूल पर ग्राहक रुपी भंवरे मंडराएंगे। लेकिन इस बार इंतहां हो गई इंतजार की। कोई भी ऐसी घोषणा नहीं हुई और उम्मीद को सांप सूंघ गया।
इस बज्रपात से शेयर बाजार भरभराकर गिर गया। बीएसई, एनएसई ने कई फीसदी लुढ़क-लुढ़ककर संभलने की कोशिश की। निफ्टी का मामला भी फिफ्टी-फिफ्टी जसा होने लगा। उम्मीदें इस बार भी मुस्कराकर दम तोड़ी। सबसे अधिक उम्मीद कर्तव्यनिष्ट कलमकारों को थी, वो बजट भाषण के समय टकटकी लगाकर देख रहे थे कि बुढ़ऊ शायद कुछ बक दें, चश्मा का लेंस काश इस बार धोखा दे दे और बेरोजगारों की फ टी झोली में एकाध ही सही रसीली गोली आ जाए। लेकिन काश, काश ही रह गया और आस, आस। इस गंदी मंदी से जूझ रहे बेजार बाजार बेचारे बने रहे और सुनकर व्यापारी बौरा गए।
बहरहाल चाय के बाद चिंतन का दौर शुरू हुआ। सहीराम भी इसमें शामिल हुए। मन मंथन चित्त क्रंदन की व्यथा कथा के लिए सभी उत्साहित दिखे। किसी ने कहा, लेकिन इस बजट में किसानों को भारी पैकेज देने की सूचना है और सेना के लिए भी सरकार बढ़ोत्तरी कर रही है। इस पर आर्थिक मामलों के गुरु बाबा चवन्नी ने कहा कि मतलब भक्तजनों इस बार होरी, धनिया, गोबर होली में हर्बल कलर से होली खेलेंगे। लोन सस्ता होने पर निरहू रेडियो की जगह होम थिएटर ले लेगा। अब पूस की रात में हल्कू पश्मीना शाल ओढ़कर खेत की रखवाली करने जाएगा। स्लमडाग झबरा अब अलाव के पास नहीं रूम हीटर के पास बैठेगा। अब बुधिया चंदा मांगकर नहीं खाएगा। जरूर यह खबर सुनकर विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसान श्मशान में जाम लड़ाएंगे। माने अब सर्वहारा कि आरा.र.र.ररर।
लोन न चुका पाने के कारण सुखंडी हो चुके शिष्य घुरहू ने कहा कि बाबा जब हम प्यासे मर रहे होते हैं तो सरकार पानी की बूंद टपकाती है और मरने के बाद भोज कराती है। यह बजट भी कुछ इसी तरह का है। सबने एक सुर में कहा यह बजट हमारे बजट के बाहर है।
अभिनव उपाध्याय
Thursday, March 12, 2009
महापर्व की दक्षिणा
अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र की जो परिभाषा दी वह भारत में शत-प्रतिशत लागू होती है। चाहे बस की सीट हो या भीड़ की धक्का मुक्की, चाहे दंगे में धमा-चौकड़ी हो या मंदिर में दर्शन की लाइन। लोकतंत्र को भरे बाजार में अंगड़ाई भरते देखा जा सकता है। इस लोकतंत्र का एक पर्व है चुनाव और इसके महारथी इसे महापर्व कहते हैं। चौधरी चौपट को चुनाव लड़ने के लिए नए-नए पैतरें सीखने की जरूरत पड़ रही है। वह समर्थकों को बता रहे हैं कि इस महापर्व में चार पैर की कुर्सी रानी की पूजा करनी पड़ती है। क्या पता रानी कब रूठ जाएगी और जनसेवक सड़क पर आ जाएं इसलिए ध्यान रखना पड़ता है।
ढोल-ताशे वाले,ऊं ट, हाथी, घोड़े यही नहीं गदहा तक के लिए इस महापर्व में आमंत्रण पत्र तैयार किये जा रहे हैं। तरह-तरह के गानों का कापीराइट खरीदा जा रहा है। इस पर हो रहे बेहिसाब खर्च से अनजान एक पोस्टर बनाने वाले ने कहा कि इस महापर्व के आने से एक महीने में ही साल भर का खर्च निकल जाता है। पिछली सदी के उत्तराध्र्द में हुए मध्यावधि चुनाव में समझ लिए हमारी चांदी हो गई थी। हम तो मनाते हैं कि यह महापर्व हर साल आए।
राजनीति का ककहरा सीख रहे चौधरी चौपट इस पर्व के आने से मगन हैं। नए-नए कुर्ते का आर्डर दिया जा रहा है। अपने क्षेत्र में लोगों का सुख-दुख पूछा जा रहा है। अद्धा, पौवा और पूरी बोतल का इंतजाम भी अपने चरम पर है। माने खर्च बेहिसाब, लेकिन पैसा न होने से नेता जी के सामने धर्म संकट है। इस मंगल उत्सव को मनाने के लिए दक्षिणा की व्यवस्था सबसे सामने परेशानी का संक ट बन गई है। बहन जी के भाइयों ने एक इंजीनियर को जबसे निपटाया, नेता जी के गुर्गे सरकारी लोगों को फिलहाल कम छू रहे हैं। किसी ने सलाह दे दी कि पूंजीपतियों की घंटी बजाई जाए लेकिन नेता जी परेशान हैं, वह बता रहे हैं कि ये बैरा गए हैं पुराना जूता, चम्मच, कटोरी, चश्मा, लाठी यही सब खरीद रहे हैं इस महापर्व की दक्षिणा के लिए ही इनकी मुट्ठी नहीं खुलती।
किसी ने कहा किसानों से ले लो, बजट में सरकार ने इनकी बहुत सुनी है और फसल भी कटने वाली है। बस क्या था, पकड़ लिए गए गांव के वरिष्ठ खेतिहर लेकिन दशा ऐसी कि चौपट जी चकरा गए। इकहरा बदन देखकर किसी ने पूछा ये क्या हाल बना रखी है? सरकारी योजनाएं यहां नहीं लागू होती क्या? क ल्लू किसान ने कहा, होती हैं लेकिन जमाखोर, सूदखोर, कामचोर ये सब सरकारी मौसेरे भाई हैं। क्या करें पंचायत, प्रधानी, विधान सभा और लोक सभा चुनाव इसमें दक्षिणा देते-देते बस शरीर पर हड्डी का ढांचा बचा है। जाने किस गोंद से चिपका है कि हड्डियां बिखरती नहीं है। नेता जी वहां से हट कर दूसरे के पास दक्षिणा के लिए चले गए।
अभिनव उपाध्याय
Saturday, March 7, 2009
उद्गार
पंकज चौधरी जी हमारे सहकर्मी और कवि भी हैं। बिहार में मिथिलांचल की मिट्टी की महक और समसामयिक समस्याओं पर उनके उद्गार प्राय: शब्दों के रुप में बयां हो ही जाते हैं । प्रस्तुत है इसी तरह के कुछ उद्गार-
गरमी
भीषण गरमी है
आग के गोले बरस रहे हैं
पत्ता तक नहीं हिल रहा
पाताल भी सूख गया होगा
पिछले पच्चीस सालों का
रिकार्ड भंग हो गया है
..............
बड़े-बूढों की गरमी
ऐसे ही निकल रही थी
और दूधमुंहे-बेजुबान बच्चों की गरमी
घमोरियों में निकल रही थी ।
2. कैसा देश, कैसे-कैसे लोग
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कल तक जो बलात्कार करते आया है
और बलत्कृत स्त्री के गुप्तांगों में बंदूक देते चला आया है
कल तक जो अपहरण करते आया है
और फिरौती की रकम न मिलने पर
अपहृत की आंखें निकाल कर
और उसको गोली मारकर
चौराहे के पैर पर लटका देते आया है
कल तक जो राहजनी करते आया है
और राहगीरों को लूटने के बाद
उनके परखचे उड़ा देते आया है
कल तक जो बात की बात में
बस्तियां-दर-बस्तियां फूंक देते आया है
और विरोध नाम की चूं तक भी होने पर
चार बस्तियों को और फूंक देते आया है
कल तक जिसे
दुनिया की तमाम बुरी शक्तियों के समुच्चय के रूप
में देखा जाता रहा है
और लोग-बाग जिसके विनाश के लिए
देवी-देवताओं से मन्नतें मांगते आया है
आज वही छाती पर कलश जमाए लेटा हुआ है
नवरात्र में
दुर्गा की प्रतिमा के सामने
उसकी बगल में
दुर्गा सप्तशती का सस्वर पाठ किया जा रहा है
भजन और कीर्तन हो रहे हैं
कुछ लोग भाव-विभोर नृत्य कर रहे हैं
उसकी आरती उतारी जा रही है
अग्नि में घृत, धूमन और सरर डाले जा रहे हैं
घण्टी और घण्टाल बज रहे हैं
दूर-दूर से आए दर्शनार्थी
अपने हाथों में फूल, माला, नारियल आदि लिए
उसकी परिक्रमा कर रहे हैं
उसके पैरों में अपने मस्तक को टेक रहे हैं
और करबद्ध ध्यानस्थ
एकटंगा प्रतीक्षा कर रहे हैं
उससे आशीर्वाद के लिए
ये कैसा देश है
और यहां कैसे-कैसे लोग हैं!
3. वाह-वाह रे हमारा भारत महान
खाने-खेलने की उम्र में
कूड़े के ढेर पर
पोलिथिन बिछते बच्चे
अपने देश के नहीं
बल्कि जापान के बच्चे हैं
और उनकी धंसी हुई आंखें
पांजर में सटा हुआ पेट
और जिस्म पर गिननेवाली हड्डियों की रेखाएं
अपने देश की नहीं
बल्कि सोमालिया की हैं
और उनकी अर्जित की हुई सम्पत्ति
अपने देश भारत की है
वाह-वाह रे हमारा भारत महान!
4. चोर और चोर
पूस का महीना था
और पूरबा सांय-सांय करती हुई
बेमौसम की बरसात झहरा रही थी
जो जीव-जन्तुओं की हड्डियों में छेद कर जाती थी
और उसे उस बीच चौराहे पर
उस रोड़े और पत्थर बिछी हुई रोड पर
बूटों की नोक पर
फुटबाल की तरह उछाल दिया जाता था
तत्पश्चात उसकी फै्रक्चर हो चुकी हुई देह पर
बेल्टों की तड़ातड़ बारिश शुरू कर दी जाती थी
उसे लातों, मुक्कों, घुस्सों, तमाचों
रोड़े और पत्थरों से पीट-पीटकर
अंधा, बहरा, गूंगा और लूला बना दिया गया था
उसे बांसों और लकड़ियों से भी डंगाया जा रहा था
उसके ऊपर लोहे की रडों का ताबड़तोड़ इस्तेमाल करके
उसके दिमाग को सुन्न कर दिया गया था
और उस सबसे भी नहीं हुआ
तो उसके लहूलुहान मगज पर
चार बोल्डरों को और पटक दिया गया
जुर्म उसका यही था
कि वो एक चोर था
और एक बनिये की दुकान में
चोरी करते हुए पकड़ा गया था
दुनिया के सबसे बड़े और महान लोकतंत्र में
मानवाधिकार का साक्षात उल्लंघन हो रहा था
और ऐन उसी रोज एक चोर और पकड़ाया था
जो राष्ट्र का अरबों रुपया डकार गया था
लेकिन उसके लिए एयर कंडिशंड जेल का निर्माण हो रहा था!
5. यदि तुम्हारे
यदि तुम्हारे
कान बंद कर दिए जाएं तो?
तुम नहीं सुनोगे
यदि तुम्हारी आंखें
बंद कर दी जाएं तो?
तो तुम नहीं देखोगे
और यदि तुम्हारे
मुंह पर जाबी लगा दी जाए तो?
तो तुम्हारा शेर बनना लाजिमी है!
6. वे जब-जब राजपथ की ओर मुड़े
वे जब-जब राजपथ की ओर मुड़े
उनके बारे में प्रचार किया गया कि
उनके पास हाथ तो हो सकते हैं
पर खोपड़ी कहां
उनके सिर पर ताज तो हो सकता है
पर वैसा गौरव कहां
उनकी ही पूरी दुनिया है
क्या है कोई ऐसा विश्वासभाजन?
वे दुनिया को चला तो सकते हैं
पर वैसा चालक कहां
दुनिया के प्रति वे वफादार भी हो सकते हैं
क्या हैं कोई ऐसा माननेवाले माननीय?
उनके पास कुरूपता हो सकती है
सुन्दरता नहीं
उनकी जगह नरक में हो सकती है
स्वर्ग में नहीं
वे असुर हो सकते हैं
सुर नहीं
उनका स्थान पदतल है
सिर ऊपर नहीं
उनका राहु हो सकता है
चन्द्रमा नहीं!
वे कौन थे
और किनके बारे में ऐसा प्रचार करते आ रहे थे
आखिर उनका मकसद क्या था?
7. सचमुच
सचमुच में आप
बदलाव चाहते हैं?
सचमुच में आप
परिवर्तन चाहते हैं?
और सचमुच में आप
दुनिया को बदल देना चाहते हैं?
तो हटाइए
बोरिंग के उस मुहाने पर से
अपना जकड़ा हुआ हाथ
जिसकी कल-कल करती धारा को
आपने आजतक निकलने ही नहीं दिया!
- पंकज चौधरी
Friday, March 6, 2009
नजरें जो बदलीं..

नजरें जो बदलीं..
पिछले एक सप्ताह से बौद्धिक वर्ग से ताल्लुक रखने वाली महिलाएं बेहद सक्रिय नजर आ रही हैं। इन दिनों अखबार और चैनलों में भी कोई न कोई महिला संबंधी लेख पढ़ने को मिल ही जाता है। सबसे ज्यादा व्यस्त इन दिनों महिला पत्रकार हैं, क्योंकि उन्हें आठ मार्च के लिए सामग्री जो जुटानी है। मुश्किल यह है कि पुरानी बोतल में नई शराब भरें भी तो कैसे। क्योंकि महिलाओं की समस्याएं भी पुरानी हैं और समाज का नजरिए में भी कोई खास बदलाव नहीं आया है। लेकिन कलमकार होने की रस्म तो अदा ही करनी होगी। ऊपर मैंने समाज के नजरिए की बात की वही पुराना, घिसा-पिटा नजरिया। पहले सोचा भ्रूण हत्या पर लिखूं पर कुछ नया नहीं लगा। तकरीबन डेढ़ दशक पुराना है यह मुद्दा। दहेज पर हजारों लेख लिखे जा चुके हैं। घरेलू हिंसा अभी पं्रह दिन भी नहीं बीते मैंने हैबिटाट सेंटर के गुलमोहर हाल में इस मुद्दे को लेकर सीएसआर के सौजन्य से आयोजित एक प्रेस वार्ता में शिरकत की थी। सरकार के प्रति बहुत गुस्सा था बौद्धिक वर्ग की महिलाओं में। आरक्षण का मुद्दा भी उठाया गया। दबी कुचली महिलाओं के लिए इन परोपकारी महिलाओं ने आवाज उठाई। वार्ता खत्म करके जब मैं बाहर आई तो ऊनी शाल बेच रही महिला के भावहीन चेहरे को देखकर मैं समझ गई कि यह अंदर चलने वाली महिला आजादी की मुहिम से बेखबर है। सो इस मुद्दे को भी मैंने छोड़ दिया।
मुद्दा तलाशते-तलाशते मैं अचानक दिल्ली की वढेरा गैलरी में पहुंच गई, वहां पर लगी फोटोग्राफी की प्रदर्शनी देखकर मुङो सुकून का एहसास हुआ। इसलिए नहीं क्योंकि यह किसी महिला फोटग्राफर के फोटो की प्रदर्शनी थी, बल्कि इसलिए क्योंकि दिल्ली तक पहुंचने वाली यह महिला शादी गार्डिया एक ऐसे देश से ताल्लुक रखती है जहां आज भी बुर्का महिलाओं की पहचान है। दीवार पर शादी ने अपने कुछ फोटो भी लगाए थे। एक तस्वीर में शादी अपने कैमरे को निहार रही हैं। उस चेहरे को बेहद बारीकी से देखो तो आपको पता चलेगा कि इस महिला ने अपनी आइब्रो के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की है। बात आइब्रो बनवाने या पार्लर जाने की नहीं है बात है लगन की, ईरान जसे कट्टर देश में अपना वजूद बनाने के लिए इस महिला को कितना जूझना पड़ा होगा। वहां लगी फोटो खुद ही बयान कर देती हैं। बुर्के से ढके चेहरों के ठीक सामने रसोईंघर के बर्तन यानी कप प्लेट, कद्दूकस और भी ना जाने क्या-क्या। इस बात का सबूत है कि बुर्का तो मात्र प्रतीक है, इसकी आड़ में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कई बंदिशों से गुजर कर शादी ने दिल्ला तक का अपना सफर तय किया होगा। हालांकि शादी ने अपने ब्रोशर में इस बात का भी जिक्र किया है कि उसके अब्बा उन तंग दिमाग वाले लोगों से बेहद अलग थे जो लड़कियों की आजादी के खिलाफ होते हैं। यह तो महज एक उदाहरण है जो हालिया होने की वजह से मेरे जहन में ताजा था सो लिख दिया। लेकिन और भी ऐसी महिलाएं हैं जिन्हें बंदिशें रोक नहीं पाईं। पर ऐसी महिलाएं महिला दिवस जसे आयोजनों से दूर ही रहती हैं। उनका आदर्श कोई जुझारु इंसान होता है। उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि वह महिला है या पुरुष। वह चीख-चीख कर किसी आरक्षण की मांग भी नहीं करती हैं। मुझसे किसी ने कहा था कि नजरें क्या बदली नजारे बदल गए। शादी जसी महिलाएं नजरें बदलती हैं और ढूंढ़ती हैं अपने हिस्से का आकाश।
संध्या द्विवेदी, आज समाज
Thursday, March 5, 2009
जय हो, मगर किसकी!
खबर है कि सत्ताधारी दल कांग्रेस ने आस्कर विजेता फिल्म स्लमडाग मिलियेनर के गाने जय हो के कापीराइट को खरीद लिया। अब इस गाने की धुन पर कई जिंगल्ल बनाए जाएंगे। जिनका प्रयोग आगामी लोकसभा चुनाव में जनता तो लुभाने के लिए किया जाएगा। वैसे फिल्मी गानों पर राजनैतिक पार्टियाों का थिरकना नया नहीं है। फिल्म चक दे इंडिया में शाहरुख की टीम ने विपक्षी टीम को शिकस्त क्या दी। बस चक दे एक जुमला बन गया। राजनीति हो या क्रिकेट बस मैदान में एक ही गाना गूंजता था। चक दे, चक दे। तब भी कांग्रेसी इस गाने की धुन पर थिरके थे। तब इसका इस्तेमाल गुजरात में किया गया था। हालांकि गुजराती मन पर इस गाने का कोई असर नहीं हुआ। और रील लाइफ से इतर कांग्रेस को रीयल लाइफ में हार का मुंह देखना पड़ा था। जनता ने मोदी को सत्ता सौंप कर यह साबित कर दिया था कि वोट प्रचार पर नहीं, बल्कि मुद्दों पर मिलते हैं। गुजरात की जनता के मन में मोदी यानी विकास पुरुष के रूप में स्थापित हैं। हालांकि यह भी बहश का मुद्दा है कि गुजरात की चमक कितनी सतही है। क्योंकि हालिया कुछ खबरों पर गौर करें तो गुजराते के गांव-देहात में यह चमक फीकी पड़ती दिखाई देती है। खैर, इस बात को तब तक नहीं उठाया जा सकता जब तक आंखों न देख लिया जाए। फिर भी धुआं उड़ा है तो कहीं न कहीं आग तो होगी ही। यानी पूरी न सही पर कुछ प्रतिशत ही सही सच्चाई तो जरूर होगी। खैर राजनीति विषय ही ऐसा है कि किसी एक गली में गुजरते ही कई रास्ते खुल जाते हैं। यानी किसी एक पार्टी का जिक्र करो तो खुद-बखुद कई पार्टियां उस बहश की जद में आ जाती हैं। हम बात कर रहे थे जय हो की। आस्कर विजेता फिल्म स्लमडाग में यह गाना पूरी फिल्म की आत्मा है। किस तरह स्लम में रहने वाला एक बच्चा केबीसी सरीखे प्रोग्राम में एक करोड़ रुपए जीतने में कामयाब होता है। जय हो, जीत और सफलता का पर्याए है। कांग्रेस ने भी जीत के मंसूबों के साथ ही इस गाने को प्रचार का माध्यम बनाया है। पर गुजरात की हार से पार्टी को सबक तो जरूर लेना चाहिए कि अब जनता को लुभाना आसान नहीं है। प्रचार का सुर जो भी हो, लेकिन जब तक असल मुद्दों को न केवल उठाया जाएगा बल्कि सत्ता में आने के बाद अमल में भी लाया जाए तभी जनता उन्हें सड़क से संसद तक जाने का मौका देगी। ध्यान रहे रास्ता दोतरफा है, दूसरा रास्ता संसद से सड़क तक का भी है। जय हो, लेकिन केवल पार्टी की नहीं बल्कि इस जीत में जनता भी शामिल हो।
संध्या द्विवेदी, आज समाज
Thursday, February 26, 2009
Monday, February 23, 2009
सबकी जय हो
स्लमडॉग मिलेनियर ने भारतीय सिनेमा के लिए भी इतिहास रच दिया। अब विदेशी सिनेमा के लोग भी भारतीयों को थोक के भाव अवसर देगें। पहले बस गिने चुने लोग ही हालीवुड में जाकर अर्ध, पूर्ण और अपूर्ण तरीके से डायलॉग बोलते समय मुंह खोलते थे। जो नहीं जा पाते थे। उनका कलेजा कचोटता था लेकिन फिलहाल संकरा रास्ता और चौड़ा हो गया है। अब भारतीय लोग भी विदेशियों के साथ इस चौड़े रास्ते पर चलेगें। मुम्बई का हर स्लमडॉग अब मिलेनियर बनने के लिए डैनी बोएल का इंतजार करेगा। काश किसी की नजर इधर पड़ जाए।
भारतीय सिनेमा जगत और व्यापार पर भी इसका असर पड़ेगा। तमाम बेस्लमडाग सोच में पड़ गए होंगे। गुलजार ने एक बार फिर अपने को सिद्ध कर दिया। अल्ला रक्खा रहमान अब हालीवुड के मेहमान बन जाएगें। शायद इनका भी रेट बढ़ जाए। अनिल कपूर को भी इसका फायदा मिलेगा। फ्रिदा पिंटो और देव पटेल की भी कई फिल्मों के लिए आफर पाएंगें। माने एक साथ सबकी जय हो गई।
इतनी बधाइयां मिली की मन अघा गया। जय हो गाना, बजट पास होने के बाद पराजय की मुद्रा होने पर भी जुबान पर चढ़ गया। मतलब तबीयत कैसी भी हो हर हाल में जय हो।
सब फायदों के बीच एक बात समझ में नहीं आई, क्या गुलजार ने जय हो से बेहतर गाने नहीं लिखें हैं या रहमान ने इससे अच्छा संगीत नहीं दिया है या भारतीय कलाकारों ने इससे बेहतर अभिनय नहीं किया है। इसका उत्तर भी हम जानते हैं। क्योंकि भारत का हिंदी भाषी गीत प्रेमी गुलजार को और पूरे भारत का संगीत प्रेमी रहमान की संगीत का दीवाना है। लेकिन जब ऑस्कर की बात आती है तो हमें सारी योग्यता मूढ़ता में बदल जाती है। हमें शुक्रगुजार होना चाहिए डैनी बॉयल का जिसकी बदौलत हमारे देश में भी आस्कर आ गया और हम सुबह से ही जय हो-जय हो कहते लगे। एक प्रश्न जो कचोटता है वह यह है कि आखिर कब तक हमें ऑस्कर के लिए डैनी बॉयल जसे लोगों की राह देखनी पड़ेगी।
Saturday, February 21, 2009
इन्हे देखकर याद आया कुछ

इन्हे देखकर याद आया कुछ
‘मैं पिछले बाइस साल से यहां आती हूं। तब मेले में मजदूरी करने आई थी, लेकिन जब यहां पर लोगों की भीड़ देखी तो लगा मैं भी सामान बेंच सकती हूं और तभी से हर साल आती हूं।ज् राजस्थानी लोक कला को समृद्ध करने भंवरी देवी सूरजकुंड मेले में तब से आती हैं जब से यह मेला शुरु हुआ है। दिल्ली और आस-पास के लोगों को राजस्थानी लोक कला इतनी भाती है कि इनका कोई भी सामान बच कर वापस नहीं जाता। चाहे लड़ी हो या छल्ले, कठपुतली हो या इंडी या फिर कपड़े का बना पर्स, घोड़ा या गणेश जी इनकी हर सामान से ग्राहक मौजूद हैं।
इस काम में इनका बड़ा लड़का मदन मेघवाड़ सहयोग करता है। ये गांव की चक्की पर बाजरा पीसती हुई दर्शकों को दिखाती हैं। उनका कहना है कि शहर के लोग चक्की नहीं देखे हैं इसे चलाते हुए वह देखना चाहते हैं, खासकर बच्चे इसमें काफी रुचि लेते हैं।
भंवरी देवी ने यह काम कैसे सीखा इसके बारे में वह बताती हैं कि ‘जब मैंे दस साल की थी तभी से बकरी चराती थी और उन लोगों के पास बैठती थी जो कसीदेकारी और गोटे का काम करती थी तभी से मैं भी यह बनाने लगी।ज् इनके काम की खासियत यह है कि इसमें केवल सुई-धागा और कतरन का प्रयोग किया गया है। मात्र सोलह रुपए दिहाड़ी पर काम करने वाली भंवरी देवी मेले में अपनी रोज की आमदनी पांस सौ से दो हजार बताती हैं। लगभग बासठ वर्षीय भंवरी देवी कला श्री सम्मान से सम्मानित हो चुकी हैं। राजस्थान में नागौर जिला के भांवता गांव की रहने वाली भंवरी देवी जब अपने गांव होती हैं तो शादी या अवसरों पर गीत भी गाती हैं। मेले के बारे में वह बताती हैें कि यहां पर मिलने वाला लोगों का प्यार उन्हे इस उम्र में भी खींच लाता है।
ये एक खबर है अखबार के लिए लेकिन इसमें कई सच्चाई भी है जसे आज के युवा चक्की से अनभिज्ञ हैं। कबीर ने चक्की को पूजने की बात की थी लेकिन आज का युवा मेले में इस चक्की को देखते आता है। कितने तो वहां पर अजीब-अजीब से सवाल भी करते थे। भंवरी एक मिसाल लगी। मेहनत की। साहस की। और अपनी में से अर्जित की गई प्रतिष्ठा की।
लेकिन आखिर यह बाल मन कब तक खोजेगा, सरसों के फूल, गेंहू की बाली। ओखल-मूसल या आम की डाली। पब्लिक स्कूल का अध्यापक कबीर के दोहा पढ़ाने के बाद कैसे बता पाएगा कि चक्की कैसी होती है।
एक सवाल जो कौंधता है वह यह है कि हम वाकई अपनी जड़ों से कितना कट गए हैं।
अब एक व्यक्ति गत अनुभव बताता हूं- दिल्ली में दस रुपए गिलास गन्ने का रस पीना खल जाता है इस छोटी कमाई में और गांव का कोल्हू शायद तब बहुत याद आता है और देर तक पकते हुए गुड़ की खुशबू मदहोश कर देती है।
अभिनव उपाध्याय
Monday, February 16, 2009
सन्नाटा का संगीत
सन्नाटा का संगीत
संगीत जीवन से जुड़ा वह आवश्यक तत्व है जिसके बिना फीका है सबकुछ। यह किसी भी तत्व से उत्पन्न हो सकती है। चाहे सिल-बट्टे की खट-खट हो या चक्की के दो पाटों का घर्षण, चाहे ओखल में मूसल का प्रहार हो या सूप में उछलते गेहूं की ध्वनि, गरजते बादल हों या बूदों की रिमझिम, ऊंचाई से लहराकर गिरता झरना हो या समुद्र में थिरकती लहरों की उछल-कूद, पंक्षियों की फड़फड़ाहट हो या हवाओं की सरसराहट, सांसों की गति हो या दिल की धड़कन, सब में बसा है एक सुनाई देने वाला संगीत। लेकिन अगर सन्नाटा का संगीत सुनना हो तो पंडित बिरजू जी महाराज की महफिल में शिरकत करें और उनसे इसकी प्रस्तुति के लिए आग्रह करें। इकहत्तर वर्षीय पंडित जी की यौवन मदमाती प्रस्तुति आपको मंत्रमुग्ध कर देगी।
स्पिक मैके के सौजन्य से आयोजित लेडी श्रीराम कालेज में पंडित बिरजू जी महाराज के कथक नृत्य की प्रस्तुति की सूचना जसे मिली मन में एक बेचैनी सी हो गई, क्योंकि मैं कई दिनों से उनका कार्यक्रम देखने की चाहत पाले बैठा था। मेरा मानना है कि दिल्ली की भागमभाग में ऐसे कार्यक्रम अगर आप देखे तो ये आपको रिचार्ज कर देते हैं।
अपने सहकर्मी मित्र आलोक को जब यह बात बताई तो वह खुशी मन से मेरे साथ चलने को तैयार हो गए। वजह मैं जानता हूं, एक तो वह साहित्य प्रेमी हैं और दूसरे संगीत के प्रति अनुग्रही। एक सच यह भी है कि हम दोनों संगीत की गूढ़ता के अल्पज्ञ भी हैं। इसलिए एक दूसरे पर अपनी विद्वता आरोपित, प्रतिरोपित और अंतत: सहमति प्रदान क रते हैं। उनका कम बोलना हमें अवसर देता है।
बहरहाल, हम मदर डेरी से आए नोयडा मोड़ लेकिन कम्बख्त बस छूट गई, भला हो उस माल ढोने वाली टैक्सी का जिसने हमें गन्तव्य तक पहुंचाया। लेकिन हमें देर हो रही थी और आयोजन स्थल हम दोनों ने नहीं देखा था। मुश्किल तब हो गई जब हमें रास्ता भी गलत बता दिया गया। अब ये सोच रहा था कि कहीं कार्यक्रम शुरु न हो जाए लेकिन जब कार्यक्रम में पहुंचे तो पंडित जी ठीक पहले मंच पर आए थे और लोग खड़ा होकर उनका स्वागत कर रहे थे। पंडित जी के प्रशंसकों की भीड़ ने हमें बालकनी में बैठने को मजबूर कर दिया नहीं तो हम पंडित जी को करीब से निहारना चाहते थे। अद्भुत भाव-भंगिमा और घुंघरु की खनक के बीच पंडित जी ने अपने पिता और गुरु पं. लक्षन जी महाराज के बारे में बताते हुए अपना परिचय दिया। कथक और संगीत के बारे में जो उन्होंने बताया उनकी कुछ बातें इस प्रकार हैं, ‘संगीत वह भाषा है जो लय के आंचल में छिपी बैठी है। ताल लय को मात्रा देते हैं और घुंघरु उसे लय देते हैं। लय ईश्वर की कृपा है, यह हमारी जिंदगी है। संगीत हर जगह है। सन्नाटा में भी संगीत है।ज् इस संक्षिप्त उद्बोधन के बाद पंडित जी ने राग मालकोश में, ‘बरनत छवि श्याम सुंदर, लसत अंग पीत बसन, बंक भृकुटि गरे भाल..ज् पर मनमोहक प्रस्तुति दी।
इसके बाद शुरु हुई विशेष प्रस्तुति, मैंने बहुत से शास्त्रीय कार्यक्र म देखें हैं लेकिन ‘सन्नाटा के संगीतज् को सुनने और महसूस करने का यह हमारा पहला अनुभव था। घुंघरु की हल्की खनक और वातावरण की शांति पूर्ण सन्नाटा का आभास दे रही थी।
शरीर की लचक और पैरों की थिरकन से कहीं भी नहीं लगता था कि यह प्रस्तुति इकहत्तर वर्षीय उस जवान की है जो जिसे गुरु मानकर न जाने कितने जवान कथक की शिक्षा लेते हैं।
इस प्रस्तुति के बाद अब बारी थी तीन ताल की पर प्रस्तुति की। पंडित जी ने बताया कि तीन ताल आकाश है और घुंघरु इसमें तारों की भांति चमक रहा है। इसके बाद तीन ताल की पूरी प्रस्तुति में घुंघरु सुरों के बीच टिमटिमाता रहा। फिर पंडित जी ने छन्द, लय, ताल और बोल के माध्यम से कार्यक्रम में तराना, आरोह-अवरोह के बीच लचकती कमर और थिरकते पांव ने ऐसा जादू किया कि दर्शक समूह मंत्रमुग्ध सा देखते रह गये और हर प्रस्तुति पर दर्शकों की अनवरत तालियां बजती रहीं।
इसके बाद की प्रस्तुति भी आकर्षक और आनंदायक भी थी क्योंकि अब नायक और नायिक के यमुना पर मिलन की बारी थी। दरअसल नायक तबला था और नायिका घुंघरु थी। नायक आगे-आगे और नायिका पीछे-पीछे। इस बीच नायक का रुकना, नायिका का उसे चिढ़ाना, नायक का रुठना और नायिका का मनाना, नायिका के पांव में कांटा चुभना और नायक द्वारा निकालना, और एक कहासुनी के बाद अंतत: यमुना के किनारे दोनों का मिलन। इसका कथक के माध्यम से प्रस्तुति पर सैकड़ों हाथों की तालियों की गड़गड़ाहट की गूंज देर तक हाल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही। दर्शकों के लिए इस न भूलने वाली प्रस्तुति के बाद पारंपरिक कथक के साथ कुछ नए प्रयोग पंडित जी ने दिखाए, इसमें सांप-नेवला की लड़ाई, प्रकृति का चित्रण और अंतत: एक आलसी व्यक्ति की गतिविधियों के माध्यम से हास्य प्रस्तुत किया वह किसी भी लाफ्टर शो अधिक मनोरंजक लगी। यही नहीं इशारों में गोपनीय बातचीत की प्रस्तुति ने मानों लोगों को लोट-पोट कर दिया।
और अब अंत में एक ठुमरी की प्रस्तुति, ‘मोरी गागरिया काहे को फोरी रे श्याम, मैं तो गारी दूंगी ना..., जाए कहूंगी नन्द के दुआरे..ज् की प्रस्तुति के साथ इस कार्यक्रम का समापन किया। उनके साथ उस्ताद अकरम खान ने तबले पर थिरकती अंगुलियों का जो जादू बिखेरा उससे सभी दर्शक उद्वेलित हो गए। राजेश प्रसन्ना ने सरोद पर अच्छी प्रस्तुति दी।
इस तरह एक शाम सुहानी बीती। इसके बाद मैं हर उस शाम को जब अकेला होता हूं तो सन्नाटा में संगीत ढूंढता हूं और उसके मिलने पर एक मिठास देर तक महसूस करता हूं।
अभिनव उपाध्याय
Thursday, February 12, 2009
ये इश्क नहीं आसां...

ं ये इश्क नहीं आसां...
प्रेम दिवस के साथ ही नागफनियां भी उगने लगती हैं। युगल लुकाछिपी शुरु कर देते हैं। ये प्रेम पुजारी बचते रहते हैं कि कहीं श्रीराम भक्तों द्वारा घंटा न बज जाए। सहीराम ने अपने कवि मित्र से पूछा कि इस बार क्या प्रोग्राम है। उन्होनें दबी जुबान से कहा कि क्या बताएं, मंहगाई ने जेब ढीली कर दी है और शिव,राम की सेना ने. . .।
मधुमास मनाने की संभावनाएं बनने से पहले बिगड़ जाती हैं। आप तो जानते ही हैं कि लव मी, लव माई डाग। दरअसल उनका डॉग बेस्लम डॉग है, बहुत चटोर है। हमेशा बढ़िया चाकलेट ही खाता है। लव के चक्कर में डॉग की इतनी सेवा हो गई कि मधु चन्द्रिका की मिलन यामिनी को मंहगाई का ग्रहण लग गया। इस बार मधुमास को खास बनाने की सारी योजनाएं पानी भरती नजर आ रही हैं। फिर भी बड़ी मुश्किल से अठन्नी-चवन्नी जोड़कर रखा था कि 14 फरवरी को प्रेम दिवस मना ही लेंगे लेकिन डर लग रहा है कि पकड़े गए तो स्वघोषित नैतिक ब्रिगेड के सैनिक कहीं तेरही न कर दें। सुना है जितना राम ने सीता को नहीं खोजा था उससे अधिक श्री राम सेना वाले युगलों को खोज रहे हैं। अब सच बताएं सहीराम जी किसी ने सच ही कहा है कि ये इश्क नहीं आसां..।
सहीराम जी पिछले दिनों एक अद्भुत दुर्घटना मेरे साथ हो गई, वसंत के आगमन पर शहर के घोषित रसिकों ने ‘प्रेम पियासाज् कवि सम्मेलन किया उसमें मुङो भी आमंत्रित किया गया था। सच कहूं तो ‘लवज् पर कविता पाठ का आमंत्रण पाकर मन लबालब हो गया। मैंने कविता शुरू की, ‘मोहिनी तेरे नैन कटार, झंकृत होते मन के तारज् अभी स्वर पंचम तक पहुंचा ही था कि मंच के पीछे भगवा और त्रिशूल धारी भाइयों को देखा और श्रृंगार रस की कविता वीर रस में बदल गई। सहीराम ने आगे पूछा, क्या आपने कविता सुनाई? उन्होंने कहा हां लेकिन ऐसे- ‘गोरी तेरे नैन कटार, कर दुश्मन को तार-तार। तोड़, मरोड़ गर्दन उसकी, बैरी छुपा है सीमा पार।ज्
परेशानी तब हो गई जब इस अद्भुत कविता को सुनाकर श्रोताओं ने मुङो श्रृगांर और वीर रस के संयुक्त कवि ‘रसिक विद्रोहीज् की संज्ञा दे दी। रसिक विद्रोही ने आंख बंद कर संत वेलेंटाइन के प्रेम मंत्र का जप किया और प्रार्थना की कि हे संत जी इन घोंघा बसंतों को सपने में समझाओ, साथ में कवि बिहारी से भी अनुरोध किया और कहा, हे रीतिकाल के केशव इन्हे विरह व्यथा से अवगत कराओ शायद इनका पाषाण हृदय पिघल जाए। इस व्यथा को सुनने के बाद सहीराम ने कहा, इस नैतिक ब्रिगेड से मुङो भी चिंता है क्योंकि इश्क तो ऐसा गुनाह है जो शादीशुदा भी करता है।
अभिनव उपाध्याय
बीन की धुन पर अब सांप नहीं, नाचते हैं सपेरे

सांप पर प्रतिबंध के कारण इसमें सपेरों की होती है भागीदारी
सूरजकुं ड मेले में देश के विभिन्न प्रदेशों से आए लोकनृत्यों को देखने में दर्शकों की रुचि रही लेकिन आजकल मेले सपेरा नृत्य की धूम है। लेकिन आश्चर्य इस बात का है यहां बीन की धुन पर सांप नहीं बल्कि सपेरे खुद अपने साथियों के साथ नाचते हैं।
इस सपेरा नृत्य के मुखिया सीसानाथ ने बताया कि अब सरकार ने सांप नचाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। लेकिन दर्शकों को अब भी बीन की धुन सुनने और सांप का नृत्य देखने का शौक है। इसलिए हमारे नृत्य को देखने के लिए देश में ही नहीं विदेशों में भी दर्शकों की कमी नहीं रही।
मूलत: नाथ संप्रदाय के ये सपेरे कानिपा नाथ को अपना गुरू मानते हैं। उनका कहना है कि लोग हमारे बारे में जानना चाहते हैं हमारे नृत्य और बीन की धुन को भी समझना चाहते हैं।
सीसाराम भारत में हरियाणा ट्यूरिज्म की तरफ से इंडिया हैबिटेट सेंटर से लेकर अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर तीस लोगों के साथ प्रस्तुति दे चुके हैं। इसके अलावा वह विश्व के कई देशों में अपनी प्रस्तुति देने गए हैं। इंग्लैंड में बैंड के साथ ‘आन लॉग सांगज् और स्काटलैंड में ‘इमेजिन ग्रेमज् की धुन पर बीन की प्रस्तुति को वह यादगार मानते हैं यही नहीं एक सौ पांच सपेरों के साथ इटली में बीन की प्रस्तुति पर दर्शकों की सराहना वह आजतक नहीं भूलते हैं। वह हरियाणा सरकार का भी धन्यवाद व्यक्त करते हैं कि जो इस कला को जीवित रखने के लिए आर्थिक सहायता और कलाकारों को प्रोत्साहन देती है।
Saturday, February 7, 2009
एक पत्र कुबेर के नाम
लोकतंत्र में गणतंत्र को याद करने के बाद मंहगाई की मार से त्रस्त एक भारतीय नागरिक ने स्वर्ग में धन के देवता को एक पत्र लिखा। पत्र इस प्रकार है-
प्रिय कुबेर जी
दंडवत नमस्कार, बिना इस परवाह के कि कपड़े गंदे हो जाएंगे और इस आशा में कि शायद इसी बहाने आपकी तिजोरी की कुंडी खुल जाए और स्वर्ण कलश से छलक कर एक दो स्वर्ण मुद्रा इधर भी आ जाए। बड़ी आशा से यह पत्र आपको लिख रहा हूं। पिछले साल भी लिखा था लेकिन साढ़े नौ महीने तक कोई जवाब नहीं आया और इतने दिनों से मंदी बरकरार है। इसलिए फिर लिख रहा हूं मेहरबानी करके रिसीव कर लीजिएगा मेहरबानी होगी।
कुबेर जी धरती की बुलेटिन आप तक पहुंच रही होगी तो पता तो चल गया होगा कि आजकल कलमकारों के फांके कट रहे हैं, लेकिन आप निश्चिंत रहिएगा पुजारियों की चांदी है। मंदिर में भक्तों की कमी नहीं है। परेशानी कामन मैन को है, दुकानदार उनकी जेब काटने के लिए-नए उस्तरे इस्तेमाल कर रहा है। दुकान पर सामानों की रेट बढ़ते जा रहे हैं लेकिन वहां काम करने वाला नौकर सूखता जा रहा है। हमारी सरकार कोशिश कर रही है कि कुछ जादू हो जाए लेकिन आप तो जानते ही हैं कि ये लोग कितने अनाड़ी हैं।
कुबेर जी, हमारे पंडित जी ने बताया था कि आप देवताओं के वित्तमंत्री हैं शायद इसीलिए टीवी से लेकर फोटू तक में देवी-देवता एकदम चकाचक दिखते हैं, गहनों से लकधक। लेकिन हमारे यहां के वित्त मंत्री थोड़ा उस टाइप के हैं क्या करें एक साथ कई जिम्मेदारियां हैं, लड़खड़ा कर खड़े भी होते हैं तो पड़ोसी देश लंगी लगा देता है। हमारे प्रधानमंत्री भी सत्तर पार के हो गए हैं निर्णय भी उम्र के हिसाब से ही लेते हैं। वो आपके इंद्र का क्या हाल चाल है उनके रंग-ढंग बदले कि अभी..। उनसे कहिएगा इस साल थोड़ी मेहरबानी कर देगें हमारे यहां काफी किसान सूखे के कारण आपके पास चले गए हैं।
एक बात और वो युधिष्ठिर जी के कुत्ते का हाल भी लिखिएगा, हमारे यहां तो स्लमडॉग करोड़पति हो गया है और बेस्लमडॉग कार के शीशे से मुंह निकालकर स्लम वालों को जीभ चिढ़ाता है।
मनोरंजन का भी बुरा हाल है फिल्मों के टिकट मंहगे हो गए हैं, तारिकाओं पर मंदी का असर नहीं है इनका रेट बढ़ता ही जा रहा है। लेकिन आप अपने यहां की उर्वशी और मेनका टाइप तारिकाओं के बारे में थोड़ा डिटेल में दीजिएगा। एक बात भूल ही रहा था हमारे वित्त मंत्री को मंदी से निकलने का हल सपने में जरुर दे दीजिएगा भूलिएगा मत।
क्या करुं लिखना तो बहुत कुछ है लेकिन अभी पन्ना भर गया है और पेन की स्याही भी जवाब दे रही है। हमारे यहां पेट्रोल पर सब्सिडी है लेकिन कागज, कलम को कौन पूछता है। और अंत में लक्ष्मी जी से मेरा हेलो कहिएगा।
शेष सब ठीक है!
आपका दर्शनाभिलाषी
दुखीराम
अभिनव उपाध्याय
Friday, February 6, 2009
Monday, February 2, 2009
सत्यम् झूठम् सही है लूटम्
जनवरी की ठंड का अगर सबसे अधिक असर किसी पर पड़ा है तो वह है शेयर बाजार। आदमी तो फिर भी थोड़ा बहुत बाहर घूम टहल लेता है लेकिन शेयर तो ठंड के मारे उठा ही नहीं। ये आलस्य मीडिया को भी था बम्बई बम धमाके के बाद वह भी मसाले के अभाव में बस इधर उधर की दिखा सुना रहा था। एकाएक रामालिंगा राजू ने अपने क्रिया कलापों की जानकारी देकर लोगों के मिजाज में गर्मी ला दी। शेयर तो फिर भी आराम फरमाता रहा। मीडिया में खबर चल रही थी, सत्यम ने झूठा कारोबार दिखाकर करोड़ों रुपए ठगे। माने रामलिंगा राजू ने बिना गंगा नहाए काजू खाने का इंतजाम कर लिया। लेकिन धन्य हो भारत का सपूत कि पत्र लिखकर धोखाधड़ी की आत्मस्वीकृति कर ली। दो दिन भूमिगत रहा और निकला तो सीधे हवालात।
उसका यह कार्य चर्चा में रहा। इस पर तत्काल टिप्पणी के लिए सहीराम ने बाबा अठन्नी से संपर्क साधा। बाबा अठन्नी से जब सहीराम ने राजू की चर्चा की तो उन्होंने कहा, भक्त सहीराम मैं राजू की कारगुजारियों से तंग आ गया था कितनी बार समझाया कि सारा माल अकेले मत उड़ाओ कुछ आश्रम टाइप जगहों पर भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दिया करो, माघ का महीना है दुनिया बाबाओं को दान पुण्य करती है। लेकिन उसके कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अब बताओ देश की चौथी आईटी कंपनी की उसने तेरही कर दी।
सहीराम ने बाबा अठन्नी से कहा कि, बाबा कुछ भी हो रामलिंगा ने तो शेयर को गंगा में डुबा दिया। एकदम से नाक कटा दी। बाबा अठन्नी ने मुस्कुराते हुए कहा, सहीराम तुम्हे नहीं पता ऐसे लोग दो नाक वाले होते हैं। एक कट भी जाए तो दूसरी लेकर मुस्कुराते हुए जेल के बाहर फ्लाइंग किस देते हुए फिर वापस आ जाते हैं। सहीराम ने गर्दन हिलाते हुए बाबा अठन्नी की बात पर हैरानी जताई और बोले बाबा रामलिंगा राजू ने आत्मस्वीकृति करके अपनी नाक पर ही उस्तरा चला लिया। यही तो बात है भक्त, तुम्हे मार्केट का मंत्र पता नहीं है। राजू की इस क्रिया के बाद न जाने कितने विशेषण जुड़ते गए। सरकार ने भी उस पर अपनी सहानुभूति जता कर मदद करने की अपील की है। राजू ने यह काम अपने आजू-बाजू देखकर किया है।
सहीराम ने कहा, लेकिन कंपनी की तो काफी साख थी अब क्या होगा? होना क्या है इस कंपनी को तो अभी इक्कीसवां लगा है और जवानी में ऐसी गलती हो ही जाती है इसे सरकार भी समझती है और व्यापार भी। एक लाइन में बाबा इस प्रकरण को क्या कहेगें, सहीराम ने पूछा? बाबा ने कहा, सत्यम् झूठम् सही है लूटम्।
Monday, January 12, 2009
डिप्लोमा इन चाटुकारिता
विश्व आर्थिक मंदी में गोते खा रहा है। कंपनियां लोगों की कास्ट कटिंग कर रही हैं। ऐसे दौर में हमारा काम लोगों को सही तरह से सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में उन लोगों को ट्रेनिंग देना है जो लोगों की तारीफ करने में थोड़ा झिझक महसूस करते हैं। डिप्लोमा इन चाटुकारिता कोर्स के प्रबंधक लम्पट जी बड़े चाव से इसके बारे में सहीराम को बता रहे थे। सहीराम ने उनसे पूछा कि, इस कोर्स को शुरू की जरूरत आपको कैसे महसूस हुई? लम्पट जी ने कहा, यह मेरे व्यक्तिगत अनुभव की देन है। ऐसा हुआ कि मैं एक पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता था लेकिन मुङो चाटुकारिता नहीं आती थी और उम्र के इस पड़ाव पर भी मुङो टिकट नहीं दिया गया। लेकिन राजनीति को छोड़ कर अन्य क्षेत्रों में इसकी क्या उपयोगिता है? सहीराम ने पूछा, लम्पट जी ने मुस्कुराते हुए कहा, लगता है आप भी बिल्कुल सीधे ही हैं, अरे मिनिस्टर से लेकर चपरासी तक इसकी कमी के कारण प्रतियोगिता से बाहर हो जाते हैं और अब तो इसकी जरूरत व्यापक पैमाने पर महसूस होने लगी है।
सहीराम ने इसमें एडमिशन से संबंधित प्रक्रिया पूछी और लम्पट जी ने रिसेप्शन की तरफ इशारा कर दिया। रिसेप्शन पर बैठी चंचला चंद्रमुखी ने ड़ेढ इंच की मुस्कान के साथ ‘हाय हैंडसमज् कहकर उनका स्वागत किया। सहीराम ने उनसे पूछा, कितनी फीस देनी होगी। चंद्रमुखी ने कहा फीस का क्या है इसे डोनेशन ही समझिए यह पब्लिक वेलफेयर में ही है। वैसे आप जसे स्मार्ट के लिए पांच हजार कोई बड़ी रकम नहीं है। अगला सवाल था, यह कोर्स कितने दिनों का है? यह एक हफ्ते के शार्ट टर्म कोर्स की फीस है वैसे हमारे यहां एक महीने, दो महीने से लेकर एक साल तक के कोर्स भी कराए जाते हैं। अगर मास्टर डिग्री या रिसर्च करना हो तो फीस थोड़ी ज्यादा लगेगी लेकिन इसके फायदे की आप कल्पना तक नहीं कर सकते। सहीराम उसकी आंखों की चमक देखकर चौंधिया रहे थे तभी उसने क हा, आप को देखकर ऐसा लगता है कि आप जल्द ही सीख जाएंगे, इसलिए आपके लिए शार्ट टर्म कोर्स ही बेहतर होगा। सहीराम ने फिर पूछा कि आप के यहां कौन-कौन से लोग आते हैं? ओए यंग मैन, ये पूछिए कौन नहीं आता है हमारे यहां राजनीति, फिल्म, कारपोरेट, एजूकेशन, सरकारी मुलाजिम और अलग-अलग क्षेत्रों से लोग आ रहे हैं। पिछले दिनों रिफ्रेशर कोर्स के बदौलत ही कितनों ने इसका लाभ उठाया। अब आप भी देर न करें और दिलखोलकर इसका लाभ लें। उसने मुस्कुराते हुए एक दीर्घ सांस में यह बात कह दी।
सहीराम ने उनका फार्म लौटाते हुए कहा कि, वैसे आपके चेहरे से आपकी उम्र का पता नहीं चलता। रिसेप्शनिस्ट ने फौरन कहा, आप तो पहले से ही एक्सपर्ट हैं।
अभिनव उपाध्याय
Saturday, January 3, 2009
एक न भूलने वाली शाम

ऑफिस की भाग-दौड़ और रिपोर्टिग के बाद जब शाम को खबर लिखने बैठा तो मेरे सहकर्मी रत्नाकर मिश्र ने एक बड़ी अच्छी सूचना थी। उन्होनें कहा कि प्रसिद्ध बांसुरी वादक पं.हरिप्रसाद चौरसिया मंडी हाउस के कमानी सभागार में आ रहे हैं और कार्यक्रम शायं सात बजे से है। मैं जल्दी से काम निपटा के उनके साथ 433 नम्बर बस से जंतर-मंतर पहुंच गया और फिर पद यात्रा के बाद आडिटोरियम। श्रोता बड़ी संख्या में कठोर ठंड की परवाह किए बगैर आए हुए थे। औपचारिकताओं के बाद कार्यक्रम शुरू हुआ। पंडित जी ने पहले राग सरस्वती पर आलाप और फिर पं. भवानी प्रसाद के पखावज के साथ जुगलबंदी सुनाई। सुरों के आरोह-अवरोह के बीच बांसुरी और पखावज पर थिरकती अंगुलियां और स्वर लहरियों का आकर्षण दर्शकों को ताली बजाने पर मजबूर कर रहा था। इसके बाद उसी राग में पं योगेश शम्शी के साथ तबले पर जुगलबंदी हुई। बांसुरी और तबले का साथ भी लोगों को खूब भा रहा था। इसके बाद राग यमन में पंडित जी ने सबसे साथ मिलकर बांसुरी बजाई इसमें उनका साथ बांसुरी पर सुनील अछावत और तानपुरे पर रेखा चतुर्वेदी ने दिया।
इसके बाद श्रोता राग भैरवी और दरबारी की मांग करने लगे लेकिन पंडित जी ने कहा कि यह उन रागों को सुनाने का वक्त नहीं है। इसलिए बात पहाड़ी राग पर आकर टिक गई। पंडित योगेश शम्शी की तबले पर थिरकती अंगुलियां और पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी की तान से उठती स्वर लहरियों ने शांत माहौल में भी एक स्पंदन भर दिया था।
शाम जसे जसे ढल रही थी कार्यक्रम अपने चरम पर पहुंच रहा था। बांसुरी की धुन ने अपने मोह पाश में ऐसा बांधा कि श्रोता उसमें खोते चले गए। एक लंबी सांस के बाद बांसुरी की फूंक और उससे उठी जवान स्वर लहरियां चौरसिया जी कि उम्र को नकार रही थी और राग पहाड़ी सुनने पर बस ऐसा ही प्रतीत होता था कि हम दिल्ली में कंक्रीटों के जंगल से निकल कर पहाड़ की उन हसीन वादियों में चले गए हैं जहां हरियाली है, शांति है और लोक धुन पर नाचती पहाड़ी औरतें अपने पहाड़ का बखान कर रही हैं।
कार्यक्रम के समापन के बाद बाहर निकलते ही कपां देने वाली ठंड थी। हमने फुटपाथ पर चाय पी और रत्नाकर ने सिगरेट सुलगाई। रात के साढ़े नौ बज चुके थे अब बस का इंतजार था। मुङेा पहले बस मिल गई और मैं इस न भूलने वाली शाम और बांसुरी की आवाज को अपने मन मस्तिष्क में संजोए चला जा रहा था।
अभिनव उपाध्याय
Wednesday, December 31, 2008
न्याय के लिए आई हूं
न्याय के लिए आई हूं
भारतीय फिल्में, भारतीय संगीत और भारतीय संस्कृ ति से प्रभावित अफगानी लड़की साबरा अफगानिस्तान से भारत तक की यात्रा अपने पति को ढ़ूंढने के लिए की। लेकिन तलाश पूरा होने के बाद उसे अब न्याय के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है।तीस नवम्बर को अपने मां के साथ भारत आई साबरा अपने पति मेजर डा.चंद्रशेखर पंत को तलाशती उसके पास पहुंच गई लेकिन उससे मिलने के बाद अपने पति की प्रतिक्रिया को देखकर वह अवाक साबरा का कहना है कि, सबसे पहले उसने मुङो देखकर यही पूछा कि ‘तुम यहां तक कैसे आ गई। अफगानिस्तान से आए उसे दो साल हो गए थे लेकिन इस बीच उसने मात्र तीन फोन किया और वह भी यह बताने के लिए वह शादीशुदा है और सारा उसे भूल जाए। 20 साल की साबिरा डा. पंत से मुलाकात के बारे में बताती हैं कि ‘मैं काबुल में आई एमएम (इंडियन मेडिकल मिशन) में एक दुभाषिया के रूप में काम कर रही थी, वहां पर मेजर पंत भी थे मैं अफगानी या पस्तो से हिन्दी में बदलती थी। इस बीच मेजर पंत ने उसके सामने शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन उसने बिना परिवार की आज्ञा से इसे मानने से इनकार कर दिया। जब उसने हमारे पिता से बात की तो उन्होंने कहा कि हम लोग हिन्दूओं में शादी नहीं करते इस पर मेजर पंत ने निकाह के लिए इस्लाम कबूल कर मेजर हिम्मत खान बन गया और हिजरी सम्सी 19/8/1385 को उसने मुझसे निकाह किया। हमारे साथ किराए के मकान में पन्द्रह दिन गुजारने के बाद वह भारत आ गया। उसने जाते समय कहा कि वह जल्द ही लौट कर आ जाएगा। लेकिन उसने जब फोन किया तो उसका उत्तर उम्मीदों को तोड़नें वाला था। उसने कहा मैं एक शादीशुदा दो बच्चों का बाप है तुम दूसरी शादी कर लो।ज् मुङो इस तरह के उत्तर की उम्मीद नहीं थी। शादी के दो साल बाद पति के लिए भारत आने के बारे में वह बताती हैं कि, जब आखिरी बार उसने एकदम मना कर दिया और हमारी बिरादरी के लोगों का लगातार दबाव हम पर बनता गया तो हमने मां के साथ भारत आने के बारे में सोचा। अधिक समय वीजा मिलने में लग गया, लेकिन इतने समय बाद भी न्याय न मिलने से वह निराश हैं।साबरा का कहना है कि यहां की सरकार और उत्तराखंड प्रशासन ने भी मेरे साथ काफी सहयोग किया है यही नहीं भारतीय महिला आयोग ने भी सकारात्मक उत्तर दिया और मेरे वीजा की अवधि बढ़ाने का आश्चासन दिया है।साबिरा का कहना है कि अब मैं भी भारतीय हूं और यहां की बहू हूं। अगर मैं दोषी हूं तो मुङो जांच करने के बाद दंड दिया जाय और नहीं हूं तो दोषी को सजा दी जाय। मैं न्याय मांगने आई हूं। साबिरा बताती हैं कि जब मेजर पंत ने पिथौरागढ़ में रहने वाली अपनी पत्नी से मिलवाया तो पहले तो उसकी पत्नी ने कहा कि मैं जानती हूं कि इसने तुमसे शादी की है लेकिन जब उसे पुलिस के सामने बयान देने को कहा गया तो उसने बयान बदल दिया और कहा मुङो इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।साबरा अपने परिवार की हालत बयां करते हुए कहती हैं कि मेरे परिवार में चार बहन और तीन भाई हैं मैं सबसे बड़ी हूं। मेरी अपनी ही बहन जब मुझसे सवाल करती है तो मैं निरूत्तर हो जाती हूं। पड़ोस के लोग भी छींटाकसी क रते हैं। इस संबंध में आपने काई केस भी दायर किया है? यह पूछे जाने पर साबरा का कहना है कि, अभी नहीं, क्योंकि बिना केंद्रीय सरकार की अनुमति के यह संभव नहीं है अभी मैं हाल ही में गृहमंत्री से मिली हूं और उन्होंने मामले पर ध्यान देने का आश्वासन दिया है। यहां की न्याय प्रणाली के बारे में उसका कहना है कि, मुङो जब तक न्याय नहीं मिलेगा मैं लड़ती रहूंगी। साबरा का कहना है, मुङो भारत और अफगानिस्तान में कोई विशेष अंतर नहीं लगता यहां लोग काफी अच्छे हैं। बहुत भारतीय अफगानिस्तान में वर्षो से रह रहे हैं सबका आपस में बहुत भाईचारा है। किसी एक आदमी के बुरा होने से पूरा देश तो बुरा नहीं हो जाता।
यह माया की देवी है
उत्तर प्रदेश अपने विभिन्न प्रकार के निम्न, मध्यम, मध्यमोत्तम, उत्तम और सर्वोत्तम कार्यो के लिए जाना जाता है। यह खासकर तब और चर्चा में आ जाता है जब वहां विभिन्न तरह की लीलाएं होने लगती है। चाहे अमरमणि प्रेम प्रसंग हो या कविता चौधरी का मामला या कुछ और यहां तरह-तरह की लीलाएं जनता ने देखी। विभिन्न कलाओं में राजनेताओं ने अपनी योग्यता का प्रदर्शन करते हुए पल्टीमार युक्ति से सत्ता प्राप्त की और पुन: अपनी खोई धार्मिक, आर्थिक और नैतिक प्रतिष्ठा को प्राप्त करने में लगे रहे।
अपनी कमाई के बारे में कुछ सोचते कि आर्थिक मंदी ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। इसके असर से परेशान मुखिया मायावती ने अपने धुरंधर कार्यकर्ताओं के ऊपर जन्म दिन की तैयारियों का भारी-भरकम बोझ डाला। सब तो बच गए लेकिन फंस गए बेचारे तिवारी बाबा। अगर चढ़ावे की व्यवस्था न करें तो देवी नाराज और व्यवस्था की तो हिरासत बढ़ गई।
तिवारी बाबा के समर्थकों को नहीं सूझ रहा है कि वह क्या करें देवी की भक्ति मनायें कि नेता जी के पकड़े जाने का शोक। उधर विपक्ष ने चंदा उगाही समिति की प्रिय नेता को ‘माफिया क्वीनज् कह डाला।
सेवक सुटुकुन जनता के बीच जाकर प्राप्त आदेश को प्रसारित कर रहा है कि, देवी दहाड़ रही है। मैं माया हूं मुङो पैसा चढ़ाओ, आर्थिक मंदी ने मेरी भूख और बढ़ा दी है। कार्यकर्ताओं को अपील जारी है। साथ में यह धमकी भी कि अगर इस बार हमारा जन्मदिन नहीं मनाया गया तो अगली बार पैसा भी लूंगी और टिकट भी नहीं दूंगीं। लखनऊ में उनकी मूर्ति में बना पर्स भी यही संकेत कर रहा है। आप लोग इशारों को समझें और राज को राज..
इस पर सभी कार्यकर्ता सकते में हैं लेकिन चिरकुट चतुर्वेदी ने जोर देकर कहा, हम औरैया के लोग गौरैया मार दें तो भी शोर होता है लेकिन दूसरे राज्य के लोग चाहे कुछ भी करें लेकिन चूं तक नहीं होती। ये तो लोकतंत्र में जबरदस्ती है भाई। हमारी बहन जी का अपमान है। हम सभी भाई इसके खिलाफ आन्दोलन करेंगे।
विचारक सुबुद्धि शास्त्री जी ने कहा आपकी बहन जी ने न जाने कितने भाई पाल रखे हैं जो आए दिन किसी न किसी को टपकाते ही रहते हैं। प्रदेश में हाहाकार मची है, अब तो सरकारी महकमें में लोगों को सांप सूंघ गया है। लोग अपने बेटे को डाक्टर, इंजीनियर बनाने के बारे में एक बार सोचेगें कि देवी का शेर आकर चढ़ावा न मांगने लगे। यह देवी साम, दाम, दंड, भेद जसी कलाओं में निपुण है इसकी लीला भी अपरंपार है। सहीराम ने कहा यह माया की देवी है ।
Friday, December 26, 2008
कला फिल्मों पर बाजार का दबाव
फिल्म अभिव्यक्ति की वह विधा है जो वर्तमान समय में शायद सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रभावी है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से इक्सवीं सदी के पूर्वार्ध के बीच भारत ही नहीं विश्व सिनेमा ने एक पूरे सौ साल का सुनहरा दौर देखा है। मूक फिल्मों से लेकर वाचाल फिल्मों की लम्बी यात्रा तय की है। उन मानवीय संवेदनाओं को छुआ है जो मार्मिक ही नहीं जीवंत भी हैं। आलमआरा से बोलती फिल्मों की जो शुरूआत हुई वह आज चिल्ला रही है लेकिन वह चीख किसी संवेदना कि नहीं बल्कि उपभोक्तावाद की है। शायद इसी तरह के किसी वाद ने फिल्मों को दो भागों में बांट दिया, कला फिल्में और व्यावसायिक फिल्में। इसी के साथ फिल्म निर्माण की कला भी बाजार देखकर उभरने लगी। और आज विश्व में सबसे अधिक फिल्में हमारे देश में बनाए जाने लगी हैं। लेकिन वहीं एक प्रश्नचिह्न भी खड़ा हो गया कि जो फिल्में बन रही है क्या वह समाज के लिए सार्थक सिनेमा कि उपज मानी जा सकती हैं? प्राय: निर्माता निर्देशकों के बीच यह बहस का मुद्दा रहा है कि सार्थक सिनेमा क्या है? इस पर आज भी एक राय नहीं है। लेकिन कुछ फिल्में ऐसी हैं जो समाज की कसक, पीड़ा, संवेदना और कुंठा को पर्दे पर लाती हैं और दर्शक उसे देखते ही उससे आत्मसात् कर लेता है। इस तरह की फिल्में अधिकतर कला फिल्मों के दायरे में आती हैं। लेकिन वर्तमान में कला फिल्मों का निर्माण करने से निर्देशक कतरा रहे हैं या कला फिल्में बनाने वाले निर्देशक अब व्यावसायिक फिल्मों की ओर रुख करनें लगे हैं।
जब कला फिल्मों की बात आती है तो सत्यजीत रे का नाम पहले लिया जाता है। ‘पाथेर पांचालीज् को देखकर कौन प्रभावित नहीं हुआ है उसे आज भी एक कालजयी कला फिल्म का दर्जा प्राप्त है। इसी तरह विमल दा कि ‘दो आंखे बारह हाथज् हो या ‘दो बीघा जमीनज् या फिर ‘बंदिनीज् इन फिल्मों में कला फिल्मों का संपूर्ण समन्वय देखने को मिल जाएगा। यही कला गुरूदत्त की फिल्मों में भी देखने को मिल जाती है। इसके बाद तो कला फिल्मों कि एक लम्बी श्रृंखला है जो उस दौर में बहुत प्रभावी तो नहीं रही लेकिन हां उसने अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज करा दी। षिकेश मुखर्जी, श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, महेश भट्ट या फिर प्रकाश झा ऐसे निर्देशक आए जिन्होंने कला फिल्मों से ही अपनी शुरुआत की लेकिन समय के साथ साथ उन पर बाजार का बुखार चढ़ने लगा और देखते ही देखते वह भूमंडलीकरण के दबाव को ङोल नहीं सके।
गोविंद निहलानी ने जिस शिद्दत से आक्रोश, अर्धसत्य, गांधी या दृष्टि बनाई थी उसके बाद देव जसी कमार्शियल फिल्म का निर्माण इन फिल्मों से कमाई न होने की परिणति ही है। यही नहीं महेश भट्ट जिनकी शुरुआत ही कला फिल्म सारांश और अर्थ से हुई वह जल्द ही बाजार की समझ जान गए और आशिकी, क्रिमिनल, नाम, दिल है कि मानता नहीं जसी फिल्मों के निर्माण की फैक्ट्री ही खोल ली, जिसमें साल में कई फिल्मों का निर्माण होता है। कुछ इस तरह की बात प्रकाश झा के बारे में भी कही जा सकती है जिन्होनें दामुल, मृत्युदंड, परिणति जसी कला फिल्में तो दीं लेकिन स्पष्ट तौर पर स्वीकार किया कि अब बिना पैसों के काम नहीं चलेगा और अपहरण, गंगाजल जसी फिल्मों का निर्माण किया, परन्तु श्याम बेनेगल ने जिस लगन से अंकुर, निशांत, मंथन, कलयुग या सरदारी बेगम बनाई उसी लगन से मंडी और आरोहण भी बनाया। लेकिन इक्कीसवीं सदी में हरी-भरी और जुबैदा शायद उस अनुरूप नहीं बन पाई।
आज यदि देखा जाए तो कला फिल्मों का निर्माण अब मॉस को ध्यान में रखकर किया जा रहा है न कि क्लास को। क्योंकि फिल्म का निर्माण महज एक जुनून नहीं रह गया है बल्कि यह एक विशुद्ध लाभ का व्यवसाय बन गया है जिसमें कोई निर्माता घाटा सहना नहीं चाहता। इसीलिए इन फिल्मों के प्रमोशन में भी कोई कमी नहीं की जा रही है। आज के निर्माता निर्देशक कला और कमर्शियल फिल्मों में कोई अंतर भी नहीं मानते हैं। उनका मानना है कि जो फिल्में बिजनेस दें वो कमर्शियल फि ल्म हैं, फिर चाहे वो किसी गंभीर विषय पर ही क्यूं न बनी हों। चांदनी बार को ही ले लीजिए। यह परिभाषा बाजार ने दी है। फिर भी आजकल निर्देशकों की एक नई पीढ़ी आई है जिसमें सुधीर मिश्र नें चमेली, हजारों ख्वाहिशें ऐसी, मैं जिंदा हूं या ये वो मंजिल नहीं जसी फिल्में दी। जो एक नई पीढ़ी की शुरुआत मानी गई। इसी तरह अनुराग बसु की फिल्में हैं जो केवल अलग पृष्ठभूमि पर ही नहीं बनी बल्कि एक सामाजिक संक्रमण को बखूबी दर्शाती हैं। इसी तरह रितुपर्णो घोष की चोखेर बाली, रेनकोट या तितली सामाजिक संरचना और मानवीय स्वभाव की अभिव्यक्ति को जिस तरह उद्घाटित किया है, उससे फिल्म जगत में एक नई संभावना देखने को मिली है। कुछ इसी तरह की उम्मीद मधुर भंडारकर से भी जागी है, जब उन्होंने चांदनी बार, पेज थ्री और सत्ता जसी फिल्में समाज और राजनीति के नए समीकरणों परिभाषित किया। नागेश कुकनूर ने जिस बारीकी से डोर का निर्माण किया है उसमे महिला सशक्तीकरण की छाप दिखाई देती है।
सवाल यह है कि ये प्रतिभाशाली निर्देशक अब लीक से हट कर फिल्में तो बना रहे हैं, लेकिन क्या वो बाजार के दबाव का मुकाबला कर पाएंगे? प्रश्न यह उठता है कि जब बाजार कला को नियंत्रित करेगा, तो क्या अभिव्यक्ति का वह रूप सामने आ पाएगा जो दर्शकों के मनोभावों तक पहुंच पाए या उनकी संवेदनाओं को झकझोर दे। या फिर कला फिल्म कही जाने वाली फिल्में भी बाजार के दबाव में मसाले की चाशनी में लग कर आएंगी।
अभिनव उपाध्याय
कैनवस पर आस्था

अभिव्यक्ति के अनेक माध्यम है लेकिन जब तूलिका अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है तो कैनवस पर उभरी आकृति कलाकार की मनोवृत्ति स्वयं स्पष्ट कर देती हैं।
डा. निशा जायसवाल एक ऐसी ही कलाकार हैं। जिनकी अभिव्यक्ति का माध्यम तूलिका है और उससे चित्र बनाना एक साधना।
यूं तो वह दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की प्रवक्ता हैं लेकिन कला के प्रति उनका समर्पण देखते ही बनता है। 32 वर्ष से अध्ययन और अध्यापन से समय निकालकर कला की जो साधना वह करती हैं, वह जब लोगों के सामने आई तो कला के पारखियों ने इनकी कृतियों को उत्कृष्ट कृतियों का दर्जा दिया।
दिल्ली के इंडिया हेबिटेट सेंटर में आयोजित इनकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी में आए सोमनाथ चटर्जी, उस्ताद अमजद अली खां, नामवर सिंह, नफीसा अली जसे कद्रदानों ने उनकी कृतियों को देखकर काफी सराहना की। अपनी पेंटिंग्स की पहली प्रदर्शनी पर इस तरह की प्रतिक्रिया को लेकर उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। उनका कहना है कि ‘यह मेरे चित्रों की पहली प्रदर्शनी थी और लोग इसे इतना पसंद करेंगे, मुङो ऐसी उम्मीद नहीं
कला की यह यात्रा कबसे शुरू हुई? पूछने पर वह बताती हैं कि ‘मैं मूलत: पूर्वी उत्तर प्रदेश में पड़रौना के मारवाड़ी परिवार से हूं। इस परिवार की लड़कियां बहुत खूबसूरत मेंहदी अपने हथेलियों पर सजाती थीं। एक दिन उन्होंने भी झाड़ से एक सींक खींचकर अपनी हथेली को मेंहदी से सजा लिया। यह एक छोटा सा प्रयास था लेकिन जिसने भी इसे देखा उसने काफी सराहना की। यहीं से कला के प्रति प्रतिबद्धता जागी और इसके बाद बारीक आकृतियों और रेखाओं को कैनवस पर उतारने लगी। 16 वर्ष की आयु से शुरू कला की यात्रा यह अविराम जारी है।ज्
वह बताती हैं कि ग्रेजुएशन से पहले तो वह कवि बिहारी की नायिकाओं, खजुराहो की मूर्तियों, मयूर पक्षी और सौंदर्य प्रधान अनुकृतियों को अपनी रचना का केंद्र बनाती रही लेकिन ग्रेजुएशन के बाद देवी-देवताओं और मयूर पक्षी पर ही अपनी कला को केंद्रित किया। यह पूछे जाने पर कि आपने देवी-देवताओं और मयूर पर ही अपनी अनुकृतियां क्यों केंद्रित की? उनका कहना है कि ‘ईश्वर में अटूट आस्था के कारण हमने देवी-देवता को चुना। जब मैं ईश्वर की कृतियों को बनाती हूं तो ऐसा लगता है कि ईश्वर स्वयं अपने को बना रहा है। मेरा हाथ तो केवल माध्यम है। मोर पंक्षी के बारे में वह बताती हैं कि, वह उमंग का द्योतक है। वर्तमान समय में भागती-दौड़ती जिंदगी में आदमी के पास बहुत तनाव है। लेकिन एक मोर मदमस्त अपनी धुन में नाचता है और उसे देखकर मन खुश हो जाता है।ज्
डा. निशा की पेंटिंग्स में राजस्थानी लोक कला, विभिन्न देवी-देवताओं के चित्र, ड्रेगन आदि के चित्र भी मोर की पेंटिंग्स में दिख जाते हैं। इसी तरह उनके ‘सूरजज् की कृति में उससे संबंधित बादल, घोड़े आदि उससे संबंधित कई चित्र दिख जाते हैं। डा. निशा ने श्रीनाथ, लक्ष्मी-गणेश और मयूर समेत कुल 19 कृतियां बना चुकी हैं।
लगभग 25 वर्षो में मात्र 19 कृतियां ही बनाए जाने पर उन्होंने बताया कि ‘इस तरह की कृतियां बनाना एक कठिन कार्य है और मैं पेशे से प्रवक्ता हूं इसलिए चित्रकारी के लिए पूरे वर्ष में मुङो मुश्किल से एक से डेढ़ महीने ही मिलते है। गर्मी की छुट्टियों में जब में पड़रौना जाती हूं तभी ये संभव हो पाता है। इसके लिए प्रतिदिन एक बार छ: से सात घंटे तक काम करती हूं। फिर भी कभी-कभी किसी चित्र को पूरा करने में दो से तीन गर्मी की छुट्टियां निकल जाती हैं।
वह बताती हैं, ‘दरअसल चित्रकारी मेरे लिए एक साधना है, एक तपस्या है, एक श्रद्धा है। कभी-कभी लगता है कि ये तनाव मुङो परोक्ष रूप से ऊर्जा देता है। जिसके फलस्वरूप एक सुंदर कृति का सृजन होता है।ज् डा. निशा के चित्र देखने के बाद लगता है कि यह आपसे संवाद करते हैं। यूं तो इन चित्रों की एक नई शैली है लेकिन इस पर लोक कला, तिब्बत की थंकाव व मधुबनी चित्रकारी का प्रभाव देखा जा सकता है। वह बताती है कि ‘मैं यामिनी राय के स्क्रेच से काफी प्रभावित हूं।ज्
इन चित्रों को किस तरह बनाती हैं? पूछने पर वह बताती हैं कि देवी-देवताओं को मैं ब्लैक एंड व्हाइट में बनाती हूं। जिसके लिए मैं ग्राफ पेन का इस्तेमाल करती हूं और मोर के लिए जल रंगों व दो नंबर के ब्रश का सहारा लेती हूं। चित्र चाहे ब्लैक एण्ड व्हाइट हो या रंगीन, दोनों को बनाना एक कठिन साधना जसा है क्योंकि कोई भी लाइन खींचने से पहले मैं सांस रोक लेती हूं, क्योंकि एक गहरी या सामान्य सी सांस भी सारी मेहनत पर पानी फेर सकती है। रंगीन चित्र बनाते समय ब्रश को चूसकर उसे नुकीला बना लेती हूं और फिर उस पर रंग लगाती हूं।ज् अपनी कृतियों के बारे में वह बताती हैं कि ‘मैंने कभी नहीं चाहा कि मेरी कृति केवल बुद्धिजीवी वर्ग की आलोचना तक सीमित रहे। शायद इसीलिए मुङो अमूर्त कला ने कभी आकर्षित नहीं किया। मेरे जीवन से जुड़ा हर व्यक्ति मेरा गुरु है। मेरा प्रशिक्षक है और मेरा समीक्षक है। इन्हीं की प्रतिक्रियाओं ने मुङो अपनी शैली को विकसित करने में सहयोग दिया है। वह कहती हैं कि मैं इस कला को घर-घर तक पहुंचाना चाहती हूं।ज्
-अभिनव उपाध्याय
Saturday, December 20, 2008
यह एफ एम ढेंचू है
सहीराम के पड़ोसी गर्दभानन्द विद्वान होने के साथ- साथ समसामयिक विषयों पर चिंतन भी करते हैं। नाम को लेकर पाठक भ्रम न पालें क्योंकि जब वह बचपन में रोते थे तो गधा देखकर ही चुप होते थे। स्कूल में अध्यापक भी उन्हे प्यार से गधा ही कहते थे। उनका प्रिय पशु गधा ही था। इसलिए मां-बाप ने उनका नाम गर्दभानन्द ही रख दिया।
बहरहाल, आर्थिक मंदी ने न केवल उन्हे नौकरी से निकाला बल्कि उनके विचारों के सेन्सेक्स को भी रसातल में धकेल दिया। अब उनकी बातें सुनने वाला कोई नहीं था। उनकी कुंठा तब और बढ़ गई जब बुश को जूता लगा और वह अपनी भड़ास निकालने के लिए लोगों को खोज रहे थे लेकिन निराशा ही हाथ लगी। किसी सज्जन ने उनकी समस्या को देखकर एक उपाय बताया कि भाई गर्दभानन्द जी, मेरी मानिए तो एक एफएम चैनल खोल लीजिए। इसके कई फायदे हैं, पहला तो यह कि लोगों तक आपकी बात बहुत आसानी से पहुंच जाएगी, दूसरा लोगों का मनोरंजन होगा और तीसरा लोग आपको जानने लगेगें लाभ कि चिंता मत कीजिएगा क्योंकि चुनाव में ही सारा लागत निकल आएगी। गर्दभानंद को बात जंच गई लेकिन इस आर्थिक मंदी के दौर में यह काम इतना आसान नहीं था। किसी ने पुरानी यारी निभाई और पैसा लगा दिया। समस्या इसके नामकरण को लेकर आई। मित्र चौकड़ी राम ने समस्या का हल बता दिया, क्यों न इसका नाम ‘कुकड़ू कूज् रखा जाय। लेकिन गर्दभानंद अड़ गए उन्होंने कहा चौकड़ी वह दिन भूल गए जब तुम्हे क्लास में मुर्गा बनाया जाता था तो मैं जिद करके तुम्हे गधा बनवाता था मेरी पसंद को तुम जानते हो फिर भी..। चौकड़ी ने इस बार दूसरा नाम सुझाया ‘ढेंचूज् और यह नाम गर्दभानन्द को जंच गया। लेकिन लोग क्या कहेगें यह बात उन्हे सता रही थी चौकड़ी ने उन्हे फिर समझाया देखो जब एफएम चैनल का नाम सिटी,टाउन, मिर्ची, टमाटर, रेड, ब्ल्यू यही नहीं बिल्ली की आवाज म्याऊं हो सकता है तो ढेंचू क्यों नहीं हो सकता।
अब चैनल के उद्घाटन में सारे शहर के गधे बुलाए गए उन्होनें सस्वर गान किया और नारियल फोड़कर चैनल शुरू हो गया। उद्घोषक गर्दभानन्द ही थे उन्होनें धीरे-धीरे चैनल की बारीकियां सीखीं और अब एक दम पक्के हो गए। उन्होनें हर गाने के बार एक विज्ञापन और मैसेज करने के लिए श्रोताओं को उकसाने लगे।
उनके एफएम की बानगी देखिए, ‘यह एफएम ढेंचू है, अपने दिल की बात हमारे ढेंचू के साथ। हमारे सवालों के जवाब ढेंचू स्पेस 420 पर मैसेज करके इनाम पाएं।ज् सवाल सीधा सा है, बुश के ऊपर कितने जूते चलाए गए? इनाम है अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रेस कांफ्रे न्स में जाने का सुनहरा मौका। पिंटू पढ़वइया ने फटाफट मोबाइल उठाकर पांच मैसेज किए लेकिन इनाम की घोषणा नहीं हुई। अलबत्ता उद्घोषक ने फोन करके उनसे पूछ जरूर लिया कि आप करते क्या हैं? उन्होंने कहा साइंस का विद्यार्थी हूं? अब आपके लिए आखिरी आसान सवाल, जो जूते बुश को मारे गए थे उसका द्रव्यमान और वेग क्या था? पिंटू ने लाख कोशिश की लेकिन नहीं बता पाए और गर्दभानन्द ने ढेंचू-ढेंचू बोलते हुए गाना चला दिया।
अभिनव उपाध्याय
Thursday, December 4, 2008
artical- सारा खेल टीआरपी का है
चमचमाता स्टेज, शोर करते दर्शक, रंग-बिरंगे कपड़ों में प्रतियोगी, कभी गंभीर तो कभी नाजुक अंदाज में दिखते जज और सर्वगुण सम्पन्न एंकर। आमतौर से यही होता है एक रियलिटी शो में। नाज, अंदाज और नाटक से लबरेज ये रियलिटी शो वास्तव में कितने रियल है, वर्तमान में इसके ऊपर प्रश्नचिह्न लगाए जा रहे हैं। और प्रश्नचिह्न् भी क्यों न लगाए जाएं, क्या शो को हिट करने का एकमात्र साधन विवाद ही है? और विवाद को दर्शाने का माध्यम भी ऐसा कि जसे मंच पर दो प्रतियोगी नहीं, बल्कि दो महारथी युद्ध करने आ रहे हैं। कार्यक्रम के प्रायोजक एक ऐसा रोमांच पैदा करने की कोशिश करते हैं जिसको दर्शक दिल से ले बैठते हैं और फिर वही होता है जो चैनल वाले चाहते हैं। मतलब उनके कार्यक्रम की टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) में इजाफा और दर्शक प्राय: इस भ्रामक रोमांच को देखने के लिए कार्यक्रम की टीआरपी में इजाफा करते हैं।
आजकल लोकप्रिय बनने के एक नए तरीके इन कार्यक्रमों में देखे जा सकते हैं। इसके जज प्रतियोगी को पीट भी सकते हैं। अभी हाल ही में नाइन एक्स चैनल पर एकता कपूर का कार्यक्रम कौन जीतेगा बालीवुड का टिकट का कार्यक्रम चल रहा था। कार्यक्रम बस चल ही रहा था कि उसकी टीआरपी अचानक बढ़ गई वजह वही पुरानी कार्यक्रम में जज की भूमिका निभाने वाले चेतन हंसराज ने एक लड़के को पीट दिया। इसी तरह का एक और रोमांच एक बंगाली टीवी चैनल के रियलिटी शो में हुआ। यह मामला कोलकता की 16 वर्षीय दसवीं की छात्रा शिंजिनी सेनगुप्ता का था। उसे जज ने डांट लगाई और उसकी हालत बिगड़ गई। यह मामला पूरे देश में चैनलों के लिए हॉट न्यूज बन गया।
सवाल यह भी है कि प्रतियोगी को किस बात की सजा दी जा रही है? उनकी यह हालत सिर्फ इसलिए हो रही है कि वे प्रतियोगिता का हिस्सा हैं या नीरसता भरा कार्यक्र म इस तरह के ट्विस्ट से मसालेदार हो जाएगा।
इस चकाचक रियल्टी शो के जजों ने आपसी भिड़ंत क रके भी ऐसे कार्यक्रमों की टीआरपी बढ़ाई हैं। अधिक पीछे जाने की जरूरत नहीं है, 2007 में सा रे गा मा पा के रियल्टी शो में संगीतकार अनु मलिक और गायिका आलिशा चिनॉय के बीच ऐसी ही नोंकझोंक हुई थी वजह आलिशा के पसंदीदा प्रतियोगी को बाहर कर दिया गया था। वॉयस ऑफ इंडिया में बखेड़ा खड़ा करने के उस्ताद हिमेश रेशमिया ने अपने बड़बोलेपन से कार्यक्रम की टीआरपी बरकरार रखी। इसी तरह ललित सेन और गायक अभिजित के वाकयुद्ध ने कार्यक्रम का मसाला बरकार रखा।
इसके अलावा भी ऐसे कार्यक्रमों में रोचकता पैदा करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। सुस्ती से चल रहे कार्यक्रम में यह दिखाया जाता है कि प्रतियोगी को अपने ही बीच की किसी प्रतियोगी से प्रेम हो जाता है या मंच पर प्रतियोगी अपनी साथी महिला प्रतियोगी को प्रपोज कर देता है, इसे और हॉट बनाने के लिए वह किस भी ले सकता है। इस बात में कितनी रियलिटी होती है यह तो पता नहीं, लेकिन कार्यक्रम का एंकर इसे इस अंदाज में प्रस्तुत करता है जसे यह कार्यक्रम का आवश्यक अंग हो।
आजकल छोटे-बड़े सभी चैनल इस तरह के रियलिटी शोज को बढ़ावा दे रहे हैं। झलक दिखला जा, उस्तादों के उस्ताद, छोटे उस्ताद, लिटिल चैंप इत्यादि। यही नहीं अब कार्यक्रम मे रोमांच से भरने के लिए अक्षय कुमार जसे फि ल्म स्टार भी खतरों के खिलाड़ी कर रहे हैं। अगर इन रियलिटी शो को गौर से देखा जाए तो इनमें आने वाले जज भी लगभग वही होते हैं जो पहले के कार्यक्रमों में आए हुए होते हैं। कुछ संगीत गुरुओं के नाम इस प्रकार हैं- इस्माइल दरबार, आदेश श्रीवास्तव, ललित सेन, विशाल- शेखर, प्रीतम आदि लेकिन सबकी महागुरू आशा भोंसले।
इसके पीछे भी मामला टीआरपी का है। ऐसा लगता है कि जो गुरु जितना अधिक विवाद खड़ा करेगा उसे उतनी ही बार जज बनाया जाएगा। और जब दो महारथी संगीत के विश्व युद्ध में लड़ेंगे तो लोग देखेंगे ही।
पर्दे के पीछे की दुनिया भी वास्तविक दुनिया में चमक ला सकती है। बिग बॉस ने शिल्पा शेट्टी खास सेलेब्रेटी बना दिया। लेकिन सबकी किस्मत शिल्पा जसी नहीं है। इंडियन आइडल अभिजीत सावंत फिर किसी स्टार के रूप में नहीं दिखे। अमूमन यही हाल बाद के स्टार प्रतियोगियों का भी रहा।
अब रियलिटी शो का मतलब वाक् युद्ध, प्रतियोगियों की मोहब्बत, तिजारत, रूठना, मनाना, इश्क, मुश्क, गुरुओं का किसी प्रतियोगी पर अपार स्नेह, अनावश्यक टीका टिप्पणी। लेकिन सबकुछ प्रायोजित। चटकारा। एकदम मसालेदार। और जब इतना कुछ एक कार्यक्रम में मिलेगा तो दर्शक निहारेगा ही।
अभिनव उपाध्याय
विनाश काले विपरीत बुद्धि
विनाश काले विपरीत बुद्धि
हे लक्ष्मी मइया पधारो मेरे धाम, स्वागत है। हम आपका अपमान कतई नहीं करेंगे। बुरा हो सांसदों का आपको सबके सामने उछालते हैं और कहते हैं कि आपसे उनका कोई वास्ता नहीं है। जसे जीते लकड़ी मरते लकड़ी जरूरी है उसी तरह बिन लक्ष्मी सब सून। सुन ले माई सुन ले चवन्नी की अरज सुन ले। सहीराम गुजर रहे थे कि देखा चौधरी चवन्नी अगरबत्ती जलाकर लक्ष्मी जी की पूजा कर रहे थे। गौरतलब है कि चौधरी चवन्नी यूं तो बेइमान पार्टी के नेता हैं लेकिन राजनीति की आर्थिक दृष्टि से समीक्षा करने के लिए जाने जाते हैं।
सहीराम पूछ बैठे, चवन्नी जी सुना है सांसदों ने सरकार के पक्ष में वोट देने के लिए पैसा लिया था? चवन्नी जी मंद मुस्कान और तिरछी तकान से बोले- सहीराम जी, रह गए ना सीधे के सीधे। अरे संसद तक पहुंचने के लिए कम पापड़ बेलने पड़ते हैं और रोज-रोज थोड़े ही बिल्ली के भाग्य से छींका टूटता है। बहती गंगा में हाथ धो लेा भाई फिर ना जाने कब मौका मिलेगा।
हमें तो तरस आता है उन सांसदों पर जिन्होंने माता लक्ष्मी का अपमान किया। वो भी सनसनी फैलाने वाले चैनलों के सामने। मुंह लजाकर रह जाता है और सोचकर बुद्धि भी चकरिया जाती है कि कैसे हैं अपने भाई-बंधु। अब आप ही बताइए नेता की कोई जाति होती है अगर ऐसे होगी बिना मुद्रा के पालिटिक्स तो राजनीति का भाग्य तो रसातल में जाएगा ही। जाने कैसे टिकट पा गए मूरख जपाट। अरे, जब लक्ष्मी मेहरबान थी तो सबके सामने छाती पीटकर बताने की क्या जरूरत थी, चले थे बड़के राजा हश्चिन्द्र बनने। दबा लेते अगल-बगल कौन देख रहा है। और यह संसद है, कोई देख भी लेता तो क्या। संसद ने सबकुछ देखा, ये भी देख लेती। लेकिन नहीं, पार्टी भक्ति चरचराई थी। सरकार रोज-रोज थोड़े ही अल्पमत में आती है लेकिन क्या करें सहीराम जी विनाश काले विपरीत बुद्धि। मैंने तो बड़ी कोशिश की थी कि चुनाव जीत जाऊं लेकिन लटक गया। बस जान जाइए कलेजा कचोट कर रह जाता है ऐसे अवसर देखकर।
इस लम्बे उत्तर के बाद सहीराम ने पूछ लिया, वामपंथियों के बारे में क्या खयाल है? मैं तो उन्हे पूरे सावन भर रात्रिभोज कराऊं। इस अल्पमत वाले ड्रामे के सूत्रधार अपने करात भाई तो थे ईश्वर उनकी सत्ता पक्ष से भी दुश्मनी बरकरार रखें। काश मेरे समय तक भी सरकार एकाध बार अल्पमत में आ जाती तो खुदा कसम जितना पैसा वोट पाने में लगाता उससे कई गुना एक वोट देने में वसूल कर लेता, काश..., कहकर चौधरी चवन्नी रुक गए उनके चेहरे पर संसद तक न पहुंच पाने की निराशा थी। सहीराम अभी कुछ पूछना चाहते कि उन्होंने कहा कि उन्हे अगले चुनाव की तैयारी करनी है और उनके पास जरा भी समय नहीं है।
अभिनव उपाध्याय
पिछलग्गू लेखक
सहितस्य भावं साहित्यं- हम तो सबके हित की बात लिखते हैं और हमेशा इस चीज का ख्याल रखते हैं कि समाज का अहित कभी न हो, चाहे सरकार गिरे या ठहर जाए, चाहे बाबा बर्फानी पिघले या जम जाएं, चाहे कश्मीर जले या बुझ जाए, चाहे सेतु समुद्रम में सुनामी आए या वह सूख जाए। हम हमेशा इसमें पब्लिक को हित देखकर किसी न किसी विषय पर लिख ही देते हैं। ये सारी बातें पिछलग्गू लेखक संघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष नकलचीराम सहीराम से बड़े ही गौरव की मुद्रा में कह रहे थे। दरअसल नकलची राम की रचनाएं किसी न किसी बड़े लेखक की नकल होती हैं लेकिन नकलची राम इसे पूरी तरह चौबीस कै रेट का प्योर गोल्ड मानते हैं। सहीराम ने सोचा क्यूं न आज इनसे साहित्यिक उपलब्धियों की चर्चा की जाए। पूछ लिया, इधर कोई नई किताब लिखी है? इधर-उधर क्या हम तो हर हफ्ते कोई न कोई किताब टीप ही देते हैं वो भी पूरी प्योर, हाइब्रिड एकदम नहीं। अभी पिछले दिनों मेरी एक किताब दि लॉस्ट मुगल एण्ड फर्स्ट दुग्गल चर्चा में रही। दि लॉस्ट मुगल तो सुनी हुई पुस्तक लग रही है लेकिन फर्स्ट दुग्गल कौन है? ये हमारे पैसे वाले पड़ोसी हैं जिनकी दिली ख्वाइश थी कि उनके ऊपर एक पुस्तक लिखी जाए सो मैंने उनकी आखिरी इच्छा पूरी कर दी। इस किताब की उपलब्धि ने तो मुङो अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचाया है।
अच्छा, अपनी कुछ और रचनाओं के नाम बताएंगे? बता तो दूंगा लेकिन प्लीज पलट कर सवाल मत कीजिएगा। कुछ चर्चित पुस्तकें इस प्रकार हैं- विष्णु भट्ट की आत्मकथा और चिरौंची लाल की व्यथा, कितने पाकिस्तान जितने हिन्दुस्तान, गुनाहों का देवता दैत्यों की उदारता, ए ट्रेन टू पाकिस्तान एण्ड ए प्लेन टू कब्रिस्तान और भी बहुत सी हैं बताने लगूं तो शाम हो जाएगी। वैसे आप इतना जान जाइए कि शायद ही कोई विषय हो जिस पर मेरी लेखनी ने मैराथन दौड़ न लगाई हो। सहीराम ने कहा कि नकलची राम जी आप की पुस्तकों का पहला नाम किसी न किसी बड़े लेखक की किताब के शीर्षक से मिलता है। देखिए सहीराम जी, मैंने पहले ही कह दिया था कि आप कोई सवाल नहीं करेंगे नकलची राम ने आंख तरेर कर कहा। जो चाहे वो लांछन लगा दिया, लोकतंत्र का इतना फायदा मत उठाइए। सरकार समङो हैं क्या कि जिसका मन हुआ मुंह उठाकर बड़बड़ा दिया और कोई कुछ नहीं कहेगा। सहीराम ने उनको खुश करते हुए कहा कि मुझे आपकी प्रतिभा पर शक नहीं है। अच्छा एक बात बताइए कैसे लिख पाते हैं इतना सबकुछ? यह राज की बात है प्रॉमिस करिए किसी से बताइएगा नहीं, चलो भाई प्रॉ.. है। कट-कॉपी-पेस्ट उसके बाद हमारा रेस्ट पब्लिक कहती है ये है नकलची राम का बेस्ट। वैसे सहीराम जी मैं एक नई किताब लिखना चाहता हूं सहीराम संग नकलचीराम।
अभिनव उपाध्याय
भाईगिरी संग गांधीगिरी
धंधे की क म्पटीशन और आए दिन हो रहे नए लोचे से परेशान होकर अब भाई लोगों का धंधा मंदा चल रहा है। दादा लोग धंधागिरी के साथ चमचागिरी भी कर रहे हैं। आजकल सभी भाई लोग मुम्बई से लेकर दुबई तक परेशान हैं। यह बात सुलेमान भाई ने जब्बार भाई से कही। बोला, भाई ! आजकल धंधे में कोई भी डांट देता है, पुलिस ने भी हफ्ता बढ़ा दिया है। नए-नए छोरे खुद को भाई कह रहे हैं। इन मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए सभी छोटे, बड़े, मझले भाइयों ने एक मीटिंग बुलाई है। इसमें कोई न कोई रास्ता निकाला जाएगा। मीटिंग शुरू हुई। जंगी कसाई ने कहा हमें कोई दूसरा रास्ता निकालना चाहिए जिससे पब्लिक हमें के वल भाई न समङो, कभी धंधा मंदा पड़ जाय तो हम पालिटिक्स या फिल्म टाइप लाइनों में भी हाथ आजमा सकें।
कुछ बुद्धिजीवी भाइयों ने विश्व में आई आर्थिक मंदी पर चिंता जताई और कहा कि आजकल जिस तरह पुलिस और प्रशासन ने सख्ती और वसूली बढ़ा दी है। उससे तेजी से उभरते हुए इस कारोबार पर खतरा मंडराने लगा है। हम दुर्गा पूजा, रोजा इफ्तार पार्टी से लेकर राजनीतिक पार्टियों को चंदा देते हैं लेकिन मौके पर सभी हमसे मुंह फेर लेते हैं। इस सभा में थोड़े पढ़े-लिखे लिखे इस्माइल भाई ने गले से रुमाल की गांठ खोलते हुए कहा कि भाई जान हम लोग अब गांधीगिरी करेंगे। पास में बैठे खुंखार सिंह ने कहा पागल हो गया है क्या अब पिस्तौल की जगह पिचकारी पकड़ेगा क्या? या धंधे में तेरी नीयत बदल गई है। कहीं तू पुलिस का चमचा तो नहीं, बोल नहीं तो अभी टपका दूंगा। इस्माइल ने संभलते हुए कहा खुदा कसम, भाई पहले हमारी बात सुनो चाहे बाद में खल्लास कर देना। तब खुंखार सिंह ने कहा सुनो भाई लोग अपुन लोग को इस्माइल एक आइडिया देने वाला है कुछ गांधीगिरी टाइप। सब दौड़कर सुनने आए। इस्माइल ने कहा अब हम किसी को टपकाएंगे तो उसकी मजार पर फू ल भी चढ़ाएंगे, किसी का थोबड़ा उड़ाएंगे तो उसे हास्पीटल भी ले जाएंगे। लूट का एक हिस्सा मरहम पट्टी के लिए लोगों में बांट देंगे। इससे पब्लिक में पापुलरिटी बढ़ेगी और हमारी इमेज एक लवली भाई लोगों की तरह हो जाएगी। इससे धंधा मंदा पड़ने पर भी हम लोग चुनाव वगैरह में हाथ आजमा सकते हैं। खूंखार ने पूछा ये अकल कहां से आई रे। स्माइल ने मुस्कुरा कर कहा, सरकार से। सरकार पहले बाढ़ आने को इंतजार करती है फिर राहत की घोषणा मतलब पहले मुसीबत पैदा करो बाद में समाधान। मतलब पहले भाईगिरी फिर गांधीगिरी।
अभिनव उपाध्याय
हिन्दी पखवाड़े का हिंग्लिश भाषण
बैंकों, अस्पतालों, स्कूलों, विश्वविद्यालयों में हिन्दी पखवाड़े की धूम देखकर हिन्दी उत्थान समिति के अध्यक्ष और स्वनाम धन्य साहित्यकार सनेही सुकुल लम्ब्रेटा ने एक ऐसा ही आयोजन कराने का मन बनाया। जब सहीराम ने उनसे पूछा कि नाम के पीछे लम्ब्रेटा क्यों लगाते हैं तो वो मुस्कु राते हुए कह देते, इससे स्मार्टनेश थोड़ी बढ़ जाती है और कोई खास बात नहीं है। लेकिन ये स्मार्टनेश उनके वक्तव्यों में भी दिखाई देती है। प्रस्तुत है हिन्दी उत्थान समिति की बैठक में उनके दिए गए भाषण के कुछ अंश-
डियर लिसनर! हमारी हिन्दी निरंतर आगे बढ़ रही है। शायद यही कारण है कि विदेशी लोग हमारी भाषा की स्मग्लिंग कर रहे हैं। हिन्दी के साथ रहना मिंस, इट विल बी ए रियल स्पिरिचुअल एक्सपिरिएंस। लेकिन हिन्दी की कंडीशन आजकल कुछ बिगड़ गई है। इसका सबसे अधिक नुकसान लिटरेचर के तिलचट्टों ने किया है। हिन्दी इंफे क्शन से ग्रस्त है उसे अंग्रेजी के एंटीबायटिक की आवश्यकता है। साहित्यकार रूपी डॉक्टर इसका एमआरआई, सीटी स्कैन, ईसीजी कराकर रोज नए इंजेक्शन लगाकर इसके साथ एक्सपेरिमेंट कर रहा है।
लेकिन एफएम चैनल वालोंे ने हिन्दी की प्रगति में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। म्यांऊ -च्यांऊ एफएम की एंकर तो प्योर इंग्लिश बोलते-बोलते आहिस्ते से सीरियस हिन्दी बोल देती है। यह फीलिंग कुछ ऐसी ही है जसे बर्गर चबाते-चबाते अचानक रसगुल्ला मुंह में आ गया हो और हिन्दी का कद फाइव गज उठ जाता है।
आइ एम रियली थैंक्स टूडेज हीरोइन्स बिकाज, ये हिन्दी फिल्मों की नायिकाएं अंग्रेजी में इंटरव्यू देते-देते जब हिन्दी में मुस्कुरा देती हैं तो एक बार में लाखों लोगों को इससे सीखने को मिलता है और हिन्दी को फोर मून (चार चांद)लग जाता है। हिन्दी फिल्मों में भी टाइटल आधा इंग्लिश में रखने का चलन है जसे दिल दोस्ती ईटीसी, जब वी मेट, किस्मत कनेक्शन, सिंह इज किंग और न जाने कितनी फिल्में अंग्रेजी नाम को पीछे और हिन्दी नाम को आगे रख रही हैं।
हमें अपने बड़ों से कुछ सीखना चाहिए। मुङो याद है वो दिन जब हमारे इंग्लिश के टीचर इंग्लिश गाली इडियट, नानसेंस, डफर कहते-कहते चोट्टा, नालायक और बेवकूफ पर आ जाते थे उनका हिन्दी प्रेम देखकर आंख भर आती है। सच ये उनका हिन्दी के साथ प्यार ही था, एकदम ट्रू लव।
साथियों! हिन्दी के डेवलपमेंट के लिए एक बात और, आप इंग्लिश की डिक्शनरी हमेशा साथ रखें, सीने से चिपका कर रखें। हिन्दी के विकास के लिए जरूरी है कि आप अपना डेली वर्क भी हिन्दी में करें। लंच, डिनर, लव, अफे यर्स, गुटुरगूं, मार-पिटाई, गाली-गलौज ऑल वर्क हिन्दी में ही हो, और हां पड़ोसी से रिक्वेस्ट करें कि प्लीज मेरी हिन्दी गाली का जबाव भी हिन्दी में ही दें। सरकार भी इस मामले में ठोस कदम उठाए जो हिन्दी में नहीं बोलेगा पर वर्ड सवा रुपए जुर्माना।
भाषण खत्म होने पर सहीराम ने पूछ लिया आप पर कितना जुर्माना लगे?
अभिनव उपाध्याय
सखी री मैं पनिया भरन नहीं जाऊं
चाहे गंगा हो या गोमती, चाहे कोसी हो या सरयू आजकल नदियों में न जाने क ौन सी दीवानगी छाई है कि बढ़ती ही जा रही हैें। लेकिन यमुना समझदार है इसे पता है कि कृ ष्ण जन्माष्टमी बीत चुकी है, चतुर, चितवन, चितचोर ने अपना चरण स्पर्श करा दिया है या कोई सरकारी आश्वासन टाइप कुछ मिल गया है कि मान जाओ हिमालय पुत्री चुनाव करीब है। हमें तुम्हारे सेहत का ख्याल है इस बार दिल्ली को थोड़ा बख्श दो, अगली सरकार बनते ही हम तुम्हारी आखिरी इच्छा पूरी कर देगें। और यमुना जी मान भी गई। थोड़ी गर्जना और थोड़ी सरकार के सुरक्षा उपायों की पोल खोल कर शांति के साथ बहने लगी।
मामला अटका है सरयूू का यूपी सरकार ने उन्हे कोई आश्वासन नहीं दिया है। सरयू जी नें भी अपनी दलील रखी कि हम राम की जन्मभूमि के पास से गुजरते हैं हमारा महत्व यमुना से कम नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने दो टूक जवाब दिया, देखो, राम और जन्मभूमि यह बीजेपी का मसला है इसका दलितों की चेतना से कोई वास्ता नहीं है प्रधान मंत्री बनने दो तब कुछ सोचूगीं फिलहाल राहत कार्य बढ़ाने के अलावा मैं कुछ नहीं कर सकती।
बिहार में कोसी की हालत कुछ और ही है। कोसी भी सरकार को दोषी मानकर कोस रही है। ठीकठाक बह रही थी कोसी लेकिन सरकार की दरार बांध में दिखने लगी। सरकार तो चल रही है लेकिन बांध चल बसा और कोसी की लहरें और भंवर कह रही है हमारी मांगें पूरी करो। सरकार अभी कुछ सोचती आंदोलन और तेज हो गया। अब मामला बस राहत कार्य पर आकर अटका है। कोसी कह रही है मेरी सेहत देखो, तटबंधों को चौड़ा करो, मेरी गाद निकालो। लेकिन खद्दरधारी संत ने कहा चुप रह तुम्हारी दुदर्शा को हम लोग चुनावी एजेंडा बनाएंगें, इसमें विपक्ष को भी घसीटेगें बस एक गुजारिश है तुम और फैलो 15 नहीं 150 गांवों को घेरो, चार लाख नहीं चालिस लाख लोगों को बेघर करो। अरे अच्छा मौका है जनता की सेवा का मइया थोड़ा लूटने दो। नाविक से लेकर ठेकेदार, मददगार सब लूट कर खुश हैं काहे को पेट पर लात मारती हो बढ़ो थोड़ी और बढ़ो। एक मीटर और बढ़ जाती तो मजा आ जाता। कोसी फूल रही है उफना रही है हरहरा रही है। एकदम मदमस्त होकर, घुमड़-घुमड़ कर।
उधर सहीराम के गांव में भादों की रासलीला चल रही है। कलयुगी राधा ठुमक-ठुमक कर नाच रही है और मटका लेकर सखियों के संग गा रही है- सखी री मैं पनिया भरन नहीं जाऊं , ना सूङो पनघट ना सूझे मोहन, मैं बाढ़ देखि डर जाऊं। सखी री मैं पनिया भरन नहीं जाऊं।
Monday, December 1, 2008
पप्पू वोट नहीं देता
ऐसा नहीं कि चुनाव के पहले पप्पू को मनाने की कोशिश नहीं हुई। बड़ा वाला चाकलेट, बढ़िया कपड़ा, जूता यही नहीं प्रत्याशी के साथ उसे हाथी पर बैठाकर घुमाया गया कि शायद ऊंचाई देखकर उसका मन बदल जाए लेकिन पप्पू तो पप्पू ही है। एक दम अड़ियल सांड़ जसा चाहे कुछ भी कहो नतीजा वही...।
सारी कोशिश बेकार, चुनाव से पहले दिन भी पप्पू मजे से टीवी पर मुम्बई में धमाकों की आवाज सुन रहा था। बाबा नारंगी को पप्पू पर कुछ शक हुआ कहीं कोई भूत-प्रेत का चक्कर तो नहीं है, लेकिन ओझा बाबा ने सांप्रदायिकता के मंत्र से ऐसा झाड़ा कि पप्पू का पारा और गरम। नारंगी फिर परेशान कि अब क्या करें, उसे डाक्टर विकराल जी के पास ले जाया गया उन्होंने भी मालेगांव का आला लगाकर उसकी नब्ज टटोली लेकिन पप्पू एक दम सुन्न। यह किसी के समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर पप्पू को क्या हो गया है।
एक आखिरी उपाय बचा था कि पड़ोस के बुद्धिमान प्रोफेसर बुद्धिसागर के पास ले जाया जाए तो शायद कुछ बात बन जाए। यह भी आजमाया गया। पप्पू सिर झुकाए खड़ा हो गया। लेकिन पप्पू के पहुंचने का समय गलत था क्योंकि उस समय प्रोफेसर साहब फासीवादी पकौड़े के साथ समाजवादी चाय पी रहे थे। उन्होंने पप्पू को पुचकारा, सिर पर हाथ फेरा बोले ऐसा नहीं करते बेटा वोट देते हैं, देख नहीं रहे हो सभ्यताएं टकरा रही हैं, दुनिया तेजी से बदल रही है। पूंजी प्रवाह असंतुलित है अपने महत्व को समझो। यह लोकतंत्र का महापर्व है, नाचो, गाओ, पटाखे छोड़ो खुशियां मनाओ। इस तरह मुंह नहीं लटकाते लो पकौड़े चख लो। लेकिन पप्पू तो एकदम पप्पू था, भैंस के आगे बीन बजाए भैंस बैठ पगुराय.
अब मामला क्रिटिकल होता जा रहा था। पप्पू घूम-फिर कर फिर टीवी से चिपक गया। खबर दिलचस्प थी, ‘आडवानी नहीं गए मनमोहन के साथ मुम्बई,ज् विज्ञापन था ‘आतंक आखिर कब तकज्, फिर चंचला ऐंकर चिल्ला रही थी, ‘आतंक के साए में मुम्बईज्, विज्ञापन फिर आ गया ‘विकास को वोट दें। लेकिन पप्पू का वोट न देना राज ही रहा।
अभिनव उपाध्याय






चित्र मन के भाव बयां करते हैं। इरान के कलाकार इमान मलिकी की पेंटिंग आँखों को सजीव चित्र का आभास कराती हैं . ऊपर पेश है कुछ ऐसी ही पेंटिंग.जो गूगल से साभार ली गई है .



